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क्योंकि नौका दुर्घटनाओं में गरीब ही मरते हैं…

By   /  June 28, 2012  /  No Comments

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– अरविंद कुमार सिंह||

पिछले महीनों में कई नौका दुर्घटनाएं हुईं। इसमें असम में हुई नौका दुर्घटना काफी गंभीर थी और सैकड़ों लोग इसमें मारे गए। यह नौका दुर्घटना तो मी़डिया की निगाह में आयी। लेकिन उसके कुछ पहले ही हुई पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले की एक नौका दुर्घटना कायदे से सिंगल कालम में भी जगह नहीं पा सकी। इसमें हालांकि 70 से अधिक ग्रामीणों की मौत हो गयी। नौका दुर्घटनाओं के मामले में देश के तमाम हिस्सों में यही देखने को मिलता है कि गोताखोर या स्पीड बोट लोगों को बचाने के बजाय लाशें निकालने ही पहुंचते हैं।
आज भी इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध तथा परिवहन और संचार क्रांति की धूम के बीच भारत में तमाम इलाकों में ऐसी नौका दुर्घटनाएं होती रहती हैं। उनकी खबरें भी अखबारों में छपती हैं। पर इन दुर्घटनाओं के मृतकों को न तो उचित मुआवजा मिलता है, न ही ऐसा कोई ठोस कदम उठ पाता है कि दोबारा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। इसका कारण यह कि आज की तेज रफ्तार दुनिया में नौकाओं पर सफर करने वाले गरीब लोग सरकारों को आदमी नहीं लगते हैं। इसी नाते भारत सरकार या राज्य सरकारें ऐसे मामलों में रस्मी शोक संवेदना जताना भी उचित नहीं समझती है। न उनको देखने कोई मंत्री जाता है न सांसद।
आज भी विकास से कटे देश के तमाम नदी तटीय इलाकों में नौकाएं ही ग्रामीणों के संचार का सबसे बड़ा साधन है। परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में जल परिवहन अभी भी काफी सस्ता है। बाढ़ के दिनों में तो केवल नावें ही असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश औऱ बिहार में तमाम इलाकों तक पहुंचने का साधन होती हैं। इस दौरान भी कई जगहों पर नौका दुर्घटनाएं होती हैं। नौका दुर्घटनाओं में अधिकतर मामलों में यही देखा गया है कि वे उचित निगरानी तंत्र के अभाव, क्षमता से अधिक सवारियों को भर लेने या माल लाद देने तथा घाट माफिया की मनमानी के नाते होती हैं।
भारत के राष्ट्रीय जलमार्गों पर सुरक्षित नौवहन के लिए भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण जिम्मेदार है। पर राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या एक(गंगा-हुगली-भागीरथी) तथा दो (ब्रह्मपुत्र) पर प्राधिकरण द्वारा डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिसनिंग सिस्टम (डीजीपीएस) तकनीक की शुरूआत की गयी है। पर विभिन्न राज्यों अभी भी जल परिवहन तंत्र से जुड़े सुरक्षा पहलुओं पर ठोस काम होना शेष है।
अंतर्देशीय जलयान अधिनियम 1917 के प्रावधानों में यांत्रिक अंतर्देशीय जलयानों के पंजीकरण के साथ कर्मी दल व सवारियों की सुरक्षा से संबधित अपेक्षाएं निर्धारित की गयी हैं। पर इसका अनुपालन राज्य सरकारों के दायित्व में है। पर राज्य सरकारें इस दिशा में उदासीन है,इसी नाते आम तौर पर साल भर और मानसून के दौरान देश के तमाम हिस्सों में नौका दुर्घटनाओं के मामले प्रकाश में आते हैं। खास तौर पर असम, बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में अधिकतर दुर्घटनाएं देसी नौकाओं से होती है। पर ताकतवर इंजनों से लैस स्पीड बोटें भी कम खतरा नहीं बनी हुई हैं। पूर्वोत्तर भारत में कुल नौकाओं में एक बड़ा हिस्सा स्पीड बोटें हैं जिनमें कई बिना लाइसेंस के अवैध रूप से चल रही हैं।
लेकिन यही देसी नौकाएं देश के तमाम हिस्सों में ग्रामीणों,खेतिहर उपयोग वाले पशुओं तथा कृषि उपज के साथ किसानों के लिए कई तरह की उपयोगी सामग्रियों की ढुलाई करती हैं। भारतीय जल यान अधिनियम में व्यवस्था है कि इन नौकाओं को बिना सुरक्षा उपायों के नहीं चलाया जा सकता है, पर दुर्गम इलाकों में इस कानून की अवहेलना होती है। स्वयं अंतर्देशीय जल परिवहन नीति (2001) में स्वीकार किया गया था कि अंतर्देशीय जल परिवहन का सुरक्षा का रिकार्ड उत्साहवर्धक नहीं है। राष्ट्रीय जलमार्गों पर तो हाल के वर्षों में ठोस पहल की गयी है पर कई राज्यों में अभी प्रभावी कदम उठाया जाना शेष है।
हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चित नौका दुर्घटना 30 सितंबर 2009 को केरल में हुई थी,जिसमें दिल्ली के एक परिवार के 10 सदस्यों समेत कुल 45 पर्यटक डूब गए थे। जलकन्या नाव में सवार पर्यटकों का दल पेरियार वन्यजीव अभयारण्य को देखने पहुंचा तो हाथियों का झुंड देखने के लिए वे नौका के एक कोने में एकत्र हो गए। इससे नाव एकांगी होकर पलट गयी। इस नाव पर दो विदेशी पर्यटकों समेत कुल 87 पर्यटक सवार थे। नौका दुर्घटना की जांच से पता चला कि इसकी क्षमता 70 सवारियों की थी। पर इसमें 17 और लोग लाद लिए गए थे। इस पर्यटक नौका पर बैठे किसी भी यात्री के पास लाइफ सेविंग जैकेट उपलब्ध नहीं थी। किसी ने पर्यटकों को कोई चेतावनी तक नहीं दी थी। केरल में थेक्कडी झील में जंगलों के बीच नौकाविहार का पर्यटकों में विशेष आकर्षण है। इसी नाते काफी सवारियों को लेकर नौकाएं चलती हैं। इस हादसे के बाद केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और केरल पर्यटन निगम के रवैये के प्रति असंतोष जताया और सुरक्षा उपायों पर बहुत तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि -केरल में पहले भी ऐसे हादसे हो चुके हैं जिन पर दुर्घटनाओं के बाद अफसोस जताने के अलावा कोई ठोस कार्य नहीं हुआ। कभी-कभी आयोग भी बना दिया गया , पर कोई जान नहीं पाता कि उसकी रिपोर्टों का क्या हुआ? इसी इलाके के पास 2007 में भी नौका दुर्घटना हुई थी, जिसमें 18 स्कूली बच्चों समेत 22 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। 27 जुलाई 2002 को वेंबानाद झील में नौका डूबने से 29 लोगों की मौत हो गयी थी। हालांकि केरल में इस घटना के बाद राज्य सरकार ने कई कदम उठाए। जांच-पड़ताल कर नौकायन का प्रमाणपत्र जारी करने के साथ यह भी सुनिश्चित किया गया कि नौकाओं पर लाइफ जैकेट्स रखे जायें।
देश के विभिन्न इलाकों में नौका दुर्घटनाओं की चपेट में आकर हर साल 700 से 1000 लोग अपनी जान गंवा देते हैं। इन दुर्घटनाओं में मरने वालों में महिलाओं और बच्चों की संख्या भी काफी होती है। असम, बिहार उत्तर प्रदेश,तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल केरल, आंधप्रदेश,छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों में नौका दुर्घटनाएं होती रहती हैं।
24 अप्रैल 2008 को पुणे के पास एक जलाशय में नाव पलट जाने से 19 लोगों की मौत हो गयी। महज 8-10 लोगों के बैठने की क्षमता वाली छोटी नौका पर 28 लोग सवार हो गए थे। 23 मार्च 2009 को चित्तौडग़ढ़ के पास राणा प्रताप सागर बांध के कमांड क्षेत्र में एक नाव के पलटने से भील जाति के एक परिवार के 10 लोगों की मौत हो गयी। सितंबर 2009 में बिहार के खगडिय़ा जिले में अलौली के पास बागमती नदी में एक बड़ी नाव दुर्घटना में 56 लोग मारे गए। इनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे थे। इस नाव पर क्षमता से काफी अधिक और 100 लोग सवार थे। इसी प्रकार 30 जनवरी 2010 को पश्चिमी गोदावरी (आंध्र प्रदेश) जिले में गोदावरी नदी में नौका पलटने से 16 लोगों की मौत हो गयी। इस नाव पर 80 से अधिक लोग सवार थे और संतुलन खो जाने के कारण नौका डगमगाकर पलट गयी। 15 जून 2010 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में नाव पलटने से 47 लोगों की मौत हो गयी। इस नाव पर 76 लोग सवार थे, जिसमें से 15 तैर कर बच निकले। छानबीन से यह भी पता चला कि नाव बेहद जर्जर थी और मझदार में जाकर अचानक बीच से फट गयी।
हाल मे जालौन हमीरपुर सीमा पर स्थापित प्राचीन मंदिर मां महेश्वरी का दर्शन कर लौट रहे 14 लोगों के साथ नौका डूब गयी,जिसमें चार लोग मारे गए। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए बेतवा पार करना पड़ता है। मल्लाह ने जब 14 लोगों को ले जाने से मना कर दिया तो धमकी देकर उससे नाव चलवा दी गयी।

