/फेसबुक पर लिखी जा रही हैं रिश्तों की नई-नई इबारतें!

फेसबुक पर लिखी जा रही हैं रिश्तों की नई-नई इबारतें!

दैनिक भास्कर ने फेसबुक के भारतीय उपयोगकर्ताओं पर एक सर्वेक्षण करवाया और रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसे हम अक्षरक्ष: मीडिया दरबार के पाठकों के समक्ष रख रहे हैं…

 

नौजवान या बुजुर्ग, छोटे शहर या महानगर, खुशी हो या गम, रोमांस हो या फिर आशीर्वाद, फेसबुक पर लिखी जा रही हैं रिश्तों की नई-नई इबारतें, हर पल, हर घड़ी। जिंदगी और रिश्तों में घर करती सोशल नेटवर्किंग पर रिपोर्ट…

इंजीनियरिंग स्टूडेंट निशा (20) ने तीन बरस पहले फेसबुक (एफबी) अकाउंट खोला। आज हाल यह है कि घर पर नेट नहीं मिलता, तो साइबर कैफे चली जाती हैं। खाना छूट सकता है, लेकिन फेसबुक नहीं। उनकी लव  स्टोरी भी फेसबुक में लिखी गई। जयपुर की निशा कहती हैं, ‘कोचिंग में मेरे साथ एकलड़का पढ़ता था। एक कॉमन फ्रेंड ने हमारी मुलाकात कराई और अगले ही दिन मैंने उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी।

चैटिंग शुरू हुई, मुलाकातें बढ़ीं और वह बॉयफ्रेंड बन गया।’ दो साल पुरानी निशा की लव स्टोरी में दो महीने ऐसे भी आए, जब बातचीत बंद हो गई। निशा कहती हैं, ‘उस वक्त एफबी से ही पता लगता था कि उसकी जिदंगी में क्या चल रहा है। धीरे-धीरे खटास खत्म हुई। मैंने बातचीत की पहल की तो बात बन गई।’

लखनऊ में बसे और पेशे से टीचर सुनील का भी कमोबेश यही हाल है। उनकेलिए फेसबुक घर-सी है। उनका कहना है, ‘फेसबुकबिना भी क्या जीना? जब कभी फेसबुकनहीं मिलती, तो लगता है जैसे कुछ छूट गया। फेसबुकपर चार साल पहले आया था। इसने अब तककरीब दस लड़कियों से रिलेशनशिप बनाने का जरिया दिया।’

यह फेसबुक की दुनिया है, जो रोज नई दास्तां लिख रही है। पहले रिश्तों की शुरुआत फर्स्ट गियर में होती थी। दूसरे, तीसरे गियर से होते हुए रिश्ते चौथे गियर में आते थे, जिसमें दो-तीन बरस लगना मामूली बात थी। लेकिन फेसबुक से रिश्तों की शुरुआत ही टॉप गियर में होती है। असल में फेसबुक ने जिंदगी की किताब के पहले और आखिरी पन्ने के बीच का फासला मिटा दिया है। रिश्ते बन रहे हैं, आगे बढ़ रहे हैं। नए आयाम खुल रहे हैं।

बीते हुए कल में खो चुके रिश्ते भी फिर से सामने आ रहे हैं। फेसबुक की आबादी अगले महीने 100 करोड़ हो जाएगी। यानी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मुल्क। 125 करोड़ लोगों केभारत में फेसबुकभले ही केवल 3 फीसदी तक पहुंची हो, लेकिन वह दुनिया में उसका दूसरा सबसे बड़ा मैदान बन चुका है। भारतीय यूजर की संख्या 130 फीसदी ग्रोथ के पंख लगाकर उड़ रही है। यूजर की बढ़ती संख्या के साथ फेसबुकरिश्तों की परिभाषा और नियम भी बदल रही है।

