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औरत की गोलाइयों से बाहर भी दुनिया गोल है…

-कनुप्रिया||

गुवाहाटी की घटना ने मुझे आहत किया है वैसी आहत नहीं जैसा आम तौर पर लोग हो जाते हैं किसी अपने के साथ दुर्घटना हो जाने पर ..अब हम लोग उतने आहत होते ही नहीं.. लगता है मीडिया

के नकली आंसुओं ने हमें भी कुछ उसी तरह के घडियाली आंसू बहाने, ना बरसने वाले बादलों की तरह सिर्फ गडगड़ाने वाला बना दिया है. मैं आहत हूँ क्यूंकि हम सब ऐसे हो गए है, मैं आहत हूँ कि आम जनता सिर्फ मूक दर्शक हो गई है …ज्यादातर लोग आहत हैं क्यूंकि कल को जब उनकी बहु बेटियों के साथ भरी सड़क पर ऐसा होगा तो लोग क्या ऐसे ही खड़े रहेंगे? ज्यादातर लोग अपनी ढपली अपना राग गा रहे हैं. २-४ दिन में शायद लोग भूल भी जाए या कुछ और दिन याद रख लें फिर भूलें … पर क्या सच में बात सिर्फ इतनी ही है कि हम कितने दिन याद रखेंगे या कितनी जल्दी भूल जाएँगे ? अगर बात सिर्फ इतनी ही है तो फिर बात को करना ही क्यों? क्यों हर जगह गुस्सा दिखाना, बोलना या बुरे शब्दों में कहे तो थोड़ी देर भोंकना और फिर अपनी रोटी की जुगाड़ में लग जाना ? लगता है ना दिल पर ऐसी बुरी तुलना से? पर सच मानिये दिल पर लग रहा है, ये अच्छी बात है क्यूंकि जिनके दिल पर लग रहा है, वहाँ अभी रौशनी की किरण बाकी है ….

मुझे पिछले उन सभी दिनों से लग रहा है जबसे ये घटना हुई है. हर मिनिट हर क्षण लग रहा है, पढ़ रही हूँ, देख रही हूँ, सोच रही हूँ पर ये लगना बंद नहीं हो रहा घबराहट हो रही है अन्दर से….लोग अपनी अपनी अपनी शिकायतें कर रहे हैं किसी को पुलिस से शिकायत है, किसी को उस भीड़ से शिकायत है जिसने विरोध नहीं किया कुछ लोग अपनी ढपली लेकर महिलाओं को आत्म रक्षा सिखाने के गीत गा रहे हैं पर मुझे किसी से शिकायत नहीं बस शर्म है, जो ख़तम नहीं हो रही. शर्म है उस सोच पर जिसने कुंठित होकर घिनौना रूप धारण कर लिया है.

अजीब है ये बात की कुछ लोग लड़की के कपड़ों पर, लड़की के घर आने जाने के समय पर आपति उठा रहे हैं (इसमें महिलाएं भी शामिल हैं) ..अजीब इसलिए नहीं कि उन्हें आपत्ति है, अजीब इसलिए कि ऐसी सोच लेकर वो जिन्दा है अभी भी ….ऐसे लोग बार बार सिक्के का दूसरा पहलू देखने की बात कर रहे हैं पर हम लोग कब तक सिक्के का दूसरा पहलू देखने की बात कर करके सिर्फ दूसरा पहलू ही देखते रहेंगे, कब तक समस्या की जड़ को छोड़कर इधर उधर भटकते रहेंगे?

अजीब लगती है ये बात की लड़की के छोटे कपडे लडको को एसे कृत्य करने के लिए भड़का सकते है … ये बात तो मैं मानती हूँ “दुनिया गोल है पर गोलाइयों से बाहर भी इक दुनिया है”, एक खुली साफ़ सुथरी सोच है. ये बात पिछड़ी और संकुचित सोच रखने वाले लोग जाने कब मानेंगे ?
एक लड़का जब बरमूडा पहनकर घर से निकलता है तो शरीर का दिखने वाला हिस्सा होता है २ टांगे, हाड मॉस से बनी हुई और जब एक लड़की वही बरमूडा पहनकर घर से निकलती है तो उन टांगों के साथ एसा क्या दिखता है लोगो को जिसका इतना विरोध है? अब इसमें दोष किसका है? किसी लड़की का या गन्दी नज़रों का? ये सब जानते है पर मानने में उन्हें संस्कृति का हास दिखाई देता है !
क्यों ऐसे विचार रखने वाले लोग जीभ लपलपाने वाले घटिया और कुंठित लोगो को पागल कुत्तों की तरह बंद कर देने का विचार नहीं रखते? जब पागल कुत्ता राह चलते को काट लेता है तो दोष पागल कुत्ते को दिया जाता है और एक कुंठित मानसिकता वाला इंसान राह चलती लड़की की इज्जत उतारने की कोशिश करे तो दोष लड़की का क्यों?
ऐसे लोगो को द्रोपदी के चीरहरण का दोष भी द्रोपदी को देना चाहिए… कह दीजिए उसी की कोई गलती रही होगी जो भरी सभा में उसे चीर हरण के लिए लाया गया फिर कृष्ण को उसकी अस्मिता बचाने आने की जरुरत ही क्या थी ?
सिर्फ कुछ अंगों के अलग होने से महिला पुरुषों की भोग की वस्तु मानी जा सकती है? क्या हड्डियों के ढांचे पर मांस की मात्रा का अंतर उसे इतना अलग बना देता है कि भरी सड़क पर उन अंगों को निर्वस्त्र करने की कोशिश की जाए ?

