/मीडिया पर शर्मनाक वार – कुक्कुर को बताया चौथे खंभे का पहरेदार

मीडिया पर शर्मनाक वार – कुक्कुर को बताया चौथे खंभे का पहरेदार

– देशपाल सिंह पंवार के साथ रीतेश साहू||

छत्तीसगढ़ में सुराज है इसमें कोई दो राय नहीं। हां किसके लिए है ये अहम सवाल जरूर है। अगर रायशुमारी करा ली जाए तो जनता बता देगी कि किसके लिए सुराज है? ढेरों नाम तो तभी पता चलेंगे लेकिन हां इसमें कोई दो राय नहीं कि कुछ आला अफसरों के लिए यहां सुराज ही सुराज है और ऐसा राज शायद ही उन्हें इसके बाद कभी मिल पाए। कहते हैं कि वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा कभी किसी को कुछ नहीं मिलता। रमन सिंह का राज आया तो इन्हें भी इनके हिस्से का ऐसा और इतना मिला कि संभालना ही मुश्किल हो रहा है। खुद भाजपाई और संघी भी अब तो मानने लगे हैं कि रमन सिंह सरकार को अफसर ही चलाने से ज्यादा हांक रहे हैं। वो तो इतना भी मान रहे हैं कि ये हांक नहीं रहे बल्कि रमन सिंह जैसे शख्स का सारा मान-सम्मान फांक भी रहे हैं।

मुख्यमंत्री के नौ रत्नों में से ज्यादातर एक हो गए हैं लिहाजा जो चाहते हैं, जैसा चाहते हैं वैसा ही करते हैं और सारे सरकारी तंत्र से कराते हैं। जो नहीं करता उसे हैसियत दिखाने में देरी भी नहीं करते। करती ये मंडली है और सुननी पड़ती है सरकार को। भाजपा को। झेलनी पड़ती है मुख्यमंत्री को। किसी को सुननी पड़े-किसी को झेलनी पड़े इससे इन पर क्या फर्क पड़ता है? सरकार किसी की बनें इनका राजपाट तो ऐसे ही चौचक रहना है। इन्हीं नौ रत्नों में से असली महारत्न हैं-एन बैजेंद्र कुमार। प्रमुख सचिव हैं। कोई माने या ना माने पर वो खुद तो यही मानते हैं और दर्शाते हैं कि इस धरती पर उनसे ज्यादा काबिल, पढ़ा-लिखा और जहीन या कहा जाए कि महीन और कोई दूजा नहीं है। कामकाज तो इनके पास वास्तव में बहुत ज्यादा हैं पर कागजों पर सरकार के कामकाज के प्रचार-प्रसार का जिम्मा सबसे खास है। जनसंपर्क विभाग के मुखिया हैं। सारी मीडिया को साधे रखना इनके जाब प्रोफाइल में शामिल है। हां ये बात दीगर है कि अरसे से उस मुकाम पर सुराज में हैं जहां मीडिया इनको साधने पर ही अपनी एनर्जी ज्यादा खर्च करता आ रहा है। ये खुश तो पहले ही दिन से विज्ञापन भी ले लो और उसका अग्रिम भुगतान भी। नाराज तो मजाल की सरकारी इमारत के पास भी कोई फटक जाए। सुराज ने सारी ताकत दे रखी है और मीडिया ने घुटने टेक रखे हैं-लिहाजा दिमाग सातवें आसमान पर रहता है। अब ये सब होता रहे किसी को कोई आपत्ति नही है। हमें भी नहीं है। आपत्ति कोई करेगा भी तो क्या कर लेगा? उल्टा अपना ही नुकसान। हां इतिहास गवाह है कि समय बलवान होता है और घमंड तो रावण जैसे बलशाली का भी नहीं रहा। फिर वक्त की लाठी की आवाज का पता आज तक किसी को चला है। जो तमाम उछलने वालों को चलेगा।
इन्हें काम ज्यादा हैं। खुद भी कहते हैं और दिखाते उससे भी ज्यादा हैं। लेकिन फेसबुक से इन्हें खास लगाव है। लोकतंत्र है। नया जमाना है। नए जमाने के साथ चलने में कोई आपत्ति किसी को नहीं होनी चाहिए। मीडिया के लिए भले ही कानून बन गए हों। सरकारों के हाथों में विज्ञापन रूपी चाबुक हों लेकिन कम से कम न्यू मीडिया या सोशल मीडिया जैसी जगहों पर अब तक भारत में ज्यादा कानून नहीं बने हैं। लिहाजा जिसकी जो मरजी हो रही है वो इन जगहों पर जहर उगल रहा है। कोई ज्ञान बांटता है तो कोई दूसरे के मान-सम्मान से खेलता है। लच्छेदार भाषा का उपयोग करता है तो अप्रत्यक्ष रूप से जली-कटी सुनाता है। अपने ये आला अफसर एनबीके भी अपने ही हिसाब से फेसबुक का प्रयोग या उपयोग करते हैं। अफसर हैं लिहाजा कुक्कुर पालने का नवाबी शौक इन्हें भी है। ये खुद फरमाते हैं कि इनके पास आस्कर अवार्ड विनर कुतिया कुक्कु है। अब है तो अच्छी बात है। यहां तक कुतिया की तारीफ की जा सकती है। लेकिन अब इस कुतिया कुक्कु का सहारा लेकर इन्होंने फेसबुक पर जो स्वांग रचा है जरा उस पर भी एक नजर डाल लीजिए। कुक्कु के सहारे ये सारे मीडिया को उसकी औकात दिखा रहे हैं। कह रहे हैं कि कुक्कु कर रही है चौथे खंभे की सुरक्षा। या चौथे खंभे की असली चौकीदार। अब मीडिया वाले तो सारे मर गए या मिट गए। यानि अब ये औकात है भारत में या कहा जाए कि छत्तीसगढ़ में मीडिया की? ये हैसियत है सुराज की सरकार में मीडिया की? यही है मीडिया प्रबंधन इन आला अफसर का?
जिस अखबार पर इनकी कुक्कु बैठी है, वो दैनिक भास्कर भी हो सकता है, वो राजस्थान पत्रिका भी हो सकता है, वो हरिभूमि भी हो सकता है, वो नवभारत भी हो सकता है और वो जनदखल समेत बाकी वो सारे 80-90 अखबार भी हो सकते हैं जो रायपुर से रोजाना निकलते हैं। सरकार के घरों में जाते हैं। अफसरों के घरों में सुबह-सबेरे पहुंचते हैं। चौथे खंभे की क्या परिभाषा है, क्या महत्व है, क्या उसकी उपयोगिता है, क्या उसकी जरूरत है, हम यहां ये बताने नहीं जा रहे हैं। लेकिन शायद ही काबिल अफसरों को ये पता होगा कि सबसे मेहनत से तैयार होने वाला अखबार ही इस पूरी धरती पर अकेला ऐसा उत्पाद है जो सबसे जल्दी खत्म भी होता है। हां अपना प्रभाव छोडऩे के बाद। अपना रोल प्ले करने के बाद।
आला अफसर हैं एनबीके। जाहिर सी बात है कि उनकी कुतिया भी आला ही होगी। वो उसे जहां चाहें वहां बैठा सकते हैं। जिस तरह का राज चल रहा है उसमें रमन सिंह की अफसरशाही जहां चाहे वहां कुतिया तो क्या गधों तक को बैठा सकती है? किसी को भी जब चाहे जैसे चाहे अपमानित करा सकती है। पर इस धरती पर हर पद की हद होती है। मद में जद को जो पार करता है तो क्या भद्द भी नहीं पिटेगी? कोई कुतिया खुद बैठ जाए तो कोई बात नहीं पर जिस अंदाज में आला अफसर एनबीके ने ये तस्वीर पेश की है क्या वो सवाल पैदा नहीं करती? क्या वो अंदर से नहीं झकझोरती? मीडिया वालों को भी। राजचलाने वालों को भी। राजनीति करने वालों को भी। समाज चलाने वालों को भी। या फिर घर चलाने वालों को भी।

