अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ! आँचल में दूध और आँखों में पानी !!

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-अर्चना यादव||

ज़रा सोचिये इंसान की शक्ल में घूमने वाले न जाने कितने भेडियों की शिकार होती है यह नारी, जिसका ज़िक्र तक नहीं होता समाज में, न ही उसके बारे में किसी को जानकारी हो पाती है . बहुत से लोग तमाम घडियाली आंसू बहते है महिलाओं की स्थिति पर, उनमें महिलाओं की संख्या भी खूब होती है .
महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अपराध से निपटने के लिए जटिल कानूनी प्रक्रिया भी एक बाधा है, जिससे उन्हें न्याय देरी से मिलते है और बहुत से मामलों में वो न्याय से वंचित रह जाती  है  . आज भी महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में दोयज दर्जे की है .
सीओ हजरतगंज द्वारा बुलाये जाने पर मुझे लगातार हो रही मूसलाधार तेज़ बारिश में विवश होकर जाना पड़ा क्योकि मुझे बताया गया की अनिल त्रिपाठी वहां  थाने में मौजूद है और आपसे कुछ वार्ता करनी है और थाने में सात आठ पुरुषो के सम्मुख मुझसे पूछताछ की गयी . थाने पर थानेदार और उनके सहयोगियों को देखकर शेरों के सम्मुख जो स्थिति शिकार की होती है ऐसी ही अनुभूति हुयी . क्या यह उचित है कि अकेली लड़की पर पुलिसिया रौब दिखा कर थाने पर पूछताछ के नाम पर बुलाया जाना और मानसिक दबाव बनाया जाए. बरसात के इस मौसम में भीगते हुए कानून से न्याय मांगते हुए एक पीड़ित महिला को थाने में बुलाकर कौन सी जांच की  जायेगी . वहा थाने में पुलिसकर्मियों के अलावा  कई दूसरे लोग और  एक वरिष्ठ पत्रकार भी मौजूद थे. मेरा सवाल है सबसे कि इस तरह थाने में सबसे सामने बुलाना और पूछताछ करना क्या उचित था . एक बार फिर शर्मिन्दिगी और इस बेज्जती को  सहकर आँखे भर आई मेरी .
आज की  इस न्याय प्रणाली का अवलोकन करने पर ज्ञात हुआ कि शायद मुझे आवाज़ नहीं उठानी थी और न जाने कितनी महिलाओं ने यही सोच कर अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान जैसे दरिंदों से अपना शोषण करवाया होगा. यहाँ प्रतीकात्मक कार्यवाही किसी भी अपराध की तुलना में अधिक कठिन है . यहाँ तक कि महिलाओं के प्रति अपराध को पारिभाषित करना भी अत्यधिक दुष्कर कार्य है. जांच, प्रमाण और पुलिस व्यवहार मिलकर सम्पूर्ण न्याय प्रक्रिया को हाशिये में ला खड़ा कर देते हैं.
कल के पुलिस के इस व्यवहार को देखकर लगता है कि शारीरिक अपराध के सम्बन्ध में महिलायें पुलिस थाने में जाकर रिपोर्ट लिखवाने में आज भी जिस भय को महसूस करती है वह पूर्णतया सत्य है . समुचित व् प्रभावी कानून न होने के कारण महिलाए न्याय पाने में  खुद को असहाय पाती है .

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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