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गुंडागर्दी के बल पर दिखाए जाते हैं टीवी चैनल्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी

By   /  July 1, 2012  /  7 Comments

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टीवी चैनल शुरु करना जितना आसान है मगर उसे दर्शकों तक पंहुचना उतना ही विकट काम है. केबल के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचने वाले ये चैनल्स हर साल सौ अरब रुपये से ज्यादा अवैध तौर पर केबल उद्योग को बाटंते हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं रखा जाता. इसका सीधा सीधा मतलब है की जिस रुपये का कोई हिसाब नहीं होता वह काला धन होता है. यह आलेख पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कुछ समय पहले लिखा था लेकिन इसकी सामयिकता देखते हुए इसे अब मीडिया दरबार पर प्रकाशित किया जा रहा है.यहाँ हम यह भी दर्ज करना चाहेंगे कि अब डायरेक्ट टू होम के ज़माने में भी अपने चैनल को करोड़ों रूपये डिश सेवा प्रदाता कम्पनियों को दिए जाते हैं.

 

हर बरस एक हजार करोड़ से ज्यादा ऑफिशियल कालाधन केबल इंडस्ट्री में जाता है। हर महिने सौ करोड रुपये केबल इंडस्ट्री में अपनी धाक जमाने के लिये अंडरवर्ल्ड से लेकर राज्यों के कद्दावर नेता अपने गुर्गों पर खर्च करते हैं । हर दिन करीब एक करोड रुपये केबल-वार में तमंचों और केबल वायर पर खर्च होता है, जिनके आसरे गुंडा तत्व अपने मालिकों को अपनी धाक से खुश रखते हैं कि उनके इलाके में केबल उन्हीं के इशारे पर चलता है और बंद हो सकता है।

पुण्य प्रसून वाजपेयी

इन्ही केबलों के आसरे बनने वाली टीआरपी किसी भी न्यूज या मनोरंजन चैनल की धाक विज्ञापन बाजार से लेकर सरकार तक पर डालती है जो चैनल की साख चैनल को देखने वाले की टीआरपी तादाद से तय करते हैं। तो खबर यही से शुरु होती है। करोड़ों का कालाधन और कही से नहीं चैनल चलाने वाले देते हैं। चाहे खबरिया चैनल हों या मनोरंजन चैनल उसकी प्रतिस्पर्धा चैनलों के आपसी कंटेंट में पैसा लगाने से कही ज्यादा केबल पर दिखायी देने में खर्च होते हैं। और टीवी पर केबल के माध्यम से सिर्फ 60-70 चैनल ही एक वक्त दिखाये जा सकते है तो फिर बाकि चैनल खुद को स्क्रीन तक पहुंचाने में कितना रुपया फूंक सकते है और रुपया फूंकना ही जब टीआरपी के खेल से जुड़ जाये तो फिर करोडो कैसे मायने नहीं रखते यह सीबीडीटी की रिपोर्ट देखने से पता चलता है।

सरकार इसी केबल इंडस्ट्री पर ताला लगाने की पूरी तैयारी कर रही है। सूचना प्रसारण मंत्रालय की फाईल नं. 9/6/2004- बीपी एंड एल [ वोल्यूम छह] में 78 पेज की रिपीर्ट में केबल सिस्टम को डिजिटल में बदलते हुये उसके प्रसार और कानूनी ढांचे को सरकारी हद में लाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। कैबिनेट के सामने रखे जाने वाले इस प्रस्ताव को जानने से पहले जरा चैनलो और केबल के खेल को समझना जरुरी है।

क्योंकि एक तरफ सीबीडीटी की रिपोर्ट बताती है कि देश के जिन टॉप पांच टैक्स चोरों पर उसकी नजर है, उसमें रियल स्टेट, बिल्डर लाबी, चीटफंड, ट्रांसपोटर के अलावा केबल इंडस्ट्री है। और केबल वालो के कालेधन का नंबर तीन है। वही सरकार ने बीते पांच बरस में जिन-जिन कंपनियो को चैनलों के लाईसेंस बांटे उसमें सबसे ज्यादा रियल स्टेट, बिल्डर , चीट-फंड चलाने वालो के ही ज्यादातर नाम है। यानी एकतरफ केबल इंडस्ट्री के काले धंधे पर सीबीडीटी नकेल कसने के लिये फाइल तैयार कर रही है तो दूसरी तरफ कालेधंधे करने वालो को सरकार चैनलों के लाइसेंस बांट रही है।

