/गुवाहाटी की उस लड़की के नाम : ब्रह्मपुत्र आज सिसक सिसक कर रो रही है !!!

गुवाहाटी की उस लड़की के नाम : ब्रह्मपुत्र आज सिसक सिसक कर रो रही है !!!

-विजय कुमार||

भाग एक :

हे बाला [ श्री भूपेन हजारिका अक्सर north -east की लडकियों को बाला कहते थे. ] ; तो हे बाला , हमें माफ़ करना , क्योंकि इस बार हम तुम्हारे लिये किसी कृष्ण को इस बार धरती पर अवतरित नहीं कर सके. actually कृष्ण भी हम से डर गए है . उनका कहना है कि वो दैत्य से लड़ सकते है , देवताओं से लड़ सकते है. जानवरों से लड़ सकते है ; लेकिन इस आदमी का क्या करे ……!!! तो वो जान गए है कि हम आदमी इस जगत के सबसे बुरी कौम में से है . न हमारा नाश होंगा और न ही हम आदमियों का नाश होने देंगे. कृष्ण चाहते थे कि वहां कोई आदमी कृष्ण बन जाए . लेकिन वो भूल गए , धोखे में आ गए . वहां हर कोई सिर्फ और सिर्फ आदमी ही था . और हर कोई सिर्फ दुशासन ही बनना चाहता था . कोई भी कृष्ण नहीं बनना चाहता था. In fact अब कृष्ण outdated हो गए है . वहां उन लडको में सिर्फ आदमी ही था . वहां जो भीड़ खड़ी होकर तमाशा देख रही थी , वो भी आदमियों से ही भरी हुई थी . तो हे बाला हमें माफ़ करना . क्योंकि हम आदमी बस गोश्त को ही देखते है, हमें उस गोश्त में हमारी बेटी या हमारी बहन या हमारी कोई अपनी ही सगी औरत नज़र नहीं आती है .

भाग दो :

दोष किसका है : मीडिया का जो कि आये दिन अपने चैनल्स पर दुनिया की गंदगी परोसकर युवाओ के मन को उकसाता है  या इस सूचना क्रांति का जिसका का दुरूपयोग होता है और युवा मन बहकता रहता है  या फिर हमारे गुम होते संस्कारों का, जो हमें स्त्रियों का आदर करना सिखाते थे. या हम माता -पिता का जो कि अपने बच्चो को ठीक शिक्षा नहीं दे पा रहे है . या युवाओ का जो अब स्त्रियों को सिर्फ एक भोग की वस्तु ही समझ रहे है . टीवी में आये दिन वो सारे विज्ञापन क्या युवाओं को और उनके मन को नहीं उकसाते होंगे. फिल्मो में औरतो का चरित्र जिस तरह से जिन कपड़ो में दर्शाया जा रहा है . क्या वो इन युवा पीढ़ी को इस अपराध के लिये नहीं उकसाते होंगे? कहाँ गलत हो रहा है . किस बात की कुंठा है और फिर तन का महत्व इस तरह से कैसे हमारे युवाओ के मन में गलत घर बना रहा है. क्या माता-पिता का दोष इन युवाओ से कम नहीं? क्यों उन्होंने इतनी छूट दे रखी है. कुछ तो गलत हो रहा है, हमारी सम्पूर्ण सोच में . और अब हम सभी को ; एक मज़बूत सोच और rethinking की जरुरत है .

भाग तीन :

तो बाला , हमें इससे क्या लेना देना कि अब सारा जीवन तुम्हारे मन में हम आदमियों को लेकर किस तरह की सोच उभरे. कि तुम सोचो कि आदमी से बेहतर तो जानवर ही होते होंगे . हमे इससे क्या लेना देना कि तुम्हारे घरवालो पर इस बात का क्या असर होंगा. हमें इससे क्या लेना देना कि तुम्हारी माँ कितने आंसू रोयेंगी. हमें इससे भी क्या लेना देना कि तुम्हारे पिता या भाई को हम आदमी और हम आदमियों की कुछ औरते पीठ पीछे ये कहा करेंगी, कि ये उस लड़की के पिता है या भाई है. हमें इस बात से क्या लेना देना, कि अगर तुम्हारी कोई छोटी बहन हो तो हम आदमी उसे भी easily available ही समझेंगे .इससे क्या लेना देना कि अब तुम्हारी ज़िन्दगी नरक बन गयी है और जीवन भर , अपने मरने तक तुम इस घटना को नहीं भुला पाओंगी. हमें इससे क्या लेना देना कि अब इस ज़िन्दगी में कोई भी पुरुष अगर तुम्हे प्रेम से भी छुए तो भी तुम सिहर सिहर जाओंगी. और अंत में हमें इससे क्या लेना देना कि तुम ये सब कुछ सहन नहीं कर पाओ और आत्महत्या ही कर लो. हमें क्या करना है बेटी. हम आदमी है. ये हमारा ही समाज है .

