/स्कूलों में बच्चों को पीटना उचित है – यूपी के शिक्षामंत्री राम गोविंद चौधरी

स्कूलों में बच्चों को पीटना उचित है – यूपी के शिक्षामंत्री राम गोविंद चौधरी

उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री रामगोविंद चौधरी  ने स्कूलों में बच्चों की पिटाई करने वाले शिक्षकों का पक्ष लेते हुए कहा है कि स्कूलों में बच्चों की पिटाई होना बहुत जरूरी है, नहीं तो वे उद्दंड हो जाते हैं. ना जाने कौन सी सदी की पाशविक मानसिकता के साथ जी रहे हैं मंत्री महोदय। उन्हें शायद इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि चाइल्ड साइकलॉजी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, यह बात सभी मानते हैं कि बच्चों को मार की नहीं बल्कि प्यार-दुलार की अधिक जरूरत होती है. यदि बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है तो उसे प्यार से समझा कर पढ़ाई की ओर मोड़ा जा सकता है, लेकिन उसे मारना-पीटना तो दूर किसी भी तरह से प्रताड़ित करना उचित नहीं है. स्कूलों के लिए तो बाकायदा यह नियम-कानून का मामला है. कोई भी शिक्षक स्कूली बच्चे को मार-पीट नहीं सकता. यदि ऐसा करता है तो अभिभावक की शिकायत पर उसके और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ मामला बन सकता है.

यूपी के मंत्री राम गोविंद चौधरी के इस बयान पर विवाद होना लाजिमी था, जो हो रहा है. चौधरी ने कहा कि यदि बच्चों की स्कूल में पिटाई न की जाए तो उनका मन पढ़ाई में नहीं लग सकता. बच्चों की पिटाई होना जरूरी है, नहीं तो वे बिगड़ जाते हैं. जब मैं छोटा था तो मेरे शिक्षक भी मुझे बहुत पीटते थे. पिटाई से बच्चे अनुशासित रहते हैं, नहीं तो उनमें उद्दंडता आ जाती है. शुक्र है मंत्री जी ने सिर्फ बयान भर दिया है, यदि उनका वश चलता तो वे इसे कानून ही बना डालते। बाल-बाल बच गए यूपी के बच्चे.

 

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.