0 क्या ये मीडिया का अपमान नहीं है? क्या इससे ये नहीं झलकता कि रमन सिंह सरकार की नजर में चौथे खंभे की क्या हैसियत है? अगर अपमान नहीं है तो फिर भगवान ही मालिक?

0-क्या कुक्कुर का सहारा लेकर मीडिया को जलील करना सही है? अगर सही है तो 15 अगस्त को पूरे देश की तरफ से एन बैजेंद्र कुमार को स्वर्ण पदक जरूर मिलना चाहिए?

0-क्या मीडिया को ये एहसास अब भी नहीं हो रहा है कि चंद अफसर उन्हें किस निगाह से देखते हैं? अगर इसके बाद भी घरों की बांदी की तरह व्यवहार तो फिर अल्लाह ही मालिक?

0- क्या वास्तव में रमन सिंह के राज में अफसरशाही बेलगाम है या फिर वो सरकार को जानबूझकर बदनाम करने में जुटी है? ये तो भाजपा और खुद मुख्यमंत्री ही बेहतर बता सकते हैं?

0-अगर अपनी जनता व मीडिया की तौहीन की छूट अफसरों को नहीं मिली हुई है तो फिर ऐसे आला अफसरों के खिलाफ रमन सिंह सरकार को क्या कोई एक्शन नहीं लेना चाहिए?

0- क्या मीडिया के हर विंग, राजनीति के हर रिंग और सारे सभ्य समाज को इस तरह के घटिया रिमार्क या व्यंग का विरोध नहीं करना चाहिए या निंदा नहीं करनी चाहिए?

0-आज अखबार पर है। कल अटल बिहारी वाजपेयी के फोटो पर बैठकर वो राजनीति को गार्ड करेगी। क्या यही दिन अपनी जनता और अपने प्रदेश को दिखवाएगी सुराज की सरकार?

जिन अपनों का दुश्मन से समझौता है, उन अपनों से घर को बचाना मुश्किल है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.