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सरबजीत पर पाकिस्तान का मानवीयता के साथ क्रूर मजाक

By   /  June 30, 2012  /  No Comments

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– राजीव गुप्ता||

दोनों देशो में अचानक भरतमिलाप हो जाने की उम्मीद  किसी को भी नहीं होनी चाहिए इसकी पुष्टि सरबजीत की रिहाई के मसले पर पाकिस्तान ने अपने रवैये से सिद्ध कर दिया! परन्तु इस सबके बावजूद रिश्ते सुधारनेकी जो पहल दोनों तरफ से शुरू हुई है , वह ईमानदारी के बिना ज्यादा आगे नही जा सकती, इसका ध्यान दोनों देशो को रखना चाहिए!  ज्ञातव्य है कि सरबजीत सिंह को 1990 में पाकिस्तान के लाहौर और फ़ैसलाबाद में हुए चार बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया था और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी थी ! बम विस्फोट के आरोपों में मौत की सजा पाए पिछले बीस वर्षों से  लाहौर स्थित कोट लखपत  जेल में बंद सरबजीत के मसले पर बात – बात पर अपनी बात से पलटकर धोखा देने वाले पाकिस्तान से भारत अब उम्मीद लगाये भी या नहीं यह एक यक्ष प्रश्न बन गया है ! वैसे भी पाकिस्तान विश्व के सभी देशो को लगभग हर मुद्दे पर बात-बात में दगा देने की महारत हासिल है परिणामतः विश्व पटल पर पाकिस्तान की नियत पर सदैव से  प्रश्नचिन्ह लगता रहा है जिससे उसकी साख को धक्का लगता है ! हाल ही में इसी मंगलवार को पूरे दिन भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों की मीडिया में राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी द्वारा सरबजीत सिंह की फाँसी की सज़ा को उम्र कैद में तबदील कर देने की चर्चा ग़र्म थी! परन्तु पाकिस्तान की पलटी ने फिर से अपने आपको प्रश्नचिन्ह के घेरे में खड़ा कर लिया! 

ग़लतफ़हमी के शिकार 

 इस मामले पर ग़लतफ़हमी  इतनी ज़्यादा थी कि  भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने सरबजीत को रिहा करने से जुड़े कथित कदमों के लिए जरदारी को धन्यवाद तक कर दिया तो वही दूसरी तरफ पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्रियों तक ने सरबजीत को माफी की ख़बर का स्वागत कर दिया! एक केंद्रीय मंत्री शेख वकास ने तो यहाँ तक कहा था कि उनकी सरकार भारत और पाकिस्तान के आम लोगों को करीब लाने की कोशिश कर रही है और इसलिए इस प्रकार के फैसले लिए जा रहे हैं ! केंद्रीय मंत्री शेख वकास ने कहा था कि सरबजीत के मामले को विस्तार से पढ़ने के बाद पता चलता है कि उनकी रिहाई से पाकिस्तान को कोई नुक़सान नहीं है बल्कि फायदा है और तो और वकास ने सरबजीत की रिहाई के कारण को विस्तार से समझाते हुए यहाँ तक कहा था, “जब भारत ने पाकिस्तानी नागरिक डॉक्टर खलील चिश्ती को रिहा किया था और वह स्वदेश लौटे थे तो उसके बाद पाकिस्तानी सरकार पर अतंरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया था कि वह सरबजीत सिंह जैसे क़ैदियों को रिहा करे !” इस पूरे प्रकरण के चंद घंटो के ही भीतर इस ख़बर के गलत साबित कर पाकिस्तान अपनी बात से पलट गया जिससे कई सवाल खड़े हो गए हैं और जिनके उत्तर आना अपेक्षित है परन्तु ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की यह अनबूझी पहेली मात्र भारत की जन – भावनाओ के साथ क्रूर मजाक के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह गयी है !