भाग चार :
अब चंद आदमी ये कहेंगे कि उस लड़की को इतनी रात को उस पब में क्या करना था. क्या ये उस लड़की की गलती नहीं है. अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि आजकल लडकियां भी तो कम नहीं है . अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि उस लड़की ने proactive ड्रेस पहन रखी थी . लडकिया अपने ड्रेस से और अपनी बातो से लडको को [? ] [ आदमियों को ] उकसाने का कार्य करती है .अब चंद आदमी ये कहेंगे कि उस लड़की के माँ बाप को समझ नहीं है क्या जो इतनी रात को उसे पब भेज रहे है . वो भी ११ वी पढने वाली लड़की को . अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि उस लड़की का चरित्र भी ठीक नहीं होंगा . अब चंद आदमी ये कहेंगे कि देश सिर्फ ऐसी लडकियों और औरतो की वजह से ही ख़राब होते जा रहा है . मतलब ये कि ये चंद आदमी पूरी तरह से सारा दोष उस लड़की पर ही डाल देंगे . ये चंद आदमी ये भी नहीं सोचेंगे कि north -east हमारे देश के सबसे अडवांस states है और वहां पर ज्यादा gender biased घटनाएं नहीं होती है .. [ except जब हमारी so called सेना के चंद जवान आदमी वहाँ की औरतो का जब तब दोहन करते रहते है ] . और अब ये चंद आदमी इस देश में तय करेंगे कि औरते ख़राब होती है .

भाग पांच :

तो हे बाला , हम सब का क्या . हम थोड़ा लिखना पढना जानते है तो इसीलिए हम थोड़ा लिख कर पढ़कर बोल कर अपना गुस्सा जाहिर करते है . दरअसल उस तरह के लिखने पढने वाले अब नहीं रह गए है कि जिनके कहे से क्रान्ति आ जाती थी और न ही उनकी बातो को सुनकर जोश में कुछ करने वाले बन्दे रह गए है . तुम तो ये समझ लो कि हम सबका खून ठंडा हो चला है . और और एक तरह से नपुंसक ही है . हाँ , हमें दुःख है कि तुम्हारे साथ ये हुआ. ये तुम्हारे साथ तो क्या , किसी के भी साथ नहीं होना था. हमें दुःख है कि आदमी नाम से तुम्हारा परिचय इस तरह से हुआ है . लेकिन हाँ , हम ये भी कहना चाहते है कि सारे आदमी ख़राब भी नहीं होते. क्योंकि जिस पत्रकार ने ये सब हम तक ये सब बात पहुंचाई , वो भी एक भला आदमी ही है . बस तुम इतनी सी बात को याद रखो कि बेटी , ये बाते भी एक आदमी ही लिख रहा है . ईश्वर तुम्हे मन की शान्ति दे. हाँ एक बात और , मुझे ये तो पता नहीं कि ये समाज कब बदलेंगा , लेकिन मैं आज एक बात तुमसे और सारी औरतो से कहना चाहता हूं , कि ” अबला तेरी यही कहानी, आँचल में दूध , और आँखों में पानी” वाली स्त्रियों का ज़माना नहीं रहा . समाज ऐसे ही घृणित जानवरों से भरा पड़ा है . इनसे तुम्हे खुद ही लड़ना होंगा. तो खुद को तैयार करो और इतने सक्षम बनो कि हर मुसीबत का तुम सामना कर सको. और हाँ , ईश्वर से ये भी प्रार्थना है कि जीवन में कोई आदमी तुम्हे ऐसा जरुर दे , जो कि तुम्हारे मन से आदमी के नाम से जो डर बैठ गया होंगा ; वो उसे ख़त्म करे , उसे जड़ से निकाल दे. आमीन !!

भाग छह :

ब्रह्मपुत्र की लहरों को सबसे ज्यादा गुस्सेल और उफनती कहा गया है . आज ब्रम्हपुत्र जरुर रो रही होंगी कि वो एक नदी है और उसी की धरती पर ऐसा एक बच्ची के साथ ऐसा घृणित कार्य हुआ. हे ब्रम्हपुत्र , मैं सारे आदमियों की तरफ से तुमसे माफ़ी मांगता हूं. इतना ही मेरे बस में है !!! और बस में ये भी है कि मैं एक कोशिश करूँ कि अपने आस पास के समाज को दोबारा ऐसा करने से रोकूँ. और बस में ये भी है कि मैं अपने बच्चो को और वो दुसरे सारे बच्चो को बताऊँ कि औरत एक माँ भी होती है और उन्हें जन्म देने वाली भी एक औरत ही है . और मेरे बस में ये भी है कि मैं उन सभी को औरत की इज्जत करना सिखाऊ. हे ब्रम्हपुत्र मुझे इतनी शक्ति जरुर देना कि मैं ये कर सकूँ.

भाग सात : एक कविता

: दुनिया की उन तमाम औरतो के नाम , उन आदमियों की तरफ से जो ये सोचते है कि उन औरतो का वतन उनके जिस्म से ज्यादा नहीं होता है :

:::::जानवर::::
अक्सर शहर के जंगलों में ;
मुझे जानवर नज़र आतें है !
आदमी की शक्ल में ,
घूमते हुए ;
शिकार को ढूंढते हुए ;
और झपटते हुए..
फिर नोचते हुए..
और खाते हुए !

और फिर
एक और शिकार के तलाश में ,
भटकते हुए..!

और क्या कहूँ ,
जो जंगल के जानवर है ;
वो परेशान है !
हैरान है !!
आदमी की भूख को देखकर !!!

मुझसे कह रहे थे..
तुम आदमियों से तो हम जानवर अच्छे !!!

उन जानवरों के सामने ;
मैं निशब्द था ,
क्योंकि ;
मैं भी एक आदमी था !!!

विजय कुमार सप्पत्ति के ब्लॉग कविताओं के मन से….!!!! से…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.