कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

Category: अपराध

चुनावों में उम्मीदवारों के मोबाइल फोन की गृह मंत्रालय के आदेश पर टेपिंग ..

छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी से नक्सली सांठ -गाँठ को लेकर सुबूत मिलने का दावा.. बिहार विधानसभा के अध्यक्ष पर नक्सलियों को समर्थन के बदले धन का आफर देने का आरोप..

-आवेश तिवारी||
लोकसभा चुनावों में नक्सली हिंसा की सम्भावनाओं के बीचो-बीच उम्मीदवारों के फोन काल पर खुफिया एजेंसियों द्वारा निगरानी रखने का मामला सामने आया है.एजेंसियां , उम्मीदवारों और नक्सलियों के बीच सांठ-गाँठ को लेकर कई उम्मीदवारों और अलग अलग पार्टियों के बड़े नेताओं के टेलफोन काल्स पर निगरानी रखे हुए हैं. ख़ास तौर से छत्तीसगढ़ ,बिहार और झारखंड में गृह मंत्रालय के आदेश से शुरू की गई इस शुरूआती जांच में एजेंसियों को कई चौंका देने वाली जानकारियां हासिल हुई है. मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि ख़ुफ़िया एजेंसियां हमें लगातार ऐसे उम्मीदवारों को लेकर इनपुट उपलब्ध करा रही है हैं ,वो जल्द ही इस संबंध में चुनाव आयोग को अपनी लिखित शिकायत सौंपेंगे. मंत्रालय के संयुक्त सचिव (नक्सल )एम ए गणपति बताया है कि अब तक जो जानकारी मिल रही है उससे कहा जा सकता है कि इन राज्यों में कई उम्मीदवारों ने नक्सलियों से संपर्क किया है , नक्सली अपने लाभ हानि के हिसाब से उम्मीदवारों को सहयोग देने न देने की बात कर रहे हैं , एजेंसियां ऐसे उम्मीदवारों की गतिविधियों पर पूरी तरह से निगाह रखे हुए हैं. जानकारी मिली है कि बिहार के जमुई से उम्मीदवार उदय नारायण सिंह द्वारा माओवादियों से मदद लिए जाने को लेकर इंटेलिजेंस एजेंसियों की रिपोर्ट इसी सप्ताह गृह मंत्रालय को भेजी गई थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि जनता दल यू के उम्मीदवार और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण सिंह ने हाल ही में एक बड़े नक्सली लीडर के साथ बैठक भी की थी और उन्हें सहयोग के लिए धन का लोभ भी दिया था उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में बस्तर से आप पार्टी की उम्मीदवार सोनी सोढ़ी से नक्सली सांठ गाठ को लेकर हमारी निगाह में हैं.soni sori

उदय नारायण सिंह को लेकर सोमवार को एक इंटेलिजेंस रिपोर्ट गृह मंत्रालय को प्राप्त हुई है. खुफिया एजेंसियों की माने तो छत्तीसगढ़ के एक बहुचर्चित उम्मीदवार को समर्थन देने न देने को लेकर माओवादी संगठनों में आपसी मतभेद पैदा हो गए हैं , माओवादी संगठनों की सेन्ट्रल कमेटी के एक बड़े नेता ने जहाँ इस एक उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कराने को लेकर अपनी राय रखी है , वहीँ अन्य कैडर नहीं चाहते कि इस एक उम्मीदवार का समर्थन किया जाए झारखंड में माओवादी संगठनों ने एक उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने का फरमान जारी करने को लेकर एकराय बन गई है. छत्तीसगढ़ में पूर्व गृह मंत्री विक्रम उसेंडी जिस पर नक्सली सांठ -गाँठ के यदा कदा आरोप लगते रहे हैं को लेकर गृह मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना था कि अभी फिलहाल उनके और नक्सलियों के बीच चुनावों को लेकर किसी भी किस्म के सांठ -गाँठ की कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है.

इस बीच चुनावों के दौरान माओवादी गतिविधियों पर निगाह रखने के क्रम में खुफिया एजेंसियों ने छत्तीसगढ़ समेत अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में शहरी क्षेत्रों में काम कर रहे लगभग 125 संगठनों पर भी निगरानी रखने का काम शुरू कर दिया है जिन पर नक्सलियों से सांठ गाँठ का शक है. गृह मंत्रालय के सचिव स्तर के एक अधिकारी ने बताया कि हमारी तैयारियां पूरी है लेकिन माओवादियों ने भी चुनावों को प्रभावित करने के लिए हर सम्भव तैयारी कर रखी है , हमने सुरक्षा बलो को छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अंतिम तौर पर तैनात कर दिया है , फिलहाल हमारी कोशिश है कि नक्सलियों को बारूदी सुरंग लगाने में सफल नहीं होने दिया जाए इसके अलावा हमारी निगाह विद्यालयों और मोबाइल टावरों पर भी है , जिनको नक्सली निशाना बना सकते हैं. हमारी असली परीक्षा 10 अप्रैल को है. हम किसी भी कीमत पर माओवादियों को सफल नहीं होने देंगे.

‘वैवाहिक बलात्कार’ का कानून कितना प्रासंगिक…

स्त्रियों का कहना है कि पत्नियों के साथ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला बलात्कार, किसी गैर मर्द द्वारा किये जाने वाले बलात्कार से भी कई गुना भयंकर दर्दनाक और असहनीय होता है, क्योंकि किसी गैर-मर्द द्वारा किया जाने वाला बलात्कार तो एक बार किया जाता है और उसके विरुद्ध कानून की शरण भी ली जा सकती है, लेकिन पतियों द्वारा तो हर दिन पत्नियों के साथ बलात्कार किया जाता है, जिसके खिलाफ किसी प्रकार का कोई वैधानिक उपचार भी उपलब्ध नहीं है. यही नहीं ऐसे बलात्कारी पति, अपनी पत्नियों को शारीरिक रूप से भी उत्पीड़ित भी करते रहते हैं. ऐसे में पत्नियां जीवनभर अपने पतियों की गुलामों की भांति जीवन जीने को विवश हो जाती हैं.

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’||

देश की राजधानी में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद बलात्कार कानून में बदलाव के लिये सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा के नेतृत्व में एक कमेटी बनायी गयी, जिसने सिफारिश की, कि वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दण्ड संहिता में यौन-अपराध (जिसे बलात्कार की श्रेणी में माना जाये) के रूप में शामिल किया जाए और ऐसे अपराधी पतियों को कड़ी सजा देने का प्रावधान भी किया जाये.vaivahik blatkar

हम सभी जानते हैं कि आयोग और समितियां सरकार को निर्णय लेने में सहायक हो सकने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती. इस समिति की सिफारिशों पर भी सरकार और संसद ने विचार किया और उपरोक्त सिफारिश के अलावा करीब-करीब शेष सभी सिफारिशों को स्वीकार करके जल्दबाजी में बलात्कार के खिलाफ एक कड़ा कानून बना दिया. जिसके दुष्परिणाम अर्थात् साइड इफेक्ट भी सामने आने लगे हैं. यद्यपि साइड इफेक्ट के चलते इस कानून को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता, क्योंकि इस देश में और शेष दुनिया में भी कमोबेश हर कानून और हर प्रावधान या परिस्थिति का मनमाफिक उपयोग या दुरुपयोग करने की आदिकाल से परम्परा रही है. जिसके हाथ में ताकत या अवसर है, उसने हमेशा से उसका अपने हितानुसार उपभोग, उपयोग और दुरुपयोग किया है. अब यदि स्त्रियॉं ऐसा कर रही हैं तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ा है.