अरविन्द कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा इन दिनों राज्यसभा टीवी को अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

इसी तरह 24 मई 2011 को बदायू फर्रूखाबाद सीमा पर गंगा नदी में एक नौका डूब जाने से इसमें सवार 26 लोग डूब गए। उसहैट (बदायूं) के अटैना गंगा घाट से करीब सवार होकर ये लोग फ र्रूखाबाद जा रहे थे। इसी प्रकार मऊ जिले के रणवीरपुर गांव के पास तमसा नदी में डोंगी पलटने से दिहाड़ी पर काम करने वाली छह महिलाएं मारी गयीं। इस घटना में जिला प्रशासन ने इनके परिजनो को 20-20 हजार रुपए देने की घोषणा की। डोंगी ती क्षमता पांच सवारियों की थी पर 14 लोग सवार हो गए थे। इसमें पतवार भी नहीं थी और महिलाएं डोंगी को चप्पल से ही खे रही थीं।
इसी प्रकार 28 मई 2011 को बेतवा नदी के ढेरी घाट पर एक ही परिवार के नौ लोग डूब कर मर गए। तीन ने किसी तरह तैर कर अपनी जान बचायी। मोंठ (झांसी) तहसील के थाना पुंछ के तहत महाराजगंज ढेरी में आयोजित उर्स में शिरकत करने व एरच गांव में हजरत मीरुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढाऩे जा रहे थे। बीच धारा में नाव पहुंची तो नाविक नियंत्रण खो बैठा और नदी का पानी तेजी से नाव में भरने लगा। देखते ही देखते नाव पलट गयी।
ये केवल कुछ घटनाएं हैं। देश के तमाम हिस्सों में देसी नौकाएं यात्री और माल परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। पर तमाम जर्जर नौकाएं भी चल रही हैं जिनकी तरफ सरकारों का ध्यान नहीं है। न उनकी जांच पड़ताल होती है न ही नदी किनारे के रहने वाले लोगों पर सरकार की निगाह जाती है। देश के तमाम हिस्सों में नौका दुर्घटनाओं में परिवारों को औने-पौने मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। राज्य सरकारों ने कानून बनाए हैं, पर वे भी देसी नौकाओं जैसे ही जर्जर हो चुके हैं। हाल में बिहार सरकार इस मामले में जरूर आगे आयी है। वहां के परिवहन मंत्री वृषन पटेल ने कहा कि क्षमता से अधिक यात्री और माल परिवहन के कारण होने वाली नौका दुर्घटनाओं को रोकने और जल यातायात नियमन के लिए बिहार सरकार जल्दी ही जल परिवहन कानून लागू करेगी। कानून से नौका दुर्घटनाओं को रोकने, जल परिवहन को नियमित करने तथा सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी। इस कानून के माध्यम से जलमार्गों पर विशेष ध्यान दिया जा सकेगा। जिलाधिकारी अधिकृत व्यक्ति से इस कानून का पालन तय कराएंगे। पर देखना है कि बाकी सरकारें कब जगती हैं और गरीब लोगों के सबसे सस्ते और पर्यावरण मैत्री साधन पर उनकी निगाह कब जाती है।

(अरविन्द कुमार सिंह की फेसबुक वाल से)

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  • Published: 5 years ago on June 28, 2012
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  • Last Modified: June 28, 2012 @ 3:31 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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