/गुवाहाटी की वह बेख़ौफ़ भीड़ हमारे अपने समाज का चरित्र है, सम्मान नैतिकता का पाठ पढ़ा देने से नहीं आता

गुवाहाटी की वह बेख़ौफ़ भीड़ हमारे अपने समाज का चरित्र है, सम्मान नैतिकता का पाठ पढ़ा देने से नहीं आता

-चंद्रकांता||

महिलाओं को घूरना, छेडखानी करना, सार्वजनिक स्थानों पर फब्तियां कसा जाना, उन्हें लेकर चुटकुलेबाजी इन सबकी सामाजिक स्वीकार्यता इतनी अधिक है कि अभियुक्त तो इन्हें अपराध मानता ही नहीं है इनकी बेलाग बारंबारता (फ्रीक्वेंसी) से महिलाए भी इनकी अभ्यस्त हो गयी हैं.

भीड़ का यह रूप एक दिन में नहीं बना इसके पीछे सदियों से रूढ़ सामाजिक/पारिवारिक संस्कार हैं जो… हमें महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने ही नहीं देते. क्यूंकि, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ का मंत्र हमें रटा दिया गया है लेकिन ना घर-समाज में और ना ही शिक्षा संस्थानों में उसका व्यवहार करना सिखाया गया. और हमने भी अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद सीखने की कोशिश भी नहीं की.

संकुचित और विकृत मानसिकता का यह तिलिस्म किसी तात्कालिक घटना पर हमारी प्रतिक्रिया या गंभीर रोष प्रकट करने से नहीं टूटने वाला. हम सभी को प्रयास करने होंगे और यह नैतिकता का पाठ रटाने जैसा नहीं हो बल्कि चरित्र के स्तर पर प्रभावी परिवर्तन और महिलाओं की एक समान सामाजिक स्वीकार्यता का हो. हमें अपने घर-परिवार-मित्रों से ही इसकी शुरुआत करनी होगी. तो अगली मर्तबा अपने भाई दोस्त या किसी को भी ऐसा करने की या ऐसी बोलचाल की इजाजत नहीं दें, और ऐसा निसंकोच कीजिये सही बात के लिए टोकने से आप अपने ही घर-समाज को सभ्य बना रहे हैं.

और अंत में यह बात कि, यदि कपडे नैतिकता का अभिकेन्द्र होते और छोटे कपडे पहने जाने से सम्मान या असम्मान या की स्वछंद व्यवहार से भीड़/व्यक्ति का उत्तेजित होना किसी भी तरह संबद्द होता तब कपडे फाड़े जाना, देह की गरिमा भंग करना जैसे कुकृत्य पुरुषों के प्रति अधिक होने चाहिए थे. और इसके लिए पुरुषों का सड़क पर जहाँ कहीं खुले में पेशाब करना और घर के बाहर अंतःवस्त्रों में स्वछंद होकर घूमना अपने आप में पर्याप्त कारण देता है.

तो जो लोग ऐसी घटनाओं के पीछे कपड़ों का या ‘पब कल्चर’ का बहाना करने का दुस्साहस करते हैं वे सावधान हो जाएँ!

स्त्रियों के लिए नैतिकता की दोहरी परिभाषाएं किसी परंपरागत षड्यंत्र का ही हिस्सा नहीं रहीं बल्कि हमारे आधुनिक सोच विचार विमर्श को भी उसी नैतिकता के इर्द गिर्द बुना जा रहा है. देह की गरिमा उसे ढकने या उघाड़ने से कहीं अधिक उसकी उन्मुक्तता में है. देह वर्जना स्त्री का अपना निर्णय है.

देह की यह प्रायोजित मीमांसा एक किस्म का मानसिक रोग है.जहाँ तक स्त्री देह का प्रश्न है वह स्तुति का नहीं सम्मान का विषय है. क्यूँ ना सैनिटेशन, सनेट्री नेपकीन, गर्भ निरोधक, ब्रेस्ट केंसर, एच.आई.वी./ एड्स, सेक्स एजुकेशन और स्वच्छता के मुद्दों पर बात की जाए! ये भी स्त्री से सम्बन्धित विमर्श हैं.

देह को किसी भी रूप में केन्द्र में रखना सामंतवाद का ही परिचायक है और ये बात आधुनिक बुद्धिजीवियों पर भी उतनी ही लागू होती है. इस तिलिस्म से बाहर आइये.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.