हम माने या ना माने अंतर सोच का है ना की रहन सहन का ….और उससे भी बड़ा अंतर है सामाजिक पतन का जो बढ़ता जा रहा है ,किसने हक दिया पुरुष नाम के प्राणी को की वो एक खाप पंचायत बनाए और वहा स्त्रियों से सम्बन्धित निर्णय इस तरह ले जैसे वो अपने पालतू जानवरों के लिए निर्णय ले रहे हो ? और अगर वो सच में स्वयं को संरक्षक माने बैठे हैं तो रक्षा कीजिए ऐसे नज़रबंद मत कीजिए या फिर वो सुरक्षा नहीं कर सकते तो कृपा करके अपना खिताब वापस दे दे या कह दे कि महिलाओं को संरक्षित प्राणी घोषित करना चाहिए बाघों की तरह ? अगर यही चाहते हो तो ये भी करके देख लो क्यूंकि बाघ भी बचे नहीं रह सके क्यूंकि शिकारी की सोच नहीं बदली …..
हर शिकार को छुपा देने से शिकारी की सोच नहीं बदल जाएगी बल्कि वो और ज्यादा तीव्रता से खोज चालू कर देगा….

क्या कुछ अंगो को छुपा देने भर से औरत की इज्जत सच में बच जाएगी ? किसने कहा ये बात की इज्जत सिर्फ औरत की होती है जैसी इज्जत औरत की होती है, ठीक वही इज्जत आदमी की भी होती है. अंतर बस इतना है की औरत की इज्जत का ऐसा हौवा बनाया जाता है कि वो अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उस इज्जत को बचाने के बारे में सोचने में लगा देती है और आदमी उसे लूट लेने के बारे में सोचने में …

मीडिया को दोष देना थोडा बनता है क्यूंकि उनके लिए जब तक कोई खबर टीआरपी बढ़ाने वाली होती है वो महिला का अंग अंग जूम करके कैमरे में दिखाएंगे और जेसे ही वो टीआरपी कम हुई तो वो दूसरा कोई किस्सा ढूंढ लेंगे जूम करने के लिए पर हम लोग कब तक इस पैन, जूम, लॉन्ग शॉट में उलझे रहेंगे? हमारी अपनी आत्मा नहीं कहती विरोध करो. ख़ुद विरोध करो, क्या महिलाओं की ख़ुद की आँखों की शर्म इतनी मर गई है की ऐसी घटनाओं पर विरोध तक नहीं जताना चाहती ?

माता पिता के दिए संस्कारों को क्या कहना कोई माता पिता अपने बच्चे को रेप करना नहीं सिखाते पर क्या वो महिलाओं की इज्जत करना भी नहीं सिखा सकते? अगर वो इतना भी नहीं सिखा सकते तो उनकी बात करना ही बेकार है क्यूंकि एसे माता पिता को नवजात बेटियों को नहीं अपने नवजात बेटों को कूड़े के ढेर में फेकने वालों की श्रेणी में मान लेना चाहिए क्यूंकि जब वो मूलभूत बात नहीं सिखा सकते तो जनम देकर वो सिर्फ समाज बिगाड़ रहे है और उनका भविष्य भी अँधेरे की गर्त में ही समझिए…

इतनी बातों के बाद भी अगर ज्ञान चक्षु नाम की चीज या दिल नाम की चीज पर कोई असर नहीं पड़ता तो जाइये वापस अंधेरों में और खोज लाइए कुछ और कुतर्क में इंतज़ार करुँगी …क्यूंकि महिलाओं के पास ज्यादा रास्ते नहीं है या तो अब विरोध के लिए उठ खडी हो या दबती जाए कुचलती जाए और शरीर की गोलाइयों वाली सोच में ख़ुद को और अपनी सोच को भी कैद कर लें …पर मुझे अब भी उम्मीद है…..और हर हाल में रहेगी….

(कनुप्रिया एक मशहूर ब्लॉगर हैं)

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41 comments

#1mahesh sharmaJuly 29, 2014, 2:41 AM

kisi bhi samajik ghtana ghatane ya vyavastha ke sanchalit hone ke karano se shikh milati hai. jeevan ke pratyek pahalu par socha jana chahiye. hamara rahan sahan aur pahanava samay parithiti anusar hi hona chahiye. ye bate sabhi ke liye lagu hoti hai. hum jitane saymit rahenge utane hi savyam tatha dusaro ke liye hitkari hoga. yah mera vyaktigat vichar hai aapaka sahmat hona aavshyak nahi hai parantu soche jarur. thaks………..

#2kanupriyaMay 5, 2013, 4:16 PM

जितने भी लोग यहाँ महिलाओं के कपड़ो, उनकी नैतिकता, उनके संस्कारों की बातें कर रहे थे उनके दिल्ली रेप केस पर क्या विचार है क्या अब भी उन्हें लगता है की इस सब के पीछे घटिया मानसिकता नहीं छोटे कपडे जिम्मेदार है

#3AnonymousJuly 31, 2012, 5:16 PM

कनुप्रिया जी, क्या आप मुझे बता सकती हैं महिलाओं का सम्मान क्यों होना चाहिए? मुझे पता हैं माँ का सम्मान होना चाहिए. पर महिला का सम्मान क्यों होना चाहिए. महिला होना ऐसी कौन सी डिग्री हैं जिसका सम्मान होना चाहिए. आप कह सकती हैं गैर पुरुष महिलाओं से मतलब न रखो, पर सम्मान क्यों होना चाहिए. कृपया, इस सवाल का जवाब दे.