यह भ्रष्टाचार का सरकारी लोकतांत्रिकरण है। जिसका असर यह हुआ है कि किसी भी खबरिया चैनल को राष्ट्रीय स्तर पर दिखने के लिये सालाना 35 से 40 करोड कालाधन बांटना ही पड़ेगा। जो केबल वालो की फीस है। मगर इसकी कोई रसीद नहीं होती।

इस कैश को देने के लिये हर कोई राजी है, क्योकि बिना केबल पर दिखे विज्ञापन के लिये तैयार होने वाली टैम रिपोर्ट से चैनल का नाम गायब होगा। और देश में फिलहाल जब साढे छह सौ चैनल हो और केबल टीवी पर एक वक्त में 60 से 70 चैनल ही दिखाये जा सकते हों तो फिर बाकि चैनल चलाने वाले क्या करेंगे।

जाहिर है वह खुद को दिखाने के लिये रुपया लुटायेंगे। क्योकि क्षेत्रवार भी हर राज्य में औसतन 145 चैनल चलाने वाले चाहते है कि केबल के जरीये उनके चैनल को दिखाया जाये। एक तरफ यह धंधा सालाना 900 करोड़ से ज्यादा का है तो इसके सामानांतर कालेधन की दूसरी प्रतिस्पर्धा केबल के जरीये टीवी पर पहले 15 चैनलो के नंबर में आने के लिये होता है। इसमें हर महिने 60 से 90 करोड रुपया बांटा जाता है।

यानी हर कोई रुपया लुटाने को तैयार हो तो फिर चैनलो के पास कालाधन कितना है या कहे कालाधन बांटकर विज्ञापन और साख बनाने को खेलने की कैसी मजबूरी बना दी गई है यह चैनलो की मार-काट का पहला हिस्सा है। दूसरा हिस्सा कहीं ज्यादा खतरनाक हो चला है। क्योंकि नये दौर में जब धंधेबाजों को ही चैनलों का लाइसेंस क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया तो चैनलों में सबसे बडा हुनरमंद टीआरपी मैनेज करने वाला बन गया। चैनलों में सबसे ज्यादा वेतन उसी शख्स को मिलता है जो टीआरपी मैनेज करने का भरोसा देता है और करके भी दिखा देता है।

लेकिन इस खेल का दवाब संपादको पर भी पड़ा है। टीआरपी मैनेज कर खुद को बडा हुनर मंद बनाने का ही चक्कर है कि दो राष्ट्रीय नयूज चैनलों के संपादकों से इनकम टैक्स वाले लगतार पूछताछ भी कर रहे है औरं इनकी टीआरपी भी हाल के दौर में आश्चर्यजनक तरीके से तमाशे के जरीये कुलांचे भी मार रही है। असल में करोड़ों के इस खेल में कितना दम है और इस खेल के महारथियों को रोकने के लिये सरकार की नीयत कितनी साफ है इसके एसिड-टेस्ट का वक्त अब आ गया है। क्योंकि कैबिनेट के लिये तैयार सूचना प्रसारण मंत्रालय की सीक्रेट रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस एनॉलाग सिस्टम पर केबल के जरीये टीवी तक चैनल दिखाये जाते है, उससे अगले तीन बरस में पूरी तरह डिजिटल में बदलना जरुरी है ।

इसके लिये बकायदा समयसीमा भी तय की गयी है। सबसे पहले 31 मार्च 2012 तक चार महानगर दिल्ली , मुंबई ,कोलकत्ता और चेन्नई में समूचा सिस्टम डिजिटल हो जायेगा। यानी केबल सिस्टम खत्म होगा । उसके बाद दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरो में 31 मार्च 2013 तक केबल सिस्टम की जगह डिजिटल सिस्टम शुरु होगा और तीसरे फेज में सितंबर 2014 तक सभी शहर और आखिरी दौर यानी चौथे फेज में दिसबंर 2014 तक समूचे देश में केबल का एनालाग सिस्टम खत्म कर डिजिटल सिस्टम ले आया जायेगा। जिसके बाद डीटीएच सिस्टम ही चलेगा। रिपोर्ट में इन सबके लिये कुल खर्चा 40 से 60 हजार करोड़ का बताया गया है।