बात यहीं तक होती तो भी कोई बात नहीं थी, लेकिन इन दिनों स्त्रियों में एक ऐसी विचारधारा बलवती होती जा रही है, जो विवाह को अप्रिय बन्धन, परिवार को कैदखाना और एक ही पुरुष क साथ जिन्दगी बिताने को स्त्री की आजादी पर जबरिया पाबन्दी करार देने के लिये तरह-तरह के तर्क गढ रही हैं. ऐसी विचारधारा की वाहक स्त्रियों की ओर से अब पूर्व न्यायाधीश जे. एस. वर्मा की संसद द्वारा अस्वीकार कर दी गयी उस अनुशंसा को लागू करवाने के लिये हर अवसर पर चर्चा और बहस की जा रही हैं. जिसमें उनकी ओर से मांग की जाती है कि पति द्वारा अपनी बालिग पत्नी की इच्छा या सहमति के बिना किये गये या किये जाने वाले सेक्स को न मात्र बलात्कार का अपराध घोषित किया जाये, बल्कि ऐसे बलात्कारी पति को कठोरतम सजा का प्रावधान भी भारतीय दण्ड संहिता में किया जाये.

ऐसी मांग करने वाली स्त्रियों की मांग है कि पुरुष द्वारा सुनियोजित रूप से स्त्रियों की आजादी को छीनने और स्त्री को उम्रभर के लिये गुलाम बनाये रखने के लिये विवाह रूपी सामाजिक संस्था के बन्धन में बंधी स्त्री के साथ हर रोज, बल्कि जीवनभर पति द्वारा बलात्कार किया जाता है, जो पत्नियों के लिये इतना भयंकर, दर्दनाक और वीभत्स हादसा बन जाता है, जिसके चलते पत्नियां जीवनभर घुट-घुट कर नर्कमय जीवन जीने को विवश हो जाती हैं. उनका मानना है कि अनेक पत्नियां आत्महत्या तक कर लेती हैं. ऐसी विचारधारा की पोषक स्त्रियों का कहना है कि पत्नियों के साथ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला बलात्कार, किसी गैर मर्द द्वारा किये जाने वाले बलात्कार से भी कई गुना भयंकर दर्दनाक और असहनीय होता है, क्योंकि किसी गैर-मर्द द्वारा किया जाने वाला बलात्कार तो एक बार किया जाता है और उसके विरुद्ध कानून की शरण भी ली जा सकती है, लेकिन पतियों द्वारा तो हर दिन पत्नियों के साथ बलात्कार किया जाता है, जिसके खिलाफ किसी प्रकार का कोई वैधानिक उपचार भी उपलब्ध नहीं है. यही नहीं ऐसे बलात्कारी पति, अपनी पत्नियों को शारीरिक रूप से भी उत्पीड़ित भी करते रहते हैं. ऐसे में पत्नियां जीवनभर अपने पतियों की गुलामों की भांति जीवन जीने को विवश हो जाती हैं.

अत: स्त्रियों के अधिकारों तथा स्त्री सशक्तिकरण की बात करने वाली स्त्रियों का तर्क है कि ऐसे बलात्कारी पतियों पर केवल इस कारण से रहम करना कि यदि पतियों को बलात्कार का दोषी ठहराया जाने वाला कानून बना दिया गया तो इससे परिवार नामक सामाजिक संस्था के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो जायेगा और हमारे परम्परागत सामाजिक मूल्य नष्ट हो जायेंगे, कहां का न्याय है? क्या परिवार और सामाजिक मूल्यों के बचाने के नाम पर ऐसी बलात्कारित पत्नियों के साथ यह घोर अन्याय नहीं किया जा रहा है? और ऐसे पारिवारिक या सामाजिक मूल्यों को जिन्दा रखने से क्या लाभ जो स्त्री को किसी की पत्नी बनने के बाद इंसान के रूप में ही मान्यता नहीं देते हैं?

ऐसी स्त्रियों का कहना है कि एक पत्नी भी इंसान होती है और वह अपने पति के साथ भी कब सेक्स करना चाहती है या सेक्स नहीं करना चाहती, यह निर्णय करना उसका खुद का ही अधिकार है. क्योंकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 उसे अपनी देह को अपनी इच्छानुसार जीने की इजाजत देता है. जबकि वर्तमान पारिवारिक संस्था में स्त्री की देह पर पुरुष का स्थायी और अबाध अधिकार है. जिसके चलते एक पत्नी की सहमति, इच्छा और अनुमति के बिना उसके पति द्वारा उसके साथ जीवनभर सेक्स किया जाता है. जबकि ऐसा किया जाना न मात्र संविधान के उक्त प्रावधान का उल्लंघन है, बल्कि ऐसा किया जाना अमानवीय और हिंसक भी है.

ऐसे विचारों पर तर्क-वितर्क चलते रहते हैं. किसी को भी ऐसी स्त्रियों के विचारों से सहमत या असहमत होने का पूर्ण अधिकार है. केवल इस बारे में हॉं या ना कह देने मात्र से समस्या का समाधान या निराकरण नहीं होने वाला. हमें बिना पूर्वाग्रह के इस बारे में विचार करना होगा और जानना होगा कि पति-पत्नी जो एक दूसरे पर जान छिड़कते रहे हैं. एक दूसरे को रक्त सम्बन्धियों से भी अधिक महत्व और सम्मान देते रहे हैं, उस रिश्ते के बारे में कुछ स्त्रियों की ओर से इस प्रकार के तर्क पेश करने की वजह क्या है? जो तर्क पेश किये जा रहे हैं, वे कितने व्यावहारिक हैं और कितने फीसदी मामलों में इस प्रकार के हालात हैं, जहां एक स्त्री अपनी पति के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने को बलात्कार से भी घृणित मानने को विवश है? मेरा मानना है कि इसके पीछे के कारणों पर बिना पूर्वाग्रह के विचार करने और उनका विश्‍लेषण करने की जरूरत है. जिससे हमें सही और दूरगामी प्रभाव वाले निर्णय लेने में सुगमता रहे.

उपरोक्त के साथ-साथ स्त्रियों के तर्क-वितर्कों को निरस्त करने से पूर्व हम पुरुषों को इस मुद्दे पर न मात्र बिना पूर्वाग्रह के गम्भीरता से विचार करना चाहिये, बल्कि इस बारे में एक स्वस्थ चर्चा को भी प्रेरित करना होगा. क्योंकि यदि आज कुछेक या बहुत कम संख्या में स्त्रियां इस प्रकार से सोचने लगी हैं, तो कल को इनकी संख्या में बढोतरी होना लाजिमी है. जिसे अधिक समय तक बिना विमर्श के दबाया या अनदेखा नहीं किया जा सकेगा. मगर इस विमर्श के साथ कुछ और भी प्रासंगिक सवाल हैं, जिन पर भी विमर्श और चिन्तन किया जाना समीचीन होगा. जैसे-

