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क्या हिग्स बोसोन नियति बदल डालेंगे?

-पलाश विश्वास||

बह्मांड की उत्पत्ति और जीवन के सृजन संबंधी कई प्रश्नों का जवाब देने में सक्षम गॉड पार्टिकल को बुधवार को खोज लिया गया। हजारों साल से मनुष्य के जीवन पर धर्म का जो वर्चस्व कायम है, वह अब भी खत्म नहीं होता तो समता और न्याय का भविष्य अंधकारमय है। भारत में नवउदारवादी अर्थ व्यवस्था से हिंदुत्व का पारमाणविक वर्चस्व कायम है, जिसके तहत सत्ता वर्ग के एक फीसदी लोगों के हित में निनानब्वे प्रतिशत लोगों का सफाया अभियान चालू है। क्या ईश्वरीय कण की अवधारणा के सही पाये जाने और भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस की खोज को वैश्विक मान्यता मिल जाने से निनानवे प्रतिशत भारतीय जनता की नियति बदलेगी? ईश्वरीय कण का रहस्य तो सुलझ गया है पर भारतीय अर्थ व्यवस्था और राजनीति की पहेलियां बूझना दुःसाध्य है, जिसने समाज और सामाजिक सरोकार को सिरे से गैर प्रसंगिक बना दिया है। बहुत पहले विद्रोही लेखिका तसलिमा नसरिन ने कहा है कि धर्म के रहते न मानवाधिकार संभव है और न सामाजिक न्याय। खुले बाजार की अर्थ व्यवस्था में धर्म का वर्चस्व बढ़ा ही है। वैश्विक पूंजी और कारपोरेट साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा हथियार धर्म है। बहरहाल धरती, सूरज, चांद और सितारों से भरे इस ब्रह्मांड को भगवान ने नहीं बनाया. ये बात सर्न की प्रयोगशाला में 10 साल से जारी महाप्रयोग के शुरुआती नतीजों ने साबित कर दी है। जेनेवा में आज दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्न के वैज्ञानिकों ने उठा दिया संसार के सबसे बड़े रहस्य से पर्दा गॉड पार्टिकल यानी ईश्वरीय कण खोजने के लिए चल रहे महाप्रयोग में वैज्ञानिकों को अब तक जो जानकारी मिली है, उससे संसार की उत्पत्ति का रहस्य खुल सकता है। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक वैज्ञानिकों ने महाप्रयोग का जो ब्योरा दिया है। उससे हिग्स बोसान नाम के उस कण की मौजूदगी का संकेत मिलता है, जिसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है, इसका एक मतलब ये भी निकाला जा सकता है कि ब्रह्मांड को भगवान ने नहीं बनाया।

स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर स्थित 27 किलोमीटर लंबी एक भूमिगत सुरंग में हिग्स बोसोन, ईश्वरीय कण  पर वर्ष 2009 से दिन-रात शोध कर रही यूरोपीय परमाणु शोध संगठन (सर्न) की दो टीमों (एटलस) और (सीएमएस) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इससे मिलते-जुलते कण के अस्तित्व की बात स्वीकार की। सर्न की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हमें अपने आंकड़ों में एक नए कण के पाए जाने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह हमारे शोध संयंत्र लार्ज हेड्रोन कोलाइडर के 125 और 126 जीईवी क्षेत्र में स्थित है। यह एक अद्भुत क्षण हैं।हमने अब तक मिले सभी बोसोन कणों में से सबसे भारी बोसोन को खोज निकाला है। सर्न ने इन नए आंकड़ों को सिग्मा 05 श्रेणी में स्थान दिया है, जिसके मायने होतें हैं नए पदार्थ की खोज।सेर्न के महानिदेशक राल्फ ह्यूर ने कहा कि प्रकृति को लेकर हमारी समझ में इजाफा करने की दिशा में हमने एक मील का पत्थर हासिल कर लिया। सर्न के शोध निदेशक सेर्गियो बर्तालुकी ने हिग्स बोसोन के अस्तित्व की दिशा में प्रबल संकेत मिलने पर गहरी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमारे लिए इतने अद्भुत नतीजों को लेकर उत्साहित नहीं होना बेहद चुनौती भरा काम है। हमने पिछले वर्ष ठान लिया था कि 2012 में या तो हम हिग्स बोसोन को खोज निकालेंगे अथवा हिग्स थ्योरी को ही खारिज कर देंगे। हम एक अहम पड़ाव पर पहुंच गए हैं और भविष्य में इन आंकड़ों पर और अधिक प्रकाश पड़ने से हमारी समझ में इजाफा होगा।

हिग्स बोसोन पर आए मौजूदा नतीजे वर्ष 2011 के आंकड़ों पर आधारित हैं और इस वर्ष के आंकड़ों पर भी अभी भी अध्ययन चल रहा है। हिग्स बोसोन पर 2011 के आंकड़ों से जुड़ी सेर्न की विस्तृत रिपोर्ट के इस महीने के आखिर तक जारी होने की उम्मीद है।

इन नतीजों के जारी होने के साथ ही ब्रह्म कण (गॉड पार्टिकल) अब एक रहस्य या परिकल्पना मात्र नहीं रह गया है। ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने वर्ष 1964 में इस कण की परिकल्पना को जन्म दिया था। इस कण का नाम हिग्स और भारतीय वैग्यानिक सतरूद्रनाथ बसु के नाम पर रखा गया था।

दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले चार दशकों के दौरान हिग्स बोसोन के आस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर पाए। ऐसा माना जाता है कि 13.7 अरब वर्ष पहले जब बिग बैंग कहलाने वाले महाविस्फोट के जरिए ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई होगी तो हिग्स बोसोन आस्तित्व में आया होगा और इसी से पदार्थ तथा दूसरे कणों की रचना हुई होगी तथा आकाशगंगाओं नक्षत्रों तथा जीवन इत्यादि ने आकार लिया होगा। वैज्ञानिक इसी वजह से इसे ब्रह्माकण (गॉड पार्टिकल) का नाम देते हैं।

सृष्टि में हर चीज को कार्य करने के लिए द्रव्यमान की आवश्यकता होती है। अगर इलेक्ट्रानों में द्रव्यमान नहीं होता तो परमाणु नहीं होते और परमाणुओं के बगैर दुनिया में किसी भी चीज का सृजन असंभव था। डा हिग्स ने इसे लेकर सिद्धांत की खोज की जिसे आगे चलकर (हिग्स सिद्धांत) के तौर पर जाना गया। इससे कणों का द्रव्यमान सुनिश्चित्त करना संभव हो सका। डा हिग्स ने कहा कि इस माडल को काम करने के लिए एक सबसे भारी कण की आवश्यकता थी जिसे हिग्स बोसोन का नाम दिया गया।

हिग्स बोसोन अभी तक एक परिकल्पना मात्र ही था लेकिन वैज्ञानिकों को चूंकि इसके कुछ विशेष लक्षण ज्ञात थे इसलिए उन्हें पता था कि अगर वे इसे खोजने की मुहिम छेड़ते हैं तो यह कैसा दिखाई देगा। हिग्स बोसोन का द्रव्यमान बाकी सभी बोसोन कणों में सबसे अधिक था। सेर्न के वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्म कण की खोज सुपर कणों और डार्क मैटर की खोज का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.