Share this on WhatsApp
Subscribe to RSS
कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

अपराध back to homepage

दलित RTI कार्यकर्ता पर हुआ जानलेवा हमला.. दलित RTI कार्यकर्ता पर हुआ जानलेवा हमला..(0)

दलित कार्यकर्ता के बाल काटे और जबरन पिशाब पिलाया.. भूमाफियों के साथ लड़ रहा था लड़ाई.. रामगढ कस्बे का मामला..

 

-सिकन्दर शेख़॥

जैसलमेर, पूरे देश में एक और जहां पत्रकारों पर हमले बढ़ गए हैं वहीँ RTI कार्यकर्ताओं पर भी जानलेवा हमलों की ख़बरें सुनने को मिल रही है. उसी कड़ी में आज जैसलमेर के रामगढ़ कस्बे में बाबुराम चौहान नाम के एक दलित शिक्षक और RTI कार्यकर्ता पर भूमाफियों ने जानलेवा हमला कर उसकी टाँगे तोड़ दी साथ ही उसके बाल काट कर उसको जबरन पेशाब भी पिलाया गया. पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है.

बाबुराम काफी वक़्त से रामगढ़ कस्बे में भूमाफियों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था. आज हुए जानलेवा हमले में वो गंभीर रूप से घायल हो गया तथा उसको तत्काल रामगढ़ से जैसलमेर रेफर किया गया जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसको गुजरात रेफर कर दिया गया. घटना की गम्भीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक राजीव पचार अस्पताल पहुंचे और बाबू राम से घटना की जानकारी ली. पीसीसी सचिव रूपा राम धनदेव , उम्मेद सिंह तंवर और जिला प्रमुख जैसलमेर अंजना मेघवाल भी अस्पताल पहुंची तथा बाबु राम के हाल चाल जाने तथा साथ ही बड़ी संख्या में RTI कार्यकर्ता वहाँ इकठे हुए तथा इस हमले की निंदा की तथा साथ ही RTI कार्यकर्ताओं को पुलिस सुरक्षा देने की मांग भी की. RTI कार्यकर्ता अशोक भाटी ने बताया कि इन हमलों की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है क्योंकि RTI कार्यकर्ता को पुलिस सुरक्षा देना ज़रूरी है मगर यहाँ इस तरह के हालत है फिर भी कोई नहीं सुनता है.
घटना की जानकारी देते बाबु राम ने बताया कि वो काफी समय से इन भूमाफियों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है तथा उसको बार बार धमकी भी मिलती रही थी मगर आज उन लोगों ने नकाब दाल मुझ पर हमला किया तथा मेरे बाल काटे मुझे जबरन पेशाब भी पिलाया और मेरे पैर तोड़ डाले , लेकिन मैं बच गया हूँ और आगे भी इस तरह की मुहीम चलता रहूँगा मैं डरने वाला नहीं हूँ.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
समझ में नहीं आ रहा है कि यह मौत है या नौटंकी.. समझ में नहीं आ रहा है कि यह मौत है या नौटंकी..(0)

-कुमार सौवीर॥
कोई बता रहा है कि जेल में उम्रकैद काट रहे ऐयाश नेता अमरमणि त्रिपाठी की बहू सारा का कत्‍ल किया गया है, जबकि सारा का मामा सत्‍येंद्र सिंह रघुवंशी, जो प्रदेश का गृह सचिव भी है, ऐलान कर रहा है कि यह एक महज सड़क-दुर्घटना का मामला है। हैरत की बात है कि दुर्घटना के वक्‍त सारा पिछली सीट पर थी और अमनमणि कार चला रहा था। आखिर क्‍यों। पति-पत्‍नी के बीच क्‍या कलह चल रहा था। कई बार पलटी कार में सारा तो बुरी तरह कुचल गयी, जबकि अमन का बाल तक बांका नहीं हुआ।
हालांकि यह मौत दर्दनाक हुई है, लेकिन इसका दिलचस्‍प पहलू यह है कि अमनमणि के चाचा ने ऐलान कर इस मामले को चकरघिन्‍नी बना दिया है कि सारा और अमन के बीच पति-पत्‍नी का रिश्‍ता था ही नहीं। खैर, उधर सारा की मौत के बाद उसके पति अमनमणि को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि यह गिरफ्तारी गोरखपुर में कई महीनों पहले हुई एक अपहरण के मामले में हुई है जिसमें अमनमणि फरार चल रहा था।
यानी कड़ी दर कड़ी।
पहले समझ लीजिए कि इन दोनों के खानदानों और उनके बीच का लफडा क्‍या है। सारा ठाकुर परिवार की बेटी है,जबकि अमन अमरमणि त्रिपाठी का बेटा है। समाजवादी पार्टी के वरिष्‍ठ नेता रह चुके अमरमणि और मधुमणि पिछले लम्‍बे से एक गर्भवती कवियत्री मधुमति की हत्‍या के मामले में उम्रकैद काट रहे हैं। बताते हैं कि अमरमणि और मधुमणि ने अपने बेटे अमनमणि से साफ कहा था कि वह सारा को अपनी बहू के तौर पर मान्‍यता नहीं देगा।
दूसरी ओर ठाकुर परिवार की होने के चलते अमनमणि को भी उस परिवार में दिक्‍कत होती थी। यानी यह सारा झगड़ा-टंटा सदियों पुराने ठाकुर-बाभन का हो चुका था। सत्‍येन्‍द्र सिंह रघुवंशी का बयान इस पूरे मामले को जस का तस बहाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है जबकि अमनमणि के चाचा श्‍यामनरायण तिवारी का बयान बेहद बेचैनी पैदा करता है। उसका कहना है कि इन की शादी हुई ही नहीं थी। यानी शोले भले ही नहीं दिख पा रहे हों, लेकिन उनके भीतर की तपिश बेहिसाब है।
खासतौर पर तब, जबकि एक कार में यह दोनो मौजूद थे, लेकिन आगे-पीछे की सीट पर। एक को खरोंच तक नहीं आयी, जबकि दूसरे को असंख्‍य चोटें लगीं।
अब आखिरी बात। गोरखपुर में एक सनसनीखेज़ अपहरण का मामला था अमन पर। लेकिन वह पूरे देश-प्रदेश में फर्राटा भरता रहा था। पुलिस की हिम्‍मत तक नहीं थी कि अमनमणि पर हाथ छोड़े। कारण यह है कि सारा का मामा सत्‍येन्‍द्र कुमार रघुवंशी प्रदेश के गृह सचिव की कुर्सी पर काबिज है। जैसे ही सारा गयी, पुलिस ने मामला खोल लिया और अमन अंदर।
धन्‍य है हमारे यूपी की पुलिस, धन्‍य हैं

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
“चलिए, छेड़ दें “ना” कहने के अधिकार का आन्‍दोलन.. “चलिए, छेड़ दें “ना” कहने के अधिकार का आन्‍दोलन..(0)

 

-कुमार सौवीर॥

लखनऊ: मोहनलालगंज में एक साल पहले एक युवती की पाशविक हत्‍या के बाद अब यूपी में बर्बरता पूर्वक मारी गयीं महिलाओं नंगी लाशों का सिलसिला बिखेर दिया है। पुलिस के आला अफसरों ने इस मामले को दबाने की साजिश की और इसके लिए नंगे झूठ की एक आलीशान इमारत खड़ा करने की कोशिश में लगा दी गयीं पुलिस की एक महानिदेशक सुतापा सान्‍याल। असल काण्‍ड को दरकिनार कर उन्‍होंने एक झूठी कानी बना दी। नतीजा यह कि उसके बाद अकेले लखनऊ में ही आधा दर्जन से ज्‍यादा युवतियों को नृशंस कर उनकी नंगी लाशों में तब्‍दील कर दिया गया।
आपको बता दें कि मोहनलालगंज के मारी गयी उस युवती दो बच्‍चों की मां थी, जिसका बड़ा बच्‍चा 7 साल का था, बेटी की उम्र 5 साल। पति का देहान्‍त गुर्दा की बीमारी में हुआ था, जिसे बचाने के लिए उसने अपना एक गुर्दा भी दान दे दिया था। वह युवती पीजीआई में ठेकेदारी पर चल रही लैब की कर्मचारी थी। वेतन पांच हजार। लेकिन कई महीनों तक वेतन नहीं देता था वह ठेकेदार। ऐसे में वह युवती कभी-कभी अपना शरीर तक बेचने पर मजबूर हो जाती थी, परिवार काे पालने के लिए।
जिस दिन उसकी हत्‍या हुई, उसे उसके ग्राहक ने महज चार सौ रूपयों के लिए अपनी देह का सौदा किया था। एक ग्राहक के लिए। लेकिन मुझे मिली सूचनाओं के अनुसार जब वहां मौके पर पहुंची तो वहां कई लोग मौजूद थे। उस युवती ने यह सौदा खारिज कर दिया और वापस लौटने लगी। इस पर वहां मौजूद लोगों ने उस पर जुल्‍म ढाना शुरू कर दिया। मारा-पीटा, नोंचा-खसोटा। और दरिंदगी का आलम यह तक रहा कि कम से दो हत्‍यारों ने उसकी टांग खींच कर झटके देकर कर वहां लगे इंडिया मार्क-टू का हत्‍था उसके जननांग में घुसेड़ दिया। जाहिर है कि इस असह्य पीडा को वह सहन नहीं कर पायी और उसकी मौत हो गयी।
लेकिन इसके बाद कई बड़े अफसरों ने असल काण्‍ड पर पर्दा डालने के लिए सुतापा सान्‍याल की आड़ ली। सुतापा को किसी दारोगा की तरह पेश किया और मीडिया को झुठ का पुलिन्‍दा थमा दिया। सुतापा पुलिस के आला अफसरों में एक हैं। उनके पास अपर मुख्‍य सचिव के अनुरूप हैसियत है।लेकिन वे केवल अपने सम्‍मान, वैभव और ऐश्‍वर्य तक ही सीमित रहीं। यह जानते हुए भी उन्‍हें एक
घिनौने मोहरे में तबदील किया जा रहा है, उन्‍होंने उफ तक नहीं किया और अपने आला अफसरों की जी-हुजूरी में ही जुटी रही। किसी बेहूदा रट्टू-ताेता की तरह। नतीजा यह हुआ कि एक साल के भीतर ही करीब आधा दर्जन युवतियों की लाशें राजधानी लखनऊ कें जहां-तहां बिखेर दी गयीं।
हे ईश्‍वर।
मैंने इस युवती को अपनी मेरी बिटिया क दर्जा दे दिया है। मेरे पास इसके लिए पुख्‍ता कारण-तर्क भी हैं। कम से कम उसने अपनी देह के बारे में स्‍वतंत्र सोचने और फैसले का प्रयोग किया। वह अडिग रही अपने फैसले पर,तनी रही अपनी रीढ़-मेरूदण्‍ड पर। खुद को झुकाया नहीं, भले ही प्राण निकल गये।
मैं आपसे पूछता हूं कि क्‍या आपके पास इतना जिगरा है? बहुत दूर जाने की भी कोई जरूरत नहीं, आप अपने आसपास ही टटोल लीजिए। केंचुए की तरह बिलबिलाते हुए इंसान हमेशा गिड़गिड़ाते ही दिख जाएंगे।
एक सामाजिक कार्यकर्ता विनीता सहगल का कहना है कि:- “उस युवती ने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग किया था। और इस अधिकार के लिए उसने जान तक दे दी। अब हमारे समाज में झांकिये ना, कि कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो अपनी “ना” के अधिकार को लेकर अपनी आवाज उठा सकती हैं, उसके लिए लड़ पड़ना या जान दे देना तो बहुत कोसों दूर की बात है। मेरी नजर में तो वह युवती तो स्‍त्री-सशक्‍तीकरण की श्रेष्‍ठतम जीवन्‍त घटना है।”
अब यहां कई सवाल हैं दोस्‍तों। वाकई, उस बिटिया ने अपने बाल-बच्‍चों जैसी घरेलू मजबूरी के चलते खुद के शरीर को एक दिन महज 400 रूपयों के लिए बेचना का सौदा किया, लेकिन केवल एक ग्राहक के लिए। जब उसने देखा कि वहां कई नर-पिशाच मौजूद हैं, तो उसने अपने ना के अधिकार का तत्‍काल प्रयोग कर लिया और उसी अधिकार के लिए प्राणोत्‍सर्ग कर दिया। उस पर नारकीय
जुल्‍म-सितम ढाते गये, लेकिन उसने अपने अधिकार के पालन में ऊफ तक नहीं किया।
अपने अधिकार के लिए जान तक लुटा देने वाली महिला, कम से कम मुझे तो अब तक नहीं मिली। मैं तो सैल्‍यूट करता हूं। मेरी नजर में तो वह बिलकुल भारत-रत्‍न से कम नहीं। इसीलिए तो मैं उसे अपनी मेरी बिटिया कहता हूं।
अब, असल सवाल पर आते हैं। महज पांच हजार रूपया पर महीना काटने वाले पुलिस महानिदेशक सुतापा सान्‍याल ने अपने एक भी अधिकार का इस्‍तेमाल नहीं किया। है कि नहीं? वह केवल अपने उच्‍चाधिकारी-उच्‍चाधिकारियों और आकाओं के हुक्‍म का ही पालन करती रहीं। आपसे कहा गया कि जाओ और इस मामले में साफ झूठ बोल दो मीडिया के सामने। और आपने ऐसा कर दिया बेहिचक। जबकि वे जानती थीं कि जो भी कराया जा रहा है, वह बिलकुल झूठ है और अपराध है। और ऐसे झूठ युगों की सत्‍यता को कलंकित कर देते हैं।
मगर उस मेरी बिटिया ने ऐसा नहीं किया था।उसने आखिरी दम तक संघर्ष किया। भले ही उसकी जान चली गयी। जबकि सुतापा सान्‍याल ने अवांछित, आपराधिक और षडयंत्री किलाबंदी में खुद को एक मोहरा ही बनना पसन्‍द किया, अपने “ना” अधिकार का कत्‍तई प्रयोग नहीं। इस पूरे दर्दनाक हादसे के बावजूद उन्‍होंने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग नहीं किया। अगर कर लेतीं तो आज
वे स्‍त्री-सशक्‍तीकरण और महिला सम्‍मान की शिखर-पुरूष बन जाती होतीं।
और कहां वह दो-कौडी की मेरी बिटिया, जिसने औरत की खुद्दारी का एक नया आयाम-अध्‍याय लिखने के लिए अपना प्राण दे दिया। अब अपने बारे में आप खुदतय कर लीजिएगा, मगर इस मेरी बिटिया को मैं भारत-रत्‍न से श्रेष्‍ठ मानता हूं।
मेरी बिटिया जिन्‍दाबाद।
जाहिर है कि कोई भी नागरिक अब सुतापा सान्‍याल को अपना आदर्श नहीं मानेगी। इसीलिए मैं अब खोजना चाहता हूं ऐसे अफसरों को, जिन्‍होंने खुद को बिक जाने के बजाय अपने होने को साबित किया। भारी दुश्‍वारियों के बावजूद अपना पक्ष बिलकुल साफ रखा। इसमें से कुछ ने तो इसकी भारी कीमत भी चुकाई,लेकिन अडिग रहे। हमेशा। सिर तान कर।
हमारा यह अभियान आज से शुरू हो चुका है। नाम है:- “ना” कहने का अधिकार आन्‍दोलन। हम चाहते है कि इस अभियान कम से कम 20 जुलाई तक जरूर चले, जब एक आला शासकीय नौकर सुतापा सान्‍याल ने इस काण्‍ड को भयंकर विद्रूप शक्‍ल में तब्‍दील कर दिया था। इस अभियान में हम आपको रोजाना यह भी बतायेंगे कि किस तरह बड़े सरकारी नौकर अपने आकाओं की हां में खुद को खत्‍म कर देते हैं, और कैसे चंद लोग अपने ना कहने के अधिकार का प्रयोग कर खुद को
प्रकाश-स्‍तम्‍भ के तौर पर दमकते दिख जाते हैं।”
चलिए, छेड़ दें “ना” कहने के अधिकार का आन्‍दोलन
आला पुलिस अफसर की हां ने बिखेर दीं यूपी की बेटियों की नंगी लाशें
सरकारी कार्यशैली से गुम होता जा रहा है “ना” का आधिकार
दैनिक तरूणमित्र ने थाम लिया है इस आंदोलन का परचम
अब कम से कम एक महीने तक खुलासा होगी इस आंदोलन पर चर्चा

