Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

यूपी निकाय चुनाव परिणामों के संकेत

By   /  July 10, 2012  /  3 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-प्रणय विक्रम सिंह||
उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव परिणामो ने बुनियादी स्तर पर भाजपा की मौजूदगी का अहसास सभी सियासी जमातो को करवा दिया है। 12 नगर निगमों में से 10 निगमों पर भाजपाई मेयर की ताजपोशी इस बात की तस्दीक करती है कि अभी भी भाजपा जमीनी स्तर पर अपनी उपस्थिति बनाये हुए है। गौरतलब है कि स्थानीय निकायों के चुनाव जनता के बुनियादी सवालो से प्रभावित रहते है। बिजली,सडक,पानी जैसी रोजमर्रा के सवालात निकाय चुनाव में अहम् भूमिका निभाते है। दूसरा,विधायक और सांसद से आम जनमानस का सीधे जुड़ाव नहीं हो पाता है किन्तु स्थानीय निकाय के चुनाव में जनसाधारण की पहुँच सीधे प्रत्याशी तक होती है,वह उनसे रोज मिल सकता है,अपनी शिकायत से वाकिफ  करा सकता है। अत:  इस प्रकार के चुनावों में जनता सीधे बुनियादी सवालो से जुड़े मुद्दों पर समाधान कर सकने वाले प्रत्याशी को ही अपना अमूल्य मत प्रदान करती है।

वर्त्तमान चुनाव परिणामो को आधार मानकर यदि समीक्षा की जाये तो कदाचित यही परिलक्षित होता है कि उत्तर प्रदेश की जनता ने अपने बुनियादी मुद्दों से भाजपा को जड़ा हुआ पाया। शायद तभी हाल ही में सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावो में अपने चाल-चरित्र-चिंतन पर बट्टा लगवा चुकी भाजपा ने जोरदार वापसी की है। लोकतंत्र में अंकगणतीय संख्या का बड़ा महत्व होता है। सदन में संख्या बल बढाने के लिये सियासी जमाते न जाने कैसे कैसे समझौते करती है। वस्तुतरू विजयी प्रत्याशिओ का संख्याबल ही राजनैतिक दल की मकबूलियत का पैमाना होती है। यदि आंकड़ो की शहादत ले तो विदित होता है कि 12 नगर निगमों में से 10 में कमल का फूल खिला है। नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतो में भी भाजपा ने बढ़त बढ़ा राखी है। राज्य निर्वाचन आयोग से मिली जानकारी के अनुसार नगर पालिका परिषद सदस्य पद के 4877 सीटों के लिए हुए चुनाव में 2890 सीटों के परिणाम आ गये थे। इसमें 1700 सीटों पर भाजपा और 700 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी विजयी हुए हैं। शेष सीटों पर निर्दलीयों को विजय मिली है। इसी प्रकार नगर पंचायत सदस्य के 4747 सीटों के लिए 3436 सीटों के परिणाम घोषित हो गये थे। इसमें भी 2 हजार सीटों पर भाजपा, 800 पर कांग्रेस और शेष पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए हैं। दीगर है कि 2006 के नगर निगम चुनाव में भाजपा को आठ महानगरों में सफलता मिली थी। उल्लेखनीय है कि बसपा और सत्तारूढ़ दल ने तो निकाय चुनावो में सीधे भागेदारी न करके उम्मीदवारों को समर्थन देकर सहभागिता की थी किन्तु परिणामो में समर्थित उम्मीदवारो की गिनती सूबे की दोनों बड़ी सियासी तंजीमो के सक्रिय रूप से निकाय चुनाव में हिस्सेदारी न करने के निर्णय के पीछे छिपे स्याह अंदेशो के सच को उजागर करती है। सपा और बसपा के समर्थित उम्मीदवारो ने महापौर की एक-एक सीट प्राप्त की है।
दरअसल समाजवादी दल द्वारा विधानसभा चुनाव में चमत्कृत कर देने वाले प्रदर्शन के बाद आगामी 2014 के लोकसभा चुनावो में भी इस करिश्माई प्रदर्शन की पुनरावृत्ति की रूपरेखा तैयार की गयी,किन्तु लोकसभा चुनावो के समर के पूर्व निकाय चुनाव का भंवर भी एक बड़ी चुनौती थी। सत्तारूढ़ दल को डर था कि कही स्थानीय निकाय के चुनावो में पार्टी का फीका प्रदर्शन मिशन 2014 को न प्रभावित कर दे,वही विधान सभा चुनावो में पराजय के कारण रिस रहे जख्मो पर मलहम लगा रही बसपा ने पुनर: शक्ति परीक्षण से बचने में ही अपनी भलाई समझी। किन्तु उत्तर प्रदेश में अपने खोई जमीन को तलाश कर रही भाजपा व कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव एक अवसर की भांति थे। लिहाजा दोनों राष्ट्रीय दलो ने पूरी शिद्दत के साथ निकाय चुनावो में जोर आजमाइश की। खैर चुनाव परिणामो ने जहां भाजपा में जान फूकने का काम किया है, वहीं कांग्रेस के लिए परेशानी व चुनौती का सबब बन गए। विधान सभा चुनावों की शर्मनाक पराजय के बाद निकाय चुनावो से उबरने की उम्मीद लगाये कांग्रेसी कार्यकर्ताओ का मनोबल बुरी तरह टूट गया है।

दूसरी ओर भाजपा के प्रदर्शन ने कार्यकर्ताओ में एक उत्साह का संचार किया है। उन्हें विधान सभा चुनावो की पराजय व कन्नोज में सपा को दिए गए वाक ओवर के कारण मिले दर्द,अपमान एव दबाव से काफी हद तक मुक्त कर दिया है। साथ ही लोक सभा चुनावो के तैयारी के लिए पर्याप्त ऊर्जा भी प्रदान की है। वर्त्तमान चुनाव परिणाम सत्तारूढ़ दल के लिए भी चिंतन का विषय है। सपा प्रमुख ने भले ही अखिलेश के 100 दिनों के कार्यकाल को शत प्रतिशत अंक दे दिए हो किन्तु जनता का बदलता रुझान कुछ और ही संकेत दे रहा है। सूबे की बदहाल होती कानून व्यवस्था,बिजली-पानी जैसी बुनियादी आवश्यक्ताओ की किल्लत के प्रति सरकार का उदासीन रवैया, सूबे के राजनैतिक भविष्य में आमूल-चूल परिवर्तन के रूपरेखा बुन रहे है। भाजपा ने साबित किया कि उसका दबदबा शहरी इलाकों में कायम है। सपा को विधानसभा चुनावों में फायदा हुआ था,वह उसने खो दिया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को देखकर शहरों में लोगों ने सपा को वोट दिए थे। लेकिन उनसे अब मोहभंग हुआ है। सपा-बसपा ने अधिकृत उम्मीदवार नहीं उतारे। इससे भाजपा की राह आसान हो गई। खैर अब लोकसभा चुनाव का समर सामने है,निकाय चुनावो के परिणामों नें सभी दलो के सम्मुख संघर्षात्मक स्थितियां उत्पन्न कर दी है। सपा का विधानसभाई करिश्मा खत्म हो चुका है। कांग्रेस की असफलता का अंतहीन धारावाहिक समाप्त होने का नाम नही ले रहा है। बसपा की अवसरवादी सोशल इंजीनियरिंग दम तोड़ चुकी है। विधान सभा चुनावो में उनके निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे के कारण भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, कमजोर कानून

व्यवस्था,जन सरोकारो के प्रति उदासीनता,जैसे दोषो से आज का निजाम भी ग्रसित है। 2011 के विधान सभा चुनाव में जन बदलाव की आवाज बनकर उभरी सपा के लिये जनता का वही परिवर्तनगामी स्वभाव, जिसनें उसे तख़्त पर बैठाया था, 2014 के लोकसभा चुनावो में ताज उछालने की भी सम्भावनायें व्यक्त कर रहा है। जम्हूरियत में  छरू दशक व्यतीत करने के पश्चात आम आवाम ने भी अपनी मत शक्ति को पहचान लिया है,जिसका प्रयोग अब खामोश किंतु आश्चर्यजनक परिवर्तन की रुपरेखा बुनता है। अब राजनैतिक दलो को यह समझ लेना चाहिये कि जनता सियासतदानों के हर दांवपेंच से वाकिफ हो चुकी है क्योकि यह पब्लिक है ये सब जानती है।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Siddartha says:

    Never would have thunk I would find this so indibpensasle.

  2. भाजपा २०१४ के लिये अगर मोदीजी को प्रधानमंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट करती है तो केंद्र मे भाजपा की सरकार तय है…..देश विकास चाहता है…..आज की तारीख मे ये काम मोदी जी के ही बस का है….. भाजपा के बड़े नेताओं को ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये……

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक क्रांतिकारी सफर का दर्दनाक अंत..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: