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जल, जंगल, जमीन के हक हकूक के मसले अदालती फैसले से सुलझेंगे?

By   /  June 24, 2012  /  No Comments

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-पलाश विश्वास
2006 से अपनी जमीन की वापसी की लड़ाई लड़ रहे सिंगुर के बेदखल किसानों और खेतिहर मजदूरों को नया कानून बनाकर भी राहत नहीं दे सकी मां माटी मानुष की सरकार। ३४ साल के वाम शासन के अवसान के बाद परिवर्तन का साल बीतते न बीतते सत्ता में रहते हुए फिर आंदोलन की राह पर हैं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी क्योंकि कोलकाता हाईकोर्ट ने सिंगुर के अनिच्छुक किसानों को जमीन वापस दिलाने के लिए नई सरकार के सिंगर कानून को अवैध और असंवैधानिक करार दिया है। सिंगुर में जमीन वापसी के सरकार के फैसले पर अदालत की रोक से किसानों में एक बार फिर हताशा छा गई है। राज्य सरकार इसके खिलाफ दो महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है। सिंगुर कानून के तहत राज्य सरकार ने टाटा मोटर्स के कब्जे से सिंगुर की सारी जमीन अधिग्रहित करने का फरमान जारी किया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट से टाटा ने स्थगनादेश हासिल कर लिया। सिंगुर के किसानों का धीरज भी जवाब देने लगा है। मां माटी मानुष की सरकार का जनाधार खिसकने का भारी खतरा पैदा हो गया है। लिहाजा अपना प्रबल जन समर्थन को अपने हक में बनाये रखने और परिवर्तनपंथी ताकतों को एकजुट बनाये रखने के लिए दीदी के सामने आंदोलन के सिवाय कोई रास्ता नहीं है।बहरहाल टाटा ने जिस नैनो कार को बनाने के लिए पश्चिम बंगाल में हल्दिया जिले के सिंगुर की जमीन राज्य सरकार से पट्टे पर ली थी, वह कार अब गुजरात के सानंद में बनकर सड़कों पर दौड़ती दिख रही है।किसानों को उनकी जमीन वापस मिल सके, इसके लिए सिंगुर भूमि सुधार अधिनियम तैयार किया। लेकिन न जाने किस उत्साह में इस अधिनियम पर राष्ट्रपति की सहमति हासिल करना किसी को भी याद नहीं रहा। इस कानून को अब कोलकाता उच्च न्यायालय के खंडपीठ ने न सिर्फ निरस्त कर दिया है, बल्कि उसे असांविधानिक भी कहा है। इसके निरस्त होने के पीछे राष्ट्रपति की सहमति न लेना भी एक कारण है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है।अदालत का कहना है कि इस कानून और भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 में अंतर्विरोध है। अदालत ने यह भी कहा है कि सरकार के पास इस पुराने कानून को बदलने या उसमें संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है। मुमकिन है कि इस फैसले का टाटा के लिए ज्यादा महत्व न हो। नैतिक जीत के तर्क के अलावा अब यह उम्मीद नहीं है कि टाटा मोटर्स नैनो बनाने के लिए सिंगुर लौटेगी। लेकिन यह फैसला ममता बनर्जी के लिए बड़ी समस्या खड़ी करने वाला है।