जाहिर है सूचना-प्रसारण मंत्रालय की 78 पेज की इस रिपोर्ट को सिर्फ कैबिनेट की हरी झंडी मिलने का इंतजार है। जिसके बाद यह कहा जा सकता है खबरों के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, उसकी उम्र सिर्फ आठ महीने है। क्योंकि चार महानगर भी केबल के जरीये टीआरपी के गोरखधंधे पर खासा वजन रखते हैं और अगर वाकई 31 मार्च 2012 तक सिस्टम डिजिटल हो गया तो खबरों के क्षेत्र में क्रांति हो जायेगी।

लेकिन जिस सरकार की नीयत में दागियो को चैनल का लाइसेंस देना हो और उसी सरकार के दूसरे विभाग इन दागियो को पकड़ने के लिये जाल बिछाता दिखे तो ऐसे में यह क्यों नहीं कहा जा सकता है कि सरकार की हर पहल के पीछे पहले सत्ताधारियों का लाभ जुड़ा होता है और वह मुनाफा काला-सफेद नहीं देखता। यहां यह बात उठनी इसलिये जरुरी है क्योंकि केबल इंडस्ट्री पर कब्जा सत्ताधारियो का ही है।

पंजाब में बादल परिवार की हुकूमत केबल पर चलती है तो तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार की। कोई राज्य ऐसा नहीं है जहां राजनेताओ की सीधी पकड केबल पर नहीं है। और यही पकड़ उन्हें मीडिया के चंगुल से बचाये रखती है क्योंकि किसी भी सीएम या सत्ताधारी के खिलाफ खबर करने पर अगर उस चैनल को केबल ही दिखाना बंद कर दें तो फिर खबर का मतलब होगा क्या। एक वक्त छत्तीसगढ के कांग्रेसी सीएम रहे अजित जोगी ने अपनी ठसक इसी केबल धंधे के बल पर बेटे के कब्जे से बनायी। तो आंध्रप्रदेश में वाएसआर के मौत पर जिस न्यूज या मनोरंजन चैनल ने वाएसआर की तस्वीर दिखाकर वायएसआर का गुणगान नहीं किया उस चैनल का उस वक्त आन्ध्र प्रदेश में ब्लैक-आउट कर दिया गया।

मुंबई में तो केबल वार अंडरवर्लड की सत्ता का भी प्रतीक है। इसलिये मुंबई का हिस्सा केबल के जरीये दाउद और छोटा राजन में आज भी बंटा हुआ है। और देश में सबसे ज्यादा सालाना वसूली भी मुंबई में ही चैनलो से होती है क्योंकि टैम के सबसे ज्यादा डिब्बे यानी पीपुल्स मीटर भी मुंबई में ही लगे हैं। किसी भी राष्ट्रीय न्यूज चैनल को यहां सालाना आठ करोड रुपये देना ही पड़ता है। और क्षेत्रीय चैनल को पांच करोड़। करीब बीस हजार लड़के केबल पर कब्जा रखने के लिये काम करते हैं। और देश भर में इस केबल इंडस्ट्री ने करीब सात लाख से ज्यादा लड़को को रोजगार दे रखा है।

खुद सूचना प्रसारण मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि देश में 60 हजार लोकल केबल ऑपरेटर हैं । जबकि सात हजार स्वतंत्र केबल आपरेटर। और हर केबल आपरेटर के अंदर कम से कम पांच से 20 लड़के तक काम करते हैं। फिर टैम रिपोर्ट जुगाड करने वाले दस हजार लड़कों से ज्यादा की तादाद और टैम के लड़कों से सैटिंग करने वाले बडे बिचौलियों की तादाद जो चैनलों से मोटी रकम वसूल टीआरपी के खेल को अंजाम देते हैं। इस पूरे कॉकस को क्या सरकारी डिजिटल सिस्टम तोड देगा और वाकई अपने मंत्रालय की जिस सीक्रेट रिपोर्ट पर अंबिका सोनी बैठी हैं क्या कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद वाकई केबल-टीआरपी की माफियागिरी पर ताला लग जायेगा।

