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कैसे मिले केरोसीन, वह तो बसों के डीजल टेंक में भरा है!

By   /  July 24, 2012  /  No Comments

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-लखन सालवी||

राशन की दूकानें हो या ग्राम सेवा सहकारी समितियां अधिकतर पर केरोसीन, खाद, गेहूं व चावल की कालाबाजारी बरसों से जारी है। ग्राम सेवा सहकारी समिति कोशीथल में तो अमूमन केरोसीन का टेंकर रात में ही आता है। आधी रात में राजनीतिक लोगों से जुड़े चमचे करोसीन को बड़े-बड़े ड्रमों में भरकर ट्रेक्टरों में लोड कर ले जाते है। कई बार ग्रामीण देख चुके है और प्रशासन को अवगत करा चुके है। प्रशासनिक अधिकारी कार्यवाही करने आते है और अपने हिस्से का टुकड़ा मुंह में दबा कर दबे पांव चले जाते है। क्या कार्यवाही हुई इसकी भनक भी नही लगने देते है। शिकायतकर्ता सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं निकलवाने के लिए चक्कर लगाते रहता है। नतीजा . . . सिफर। सूचना के लिए दौड़ते रहो।
डेलाणा, कोशीथल, मौखुन्दा, खेमाणा, उम्मेदपुरा, चावण्डिया सहित सैकड़ों ऐसे गांव है जहां के लिए आ रहा केरोसीन कालाबाजारी के भेंट चढ़ रहा है। गंगापुर से आमेट, रानी-फालना चलने वाली किसी भी बस (निजी ट्रावेल्स) के डीजल टेंक को खोलकर देख लिजिए। उनमें केरोसीन भरा मिलेगा। कोशीथल गांव के दो-तीन बस मालिक तो सुबह होते ही केरोसीन की जुगत में ड्रम लेकर दौड़ने लगते है और कुछेक गांव में घरों से राशन कार्ड इक्कट्ठे करते हुए मिल जाएंगे। 5-10 रुपए के प्रलोभन पर राशन कार्ड इक्कट्ठे कर वो ग्राम सेवा सहकारी समिति से केरोसीन ले लेते है। उससे उनकी बसें सड़कों पर दौड़ लेती है ग्राम सेवा सहकारी समिति केरोसीन की अगली खेप आने तक।
आए दिन समाचार आते रहते है कि ‘‘केरोसीन नहीं मिल रहा है, केरोसीन के लिए लम्बी कतारें लगी है।’’ बसें केरोसीन से चल रही है, केरोसीन राशन डीलरों व ग्राम सेवा सहकारी समितियों से कालाबाजारी के मार्फत लाया जा सकता है। अब बताइये आमजन को कैसे मिलेगा पूरा केरोसीन ? इस सच्चाई को सब जानते है, लेकिन आवाजें किसी ना किसी बोझ तले दबी है, प्रशासनिक अधिकारियों को कालाबाजारी की किस्तें समय पर मिल जाती है तो वो क्यों किस्तों को नकारेंगे ?

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  • Published: 5 years ago on July 24, 2012
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  • Last Modified: July 24, 2012 @ 5:55 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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