/और काका रो पड़े …

और काका रो पड़े …

आवेश तिवारी||

अब राजेश खन्ना नहीं है.  परदे पर दिख रहे नायकों को हम उनकी वास्तविक जिंदगी में  अलग करके नहीं देख पाते , काका तो वैसे ही थे जैसे परदे पर वैसे परदे के बाहर. मशहूर पेंटर, लेखक और काशी हिंदू  विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष चंचल, राजेश खन्ना के अभिन्न मित्रों में से एक थे. आज आवेश तिवारी ने उनसे बात की, आइये पढते हैं वो बातचीत-

आवेश -राजेश खन्ना का न होना आपके लिए कैसा है ?

चंचल -बहुत जबरदस्त धक्का लगा मुझे! मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी मेरा ये दोस्त मुझे छोड़कर चला जाएगा. बहुत ही खूबसूरत और नफीस पल हमने साथ -साथ बिताए हैं, इतना कमाल का इंसान हमने देखा नहीं था. उनका न होना मुझसे, मुझको अलग कर देने जैसा है..

 

आवेश -चंचल जी, एक अभिनेता और एक मित्र के तौर पर आप राजेश खन्ना को कैसे देखते हैं?

चंचल – बतौर अभिनेता तो राजेश खन्ना मेरे किये ऐसा था कि जब मैं विश्वविद्यालय में था तो उनकी फिल्मों के टिकट ब्लेक में खरीद कर देखा करता था. लेकिन उन्ही राजेश खन्ना से जब दोस्ती बढ़ी तो हद से ज्यादा  दोस्ती बढ़ी, मैंने एक चीज जो काका में पायी वो ये  थी कि वो जैसे परदे पर थे वैसे ही वास्तविक जिंदगी में भी.

 

आवेश -आप राजेश खन्ना के साथ अपनी मुलाक़ात के बारे में  बताएं, कैसे दोस्ती हुई आप दोनों की?

चंचल -दिल्ली में हम दोनों के एक कामन मित्र हुआ करते थे नरेश जुनेजा जी, एक बार उनके यहाँ एक पार्टी चल रही थी, उस पार्टी में राजेश खन्ना भी मौजूद थे. उस पार्टी में संतोष आनंद जो कि मनोज कुमार की फिल्मों में गीत लिखते थे और कांग्रेसी विचारधारा  के थे कुछ संघ के लोगों के बीच फंसे हुए थे मैं भी उस बातचीत को सुनने पहुंचा तो संतोष ने कहा कि लो आ गया मेरा दोस्त अब तुम इनसे गांधी के बारे में बात करो. मैंने उन लोगों से कहा गांधी दुनिया के सबसे बड़े पोस्टर डिजाइनर थे, गांधी और उनके चरखे से बड़ा पोस्टर कोई नहीं हो सकता. अभी बात चल ही रही थी कि पीछे से आवाज आयी मैं राजेश खन्ना हूँ क्या आप दुबारा इस पर कुछ और बता सकते हैं ?फिर उस दिन से हमारी और राजेश खन्ना की मित्रता हो गयी.

 

आवेश -उनसे जुडी कौन सी स्मृति आपको इस एक वक्त सबसे अधिक याद आ रही है, कभी जीवन मृत्यु के बारे में अपने उनसे चर्चा की कि नहीं ?

चंचल -मौत से बहुत घबराते थे वो, यहाँ तक कि वो आदमी उम्र के बढ़ाव को भी कभी नहीं महसूस करता था. बहुत ही सकारात्मक और उर्जा से भरे थे राजेश खन्ना शायद यही वजह थी कि वो अवसाद के शिकार कभी नहीं हुए, वो व्यक्ति हमेशा अपने नोस्टेलजिया में जीता रहा कि मैं इस दुनिया का बेताज बादशाह हूँ, चाहे राजनीति हो या फिल्म. दरअसल शराब भी उसी का एक लाजिक था. उनसे जुडी कई स्मृतियाँ है एक आपको बताता हूँ एक बार कि बात है मैं अंजू महेन्द्रू और काका दिल्ली में एक जगह  बैठे हुए थे, रात के दो बजे थे, तभी  बाहर से मन्ना डे का गाया और काका पर फिल्माया गया आनंद का वो गीत “जिंदगी कैसी है पहेली” बाहर कहीं से बजता सुनाई पड़ा, मैं चुपचाप  उस गीत को सुनता हुआ बाहर टेरिस पर चला गया, जब  गाना खत्म होने के बाद  वापस लौटा तो देखा अंजू महेन्द्रू अपने कमरे में चली गयी हैं, और वहाँ कुर्सी पर बैठे राजेश अकेले रो रहे थे, मैंने पूछा “क्या हुआ? “तो काका ने कहा “वही जो आपको हुआ था और आप बाहर चले गए ”

 

आवेश -आपको क्या  लगता है राजेश खन्ना का होना, राजेश खन्ना का न होना हिंदी सिनेमा प्रेमियों  को कैसे प्रभावित करेगा ?

