/महुआ को लेकर गलत रिपोर्ट पेश कर रहे हैं कुमार सौवीर…

महुआ को लेकर गलत रिपोर्ट पेश कर रहे हैं कुमार सौवीर…

-विनय आर्यदेव||
महुआ समूह के प्रमुख पीके तिवारी को उनके बेटे आनंद तिवारी के साथ सीबीआई ने गिरफ्तार किया है और कोर्ट ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। ये खबर सोलह आने सच है। लेकिन महुआ न्यूज के कभी यूपी के वरिष्ठ संवाददाता रहे कुमार सौवीर जिस तरह से इस पूरे मामले को झूठ की चाशनी के साथ चटखारे लेकर परोस रहे हैं वो उनकी तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता पर सवाल खड़े करने को काफी है। इस पूरे मामले में उनका व्यक्तिगत पूर्वाग्रह उनकी निष्पक्षता पर हावी दिखता है।

सौवीर जी स्वतंत्र पत्रकार हैं लेकिन खबर लिखने की स्वघोषित आजादी में वो जिस तरह पीके तिवारी के बेटे आनंद तिवारी के साथ अभिषेक तिवारी के भी गिरफ्तार होने और जेल जाने की बात लिख गए हैं उसके लिए वो खुद बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं। अभिषेक तिवारी को सीबीआई ने गिरफ्तार नहीं किया है लेकिन सौवीर जी ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा साफ-साफ लिखा है। एक बड़े संस्थान के बारे में,- जिससे हजारों लोगों के सरोकार जुड़े हैं उसे लेकर ऐसी तथ्यहीन बातें लिखने का मतलब क्या बनता है वो बेहतर जानते हैं।

महुआ समूह में कर्मचारियों को 3 महीने से वेतन नहीं मिलने की बात पूरी तरह गलत है। साल भर से संकट में होने के बावजूद इस समूह के कर्मचारियों को प्रबंधन वेतन दे रहा है लेकिन वित्तीय संकट की वजह से थोक के भाव में कर्मचारियों की छंटनी का इस संस्थान ने कभी सहारा नहीं लिया। उल्टे यूपी-उत्तराखंड के लिए नए न्यूज़ चैनल की सफल शुरुआत करके नई चुनौती भी स्वीकार की। यह सही है कि इस संस्थान में सैलरी समय पर नहीं मिलने जैसी समस्या हो रही है, पिछले 6 महीनों से इस समूह के दो न्यूज़ चैनलों महुआ न्यूज और महुआ न्यूज़लाइन में वेतन 15 से 20 दिन की देरी से मिल रहा है। लेकिन इसके बारे में आंतरिक तौर पर कर्मचारियों को भरोसे में लेने की हमेशा कोशिश हुई है। श्रमविवाद जैसी स्थिति पैदा नहीं हुई है। वजह है पीके तिवारी को लेकर महुआ के कर्मचारियों में आत्मीयता का भाव है।

पीके तिवारी पर कई आरोप लगाए जा सकते हैं, और लगते भी रहे हैं, लेकिन दूसरे मालिकों की तरह खबरों के चयन में टांग अड़ाना, न्यूजरूम में मालिकाना धमक दिखाना, हर संकट का समाधान छंटनी कर के निकालना, – कम से कम ऐसी कोई भी बात तिवारी के लिए सही नहीं है। महुआ के न्यूज़रूम से सरोकार रखनेवाले लोग जानते हैं कि यहां से शोर-शराबे और बेकार की डांट-फटकार का वास्ता नहीं। इंक्रीमेंट समय पर नहीं होने को लेकर कर्मचारी भले ही निराश हों लेकिन महुआ समूह पर आंच आने पर सभी एकजुट दिखते हैं। महुआ समूह संकट में है ये सबको पता है लेकिन कोई ये कहता नहीं मिलेगा कि शटर बंद हो जाएगा। वजह है सेंचुरी कम्युनिकेशन की मजबूत वित्तीय हैसियत और महुआ समूह की ठोस अचल संपत्ति। पीके तिवारी अब अपनी देश भर में पहचान महुआ समूह से जोड़कर देखते हैं इसलिए वो समूह को संभालने के लिए जो कर सकते हैं करते रहे हैं और इसमें सफल हुए हैं।

