/RO हर जगह नहीं OK

RO हर जगह नहीं OK


चाहे ऊंची कीमत चुकानी पड़े, घर में पीने का पानी प्योर होना चाहिए – यह सोचकर दिल्ली में बड़ी तादाद में लोग आरओ (रिवर्स ऑसमोसिस) सिस्टम लगवा रहे हैं। आरओ आम तौर पर महंगा है, तो आम आदमी को लगता है कि यह खास प्योरिफायर होगा और किसी भी हद तक की गंदगी या खारेपन को खत्म कर देगा। हकीकत यह है कि दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में इसकी जरूरत नहीं है। यहां बता दें कि पानी की जांच कराए बिना आरओ लगवाना सेहत के लिए नुकसानदेह है।

जानकारों के मुताबिक, आरओ सिस्टम पानी में मौजूद टीडीएस को कम करके 10 पर्सेंट तक कर देता है। अगर पानी में टीडीएस 1200 एमजी/ लीटर है तो आरओ से 120 एमजी/ लीटर तक हो जाएगा। इस तरह ज्यादा टीडीएस की वजह से जो पानी हम नहीं पी सकते थे वह पीने लायक बन जाएगा। लेकिन दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में लोग जल बोर्ड का पानी इस्तेमाल करते हैं, जहां टीडीएस लेवल सही है। अगर इस पानी में हम आरओ तकनीक इस्तेमाल करते हैं तो टीडीएस लेवल घटकर बेहद कम हो जाता है जो पीने लायक पानी को ज्यादा हानिकारक बनाता है। यानी जल बोर्ड के पानी को साफ करने के लिए आरओ की जरूरत नहीं है।

राजीव कुमार (बदला हुआ नाम) ने बड़ी उम्मीदों से घर में आरओ लगवाया था। उन्होंने बताया कि आरओ लगाने वाली कंपनी ने हमें सिस्टम लगाने से पानी के टीडीएस पर फर्क पड़ने के बारे में कुछ नहीं बताया। हाल ही में जब कंपनी की तरफ से आरओ चेक करने के लिए एग्जिक्यूटिव आया, तब पता चला कि उसका टीडीएस महज 45-50 तक पहुंच गया है। इस तरह जो तकनीक हम साफ पानी पाने के लिए यूज कर रहे थे, वही हमारे पानी को खराब कर रही थी।

हैजर्ड सेंटर के डायरेक्टर डूनू रॉय कहते हैं कि लंबे वक्त तक कम मिनरल वाला पानी पीने से शरीर में जरूरी मिनरल्स की कमी हो सकती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक अगर पीने के पानी में मिनरल्स की कमी है तो उस कमी को अच्छा खाने से भी पूरा नहीं किया जा सकता।

फोर्टिस हॉस्पिटल में ऑथोर्पेडिक कंसलटेंट डॉ. कौशलकांत मिश्रा कहते हैं कि जब पानी से मिनरल का कंटेंट कम होता है तो उसकी वजह से बॉडी में मिनरल की कमी हो जाती है। तब हड्डी में जमा मिनरल निकलकर बॉडी के मिनरल लेवल को मेंटेन करने की कोशिश करते हैं। इससे हड्डियों में कमजोरी आ सकती है और मिनरल के बिगड़े संतुलन की वजह से हॉर्मोन्स का संतुलन भी बिगड़ सकता है।

(पूनम पांडे – नभाटा)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.