/भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले भी भ्रष्ट….

भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले भी भ्रष्ट….

66 वर्ष की आजादी और 70-72 वर्ष के स्वतंत्रता सेनानियों की लम्बी कतार, लूट जारी है….
 56,000 से अधिक स्वतंत्रता संग्राम पेंशनभोक्ता “फर्जी”, शहीदों के कफ़न को नोच-नोच कर खा रहे हैं ये “फर्जी पेंशनभोक्ता”, चार वर्षों में 300 करोड़ रूपये से अधिक लुट चूका….
 

स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के जीवित वंशजों कि दुर्दशा पर बनी एक लघु फिल्म ने यह दावा किया है कि स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर मिलने वाली पेशन योजना कि राशि को “दवा कर” लूटा जा रहा है और पिछले चार वर्षों में ही यह राशि तक़रीबन 300 करोड़ से अधिक पहुँच गयी है.फिल्म के अनुसार भारत सरकार कि स्वतंत्रता संग्राम पेंशन योजना में उल्लिखित नामों में 30 से अधिक प्रतिशत लोगों का नाम या तो फर्जी है या अपने “उल्लेखित उम्र” के कारण “शक के दायरे में” आते हैं. दुर्भाग्य यह है कि इस दिशा में भारत सरकार अथवा गृह मंत्रालय की ओर से कभी कोई जांच नहीं किगयी है.

“आन्दोलन एक पुस्तक से” के तहत बनी यह लघु फिल्म, जो भारत के 66 वां स्वाधीनता दिवस से सम्पूर्ण देश में शहीदों और उनके जीवित वंशजो के प्रति एक “सामाजिक चेतना और दायित्व” को जागृत करने के लिए अभियान के तौर पर सभी शैक्षणिक, सांस्कृतिक संस्थाओं में प्रदर्शित किया जायेगा, ने यह दर्शाया है कि “भारत सरकार के अधीन निबंधित एक लाख सत्तर हजार पांच सौ पैन्तालिस स्वतंत्रता सेनानियों में लगभग 30 फीसदी लोगों का उम्र मात्र सत्तर से बहत्तर साल है और इस योजना के अधीन मिलने वाली अन्य सुविधाओं के अतिरिक्त वे ग्यारह हज़ार तीन सौ एक तीस रूपये प्रतिमाह की पेंशन भी पाते हैं, जो एक सोचनीय विषय है.”

दिल्ली के एक वरिष्ट खोजी पत्रकार शिवनाथ झा और उनकी शिक्षिका पत्नी श्रीमती नीना झा की पुस्तक “फोर्गोटेंन इंडियन हेरोज एंड मार्टियर्स: देयर नेग्लेक्टेड दिसेन्देंटस – 1857-1947” नामक पुस्तक पर आधारित यह लघु फिल्म, पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय के.आर. नारायणन का हवाला देते हुए इस बात का भीखुलाशा किया है कि “भारत में राष्ट्रपति के अधिकारों पर भी परोक्ष रूप से एक सरकारी-प्रतिबन्ध है, नहीं तो भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त शक्तियों के आधार पर राज्य सभा में जिन 12 सीटों पर राष्ट्रपति को मनोनयन करने का अधिकार है, उस अधिकार के तहत अब तक कभी भी शहीदों अथवा उनके वंशजों को लाकर सम्मानित क्यों नहीं किया गया है?” जबकि स्वतंत्रता के पश्च्यात भारत के संविधान में सैकड़ों बार संशोधन किये गए हैं.

“एक खोज भारत की: स्वतंत्रता आन्दोलन 1857-1947 के शहीदों के जीवित वंशजों की दर्दनाक दास्ताँ” नामक साठ मिनट की इस जीवंत फिल्म को एक दसवीं कक्षा के छात्र आकाश झा ने बनाया है. आकाश झा ने शहीदों के दर्जनों से अधिक जीवित वंशजों के घर जाकर उनकी दशा का फिल्मांकन किया है.

शिवनाथ कहते हैं की भारत 50वें स्वाधीनता दिवस के अवसर पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय के.आर.नारायणन ने अंडमान जेल में बोलते हुए सरकार पर यह आरोप लगाया था की “संविधान के अधीन प्रदत्त शक्तियों के आधार पर भारतीय संसद (राज्य सभा) में 12 सदस्यों का मनोनयन करने का अधिकार राष्ट्रपति को है. लेकिन इस दिशा में सरकार की ओर से कभी कोई पहल नहीं की गई ताकि स्वतंत्रता आन्दोलन के शहीदों अथवा काला-पानी की सजा भुगते क्रांतिकारियों या उनके वंशजों को राज्य सभा में मनोनीत कर उन्हें सम्मानित किया जाये. उन्होंने यह भी कहा था की फिल्म अथवा अन्य क्षेत्रों से मनोनयन करना एक फैशन हों गया है.”

नारायणन ने स्पष्ट रूप से सरकार को कहा था की “स्वतंत्रता आन्दोलन में इन शहीदों और क्रांतिकारियों के अमूल्य त्याग और बलिदान को मद्दे नजर इनके परिवार को राष्ट्रीय परिवार घोषित किया जाये.” दुर्भाग्य यह है की उनके इस कथन को भी बोले 16 वर्ष बीत गए लेकिन किसी भी सरकार या राज नेताओं के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.