/गुजरात दंगे को ना भूल पाने वाले मीडिया को नज़र नहीं आया असम दंगा…

गुजरात दंगे को ना भूल पाने वाले मीडिया को नज़र नहीं आया असम दंगा…

जिस मीडिया ने गुजरात दंगों के भूत को महज नरेन्द्र मोदी की बुराई करने के लिए इतने सालों से जिन्दा रखा है और मौके बेमौके गुजरात दंगों पर अपनी सड़ी बासी रिपोर्ट को नया मुलम्मा, नयी चाशनी चढा कर पेश करता रहता है. उसी मीडिया को असम के कोकराझार में लगातार हो रही साम्प्रदायिक हिंसा नहीं दिखती. यह कैसा मीडिया है जिसे सालों पहले हुआ दंगा तो याद रहता है और सामने हो रहे दंगे से वह अपनी आँखे फेर लेता है…?

 

-एसके चौधरी||

गुजरात दंगों को आज तक जिस मीडिया ने जिंदा रखा हैं, उसे जलते असम की तस्वीरें क्यों नजर नहीं आ रही हैं? पिछले एक हफ्ते से असम के तीन जिलों मे मार-काट मची हैं. हालात कश्मीर से भी बदतर हो चले हैं. कई लोगों को की जानें जा चुकी हैं, लेकिन मीडिया इसे सिर्फ अपनी बुलेटिन की खबरों मे डालकर या दूसरे पेज पर लिखकर खानापूर्ति कर रहा है. हिन्दुस्तान में अब तक हुए हर दंगे के पीछे से राजनीतिक बू आती रही है। हो सकता है असम में हो रहे तांडव के पीछे कोई राजनैतिक चाल ना हो, लेकिन किसी प्रदेश मे लगातार एक हफ्ते तक दंगे होते रहे और स्थिति को काबू ना कर पाने के पीछे तो सरकार की विफलता साफ झलकती है। तो क्या दंगाइयों को शह नहीं दिया जा रहा है?

यह सवाल उठना इस लिए भी लाजिमी है, क्योंकि दंगा करने वाले लोग एक खास समुदाय से आते हैं, जो 1971 के बाद बंग्लादेश से आकर भारत में बसे हैं और यह पलायन जारी है। जाहिर है सरकार और प्रशासन की शह के बगैर किसी भी मुल्क के किसी भी कोने में आप जाकर बिना उसके इजाजत के नहीं रह सकते। दंगों में बात अगर मीडिया की करी जाए तो सीना चौड़ा कर अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानती है. बड़े गर्व से शाहिद सिद्दीकी के एक इंटरव्‍यू को लेकर फिर से मोदी को दोषी साबित करने की कोशिश की है, लेकिन इतनी ही प्रमुखता से अगर जलते असम की पहले दिन की तस्वीर सामने लाई जाती तो शायद आज हालात बेहतर होते।

कांग्रेस ही नहीं मीडिया के नजरों में भी सिर्फ गुजरात में मची तबाही ही दंगा है बाकी सब तो छिट-पुट हिंसा बनकर रह गया है। तब से लेकर अब तक ना तो किसी चैनल ने और ना ही अखबार ने असम को इतनी प्रमुखता दी है, जितनी 12 साल बाद गोधरा को दी जा रही हैं, आखिर क्यों? असम में जारी हिंसा के पीछे क्या वजह है? इसे लेकर अलग-अलग दावे और राय सामने आ रही है। हिंसा की चार वजहें सामने आ रही हैं, जिनमें कुछ तात्कालिक हैं तो कुछ वजहें काफी पहले से समस्या बनी हुई हैं। बांग्लादेश से आ रहे अवैध प्रवासी असम में जारी हिंसा की मूल वजह बताए जा रहे हैं। असम के मूल निवासियों का कहना है कि बांग्लादेश से लगातार भारत में अवैध रूप से घुस रहे लोगों की वजह से वे असुरक्षित महसूस करते हैं।