1-आज घरेलु हिंसा कानूनन अपराध है. इसके बावजूद भी-
(1) घरेलु हिंसा की शिकार कितनी पत्नियां अपने पतियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराती हैं?
(2) कितनी पत्नियां घरेलु हिंसा के प्रकरणों को पुलिस या कोर्ट में ले जाने के तत्काल बाद वापस लेने को विवश हो जाती हैं?
(3) घरेलु हिंसा की शिकार होने पर मुकदमा दर्ज कराने वाली स्त्रियों में से कितनी घरेलु हिंसा को कानून के समक्ष कोर्ट में साबित करके पतियों को सजा दिला पाती हैं?
(4) घरेलु हिंसा प्रकरणों को पुलिस और कोर्ट में ले जाने के बाद कितनी फीसदी स्त्रियॉं कोर्ट के निर्णय के बाद अपने परिवार या विवाह को बचा पाती हैं या कितनी स्त्रियां विवाह को बचा पाने की स्थिति में होती हैं?
2-आज की तारीख में एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करना अपराध है, मगर विवाहित होते हुए दूसरा विवाह रचाने वाले पति पर मुकदमा तब ही दर्ज हो सकता है या चल सकता है, जबकि उसकी पहली वैध पत्नी खुद ही मुकदमा दायर करे! इस प्रावधान के होते हुए कितनी ऐसी पत्नियां हैं जो-
(1) दूसरा विवाह रचा लेने पर अपने पतियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाती हैं? क्या बॉलीवुड अभिनेता धर्मेन्द्र द्वारा हेमा मालिनी से दूसरा विवाह रचाने के बाद उनकी पहली पत्नी ने धर्मेन्द के खिलाफ मुकदमा दायर किया? नहीं. इसी कारण धर्मेन्द्र आज दूसरा विवाह रचाने का अपराधी होते हुए संसद तक की शोभा बढा चुका है! ऐसे और भी अनेकानेक उदाहरण मौजूद हैं
(2) यदि पत्नियां अपने पति के विरुद्ध दूसरा विवाह रचाने का मुकदमा दर्ज नहीं करवाती हैं तो इसके पीछे कोई तो कारण रहे होंगे? इसके साथ-साथ स्त्री आजादी और स्त्री मुक्ति का अभियान चलाने वाली स्त्रियों की ओर से इस कानून में संशोधन करवाने के लिये कोई सक्रिय आन्दोलन क्यों नहीं चलाया गया? जिससे कि कानून में बदलाव लाया जा सके. जिससे पूर्व से विवाहित होते हुए दूसरा विवाह रचाने वाले पुरुष या स्त्रियों के विरुद्ध देश का कोई भी व्यक्ति मुकदमा दायर करने को सक्षम हो!
3. जारकर्म में केवल पुरुष को ही दोषी माना जाता है, बेशक कोई विवाहिता स्त्री अपने इच्छा से और खुद किसी पुरुष को उकसाकर उस पुरुष से यौन-सम्बन्ध स्थापित करे, फिर भी ऐसी पत्नी के पति को ये अधिकार है कि वह अपनी पत्नी की सहमति होते हुए, उसके साथ यौन-सम्बन्ध स्थापित करने वाले पुरुष के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर सकता है. ऐसे मामले में ऐसी विवाहिता स्त्री के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है! आखिर क्यों?

4. ऐसे अनेक मामले हैं, जहां पर स्त्रियां भी कम उम्र के लड़कों को या सहकर्मी पुरुषों को शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिये उत्प्रेरित करती या उकसाती देखी जा सकती हैं, लेकिन उनके खिलाफ इस द्भत्य के लिये बलात्कार करने का मामला दर्ज नहीं हो सकता! आखिर क्यों?

5. महिला के साथ बलात्कार की घटना घटित होने पर, महिला अपनी इज्जत लूटने का आरोप लगाते हुए पुरुष के खिलाफ मुकदमा दायर करती है, लेकिन जब लगाया गया आरोप साबित नहीं हो पाता है तो पुरुष की इज्जत लुटने का मामला ऐसी स्त्री के विरुद्ध दायर करने का कोई कानून नहीं है! इसका मतलब क्या ये माना जाये कि इज्जत सिर्फ स्त्रियों के पास होती है, जिसे लूटा या नष्ट किया जा सकता है? पुरुषों की कोई इज्जत होती ही नहीं है? इसलिये उनकी इज्जत को लूटना अपराध नहीं है!

6. यदि मान लिया जाये कि स्त्रियॉं ये कानून बनवाने में सफल हो जाती हैं कि विवाहिता स्त्री की रजामन्दी के बिना उसके साथ, उसके पति द्वारा बनाया गया प्रत्येक सेक्स सम्बन्ध बलात्कार होगा, तो सबसे बड़ा सवाल तो यही होगा कि इस अपराध को साबित कैसे किया जायेगा? क्या पत्नी के कहने मात्र से इसे अपराध मान लिया जायेगा? क्योंकि पति-पत्नी के शयनकक्ष में किसी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के उपलब्ध होने की तो कानून में अपेक्षा नहीं की जा सकती? और यदि केवल पत्नी के कथन को ही अन्तिम सत्य मान लिया जायेगा तो क्या कोई पुरुष किसी स्त्री से विवाह करने की हिम्मत जुटा पायेगा?

7. आजकल ऐसे अनेक मामले कोर्ट के सामने आ रहे हैं, जिनमें आरोप लगाया जाता है कि पति अपनी पत्नी के साथ, पत्नी की इच्छा होने पर सेक्स सम्बन्ध नहीं बनाता है या सेक्स में पत्नी को सन्तुष्ट नहीं कर पाता है तो ऐसी पत्नियां इसे वैवाहिक सम्बन्धों में पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार का दर्जा देती हैं और इसी के आधार पर तलाक मांग रही हैं. जिसे देश के अनेक उच्च न्यायालयों द्वारा मान्यता भी दी जा चुकी है! वैवाहिक बलात्कार कानून बनवाने की मांग करने वाली स्त्रियां इस स्थिति को किस प्रकार से परिभाषित करना चाहेंगी?

उपरोक्त के अलावा भी बहुत सारी ऐसी बातें हैं, जिन पर वैवाहिक बलात्कार का कानून बनवाने की मांग पर विचार करने से पहले जानने और समझने की जरूरत है. इस आलेख को विराम देने से पूर्व निम्न कुछ प्रसिद्ध उक्तिओं को पाठकों के समक्ष अवश्य प्रस्तुत करना चाहूंगा :-

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वाटसन का कहना था कि पश्‍चिम में दस में नौ तलाक मैथुन सम्बन्धी गड़बड़ी के कारण होते हैं, जिसमें स्त्रियों का सेक्स में रुचि नहीं लेना भी बड़ा कारण होता है.

एक अन्य स्थान पर वाटसन कहते हैं कि स्त्रियॉं विवाह के कुछ समय बाद सेक्स में रुचि लेना बन्द कर देती हैं और अपने पति के आग्रह पर सेक्स को घरेलु कार्यों की भांति फटाफट निपटाने को उतावली रहती हैं.

सेक्स मामलों की विशेषज्ञ लेखिका डॉ. मेरी स्टोप्स लिखती हैं कि स्त्री और पुरुष की काम वासना का वेग एक समान हो ही नहीं सकता. पुरुष कितना ही प्रयास क्यों न कर ले, अपनी पत्नी या प्रेमिका के समीप होने पर वह अपनी वासना पर नियन्त्रण नहीं कर सकता. वह क्षण मात्र में सेक्स करने को आतुर होकर रतिक्रिया करने लगता है, जबकि स्त्रियों को समय लगता है, लेकिन स्त्रियों को इसे पुरुषों की, स्त्रियों के प्रति अनदेखी नहीं समझकर, इसे पुरुष का प्रकृतिप्रदत्त स्वभाव मानकर सामंजस्य बिठाना सीखना होगा, तब ही दाम्पत्य जीवन सफलता पूर्वक चल सकता है.

डॉ. मेरी स्टोप्स आगे लिखती हैं आमतौर पर स्त्रियॉं सेक्स में अतृप्त रह जाती हैं, सदा से रहती रही हैं. जिसके लिये वे पुरुषों को जिम्मेदार मानती हैं और कुछेक तो अगली बार पुरुष को सेक्स नहीं करने देने की धमकी भी देती हैं. जबकि स्त्रियों को ऐसा करने से पूर्व स्त्री एवं पुरुष की कामवासना के आवेग के ज्वार-भाटे को समझना चाहिये.

महादेवी वर्मा का कथन है कि काव्य और प्रेमी दोनों नारी हृदय की सम्पत्ति हैं. पुरुष नारी पर विजय का भूखा होता है, जबकि नारी पुरुष के समक्ष समर्पण की. पुरुष लूटना चाहता है, जबकि नारी लुट जाना चाहती है.

द मैस्तेरी का कहना है कि नारी की सबसे बड़ी त्रुटि है, पुरुष के अनुरूप बनने की लालसा.

शेक्सपियर-कुमारियां पति के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहती और जब उन्हें पति मिल जाता है तो सब कुछ चाहने लगती हैं. यही प्रवृत्ति उनके जीवन की सबसे भयंकर त्रासदी सिद्ध होती है.

बुलबर-विवाह एक ऐसी प्रणय कथा है, जिसमें नायक प्रथम अंक में ही मर जाता है. लेकिन उसे अपनी पत्नी के लिये जिन्दा रहने का नाटक करते रहना पड़ता है.

