/पति ‘‘परमेश्वर’’ से हारी पाकिस्तान की ‘‘भक्ति’ – अंधी आँखों से पाकिस्तान जाने की कर रही गुहार..

पति ‘‘परमेश्वर’’ से हारी पाकिस्तान की ‘‘भक्ति’ – अंधी आँखों से पाकिस्तान जाने की कर रही गुहार..

हिंदुस्तान में मिली बेवफाई, पति ने भारत लाकर छोड़ा साथ

-जैसलमेर से सिकंदर शेख||

कहते हैं जोडियां भगवान बनाता है और भारतीय संस्कृति में भगवान की बनाई गई जोडियों के साथ सात जन्म का बंधन तक बांध दिया जाता है लेकिन भगवान की बनाई जोडियों के साथ अगर इन्सान दखल अंदाजी करता है तो सात जनम तो क्या एक जीवन भी जीना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही मामला है पाकिस्तान की एक अबला नारी भक्ति का है  जिसे उसके पति ने दूसरी औरत के लिये छोड दिया है और इतना ही नहीं वह इसकी बेटी को भी अपने साथ लेकर भूमिगत हो गया है ऐसे में आज दर दर की ठोकरें खा रही यह भक्ति, अंधी आँखों से  गुहार लगा रही है अपने पति व बेटी की जिसे वह अपने साथ वापिस पाकिस्तान ले जाना चाह रही है लेकिन उसकी सुनवाई कहीं नही हो पा रही है जैसलमेर से जोधपुर तक पुलिस अधिकारियों से लेकर जिला कलक्टर तक को यह अबला अपनी पीडा सुना चुकी है लेकिन बेवफा पति की तरह जमाना भी बेवफा हो गया है इसके दर्द से..
आंगन में बैठी पथराई आंखों के साथ हर आने जाने वाले की आहट पर उम्मीद की आस लेकर अपने रिश्तेदारों के यहां शरण लिये बैठी भक्ति को लगता है कि कोई ना कोई जरूर आयेगा जो उसकी मदद करेगा और उसके परिवार को जोड कर उनमें खुशियों के रंग भरेगा और ऐसा ही हुआ जब हमने  इस महिला की पीडा को सुनने के लिये इससे संपर्क किया। सरकार से आस खो चुकी यह महिला कैमरे के सामने हमसे बात करते करते ही फफक पडी और उसके आंसू साफ बयां कर रहे थे कि अपने पति व बेटी को खोने का दर्द क्या है। आंखों से कम देखने वाली भक्ति अपनी किस्मत पर आंसू बहाती हुई बताती है कि केवल नजर कमजोर होने की कमी के कारण उसके पति ने उसे छोड दिया लेकिन आंखों की बजाय अगर उसके दिल की नजर की बात की जाये तो आज भी उसमें उसका वह बेवफा पति व मासूम बेटी ही दिखाई देते हैं जिन्हें वह अपने साथ पाकिस्तान ले जाना चाह रही है।

मामला है पाकिस्तान निवासी पारो पुत्र गिरधारी लाल भील पासपोर्ट संख्या एएस 3993672, भक्ति पत्नी पारो भील पासपोर्ट संख्या एएफ 3349152 और हरि पुत्री पारो भील पासपोर्ट संख्या एबी 6995092 का जो कि पिछले दिनों धार्मिक वीजा पर एक संघ के साथ भारत आये थे और भारत में प्रवेश के साथ ही आमद दर्ज करवा कर ये लोग हरिद्वार के लिये रवाना हुए। वहां पर धार्मिक स्थलों केे दर्शनों के साथ गंगा स्नान करने बाद इस परिवार ने जैसलमेर में रह रहे अपने रिश्तेदारों से मिलने का मन बनाया और जैसलमेर पहुंच गये लेकिन भक्ति को क्या मालूम था कि जिस गंगा नदी में इंसान के पाप धुल जाते हैं वहीं उसके पति के पाप यहां पर स्नान करने के बाद जाग जायेंगे और जैसलमेर पहुंचने पर पारो को मिली अपनी पहली पत्नी लूणी जिसे वह बीस साल पहले मनमुटाव के कारण सामाजिक पंचायत में छुटपल्ला कर के छोड चुका था लेकिन  अपनी पहली पत्नी लूणी से मिलने के बाद इस पारो भील ने अपनी पत्नी भक्ति व बेटी को हरि को भारत में स्थाईवास करने का झांसा देकर पहली पत्नी लूणी के घर पर रखा, लेकिन कहते हैं ना कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती है और ऐसा ही हुआ पति की शह पर पहली पत्नी लूणी ने आंखों से लाचार इस भक्ति के साथ मारपीट की और इसके गहने व पासपोर्ट छीन कर इसे सडकों पर धक्के खाने के लिये छोड दिया। आंखों से कम देखने वाली यह भक्ति कुछ दिन भूखी प्यासी जैसलमेर की सडकों पर भटकती रही और उसकी हालत पागलों जैसी हो गई।