असम के मूल निवासियों का कहना है कि प्रवासियों के चलते इस क्षेत्र का ‘संतुलन’ बिगड़ गया है। गौरतलब है कि भारत-बांग्लादेश की पूरी सीमा पर तारबंदी न होने और नदियों के चलते सीमा के उस पार से भारत में प्रवेश करना बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसे में बड़ी तादाद में बांग्लादेशी लोग बेहतर ज़िंदगी की तलाश में भारत में प्रवेश करते रहे हैं। जानकारों का मानना है कि 1971 के बाद से बांग्लादेशियों का भारत आकर बसना जारी है। असम के नेताओं पर आरोप है कि वे इन अवैध प्रवासियों को पहचान पत्र दे देते हैं, ताकि वे उनके हक में वोट करें। मैंने लगातार अपने फेसबुक पेज पर असम हिंसा को लेकर रोज अलग-अलग तस्वीरें और खबरें पढ़ी, जो मीडिया से इतर कुछ और हकीकत बयान कर रही हैं।

आपको बता दें कि दंगाई किसी भी समुदाय का हो वह मनुष्य नहीं हो सकता चाहे वो गुजरात दंगे का दोषी हो या कश्‍मीर से लेकर दिल्ली तक का, जो भी दोषी है उसको सजा मिलनी चाहिए, लेकिन देश के राजनेताओं के साथ-साथ मीडिया ने जो दलाली को चोला ओढ़ रखा है ये इस देश के लिए किसी भी एंगल से सही नहीं है. नरेन्द्र मोदी को आज तक गुजरात दंगों का जबरदस्ती दोषी ठहराने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर हर बार मीडिया उनको सजा देने पर तुला रहती है. इस देश में दंगों का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन गुजरात को लेकर जिस तरह से इस देश के मुसलमानों को बरगलाने के लिए हर बार बिकाऊ मीडिया कांग्रेस के इशारे पर चीख-चीख कर मोदी को दोषी ठहराती आई है. इसे देखकर तो यही लगता हैं कि दंगा सिर्फ गुजरात में हुआ है. मैं ना तो नरेंद्र मोदी का पक्षधर हूं और ना ही किसी समुदाय का अगर मोदी ने गलत किया तो उनको भी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन सिर्फ गोधरा में मारे गए मुसलमानों को लेकर बाकी समुदाय की अनदेखी करना मीडिया के स्वंतंत्रता पर प्रशनचिन्ह जरुर लगा देता है.

क्या गोधरा में सिर्फ मुसलमानों की जानें गई थी, हिन्दुओं की नहीं? पहले कश्मीर.. फिर केरल इसके बाद असम में हिंदू अल्पसंख्यक हो गया है और अब खुलकर हिन्दुओं के घर जलाए जा रहे हैं. कोकराझार में कई लोगों को बंगलादेशियों ने जिन्दा जलाकर मार डाला और 1500  घर जला दिये गए. करीब 2 लाख हिंदू अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में रह रहे है. अब कहाँ है मानवाधिकार आयोग? गुजरात दंगों पर अपनी छाती कूटने वाले तथाकथित सेकुलर लोगों के लिए क्या असम में हो रहा मार-काट दंगा नहीं हैं? कश्‍मीर के विस्थापितों के लिए खुलकर इसलिए नहीं बोल पाते क्योंकि उससे धार्मिक सौहार्द खराब हो सकता है, लेकिन गुजरात के बारे मे सीना ठोंक कर बोलते हैं तब कहां चली जाती है धर्मनिरपेक्षता?