कुमार सौवीर

लखनऊ: मोहनलालगंज में एक साल पहले एक युवती की पाशविक हत्‍या के बाद अब यूपी में बर्बरता पूर्वक मारी गयीं महिलाओं नंगी लाशों का सिलसिला बिखेर दिया है। पुलिस के आला अफसरों ने इस मामले को दबाने की साजिश की और इसके लिए नंगे झूठ की एक आलीशान इमारत खड़ा करने की कोशिश में लगा दी गयीं पुलिस की एक महानिदेशक सुतापा सान्‍याल। असल काण्‍ड को दरकिनार कर उन्‍होंने एक झूठी कानी बना दी। नतीजा यह कि उसके बाद अकेले लखनऊ में ही आधा दर्जन से ज्‍यादा युवतियों को नृशंस कर उनकी नंगी लाशों में तब्‍दील कर दिया गया।
आपको बता दें कि मोहनलालगंज के मारी गयी उस युवती दो बच्‍चों की मां थी, जिसका बड़ा बच्‍चा 7 साल का था, बेटी की उम्र 5 साल। पति का देहान्‍त गुर्दा की बीमारी में हुआ था, जिसे बचाने के लिए उसने अपना एक गुर्दा भी दान दे दिया था। वह युवती पीजीआई में ठेकेदारी पर चल रही लैब की कर्मचारी थी। वेतन पांच हजार। लेकिन कई महीनों तक वेतन नहीं देता था वह ठेकेदार। ऐसे में वह युवती कभी-कभी अपना शरीर तक बेचने पर मजबूर हो जाती थी, परिवार काे पालने के लिए।
जिस दिन उसकी हत्‍या हुई, उसे उसके ग्राहक ने महज चार सौ रूपयों के लिए अपनी देह का सौदा किया था। एक ग्राहक के लिए। लेकिन मुझे मिली सूचनाओं के अनुसार जब वहां मौके पर पहुंची तो वहां कई लोग मौजूद थे। उस युवती ने यह सौदा खारिज कर दिया और वापस लौटने लगी। इस पर वहां मौजूद लोगों ने उस पर जुल्‍म ढाना शुरू कर दिया। मारा-पीटा, नोंचा-खसोटा। और दरिंदगी का आलम यह तक रहा कि कम से दो हत्‍यारों ने उसकी टांग खींच कर झटके देकर कर वहां लगे इंडिया मार्क-टू का हत्‍था उसके जननांग में घुसेड़ दिया। जाहिर है कि इस असह्य पीडा को वह सहन नहीं कर पायी और उसकी मौत हो गयी।
लेकिन इसके बाद कई बड़े अफसरों ने असल काण्‍ड पर पर्दा डालने के लिए सुतापा सान्‍याल की आड़ ली। सुतापा को किसी दारोगा की तरह पेश किया और मीडिया को झुठ का पुलिन्‍दा थमा दिया। सुतापा पुलिस के आला अफसरों में एक हैं। उनके पास अपर मुख्‍य सचिव के अनुरूप हैसियत है।लेकिन वे केवल अपने सम्‍मान, वैभव और ऐश्‍वर्य तक ही सीमित रहीं। यह जानते हुए भी उन्‍हें एक
घिनौने मोहरे में तबदील किया जा रहा है, उन्‍होंने उफ तक नहीं किया और अपने आला अफसरों की जी-हुजूरी में ही जुटी रही। किसी बेहूदा रट्टू-ताेता की तरह। नतीजा यह हुआ कि एक साल के भीतर ही करीब आधा दर्जन युवतियों की लाशें राजधानी लखनऊ कें जहां-तहां बिखेर दी गयीं।
हे ईश्‍वर।
मैंने इस युवती को अपनी मेरी बिटिया क दर्जा दे दिया है। मेरे पास इसके लिए पुख्‍ता कारण-तर्क भी हैं। कम से कम उसने अपनी देह के बारे में स्‍वतंत्र सोचने और फैसले का प्रयोग किया। वह अडिग रही अपने फैसले पर,तनी रही अपनी रीढ़-मेरूदण्‍ड पर। खुद को झुकाया नहीं, भले ही प्राण निकल गये।
मैं आपसे पूछता हूं कि क्‍या आपके पास इतना जिगरा है? बहुत दूर जाने की भी कोई जरूरत नहीं, आप अपने आसपास ही टटोल लीजिए। केंचुए की तरह बिलबिलाते हुए इंसान हमेशा गिड़गिड़ाते ही दिख जाएंगे।
एक सामाजिक कार्यकर्ता विनीता सहगल का कहना है कि:- “उस युवती ने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग किया था। और इस अधिकार के लिए उसने जान तक दे दी। अब हमारे समाज में झांकिये ना, कि कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो अपनी “ना” के अधिकार को लेकर अपनी आवाज उठा सकती हैं, उसके लिए लड़ पड़ना या जान दे देना तो बहुत कोसों दूर की बात है। मेरी नजर में तो वह युवती तो स्‍त्री-सशक्‍तीकरण की श्रेष्‍ठतम जीवन्‍त घटना है।”
अब यहां कई सवाल हैं दोस्‍तों। वाकई, उस बिटिया ने अपने बाल-बच्‍चों जैसी घरेलू मजबूरी के चलते खुद के शरीर को एक दिन महज 400 रूपयों के लिए बेचना का सौदा किया, लेकिन केवल एक ग्राहक के लिए। जब उसने देखा कि वहां कई नर-पिशाच मौजूद हैं, तो उसने अपने ना के अधिकार का तत्‍काल प्रयोग कर लिया और उसी अधिकार के लिए प्राणोत्‍सर्ग कर दिया। उस पर नारकीय
जुल्‍म-सितम ढाते गये, लेकिन उसने अपने अधिकार के पालन में ऊफ तक नहीं किया।
अपने अधिकार के लिए जान तक लुटा देने वाली महिला, कम से कम मुझे तो अब तक नहीं मिली। मैं तो सैल्‍यूट करता हूं। मेरी नजर में तो वह बिलकुल भारत-रत्‍न से कम नहीं। इसीलिए तो मैं उसे अपनी मेरी बिटिया कहता हूं।
अब, असल सवाल पर आते हैं। महज पांच हजार रूपया पर महीना काटने वाले पुलिस महानिदेशक सुतापा सान्‍याल ने अपने एक भी अधिकार का इस्‍तेमाल नहीं किया। है कि नहीं? वह केवल अपने उच्‍चाधिकारी-उच्‍चाधिकारियों और आकाओं के हुक्‍म का ही पालन करती रहीं। आपसे कहा गया कि जाओ और इस मामले में साफ झूठ बोल दो मीडिया के सामने। और आपने ऐसा कर दिया बेहिचक। जबकि वे जानती थीं कि जो भी कराया जा रहा है, वह बिलकुल झूठ है और अपराध है। और ऐसे झूठ युगों की सत्‍यता को कलंकित कर देते हैं।
मगर उस मेरी बिटिया ने ऐसा नहीं किया था।उसने आखिरी दम तक संघर्ष किया। भले ही उसकी जान चली गयी। जबकि सुतापा सान्‍याल ने अवांछित, आपराधिक और षडयंत्री किलाबंदी में खुद को एक मोहरा ही बनना पसन्‍द किया, अपने “ना” अधिकार का कत्‍तई प्रयोग नहीं। इस पूरे दर्दनाक हादसे के बावजूद उन्‍होंने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग नहीं किया। अगर कर लेतीं तो आज
वे स्‍त्री-सशक्‍तीकरण और महिला सम्‍मान की शिखर-पुरूष बन जाती होतीं।
और कहां वह दो-कौडी की मेरी बिटिया, जिसने औरत की खुद्दारी का एक नया आयाम-अध्‍याय लिखने के लिए अपना प्राण दे दिया। अब अपने बारे में आप खुदतय कर लीजिएगा, मगर इस मेरी बिटिया को मैं भारत-रत्‍न से श्रेष्‍ठ मानता हूं।
मेरी बिटिया जिन्‍दाबाद।
जाहिर है कि कोई भी नागरिक अब सुतापा सान्‍याल को अपना आदर्श नहीं मानेगी। इसीलिए मैं अब खोजना चाहता हूं ऐसे अफसरों को, जिन्‍होंने खुद को बिक जाने के बजाय अपने होने को साबित किया। भारी दुश्‍वारियों के बावजूद अपना पक्ष बिलकुल साफ रखा। इसमें से कुछ ने तो इसकी भारी कीमत भी चुकाई,लेकिन अडिग रहे। हमेशा। सिर तान कर।
हमारा यह अभियान आज से शुरू हो चुका है। नाम है:- “ना” कहने का अधिकार आन्‍दोलन। हम चाहते है कि इस अभियान कम से कम 20 जुलाई तक जरूर चले, जब एक आला शासकीय नौकर सुतापा सान्‍याल ने इस काण्‍ड को भयंकर विद्रूप शक्‍ल में तब्‍दील कर दिया था। इस अभियान में हम आपको रोजाना यह भी बतायेंगे कि किस तरह बड़े सरकारी नौकर अपने आकाओं की हां में खुद को खत्‍म कर देते हैं, और कैसे चंद लोग अपने ना कहने के अधिकार का प्रयोग कर खुद को
प्रकाश-स्‍तम्‍भ के तौर पर दमकते दिख जाते हैं।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
आर्डर किया था चिकन, KFC ने पकड़ा दिया चूहा फ़्राय.. आर्डर किया था चिकन, KFC ने पकड़ा दिया चूहा फ़्राय..(0)

लॉस एंजिलिस के पास वॉट्स में रहने वाले डेवारिस डिक्सन ने दुनियाभर में मशहूर फूड चेन केएफसी से आर्डर तो किया था चिकन टेंडर्स का, लेकिन उन्हें मिला तला हुआ चूहा.
वायरल हुई तस्वीर
डिक्सन ने इस चूहे की दो तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट की, जो वायरल हो गई. इसे एक लाख से ज्यादा बार शेयर किया जा चुका है. उन्होंने कहा, मैं वापस गया और केएफसी मैनेजर को इस बारे में बताया। उसने स्वीकार किया कि यह फ्राइड चूहा है। मैनेजर ने मुझे मुफ्त में खाना ऑफर किया, लेकिन मैंने इनकार कर दिया.’ डिक्सन का कहना है कि कि उन्होंने वकील हायर कर लिया है और वह अब कंपनी पर केस करेंगे.

केएफसी ने आरोपों से किया इनकार
हालांकि केएफसी ने सफाई दी है, ‘हमने ग्राहक से संपर्क करने के कई प्रयास किए, लेकिन उन्होंने हमसे खुद या अपने वकील के जरिए बात करने से इनकार कर दिया. हमारे चिकन टेंडर्स कई साइजों और शेप में होते हैं और फिलहाल हमारे पास उनके आरोपों को सही साबित करने के लिए सबूत नहीं हैं.

पहले दी थी ये सफाई
हालांकि पहले केएफीसी ने सफाई दी थी, ‘हम ग्राहकों के दावे को पूरी गंभीरता से लेते हैं और हम इस मामले की लगातार जांच कर रहे हैं.