अरबी लोकोक्ति-सफल विवाह के लिये एक स्त्री के लिये यह श्रेयस्कर है कि वह उस पुरुष से विवाह करे, जो उसे प्रेम करता हो, बजाय इसके कि वह उस पुरुष से विवाह करे, जिसे वह खुद प्रेम करती हो.

उपरोक्त पंक्तियों पर तो पाठक अपने-अपने विचारानुसार चिन्तन करेंगे ही, लेकिन अन्त में, मैं अपने अनुभव के आधार पर लिखना चाहता हूँ कि-

यदि स्त्रियॉं विवाह के बाद अपने पतियों के प्रति भी वैसा ही शालीन व्यवहार करें, जैसा कि वे अपरचित पुरुषों से करती हैं तो सौ में से निन्यानवें युगलों का दाम्पत्य जीवन सुगन्धित फूलों की बगिया की तरह महकने लगेगा. साथ ही स्त्रियों को हमेशा याद रखना चाहिये कि पुरुष प्रधान सामाजिक ढांचे में कोई भी पुरुष चिड़चिड़ी तथा कर्कशा पत्नी के समीप आने के बजाय उससे दूर भागने में ही भलाई समझता है. जिसके परिणाम कभी भी सुखद नहीं हो सकते.

पत्नी और बेटी को भाजपा नेताओं को खुश करने भेजने वाले ससुर को गोली मारी..

दिल्ली से सटे साहिबाबाद में बीजेपी नेता चौधरी धर्मवीर को उन्हीं के दामाद सुनील ने गोली मार हत्‍या कर दी है. सुनील ने अपने ससुर की हत्या के बाद पुलिस के समक्ष समर्पण कर दिया. समर्पण के बाद सुनील ने आरोप लगाया कि धर्मवीर अपनी पत्नी और बेटी को भाजपा के बड़े नेताओं को खुश करने भेजता था.pistol

धर्मवीर साहिबाबाद के गरिमा गार्डन कॉलोनी के रहने वाले हैं. वो पार्टी के वार्ड अध्यक्ष भी थे. दामाद के गोली मारने के बाद घरवालों ने धर्मवीर को गंभीर अवस्‍था में जीटीबी अस्पताल ले गए लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

थोड़ी देर बाद गोली मारने वाले दामाद सुनील ने साहिबाबाद थाने में जाकर सरेंडर कर दिया. दामाद सुनील ने अपने ससुर चौधरी धर्मवीर के उपर कई गंभीर आरोप लगाए हैं.

सुनील का कहना है कि उसकी शादी 18 साल पहले हुई थी. लेकिन पिछले 8 महीने से मेरी बीवी मेरे साथ ना रहकर अपने पिता के घर में रहने लगी थी. पिता ने मेरी पत्नी को जबरदस्ती अपने घर में रखा हुआ था. वह पार्टी की ओर से टिकट पाने के लालच में नेताओं को अपनी बेटी और मेरी पत्नी को उनके घरों में गंदे काम के लिए भेजा करता था. इलाके में रसूख होने के कारण कोई इससे उलझना नहीं चाहता था.

मैं अपने ससुर की इन हरकतों से बहुत परेशान हो गया था, इस कारण आज मैंने उसे गोली मार दी. पुलिस ने बताया कि सुनील की 4 लड़कियां और 2 लड़के हैं.

दुष्कर्म पीड़ितों के ‘टू फिंगर’ टेस्ट पर रोक…

बलात्कार पीडि़तों की मानसिक पीड़ा को समझते हुए सरकार ने इलाज और जांच के लिए नई गाइडलाइन जारी की है. स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने ‘टू फिंगर’ टेस्ट पर रोक लगा दी है. नए दिशा निर्देश के अनुसार इसे अवैज्ञानिक और गैर-कानूनी करार दिया गया है. अस्पतालों से कहा गया है कि वे पीडि़तों की फॉरेंसिक और मेडिकल जांच के लिए अलग से कमरे की व्यवस्था करें. ऐसा विश्वास किया जा रहा है कि इससे बलात्‍कार पीडि़ता की ‘मानसिक पीड़ा’ बढ़ने पर रोक लगेगी.two finger test

डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च (डीएचआर) ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ मिलकर विशेषज्ञों की मदद से आपराधिक मामलों से निपटने के लिए राष्ट्रीय दिशा निर्देश तैयार किया है. डीएचआर ने यौन हिंसा के मानसिक-सामाजिक प्रभाव से निपटने के लिए भी एक नई नियमावली बनाई है. ये नियम उन सभी हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स को उपलब्ध कराए जाएंगे, जो यौन हिंसा पीड़ितों की जांच और देखभाल करते हैं.

आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. वी एम कटोच ने नवंबर 2011 में विशेषज्ञों का एक समूह बनाया था. डॉ. एम ई खान की अध्यक्षता में बने समूह को ऐसे दिशा निर्देश बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी. जिसका पालन किसी भी बलात्कार पीड़ित के स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में पहुंचने पर किया जाना है. इसके बाद क्लीनिकल फॉरेंसिक मेडिकल यूनिट (सीएफएमयू) प्रभारी इंद्रजीत खांडेकर को भी दिशानिर्देश बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी.

क्‍या है नए दिशा निर्देश……..

1. अब तक बलात्कार पीड़ितों की जांच केवल पुलिस के कहने पर की जाती थी, लेकिन अब यदि पीड़ित पहले अस्पताल आती है तो एफआईआर के बिना भी डॉक्टरों को उसकी जांच करनी चाहिए.

2. डॉक्टरों से ‘रेप’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करने को कहा गया है, क्योंकि यह मेडिकल नहीं कानूनी टर्म है.

3. अस्पतालों को रेप केस में मेडिको-लीगल मामलों (एमएलसी) के लिए अलग से कमरा मुहैया कराना होगा और उनके पास गाइड लाइंस में बताए गए आवश्यक उपकरण होना जरूरी है.

4. पीड़ित को वैकल्पिक कपड़े उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए और जांच के वक्त डॉक्टर के अलावा तीसरा व्यक्ति कमरे में नहीं होना चाहिए.

5. यदि डॉक्टर पुरुष है तो एक महिला का होना आवश्यक है.

6.. डॉक्टरों द्वारा किए जाने वाले ‘टू फिंगर’ टेस्ट को गैर कानूनी बना दिया गया है. नियमावली में माना गया है कि यह वैज्ञानिक नहीं है और इसे नहीं किया जाना चाहिए.

7.. डॉक्टरों को पीड़ित को जांच के तरीके और विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी देनी होगी और जानकारी ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए, जिन्हें मरीज समझ सके.

सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय गिरफ्तार…

सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय ने लखनऊ पुलिस के सामने समर्पण कर दिया है. एसएसपी प्रवीण कुमार के मुताबिक़ पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

सुब्रत रॉय के बेटे सीमांतो रॉय ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, “इस समय जबकि मैं आपसे बात कर रहा हूँ सहारा श्री उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ हैं. उन्होंने सुबह लखनऊ पुलिस के सामने समर्पण कर दिया. वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार अधिकारियों से पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं.”Subrata-Roy

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय की अंतरिम अपील क्लिक करें ये कहते हुए ख़ारिज कर दी है कि विशेष बेंच के लिए शुक्रवार को मामले की सुनवाई करना संभव नहीं है.

रॉय के वकील रामजेठमलानी अदालत में अपील की थी कि उन्हें गिरफ़्तारी से राहत दी जाए जिससे वह अपनी बीमार माँ के साथ समय गुज़ार सकें. सुब्रत रॉय को चार मार्च को न्यायालय में पेश होना है. इस तरह तब तक उन्हें जेल में ही रहना होगा.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गिरफ़्तार हुए सुब्रत रॉय भारत के तेज़तर्रार और रहस्यमयी उद्योगपतियों में से एक हैं. वह देश के प्रमुख व्यापारिक घराने सहारा इंडिया के अध्यक्ष हैं.

