Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

कश्मीर से कन्याकुमारी तक खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है…

By   /  July 22, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-सुभाषनी अली सहगल||

मानवता की सबसे बड़ी त्रासदी भारत के अधिकांश घरों में बिना हल्दी के खाना नहीं पकता, लेकिन इस देश की कुछ औरतें ऐसी भी हैं जिन्हें हल्दी के रंग से ही नफरत है। बिना दाल के भोजन अधूरा है, लेकिन कुछ महिलाओं को पीले रंग की दाल देखते ही मितली आने लगती है। लंबे, घने केश औरतों के सौंदर्य के आभूषण माने जाते हैं, लेकिन कुछ औरतों को अपने लंबे, घने बालों से भी घिन आती है। इन विचित्र औरतों से हमारा परिचय हाल ही में आई एक पुस्तक अदृश्य भारत में होता है।

ये महिलाएं हमारे मल के साथ ही हमारी इंसानियत को टोकरियों में भरकर अपने सिर के ऊपर रखती हैं। उन टोकरियों में भरा मैला उनके जेहन पर इस कदर तारी हो गया है कि खुद से और इंसानियत से घिन आने लगी है। इसीलिए हल्दी देखकर वे गश खा जाती हैं, पीली दाल देखकर उन्हें मितली आने लगती है और अपने घने, काले बालों से वे इसलिए घृणा करती हैं, क्योंकि उनमें समा गए हमारे मल की दुर्गध कभी कम होती ही नहीं। इन औरतों के लिए दुनिया की बहुत-सी खूबसूरत चीजें बदसूरत बन चुकी हैं जैसे बारिश। इन औरतों के लिए बरसात का मतलब है टपकती हुईं टोकरियां, जिनके बजबजाते मल से उनका शरीर, उनका मन और उनकी आत्मा सब भर जाते हैं।

ये औरतें हर शहर, कस्बे और गांव में सिर पर मैला ढोने का तो काम करती ही हैं, साथ ही रेलगाडि़यों से गिरने वाले मल को रेलवे लाइन से उठाती भी हैं। और हम हैं कि उनकी ओर देखना भी नहीं चाहते। शायद इसलिए कि उन्हें देख लेंगे तो हमें इस बात का अहसास हो जाएगा कि उनकी टोकरी में हमारे मल के साथ-साथ हमारी इंसानियत भी लिपटी हुई है। अगर ऐसा न होता तो क्या मजाल है कि वह टोकरी 2012 में भी उनके सिर पर टिकी होती।
पूरी दुनिया में पुराने जमाने के शुष्क (बिना फ्लश के) शौचालय या तो खत्म कर दिए गए हैं या फिर खत्म किए जा रहे हैं। कहीं भी रेलवे लाइन के ऊपर रेलगाडि़यों से गिरता हुआ मैला अब नजर नहीं आता, लेकिन हमारे देश में शुष्क शौचालयों की भरमार है और हमारी रेलवे लाइन ही नहीं, बल्कि तमाम सड़कें, गलियां और नालियां खुला शौचालय बनी हुई हैं।
संतोष की बात यह है कि इस पद्धति को समाप्त करने की आवाजें भी उठती रही हैं। सफाई कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया है। आयोग की सिफारिशें तो अलमारियों में दीमक के हवाले कर दी गईं, लेकिन आवाजें बंद नहीं हुईं। देश के कई भागों में सफाई कर्मचारियों ने आंदोलन छेड़ दिए। इसका नतीजा हुआ कि 1993 में मैला ढोने वालों को काम पर रखने और शुष्क शौचालयों का निर्माण निषेध करने वाला अधिनियम पारित किया गया। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को मानव-मल ढोने के काम पर लगाया जाना गैर-कानूनी है। शुष्क शौचालयों के निर्माण व प्रबंध पर रोक लगा दी गई है। साथ ही मैला ढोने के काम में लगे लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करने का प्रावधान है, लेकिन यह कानून फाइलों में कैद होकर रह गया। जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया।
इस संबंध में अपील दायर करने पर जब सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों से जानकारी मांगी कि कानून का क्रियान्यवन किस हद तक किया गया है तो सब राज्यों का जवाब था कि मल ढोने वाला कोई कर्मचारी नहीं है और तमाम शुष्क शौचालयों को जल-चालित बना दिया गया है।
कोर्ट के सामने मल ढोने वाली महिलाओं को खड़ा करके इन झूठे बयानों का पर्दाफाश किया गया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय भी असहाय नजर आया। किसी भी अधिकारी को इस बात के लिए दंडित नहीं किया गया कि उसने कानून का पालन नहीं किया है। कानून लागू करने में सरकार की ढिलाई ने सफाई कर्मियों के संगठनों को आक्रोशित कर दिया। मैला ढोने वालों ने विभिन्न शहरों में अपनी टोकरियों में आग लगा दी और बहुत से शुष्क शौचालयों को ध्वस्त कर दिया।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने दिए गए सरकारी हलफनामों की सच्चाई को परखने के लिए अदृश्य भारत की लेखिका भारत भ्रमण पर निकलीं। उन्होंने पाया कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक इस कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। दिल्ली के नंदनगरी की मीना ने बताया कि मैला ढोने के कारण गर्भ में उनकी बेटी को संक्रमण हो गया। यह लड़की विकलांग पैदा हुई। इसके बाद से मीना ने मैला ढोने से तौबा कर ली और मैला ढोने के खिलाफ चलने वाले अभियान से जुड़ गईं। झूठ को सच मे तब्दील करने की कला का नमूना बिहार की राजधानी पटना की यात्रा के दौरान देखने को मिला। शहर की अनेक कॉलोनियों में टॉयलेट में फ्लश तो लगे हैं, किंतु मैला निकालने के लिए कोई सीवर लाइन नहीं है। जिस टैंक से पूरे इलाके के ये फ्लश टॉयलेट जुडे़ हुए हैं, उसकी सफाई दिन में नहीं, रात में होती है ताकि उस घिनौने दृश्य को देखने की तकलीफ वहां रहने वाले सभ्य लोगों को उठानी न पडे़।
सिर पर मैला ढोने वाले सबसे अधिक व्यक्ति उत्तर प्रदेश में हैं। एक लाख से अधिक ये लोग रोजाना नर्क भोगते हैं। यूपी के सबसे बड़े शहर कानपुर के तमाम पुराने मोहल्लों में औरतें ही मल साफ करती हैं। यह तब है जब राष्ट्रीय सफाई आयोग के अध्यक्ष रहे पन्नालाल तांबे इसी शहर के रहने वाले हैं। पन्नालाल कहते हैं कि जब हम गंदगी को खत्म कर सकते हैं, शुष्क शौचालय खत्म कर सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं कर सकती? लेखिका जब अपनी यात्रा के दौरान आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले की नारायण अम्मा से मिलीं तो उनके बालों में फूलों का गजरा सजा था। उन्होंने कहा कि मैला ढोने का काम छोड़ने के बाद ही मुझे खुद के इंसान होने पर विश्वास हुआ। मैंने इस खुशी के लिए लंबा संघर्ष चलाकर नर्क से मुक्ति हासिल की है। हम सबकी मुक्ति भी नारायण अम्मा जैसी औरतों की मुक्ति के साथ जुड़ी हुई है।

(लेखिका लोकसभा की पूर्व सदस्य हैं) (जागरण)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए, भूल गई न्यायपालिका.?

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: