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सरकार मजबूर करती है बोतलबंद पानी पीने को…

By   /  July 19, 2012  /  5 Comments

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-कनुप्रिया||
प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया शायद उसका देना बनता था हमारा लेना बनता था उसने दिल खोल कर दिया और हमने खुले दिल से ले लिया ,पानी को भी हमने प्रकृति की वैसी ही देन समझा है और पानी है भी वैसी ही देन  जिसका प्रकृति ने पलटकर कभी पैसा नहीं माँगा हमसे और प्रकृति आज भी नहीं मांग रही पर हम ख़ुद उसका पैसा देना चाहते है या ना चाहते हुए भी दे रहे हैं ….

न चाहते हुए इसलिए कहा क्यूंकि संविधान की मूलभूत सुविधाओं में ये उल्लेख किया गया है की देश के नागरिकों को स्वच्छ जल मिलना चाहिए. पर हम इक ऐसे देश  के वासी है जहा के नेता महंगाई बढ़ने को जायज ठहराते हुए कहते हैं की जब लोग आइसक्रीम और पानी की बोतलों पर पैसा खर्च कर सकते हैं तो थोड़ी सी महंगाई बढ़ने पर इतनी आपति क्यों?

इक बार सुनने पर शायद ये बात अजीब ना लगे पर जब गहराई से सोचेंगे तो पाएँगे कि ये पानी की बोतलों का अम्बार हमारे आस पास लगा ही क्यों? इसलिए कि हमें प्लास्टिक की बोतलों में कई दिनों से पैक किया हुआ पानी स्वाद में बेहतर लगता है? या इसलिए कि हम बोतल का पानी पीकर बोतल के जिन्न जैसे कुछ हो जाना चाहते है? दोनों ही तर्क हास्यास्पद है पर ये सत्य है की हम सब मजबूर है हम वो पानी पीते है क्यूंकि हमें लगता है म्युनिसिपाल्टी के नलों से आने वाले पानी से बोतलों का पानी साफ़ है.

ये बात बहुत हद तक सच भी है घरों में आने वाला पानी सच में गन्दा होता है, बहुत गन्दा, इतना गन्दा की उसे पीना तो बहुत दूर की बात है, दो बार छान लेने के बाद भी नहाने के बाद एसा लगता है जैसे नहाकर नहीं निकले या जैसे बालों में कहीं मिटटी सी है. ये मुंबई जैसे महानगर का सच है. गाँव और छोटे शहरों का सच कही, कही बेहतर और कहीं बहुत भयानक हो सकता है. पीने के पानी का फिल्टर हर रोज पानी में आ रही गन्दगी की कहानी कहकर मुह चिढाता  है. जैसे अभी बोलेगा मैं भी अब इस गंदे पानी का साथी हो गया हूँ तुम लोग जल्दी बीमार पड़ोगे …..

कई लोग है जो आजकल घर में इस्तेमाल के लिए भी  बोतलबंद पानी लाते हैं पर रिसर्च  कहते हैं कि बोतलों में बंद ये जीवन हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम कर रहा है. कई बार ये इतना पुराना होता है कि स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालता है साथ ही साथ ये हमारे नल के पानी से इतना महंगा है कि कमाई का इक बड़ा हिस्सा ये बोतलें गटक जाती है. मतलब अप्रत्यक्ष रूप से हम पानी को पैसा पिला रहे हैं वो भी अपने स्वास्थ्य के रिस्क पर.

४ से ५ रु प्रति बोत्तल की लागत में तैयार होने वाला सो काल्ड मिनिरल वाटर हम १५ से २० रु देकर पी रहे हैं और ये बहुत बड़े प्रोफिट वाला धंधा भारत में तेजी से फ़ैल रहा है क्यूंकि  लागत कम है और मुनाफा ज्यादा,सरकार चुप  है क्यूंकि उन्हें रेवेन्यू मिलता है लोग चुप है क्योंकि किसी को स्वास्थ्य की चिंता है, किसी को पैसे की ज्यादा चिंता नहीं.

