/यशवंत सिंह, तुम्हें दुश्मनों की क्या जरूरत, दोस्त जो हैं…

यशवंत सिंह, तुम्हें दुश्मनों की क्या जरूरत, दोस्त जो हैं…

-मदन तिवारी||

यशवंत सिंह

यशवंत सिंह की जमानत याचिका आज मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दी। वस्तुत: कल जमानत याचिका दाखिल हीं नही हुई थी। कल सिर्फ़ यशवंत को न्यायिक हिरासत मे लेते हुये जेल भेजा गया था याचिका पर सुनवाई आज हुई। दो मुकदमे यशवंत पर हुये हैं। एक मुकदमे मे जमानत याचिका खारिज हो गई तथा दुसरे मुकदमे मे पुलिस ने दो दिन का समय लिया है। जिला न्यायाधीश के यहां अभी कोई जमानत याचिका नही दाखिल की गई है। लेकिन इस बदलते घटनाक्रम मे वेब मीडिया के कुछ लोगों ने जो बहस छेड दी है वह निराशाजनक है। अधिकांश महानुभावों के कथन का जो सार है, उसके अनुसार यशवंत मे शराब पीकर गाली देने की आदत थी, रात-बिरात किसी को भी फ़ोन लगा कर तंग करना भी उसकी आदत मे शामिल था। हालांकि सभी ने एक स्वर में यह माना की यशवंत ने हमेशा आम पत्रकारो के मामलो को पुरी शिद्दत के साथ उठाया है,  बडे अखबार और मीडिया घरानों के लिये यशवंत नाम एक आतंक था। कुछ मित्रो ने जिनमे अविनाश भी शामिल हैं, उनके  अनुसार यशवंत  को सुधारने के लिये इस तरह के एक झटके की जरुरत थी।

मुझे लगता है कि हम विद्वत सभा यानी विद्वानो की सभा में बैठे हुये हैं। यह सभा एक अस्पताल के आपरेशन रुम मे हो रही है। सामने एक मरीज आपरेशन टेबल पर है उसका पेट चिरा हुआ है, वह दर्द से कराह रहा है, उस मरीज को किसी ने छूरा मारा है। मरीज की गलती यही थी कि वह नशे मे चूर होकर अक्सर गाली गलौज करता था। दुनिया के नियमो के हिसाब से हटकर रात को अपने मित्रो पर भी भड़ास निकालता था (दिन में फ़ोन करता तो कोई गलत नही), एक दिन उसने एक बडे आदमी के उपर भड़ास निकाल दी। खुब पिया, जमकर ऐसी की तैसी की, वह बडा आदमी खुद बहुत बड़ा नशेबाज था, उसके पास एक ऐसा लाउडस्पीकर था जिसकी आवाज बहुत गुंजती थी, उस लाउडस्पीकर से वह जिसे चाहे उसे अच्छा या बुरा बनाने का प्रचार करने लगता था। लोग भी उसकी बात को सही समझते थें, इतनी तेज आवाज वाला लाउडस्पीकर है, भला यह कभी गलत बोल सकता है। लेकिन उस बडे आदमी को जब इस कंगले शराबी ने दे दनादन गरियाना शुरु किया तो उसके होश उड गयें, उसे लगा कि यह तो मेरे लाउडस्पीकर के प्रभाव को खत्म कर देगा, बडे आदमी ने सबक सिखाने के लिये सोचा, बडे लोगो की परिषद जहां इस लाउडस्पीकर की मदद से साधु बन गये डकैत व्यक्ति बैठते थें, वहाँ इस मामले को रखा। उस परिषद के सदस्यों ने कहा अरे यह कंगला तुमको तंग कर रहा है, मारे साले को , बहुत विचार विमर्श के बाद यह निर्णय हुआ कि मारो साले को, लेकिन दिक्कत यह थी थप्पड वगैरह से मारने पर कोई खास असर होगा नही। परिषद के सदस्यों ने निर्णय लिया साले कंगले को गोली मार दो। फ़िर किसी ने कहा नही छूरा मारो काफ़ी है । उस बडे आदमी ने दुसरे दिन कंगले को दे दनादन चार – पाच छूरा मार दिया। अब विद्वानजन हाथ मे आपरेशन का हथियार लिये हुये आपरेशन के पहले यह चर्चा कर रहे हैं कि कंगले को सुधारने  के लिये बडे आदमी ने जो किया वह ठीक था, इसे थोडी देर और तडपने  दो, तब आपरेशन करेंगें।