असम के अपने के कुछ पत्रकार मित्रों की माने तो पूरे असम में कांग्रेस ने असम गण परिषद नामक पार्टी का वर्चस्व खत्म करने के लिए एक प्लान के तहत पूरे आसाम मे बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाया और उन्हें भारत की नागरिकता दी. पिछले दो दशकों के बाद से आज ये बंगलादेशी असम की बड़ी राजनीतिक ताकत बन गए हैं और असम के कुल वोट का ३०% हिस्सा है. चूँकि ये एकजुट होकर कांग्रेस को वोट देते हैं इसलिए पिछले पन्द्रह सालों से कांग्रेस असम में जीतती आ रही है. खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि पाकिस्तान के तरफ से बंग्लादेश के रास्ते कुछ घुसपैठियों को भेजकर यह दंगा प्लान करके किया गया है. चूंकि पाकिस्तान को मालूम हैं कि मुस्लिम समुदाय के नाम पर हिन्दुस्तान के सरकार को वो घुटने पर ला सकती है, इसलिए सरकार उनके उपर कार्रवाई नहीं कर सकती. हमने अपने फेसबुक पेज पर एक तस्वीर देखी, जिसमें असम के दंगाइयों के हाथ में पाकिस्तान का झंडा है. यह तस्वीर कितनी सच्ची है ये तो नहीं कह सकता, लेकिन अगर वाकई उस तस्वीर में दम हैं तो फिर हिन्दुस्तान को समझ जाना चाहिए कि इस देश कि सरकार देश के प्रति कितनी सजग है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अभी तक लगभग 50 लोग मारे गए हैं औऱ 2 लाख लोग बेघर हुए हैं. राजनेताओं का ना बोलना समझ में आता है लेकिन लोग अब मीडिया के चुप्पी पर भी सवाल खड़े करने लगे हैं. क्यों इस देश के लोगों के बजाय दूसरे मुल्क से आए लोगों को अहमियत दी जा रही है? अगर कांग्रेस की तरह सभी पार्टियों ने दूसरे मुल्कों से अपने वोट के लिए अवैध तरीके से बसाने लगे फिर कहां जाएंगे हिन्दुस्तानी. दंगा पीडि़त असम के सदियों पुराने निवासी बोडो समुदाय के एक हिंदू धर्म को मानने वाली जनजाति है, उनकी लड़कियों के साथ आये दिन वहां के बंगलादेशी लड़के छेड़छाड़ करते है, और उनके अपहरण भी करते हैं. इस घटना की शुरुआत हुई कोकराझार से जहां कुछ बंगलादेशियों ने एक बोडो लड़की को स्कूल के बाहर से उठाने की कोशिश की, फिर उस लड़की ने शोर मचा दिया तो लड़के भाग गए, लेकिन बाद में उनलोगों ने बोडो हिन्दुओं के घरों को आग के हवाले करना शुरू कर दिया. ये हाल है असम का.

डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को जबरन हटाया गया. कैम्प में रहने पर मज़बूर बेघरों की दुर्दशा पर रोने के लिये ना केन्द्र सरकार और ना असम सरकार के पास फुर्सत है. विदेशी फण्ड के लिये रोने वाली पेशेवर रूदालियों का भी अता पता नही है. बिके हुये चैनलों को तो खैर ये नज़र आयेगा ही नही. पता नहीं क्यों बार-बार गुज़रात पर दहाड़ मार मार कर रोने वाले कांग्रेसी और कथित धर्मनिरपेक्ष नेता कहां छिप गये हैं? क्या कश्मीर की तरह इसे भी भारत का हिस्सा नहीं मान रहे हैं. वे देश के ठेकेदार? क्या सिर्फ गुजरात के ही लिये रोयेंगे वे लोग? क्या ये साम्प्रदायिक हिंसा नहीं है? खानापूर्ति के लिए असम विधानसभा की 20 सदस्यीय सर्वदलीय टीम ने उपाध्यक्ष भीमानंद तांती के नेतृत्व में निचले असम के हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और लोगों तथा विभिन्न स्थानीय नेताओं से मुलाकात की.

उधर, माकपा पोलित ब्यूरो ने दिल्ली में जारी एक बयान में आरोप लगाया कि असम सरकार हिंसा को रोकने के लिए समय पर कार्रवाई करने में पूरी तरह विफल रही. पार्टी ने कहा कि विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज किया गया. केंद्र सरकार को इस बात का जवाब देना चाहिए कि उसने हिंसा को लेकर कार्रवाई करने में इतना विलम्ब क्यों किया? जवाब सिर्फ सरकार ही नहीं मीडिया को देना चाहिए कि उसके पास प्रणव चालीसा का गुणगान और उनके बाथरुम तक की खबरें देने के लिए समय है, लेकिन असम को लेकर क्यों नहीं? जल रहा है असम .. लोग मारे जा रहे हैं .. दो लाख लोग विस्थापित है .. और एनडीटीवी पर शबनम हाशमी १२ साल के बाद भी गुजरात पर छाती कूट रही है, शाहिद सिद्द्की के बहाने नरेन्द्र मोदी को एक बार फिर खलनायक साबित करने की कोशिशें जारी हैं.

सब सत्ता का खेल हो रहा??
और पिस रहे हैं आम आदमी,
इस आग भरे दंगों में जल रहे!!!!
कोई न कुछ कर रहा न बोलने की जहमत उठा रहा,
मीडिया नए महामहिम के गुणगान में मस्त हैं,
केंद्र अपने नए राष्‍ट्रपति के स्वागत में व्यस्त है,
और राज्य सरकार अपनी रोटी सेंकने में!!!

(भडास)

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.