सिंगुर, नंदीग्राम, लालगढ़ जनअभ्युत्थान और परिवर्तन अभियान की निरिवावाद नेता के लिए आंदोलन कोई नई चीज नहीं है। भारतीय राजनीति में सिंगुर मसले का महत्व सिर्फ इतना ही नहीं है कि इसने पश्चिम बंगाल से वाम मोर्चे को उखाड़ फेंका और ममता बनर्जी को सत्ता में पहुंचा दिया। सिंगुर मसले ने निजी उद्योगों के लिए सरकार द्वारा कृषि योग्य जमीन के अधिग्रहण पर सबसे पहले सवाल खड़ा किया, जो राष्ट्रीय बहस का मसला बना। सिंगुर के बाद ही यह सवाल उठा कि निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण में सरकार बिचौलिया की भूमिका क्यों निभाए? साथ ही यह भी कि हर भूमि अधिग्रहण के बाद किसान ही घाटे में क्यों रहते हैं? पर विडंबना यह है कि दीदी अब विरोधी नेत्री नहीं हैं और न सड़क पर हैं। अब वे कैसा आंदोलन और किसके खिलाफ आंदोलन  करेंगी?ही राष्ट्रपति चुनाव के मामले में उन्हें न सिर्फ कांग्रेस के हाथों राजनीतिक मात मिली है, बल्कि वह इस पूरी राजनीति में अलग-थलग भी पड़ गईं। और अब उन्हें उस मसले पर कानूनी मात मिली है, जिससे उन्होंने राज्य की वामपंथी सरकार को हिलाने का अभियान शुरू किया था। ममता बनर्जी सरकार की यह शिकस्त यह तो बताती ही है कि लोकप्रियता की राजनीति में किसी मसले पर हो-हल्ला करना बहुत आसान होता है, लेकिन हकीकत में उसे सुलझाना एक जटिल प्रक्रिया होती है।वैसे वाममोर्चा ने सत्ता में आने के बाद तुरंत एक जनांदोलन चलाया था, जिसे भूमि सुधार कहा जाता है।जो बंगाल और पूर्वी भारत में  १९४७ के सत्तेता हस्भातांतरण से पहले से जारी  जमींदार जोतदार विरोधी तेभागा आंदोलन के कार्यक्रम को असली जामा पहुंचाने का सरकारी आयोजन था। पर दीदी के आंदोलन में किसानों को जमीन वापस दिलाने या भूमि अधिग्रहण का उग्र विरोध होने के बावजूद जल, जंगल और जमीन के मुद्दे पर सोच और कार्यक्रम, या नीति का सिरे से अभाव रहा है। उनका आंदोलन और राजनीति आवेगमय अतिसंवेदन भावनाओं का खेल है, जिससे जल, जंगल और जमीन के मुद्दे हल नहीं होते। ठीक वैसे ही जैसे अदालती फैसले हमेशा सत्तावर्ग के हक में होते हैं या फिर न्याय इतना विलंबित हो जाता है कि विलंबित राग का यह अलाप सदैव सीमांत और बहिष्कृत समुदायों के लिए वसंत विलाप बन जाता है।

गनीमत है कि दीदी अब फेसबुक पर है क्योंकि जिस मीडिया के दम पर आज तलक उनकी राजनीति और भावनाओं का खेल आज राइटर्स के मुकाम हासल करने को कामयाब है और हिलेरिया स्पर्श से अहिल्या उत्कर्ष पर है, उसके लिए दीदी के सरोकार और जनाधार से ज्यादा बाजार की प्राथमिकताएं ज्यादा जरूरी है। मीडिया का करिश्मा भी यह कि बाजार की प्रथमिकताएं अब लोक प्राथमिकताएं हैं। इस प्रकरण में हस्तक्षेप के लिए सूचनातंत्र में सीधे हस्तक्षेप की दरकार है और सोशल मीडिया के इस वैकल्पिक दरवाजे पर उनका दस्तक स्वागतयोग्य है, निःसंदेह। परन्तु यह भी सोशल मीडिया के व्याकरण से बाहर खड़े होकर सड़क की राजनीति की तर्ज पर एक कलाबाजी में तब्दील होने लगा है। दीदी के वाल पर सोच कम , सरोकार ज्यादा हैं। विमर्श है नहीं, एकतरफा उद्दात्त आवाहन है, भावनाओं का काव्यिक उन्मेष है। बस, और कुछ नहीं। तो इससे क्या कि भावनाओं का समुंदर है और जनसमुद्र को छूते रहने का उल्लास है! यहां भूमि सुधार जैसे मुद्दे और आंदोलन की सोच कहीं है ही नहीं। दरअसल फेसबुक वाल ही दीदी का आधिकारिक नीति दर्पण है और वे न अन्यत्र न अननंतर कुछ बोल लिख रही हैं कि उनका दिलोदिमाग टटोलने का मौका मिलें।

दरअसल कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले से न तो सरकार की हार हुई है और न टाटा की जीत। यह तदर्थ यथास्थिति वाद है, जो सिंगुर के भूगोल और इतिहास के आर पार जल जंगल जमीन से बेदखल समस्त जनसमूह की पूर्व नियति है। देश के कानून बाजार और कारपोरेट के हक में हों और संवैधानिक प्रावधानों तक का खुला उल्लंघन हो तो उसी संविधान का हवाला देते हुए देश के कानून को सर्वोपरि बताकार किसानों को जमीन वापसी के प्रावधान को असंवैधानिक, गैरकानूनी करार देने का कानूनी रास्ता यकीनन भूमि सुधार का रास्ता नहीं है।

जिस भूमि अधिग्रहण कानून,  १८९४ के हवाले से यह फैसला आया, दरअसल उसको बदलने के लिए जो भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून का प्रस्ताव है और जो ममता दीदी के विरोध के कारण ही विलंबित है, उसमें भी भूमि अधिग्रहण के सार्वजनिक हित, यानी कारपोरेट बिल्डर प्रोमोटर माफिया हित प्रमुख हैं। सिर्फ भूमि अधिग्रहण ही क्यों, वन अधिनियम,खनन अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम, समुद्रतट संशोधन अधिनियम, नागरिकता कानून, विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून, प्रकृतिक संसाधन कानून और सारे संबंधित कानून सिंगुर के किसानों के विरुद्ध हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को कहा कि उनकी सरकार सिंगूर के किसानों के हित के लिए वचनबद्ध है और आशा है कि किसानों की जीत होगी। बनर्जी की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास अधिनियम-2011 को असंवैधानिक और अमान्य करार दे दिया है। इस अधिनियम के जरिए तृणमूल कांग्रेस, टाटा मोटर्स को दिया गया भूमि का पट्टा रद्द कर जमीन किसानों को लौटाना चाहती थी और उन्हें बेहतर मुआवजा व पुनर्वास पैकेज देना चाहती थी।बनर्जी ने राज्य विधानसभा में कहा, “मैं न्यायालय के फैसले पर टिप्पणी नहीं करना चाहती। लेकिन हम सिंगूर के किसानों के हितों के प्रति वचनबद्ध हैं और उनके साथ लगातार खड़ा रहेंगे। मुझे भरोसा है कि अंतत: किसानों की जीत होगी।” न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष और न्यायमूर्ति मृणाल कांति चौधरी की खण्डपीठ ने सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास अधिनियम-2011 को अवैध घोषित करते हुए कहा कि सिंगूर अधिनियम में मुआवजे की धाराएं भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 से मेल नहीं खातीं।

राज्य सरकार अनिच्छुक किसानों को भूमि देने के लिए कानूनी लड़ाई के साथ-साथ आंदोलन भी जारी रखेगी। यह प्रस्ताव शनिवार को टाउन हाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में पारित हुआ। बैठक में तय किया गया कि किसानों, खेतिहर मजदूरों व वर्गादार किसानों के हितों की रक्षा की जाएगी। इस सिलसिले में दो सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है। दस दिन के अंदर फिर इस सिलसिले में बैठक की जाएगी। बैठक के बाद ममता ने फेसबुक पर उनका समर्थन करने वालों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थिति में आपका समर्थन हमारे लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत है। सिंगुर आंदोलन इतिहास में एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट है। इसके लिए मैंने 26 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। इस मसले ने देश में गरीब किसानों की जमीन अधिग्रहित करने को लेकर एक गंभीर बहस शुरू की थी। शनिवार की बैठक में भाग लेने वाले कृषि जमीं जीवन जीविका रक्षा कमेटी के नेता प्रदीप बनर्जी ने कहा कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन किया जायेगा। पहले से आंदोलन में शामिल लोगों के अलावा इसमें नये लोगों को भी जोड़ा जायेगा। बैठक करीब दो घंटे तक चली, जिसमें नेता, बुद्धिजीवी, लेखक, अध्यापकों आदि को लेकर सुश्री बनर्जी के नेतृत्व में सिंगुर आंदोलन के भविष्य व कार्य सूची पर विस्तृत-विचार विमर्श किया गया। दी। इस बैठक को गैर राजनीतिक बैठक बताया गया है लेकिन उसमें सभी वर्ग के लोग शामिल थे। श्री बनर्जी ने कहा कि जरूरत पड़ी तो सिंगुर आंदोलन में शामिल होने ममता बनर्जी भी जायेंगी। सिंगुर में सभा आदि करने की योजना बनायी गयी है।