ये तो इस भक्ति की किस्मत अच्छी थी कि उसे पाकिस्तान में रह रहे अपने परिजनों के फोन नम्बर याद थे और उसने इन नम्बरों पर संपर्क कर अपनी आपबीती उन्हें सुनाई जिस पर पाकिस्तानी परिजनों द्वारा जैसलमेर में रह रहे अन्य रिश्तेदारों को फोन कर भक्ति की सुध लेने फरियाद की जिस पर रिश्तेदारों ने सडक पर पडी बेहाल भक्ति को अपने घर में शरण दी। रिश्तेदारों से मिलने व समाज में अपनी फरियाद सुनाने के बाद समाज के लोगों द्वारा पंचायत बुला कर इसके पति की तलाश की गई और उसे समझाने के प्रयास किये गये लेकिन लूणी के प्रेम में पडे पारो भील ने समाज की एक ना सुनी और भक्ति को अपनाने से साफ इन्कार कर दिया। अपने पति से न्याय की उम्मीद छोड चुकी यह भक्ति सरकार के पास न्याय की उम्मीद लिये पहुंची और सबसे पहले जैसलमेर पुलिस कोतवाली में शरण ली लेकिन पाकिस्तानी नागरिक का मामला होने का हवाला देकर कोतवाली पुलिस ने इसे सीआईडी के पास जाने को कहा। सीआईडी ने भी मामले में पेंचीदगी देखते हुए टालमटोल करते हुए इस महिला को जोधपुर स्थित सीआईडी पुलिस अधीक्षक कार्यालय भेज दिया लेकिन यहां भी इसे न्याय नहीं मिला। थक हार कर यह महिला जोधपुर आईजी कार्यालय व जैसलमेर जिला कलक्टर कार्यालय भी अपनी पीडा लेकर पहुंची लेकिन कानूनन न्याय तो दूर की बात है किसी ने मानवीयता के नाते भी इस अबला की मदद करना उचित नहीं समझा।
हमको जब इस महिला के बारे में जानकारी मिली तो अपने सामाजिक सरोकारों को लेकर जब हम इस महिला की पीडा सुनने के लिये पहुंचे तो निराशा से घिरी बैठी यह भक्ति फफक फफक कर रो पडी और एक ही रट लगाने लगी कि मुझे पाकिस्तान भेज दो। अपनी बेटी व पति को अपने साथ ले जाने की आस लगाये यह महिला अब बहरी सरकार के आगे हार चुकी है और मजबूरन अकेले ही पाकिस्तान जाने को तैयार हो रही है लेकिन सरकार की ओर से कोई हाथ इसकी मदद के लिये उठता दिखाई नहीं दे रहा है। कहने को तो सरकारें महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता की बातें करती है लेकिन इस मामले में सरकार क्यों संवेदनाहीन हो गई है जिसे इस अबला की पुकार सुनाई नहीं  दे रही है अब देखना यह है कि क्या इस भक्ति की किस्मत में अपने परिवार के साथ पाकिस्तान जाना लिखा है या नहीं या फिर इसे अकेले ही जीना पडेगा अपना बाकी जीवन.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.