 

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
मंत्री राममूर्ती वर्मा से भिड़ने की सजा पायी पत्रकार जगेंद्र सिंह ने.. मंत्री राममूर्ती वर्मा से भिड़ने की सजा पायी पत्रकार जगेंद्र सिंह ने..(0)

निर्भीक पत्रकारिता के चलते जगेंद्र सिंह की चल रही मंत्री से तनातनी.. निष्पक्ष जाँच होने पर पूरा मामला हो जायेगा साफ़..

शाहजहाँपुर। सोशल मीडिया में बेबाक खबरों के लिए पहचाने जाने वाले ईमानदार पत्रकार जगेंद्र सिंह को सूबे के मंत्री राममूर्ती सिंह वर्मा के खिलाफ सच खबरे छापना महगा पड़ गया। नर्भिक पत्रकारिता के चलते पहले उनके ऊपर हमला किया गया फिर फर्जी रिपोर्ट दर्ज की गई और फिर दबिश देने के बहाने पुलिस ने पैट्रोल डालकर उन्हें जला दिया। आज दोपहर लखनऊ में इलाज के दौरान पत्रकार जगेंद्र सिंह ने अंतिम साँस ली और यहाँ मंत्री राममूर्ती सिंह वर्मा के खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गई।
मूलतः खुटार के मोहल्ला कोट निवासी जगेंद्र सिंह ने करीब 15 साल पहले पत्रकारिता जगत में पदार्पण किया था। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में जो कदम बढ़ाया तो कभी मुड़कर नही देखा। अपनी निर्भीक पत्रकारिता के बल पर उन्होंने अमर उजाला, हिंदुस्तान, स्वतन्त्र भारत जैसे नामी गिरामी अखबारों में काम किया। अखबारों के साथ ही जगेंद्र सिंह फेसबुक पर निष्पक्ष और निर्भीक होकर खबरों पोस्ट करने लगे। उन्होंने इलेक्ट्रिक मीडिया से पहले ही खबरों को जनता के बीच पहुचाया। अपनी इसी छवि के चलते जगेंद्र सिंह का विवादों से नाता भी गहराता चला गया। पिछले कुछ माह से जगेंद्र सिंह द्वारा सूबे के पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री राममूर्ती सिंह वर्मा के खिलाफ खूब खबरे लिखीं गई। यह खबरे उन्होंने सपा नेता और पूर्व विधायक देवेन्द्र पाल सिंह के द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र के आधार पर लिखी थीं। मंत्री के खिलाफ खबरे छापने को लेकर उनके ऊपर 28 अप्रैल को देर शाम कार्यालय से घर जाते समय जानलेवा हमला किया गया जिसमे वह बाल बाल बच गए, मगर उनके पैर में फैक्चर हो गया था। इस घटना की उन्होंने रिपोर्ट भी दर्ज करवाई थी, लेकिन हमले के पीछे मंत्रीके गुर्गो का हाथ होने के शक में पुलिस ने हमलावरों को भी पकड़ा। इस बीच एक युवक द्वारा जगेंद्र सिंह के ऊपर झूठी 307 की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई। इस मामले के पीछे भी मंत्री का नाम चर्चा में आया। इसके बाद तो पुलिस जगेंद्र सिंह के पीछे ऐसी पड़ी की जैसे किसी चम्बल के डाकू को पकड़ना हो। 1 जून को तत्कालीन शहर कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने उनके घर दबिश दी। इस बीच गिरफ़्तारी में नाकाम कोतवाल ने जगेंद्र सिंह के ऊपर पेट्रोल डालकर उन्हें आग लगा दी। यह बात जगेंद्र सिंह ने अपने बयानों में कही थी। करीब 65 प्रतिशत जले जगेंद्र सिंह को जिला अस्पताल से लखनऊ रेफर किया गया। जहाँ आज आठवे दिन उन्होंने दम तोड़ दिया।
जगेंद्र सिंह को मंत्री से भिड़ने की कीमत चुकानी पड़ी है। यदि वह मंत्री के खिलाफ खबरे न डालते या फिर आर्थिक समझौता कर लेते तो आज उनको यह दिन नही देखना पड़ता। अगर जगेंद्र सिंह की मौत की निष्पक्ष जाँच हुई तो मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा भी कानून के शिकंजे में होंगे। हलाकि मरने से पहले जगेंद्र सिंह जो बयान मजिस्ट्रेट को दर्ज करवाये थे उसमे तत्कालीन कोतवाल श्रीप्रकाश समेत अन्य की गर्दन फसना तय है। अब देखना यह होगा कि जगेंद्र सिंह को असली इंसाफ मिलेगा या फिर इंसाफ के नाम पर उनके साथ ही सिर्फ मजाक ही किया जायेगा।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
तोताराम यादव बोलता है कि खुद रेप करवाती है महिलायें.. तोताराम यादव बोलता है कि खुद रेप करवाती है महिलायें..(2)

लखनऊ। 6 जून. सूबे की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बलात्कार के लिए सीधेसीधे महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहरा दिया है. यूपी सरकार द्वारा पैक्सफेड के चेयरमैन नियुक्त किये गए तोताराम यादव ने आज बलात्कार की घटनाओं पर बेशर्म बयांन देते हुए कहा कि रेप तो महिलाएं अपनी आपसी सहमती से ही करवा लेती हैं. जब कोई अपनी मर्जी से रेप करा लेगा तो फिर सरकार क्या करेगी।

उत्तर प्रदेश सरकार में लालबत्ती धारक चेयरमैन तोताराम यादव ने कहा कि पहले तो महिलाएं अपनी मर्जी से रेप करवा लेती हैं और फिर पुलिस तथा प्रशासन के साथ सरकार को भी हैरान होना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मेरा दावा है कि महिलाओं के साथ कभी रेप हो ही नहीं सकता। रेप कराने के बाद लोग सरकार को दोष देते हैं। अधिकांश लोग कहते हैं कि सरकार की कानून-व्यवस्था खराब है।

मैनपुरी में एक कार्यक्रम के दौरान चेयरमैन तोताराम यादव का दावा है कि उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म की घटनाएं नहीं होती। उन्होंने कहा कि पहले तो सब स्वेच्छा से होता है, जब मामला सामने आ जाता है तो इनको रेप का रूप दे दिया जाता है। सब लड़का-लड़की की सहमति से होता है। तोताराम यादव मैनपुरी में यूपी में बढ़ रहे दुष्कर्म की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे।

तोता राम यादव के इस बयांन से सूबे की समाजवादी पार्टी सरकार की मुश्किलें बढ़ना तय है. एक तरफ जहाँ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव महिलाओं की सुरक्षा के लिए नए नए प्रयोग कर रहे हैं और 1090 जैसी व्यवस्थाओं का विदेशों में प्रचार कर रहे हैं तो वहीँ दूसरी तरफ तोता राम यादव जैसे नेताओं के बयान सरकार को शर्मिंदा करने के लिए काफी हैं.

