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इंटरनेट पर सेंसरशिप और ऑनलाइन मीडिया के भविष्य पर बड़ी बहस…

By   /  June 30, 2012  /  3 Comments

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मीडिया से जुड़े लोगों ने ऑनलाइन मीडिया को नियंत्रित करने के सरकार के प्रयास की आलोचना की और आगाह किया कि जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए. नोएडा में बुधवार 27 जून को आयोजित ‘एस पी सिंह स्मृति समारोह 2012’ में मौजूद मीडिया के तमाम लोगों ने सरकार के ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध किया. 

मीडिया खबर डॉट कॉम की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में ‘इंटरनेट सेंसरशिप और ऑनलाइन मीडिया का भविष्य’ विषय पर चर्चा हुई. कार्यक्रम में आनलाइन मीडिया पर नकेल कसने के सरकार के प्रयासों की निंदा की गई.  केंद्र सरकार की ओर से सोशल साइटों को सोनिया गांधी के खिलाफ की गई एक टिप्पणी को हटाने के लिए कहना और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से उनके कार्टून प्रसारित करने वाले एक प्रोफेसर को गिरफ्तार किये जाने पर चिंता व्यक्त की गयी.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की पूर्व एडिटर सलमा जैदी ने कहा कि सेंसरशिप की बात तो ठीक है लेकिन एक इंटरनेट वॉच होना चाहिए.

‘इंटरनेट सेंसरशिप और आनलाइन मीडिया का भविष्य’  विषय पर वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक ने कहा कि ऑनलाइन मीडिया ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को प्लेटफॉर्म दिया है. इंटरनेट पर सेंसरशिप के सवाल पर कार्णिक का कहना था कि ‘बांध नदियों पर बनते हैं, समुद्र पर नही’. आज इंटरनेट एक समुद्र की तरह हो गया है जिस पर किसी प्रकार का सेंसरशिप लगाना अतार्किक और अव्यवहारिक है.

इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ काम कर रही जर्मनी की कोवैक्स ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सोशल एक्सपेटेंस भारत में ज्यादा है ?  भारत में बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय प्रावधान पहले से ही भारतीय संविधान में डाले गए गए हैं. जब हम सेंसेरशिप की बात करते हैं तो सिर्फ मीडिया सेंसरशिप की बात नहीं कर रहे हैं, इसके अलावे भी हमें बाकी चीजों पर बात करनी होगी. हमारी बात कहने की कोई जगह नहीं है. मेरा स्पेस नहीं है, लेस प्रोटेक्टेड. ऐसा नही है कि कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं होनी चाहिए, लेकिन लेजिटिमेसी की बात है.

दिल्ली यूनिवर्सटी के लेडी श्रीराम कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ वर्तिका नंदा का इंटरनेट पर सेंसरशिप के बारे में कहना था कि अगर सेंसरशिप का मतलब गला घोटना है तो मैं इसका समर्थन नहीं करती, अगर इसका मतलब एक लक्ष्मण रेखा है जो बताता है कि हर चीज की एक सीमा होती है तो ये गलत नहीं है.

न्यूज़ एक्सप्रेस के प्रमुख मुकेश कुमार ने कहा कि मैं ऑनलाइन और सेंसरशिप की बात को आइसोलेशन में नहीं देखना चाहता. मुझे लगता है कि ये सेंशरशिप माहौल में लगायी जा रही है. सेंसरशिप के और जो फार्म है उस पर भी बात होनी चाहिए. मैं तो देख रहा हूं कि नितिश कुमार भी एक अघोषित सेंशरशिप लगा रहे हैं. एक कंट्रोल मार्केट सेंसरशिप लगायी जा रही है.बाजार सरकार को नियंत्रित और संचालित किया जा रहा है, बाजार का जो सेंसरशिप है, उस पर भी लगाम लगाया जाना चाहिए.

वहीं छत्तीसगढ़ न्यायालय के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन साहब ने ऑनलाइन मीडिया की तारीफ़ करते हुए कहा कि ऑनलाइन ने जो सबसे अच्छी बात की है वो ये कि आईना सामने रख दिया. सच बात मान लीजिए,चेहरे पर धूल, इल्जाम आईने पर लगाना भूल है. हमसे बाद की पीढ़ी ज्यादा जानती है क्योंकि सोशल मीडिया ने ऐसा किया है.

महुआ ग्रुप के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत ने इंटरनेट के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि  आज इंटरनेट बहुत जरूरी हो गया है और इसपर किसी भी तरह का सेंसर समाज के लिए ठीक नहीं. वैसे सरकार की मंशा ऐसी रही है. यह लोकतंत्र के बुनियादी अधिकार पर रोक लगाने जैसा है.

इस कार्यक्रम में बीबीसी हिंदी.कॉम की पूर्व एडिटर सलमा जैदी, वेबदुनिया के एडिटर जयदीप कार्णिक, मीडिया विश्लेषक डॉ.वर्तिका नंदा, न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार, महुआ न्यूज़ के ग्रुप एडिटर यशवंत राणा, जर्मनी की कोवैक्स, वेबदुनिया के जयदीप कार्णिक, छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन और इन.कॉम (हिंदी) के संपादक निमिष कुमार शामिल हुए जबकि मंच संचालन युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने किया.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. tejwani girdhar says:

    यह सर्वविदित ही है कि इन दिनों हमारे देश में इंटरनेट व सोशल नेटवर्किंग साइट्स का चलन बढ़ रहा है। आम तौर पर प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर जो सामग्री प्रतिबंधित है अथवा शिष्टाचार के नाते नहीं दिखाई जाती, वह इन साइट्स पर धड़ल्ले से उजागर हो रही है। किसी भी प्रकार का नियंत्रण न होने के कारण जायज-नाजायज आईडी के जरिए जिसके मन जो कुछ आता है, वह इन साइट्स पर जारी कर अपनी कुंठा शांत कर रहा है। अश्लील चित्र और वीडियो तो चलन में हैं ही, धार्मिक उन्माद फैलाने वाली सामग्री भी पसरती जा रही है। सोशल मीडिया पर आने वाले कमेंट देखिए, आप हैरान रह जायेंगे कि उनसे किसी का खून भी खौल सकता है। असामाजिक तत्त्व किसी भी शहर में धार्मिक उन्माद फैला कर दंगा करवा सकते हैं। पिछले दिनों राजस्थान के भीलवाड़ा में तो ऐसी ही टिप्पणी के कारण दंगे जैसी उत्पन्न हो गई थी। यानि कि साफ है कि हम अभिव्यक्ति की आजादी की पैरवी करते वक्त उसके दुरुपयोग की ओर आंखें मूंद लेना चाहते हैं। ऐसा करके हम असामाजिक तत्त्वों को गुंडागर्दी करने का लाइसेंस देना चाहते हैं।

  2. Dr Shashikumar Hulkopkar says:

    EVEN if sensor is put on Internet/ media the ways & means will be adopted for publicity stunts

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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