यशवंत के उपर जो मुकदमा हुआ उससे एक घटना याद आ गई। सच्ची घटना है। कुछ बच्चे सेना की छावनी की चारदिवारी पर चढकर रोजाना अनार का फ़ल चुरा लेते थें , बार बार मना करने पर भी नही मानते थें । सेना के एक अफ़सर ने बच्चो को सबक सिखाने के लिये एक दिन चारदिवारी पर चढे एक लडके को गोली मार दी। लडका मर गया। सेना के अफ़सर  को जेल हुई और सजा भी ।

मदन तिवारी

मुझे यह कहते हुई तनिक भी झिझक नही हो रही है कि ह्मारे विद्वानजनो के पास ब्लाग पर क्रांति पैदा करने का भले बहुत अनुभव हो, वास्तविक जीवन मे संघर्ष क्या होता है उसका रत्ती भर अनुभव नही है। यशवंत पर हुआ मुकदमा पुर्णत: गलत है। जैसे फ़ल चोरी की सजा गोली मारना नही हो सकता वैसे हीं फ़ोन पर गाली देने या धमकी देने सजा धारा 386 नही हो सकती। रह गई एसएमएस की बात तो साईबर एक्ट नही लगा है, जब लगेगा तब देखा जायेगा । अभी विद्वता छोडकर के संघर्ष करने की जरुरत है। अगर सभी एकजूट होकर नही लडे तो आज न कल खून का स्वाद चख चुका शेर किसी दुसरे को भी खा जायेगा। अविनाश जी आपके साईट पर भी दलित संघर्ष के नाम पर जातिवादी गालियां दी जाती है। आपके मुसाफ़िर बैठा के साथ कई बार मेरी तकरार हुई है, लेकिन जब उन्हें बिहार सरकार ने बर्खास्त किया था तो सबसे पहले मैने अबतक बिहार सांध्य दैनिक मे इस मुद्दे पर नीतीश कुमार की बखिया उधेडी थी। मैं भुल गया था मुसाफ़िर बैठा से अपनी तकरार को। आज वही समय है। अगर मुकदमा सही होता तो आप सबकी बहस का कोई अर्थ भी था लेकिन यहां तो फ़ल चुराने के लिये गोली मारी गई है। यशवंत पर जो मुकदमा हुआ है उसमे आज या कल जमानत तो हो हीं जायेगी। कोई बहुत बडी सजा का प्रावधान नही है। अखबार वालों के पास कानूनी पहलू जानने वाले पत्रकार नही होते हैं। धारा 386 मे सजा की अवधि भले हीं दस वर्ष हो लेकिन यह मजिस्ट्रेट के यहां ट्रायल होने वाला केस है तथा प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को तीन साल सजा से ज्यादा का अधिकार नही है। नियमत: जो मुकदमा हुआ है वह धारा 385 के तहत आता है लेकिन पुलिस ने केस को गैरजमानतीय बनाने के लिए धारा 386 लगाया है। हालांकि जमानत का जो प्रावधान है तथा उच्चतम न्यायालय के बहुत सारे मामलों मे जो निर्णय आये हैं, उसके अनुसार जमानत की सुनवाई के दौरान कोर्ट को पुलिस द्वारा लगाई गई धारा को नही देखना है बल्कि अपराध के स्वभाव को देखना है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.