    #4नमित शर्माJuly 31, 2012, 5:25 PM

    उचित तो यह होगा कि इस प्रश्न का उत्तर आप कनुप्रिया जी से नहीं बल्कि अपनी माताश्री से पूछें. वही आपको इसका सटीक जवाब दे सकती हैं.

      #5AnonymousJuly 31, 2012, 6:36 PM

      नहीं. कृपया बुरा मत मानिए. आप बताईये. सॉरी, मैं छेर छार की बात नहीं कर रहा हूँ. मुझे औरतों se बहुत dar लगता हैं. मैंने अपने दोस्तों को लड़कियों के चक्कर में मरते देखा हैं. ये मत कहिये वो ladkiya निर्दोष थी, या फिर लडको का कोई सम्मान नहीं होता. डोंट ब्रिंग my मदर इन थिस. अगर आप माँ हैं तो ठीक हैं.मैं आपसे माफ़ी मांगता हूँ. मैं आपका सम्मान करता हूँ, मुझे इश्वर से दर लगता हैं. अगर आप जानती इस सवाल का जवाब जानती हैं तो मुझे बता दीजिये. मैं आपका आभारी रहूँगा.

        #6AnonymousJuly 31, 2012, 6:57 PM

        mujhe १६,१७,२०……४०,५० saal ki लड़की का लड़कों के प्रति नजरिया बताइए, जिससे की मुझे पता चले, मुझे उनका सम्मान करना चाहिए. मैंने श्रीमद भगवद गीता या फिर भारत की सनातन संस्कृति के किताबो में पढ़ा हैं, स्त्री माँ होती हैं. क्या आप लोग इस उपाधि को ग्रहण करती हैं. क्या आपके विद्यालय में यह sab लड़के- लड़कियों को सिखाया जाता. क्या यह सब सुन कर आप अपनी हसी रोक पा रहीं हैं. महिला शब्द शारीर की व्याख्या करता हैं और माँ संस्कृति की. जब मैं कॉलेज में था तो कुछ सेनिओर लडकिया मेरी ragging ले रही थी. मैं उन्हें सम्मान दे रहा था. मैं उन्हें मैडम कह कर बुला रहा था, वो इसे पचा नहीं पा रही थी. कृपया मुझे गलत न समझे. मुझे पता हैं नारी के अपमान से पूरी की पूरी संस्कृति ख़तम हो जाती हैं. पर कैसे. मेरे सवाल का जवाब दे.
        आभार

          #7suchitra sharmaAugust 16, 2012, 10:09 AM

          आका प्रश्न जायज और उचित हे, में एक स्त्री हु और आपके इस प्रश्न का समर्थन करती हु. ये एक खुली और साफ सुथरी चर्चा हे अतः इसे व्यक्तिगत न लेते हुए इस पर बात करे तो ये बेहतर और उपयोगी होगा, माँ सबकी बराबर और आदरणीय होती हे. जिसे इस चर्चा में भाग लेना हो वो इनके प्रश्न का सही तरीके से जवाब दे , कृपया.

          #8नमित शर्माAugust 16, 2012, 10:24 AM

          यदि सुचित्रा जी को लगता है कि इस अज्ञात का प्रश्न सही है तो सुचित्रा जी खुद इस बात का जवाब क्यों नहीं दे देती. क्या वे नहीं जानती कि स्त्री क्यों सम्माननीय है?

        #9परिणीताAugust 1, 2012, 12:55 AM

        क्यों आपकी माँ को ना शामिल किया जाये इस चर्चा में?

          #10PRABHPAugust 1, 2012, 10:56 AM

          nahi. aap मेरे सवाल का जवाब दे दीजिये, इतना ही काफी हैं.

    #11AnonymousJuly 31, 2012, 7:07 PM

    मेरी मम्मी इतनी पढ़ी लिखी नहीं हैं. वो सिर्फ itna कहती हैं महिलाओं का सम्मान होना चाहिए. अगर नहीं किया तो शायद मम्मी घर से निकल दे. पर मेरा सवाल हैं, महिलाओं का क्यों सम्मान होना चाहिए.
    कृपया जवाब दे.

      #12परिणीताAugust 1, 2012, 12:59 AM

      अगर आपकी माँ आपको ऐसे किसी बेहूदा सवाल पर घर से निकाल देती है तो इसी से समझ लेना चाहिये कि माँ बहन सब जगह होती हैं.

        #13PRABHPAugust 1, 2012, 10:53 AM

        मैं आपके भावना की क़द्र करता हूँ. अगर मेरे सवाल से आपको बुरा लगा हो तो मैं माफ़ी मांगता हूँ. फिर भी मेरे सवाल का जवाब यह नहीं हुआ. कृपया कर के बताये महिलाओ का सम्मान क्यों करना चाहिए. महिलाओं को सम्मान क्यों चाहिए. पुरुस तो कभी नहीं कहता साडी महिलाओं मेरा सम्मान करो.