सहारा समूह के पास 682 अरब रुपए की संपत्ति है. वित्त क्षेत्र से अपना व्यवसाय शुरू कर वह विनिर्माण, विमानन और मीडिया के क्षेत्र में भी गए.

उनका कारोबार विदेशों में भी फैला है. वह न्यूयॉर्क के लैंडमार्क प्लाज़ा होटल और लंदन के ग्रॉसवेनर हाउस के भी मालिक हैं.

क्लिक करें सहारा इंडिया भारतीय हॉकी टीम की प्रायोजक भी है. साथ ही उनकी फ़ोर्स इंडिया नाम की फ़ॉर्मूला वन टीम में भी हिस्सेदारी है.

11 लाख से अधिक कर्मचारियों के साथ क्लिक करें सहारा इंडिया देश में रोज़गार देने वाली निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है.

सुब्रत रॉय अपनी विलासितापूर्ण जीवनशैली और ऊंची राजनीतिक पहुँच को लेकर अक़सर सुर्ख़ियों में रहते हैं.

चर्चित शादी

वह बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को अपना मित्र बताते हैं तो पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के साथ कंधा मिलाते नज़र आते हैं.

साल 2004 में हुई क्लिक करें सुब्रत रॉय के दोनों बेटों की शादी का जश्न क़रीब एक पखवाड़े तक मनाया गया था. इसे इस शताब्दी की सबसे चर्चित भारतीय शादी बताया गया था और यह शादी मीडिया में छाई रही थी.

शादी समारोह में क़रीब दस हज़ार लोग शामिल हुए थे. इसमें व्यवसाय जगत की हस्तियां, बॉलीवुड के सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी और फ़ैशन जगत के दिग्गज शामिल हुए थे.

इन अतिथियों को विशेष विमानों से लखनऊ ले जाया गया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देने पहुँचे थे.

सुब्रत रॉय के आलोचक कहते हैं कि वह अपनी कंपनी को एक पंथ की तरह चलाते हैं और ख़ुद को कंपनी का प्रबंध कार्यकर्ता बताते हैं. वह ख़ुद को क्लिक करें सहारा परिवार का अभिभावक बताते हैं.

राजसी ठाठ बाट

सहारा प्रमुख ठाठ बाट से जीते हैं. उनके पास निजी विमानों और हेलिकॉप्टरों का अपना बेड़ा है. उनका एक घर अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय व्हाइट हाउस की तरह बना है.

एक निजी शहर में बना उनका एक घर लाखों डॉलर की लागत से तैयार हुआ है, जो कि ब्रिटेन के शाही निवास बकिंघम पैलेस की अनुकृति है.

सुब्रत रॉय
ख़बरों के मुताबिक़ उनके पास रोल्स रॉयस, बेनटली और बीएमडब्लू जैसी महंगी कारों का बेड़ा है.

65 साल के सहारा प्रमुख उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहते हैं. भारतीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें अक़सर देश का सबसे अधिक प्रभावशाली व्यवसायी बताया जाता है.

इस समय सुब्रत रॉय ग़लत कारणों से सुर्ख़ियों में हैं.

क्लिक करें निवेशकों के करोड़ों रुपए न लौटा पाने के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश न होने की वजह से अदालत ने उनके ख़िलाफ़ ग़ैर ज़मानती वारंट जारी किया था.

ग़ैर क़ानूनी बाँड

उनकी दो कंपनियों ने पाँच साल पहले क़रीब 240 अरब रुपए एक ग़ैर क़ानूनी बॉन्ड के ज़रिए जुटाए थे.

अधिकारियों का कहना है कि अदालत के आदेश के बाद भी वह निवेशकों को पैसा लौटाने में नाकाम रहे हैं.

अलग-अलग कारण बताकर सुब्रत रॉय अदालत में पेश होने से बचते रहे हैं.

बुधवार को उनके वकील ने अदालत को बताया कि उनकी 92 साल की माँ की तबीयत ठीक नहीं हैं और वह चाहती हैं कि उनका बड़ा बेटा उनके पास रहे.

इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट अपना धैर्य खोता हुआ दिखा.

पिछले हफ़्ते न्यायाधीशों ने कहा था कि सहारा के आकाओं ने अगर निवेशकों का पैसा नहीं लौटाया तो उन्हें जेल भेजा जा सकता है.

(बीबीसी)

ठग बाबाओं का चोखा धंधा, कमाई बेहिसाब, निवेश जीरो…

उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र बेहद धर्मप्राण रहा है. यहां बेहिसाब मठ मंदिर आश्रम हैं जिनकी अपार कमाई है देशी विदेशी भक्त हैं. बेनामी जमीनें हैं मंदिर आश्रम समिती के ट्रस्टी लाखों में खेलते हैं.fake babas

कैंची का नीम करोली बाबा का मंदिर हो या हैड़ाखान बाबा का मंदिर मायावती आश्रम हाट कालिका हो या अल्मोड़ा का चितई मंदिर श्रद्धा के साथ चढ़ावा भी खूब आता है पर कहां और कैसे खर्च होता है इसको बताने की ना वे जहमत उठाते हैं ना कोई पूछने की हिमाकत करता है. कुछेक आश्रमों, मंदिरों में रोज रसोई भी बनती है  भंग बूटी पीकर भक्त और संचालक सब तल्लीन रहते हैं.

जो स्थापक बाबा थे वो मर गये उनके नजदीकी चेले आज मस्त हैं भक्ति भाव चरस में कुछ ज्यादा ही होता है. और जो जिंदा भगवान हैं वे राजनेता भी हैं प्रवचन भी करते हैं दबा के कमाते हैं इनके आश्रम तो 5 स्टार होटलों जैसे हैं भीतर क्या होता है कुछ पता नहीं. आशाराम के बाप बैठे हुए हैं यहां.

जमीन कब्जाने की बात तो आम है इसको कौन पूछे. इनकी अपराधी टाईप खूंखार भक्त फोर्स होती है जो ज्यादा भीतर की बातें जानने की कोशिश करेगा यकीनन वो परम समाधि में ही लीन कर दिया जायेगा. इन बाबाओं ने अपनी अपराधी गाड़ियों से हरिद्वार में भक्तों को प्रभु से तत्काल मिला दिया था पिछले कुंभ मेले में क्या हुआ? कोई चूं तक नहीं बोला निशंक नाम का सी एम जो इतना बोलता था इस बारे में कभी कुछ बोला?

विचार मीमांसा नाम की एक भड़काउ आग लगाउ पत्रिका आयी. एक दिन उसने सतपाल महाराज के भाई के आश्रम के बारे में लिखा था कि वहां चरस गांजे का क्विंटलों अंबार था और कमाई तो कांरु का खजाने जैसी थी. भाजपा के ही ठग बाबा नहीं होते कांग्रेसियों ने भी सैकड़ों बाबा और आश्रम वगैरह पाले पोसे हैं. आशाराम तो कमाई कर करके बमकने लगा था और बेहद टुच्चे स्तर पर उतर आया था सो उसके दिन पूरे होने ही थे. पर ये पूरे घुन्ने गुरुघंटाल हैं. चेहरे से ही कुटिल कसाई लगते हैं. चरबी की परतों भरे चेहरे पे भाव भी चरबी में दब जाते हैं.

भाजपा कांग्रेस के अलग अलग आश्रम साधु मठ मंदिर हैं. इनके स्टाफ बेहद जांच परख कर रखे गये हैं. इनके भीतर यकीनन अभी लाखों काले कारनामे और काली नीयत के भांड और धूर्त बैठे हैं. भक्त बनकर ही सही, इनके आस पास, बाहर भीतर कभी जरुर जाइये, लंबलेट होकर पांव पकड़िये, रसोई जीमिये, गांजे की दम भरिये और खोजी नजर और जेम्स बांण्डिया दिमाग खोलिये. मन में आपके क्या चल रहा है ये कोई नहीं जान पाऐगा. माथे पर छापा तिलक लगाइये दो एक दिन आश्रम में भगत बनकर रहिए अपने पल्ले का पैसा खर्चने की जरुरत नहीं. इनके भीतर से जरुर कुछ बाहर आयेगा. पर ध्यान रखें, पूछताछ न करें, अपने दिमाग से समझें, आंख से देखें कानों से सुनें. कैमरा स्टिंग रिकार्ड़िंग कीजिये पर बचकर.

