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औरत की गोलाइयों से बाहर भी दुनिया गोल है…

-कनुप्रिया||

गुवाहाटी की घटना ने मुझे आहत किया है वैसी आहत नहीं जैसा आम तौर पर लोग हो जाते हैं किसी अपने के साथ दुर्घटना हो जाने पर ..अब हम लोग उतने आहत होते ही नहीं.. लगता है मीडिया

के नकली आंसुओं ने हमें भी कुछ उसी तरह के घडियाली आंसू बहाने, ना बरसने वाले बादलों की तरह सिर्फ गडगड़ाने वाला बना दिया है. मैं आहत हूँ क्यूंकि हम सब ऐसे हो गए है, मैं आहत हूँ कि आम जनता सिर्फ मूक दर्शक हो गई है …ज्यादातर लोग आहत हैं क्यूंकि कल को जब उनकी बहु बेटियों के साथ भरी सड़क पर ऐसा होगा तो लोग क्या ऐसे ही खड़े रहेंगे? ज्यादातर लोग अपनी ढपली अपना राग गा रहे हैं. २-४ दिन में शायद लोग भूल भी जाए या कुछ और दिन याद रख लें फिर भूलें … पर क्या सच में बात सिर्फ इतनी ही है कि हम कितने दिन याद रखेंगे या कितनी जल्दी भूल जाएँगे ? अगर बात सिर्फ इतनी ही है तो फिर बात को करना ही क्यों? क्यों हर जगह गुस्सा दिखाना, बोलना या बुरे शब्दों में कहे तो थोड़ी देर भोंकना और फिर अपनी रोटी की जुगाड़ में लग जाना ? लगता है ना दिल पर ऐसी बुरी तुलना से? पर सच मानिये दिल पर लग रहा है, ये अच्छी बात है क्यूंकि जिनके दिल पर लग रहा है, वहाँ अभी रौशनी की किरण बाकी है ….

मुझे पिछले उन सभी दिनों से लग रहा है जबसे ये घटना हुई है. हर मिनिट हर क्षण लग रहा है, पढ़ रही हूँ, देख रही हूँ, सोच रही हूँ पर ये लगना बंद नहीं हो रहा घबराहट हो रही है अन्दर से….लोग अपनी अपनी अपनी शिकायतें कर रहे हैं किसी को पुलिस से शिकायत है, किसी को उस भीड़ से शिकायत है जिसने विरोध नहीं किया कुछ लोग अपनी ढपली लेकर महिलाओं को आत्म रक्षा सिखाने के गीत गा रहे हैं पर मुझे किसी से शिकायत नहीं बस शर्म है, जो ख़तम नहीं हो रही. शर्म है उस सोच पर जिसने कुंठित होकर घिनौना रूप धारण कर लिया है.

अजीब है ये बात की कुछ लोग लड़की के कपड़ों पर, लड़की के घर आने जाने के समय पर आपति उठा रहे हैं (इसमें महिलाएं भी शामिल हैं) ..अजीब इसलिए नहीं कि उन्हें आपत्ति है, अजीब इसलिए कि ऐसी सोच लेकर वो जिन्दा है अभी भी ….ऐसे लोग बार बार सिक्के का दूसरा पहलू देखने की बात कर रहे हैं पर हम लोग कब तक सिक्के का दूसरा पहलू देखने की बात कर करके सिर्फ दूसरा पहलू ही देखते रहेंगे, कब तक समस्या की जड़ को छोड़कर इधर उधर भटकते रहेंगे?

अजीब लगती है ये बात की लड़की के छोटे कपडे लडको को एसे कृत्य करने के लिए भड़का सकते है … ये बात तो मैं मानती हूँ “दुनिया गोल है पर गोलाइयों से बाहर भी इक दुनिया है”, एक खुली साफ़ सुथरी सोच है. ये बात पिछड़ी और संकुचित सोच रखने वाले लोग जाने कब मानेंगे ?
एक लड़का जब बरमूडा पहनकर घर से निकलता है तो शरीर का दिखने वाला हिस्सा होता है २ टांगे, हाड मॉस से बनी हुई और जब एक लड़की वही बरमूडा पहनकर घर से निकलती है तो उन टांगों के साथ एसा क्या दिखता है लोगो को जिसका इतना विरोध है? अब इसमें दोष किसका है? किसी लड़की का या गन्दी नज़रों का? ये सब जानते है पर मानने में उन्हें संस्कृति का हास दिखाई देता है !
क्यों ऐसे विचार रखने वाले लोग जीभ लपलपाने वाले घटिया और कुंठित लोगो को पागल कुत्तों की तरह बंद कर देने का विचार नहीं रखते? जब पागल कुत्ता राह चलते को काट लेता है तो दोष पागल कुत्ते को दिया जाता है और एक कुंठित मानसिकता वाला इंसान राह चलती लड़की की इज्जत उतारने की कोशिश करे तो दोष लड़की का क्यों?
ऐसे लोगो को द्रोपदी के चीरहरण का दोष भी द्रोपदी को देना चाहिए… कह दीजिए उसी की कोई गलती रही होगी जो भरी सभा में उसे चीर हरण के लिए लाया गया फिर कृष्ण को उसकी अस्मिता बचाने आने की जरुरत ही क्या थी ?
सिर्फ कुछ अंगों के अलग होने से महिला पुरुषों की भोग की वस्तु मानी जा सकती है? क्या हड्डियों के ढांचे पर मांस की मात्रा का अंतर उसे इतना अलग बना देता है कि भरी सड़क पर उन अंगों को निर्वस्त्र करने की कोशिश की जाए ?