मैनपुरी के जिस कार्यक्रम में आज तोताराम यादव पहुचे थे वहां युवा सपयिओं ने प्रधानमंत्री मोदी के पुतला दहन का कार्यक्रम भी रखा था. मगर तोता राम यादव ने न सिर्फ इस कार्यक्रम को रोक दिया बल्कि मोदी की तारीफ़ के कसीदे भी पढ़े.

सरकार में पैक्सफेड के चेयरमैन तोताराम यादव समाजवादी पार्टी के पुराने नेता है और उनकी मैनपुरी के लोकसभा चुनाव के दौरान अहम भूमिका रही थी। सहकारिता विभाग की कार्यदायी संस्था पैक्सफेड के चेयरमैन तोताराम यादव तीन वर्ष पहले भी अपने पुत्र को तदर्थ रूप में लिपिक नियुक्त करने के बाद चर्चा में आए थे। उनके ऊपर पैक्सफेड ने तदर्थ नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर गड़बडिय़ां के आरोप हैं। पैक्सफेड के चेयरमैन तोताराम के पुत्र के साथ उनके कई रिश्तेदार यहां पर नियुक्त हैं।

सूबे की अखिलेश सरकार को कई बार रेप की घटनाओं के कारण शर्मिंदगी उठानी पड़ी है. बदायूं बलात्कार केस ने तो दुनिया भर का ध्यान खींचा था. और सूबे के पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा पर बीते हफ्ते ही एक आंगनवाडी कार्यकर्त्री के साथ दुष्कर्म करने का आरोप भी लगा है.

भारतीय जनता पार्टी ने पैक्सफेड के चेयरमैन दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री तोताराम यादव के बयान की तीव्र भत्र्सना की है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डा. मनोज मिश्र ने बयान की तीखी निन्दा करते हुए कहा कि बयान न केवल अशोभनीय है बल्कि नारीशक्ति का अपमान है। ‘‘सहमति से होता है रेप’’ सम्बन्धी बात घटिया सोच का परिचायक है। भाजपा प्रवक्ता ने यह आरोप भी लगा दिया कि कि महिलाओं पर अभद्र टिप्पणीयों के लिए सपा नेता कुख्यात है। उन्होंने कहा कि तोताराम का यह बयान सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह, अबू आजमी और लीलावती के घ्रणित बयानों की श्रखंला का है ।

डा. मिश्र ने मांग की कि तोताराम यादव महिलाओं से तत्काल माँफी माँगे अन्यथा उन्हें बर्खास्त किया जाये।

(तहलका न्यूज़)

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
छेड़छाड़ के आरोपी उबर ड्राइवर के खिलाफ गुड़गांव पुलिस में मामला दर्ज.. छेड़छाड़ के आरोपी उबर ड्राइवर के खिलाफ गुड़गांव पुलिस में मामला दर्ज..(2)

नई दिल्ली: कैब सेवा मुहैया कराने वाली कंपनी उबर एक बार फिर विवादों में है, पिछले साल दिसंबर में टैक्सी ड्राइवर द्वारा महिला यात्री के साथ कथित बलात्कार की घटना के बाद इस अमेरिका आधारित कंपनी के एक अन्य ड्राइवर पर एक महिला यात्री से छेड़छाड़ का आरोप लगा है।

रविवार को हुई इस घटना के बाद पीड़ित ने फोन पर उबर के एक प्रतिनिधि को शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, वह उबर कैब से गुड़गांव जा रही थी। रास्ते में ड्राइवर ने कथित तौर पर बलपूर्वक उसे चूमने और उससे छेड़छाड़ करने की कोशिश की। ड्राइवर की पहचान विनोद के तौर पर हुई है।

शिकायत के जवाब में प्रतिनिधि ने कहा, ‘हमारी नीति इस तरह के आचरण को कतई बर्दाश्त न करने की है और मैं आपको आश्वासन देता हूं कि हमारी टीम विनोद (कैब के ड्राइवर) के खिलाफ तत्काल समुचित कार्रवाई करेगी।’ गुड़गांव पुलिस आयुक्त नवदीप सिंह विर्क ने बताया कि मामले में गुड़गांव पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 ए (छेड़छाड़) के तहत कैब ड्राइवर के खिलाफ एक मामला दर्ज किया है। उन्होंने बताया कि ड्राइवर की पहचान कर ली गई है, लेकिन उसे अभी गिरफ्तार किया जाना है।

उन्होंने बताया कि पुलिस को घटना के संबंध में एक मेल मिला और तत्काल एफआईआर दर्ज की गई। उनके अनुसार, पुलिस ने उबर से इस मुद्दे पर सूचना मुहैया कराने का आग्रह किया जो उन्हें उपलब्ध करा दी गई। बहरहाल, महिला के भाई ने शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद कोई कार्रवाई न किए जाने का आरोप लगाया और आरोपी को सजा देने की मांग की।

महिला के भाई ने कहा ‘आप को (उबर को) शिकायत किए जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, आपकी ओर से इस बारे में कोई सूचना नहीं मिली।’ उन्होंने बताया कि इस मामले में गुड़गांव पुलिस में शिकायत दी है। आरोप के जवाब में उबर ने कहा ‘हमारी टीम फोन के जरिये सूचना मिलने पर कुछ ही मिनट में पीड़ित तक पहुंच गई। घटनाक्रम के सत्यापन के लिए उबर टीम के कई सदस्यों ने ड्राइवर से पूछताछ की।’ उबर की आधिकारिक प्रतिक्रिया में दावा किया गया है कि ड्राइवर पर तत्काल कार्रवाई की जा चुकी है और मामले की गहन जांच की जा रही है।

इसने आगे कहा है कि संबद्ध पक्षों की निजता की ‘सुरक्षा’ को ध्यान में रखते हुए उबर संबद्ध पक्षों के साथ इस मामले से सीधे निपटेगी। संपर्क करने पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई शिकायत नहीं मिली है और शायद गुड़गांव पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई होगी।

उबर ने हाल ही में आईआईटी स्नातक अमित जैन को भारत में अपने संचालनों के लिए अध्यक्ष नियुक्त करने का ऐलान किया था। पिछले साल दिसंबर में 27 वर्षीय एक वित्तीय परामर्शदाता के साथ उबर के एक ड्राइवर द्वारा कथित तौर पर बलात्कार की घटना के बाद इस कैब सेवा पर राष्ट्रीय राजधानी में प्रतिबंध लगा दिया गया था।

एसोसिएशन ऑफ रेडियो टैक्सी इंडिया ने इन हालात को ‘चिंताजनक’ बताते हुए इस संबंध में तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
नागौर: एक और खैरलांजी.. नागौर: एक और खैरलांजी..(0)

राजस्थान के नागौर में हुए दलितों के जनसंहार पर भंवर मेघवंशी की यह रिपोर्ट इस मुल्क का चेहरा है, जो रोज ब रोज दलित-मुस्लिम-आदिवासी बस्तियों में देखने को मिलता है. भंवर राजस्थान में दलित, आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के लिए संघर्षरत है. प्रतिरोध से साभार.

राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है. राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है. विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है, उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है, यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है. ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है. क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है? वैसे तो असम्भव है, लेकिन यह संभव हो रही है, यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से.

नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया. इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है. मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी. राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है, उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है, ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं, बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है.

डांगावास: दलित हत्याओं की प्रयोगशाला

नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास, जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है. तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास… जी हाँ, यह वही डांगावास गाँव है जहाँ पिछले एक साल में चार दलित हत्याकांड हो चुके है, जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी, मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया. उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए. 4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया, इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफाकर दिया गया. पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की.

स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है. यहाँ पर थानेदार भी उनके है, तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है, फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है, कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है, अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है.
जमीन के बदले जान

एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है. यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों, झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है, जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है, तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है. ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था, हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा. बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा. बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें, तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया, जमीन कीमती हो गयी. उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया. पहले दलितों ने याचना की. फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा. मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना. मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी. करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा, बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया. बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया. वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया. इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये. रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी. मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की. मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा.

निर्मम जनसंहार

12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया, मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी. बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी. इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था. अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है. चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े. दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे. अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां, लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे. उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया.

लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था. इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर फ़ायर कर दिया लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया जिससे मुन्नाराम गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था. गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये. उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.

ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है. वे निरीह, निहत्थे दलितों पर चलने लगे. पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी. तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया. इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था. जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया. उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी. महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी. तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए, एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जलाकर राख कर दी गयी, एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया. जो भी समान वहां था उसे लूट ले गए. इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा, लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई, जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की. इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी. यह अचानक नहीं हुआ, सब कुछ पूर्वनियोजित था.

ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित जनसंहार ही था, इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है. पुलिस ने दलितों की ओर से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था, भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके. कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे, उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला. बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे, दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही. इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा, अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे. क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है.

कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है. सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है. कोई भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया. अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है, फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम आज तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा. नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है. दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता, कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी, वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें. इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफआईआर भी दर्ज करवाई गयी है, जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.

अगर डांगावास जनसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सीबीआई को सौपना होगा क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है. आखिर जिन अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही जिसने दलितों की कमजोर एफआईआर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया, उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है.

इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है, यह आश्चर्यजनक बात है. कहीं कोई भी हलचल नहीं है. मेघसेनाएं, दलित पैंथर्स, दलित सेनाएं, मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा, हर घर आग के हवाले होगा, हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी, हर गाँव बथानी टोला होगा, कुम्हेर होगा, लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा. इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे. अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये, उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है, कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है, ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से, सम्मान और स्वाभिमान से जी सके.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
नारायण साईं मामले के मुख्य गवाह को गोलियों से भूना.. नारायण साईं मामले के मुख्य गवाह को गोलियों से भूना..(0)

पानीपत। आसाराम बापू के बेटे नारायण साईं के खिलाफ बलात्कार के मामले में मुख्य गवाह महेंद्र चावला को अज्ञात हमलावरों ने गोलियों से भून दिया। महेंद्र के दो गोलियां लगी हैं। उनको पानीपत के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां उसकी हालत नाजुक बताई जा रही है।
इस मामले में पुलिस का कहना है कि महेंद्र चावला के ऊपर उनके घर के बाहर ही गोलियां चलाई गईं। महेंद्र को इस हमले में दो गोलियां पीछे की ओर लगी हैं। पुलिस हमलावरों की तलाश कर रही है और उन्हें जल्द से जल्द पकड़ने के लिए प्रयास कर रही है।
29 अप्रैल को रेप केस में आसाराम के बेटे नारायण साई की जमानत याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने साफ किया था कि साई को जमानत तब मिलेगी जब उनकी मां की सर्जरी का दिन तय होगा।
दिसंबर 2013 में गिरफ्तार होने के बाद से नारायण साई रेप के मामले में जेल में बंद हैं। उनपर सूरत की एक महिला ने रेप का आरोप लगाया है।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
पूर्व विधायक घूरा राम को कल बलिया की जनता ने जमकर लतियाया.. पूर्व विधायक घूरा राम को कल बलिया की जनता ने जमकर लतियाया..(1)

 

 

 

-कुमार सौवीर।।

बसपा के पूर्व मंत्री और रसड़ा-बलिया से पूर्व विधायक घूरा राम को कल बलिया की जनता ने जमकर हूर दिया। जनता ने घूरा राम को पचासों चपत-झांपड़ और सैकड़ों लात-घूसे रसीद किये। गुण्‍डई पर आमादा घूरा राम और उनके गुण्‍डों ने इसके पहले ट्रक चालकों को बेवजह पीटा थ्‍ाा, नतीजा घूरा की इस हरकत पर नाराज ट्रक चालकों को भी गुस्‍सा आ गया और उन लोगों ने घूरा और उनके गुण्‍डे-साथियों को दबोचा और सरेआम उन्‍हे जमकर हूर दिया। बताते हैं कि घूरा की तेज रफ्तार स्‍कार्पियों गाड़ी किसी ट्रक से भिड गयी थी, जिसके चलते उनकी गाड़ी पर कुछ डेंट आ गया था। इस पर घूरा राम और उनके साथियों ने ट्रक चालक और उसके साथियों को दौड़ा-दौड़ा कर सडक पर पीटा था। लेकिन इसी बीच ट्रक चालक के कुछ साथी और आसपास के नागरिक भी ट्रक चालक के समर्थन में आ गये और उन्‍होंने घूरा राम व उनके साथियों को जमकर हूर दिया।


काफी देर तक आक्रोशित चालकों और नागरिकों की भीड़ को बाद में पुलिस ने बल प्रयोग कर तितर-बितर किया। बाद में कुछ चालकों को पुलिस ने हंगामा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
जन-चर्चाओं के अनुसार घूरा राम जब भी सत्‍ता में आते हैं तो इसी नशे में हमेशा सरेआम लोगों को पीटते-पिटवाते रहते हैं। इतना ही नहीं, उनका परिवार भी इसी नशे में रहता है। और उनके पट्टीदार भी कटहे कुत्‍ते की तरह जनता को काटते-पीटते रहते हैं। पिछली सरकार में उन्‍होंने एक सरकारी चिकित्‍सक को भी बुरी तरह धुन दिया था, जिसको लेकर पूरे जनपद में आक्रोश था, लेकिन चूंकि तब बसपा की सरकार थी, इसलिए कोई चूं तक नहीं कर पाया था। सूत्र बताते हैं कि घूरा राम हमेशा जातिवादी आधार पर बाकी जातियों के प्रति हिंसा के प्रति आमादा रहते हैं। लेकिन इसके बावजूद इस बार घूरा राम को पहले जनता ने हूर कर विधायकी से हटाया, फिर कल भरे सड़क जनता ने हाथ-लात से हूर दिया।
अब आखिरी बात। नेता जी, अब होशियार। आपकी गुण्‍डई का जवाब देने के लिए अब जनता ने भी कमर कस ली है। सम्‍भल जाइये। कहीं ऐसा न हो कि अगला खाता आपका ही खुल जाए
( चित्र परिचय:- तीन फोटो में जनता घूरा राम को सम्‍मानित कर रही है और बाकी फोटो में ट्रक चालक और उनके समर्थन में जुटी जनता घूरा राम को हूर रही है।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
यूपी के मुख्यमंत्री और डीजीपी के नम्बरों से कॉल स्पूफिंग की, अरबों ठगे सपा नेता ने.. यूपी के मुख्यमंत्री और डीजीपी के नम्बरों से कॉल स्पूफिंग की, अरबों ठगे सपा नेता ने..(0)