श्रम मंत्री पुर्णेदु बसु ने कहा कि दो सदस्यीय कमेटी में वह नहीं शामिल हैं क्योंकि वह अब मंत्री भी हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर आंदोलन में हिस्सा लेंगे। विभाष चक्रवर्ती ने कहा कि सिंगुर की भूमि अनिच्छुक कृषकों को दिलाने के लिए अब दो रास्ते बचे हैं। पहला यह कि हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाय और दूसरा यह कि फिर आंदोलन किया जाय। उन्होंने कहा कि वर्ष 2006 से चल रहे आंदोलन को अब तेज करने का समय आ गया है। बैठक में कृषि मंत्री रवींद्रनाथ भंट्टाचार्य, उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी, उच्च शिक्षा मंत्री ब्रात्य बसु, मेयर शोभन चंट्टोपाध्याय, रेल मंत्री मुकुल राय, सांसद कुणाल घोष, सांसद डेरेक ओब्रायन, शिशिर अधिकारी, कृषि बचाओ कमेटी के नेता व आईएनटीटीयूसी नेता प्रदीप बनर्जी, सुब्रत बक्शी, पीडीएस नेता समीर पुततुंडू, एसयूसीआई नेता सोमेन बसु, कृषि रक्षा कमेटी के नेता बेचाराम मन्ना, जेडीयू नेता अमिताभ दत्त, जमायेत उलेमा हिंद के सिद्दीकुल्ला चौधरी, वर्कर्स पार्टी के सुखेंदु भंट्टाचार्य, बुद्धिजीवियों में जय गोस्वामी, विभाष चक्रवर्ती, पेंटर शुभो प्रसन्ना, अध्यापक सुजय बसु, अशोकेंदु सेनगुप्ता आदि ने हिस्सा लिया। इस बैठक के माध्यम से सिंगुर के लोगों को संदेश देने की कोशिश की गयी है कि सरकार उनके साथ हैं। उन्ह निराश होने की जरूरत नहीं है। आंदोलन का ऐलान भी इसी का हिस्सा है। पीडीएस के नेता समीर पुततुंडू ने कहा कि जरूरत पड़ने पर सिंगुर में आंदोलन किया जायेगा।

कोलकाता से 45 व हावड़ा स्टेशन से 34 किलोमीटर दूर सिंगुर की आबादी 2001 की जनगणना के अनुसार 19539 है। इसमें पुरुष 51 प्रतिशत जबकि महिला 49 प्रतिशत हैं। साक्षरता दर 76 प्रतिशत रही। टाटा के लिए 997.11 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गयी है। इसमें 404 एकड़ भूमि का विरोध हो रहा है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सिंगुर के लोगों में नाउम्मीदी साफ नजर आ रही है।कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा शुक्रवार को सुनाए गए फैसले के बाद सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सिंगुर की जमीन पर किसका हक है? तृणमूल सांसद व अधिवक्ता कल्याण बनर्जी का कहना है कि सिंगुर की जमीन राज्य सरकार के कब्जे में है। सरकार से जमीन वापस लेने के लिए टाटा को फिर से कोर्ट जाना होगा। श्री बनर्जी ने फैसले का हवाले देते हुए कहा कि कोर्ट के आर्डर में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है कि जमीन टाटा को लौटानी है। सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए आवश्यक कागजात तैयार कर रही है। हालांकि, टाटा मोटर्स के अधिवक्ता समरादित्य पाल का कहना है कि जिस कानून को आधार बनाकर सरकार ने जमीन पर कब्जा किया था। उसे ही जब कोर्ट ने निरस्त कर दिया है तो फिर सवाल ही नहीं उठता कि जमीन को वापस लेने के लिए कोर्ट जाना पड़े।

सिंगुर में टाटा मोटर्स को दी गई जमीन वापस लेने के लिए राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून यदि संवैधानिक भी होता तो उक्त जमीन को लेकर कई पेंच फंस सकते थे। इसकी एक नहीं, कई वजहें हैं। पिछली वाममोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स और उसके लिए कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों को 997.11 एकड़ जमीन लीज पर दी थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उक्त जमीन को टाटा से लेकर उनमें से 400 एकड़ जमीन अनिच्छुक किसानों को लौटना चाह रही हैं। हालांकि, शुक्रवार को हाईकोर्ट ने सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास अधिनियम 2011 को ही असंवैधानिक करार दे दिया है। अगर ऐसा नहीं भी होता तो चार सौ एकड़ जमीन लौटा पाना सरकार के लिए आसान नहीं होता। सुश्री बनर्जी पहले से भी कहती रही हैं कि लौटने के बाद शेष बची 600 एकड़ जमीन पर टाटा यदि कारखाना लगाए तो वे उनका स्वागत करेंगी।

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  • Published: 5 years ago on June 24, 2012
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  • Last Modified: June 24, 2012 @ 4:06 pm
  • Filed Under: बहस

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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