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सुनील कान्त मुंजाल ने किताब ‘ट्रायम्फ ऑफ टूगेदरनेस’ रिलीज़ की…

By   /  July 20, 2012  /  No Comments

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पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के होटल इरोज में लेखक अनिल सेनानी की किताब “ट्रायम्फ ऑफ टूगेदरनेस” को सुनील कान्त मुंजाल (हीरो मोटो क्रॉप लिमिटेड ) ने रिलीज़ किया. इस अवसर पर प्रकाशन समूह विजडम ट्री के शोबित आर्य, आशीष भारत राम ( एम डी, एस आर ऍफ़ ग्रुप ) पुनीत डालमिया ( एम डी, सीमेंट्स भारत लिमिटेड ) और विशेष सी चंडोक (नेशनल मैनेजिंग पार्टनर, ग्रांट थोर्नटन इंडिया एल एल पी )  भी उपस्थित थे.

 

बिजनिस परिवार में जन्में व पले बढे हुए अनिल की इस किताब “ट्रायम्फ ऑफ टूगेदरनेस” की कहानी एक चींटी के परिवार के इर्द गिर्द है जिसमें  पारिवारिक मूल्यों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है जिस तरह चीटीं के परिवार में  सामंजस्य व एक रूपता होती है उसी तरह एक परिवार के लिए भी यही सब बाते मुख्य होती हैं.

 

इस अवसर पर, लेखक अनिल सेनानी ने कहा कि, “रिश्तों में मतभेद के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं इसलिए इनको नजरअंदाज किया जाना ही बेहतर है यह बात  भावनात्मक और वित्तीय दोनी ही स्तरों पर लागू है. मैंने अपनी किताब में चीटी के परिवार के माध्यम से यही बात लिखने की कोशिश की है कि सभी परिवारों चाहे वो बिजनिस परिवार हों में भी  एकजुटता से ही विजय प्राप्त की जा सकती है.”

 

इस अवसर पर पर विजडम ट्री के संस्थापक व प्रकाशक शोबित  आर्य ने कहा कि, एकजुटता से बहुत बड़ा फायदा होता है हम सभी जानते हैं और अनिल की यह पुस्तक  “ट्रायम्फ ऑफ टूगेदरनेस” भी यही सिखाती है, अपनी तरह की यह बहुत खास किताब है जिसे  हर बिजनिस परिवार को पढनी चाहिए.”

 

प्रतिभा प्रह्लाद, साधना श्रीवास्तव, विपिन हांडा, पल्लवी वर्मा, मुथु सामी वरदर्जन आदि उपस्थित मेहमानों ने अनिल को उनकी किताब के लिए शुभ कामनाये दी.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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