नए रिश्ते, नए आयाम 

सोशल नेटवर्किग की खुली किताब ने लोगों को दिल खोलने का मौका दिया है। हिचक अब दूर भाग गई है। जिस बात को कहने से पहले कई बार सोचा जाता था, अब वह बात बिना सोचे फेसबुक वॉल पर लिखी जाती है। और दुनिया उस पर रिएक्शन देती है। मसलन, आगरा की प्रियंका गुप्ता ने फेसबुकवॉल पर प्रेम का नया रूल लिख दिया। उन्होंने लिखा है, ‘जिंदगी उसके लिए जियो, जो आपकेलिए जीता हो, उसकेलिए नहीं, जो आपको पूछता तकनहीं। प्यार उससे करो, जो आपसे करता हो, उससे नहीं, जिससे आप करते हों।’ इस पर पांच कमेंट्स और आठ लाइक तुरंत आ गए।
फेसबुक रिश्तों को जोड़ने, खोजने या सिर्फ तोड़ने का काम ही नहीं करती। वह उसके नए रूप, नए आयाम को जानने में भी मदद करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है फेसबुक स्टेटस। फेसबुक अपने यूजर्स को मौजूदा स्टेटस बताने का मौका देती है। इस बात पर हैरत हो या न हो, ‘इट्स कॉम्प्लिकेटेड’ सबसे ज्यादा मशहूर स्टेटस है। रिश्तों को इतने रंगों से देखने का नजरिया सिर्फ फेसबुक में है। इससे पहले रिश्तों की इतनी गहराई सिर्फ मनोविज्ञान की किताबों और लेक्चर में मिला करती थी। स्टेटस के अलावा फेसबुक ने और भी कई नई चीजें ईजाद की हैं।

मसलन लाइक, एक ऐसा क्लिक जो यूजर को सिर्फ एक सेकेंड में अपनी पसंद जाहिर करने का मौका देता है। कुछ वक्त पहले तक इस काम के लिए लंबे-लंबे ई-मेल लिखने पड़ते थे। फेसबुक पर रोज 2.7 अरब लाइक आते हैं। लाइक की शोहरत कितनी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इजरायल के एक दंपति ने अपने बच्चे का नाम ही ‘लाइक’ रख दिया। ऐसा नहीं कि फेसबुक सिर्फ शेर-ओ-शायरी, संजीदा और हल्की-फुल्की टिप्पणियों, किस्से-कहानियों के लिए है। लोगों ने इसे अपना टैलेंट दिखाने का मीडियम भी बना लिया है।

योगेश श्रीवास्तव अपना थियेटर ग्रुप चलाते हैं। एक्टर बनना चाहते हैं। पोर्टफोलियो प्रोफाइल केलिए जो तस्वीरें बनवाते हैं, तुरंत फेसबुक पर डालते हैं। वह एफबी को सीवी बताते हैं। योगेश अकेले नहीं हैं। इन दिनों पेंटर्स अपनी पेंटिंग, सिंगर अपने ऑडियो, फोटोग्राफर अपनी फोटोग्राफ, फेसबुक पर डालने लगे हैं।  फेसबुक पर अभी ऐसे मुद्दे ज्यादा हावी दिखते हैं, जो ‘यंगिस्तान’ से ताल्लुक रखते हैं। दरअसल, भारतीय एफबी यूजर्स में बड़ी तादाद नौजवानों की है। लेकिन दूसरी उम्र के लोग भी इसमें दाखिल हो रहे हैं। विषयों का दायरा बढ़ता जा रहा है।

सियासत और साहित्य पर रोज गंभीर चर्चाएं हो रही हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ टीम अन्ना ने जिस तरह से एफबी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, वह बेहद दिलचस्प था। अमेरिका और यूरोप में एफबी पर रक्तदान से लेकर कैंसर मरीजों के सपोर्ट ग्रुप तक एक्टिव हैं। अलग-अलग उम्र के लोगों केएफबी में कदम रखने पर भारत में भी आने वाले वक्त में ऐसा देखने को मिलेगा। फेसबुक कमर्शियल रिश्तों की किताब भी बन रही है।
कंपनियां इसके जरिए अपने पुराने कंज्यूमरों से संबंध मजबूत कर रही हैं और नए कंज्यूमर तक पहुंच रही हैं। उनकी पसंद-नापसंद जान रही हैं।

बूज एंड कंपनी के प्रिंसिपल राघव गुप्ता के मुताबिक,‘कंपनियों के लिए एफबी, कंज्यूमर तक पहुंचने का पावरफुल टूल है और आगे इसमें और मजबूती आएगी। शहरी इलाकों के बाद जैसे-जैसे देश के ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की पहुंच बढ़ेगी, कंपनियां रूरल सेगमेंट तक पहुंचने के लिए भी एफबी का इस्तेमाल बढ़ाएंगी। लेकिन ग्रामीण इलाकों में फेसबुक की शोहरत तभी बढ़ेगी, जब वह उनकी भाषा सीखेगी।’ जाहिर है, फेसबुक के कई पन्ने अभी लिखे और पढ़े जाने हैं।