मीडिया का सारा दोष

फरहातुल्लाह बाबर ने इस उपापोह की स्थिति को साफ करते हुए दावा किया कि मीडिया ने ब्रेकिंग न्यूज की हड़बड़ी के चलते सरबजीत सिंह का नाम चला दिया उन्होंने आगे कहा कि ”मैने भारतीय टीवी चैनल से बातचीत में सुरजीत का नाम लिया था न कि सरबजीत का ! लेकिन क्योंकि उनके दिमाग में बस सरबजीत का ही नाम था इसलिए जल्दबाजी में उन्होंने सरबजीत सिंह की ही खबर बना दी !” फरहातुल्लाह बाबर साहब यही नहीं रुके तथा तथ्यों का हवाला देते हुए एक कदम और आगे बढ़कर बोले कि “इसकी प्रमाणिकता तो किसी भी वक्त सिद्ध की जा सकती है कि जो पत्र कानून मंत्रालय ने गृह मंत्रालय को मंगलवार को भेजा था उसमें किसका नाम है – सुरजीत सिंह का या फिर सरबजीत का. अगर उसमें सुरजीत सिंह का नाम है तो दबाव में नाम बदलने वाली बात तो अपने आप ही खारिज हो जाती है !” ध्यान देने योग्य है कि जो पाकिस्तान मात्र चंद घंटो में ही अपनी बात से मुकर जाता है भला उसके तथ्य विश्वसनीय होंगे भी अथवा नहीं !!

भारत में निराशा का दौर 

सरबजीत की रिहाई की गलत खबर से जहां भारत में निराशा छाई गई, वहीं पाकिस्तान के सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरबजीत सिंह के वकील ने कहा कि इससे पाकिस्तान की छवि काफी खराब हुई है ! सरबजीत सिंह के वकील अवैस शैख के अनुसार “कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसा होगा क्योंकि सरबजीत और सुरजीत दोनों का मामला अलग है ! राष्ट्रपति जरदारी तो केवल सरबजीत सिंह की सजा को माफ कर सकते हैं जबकि सुरजीत सिंह तो उम्र कैद के कैदी थे !” उनके अनुसार पाकिस्तान ने सरबजीत सिंह के मामले में दुनिया अच्छा संदेश नहीं भेजा है और इसको लेकर सरकार की कड़ी आलोचना हो रही है कि वह इस मामलों को गंभीरता से नहीं ले रही है !

कट्टरपंथियों का दबाव 

जरदारी के प्रवक्ता ने टीवी चैनलों पर साफ तौर पर सरबजीत का नाम लिया था लेकिन देर रात नाम को लेकर भ्रम होने की बात कैसे पैदा हुई, इस बारे में यहां राजनयिक हलकों में सवाल पूछे जा रहे हैं ! अटकलें हैं कि पाकिस्तान की मिलिट्री ने एक बार फिर भारत-पाक रिश्तों को सामान्य बनाने की पाक सरकार की कोशिशों को नाकाम किया है !  पाकिस्तानी राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता ने अपने बयान में बिल्कुल साफ कहा था कि सरबजीत की दया याचिका पर विचारकरके राष्ट्रपति ने उन्हें रिहा करने का फैसला किया है! लेकिन जैसे ही यह खबर प्रसारित हुई, वैसे ही पाकिस्तान की धार्मिक कट्टरपंथी पार्टियों जमात – ए – इस्लामी और जमात – उद – दावा ने यह कहकर आसमान सिर पर उठा लिया कि सरबजीत का अपराध अजमल कसाब के मचाए कत्लेआम से भी बुरा है और सुप्रीम कोर्ट के फैसलेकी अनदेखी करते हुए उसे रिहा करने का कदम उठाकर आसिफ अली जरदारी ने हिंदुस्तान के आगे घुटने टेक दिए हैं! पाकिस्तानी मीडिया के एक वर्ग में भी इस फैसले की निंदा की गई थी! पाक के चर्चित टीवी न्यूज एंकर हामिद मीर ने सरबजीत को भारत का अजमल कसाब तक बता दिया !

सिलसिलेवार घटनाक्रम 

अदालत को अपने बचाव में सरबजीत ने तर्क दिया कि वो निर्दोष हैं और भारत के तरनतारन के किसान हैं! गलती से उन्होंने सीमा पार की और पाकिस्तान पहुंच गए! सरबजीत पर जासूसी के आरोप लगाने के बाद  उन पर लाहौर की एक अदालत में मुक़दमा चला और पहली बार 1991 में न्यायाधीश ने उनको मौत की सज़ा सुना दी गई ! निचली अदालत की ये सज़ा हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखी ! सरबजीत ने सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी जिसे 2006 में खारिज कर दिया गया ! मार्च 2008 को पाकिस्तान की समाचार एजेंसियों के हवाले से खबर आई कि सरबजीत की फांसी तारीख तय हो गई है और उसे 1 अप्रैल को फांसी दे दी जाएगी ! पर 19 मार्च को ये खबर आई कि 30 अप्रैल तक के लिए सरबजीत की फांसी पर रोक लगा दी गई है !  भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में ये बयान दिया कि पाकिस्तान में क़ैद भारतीय बंदी सरबजीत सिंह की फाँसी 30 अप्रैल तक टाल दी गई है ! इसके बाद इसी साल पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने सरबजीत राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के पास एक दया याचिका भेजी ! इस याचिका में अंसार बर्नी ने अपील की कि सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए या उन्हें रिहा कर दिया जाए !

गलत पहचान 

पिछले साल 2011 में पाक में कैद सरबजीत सिंह का मामला एक बार फिर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा ! सरबजीत के पाकिस्तानी वकील ओवैश शेख ने असली आरोपी मनजीत सिंह के खिलाफ जुटाए तमाम सबूत पेश कर मामला फिर से खोलने की अपील की ! वकील ओवैश शेख ने कोर्ट में दावा किया कि उनका मुवक्किल सरबजीत बेगुनाह है और वो मनजीत सिंह के किए की सजा काट रहा है ! ओवैश शेख का कहना था सरबजीत को सन 1990 में मई-जून में कराची बम धमाकों का अभियुक्त बनाया गया है, जबकि वास्तविकता में 27 जुलाई 1990 को दर्ज एफआईआर में मनजीत सिंह को इन धमाकों का अभियुक्त बताया गया है ! पाकिस्तान का कहना था कि सरबजीत ही मनजीत सिंह है जिसने बम धमाकों को अंजाम दिया था!

दया –  याचना

इसके बाद से लगातार पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी उनकी बहन दलबीर कौर सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए लगातार प्रयास करते रहे! इस दौरान दलबीर कौर अपने भाई से मिलने पाकिस्तान की कोटलखपत जेल भी गईं और सरबजीत की रिहाई के लिए भारत में मुहिम चलाती रहीं और पाकिस्तान सरकार से दया की गुहार लगाती रहीं! मई 2012 में भारत में पाकिस्तानी बंदी खलील चिश्ती को पाकिस्तान यात्रा की उच्चतम न्यायालय से इजाजत मिलने के बाद प्रेस परिषद अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से सरबजीत सिंह को रिहा करने की अपील की! अपने पत्र में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश काटजू ने कहा कि इस मामले में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य सरबजीत का कथित इकबालिया बयान था, जिसमें उन्होंने हमलों की जिम्मेदारी ली थी लेकिन सभी जानते हैं कि हमारे देशों में कैसे इकबालिया बयान हासिल किया जाता है!

दोनों देशो के बीच पनपी खाई को पाटने का इससे बेहतरीन मौका पाकिस्तान के पास और नहीं आयेगा! सारे राजनैतिक एवं कूटनीतिक संबंधो को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान को  लगभग बीस वर्षो से वहां की जेल में बंद सरबजीत को अपनी दरियादिली दिखाते हुए मानवता और नैतिकता के आधार पर रिहा कर देना चाहिए जिससे कि भारत – पाकिस्तान सम्बन्ध और प्रगाढ़ ही होगे  अन्यथा पाकिस्तान का यह शर्मनाक कदम सदा के लिए कलंकित होकर रह जायेगा!

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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