(जारी)

चुनावी सियासत की भेंट चढा राजीव हत्याकाण्ड…

-प्रणय विक्रम सिंह||

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों संतन, मुरूगन और पेरारीवलन की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दी. जयललिता सरकार ने दो कदम और आगे बढते हुए राजीव गांधी हत्याकांड में सजा पाए 7 मुजरिमों को रिहा करने का फैसला किया है.RajivGandhi

गौरतलब है कि डीएमके प्रमुख करुणानिधि ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट फैसले के तुरंत बाद ही कहा था कि अगर संथन, मुरुगन और पेरारिवलन की रिहाई होती है, तो उन्हें बहुत खुशी होगी. संविधान विशेषज्ञों के अनुसार इस पर अब राज्यपाल को फैसला लेना होगा. राज्यपाल ऐसे मामलों पर केंद्र सरकार से सलाह-मशविरा करके फैसला लेते हैं. वहीं गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक सजा को माफ करने का अधिकारी केंद्र सरकार को ही है, इसलिए राज्य सरकार अपराधियों को जेल से आजाद नहीं कर सकती. हालांकि अी इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं भेजी गई है. लेकिन इस बात ने एक विवाद को जन्म दे दिया है. क्या तमिलनाडु सरकार राजीव गांधी के हत्यारों को माफ करके राजनीतिक ला उठाना चाह रही हैं? अधिकतर सीधे हस्तक्षेप से बचने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पिता राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने के लिए जयललिता पर हमला बोला है. राहुल गांधी हत्यारों को रिहा किए जाने से खुश नहीं हैं. उन्होंने कहा, जब एक प्रधानमंत्री के हत्यारों को रिहा किया जा सकता है तो फिर आम आदमी क्या उम्मीद लेकर जिएगा!

गौर हो कि पूर्व में भी तमिलनाडु की विधानसभा ने राजीव गांधी की हत्या के दोषियों को मृत्युदंड न दे कर उम्र कैद की सजा देने का जो प्रस्ताव पास किया था. और अब जो रिहाई का प्रस्ताव जयललिता सरकार ने पारित किया है वह विशुद्ध रूप से साम्प्रदायिकता है. आश्चर्य है कि यह प्रस्ताव खुद मुख्यमंत्री जयललिता ने पेश किया. प्रस्ताव में यदि निर्णय में विलंब, मानवता की मांग आदि का तर्क दिया गया होता, तब तो गनीमत थी. हालांकि अपनी बात को जायज साबित करने के लिए कई बार शैतान भी बाइबल का हवाला देता है. लेकिन जयललिता ने प्रस्ताव का औचित्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि तमिल भावनाओं का सम्मान करने के लिए उन्होंने ऐसा किया है. समझ में आना मुश्किल है कि एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या करने वालों का साथ देने के साथ तमिल भावनाओं का क्या मेल है?

दरअसल राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर तमिलनाडु में शतरंज की बाजी सी बिछी हुई है. जिसमें एक ओर है सत्तारूढ एआईएडीएमके और दूसरी ओर है विपक्षी डीएमके. इस चुनावी बाजी में एक तीसरा पक्ष भी है, कांग्रेस जो इन दोनों का खेल बिगाड़ने की भूमिका में है. जयललिता सरकार के हत्यारों की रिहाई के फैसले से तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस बेचैन हो उठी. नतीजतन शाम होते-होते केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर आपत्ति जता दी. गृह मंत्रालय ने कहा है कि तमिलनाडु की जयललिता सरकार को राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा करने का अधिकार नहीं है. तमिलनाडु के नजरिए से देखें तो राजीव गांधी के हत्यारों का मामला केंद्र के बजाय एलटीटीई से कहीं ज्यादा जुड़ा है. इस फैसले ने तमिलों को एक बार फिर प्रभाकरन की याद दिला दी है. बाकी बचा काम राजनीतिक दल कर रहे हैं जो वोटों की राजनीति के स्वार्थ के चलते अब तक एलटीटीई की निशानियों को सहेजे हुए हैं. चाहे सत्तारूढ एआईएडीएमके हो या फिर डीएमके ये दोनों दल हमेशा से तमिल भावनाओं की राजनीति करते रहे हैं. आने वाले लोकसभा चुनावों के मौके पर इन्हें तमिल भावनाओं को वोट में बदलने का बैठे-बिठाये एक अनोखा फार्मूला हाथ लग गया है.

वोटों की इस बेरहम राजनीति और सत्ता की चाहत में कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों सजा दिलवाने में अक्षम्य लापरवाही बरती. हत्यारों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास 11 साल तक लंबित पड़ी रही. केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद गृहमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका की फाइल पर अपनी राय राष्ट्रपति को भेजने में नाकाम रहे. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका निपटाने में देरी के पीछे तमिल सियासत की अहम भूमिका रही है. फांसी में हुई देरी केवल सरकार की लापरवाही नहीं, बल्कि तमिल सियासत से जुड़ी मजबूरी थी. वोटो की तिजारत और अंचल विशेष की भावना के आधार जयाललिता द्वारा की गई कार्रवाई पर अब तो कुछ लोग कहने लगे हैं कि अफजल गुरू के साथ अन्याया हुआ है. यानी जिस तरह तमिलनाडु की तमिल राजनीति ने फांसी की सजा को तमिल भावनाओं से जोड़ने का अपराध किया है, उसी तरह अफजल गुरु की फांसी को मुस्लिमवादी राजनीति से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

कहते हैं, लोकतंत्र सबसे अच्छी प्रणाली है क्योंकि इसमें सभीी की बात सुनी जाती है लेकिन जब लोकतंत्र अपने आप में कोई आदर्श नहीं रह जाता, बल्कि दल तंत्र और वोट तंत्र में बदल जाता है, तब वह समानता, न्याय और निष्पक्षता के मूल्यों का हनन करने का औजार बन जाता है. फांसी जैसे सवाल पर धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन लोकतंत्र का घोर अलोकतांत्रिक इस्तेमाल है. पतन की इस अंधेरी रात में हम वह दीपक कहाँ से ले आएं.

आज के कन्हैया को तो अहीरों ने मार डाला..

-भंवर मेघवंशी||

अपनी शूरवीरता   के लिये प्रसिद्ध चित्तौडगढ जिले के गंगरार थाना क्षैत्र के मण्डपिया गांव का 20 वर्षीय पप्पूलाल सालवी बचपन से ही अपने नाना कालूराम के साथ रह कर पला और बडा हुआ, घर में भजन सत्संग का वातावरण था, कबीर से लेकर निरंकारी तक निगुर्ण की अजस्त्र धारा बहती थी, पप्पू की वाणी का माधुर्य सबको मोह लेता था, सिर्फ 20 बरस उम्र लेकिन साधु संतों सा जीवन, सत्संगों में भजन और घर पर भी ज्ञान चर्चा,  2 वर्ष पूर्व उसने घर छोडकर अपने नाना के खेत में ही एक कुटिया बना ली, वही रहने लगा, एक वीतराग दरवेश  की भांति, अन्न आहार भी त्याग दिया, सिर्फ दूध और फल खाता, जवानी की दहलीज पर कदम रखता एक युवा संत, सुन्दर मनोहारी व्यक्तित्व  का धनी और कण्ठ में कोकिला सी आवाज, प्यार से लोग उसे पप्पू महाराज कहते और भजन गाने के लिये दूर-दूर तक सतसंIMG-20140209-WA009गों में आमंत्रित करते, इस युवा संत के विभिन्न समाजों में कई  शिष्य-शिष्याएं  भी बन गये थे, लेकिन पप्पू महाराज शायद जगत को मिथ्या मानने वाले हवाइ विचारों से ही अवगत था, उसे जगत में जाति के कड़वे सच का ज्ञान नहीं था कि कोइ भी दलित चाहे वह संत बने या साधु, राजा बने या महाराज, चपरासी बने या कलेक्टर, व्यवसायी बने या विदूषक, मजदूर बने या कलाकार, उसकी औकात बढती नहीं है, चार बात किताबी ज्ञान की दोहरा देने और मीठी आवाज में भजन गा देने मात्र से जाति का कलंक कहां मिटता है, इस देश में ? भगवा धारण कर लेने से एक दलित को कौन संत मान लेता है इस मुल्क में ?