पुराने दिनों और लोगों से मिलना

फेसबुक रिश्तों के नए पन्ने खोल रही है तो दिल के टूटे तार भी जुड़ रहे हैं। जालंधर की ट्रैवल कंपनी में काम करने वाली नीरा बताती हैं, ‘मैं और दीपक बहुत क्लोज थे। पर थोड़े दिन बाद दूरियां बढ़ने लगीं। फिलहाल वह यूएस में है। जबअपने शहर इलाहाबाद जाती हूं तो बरबस उसकी याद आती है।
यहां भागम-भाग भरी जिंदगी में किसी और चीज के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं मिलती। कुछ दिन पहले एककॉमन फ्रेंड मिला तो दीपक की चर्चा हुई। घर लौटी तो सोचा, चलो, फेसबुकपर दीपक की फोटो देखते हैं। पलक झपकते ही फोटो सामने थी। मैं हंस पड़ी। वह पूरी तरह टकला हो चुका है।’ फेसबुक स्कूल-कॉलेज या पुराने दफ्तर के साथियों को देखने और उनसे फिर जुड़ने की डोर दे रही है।

लगातार चालीस साल क्रिकेट कमेंट्री करने वाले रवि चतुर्वेदी और उनके जैसे बहुत सारे लोगों की दुनिया बदल दी फेसबुक ने। मुस्कुराते हुए रवि जी कहते हैं, ‘फेसबुक के जरिए पोते-पोतियों के करीब आ गया हूं। बेटा यूएस और बेटी सिंगापुर में सेटल है। दोनों अपने बच्चों की लेटेस्ट फोटो पोस्ट करते हैं। दूर होते हुए भी उन्हें बड़े होते देखने का सुख बयान करना मुश्किल है।’ कुछ इसी तरह का अनुभव मेरठ यूनिवर्सिटी में फिजिक्स पढ़ाने वाले प्रोफेसर पी. रतन का भी है।

प्रो. रतन ने ईमेल से बताया, ‘मुझ पर फेसबुक ने बड़ा उपकार किया। कई साल पहले स्ट्रोक का शिकार हो गया था। बोल-सुन नहीं सकता। फेसबुक पर पोते-पोतियों की फोटो देखकर खुश हो लेता हूं।’ 55 बरस की आरती मल्होत्रा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। पति  के न होने का गम तो उन्हें सालता है, लेकिन फेसबुक ने उन्हें अपने नाते-रिश्तेदारों से जुड़ने का मौका दिया। उन्होंने कहा, ‘फेसबुक मेरे लिए दुनिया से जुड़ने की राह है।’

अच्छा भी और बुरा भी

लेकिन ऐसा नहीं है कि फेसबुक के हर पन्ने पर पॉजिटिव कहानियां ही लिखीं जा रही हैं। कुछ पन्ने रिश्तों की कहानी लिखने के बाद कोरे कागज में बदल चुके हैं। इस ग्रे एरिया को इन्फोसिस से जुड़े कपिल ने बेहद करीब से देखा है। उन्हें एक फेसबुक फ्रेंड से भारी नुकसान हुआ। कपिल बताते हैं, ‘दो-तीन साल पहले एक फेसबुक फ्रेंड से खटपट हो गई।

उसने कई ऐसी चीजें फेसबुक पर डाल दीं, जिसके सिर्फ हमीं गवाह थे। फिर किसी अनजान लड़की से दोस्ती की हिम्मत नहीं पड़ी।’ शुक्र है यहां कुछ नुकसान नहीं हुआ। लेकिन हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं। पिछले साल आईआईएम बंगलौर की स्टूडेंट मालिनी मुमरू के बॉयफ्रेंड ने अपने ब्रेकअप का एलान फेसबुक पर करने की गलती की। इसके बाद मालिनी ने आत्महत्या कर ली। कॉलेज स्टूडेंट प्रशांत चौधरी के लिए फेसबुक, मोहब्बत सिखाने वाली किताब है। तीन साल में नौ रिलेशनशिप बना चुकेहैं।

फिलहाल उनकी तीन गर्लफ्रेंड हैं, लेकिन स्टेटस सिंगल ही रखा है। वह तीन गर्लफ्रेंड बनाने और उनसे निभाने की हिम्मत तो रखते हैं, लेकिन दुनिया के सामने इसके एलान का साहस उनमें नहीं है। वजह पूछने पर उन्होंने कहा, ‘अगर एफबी स्टेटस में इन-रिलेशनशिप या कमिटेड लिख दिया,  तो गर्लफ्रेंड तो भागेंगी ही, साथ ही मां-बाप घर से निकाल देंगे।’