फिलहाल तो यह सपना सरीखा लगता है क्योकि अब के दौर में चैनल का मतलब सिर्फ खबर नही है बल्कि सत्ता से सौदेबाजी भी है और केबल पर कब्जे का मतलब सत्ताधारी होना भी है। और इस सौदेबाजी या सत्ता के लिये सीबीडीटी की वह रिपोर्ट कोई मायने नहीं रखती, जो हजारों करोड़ के काले धंधे को पकडने के लिये उसी सरकार की नौकरी को कर रही है जो सरकार चैनल का लाइसेंस देने के लिये धंधे के दाग नहीं लाइसेंस की एवज में धंधे की रकम देखती है। लेकिन सरकार की यह कवायद न्यूज चैनलों पर नकेल कस सरकारी तानाशाही होने वाली स्थिति भी दिखाती है। क्योंकि देशहित के नाम पर किसी भी जिलाधिकारी का एक आदेश चैनल का दिखाना बंद करवा सकता है।

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

7 Comments

  1. तो आप की प्रोब्लब क्या है हिंदू ने इस्लाम कुबूल किया ये या कि हनुमान नामी बन्दर को बंदर कहा ये ? और में बेवकूफों को कोई पाठ नहीं पढाता मेरी पढाई के बारे में कोई सवाल करना हो तो कर लेना लेकिन पहले सच सुनने की आदत डाल लेना फिर सवाल करना

  2. पत्रकारिता की सच्चाई देखे

  3. Madan Tiwary says:

    पीस टीवी संप्रदायिकता फ़ैलाता है , भारत के कानून के अनुसार उसे दिखाने वाले को जेल होना चाहिये । एक उअदाहरण देता हूं । एकबार उसने दिखाया कि एक हिंदु ने इस्लाम कबूल कर लिया है , इस्लाम कबूल करने वाले ने पुछा मेरे हाथ मे हनुमान की अंगुंठी है क्या करे , वह जाकिर नाक का कट्टर संप्रदायिक आद्मी ने कहा वह तो एक बंदर है चाहे रखो या फ़्र्क दो । और हां मुझे धर्मनिरपेक्षता का पाठ मत पढाना , पहले खुद पढना तब बात करना ।

  4. काफी दिनों से सोच रहा था कि आखिर क्या वजह है जो एक बेहतरीन ओर सच दिखाने वाला ओर अपने मुस्लिम धर्म का प्रचार करने वाला चैनल peace tv किसी भी सेट टॉप बाक्स पर नहीं दिखया जा रहा है जबकि अन्य धर्म से जुड़े चैनल कमोबेश हर सेट टॉप बाक्स पर दिखाई देते है…..में हैरान था की एक फ्री टू एयर चैनल आखिर क्यों नई दे रहें है हर एक कंपनी {सेट टॉप } वालों से फोन किया कोई सपष्ट जवाब नहीं मिला , में तो उस{peace tv} फ्री चैनल को पे कर के भी देखना चाहता था पर अफ़सोस कोई भी कंपनी जो चैनल सर्विस देती है सब ने मना कर दिया…शुक्रिया वाजपेयी जी आज आपके माध्यम से पता चला की क्यों उस सच्चे ओर खरे बंदे का चैनल मुझे किसी भी केबल सेट टॉप कंपनी ने क्यों नही दिखया.

  5. ies lekh ne aankhe kholdi hai andar ki sahi kahani kaiya hai yes to ab pata lag raha hai ies kale dhan ki lammbaye kitani hai yeto socha hi nahi jaa sakta hai ab koyee kranti honi hi chahiye.

  6. digitalization doesn't means only dth , its about stb.