ये समूह वॉयस ऑफ इंडिया चैनल की तरह न तो किराए की बिल्डिंग में चल रहा है और न ही किराए के सामानों से चल रहा है, न ही बेकार के तामझाम पर पैसा पानी की तरह बहा रहा है। सच तो ये है कि किराए के सभी संसाधन वित्तीय संकट की हालत में वापस कर दिए गए हैं तब भी यहां के पत्रकारों का मनोबल ऊंचा रहा और वे बेहतर नतीजे देते रहे। मौजूदा स्थिति में महुआ न्यूज़ बिहार पूरी तरह विज्ञापनों के दम पर अपने खर्चे निकाल रहा है, महुआ एंटरटेनमेंट और महुआ न्यूज चैनल इस वक्त इतना राजस्व दे रहे हैं कि नए चैनल महुआ न्यूजचैनल पर किसी तरह की आंच नहीं आ सकती। जो खुद आत्मनिर्भर होने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।

संकट की इस हालत में भी सबसे बेहतर पक्ष ये है कि इस दौरान महुआ समूह के तमाम चैनल्स की लोकप्रियता आसमान पर है। महुआ समूह से जुड़े लोगों ने अपनी पेशेवर प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं की, मनोबल को ऊंचा रखा और बेहतरीन कंटेंट के साथ अपने दर्शकों की उम्मीदों को पूरा किया। यही वजह है कि महुआ अपने एंटरटेनमेंट सेगमेंट में अव्वल है तो वहीं महुआ न्यूज़ बिहार और झारखंड में निर्विवाद रूप से नंबर एक की गद्दी पर काबिज है। बिहार में लगातार साढ़े 4 महीने नंबर 1 रहकर इसने रिकॉर्ड बना डाला है। हफ्ते भर के लिए कभी नंबर दो होने के बाद फिर से नंबर 1 पर काबिज होना महुआ न्यूज़ की सफलता की कहानी बयां करता है।

यूपी और उत्तराखंड की बात करें तो महुआ न्यूज़लाइन चैनल जनवरी में लॉंच हुआ था लेकिन महज 6 महीने की अवधि में ये उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे पर अपनी सफलता के परचम लहरा रहा है। हालत ये है कि महुआ न्यूजलाइन की खबर के बाद सीएम विजय बहुगुणा सफाई देने के लिए भी इसी चैनल को चुनते हैं और बाबा रामदेव खुद से जुड़े मुद्दों पर फोन करके आधे घंटे तक अपनी बात रखते हैं। इसके साथ ही इस चैनल पर होनेवाली राजनीतिक बहस में प्रदेश के सभी दलों के वरिष्ठ नेता शामिल होने को वरीयता देते हैं। बावजूद इसके इस चैनल के बंद हो जाने की बात कहने वालों की सोच पर सिवाय तरस खाने के और क्या किया जा सकता है।

जहां तक महुआ समूह की सबसे बड़ी ताक़त महुआ एंटरटेनमेंट की बात है तो यहां सैलरी का संकट नहीं है। मनोरंजन चैनल होने की वजह से भारी भरकम खर्चों में यहां बहुत हद तक कटौती हुई है और भुगतान का संकट इक्का-दुक्का बार पैदा हुआ है लेकिन महुआ अपनी साख बचाने में कामयाब रहा है। शत्रुघ्न सिन्हा और सौरव गांगुली जैसे बेहतरीन कलाकार और खिलाड़ी को वायदे के मुताबिक मेहनताना नहीं देने के आरोपों से ये चैनल दो चार हुआ, विवाद काफी बढ़ा। बावजूद इसके समूह ने कभी ये नहीं कहा कि हम किसी भी पेशेवर का बकाया मेहनताना नहीं देंगे। आर्थिक संकट होने की वजह से ये सारे विवाद पैदा हुए। और ये संकट कुछ राजनेता, कुछ बड़े पत्रकारों और कुछ व्यवसायियों की साजिश की वजह से खड़ा हुआ। जिन्होंने पहले तिवारी से दोस्ती गांठकर ढेरों लाभ हासिल किए, खुद को मजबूत किया और फिर पीठ में खंजर भोंक दिया। इन्होंने महुआ समूह पर संगीन आरोप लगाकर इतनी जगह, इतनी शिकायतें की कि समूह पर दबाव बढ़ गया।

महुआ समूह से जुड़ी कंपनियों का कुल व्यवसाय इस वक्त दो हज़ार करोड़ रुपए से ऊपर है। और ये एंटरटेनमेंट, न्यूज, प्रोडक्शन, एडवर्टिजमेट से लेकर फिल्म और डिस्ट्रीब्यूशन तक फैला हुआ है। इन सब तथ्यों के आलोक में महुआ समूह और उसके मौजूदा संकट और का आकलन होना चाहिए। न कि झूठे तथ्यों के आधार पर भ्रम फैलाया जाना चाहिए। फिर भी व्यक्तिगत खुन्नस निकालनी हो तो कुमार सौवीर बेशक निकालें लेकिन खुद को पत्रकार बताकर झूठ न लिखें। इससे पत्रकारों का भी मान गिरता है।

विनय आर्यदेव

महुआ न्यूज़

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.