          #14kanupriya GuptaAugust 1, 2012, 1:12 PM

          मुझे आपके सवाल पर गुस्सा बिलकुल नहीं आ रहा हसी आ रही है आप सोचेंगे क्यों ? इसका बड़ा कारण है आपकी सोच .आप न करिये सम्मान पर फिर सम्मान की उम्मीद भी न करिए. आप जो भी है आपने शायद ठीक से पढ़ा नहीं मैंने लिखा है इज्जत सिर्फ लड़कियों की नहीं होती लडको की भी होती है वेसे ही दिल सिर्फ लड़कों का नहीं होता जो टूट जाता है लड़कियों का भी टूटता है इसलिए ये प्यार में धोके वाले टोपिक को यहाँ उठाकर कोई मतलब नहीं, और महिलाओं में सिर्फ माँ नहीं आती बहन भी आती है, मौसी, मामी, काकी, भाभी और दोस्त सब आती है क्या आप उनका सम्मान नहीं करते? मुझे लगता है करते होंगे. आप किसे सम्मान देना चाहते हैं ये आपका पक्ष है पर अपमान करना आपकी इच्छा नहीं हो सकती….रही मेरी बात मेरे स्कूल में क्या सिखाया गया तो में एक संस्कारपूर्ण वातापरण में बड़ी हुई हु खुदा न करे हम कभी मिले तो आप ये पहली बार में ही समझ जाएँगे कि आपको मेरा सम्मान क्यों करना चाहिए. हाँ, आप मेरा सम्मान क्यों करें ये में आपको कैसे बता सकती हु ये तो आपका मन है. बस यही सलाह दूंगी समाज में समाज के ढंग से रहना चाहते है तो सम्मान करने लायक लोगो का सम्मान अवश्य करिए …
          पर एक बात का ध्यान रखे कि आपको कोई हक नहीं है किसी का अपमान करें क्यूंकि वो आपका अधिकार क्षेत्र नहीं है. वैसे अब तक आपको यह बात समझ जाना चाहिए थी पर नहीं समझे हैं तो नारी का सम्मान क्यों करना चाहिए यह आप धीरे धीरे समझ जायेंगे…

            #15PrabhatAugust 1, 2012, 8:58 PM

            . main discussion ke waqt sentiment beech mein nahin lata. मैं सिर्फ इतना janana चाहता था की सम्मान किसका होता hain. main आपके aur अपने बारे में सवाल नहीं कर रहा था. मैं एक जेनेरल बात कह रहा था. केवल जन्म के आधार पर कोई सम्मान के योग्य नहीं हो जाता. सम्मान हमेशा आध्यात्मिक गुणों का होता हैं, जैसे दया, त्याग, सत्य, तप. जब तक हमारे समाज की प्राथमिकता में यह सब नहीं आता तब तक सुरक्षित समाज की कल्पना करना भी व्यर्थ हैं. आप मानसिकता बदलने की बात कर रही थी. मैं प्राथमिकता बदलने की बात कर रहा हूँ. भोगवादी समाज की पहली शिकार महिला ही होती हैं.आप और मैं या फिर पार्लियामेंट इतियादी इसे बहस एवें कानून बना कर नहीं बदल सकते हैं. समाज का जब पतन होने लगता हैं तो पुरुषो का पतन पहले होता हैं. sharaab पीना, मानस खाना, जुआ खेलना और फिर औरतो का शोषण सुरु हो जाता हैं. फिर और पतन होता हैं तो यह पूंजीवादी व्यवस्था औरतो को सिखाने लगता हैं देखो आदमी इतना गिरा होता, और जब समाज का और पतन होता हैं तो महिलाए भी इस पतन में पुरुष का साथ देने लगती हैं. कुछ लोग इसे औरतो का बोल्डनेस कहता हैं और कुछ logo mein संस्कृति का रोना रोया जाने लगता हैं. इसिलए समाज को vyavasthit तथा सुरक्षित करने के लिए प्राथमिकता बदलने की जरूरत हैं. हम सब एक दुसरे पर आश्रित हैं. कोई अपने कार्य में स्वतंतत्र नहीं हैं. हमें बनावती ढंग से आजाद होने की चेस्था नहीं करनी चाहिए. न ही पुरुष स्वतंत्र हैं और न ही नारी. हम सब के अन्दर छह तरह के दोष पाए जाते हैं, वासना, क्रोद्ध, लालच, घमंड, जलन तथा धोखा खाने की प्रवृत्ति. अगर हम इश avastha में आजादी की कल्पना करतें हैं तो यह सब काम ही करेंगे sharaab पीना, मानस खाना, जुआ खेलना और औरतो का शोषण. इसीलिए हमें ऐसा बंधन खोजना चाहिए जिसमे हमें ये सब करने का मौका न मिले. सरकार को बंधन देना चाहिए. हमे बंधन स्वीकार करना चाहिए. जब तक हम में वासना, क्रोद्ध, लालच, घमंड, जलन तथा धोखा खाने की प्रवृत्ति हैं तब तक लड़का, लड़की बराबर नहीं हो sakte. लड़के लड़कियों शारीरिक एवं मानसिक तौर par भिन्न होती हैं. इस avastha में दोनों में तुलना या फिर badabi की बात नहीं करनी चाहिए. बल्कि इसा भिन्नता का सम्मान होना चाहिए शिक्षा, नौकरी इतियादी में बराबरी दूसरी बात हैं .इन सन से खास कुछ नहीं बदलने वाला. आप पश्चिम को ले लीजिये. कोई अपराधिक घटना होते ही अपराधी को तुरंत सजा मिलजाता हैं. पर फिर भी अपराध के घटनाओं बढ़ते jaa रही हैं. लडको की इसी सराब पीना इतियादी आजादी के वजह से अपर्धिक घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही हैं. दुर्भाग्य से समाज लडको को सँभालने के बजाये, लड़कियों को इन सब में अपनी आजादी खोजने के लिए प्रेरित कर रहा हैं. .आपका हेड लाइन सही नहीं था.

