/गालियां एक अच्छी फ़िल्म को हास्यास्पद बना देती है

गालियां एक अच्छी फ़िल्म को हास्यास्पद बना देती है

-निलय उपाध्याय|| 

बहुत दिनों के बाद एक अच्छी फ़िल्म देखने को मिली गैंग्स ऑफ वासेपुर। सबसे बडा कमाल है कि यह फ़िल्म एक साथ तीन स्तरों पर चलती है। इतिहास के स्तर पर, लोक गीतों के स्तर पर और कहानी के स्तर पर।

इतिहास के स्तर पर नरेशन और कुछ पुराने समय के दृष्यो के माध्यम से यह कहानी हमें सुनताना डाकू के गौरव के साथ जोड्ती है और फ़िल्म के प्रति मन में यह विश्वास जताती है कि जिस तरह आजादी की लडाई में सुलताना डाकू ट्रेन लूट्कर लोगो को मदद करता है उसी तरह देश ने नए अंग्रेजो के खिलाफ़ एक लडाई होगी । विधायक जिसे अंग्रेजो की तरह ताकतवर और क्रूर होना चाहिए ,इतना कमजोर और अशक्त दिखने लगता है कि सरदार उसके बेटे को थाने मे मार करता है मगर वह कुछ नही करता। धनबाद के माफ़ियाऒ की क्रूरता के बारे में जिनको मालूम है वे इस पर यकीन नही कर सकते। अगर इतिहास से वर्तमान को कोई ताकत नहीं मिलती तो रचना में उसका उपयोग वर्जित है। यह कहा जा सकता है कि न तो वह इतिहास था न तो यह वर्तमान है। इतिहास और वर्तमान के यथार्थ के समकक्ष और समानान्तर सिनेमाई यथार्थ रखा गया है लेकिन कहानी के स्तर पर अभी यह कहना जल्द बाजी होगी क्योकि फ़िल्म का दूसरा भाग बाकी है और उसकी संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है।

इस फ़िल्म का महत्वपूर्ण पक्ष है उसका लोक गीतो में अंतरंगता के साथ चलना। आल्हा से लेकर जिन स्थानीय लोक धुनो को बजाया गया है वे बेमिसाल है और उनकी ताकत समझ में आती है। औरतो की करूणा को जिस तरह गीतो से उभारा गया है, उससे कहानी में अंतर्ध्व्नियो की क्षमता बढ जाती है।

कहानी के मोर्चे पर यह फ़िल्म सबसे मजबूत है। कहानी का मूल कन्फ़्लीक्ट है सरदार का बदला लेना और उस आदमी से जो उसके पिता की मौत का कारण था। उसकी घोषणा है कि कह के लूंगा। इस घोषणा के साथ एक्ट १ समाप्त होता है और एक्ट २ मे उस लडाई की शुरुआत होती है।यह बताने की कहीं कोशिश नही है कि सरदार एक आदर्श नायक है। लडाई भी मुल्य की नही वर्चस्व की लडाई है। सरदार अपने चरित्र के साथ अपने मिशन मे सफ़ल है। कहीं भी उसका मूल्य विधायक की हत्या करना नहीं है, कई बार दोनों की मुलाकात होती है और वह उनका मान मर्दन कर के छोड देता है। यही है उसका कह के लूंगा। यह अब तक कही गई कहानियों में एक नई बात है। इसमें सरदार के आत्म विश्वास और क्रूरता दोनो की झलक मिलती है। दूसरी तरफ़ मुसलमानों का विरोध करना हो तो मुसलमानों का साथ लो। केन्द्रीय राजनीति का चन्द्रशेखर जैसा नेता आकर रामाधार को मंत्र देता है और रामाधार सिंह नए हथियारो के साथ सक्रिय होता है। एक्ट ३ तीन आते आते समय बदल गया है। सरदार बदल गया है। ब्यक्ति के स्तर पर पर कहता है कि एक समय था जब मै और रामाधार सिंग… , परिवार के स्तर पर बेटे से कहता है कि बकरी मत बन जाना और पेशे के स्तर पर मछली का कारोबार। जीवन की यात्रा के उसके अनुभव सबक बन चुके है और इन हालातो में वह मारा जाता है। मारे जाने के बाद भी हमारी सहानुभूति सरदार के साथ नहीं होती। जीवन के रंग मंच का एक कलाकार था अपनी कला दिखला कर चला गया।

कहानी सरदार के दो और उसके बेटो के दो प्रेम कहानियो से होकर गुजरती है और लम्बी दूरी तय करती है जिसमें उसके भीतर का मनुष्य नजर आता है और जिनकी अनिवार्यता कहानी में तब समझ में आती है जब उसकी हत्या होती है । इसके अलावे कहानी मे पाईप गन बनाना, बम बनाना, हथियार की खरीद, हत्या बलत्कार जैसे सन्दर्भ आते है वे वास्तविक जीवन की क्रियाऒ से जोड कहानी को विश्वसनीय बनाते है।

निलय उपाध्याय

कहानी कभी दृष्यों में नहीं चलती.हर दृश्य एक सिक्वेंस में चलता हुआ आता है जिसके कारण कम संवाद ज्यादा प्रभावशाली होकर सामने आते है। जिन लोगो के पास विश्व सिनेमा के अनुभव है उन्हे समझ मे आ जाता है कि इस फ़िल्म के अधिकांश दृश्य चेतन या अवचेतन अवस्था में कहा से आए है लेकिन उसका प्रयोग बेहतर हुआ है। इसे मै कमजोरी नही ताकत मानता हूं। संभव है अगली कहानी में भी हमें गाड फ़ादर की प्रेत छाया देखने को मिले।

सब कुछ सही होने के बाद गालियां अखर जाती है और इस तरह अखरती है कि फ़िल्म की पूरी गम्भीरता को हास्यास्पद बना देती है।फ़िल्म में जितनी बार हंसी उभरती है वह अश्लीलता की हंसी है गोया दर्शक फ़िल्म का मजाक उडा रहे है। किसी भी समाज में ऎसा नहीं होता कि सबकी भाषा सिरे से अभद्र हो। इतिहास से ज्यादा गालियो पर शोध हुआ है और उचित जगह खोज कर पूजा में अक्षत की तरह इस्तेमाल किया गया है। इससे फ़िल्म को बाजार तो मिल सकता है, भद्र लोगो के दिल में जगह नहीं बन सकती। अनुराग कश्यप इस भाषा के जनक नहीं है, प्रकाश झा ने इसका बेहतरीन इस्तेमाल कर सिनेमा में अपनी जगह बनाई है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.