चंचल -बहुत ज्यादा प्रभावित करेगा, आपको बताऊँ राजेश खन्ना जिस फिल्म में जिस ड्रेस में होते थे, वो अगले दिन से युवा पीढ़ियों की ड्रेस हो जाया करती थी.एक पूरी पीढ़ी के जिंदगी के हर हिस्से को उस आदमी ने प्रभावित किया. उसकी जो फिल्म है आनंद, देखिये लगता है सच में राजेश खन्ना मर रहा है, और आज वास्तविक जिंदगी में भी उसकी मौत वैसे ही हुई है.उस आदमी ने जिंदगी को पूरी तरह से जिया, खूब पी आर करके जिया.फिल्मों में भी उन्होंने रोने के लिए कभी ग्लिसरीन नहीं लगाया.मुझे याद है “आ अब लौट चलें “कि शूटिंग चल रही थी, उस फिल्म में एक जगह पर उनको रोना था, ऋषि कपूर उस फिल्म के निर्देशक थे.ऋषि ने उनसे कहा काका अब कैमरे पर आ जाइए व्,वो सेट पर गए और मैंने अचानक देखा वो फूट -फूट कर रोने लगे, उनको संभलने में थोडा समय लगा, जब वो कुर्सी पर बैठे तो वहाँ सिर्फ वो और मैं था, मैंने पूछा “काका भाई कोई दर्द है क्या ?उन्होंने चुपचाप मुझे गले से लगा लिया और रोते रहे, फिर कहा “आइंदे से ये सवाल मुझसे मत पूछना.”

 

आवेश -एक चीज बताये चंचल जी, कल टीवी पर भी कहा जा रहा था कि राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन के स्टारडम से ईर्ष्या  करते थे, क्या आपको कभी ऐसा लगा ?

चंचल -नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है, गलाफाडू मीडिया ने जिस तरह से राजेश खन्ना को पेंट किया,उससे  बिल्कुल अलग उनकी शख्शियत है, अपने बच्चों अपनी बीबी से बेइंतेहा प्यार करता था वो आदमी.जबकि इन्ही लोगों ने डिम्पल और राजेश खन्ना को भी हमेशा दूरियों के साथ प्रस्तुत किया.उनके पूरे चुनाव प्रचार में डिम्पल उनके साथ थी.जहाँ तक अमिताभ का प्रश्न है वो उनका बहुत ही सम्मान किया करते थे और कई बार अकेले में भी उन्होंने मुझसे ये बात कही.

 

आवेश -चंचल जी उन्होंने राजनीति क्यों छोड़ दी?

चंचल -उन्होंने राजनीति छोड़ी नहीं एक बिंदु पर राजनीति से दूर हो गए.आपको बताऊँ कई -कई बार सोनिया जी के यहाँ से फोन आता था लेकिन वो फोन उठाने से इनकार कर देते थे.वो सीधे कहते थे  मैं चुनाव नहीं लडूंगा सिर्फ केम्पेन करूँगा.दरअसल उन्हें लगने लगा कि जिस ग्लेमर को मैं जी रहा था राजनीति उस ग्लैमर  को कम कर रही है, लेकिन वो उसे छोडना नहीं चाहते थे .

 

आवेश -बहुत सारे लोग जानना चाहते हैं जब राजेश न फिल्मों में थे न राजनीति में तो कर क्या रहे थे?

चंचल -शराब पी रहे थे!

 

आवेश -आपने कभी मना  किया कि नहीं ?

चंचल -मना किया, लेकिन जब कभी मना किया मुझे भी उनके साथ शामिल होना पड़ा.

 

आवेश -आखिरी बार उनसे आपकी मुलाकात कब हुई?

चंचल -अभी पन्द्रह दिन पहले उनसे फोन पर बात हुई थी, राज बब्बर ने मुझसे कहा उनकी तबियत ज्यादा खराब है.मैंने फोन पर पूछा कैसी तबियत है आपकी ?उन्होंने कहा “ठीक हूँ साहेब, मीडिया वाले तो यूँही छापते रहते हैं, जल्दी आइये, साथ बैठे हैं|एक महीने पहले वो मारीशस से लौटे थे, उन्होंने फोन किया तो मैं गया, दिल्ली में हम दोनों मिले काफी देर तक बैठे रहे, वो काफी दुबले हो गए थे लेकिन जिंदादिली से भरे हुए, यूँ बिल्कुल नहीं लगा कि वो हमें छोड़कर इतनी जल्दी चले जायेंगे.

 

आवेश -आपको राजेश खन्ना की कौन सी बात सबसे अच्छी लगती थी?

चंचल  -वो आदमी कभी नकारात्मक नहीं सोचता था, न देश के बारे में, न समाज के बारे में, न लोगों के बारे में

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.