            Dhanyavad

#16PrabhatJuly 31, 2012, 2:26 PM

नहीं मैं आपसे सहमत नहीं हूँ, आप कृत्रिम समाज बनाने की बात कर रहे हैं. अगर ऐसा हो सकता तो आज तक संभव हो गया होता. आप पश्चिम को ले लेलिजिये, फेमिनिस्ट आन्दोलन के बाद भी औरतों की स्तिथि बहुत ख़राब है, अंतर सिर्फ इतना हैं की ये सब बात उनके के आम हो गयी हैं. आदमी और औरत एक दुसरे से आकर्षित होने के तरीके भिन्न होते हैं, और यह मानसिकता प्रकृति के द्वारा दी गयी हैं. इसे बदलने की चेष्ठा करना व्यर्थ हैं. आप जंगल में जाकर देख लीजिये.
मै यह नहीं कहता की हमें जंगल में जाकर सीखना चाहिए. परन्तु हमें यह मानना होगा की पर्याप्त सिक्षा के आभाव में हम जानवर जैसे हो जायेंगे. अब सवाल हैं शिक्षा क्या हैं.
पुरुषों को बताना चाहिए की प्रत्येक औरत की बाहरी सुन्दरता उसके लिए नहीं बनी हैं और साथ ही महिलाओं को समझना होगा की यह शारीरिक सुन्दरता प्रत्येक पुरुष के लिए नहीं बनी हैं. यह सुन्दरता डिस्प्ले के लिए नहीं होनी चाहिए. ise पति पत्नी तक ही सिमित rakhna चाहिए. न केवल बताना चाहिए की बल्कि ऐसा समाज उत्पन्न करना चाहिए की इसा तरह की बातें भी न हो. हम केवल पुरुषो या फिर महिलाओ को जिम्मेदार ठहराते हुए कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकतें. और एक और बात इस पूंजीवादी समाज में ऐसा कर पाना संभव नहीं हैं, जहा हर प्रोडक्ट के सेल के लिए नंगी औरतो का होना अनिवार्य होता हैं. कभी आप लोगो ने सोचा हैं क्यों? जवाब हैं -पुरुषो का शोषण करने के लिए. एक नारी होने के नाते, एक माँ होने के नाते आप लोगो ने कभी इसका विरोध किया. उल्टा आप इसको महिलाओं की आजादी से जोड़ते हैं. आपके समाज, मीडिया को लगता हैं हैं की छेर-छार, बलात्कार करने वाला पुरुष फायेदे में रहता हैं. इस भौतिक जगत का नियम हैं की जब जब समाज भोगवादी हो जाता हैं तो इसकी पहली शिकार महिला होती हैं. इसे रोकना हैं तो इस भोगवादी समाज का अंत करना होगा. और यह सब संभव हैं. आप अर्जुन और उर्वशी की स्टोरी जानते होगे. वो लड़की भले ही किसी भी दशा में थी, उसके साथ छेर छार करने वाले निश्चित तौर पर अपराधी हैं उन्हें मृत्यु दंड मिलना चाहिए.

#17NeelJuly 27, 2012, 10:03 PM

मैडम, रेप केवल भारत में ही नहीं होते पूरी दुनिया में होते हे, यद्धपि में मानता हु की पुरुषो को संयमित आचरण करना चाहिय्रे किन्तु आप प्रकृति के नियमो को नहीं झुटला सकती, प्रकृति हे स्त्री को सुन्दरता और कोमलता का प्रतिक बनाया और पुरुष को कठोर, में आपके बरमूडा वाले उदाहरण से बिलकुल असहमत हु, इनकी शारीरिक विभिन्नता पर भी ध्यान दीजिये. आप पश्शिमी सब्भ्यता का अन्धाधुन अनुसरण कर रही हो, औरत कभी पुरुषो के समान और पुरुष कभी औरतो के समान नहीं हो सकते. जहा स्तरीय बरमूडा में घुमती हे वहा रेप और छेड़छाड़ का प्रतिशत कितना हे आप निकल देना.

    #18kanupriya GuptaJuly 30, 2012, 11:20 AM

    नीलआप मुझे जानते नहीं इसलिए में अन्धानुकरण कर रही हु ये भी नहीं कह सकते और समझदार इंसान को कहना भी नहीं चाहिए असा मुझे लगता है आपने लेख पढ़ा धन्यवाद् ….

      #19suchitra sharmaAugust 16, 2012, 10:29 AM

      कनुप्रिया आपने काफी साहसी व् जागरूक लेख लिखा इसके लिए आप धन्यवाद की पत्र हे किन्तु प्रभात का कहना भी बोहोत हद तक उचित एवं सत्य के बोहोत करीब हे. उनका जवाब ये दर्शाता हे के वे भी अपने मन आप जेसी ही पीदा रखते हे, और इस बीमारी का वास्तविक हल सोचने का प्रयास कर रहे हे. आप दोनों को एक आपस में सम्मान देना चाहिए, बुरे और बेईमान लोगो की तरह ही अच्छे और ईमानदार लोगो को एक साथ आकर एक प्रभावी एवं मजबूत प्रयास करना चाहिए गलत को रोकने और सही को सहयोग करने के लिए एसा बेहद जरूरी हे. अगर आप वाकई में अपने रास्ट्र, संस्कृति, और समाज का उत्थान चाहते हे तो. मुझे यकीन हे आप इसी ही चाहत और जज्बा रखते हे. आप दोनों को धन्यवाद्.

