/गाडरियों की गुण्डागर्दी: भागा भागा फिर रहा है मोहन ढोली का परिवार

गाडरियों की गुण्डागर्दी: भागा भागा फिर रहा है मोहन ढोली का परिवार

-लखन सालवी||
भीलवाड़ा जिले के गंगापुर थाना क्षेत्र के काबरिया खेड़ा गांव के दलित समुदाय के एक परिवार के सभी पुरूष गांव छोड़कर भागे-भागे फिर रहे है। उन्हें सवर्ण गाडरी समुदाय के लोग जान से मारने की धमकी दे रहे है। पीड़ित परिवार के पुरूष एक हफ्ते से गांव छोड़कर भागे-भागे फिर रहे है। इस दलित परिवार के मुखिया मोहन लाल ढोली का कहना है कि ‘‘गाडरी समुदाय के लोग करीबन एक माह से हमारा पीछा कर रहे है। उन्होंने अपने अपराधी किस्म के दोस्तों को गांव में बुला लिया है, वो हमारे घर के आस-पास मंडराते है और आंखे तैराते हुए जान से मार देने की धमकी देते है। हम डर कर गांव छोड़कर भागे-भागे फिर रहे है।’’ मोहन लाल कांपती हुई आवाज में कहते है कि हमारी महिलाएं गांव में ही है, वो लोग उन्हें भी धमकियां दे रहे है, वो कह रहे है कब तक बचते रहोगे। मोहन लाल को डर है कि वो गांव men जाएंगे तो गाडरी लोग उन्हें मार देंगे।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर गाडरी समुदाय के लोग इस दलित परिवार के लोगों को मारने की धमकी क्यों दे रहे है, आखिर झगड़ा किस बात है ?  मोहन लाल बताते है कि कोई दो साल पहले उनका बेटा राधेश्याम ढोली गांव में स्थित सार्वजनिक हेण्डपंप (सरकारी) पर बाल्टी में पानी भरकर हाथ-पैर धो रहा था। वहां पास बैठे सुरेश गाडरी ने राधेश्याम को जातिगत गालियां देते हुए कहा कि ढोलड़े यहां से पानी मत भर और आज के बाद इस हेंडपंप के आस-पास भी मत फटकना।
राधेश्याम ने सुरेश से कहा कि यह हेण्डपंप सार्वजनिक है तथा वो यहां से पानी भरेगा। तब सुरेश उसे देख लेने की धमकी देते हुए वहां से चला गया। राधेश्याम वहां से पास ही स्थित अपने बाड़े में चला गया। थोड़ी देर बाद वहां सुरेश अपने पिता, भाई व समाज के अन्य लोगों के साथ राधेश्याम के बाडे़ में आए और उसे जातिगत गालियां देते हुए पकड़कर घसीटते हुए गांव के बीच ले गए और वहां एक नीम के पेड़ के तने से बांधकर उसकी पिटाई की।
किसी ने पुलिस को सूचना दे दी तो पुलिस वहां पहुंची और राधेश्याम को बचाया। एफआईआर दर्ज करवाई गई। राधेश्याम की पिटाई लेहरू गाड़री, सुरेश गाडरी, रोशन गाडरी, हीरालाल गाडरी व भगवान ने की थी। लेकिन पुलिस ने मिलीभगत कर मुख्य आरोपियों के नाम हटा दिए। सुरेश गाडरी जो कि मुख्य आरोपी था, को तथा उसके दो अन्य को बचा लिया। पुलिस ने इस मामले का चालान न्यायालय में पेश कर दिया। मामला कोर्ट में विचाराधीन है। अब लेहरू गाडरी, सुरेश गाडरी, रोशन गाडरी, भगवान व हीरालाल गाडरी दलित परिवार को मजबूर कर उनसे समझौता करवाने पर उतारू है।
ऐसा नहीं है कि इस दलित परिवार के मुखिया मोहन लाल ढोली ने पुलिस को सूचना नहीं दी हो। वह पोटलां गांव में स्थित पुलिस चौकी में गए थे। एक नही तीन-तीन बार चौकी प्रभारी को शिकायत पत्र दिये थे। लेकिन नतीजा सिफर रहा। कोई कार्यवाही नहीं उल्टा अत्याचारियों के हौसलें और बुलन्द हुए। वो कहने लगे कि ‘‘ढोलडे़, तू कितनी भी शिकायतें कर ले, हमारा कुछ नही बिगाड़ सकता है, साले तूझे मार खत्म कर देंगे, हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा ज्यादा से ज्यादा 2-3 महीने जेल रहकर छूट जायेंगे।’’
1 फरवरी से 14 फरवरी 2012 के बीच आरोपियों ने कई बार मोहन लाल ढोली व राधेश्याम ढोली के मोबाइल पर कॉल कर उसे धमकियां दी। उनसे कहा कि न्यायालय में विचाराधीन मामले में समझौता कर ले अन्यथा गांव छोड़ के चला जा। हम तूझे गांव में नही रहने देंगे। 12 फरवरी को तो हीरालाल व भगवान लाल अपने साथियों सहित मोहन लाल के मकान में घुसे और जातिगत गालियां निकालते हुए राधेश्याम के साथ मारपीट करते हुए कहा कि साले ढोलडे़ अभी तक गांव छोड़कर नही गया, घर-बार छोड़के चला वरना खत्म कर देंगे। उन्होंने महिलाओं के साथ भी धक्का मूक्की की।
दलित परिवार पर अत्याचार जारी है, उनकी महिलाएं हेण्डपंप से पानी नही भर सकती, दूकान से सामग्री नही खरीद सकती और पुरूष गांव में नही आ सकते है। अब तो उन्हें लगने लगा है कि उन पर अत्याचार कर रहे लोगों का कोई कुछ नही बिगाड़ सकता है, वो पावरफूल लोग है। लेकिन फिर भी न्याय की उम्मीद में वो यहां से वहां भटक रहे है।
11 जुलाई को मोहन लाल जिले के पुलिस अधीक्षक से मिले है और पत्र देकर कार्यवाही की मांग की। मोहन लाल ने राजस्थान में दलित मुद्दों पर कार्यरत दलित आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के जिला संयोजक महादेव रेगर से मिलकर पूरे घटनाक्रम के बारे में उन्हें बताया है। महादेव रेगर का कहना है कि जिले में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ती जा रही है। जहां संवेदनशील प्रशासन होता है आपसी वैमनस्य नही बढ़ता है अन्यथा अराजकता का माहौल है। उन्होंने कहा कि दलितों को सवर्णों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के कारण भागे-भागे फिरना पड़ें इससे अधिक बुरे हालत और क्या हो सकते हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.