IMG-20140209-WA008एक दलित जन्म से लेकर मरने तक सिर्फ और सिर्फ दलित ही रहता है, वह कितना भी प्रतिभावान क्यों ना हों, उसका कथित नीची जाति का होना, उसके लिये आजीवन अभिशाप होता है, क्योकि इस देश में जाति कभी भी पीछा नहीं छोडती है, जन्म से पहले और मरने के बाद तक जहां सारे कर्मकाण्ड जाति पर आधारित होते है, वहां पर दलित युवा संत पप्पू महाराज को कौन महाराज मानता ? आखिर था तो वह भी नीच जुलाहों का ही बच्चा ना ? जिसके पूर्वज कपडे बुन बुनकर बेचते थे, भले ही अब बुनकर, सूत्रकार, सालवी लिखने लगे हो लेकिन सवर्ण हिन्दुओं की नजर में तो वे नीच ही थे और नीच ही रहेगें, भले ही सरकार उन्हे कितना ही ऊंचा उठाये, समाज उन्हे कभी ऊंचा नहीं उठने देगा. तो इन पप्पू महाराज की खेत की पडौसन थी एक अहीर युवती, पप्पू महाराज अगर 20 के थे तो यह लडकी है 18-19 की, बचपन में शादी हो गइ थी, पति से खट-पट हुई  और रूठ कर पीहर आ बसी वापस, खेत पर काम से फुर्सत मिलती तो पप्पू महाराज की कुटिया में और भक्तों के साथ सुस्ताने चली आती थी, एक संत था तो दसरी सतायी  हुई, दोनों ही इस जगत से खफा, कब गुरू शिष्य बने, किसी को क्या मालूम ? कई  और चेले थे, वैसे वो भी थी, पर नारी का ह्रदय गुरू के प्रति भी प्रेम से सरोबार ही था, नजदीकियां इतनी कि गांव के बहुसंख्यक एवं प्रभावशाली  अहीरों को चुभने लगी, पहले तो चेतावनी दी गयी पर बात बनी नहीं, आखिर किसी नीच जाति के एक छोकरे की चेली बन जाये अहीरों की लडकी, कितनी शर्म की बात थी यह ?IMG-20140209-WA003

हालात ऐसे विकट हुए कि संत महाराज को गांव छोडना पडा, ननिहाल का घर छोड पप्पू महाराज प्रवास को निकल गये, तीन दिन बाद शिष्या भी घर से गायब हो गयी, महाराज के नाना कालुलाल सालवी के घर आ धमके अहीर लोग, बोले – तुम्हारा पप्पूलाल और हमारी लडकी दोनों कहीं चले गये है . हमारे टुकडों पर पलने वाले नीचों, तुम्हारी यह हिम्मत हो गइ कि तुम्हारे लौण्डे हमारी लडकियों को भगा ले जाये, हम उस हरामजादे को चारों तरफ ढूंढ रहे है, जैसे ही मिलेगा, उसके शरीर  के टुकडे -टुकडे कर देगें . अहीरन  के   काका  डालू राम अहीर ने तो सरेआम धमकी दी कि-चाहे मुझे जेल ही हो जाये, पर तुम्हारा तो बीज तक नष्ट कर दूगां. घबरा गये महाराज के मण्डपिया के दलित सालवी, उन्होनें हाथ पांव जोडे और कहां कि अगर हमारे लडके ने गलती की है तो हम सजा देगें उसे, ढूंढेगें, वापस लायेगें, पर अहीर तो मरने-मारने पर आमादा थे, वे पप्पू के नाना कालूलाल से पप्पू का फोटो तथा मोबाइल नं. 8094836138 लिखवाकर ले गये. इस बीच गांव में शांति रही, ना तो अहीरों ने पप्पू महाराज की कोइ जानकारी ली और ना ही कोई  पूछताछ की, नारायण अहीर जो कि गांव का ही निवासी है, उसने जरूर पप्पू के ननिहाल के घर आकर कहा कि तुम्हारा बच्चा 6 महीने तक नहीं आयेगा.

IMG-20140209-WA002कालूलाल को पप्पू का आखरी संदेश  भी यही मिला कि वह कहीं बाहर है और आइसक्रीम की लारियों पर काम करेगा, फिर लौट आयेगा, लेकिन गांव से गायब हुई  अहीर लडकी के बारे मे उसने कुछ भी नहीं बताया, अब महाराज की कुटिया खाली थी, ना गुरू था और ना ही चेली, अन्य शिष्य भी आते ना थे, सब कुछ पूर्ववत सामान्य हालातों में चल रहा था कि 11 जनवरी 2014 की रात करीब 12 बजे मण्डपिया के ही निवासी उदयलाल सालवी ने पप्पू के नाना कालूलाल के घर आकर जानकारी दी की उसे अभी खबर मिली है कि मेडीखेड़ा फाटक के पास एक लाश  मिली है जिसे पुलिसवाले पप्पू की बता रहे है. यह सुनकर पप्पू के परिवार में तो कोहराम मच गया, पप्पू के नाना कालूलाल की हालत पागलों जैसी हो गयी , गांव से पप्पू का मामा हीरालाल, नंदलाल, किशन  तथा पप्पू के पैतृक गांव आकोडिया से उसके पिता लादूलाल, मोहनलाल तथा भंवरलाल सालवी आदि घटना स्थल पर पहुंचे, उन्होनें मौके पर देखा कि पप्पू की लाश  के टुकडे हो गये है, उसका वह हाथ गायब था जिस पर उसका नाम गुदा हुआ था, एक पैर कटा हुआ था, उसके गुप्तांग बेरहमी से काट डाले गये थे, शरीर  पर जगह – जगह चोटों के निशान थे, प्रथम दृष्टया ही मामला हत्या का प्रतीत हो रहा था, लेकिन वहां मौजूद चंदेरियां थाने की पुलिस ने बताया कि इसने ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली है, घटना स्थल पर अहीरों की उक्त लडकी और पप्पू के फोटों तथा प्रेम पत्रनुमा सुसाइड नोट भी मिला है, पप्पू के परिजनों से पुलिस द्वारा खाली कागजों पर दस्तखत करवाने गये, पप्पू का शव लेकर उसके परिजन पैतक गांव आकोडिया पहुचें, जहां पर उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

मृतक के मामा हीरालाल सालवी द्वारा एक अर्जी पुलिस अधीक्षक को देकर पप्पू की हत्या की आशंका जताते हुए जांच की मांग की गई लेकिन इस प्रार्थना पत्र को पुलिस द्वारा सुना ही नहीं गया, क्योकि अहीर लडकी का मामा पुलिस में मुलाजिम है, बताया जाता है कि वह कोई कार्यवाही नहीं होने दे रहा है, जब मामला ही दर्ज नहीं हुआ तो प्रार्थी हीरालाल ने न्यायालय की शरण ली, इस्तगासे के जरिये अब जाकर मामला दर्ज किया गया है, लेकिन इज्जत के नाम पर, जाति के नाम पर प्रेम करने वालों की हत्या कर देना भारतीय समाज में मर्दानगी का काम माना जाता है, खास तौर पर अगर लडका दलित हो और लडकी सवर्ण हो तो उनका प्रेम नाकाबिले बर्दाश्त बात है. आखिर कोई  दलित लड़का किसी सवर्ण लडकी को शिष्या बनाये या प्यार करे, यह दुनिया के सबसे सहिष्णु सवर्ण हिन्दू समाज को कैसे सहन हो सकता है ?

