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गरीबी और हमारी सरकार

By   /  July 11, 2012  /  3 Comments

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-दिलीप सिकरवार||

कौन कहता है हमारी सरकार को गरीब और गरीबों की फिक्र नही है। यदि कोई भी इस तरह के आरोप सरकार और उसके नुमाइंदों पर लगाता है तो हम उसका मुह तोड. जवाब दे सकते है। हमारे पास इसके पुख्ता प्रमाण है। हमे मालूम है सरकार का पूरा ध्यान गरीब और गरीबों पर है। दिन मे गरीबों के बारे मे मनन होता है तो रात मे गरीबी के गम को भुलाने के लिये तरह-तरह के साधन अपनाये जाते हैं। यह गरीबों के प्रति चिंता का भाव नही तो और क्या है?

हमारे यहां सरकार का काम है जो ज्वलंत समस्या हो उस पर मनन करना। सोचना कि कैसे इस विकराल समस्या का समाधान हो सकता है। इस बारे मे सुझाव बुलाये जाते है। फाईव स्टार होटलों मे या फिर किसी एसी रूम मे उस समस्या पर मंथन होता है। बाद मे रिजल्ट सबको पता होता है। पिछले दिनों गरीबी और गरीबों के बारे मे सरकार बड़ी चिंतित दिखाई दी। आखिर सरकार को इन गरीबों पर गंभीरता से विचार करना ही था। वजह, सभी जानते है। गरीब अपनी स्थिति मे रहकर सरकार को बनाने और बिगाडने का दंभ रखते हैं। यही कारण है कि सरकारें कोई भी रहे गरीब प्राथमिकता रहते है।

प्रधानमंत्री पं नेहरू हों या फिर मनमोहनसिंह गरीबी उनके लिये अति जरूरी कार्य था। हम योजना आयोग की बात करें तो गरीबी हटाने के लिये आयोग की प्लानिंग कुछ कम नही है। योजना आयोग की माने तो गरीबी रहे ही न। यूं कहें कि गरीब ही नही होंगे तो गरीबी कहां से रहेगी। पिछले साल जब योजना भवन ने गरीबी रेखा कोे षहरों मे 32 रूपये बताया था, तो कईयों को यह बात नही पची। भई, हम जानते है आजकल तो भिखारी भी डेढ से दो सौ रूपये तक आराम से कमा लेते हैं। यह उनका अपना स्टाइल है। महानगरों के भिखारियों का अपना पैकेज हो सकता है। यह बात जुदा है कि इनके खर्चे कही ज्यादा होते हैं। इनका परिवार बडा होता है। कमाने वाले कई हो सकते हैं किन्तु आय उस मान से नही होती।

कुछ दिनों पहले योजना भवन से यह जानकारी सार्वजनिक हुई कि 2004 से 2009 के बीच पांच करोड से अधिक गरीब भारतीय गरीबी रेखा के उपर निकल गये। ऐसा सुनकर हमारे कर्णधार खुष हुए ही होगे। आखिर उनकी मेहनत जो रंग लाई थी। हालांकि यह केवल आजकल का मानसूनी नाटक भर था। बादल आते तो रहे किन्तु बरसे नही। गरीब भी इसी तरह अपने लिये बनी योजनाओं से दूसरों को अमीर बनाते रहे। आकडों की बाजीगरी चलती रही। अब यह कहा जाने लगा कि फलां सरकार के आने से गरीबी दूर हो गई। वास्तविकता तो परे है।

अब तो गरीबी के मायने बदले जा चुके हैं। योजना भवन ने तय कर लिया है कि जिन लोगों की दैनिक कमाई ष्षहरों मे 29 रूपये और देहातों मे 22 रूपये है वे गरीबी से उपर होंगे। यानि कि उन्हें गरीब नही माना जायेगा। गरीबी कम करने का नायाब तरीका खोजा है हमारी कर्मठ सरकार ने। मतलब गरीबी दूर नही कर सके तो उसके मापदंड बदल दो।

कौन कहता है हमारी सरकार को गरीब और गरीबों की फिक्र नही है। यदि कोई भी इस तरह के आरोप सरकार और उसके नुमाइंदों पर लगाता है तो हम उसका मुह तोड. जवाब दे सकते हैै। हमारे पास इसके पुख्ता प्रमाण है। हमे मालूम है सरकार का पूरा ध्यान गरीब और गरीबों पर है। दिन मे गरीबों के बारे मे मनन होता है तो रात मे गरीबी के गम को भुलाने के लिये तरह-तरह के साधन अपनाये जाते हैं। यह गरीबों के प्रति चिंता का भाव नही तो और क्या है?

दिक्कत यह है हमारी और हमारी व्यवस्था कि हम समस्या को निपटाना चाहते हैं, उसके कारणों पर ध्यान ही नही देते। डाक्टर साहब के पास जाओ। उनका सवाल होता है- क्या हुआ? सर, पेट मे दर्द है। यह दवा खा लो, ठीक हो जायेगा। उपचार हुआ। किन्तु पेट मे दर्द क्यों हुआ था यह जानना कोई नही चाहता। न मरीज और न ही डाक्टर। कुछ ऐसा ही गरीबी पर हो रहा है। प्रत्येक सरकार गरीबों पर ध्यान लगाती है। मगर गरीबी आकाष का दूसरा छोर हो गई हो। जिसे छूने का अहसास भर किया जा सकता है।

हमारे यहां के मंदिर इसके गवाह हैं कि गरीब घटे हैं या बस आकडो मे यह सब हुआ है। इसके अलावा नगर पालिका सच का सामना करा रही हैं, जहां गरीबी रेखा के कार्ड बनवाने के लिये रोजाना दर्जनों लोग पहुंचते हैं। यहां उन्हे दुत्कार दिया जाता है- अभी गरीबी रेखा के कार्ड नही बन रहे हैं, जाओ बाद मे आना।  गरीब तो यथावत हैं साहब, बस। उन्हे देखने का हमारा नजरिया बदल गया है। सरकार चुनावी वायदे भले ही लाख करे किन्तु असलियत कुछ अलग हैं। जो या तो वो देख नही पा रहे या फिर मातहत दिखा नही पाते। जी सर। यस बास। हो जायेगा। देख लेंगे वगैरा, वगैरा जब तक हमारी डिक्शनरी मे रहेगे यकीन मानिये, गरीब साथ नही छोडेंगे।

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  • Published: 5 years ago on July 11, 2012
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  • Last Modified: July 11, 2012 @ 1:10 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. vipin says:

    Ye sircar ka ek hi policy hai ki kisi bhee tarah se power grab karna.Lekin logon ke jagne ke bagair kuch nahin hoga. Home minister atta aur icecream ko compare kar rahe hain aur godowns main anaj sad raha hai

  2. Shailendra says:

    They are the same people who spent more than Rs.35/- lacs on renovation of toilet.

  3. Dr Shashikumar Hulkopkar says:

    Policies of planning are considered only with aim to increase of revenue & not for benefits of poor who are burdened by Indirect taxon as effect TAXES LEVIED BY GOVT

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