चिंता ये नहीं है की हम बोतलबंद पानी पी रहे हैं ये चिंता होनी भी नहीं चाहिए क्यूंकि हम अपने शौक से ये बोतलबंद पानी नहीं पी रहे हम मजबूर हैं. सोचिये अगर हमें घरों में, बाज़ार में, पर्यटन स्थलों पर, सभी जगह साफ़ और स्वच्छ जल उपलब्ध होता तो क्या सच में इतने लोग बोतलबंद पानी पीते जो आज पी रहे हैं? तब भी लोग होते जो ये पानी पीते पर तब संख्या इतनी बड़ी नहीं होती और जो संख्या होती वो भी सिर्फ दिखावे वाली होती या बड़ी मजबूरी वाली. पर आम जनता आज दिखावे के लिए ये पानी नहीं पी रही  मजबूरी में पी रही है.

देश में इक बहुत बड़ा वर्ग है जो मिनरल वाटर के बारे में सोच भी नहीं सकता. सोचने का सवाल ही नहीं उठता क्यूंकि दो जून की रोटी जुगाड़ने में उनका पूरा दिन निकल जाता है और पानी के लिए लगी लम्बी लाइनों में खड़े खड़े उनके घर के सदस्यों की आधी जिंदगी कट जाती है और सच मानिये पानी के लिए तरसने वाला ये वर्ग बहुत बड़ा है….कई लोग कह सकते है हर इंसान एसी लाइनों में नहीं खड़ा होता सच है नहीं होता पर किसी ना किसी तरह हम सभी पानी की समस्या से ग्रस्त तो है जाने अनजाने ही सही हम सभी या तो गन्दा पानी पी रहे हैं या बोतलों में बंद इस जल जिन्न को अपने गले से नीचे उतार रहे हैं….

बात ये नहीं की हम किस किस चीज़ के लिए लड़ सकते हैं पर क्या हमें, इस देश के सभी नागरिकों को साफ़ जल पीने का अधिकार भी नहीं है? देश में हर साल बहुत बड़ा बजट पानी के लिए निर्धारित किया जाता है पर ये सारा पैसा बह बहकर  आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमें पीने का साफ़ पानी नहीं दे पाया  ऊपर से बोतलबंद पानी के इस चस्के या मजबूरी ने धरती के इक बड़े हिस्से को कचरे से पाट दिया है यानि की दोहरी मार झेल रहे हैं हम सब गन्दा पानी पीते हैं और प्रदूषित भूमि के कारण तथा भूमि प्रदुषण के दुष्प्रभावों को भी झेल रहे हैं ……

हम लोग कब तक सब चलता है का राग गाकर या हम क्या कर सकते हैं की ढपली बजाकर मूलभूत सुविधाओं और अपने मौलिक अधिकारों के लिए भी आवाज़ नहीं उठाएँगे? क्यूंकि अगर हम इस देश के नागरिक होकर हर इक बात को यूँही नज़रंदाज़ करते रहेंगे तो फिर सरकार को ,दुसरे लोगो को दोष देने का क्या फायदा … ये बोतलबंद जिन्न हम सबका पैसा, स्वास्थ्य और मौलिक अधिकार सब लील रहा है …..

( ये पोस्ट लिखते समय लेखिका  अपने ऑफिस में बोतलबंद  पानी पी रही थी और ये सोच रही है कि बदलाव होना चाहिए क्यूंकि लेखिका भी उन मजबूर  लोगो में से एक है जिन्हें ऑफिस में बोतलबंद पानी पीना पड़ता है पर लेखिका अपने घर में बोतलबंद पानी नहीं पीती, नल का पानी फिल्टर करके पीती है …)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. vinayasaxena says:

    umda lekhan

  2. nmehra says:

    kanupriya ji ab aap aise sach likhengi to aapko kadwahat hi milne wali hai tayar rahiye iske liye………

  3. mayank says:

    Acha likha hai aapne, Par aap chinta na kare sab kuch badal jayega jo aap chahti hai wo hoga lekin shart ye hai ki aap ko humko milkar is ke liye ladna padega sarkaar se agar aisa aap kar sakte hai to theek hai warna rone se koi fayda nahi hai

    • mayank ji aapne mujhe rote hue dekha hai…is tarah ke ajeeb comment karne ka kya matlab.kuch to soch samjhkar samjhdaari wala comment karie. aap ladai start kariye me sath hu.kam se kam aapki tarah ajeeb comment nahi kar rahi…..koshish kar rahi hu apni taraf se jo kar sakti hu uski

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