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सरकार पद भरेई कोनी अर् गुरू बिन ज्ञान मिळई कोनी

By   /  July 24, 2012  /  No Comments

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– लखन सालवी||
भीलवाड़ा जिले के कोशीथल गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के छात्र-छात्राएं पेशोपेश में है कि विद्यालय में प्रवेश तो ले लिया पर अब क्या करे ? विद्यालय में तो पढ़ाने के लिए अध्यापक ही नहीं है। व्याख्याताओं के 5 पद है, जो रिक्त है और सरकार रिक्त पदों को नहीं भर रही है।
जानकारी के अनुसार विद्यालय में उच्च माध्यमिक कक्षाओं के छात्र-छात्राओं के लिए भूगोल, राजनीतिक विज्ञान, हिन्दी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य व संस्कृत जैसे विषय है। लेकिन इन सभी विषयों को पढ़ाने के लिए व्याख्याताओं के पद रिक्त है। व्याख्याताओं के कुल 5 पद स्वीकृत है। अन्य कक्षाओं के छात्र-छात्राओं को पढ़ाने के लिए द्वितीय श्रेणी के 4 पदों में से 2 पद रिक्त है। संस्थाप्रधान ने बताया कि विद्यालय में कुल 18 पद है जिनमें से 10 पद रिक्त है।
अब कैसे पढ़ेगी बेटियां और कैसे तरेगी पीढ़ियां
‘‘बेटी पढ़े, पीढ़ी तरे’’ यह नारा जगह जगह सुनने और दीवारों पर छपा हुआ देखने को मिलता है। सरकार ने नारा तो जारी कर दिया लेकिन उसे मूर्त रूप देने के प्रयास नहीं किए। सहाड़ा-रायपुर विधानसभा क्षेत्र के इस गांव की बेटियां पढ़ना तो चाहती है, लेकिन सरकारी विद्यालयों मंे गुरू ही नहीं है तो वो कैसे ज्ञान प्राप्त करेंगी ?
कोशीथल के इस विद्यालय में गत वर्ष 415 छात्र-छात्राओं ने प्रवेश लिया था, जिन में 350 लड़के तथा 65 लड़कियां थी। इस विद्यालय में लड़कियों को केवल कक्षा-11 व 12वीं में ही प्रवेश दिया जाता है। वर्तमान में विद्यालय में प्रवेश का दौर चल रहा है। छात्र-छात्राओं की संख्या इस वर्ष और बढ़ सकती है। सत्र आरंभ हुए एक हफ्ते से अधिक समय हो गया है। लेकिन अभी तक कक्षाएं सुचारू रूप से संचालित नहीं हो पाई है। बेटियां पढ़ना चाहती है लेकिन बिना गुरू के ये बेटिया कैसे पढ़ेगी और क्या आने वाली पीढ़ी तिर पाएंगी? ये सबसे बड़ा सवाल है।
गुरूओं की संख्या कम होती जा रही है
संस्था प्रधान ने बताया कि विद्यालय में पहले द्वितीय श्रेणी के 5 पद थे, जिनमें से एक पद कम कर दिया गया है। 5 व्याख्याता थे, लेकिन आज एक भी व्याख्याता नहीं है। तृतीय श्रेणी के 2 पद में से एक पद कम कर दिया गया है। लायब्रेरीयन व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पद भी रिक्त हो गया है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में लायब्रेरियन का भी स्थानान्तरण हो गया है ऐसे में लायब्रेरी को संभालने वाला कोई नहीं है। पुस्तकें वितरित करने की जिम्मेदारी भी अध्यापकों को दी गई है वो किताबें वितरित करने एवं छात्रवृत्ति वितरित करने के कामों में लगे हुए है। ऐसे में पढ़ाई सुचारू रूप से नहीं करवा पा रहे है।
यहां छात्रावास भी है, छात्रावास में अन्य गांवों के छात्रों ने प्रवेश लिया है। फिलहाल सभी छात्र-छात्राएं विद्यालय में आ रहे है और स्वप्रेरणा से कुछ सीख रहे है।
वहीं ग्रामीणों का कहना है 12 किलोमीटर के दायरे में यह एक मात्र उच्च माध्यमिक विद्यालय है। पिछले दो साल से इस विद्यालय में अध्यापकों की कमी है। पढ़ाई सुचारू रूप से नहीं करवाई जा रही है। ऐसे में हमें अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए अन्यत्र भेजना पड़ रहा है।
गांव के वरिष्ठ जन भंवर लाल टांक ने बताया कि छोटे व बड़े सभी सरकारी विद्यालयों की हालत कमोबेश ऐसी ही है। अध्यापकों की कमी के कारण बच्चों की शिक्षा पर फर्क पड़ रहा है। सरकारी विद्यालयों की बिगड़ती दशा को देखते हुए लोगों का रूझान निजी विद्यालयों की तरफ बढ़ रहा है।

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  • Published: 5 years ago on July 24, 2012
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  • Last Modified: July 24, 2012 @ 5:31 pm
  • Filed Under: शिक्षा

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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