  7. badi dukhad baat hai…. jara idhar bhi dekhen :-……………..इतना समय देने के लिए धन्यवाद मैं कुछ निवेदन करना चाहूँगा :- १) जामनगर की स्थिति हैदराबाद से भी महत्वपूर्ण है पाकिस्तान से सटे इस इलाके में बच्चों के मन में जहर (मिस्टर एस. सुन्दरम विना बी.एड.या शिक्षक- योग्यता के रिलायंस टाउनशिप जामनगर ( गुजरात ) में…स्थित के.डी.अम्बानी विद्या मंदिर में प्राचार्य पद पर सुशोभित हैं और बच्चों को सिखाते हैं – बड़ों के पांव छूना गुलामी की निशानी है,आपके पीछे खड़े शिक्षक -शिक्षिकाएं अपनी बड़ी-बड़ी डिग्रियां खरीद कर लाएहैं ये आपके रोल मोडल बनने के लायक नहीं हैं , गांधीजी पुराने हो गए उनको छोडो – फेसबुक को अपनाओ…. केवल यही नहीं १४-९-२०१० को हिंदी दिवसके दिन प्रातःकालीन सभा में जब इन्हें आशीर्वाद के शब्द कहने को बुलाया गया तो इन्होने माइकपर सभी बच्चों से कहा – " कौन बोलता है हिंदी राष्ट्र भाषा है, हिंदी टीचर आपको मूर्ख बनाते हैं.") भरा जाना भयंकर हो सकता है. २) प्रिंसिपल ने क्लास ११ – १२ से हिंदी हटा दिया है जबकि बच्चे पढना चाहते हैं . ३) २-२ पुराने चयनित ऑल इंडिया रेडियो राजकोट के वार्ताकार हिंदी टीचर को निकालकर हिंदी को कमजोर करके गुजरात को भी महाराष्ट्र बनाया जा रहा है, स्कूल के Director ऑफ़ अकादमिक राजठाकरे के भक्त हैं तथा इसमें उनका अहम् रोल है. ४) इन बातों की जरा भी आहट लग जाती तो मैं अपनी परमानेंट डी०ए०वी० की नौकरी छोड़कर यहाँ नहीं आता, मेरी पत्नी सेल की सरकारी नौकरी छोड़कर यहाँ नहीं आतीं इसलिए हम चाहते हैं कि नौकरी के लालच में इन लोगों के झांसे में कोई और न फंसे और ये बताना धर्म और ईमान का काम है विशेषकर मीडिया पर्सनल की ये जिम्मेदारी भी है पर रिलायंस के आगे सब चुप हैं, रिलायंस वाले कहते भी हैं हम सबको ख़रीदे हुए हैं, आए दिन वहां लोग आत्महत्याएं करते हैं पर पैसे की महिमा ..सब शांत रहता है, गरीब को जीने का जैसे हक़ ही नहीं है ५) राष्ट्रपति महोदया के यहाँ से चीफ सेक्रेटरी गुजरात को पत्र भी आया है पर वे उसे दबाकर बैठे हैं , मैंने हाईकोर्ट में केस कर रखा है ये सवाल राष्ट्रभाषा का अधिक है मेरा पर्सनल कम मेरे घर में रोटी साग है पर एक आदर्श नागरिक के नाते हम सब की भी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं ६) कृपया गुजरात को महाराष्ट्र मत बनने दो .

    आप निम्न कार्यों में यथासंभव मदद दीजिए :- ……………१) किसी एम० पी० के द्वारा संसद में इस प्रश्न को उठाया जाए . २) किसी वकील, सामाजिक कार्यकर्त्ता या एन० जी० ओ० के द्वारा जनहित याचिका दायर की जाए ३) पत्रकारों द्वारा इस बात को लगातार लिखा जाए ४) हम सभी लोग मिलकर जनजागरण का ये प्रयास ऐसे चलते रहें . यहाँ सब बिके हैं इसलिए मैं आपकी तरफ आशा भरी नज़रों से देख रहा हूँ मैं यहाँ अपने स्तर से भी प्रयासरत हूँ ….. विशेष जानकारी हेतु संपर्क करें :- ९४२८०७५६७४ , ८१२८४६५०९२, इमेल – [email protected], [email protected] See More

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