/उफ,ये गाजीपुर का छोरा यशवंत…

उफ,ये गाजीपुर का छोरा यशवंत…

-श्रीकांत सौरभ स्वतंत्र||

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत सदियों से कही-सुनी जाती है कि ‘सच्चा राजपूत वहीं जो इक्कीस साल जीए’. इस लोकोक्ति का आशय प्राचीन राजघराने के लड़ाकू राणाओं (क्षत्रीय वंशजों) सें है. जब राजपूत जवान अपने मान-सम्मान व सल्तनत की हिफाजत के लिए कम उम्र में ही जान गंवा देते थे. भले ही आज यह कहावत अप्रसांगिक हो चली है. लेकिन इतना जरूर है कि
मर्दानगी आज भी राजपूतों के रग-रग में समाई है. जोश व जज्बा ऐसा कि किसी से वादा किया तो निभाने के लिए जान की बाजी लगाने से भी गुरेज नहीं. जो लड़ने का चैलेंज मिला तो पटखनी देने तक लड़ेंगे. और अपने (राणा) यशवंत भी इससे अछूते नहीं.

उतर प्रदेश के ऐतिहासिक जनपदों में शुमार गाजीपुर की धरती ने कला, साहित्य व राजनीति के क्षेत्र  में कई महारथी पैदा किए है. इस सूची में एक नाम यशवंत का भी जुड़ गया है. यशवंत  यानी विश्व के सबसे लोकप्रिय हिंदी मीडिया पोर्टल भड़ास4मीडिया का संचालक. इस वेबसाइट को भारत का विकिलिक्स भी कहा जाता है. ‘लीकै लीकै तीन चलै हल,बैल,कपूत..लीक छाड़ि तीनों चलै शायर,शेर,सपूत ! कुछ इसी तर्ज पर चलके, उम्र के महज तीन दशक से गुजार चुके इस सपूत ने B4M के जरिए न्यू मीडिया को जो उंचाई दी है, वह खुद में एक इतिहास है. तभी तो हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, इंडिया न्यूज सरीखे भारत के नामचीन ब्राडों के संपादक जिनकी एक खबर से सरकारें हिल जाती है. उद्दोगपतियों का व्यवसाय चौपट हो जाता है. भ्रष्टाचारियों की रातों की नींदें हराम हो जाती है. आज इन्हीं मीडया मालिकों व संपादकों की यशवंत से फटती है. यही नहीं यशवंत आज हर उस मीडिया मालिक या संपादक के लिए खौफ बना हुआ है जो भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाए बैठे हैं. यही वजह है कि आज देश के दर्जनों बड़े मीडिया घराने के मालिकान यशवंत से खार खाए बैठे हैं. इस शत्रुतावश यशवंत पर कई सारे मुकदमें भी दर्ज हुए हैं.

दूसरी तरफ, इन्हीं मीडिया ग्रुप से जुड़े हिंदी पट्टी क्षेत्रों के हजारों पत्रकारों व कस्बाई स्ट्रिंगरों के बीच आज यशवंत की छवि  ‘सुपर मैन’ की है. ‘भड़ास’ बोले तो हजार दुखों की एक दवा. एक ऐसा मंच जहां सभी मीडियाकर्मियों को अपने उपर हुए शोषण के खिलाफ आवाज लगाने की पूरी छूट है. इसकी गूंज भी ऐसी होती है कि बेइमान, कफनचोर,  हरामखोर व वैम्पायर सरीखे मालिकानों व संपादकों के कानों की चादरें फट जाए. भड़ास ने हजारों जरूरमंद पत्रकारों के हित पूरे किए है.

श्रीकांत सौरभ, स्वतंत्र पत्रकार,पूर्वी चम्पारण, मो. 9473361087

इसका गवाह मैं खुद हूं. बिहार के छोटे से जिले पूर्वी चम्पारण से लेकर पटना तक के कई पत्रकार मित्रों की वस्तु स्थिति को भड़ास पर रखा. छपने पर कुछेक को छोड़ अधिकांश की मांगें पूरी हुई या उसे तवज्जों मिली. यह दीगर बात है कि उतर भारत के तमाम कस्बों-जिले के मीडियाकर्मियों से लेकर दिल्ली के मीडिया ग्रुप में ऊंचे पदों पर आसीन आलाकमान भी रोज भड़ास पढ़ते
हैं. भले ही इन हुक्कामों के बीच भड़ास का जिक्र आते ही नाक-भौ सिकुड़े जाते हैं. लेकिन हकीकत यहीं है कि चोरी-छुपे ही सही भड़ास पढ़े बिना अधिकांश को नींद नहीं आती. दुख की बात है कि विनोद कापड़ी के फर्जी मुकदमे पर यशवंत भाई करीब तीन सप्ताह से गाजियाबाद के एक जेल में हैं. पहले से, हिन्दुस्तान के साथ मान हानि के कई दर्जन मुकदमे चल ही रहे थे. इधर,दैनिक
जागरण ने भी एक फर्जी मुकदमा दायर किया है. खैर,फार्म के हाईब्रीड मुर्गे के माफिक एसी(एयरकंडिशन) की पैदाइश ये मीडिया आलाकमान जान लें कि यशवंत नाम का जीव लाह-पांत से बना कोई समान नहीं है. जिसे धक्का दिया और टूट गया.
वह तो गांव की खालिस मिट्टी में पला-बढ़ा गबरू जवान है जिसने हारना नहीं सीखा. फिर मुकदमे लड़ना तो यूपी-बिहारवालों की फितरत में शामिल है. यहां तो इंच-इंच जमीन को लेकर कई पीढ़ी मुकदमे लड़ती है. जबकि यह तो सार्वजनिक हित व असत्य पर सत्य की लड़ाई है. साथ ही है हजारों मीडियाकर्मियों की दुआएं भी. यशवंत के जेल जाने के बाद कथित शत्रु चैनलों व अखबारों के मैनेजमेंट हाथ धोकर पीछे पड़े हैं. भले ही इनके दबाव में बंधुआ मजदूर सरीखे खबरची यशवंत को एक विलेन की तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं. लेकिन 90 प्रतिशत पत्रकारों का दिल यशवंत के लिए ही धड़कता है. न चाहते हुए भी यशवंत को लेकर नकारात्मक खबर छापना-दिखाना इनकी मजबूरी है. क्योंकि नमक खाया है तो गुलामी बजानी ही पड़ेगी. अच्छी बात यह है कि यशवंत के साथ इन्ही संस्थानों के अलग-अलग संस्करणों के कई सारे गुडविल संपादक भी हैं.
ये पर्दे के पीछे यशवंत की मदद भी करते हैं. यशवंत की जमानत याचिका पर अगली सुनवाई संभवत: 3-4 अगस्त को होगी. जमानत मिलेगी या नहीं इसको लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता. क्योंकि मामला भारतीय न्यायालय के अधीन है. पर इतना तो आशा है ही कि जल्द ही यशवतं जेल से रिहा होकर नए अवतार व तेवर में हमारे बीच होंगे.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.