#20pankaj dostJuly 24, 2012, 7:26 PM

आप अच्छा लिखती है !
पर कुछ लोग जो महिलाओं को दोषी मानते है मेरी नजर में गलत हैं और संकुचित मानसिकता से ग्रस्त हैं . क्या महिलाये नग्न होकर उन्हें कमेंट्स करने या उन्हें छेड़ने या उनके साथ ज्यातती करने के लिए इशारे करते हुए गुजरती है ?
मेरा मानना है की लड़के और लड़की में फर्क सिखाये जाने का सिस्टम ही ख़राब है दोनों को जीने के लिए संभावनाओं और अवसरों की समानता होनी चाहिए. दोनों एक दुसरे के पूरक है न की एक दुसरे से श्रेष्ठ. लडकियों को भी याचक की छवि से बाहर निकलकर ‘शारीरिक’ , ‘मानसिक’ और ‘भावनात्मक’ रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनना होगा .
मेरा मानना है की कोई क्या पहने और क्या नहीं ये उसकी अपनी मर्ज़ी होनी चाहिए न की किसी ओर का बनाया हुआ दायरा , मेरा मानना है आज की पीढ़ी दायरों में कैद नहीं होना चाहती है……… और फिर इन्सान की आज़ादी की हद वहां तक होती है जहाँ तक वो किसी और की आज़ादी में हस्तक्षेप नहीं करता, हर इंसान को अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से अपनी शर्तो पे जीने की आज़ादी है, फिर क्यों कोई व्यक्ति की प्रक्रति को दायरों में कैद करना चाहता है.
लेकिन यदि कोई सिर्फ नग्न फूहड़ता को सार्वजनिक कर किसी विशेष सामाजिक माहोल को शर्मसार करे और सम्मान के साथ जीने के किसी और के हक का हनन कर रहा हो तो वहां उसकी आज़ादी की की सीमा है लेकिन इसे तय करने का तरीका भी सभ्य होना चाहिए. क्योंकि गांधीजी ने कहा है “साधन और साध्य दोनों पवित्र होने चाहिए” अर्थार्थ आपके उद्देश्य भी और उसे पाने का आपका तरीका भी .
मेरा मानना है की व्यक्ति में हद या मर्यादा के प्रति सम्मान की भावना जगाई जानी चाहिए न की हद या मर्यादा के पूर्व निश्चित दायरों में व्यक्ति की खुलके सोचने और जीने की आज़ादी को कैद किया जाना चाहिए.
जहाँ तक बात पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करने या भारतीय संस्कृति की दुहाई देने की है तो मेरा मानना है की किसी भी संस्कृति या सभ्यता का अंधअनुकरण या खिलाफत की भावना नहीं रखनी चाहिए बल्कि क्या बेहतर है इसे समझकर अपनाने या त्यागने में कोई बुराई नहीं है. इसी को आधुनिकता कहा जाता है, क्योंकि आधुनिकता जीवन को सुखमय करती और विचारो को श्रेष्ठ होना सिखाती है, यही भारतीय संस्कृति है जो अपनाने का साहस रखती है और सदियों से हर रंग में रंगती आई है.
किसी भी राष्ट्र की नैतिक उन्नति वहां महिलाओं की दशा और उन्हें मिली आज़ादी के मायनो से निश्चित होती है
मेरा मानना है की सभी को सुरक्षा ,अपनापन और खुले विचारो के साथ जीने की आज़ादी होनी चाहिए. संभावनाओ और अवसरों से भरी दुनिया के लिए………..
हो सकता है मेरे विचार आपके व्यक्तित्व और तर्कों के सामने बहुत बोने हो, पर ………पढने के लिए शुक्रिया .
मुझे आपके विचार अछे लगे और मै आपके विचारों की आक्रामकता से प्रभावित हूँ

pankaj dost

#21vinayasaxenaJuly 23, 2012, 11:26 PM

सटीक lekhan

#22Rajat PandeyJuly 23, 2012, 10:07 PM

kisi bhi ladki ke sath is tarah ke kukritya ho ye durbhagyapurna hai.kadachit aisa nahi hona chahiye.anil ji maf kariyega aapne kaha ki ladkiyo ki tango ko dekhkar khoi hui feeling jagti hai ye bat mere samajh me nahi aa raha hai kyo ki is mansikta ke log meri nazar me havas ke pujari hai iska matlab apni ma,bahan ,beti ke tango ko dekh kar bhi vahi bhavna jagrit hoti hai.aisi soch ko mai kya kahu samajh nahi aata. Jis din khud ki bahan beti ke sath aisa ho to samajh aaye.
Kitna kast hota hoga jiske sath aisi ghatna hoti hai.

#23Anurag sharmaJuly 23, 2012, 1:06 PM

जो भी हो जेसा भी हो अगेर वो कोई भी लड़की क साथ बतमीजी कर रहा है उसे कोई मोका मत दो न हे कानून के हवाले करो साले को रोड पर खड़ा कर क गोली मार दो .वेसे एक बात कुछ लड़की भी होती है जो जान बुजकर लडको को फ्लर्ट करती है मुझे उस का जवाब दो किसी कके पास है थो.ओके दोस्तों अगेर मैंने कुछ गलत लिखा हो थो मुझे माफ़ कर देना

#24kulwant mittalJuly 21, 2012, 11:39 PM

कनुप्रियाजी , आपका कहना बिलकुल ठीक है , किन्तु कुएं के मेंढक को तो उससे ज्यादा कुछ नज़र ही नहीं आता , वो तो वहीँ अपनी गन्दी दुनिया बना लेते हैं.

