/अब हल खुद ढूँढना होगा नहीं तो ऐसे ही मरना होगा

अब हल खुद ढूँढना होगा नहीं तो ऐसे ही मरना होगा

– वंदना गुप्ता

13 जुलाई को मुंबई धमाकों में दर्जनों की मौत हो गई

आज सबके अपने अपने विचार हैं सब अपनी अपनी तरह से संवेदनाएं प्रकट कर रहे हैं और अपना क्रोध भी व्यक्त कर रहे हैं। करें भी क्यों ना.. आखिर हर संवेदनशील व्यक्ति ऐसा ही करेगा या कहिए हर आम इंसान जिसमे ज़रा भी इंसानियत होगी वो इन सब से त्रस्त होगा ही और अपनी बात कहने की यथा संभव कोशिश करेगा फिर चाहे अभिव्यक्ति का कोई भी माध्यम वो क्यों ना चुने?

देश जल रहा है सब जानते हैं और जलता ही रहेगा ना जाने कब तक? जब तक हम जनता जागृत नही होंगे हमें बलिदान देते ही रहना होगा शायद्… ये हमारी कमज़ोरी है। हम जनता ने ही तो ये अधिकार दिए हैं इन नेताओं को कि आओ और हम पर राज़ करो और अपनी मनमानी करके अपनी जेबें भरो तो वो क्यो नही इसका फ़ायदा उठाएंगे…?

आज वो वक्त तो रहा नहीं और ना ही वैसे नेता देशभक्त रहे जो अपनी जान कुर्बान कर दिया करते थे। आज तो देशद्रोहियों के नाम पर सड़कों के नाम रखने की बात होती है। उन्हें सम्मान देने की बात होती है। बिना जाने कि उसने आखिर कितना बडा देशद्रोह किया था। जब ऐसे लोग होंगे तो आम जनता किससे उम्मीद कर सकती है? ऐसे मेँ तो वो बेचारे सही ही कर रहे हैं आखिर एक कुर्सी मिलती है मुश्किल से, वो भी छूट जाए तो कैसे काम चलेगा? और फिर जनता का क्या है?

121 करोड़ में से दो चार सौ मर भी गए तो किसी का क्या जाता है? जनता तो और पैदा हो जाएगी मगर कुर्सी इकलौती हाथ से चली गई तो कैसे आएगी… अब हर कोई ओबामा तो बन नही सकता ना… कि दूसरे के घर में घुसकर अपना बदला ले और उसे सही भी ठहरा दे यहां तो वैसे भी ऐसे काम करने से पहले सब से पूछा जाता है तो ऐसी नपुंसक सरकार से और क्या उम्मीद की जा सकती है? और यहाँ की जनता भी अभी इतनी जागरुक नही हुई है कि मिस्र जैसी क्रांति के लिये तैयार हो जाए और एक चिराग से सब के दिलों मे देशभक्ति की आग लगा दे।

यहां तो जिस ने भी आवाज़ उठाई उसकी आवाज़ को ही लाठीचार्ज करके दबाया जाता है ताकि आगे कोई कदम ना उठा सके और उनकी सरकार बेरोकटोक चल सके… चाहे सारे ही गद्दार क्यों ना हों…? तो क्या हुआ अगर कसाब पर अब तक अरबों रुपया आम जनता की खून पसीने की कमाई का लग चुका…? तो क्या हुआ कि वो पैसा देश की उन्नति और खुशहाली के काम आ सकता था…?

इन छोटी-छोटी बातों की आदत तो जनता को डाल ही लेनी चाहिए क्योंकि जनता में वो आग सुलगती ही नहीं और कुछ दिन भड़कती भी है तो दो चार दिनों के बाद अपनी ज़िन्दगी के बारे मे सोच कर वो भी बुझ जाती है… जबकि मेरा तो यह मानना है कि आज इस का बदला सिर्फ़ एक ही तरीके से लिया जा सकता है कि ऐसे आतंकवादियों को सरेआम गोली मारी जाए और उनका लाइव टेलीकास्ट करवाया जाए ताकि आगे फिर कोई ऐसी घिनौनी हरकत करने की कोशिश ना करे।

वंदना गुप्ता

मगर ये कदम सिर्फ़ वो ही उठा सकता है जिसमे देशभक्ति का जज़्बा होगा और ईमान की ताकत होगी… मगर यहाँ तो अपने ही पराये हो चुके हैं हम अपनो के हाथो ही उनके गुलाम हो चुके हैं तो ऐसे मे कहाँ से एक बार फिर वो सुबह ढूँढ कर लाएं जिसमे सिर्फ़ और सिर्फ़ रौशनी का राज हो और उड़ने के लिये खुला आसमान हो… शायद वो वक्त अब सिर्फ़ ख्वाब ही बन कर रह गया है… अब नही पैदा होते इस धरती पर भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु।

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