एफबी चूंकि अमेरिका में जन्मा, सो इसका खुलापन वहीं के समाज के खुलेपन का आईना है। हमने भी फेसबुक से दोस्ती करने में ज्यादा वक्त नहीं लिया, पर यहां की संस्कृति और सामाजिक मान्यताएं उतने खुलेपन की इजाजत नहीं देतीं। शायद यही वजह है कि हमारे देश के लोग करते तो काफी कुछ हैं, लेकिन बताने से डरते हैं। यहां फेसबुक यूजर की तादाद भले ही तेजी से बढ़ रही हो, पर सच बयान करने के मामले में हम बेहद पीछे हैं।

चिट्ठी, टेलीफोन और ईमेल।

संचार की नई कड़ी फेसबुक ने फॉर्मूला वन कार की तरह सभी माध्यमों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। बच्चे, बूढ़े और जवान, सभी इसमें नए किस्से लिख रहे हैं। आज और आज के रिश्तों पर इसका असर दिखने लगा है। कल यह और बढ़ सकता है। अगर आप भी वक्तकी रफ्तार केसाथ चलना चाहते हैं, तो देर मत कीजिए, फेसबुक का दामन थाम लीजिए।

रोमांच के नए चैप्टर

फेसबुक का हिट फीचर है रिलेशनशिप स्टेटस। यूजर नौ में से कोई एक स्टेटस चुन सकते हैं, जैसे सिंगल, मैरिड, एंगेज्ड। पर सबसे मशहूर स्टेटस है ‘इट्स कॉम्प्लिकेटेड।’ भारतीय नौजवान एफबी से इन नए स्टेटस की ख्वाहिश रखते हैं:

लड़का, लड़की के बारे में

गर्लफ्रेंड के रूप में सही, पर वाइफ मेटेरियल नहीं

लड़की, लड़के के बारे में

बॉयफ्रेंड चलेगा, लेकिन कोई अमीर ही हस्बैंड बनेगा

लड़का-लड़की, मां-बाप पर

मेरी छोटी-सी लव स्टोरी में पैरेंट्स बने विलेन

दिलफेंक लोगों के लिए

कनफ्यूजन, क्योंकि मेरे पास कई ऑप्शन

पहली नजर में फिसलने वाले

एकतरफा मोहब्बत में मारे गए गुलफाम

शादी के बाद पछताने वाले

शादीशुदा,पर घर में जुदा

रोमांस के अलावा और भी बहुत कुछ…

बायोडाटा: लोग अपने लेख, पेंटिंग, पोर्टफोलियो, डिजाइन, फोटोग्राफ फेसबुक पर डाल करियर के नए दरवाजे खोल रहे हैं।

टीचर: जयपुर में बैठे स्टूडेंट को इंदौर में मौजूद टीचर फेसबुक से पढ़ा रहा है। स्टूडेंट सवाल साझा करते हैं और टीचर एफबी पर उन्हें सुलझाते हैं।

रिश्तेदार: फेसबुक भूले और टूटे रिश्तों में गर्माहट पैदा कर रही है। भले बातचीत न हो, पर एफबी उनकी जिंदगी को जानने का मौका दे रही है।

जासूस: पति-पत्नी हो या गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड, सभी को एफबी ने एक-दूजे की जिंदगी में ताक-झांक का मौका दिया। रिश्ते बन रहे हैं और बिगड़ भी रहे हैं।

न्योता: किताब का विमोचन हो, नृत्य-संगीत हो, कोई दूसरा शो हो या फिर ब्याह का मौका, आप एफबी पर किसी करीबी को पर्सनलाइज बुलावा भी भेज सकते हैं।

नए पन्ने: फेसबुक का दायरा अब नौजवानों तक सीमित नहीं। उम्रदराज भी नई दुनिया बना रहे हैं। नए दोस्तों से मिल रहे हैं, पुराने नाते मजबूत बना रहे हैं।

टेस्टिंग: प्रोडक्ट टेस्ट करने का रास्ता। एफबी दावों की पड़ताल करती है और विचारों का दम नापती है। ममता बनर्जी ने कलाम की दावेदारी के लिए इसे उपयोग किया।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.