#25अनिल गुप्ताJuly 19, 2012, 12:46 PM

kanupriya jee ek ladke kee tango ko dekh ke kisee ke andar koyee feeling nahee aayegee par ek ladkee chahe wo kaisee bhee hai kee wahee taange dekh ke har ladke mei ek alag hee feeling aayegee bahut se apne par kabu kar lete hai bahut se nahee. aadmee or ourat ke shareer kee banawat saman nahee alag hai isliye unke aakarshan bhee alag hai ourto mei apne viprit lingee ko aakarshit karne kee shamta adhik hai ladko banispat. isliye ladko or ladkiyo ke fark ko jis din aap samjh jaayenge us din aap aisaa blog nahee likhengee.

khapo ke baare mei aap jaantee kya hai wahee jo aapko desh ka desh drohee meedia bata raha hai. kanu jee bagpat mei khap panchayat nahee do muslim gaov kee panchayto ne shariya kanoon lagu kiya hai jiska khap panchayto se koyee sambandh hee nahee.

musalmaano mei khaap panchayat nahee shariya kaanon hota hai.

purush namak pranee ko koyee hak nahee kee aap kya pehne kya nahee ye dicide karne ka to aapko hak hai apne savedansheel ango ka prdarshan kare humare porush ko chunootee de……..?

roj kitnee mahila gharo se kaam par jaatee hai road par purusho ke sath chaltee hai par kya harek ke sath aisaa hota hai.

seedee see baat takatwar kamjor ko dabata hai ye sansaar ka neeyam hai purusho se mahila bahut majboot hai jeevan ke har chetr mei is baat mei koyee shak nahee par 95% mahilaaye purusho se sharirik mukaable mei kamjoor hai. or jab koyee mahila akele mei vikrit manisikta waale purusho ke beech ghirtee hai to aisa hota hai kuch baato ka khyaal to mahilaao ko bhee rakhna hoga anythaa is raat kee kabhee subha nahee aayegee.

    #26kanupriya GuptaJuly 19, 2012, 4:25 PM

    dhanyawad post padhne ka sir. aap jese samjhdaar log ye post padh rahe hain ye hi kya kam hai.aapne mera ek comment nahi padha jisme maine kaha hi khap ke smabnd me kam jankari he mujhe kher…aur mujhe nahi pata tha aapko poore lekh me sirf taange nazar aaengi…
    baki takatwar kamjor ko dabata hai yahi to nahi hona chahiye…mahilaon ko kuch khyal rakhne hi chahiye is baat se poori tarah sahmat hu …

#27zainul hasnainJuly 18, 2012, 11:02 PM

bahut accha laga aap ke ye bichar padh ker mai kafi prabhavit hoon
kash log HIZAAB ka matlub samjhte ………………….

#28sanjeetsinghbhalothiaJuly 17, 2012, 7:36 PM

kanupriya gupta ji main aapki sabhi baton se sahmat hoon sivay khap panchayat ko blame karne wali baat ke. iske piche do hi karan ho sakte hain 1. ya to aap khapo k baare me kuch jaanti nhi hain aur aapka khapo k baare me saara gyan is bikau media dwara batayi gai baaton tak hi simit hai 2, ya fir aap bhi apne aapko aadhunik kahne wale logonki tarah sachhayi se mooh mod rahi hain. aapki baat ekdum sahi hai ki aurat ki hifajat bandish lagakar nahi ki ja sakti iske liye soch badalni hogi lekin main aapko bata du ki khapo me mahilao ki ek alag shakha hai aur unke pass bhi purusho jitne hi adhikar hain aur abhi 14 april ko haryana ke jind ke gaanv bibipur me sarvjatiya sarvkhap ki mahapanchayat aayojit huyi thi aur us mahapanchayat ka aayojan mahila aur purusho ne milkar kiya tha. is mahapanchayat me 350 se jyada khapo ke mahila aur purush partinidhi aaye the aur ye mahapanchayat female foeticide ko rokne ke liye aayojit huyi thi. is mahapanchayat me faisla liya gaya ki is apradh ke aaropiyon par hatya ka mukadma chalaya jaye aur is panchayat me baghpat ki shariya panchayat dwara aurato par pabandi lagaye jane ke faisle ki ninda karte huye kaha gaya ki khap mahilaon ki aajadi aur samanta ki pakshdhar hai aur is faisle ka purjor virodh karti hai tatha ye bhi saaf kiya ki baghpat ke gaanv asara ki is shariya panchayat ka khapo se koi sambandh nhi hai aur ye ek muslim panchayat ka faisla tha jo shariya kanoon par aadharit tha aur unhone kaha ki media saajish ke tahat unhe is shariya panchayat se jod rahi hai jabki musalmano me khap nhi hoti hain.

    #29kanupriyaguptaJuly 18, 2012, 12:20 AM

    sanjeet ji aap jis khap ke fesle ki baat kar rahe hain me uska swagat karti hu.soochna dene ke lie dhanyawad.manti hu har acchi khabar mujh tak nahi pahunch paati.me sach me shariyat aur khap ka antar nahi janti thi batane ke lie dhanyawad. post pasand karne ke lie aabhar

#30rupali shuklaJuly 17, 2012, 6:11 PM

media darbar
ye sahi hai ki aap aurto ke bare me itna sochte hai aur likhte hai per jara apni bhasha pe gaur kijiye…(title) behad hi ganda hai aap ek accha prayas kar rahe hai isliye ise kisi sasti bhasha me kisi gandi aur chaltau magzine ki tarah na parose

thanks

#31manoj agrawalJuly 17, 2012, 4:05 PM

Aurat ke liye sare bandhan hai.
Aaisi soch walo par sharm aati hai

    #32kanupriya GuptaJuly 17, 2012, 4:35 PM

    accha laga aapki soch aurton ke lie acchio hai.nahi to bharat pandey ji ne jis tarah ka comment kiya hai dekhkar laga tha aadmi asa ghatiya kaise soch sakte hain aur asi gandi nazar kaise rakhte hain

    #33PrabhatJuly 31, 2012, 3:23 PM

    बंधन पुरुषो पर bhi डालना चाहिए. और पहले ऐसा होता था. आज भी बंधन की जरूरत हैं. बंधन से आजाद होकर सभ्य होने की कल्पना bhi नहीं कर सकतें.