वैलेन्टाइन डे का बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे इस देश  के लोगों से मुझे सिर्फ इतना सा कहना है कि प्रेम के देवता कृष्ण जो कि खुद एक अहीर थे, उसी के वंशज होने का दम भरने वाले अहीरों ने आज के इस कन्हैया को अपने ही हाथों से पूरी बेरहमी से मार डाला है, और अब कोई  कार्यवाही नहीं होने दे रहे है. अब सिर्फ सवाल ही सवाल है, जिनका कोई  जवाब नहीं है सब तरफ अजीब सी खामोशी  है, एक सर्द सा सन्नाटा है और मरघट की डरावनी शांति फैल रही है, क्योकि हर युग में प्रेम करने की सजा सिर्फ मौत होती है, चाहे वह कबीलाई  तालिबान के हाथों हो या जाति, गौत्र की खांप पंचायतों के द्वारा, प्रेमियों को तो मरना ही है ताकि प्रेम जिन्दा रह सके.

क्या ठगी का धंधा चल रहा है शॉप क्लूज़ पर…

आज भारत पूरे विश्व में सभी बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए सबसे पसंदीदा बाजार के रूप उभर के सामने आया है. आज हमारे देश में सभी कंपनियां अपना उत्पाद बेचना चाहती हैं और बेचती भी हैं. वर्तमान युग इंटरनेट का है और इंटरनेट की उपयोगिता को इन सभी कंपनियों ने खूब समझा है. लेकिन इंटरनेट की इस शक्ति का इस्तेमाल इन कंपनियों के उत्पाद को बेचने के लिए इनसे ज्यादा अगर किसी ने उपयोग किया है तो वो हैं सामान बेचने वाली वेब साइट्स.ShopClues home

आज आपको इंटरनेट की इस अनंत दुनिया में तमाम ऐसी वेब साइट्स मिल जाएंगी जो कि इन सभी बड़ी-बड़ी कंपनियों का उत्पाद बेचती हैं. मसला केवल सामान बेचने तक का नहीं है, बल्कि आपको जो सामान खुदरा बाजार में 1000 रुपए में मिलेगा, इस प्रकार की सामान बेचने वाली साइट्स आपको वही सामान 300 रुपए में आपके घर तक पहुंचाएगी. अब ऐसे में मन में एक ख्याल आता है कि ऐसा कैसे मुमकिन है कि जो सामान हमें बाजार में 1000 रुपए में मिल रहा है, और वही सामान हमें इस प्रकार की वेब साइट्स बड़े ही औने-पौने दामों में देने का दावा करती है. केवल दावा ही नहीं बल्कि सामान भी देती हैं, पर इनके दामों में इतना अंतर कैसे रहता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि देश में इस प्रकार की सामान बेचने वाली वेब साइट्स ने नकली माल बेच कर लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाना शुरू कर दिया है?

मीडिया दरबार अब इस धंधे के पीछे छूपे राज को सबके सामने लाने की एक कोशिश कर रहा है. मीडिया दरबार ने एक ऐसे ही वेब साइट को खोज के निकाला जो खुद को भारत की अकेली व्यवस्थित मार्केट प्लेस बताने का दावा करती है और यह साइट है “शॉप क्लूज़”. मीडिया दरबार ने जब इस वेब साइट की छान-बीन की तो यह पाया, २०११ में लांच हुई शॉप क्लूज़ ने जल्द मशहूर होने के लिए क्रैकर डील, संडे फ्ली मार्केट और ज़ा ड्रोपिंग डील जैसे ललचा देने वाले ऑफर दिए. इन ऑफ़र में सौ सवा सौ रुपए की वस्तु तीस-चालीस रूपए और उन्नीस या चौबीस रुपए शिपिंग चार्जेज में घर बैठे उपलब्ध करवाना शुरू किया. जो कि अपने वास्तविक मूल्य से आधी से कम कीमत में हासिल होने लगी. शॉप क्लूज़ इन ऑफ़र के ज़रिए ऑनलाइन ग्राहकों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हो गया और दूरदराज के शहरों में बैठे खरीददार शॉप क्लूज़ से अन्य उत्पाद भी खरीदने लगे.

साठ कर्मचारियों के बूते चल रहे इस पोर्टल पर यकायक इतने खरीददार आ गए कि शॉप क्लूज़ के करता-धर्ताओं से इसे व्यवस्थित रखना ही मुश्किल हो गया. जैसे-जैसे शॉप क्लूज़ की प्रसिद्धि बढ़ी तो कई शहरों से फुटकर विक्रेता भी शॉप क्लूज़ से जुड़ते गए और इनकी संख्या हजारों में जा पहुंची. मगर इन विक्रेताओं पर शॉप क्लूज़ का कोई नियंत्रण नहीं है और इसी का फायदा उठा कर अधिकांश विक्रेता शॉप क्लूज़ से खरीददारी करने वालों को अलग-अलग तरीकों से चूना लगा रहे हैं. इनकी शिकायत करने पर शॉप क्लूज़ द्वारा इन ठग और धोखेबाज़ विक्रेताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं की जाती है. यहाँ तक कि शॉप क्लूज़ पर किसी भी नामचीन कम्पनी के महंगे ब्रांड का नकली सामान बिकना आम बात है.

कुछ ग्राहकों की तो शिकायत यहाँ तक है कि विक्रेता के सेल्स पेज पर स्टॉक में बताया गया उत्पाद उसके पास होता ही नहीं है और आर्डर एकत्र होने के बाद इधर-उधर से उत्पाद का इंतजाम किया जाता है. जो कि सेल्स पेज पर दिखाए गए उत्पाद से परे होता है और क्वालिटी भी घटिया होती है. यही नहीं हमने स्वयं इस वेब साइट से एक सामान मंगवाया जिसका ऑडर संख्या 8265977 को पहले तो प्रोसेस ही नहीं किया गया और जब हमने इसकी शिकायत की तो हमें बताया गया कि हमारा ऑर्डर कोरियर से भेज दिया गया है और तो और हमें एक फर्जी ट्रैकिंग नम्बर भी दे दिया गया. जब इसकी शिकायत की गई तो खुद शॉप क्लूज़ ने माना कि ऐसा हो गया है.
(जारी)

संघ प्रमुख मोहन भागवत के समर्थन से किये थे असीमानंद ने बम धमाके…

कारवां पत्रिका ने बड़ा खुलासा करते हुए बुधवार को दावा किया है कि मुस्लिम इलाकों में बम धमाकों की न केवल जानकारी ही संघ प्रमुख मोहन भागवत को थी, बल्कि इन बम धमाकों को करने के लिए भागवत का पूरा समर्थन भी था. समझौता ब्लास्ट मामले में मुख्य आरोपी स्वामी असीमानंद से बातचीत के आधार पर पत्रिका ने यह दावा किया है.asimanand

mohan bhagwatकारवां पत्रिका के मुताबिक मुस्लिम इलाकों में जो भी धमाके हुए हैं उसकी मंजूरी खुद मौजूदा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दी थी. पत्रिका के मुताबिक इस मामले में असीमानंद ने मोहन भागवत के साथ संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार का भी नाम लिया है. असीमानंद के एक साक्षात्कार के आधार पर कारवां मैगजीन ने यह खुलासा किया गया है. कारवां मैगजीन ने दावा किया है कि उसके पास इस साक्षात्कार का ओडियो टेप भी उपलब्ध है. उधर, संघ ने इस साक्षात्कार को बेबुनियाद एवं गलत करार दिया है. वहीं, असीमानंद के वकील ने भी इस बात से इन्कार किया.

गौरतलब है कि असीमानंद पर साल 2006 से 2008 के बीच समझौता एक्सप्रेस धमाका, हैदराबाद मक्का मस्जिद धमाका, अजमेर दरगाह और मालेगांव में दो धमाके के आरोप लगे हैं. इन धमाकों में कुल 119 लोग मारे गए थे.

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On Linkedin