हम माने या ना माने अंतर सोच का है ना की रहन सहन का ….और उससे भी बड़ा अंतर है सामाजिक पतन का जो बढ़ता जा रहा है ,किसने हक दिया पुरुष नाम के प्राणी को की वो एक खाप पंचायत बनाए और वहा स्त्रियों से सम्बन्धित निर्णय इस तरह ले जैसे वो अपने पालतू जानवरों के लिए निर्णय ले रहे हो ? और अगर वो सच में स्वयं को संरक्षक माने बैठे हैं तो रक्षा कीजिए ऐसे नज़रबंद मत कीजिए या फिर वो सुरक्षा नहीं कर सकते तो कृपा करके अपना खिताब वापस दे दे या कह दे कि महिलाओं को संरक्षित प्राणी घोषित करना चाहिए बाघों की तरह ? अगर यही चाहते हो तो ये भी करके देख लो क्यूंकि बाघ भी बचे नहीं रह सके क्यूंकि शिकारी की सोच नहीं बदली …..
हर शिकार को छुपा देने से शिकारी की सोच नहीं बदल जाएगी बल्कि वो और ज्यादा तीव्रता से खोज चालू कर देगा….

क्या कुछ अंगो को छुपा देने भर से औरत की इज्जत सच में बच जाएगी ? किसने कहा ये बात की इज्जत सिर्फ औरत की होती है जैसी इज्जत औरत की होती है, ठीक वही इज्जत आदमी की भी होती है. अंतर बस इतना है की औरत की इज्जत का ऐसा हौवा बनाया जाता है कि वो अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उस इज्जत को बचाने के बारे में सोचने में लगा देती है और आदमी उसे लूट लेने के बारे में सोचने में …

मीडिया को दोष देना थोडा बनता है क्यूंकि उनके लिए जब तक कोई खबर टीआरपी बढ़ाने वाली होती है वो महिला का अंग अंग जूम करके कैमरे में दिखाएंगे और जेसे ही वो टीआरपी कम हुई तो वो दूसरा कोई किस्सा ढूंढ लेंगे जूम करने के लिए पर हम लोग कब तक इस पैन, जूम, लॉन्ग शॉट में उलझे रहेंगे? हमारी अपनी आत्मा नहीं कहती विरोध करो. ख़ुद विरोध करो, क्या महिलाओं की ख़ुद की आँखों की शर्म इतनी मर गई है की ऐसी घटनाओं पर विरोध तक नहीं जताना चाहती ?

माता पिता के दिए संस्कारों को क्या कहना कोई माता पिता अपने बच्चे को रेप करना नहीं सिखाते पर क्या वो महिलाओं की इज्जत करना भी नहीं सिखा सकते? अगर वो इतना भी नहीं सिखा सकते तो उनकी बात करना ही बेकार है क्यूंकि एसे माता पिता को नवजात बेटियों को नहीं अपने नवजात बेटों को कूड़े के ढेर में फेकने वालों की श्रेणी में मान लेना चाहिए क्यूंकि जब वो मूलभूत बात नहीं सिखा सकते तो जनम देकर वो सिर्फ समाज बिगाड़ रहे है और उनका भविष्य भी अँधेरे की गर्त में ही समझिए…

इतनी बातों के बाद भी अगर ज्ञान चक्षु नाम की चीज या दिल नाम की चीज पर कोई असर नहीं पड़ता तो जाइये वापस अंधेरों में और खोज लाइए कुछ और कुतर्क में इंतज़ार करुँगी …क्यूंकि महिलाओं के पास ज्यादा रास्ते नहीं है या तो अब विरोध के लिए उठ खडी हो या दबती जाए कुचलती जाए और शरीर की गोलाइयों वाली सोच में ख़ुद को और अपनी सोच को भी कैद कर लें …पर मुझे अब भी उम्मीद है…..और हर हाल में रहेगी….

(कनुप्रिया एक मशहूर ब्लॉगर हैं)

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