#34Bharat PandeyJuly 17, 2012, 3:22 PM

आपकी बातों से १००% सहमत हूँ ……..परन्तु अगेर खाप पंचायतों ने कुछ अपने नियम बनाये हैं तो वहां पर भी है तो नारी जाती का बचाव ही…………आजकल आप ही बताएं की मोबाइल लिए हुए लड़की जो घंटों बात करती है . धुप भले ही न हो फिर भी मुख को पूरी तरह से कपडे या दुपट्टे से ढके रखना चाहे रात हो या दिन ………..परिवार के लड़को के अतिरिक्त बाहरी लडको के साथ वाटर पार्क जाना सिनेमा जाना रेस्टोरेंट जाना …….इन गुणों वाली लड़की को आप किस श्रेणी में रखेगी …..रही बात गोलाईयों की तो मोहतरमा दुपट्टे का प्रयोग ब्लौसे का गला इतना बड़ा की अंदर की ब्रा भी न संभाली जाये हलके रंग के कपड़ों के साथ डार्क कलर के अंत: वस्त्र पहनने की क्या जरुरत है………..किसी की घूरती नजरों को देखने के बाद ही किसी लड़की या औरत को यह ख्याल क्यों आता है की उसका व्च्चस्थल दिखाई दे रहा है और दुपट्टा या साड़ी का पल्लू पहले भी ठीक किया जा सकता है..अगर बीवी अपने पति को बिना मेकप ठीक लगती है तो ज्यादा सजाने सवारने की जरुरत क्या है. और भी बहुत कहने की इच्छा है परन्तु शायद मर्यादा के विपरीत होगा

    #35rupali shuklaJuly 17, 2012, 6:08 PM

    bilkul sahi kaha aapne pandey …aajkal aazadi ka matlab navyuvtiyon ne khuch aur hi nikal liya hai …maa bap baccho per bharosa kar ke unhe higher studies ke liye bahar bej rahe hai…per bacche to khuch aur hi karte hai…hostle culture bhi iske liye kafi hud tak jimmedar hai……aur ek kahawat hai mai bhi nari hu per jarur kahna chahugi..”urag turag nari nrapati neech jaat hathiyaar ,rahiman inhe samhaliye paltat lage na bar”…..

    thanks

#36satyam mandowaraJuly 17, 2012, 12:36 PM

sargarbhit lekh..mahilao ke prati purusho ki jigyasa unke ango ya kapdo me hi kyu he kyu nahi mahilao ke guno aur unki yogyata ke prati jigyasa rakhi jaye…desh me sanskaro ka patan t.v. aur filmo me dikhai jane wali ashlilta se bhi bad rahi he.inke fuhad karyakramo ki samiksha samaj me jarur honi chahiye.

    #37kanupriya GuptaJuly 17, 2012, 1:10 PM

    Lekh ko padhne aur aur comment karne ke lie bahut bahut dhanyawad.Ab Samay aa gaya hai jab asi ghatnaein bhulai na jae balki inki jadon tak jaya jae.

      #38alka katiyarJuly 18, 2012, 2:27 PM

      kanu ji, mudda bahas ka nahi. bura hua h galti kis ki? ye bhi koi vishy nahi janta tamashbin bani rhi shrmnak h, but hum subhi ko is se sikhna h,,, aage ese galti na ho,,,,, galti bachi ki thiya tamassh bin ki, per sikhna h ki “bar m 17 years ki ladki ka b’day celibration ki jagh h? yahaa h galti drink karne ke baad kise hosh rahta h ?kyaa ladki ke mata pita yah jaante the… or hum sabhi aaht h is se tamshbin jaanta se,,,,galti yahaa h , bus ab or na ho asi galti savdhan hona hoga …. khud ko jagaana hoga

        #39kanupriya GuptaJuly 18, 2012, 4:30 PM

        alka ji aap bhi wahi baat kar rahi hai jo nahi ki jani chahiye aap bhi wahi galtiyan ukhad kar la rahi hai jo ukhadne ka koi matlab nahi. kya aapke savdhan ho jane se asi sharmnaak ghatnaein hona band ho jaengi? kya aap aur baaki saari ladkiyan sach me itni asaawdhan hain? nahi.ladkiyan sawdhan hi hoti hai .aap bhi wahi baat kar rahi hain ki aage galti na ho kya aap ise sach me galti manti hain ? agar aapki nazar me ye galti hai to mujhe dukh hai ye galti nahi gunaah hai…sirf sawdhan hona hal nahi galat ka virodh karna jaroori hai.aur kise hosh rahta hai ka kya matlab he maa baap ki ladki ki galti apni jagah ho sakti hai to kya wo hona sahi tha jo hua. baccho ko sanskaar die jana hi chahiye par bacche sirf ladki nahi hoti ladke bhi hote hain.

          #40Anurag sharmaJuly 23, 2012, 1:12 PM

          मै अलका जी की बात से सहमत हु की १७ साल की लड़की को बार मै जाने का कोई मतलब नहीं लड़की को कोई हक़ नहीं ऐसे माहोल मै जाने का.बर्थडे मनाना है थो घर पर बनाओ वह क्या सखी दिखने जाती है जयादा पैसे है थो कोई दान करो कुछ पुन्य मिलेगा

          #41PrabhatJuly 31, 2012, 3:29 PM

          नहीं, परन्तु अगर होगी तो केवल दो दिनों के अन्दर ऐसा करने वालो को मृत्युदंड दिया जा सकता हैं.

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