कभी मुख्यमंत्री तो कभी डीजीपी के क्लोन्ड फ़ोन नंबरों से बात करता था जालसाज

राज्य के दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों सहित कई अफसरों के करोड़ों रुपए डकारे

जालसाजी और जुगाड़ से 14 गनर ले रखे थे सफेदपोश नेता ने.. आगरा के दो दरोगाओं से दस लाख की जालसाजी में पकड़ा गया.. कॉल स्पूफिंग के जरिये मुख्यमंत्री आवास से न्यूजीलैंड दूतावास को फ़ोन किया..

-अनुराग तिवारी।।

लखनऊ, एक साथ 14-14 गनर रखने वाले सपा के एक कथित नेता ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सरकारी आवास के टेलीफोन नंबर से न्यूजीलैंड के दिल्ली स्थित दूतावास से कई बार बात की, राज्य के दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों से आलू में मोटी कमाई के नाम पर करोड़ों-करोड़ों रूपये हथियाए. कई और आईपीएस अफसरों से निवेश के नाम पर लम्बी रकम वसूली और पुलिस महानिदेशक अरविन्द कुमार जैन के सीयूजी नंबर से दर्जनों फ़ोन किये लेकिन पकड़ा गया दो दरोगाओं से जालसाजी के मामले में. एक वक़्त सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहनकर डीजीपी दफ्तर में धड़ल्ले से आने-जाने वाला शैलेन्द्र अग्रवाल फिलहाल आगरा पुलिस की गिरफ्त में है.

सरकारी जानकारी फिलहाल इतनी है कि डीजीपी बनकर फ़ोन पर दो दरोगाओं को धमकाने और उनसे दस लाख रूपये वसूलने के आरोप में इस जालसाज को पकड़ा गया है. लेकिन गोपनीय रिपोर्टके मुताबिक कॉल स्पूफिंग यानि इन्टरनेट के जरिए दूसरों के मोबाइल और लैंडलाइन नंबर की फेक कॉल के माहिर इस सफेदपोश अपराधी ने कई बड़े लोगों से पचासों करोड़ की ठगी की है. ठगे जाने वालों में इसी सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे दो सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी बताये जाते हैं, जिनसे इसने 36 फीसदी ब्याज दर की शर्त पर करोड़ों रूपये का निवेश आलू भंडारण के लिए कराया. एक अफसर से तो 14 करोड़ रूपये का निवेश आलू के नाम पर कराने के बाद यह जालसाज मुकर गया. उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो गहराई से जांच में कई बड़े राज खुलेंगे. वैसे उच्च स्तर पर इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि करोड़ों रूपये गंवाने वाले कई रिटायर्ड और मौजूदा पुलिस अधिकारी किसी तरह अपना नाम इस बड़े जालसाजी मामले से दूर रखेंगे.

सूत्रों के मुताबिक़ आगरा के विभवनगर कॉलोनी में रहने वाला शैलेन्द्र अग्रवाल समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक गतिविधियों में अक्सर सक्रिय दिखता रहा है और सत्तारूढ़ दल के कई कद्दावर नेताओं से भी इसका मिलना-जुलना तस्दीक हुआ है. कॉल स्पूफिंग के जरिये शैलेन्द्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री आवास 5, कालिदास मार्ग के लैंडलाइन नंबर 22366985 का इस्तेमाल दर्जनों बार किया है. इसने खुद को मुख्यमंत्री तैनात सीनियर अफसर बताकर दिल्ली स्थित न्यूजीलैंड दूतावास के अधिकारीयों से भी कई बार बात की है. इस बात की प्रबल आशंका है कि अग्रवाल ने कई काम निकालने के लिए राज्य के कई मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के मोबाइल नंबर की भी क्लोनिंग की है. अग्रवाल के जालसाजी प्रकरण की जांच जैसे जैसे गहरी होगी, वैसे वैसे कई वरिष्ठ अधिकारियों की संलिप्तता के राज खुलेंगे.

जानकारी के मुताबिक़ शैलेन्द्र अग्रवाल ने कॉल स्पूफिंग का इस्तेमाल करते हुए डीजीपी, शासन के वरिष्ठ अधिकारी और मुख्यमंत्री के घर और दफ्तर के नम्बरों के झांसे में कई जिलों के डीएम और एसपी को अर्दब में रखा था. इसी के चलते अग्रवाल के पास अलग-अलग जिलों से कुल 14 गनर की तैनाती का पता चला है. डीजीपी के सीयूजी मोबाइल नंबर 9454400101 और लैंडलाइन नंबर 2208085 की भी कॉल स्पूफिंग कई बार किये जाने की पुष्टि हुई है. इसी नम्बर की कॉल स्पूफिंग से उसने जीआरपी के दरोगा विजय सिंह और उसके एक और साथी दरोगा धीरजपाल सिंह को डीजीपी बनकर हडकाया और जब उधर से उलटी कॉल आई तो मामला पकड़ में आया.

दरअसल खुद को सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का उपाध्यक्ष बताने वाले अग्रवाल ने धोखाधड़ी के इस तरीके से सैकड़ों लोगों को बेवकूफ बनाया और करोड़ों रूपये इकठ्ठा किये. 36 परसेंट ब्याज का भरी मुनाफ़ा पाने की लालच में फंसे लोगों को जब एक भी पैसा नहीं मिला तो उन्होंने शैलेन्द्र अग्रवाल के घर तगादे शुरू किये. ज्यादातर फंसे लोग गनरों की भरी फ़ौज की तलाशी के चक्कर में अग्रवाल से मिल भी नहीं पाते थे. आगरा पुलिस से जानकारी मिली है कि राजामंडी चौकी पर तैनात रहे जीआरपी दरोगा विजय सिंह और उनके साथी उपनिरीक्षक धीरजपाल सिंह की शैलेंद्र अग्रवाल से वर्ष 2013 में मुलाकात हुई थी. उसने दोनों दरोगा को अपना परिचय सपा प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में दिया था.मथुरा के मूल निवासी शैलेंद्र अग्रवाल का ताजगंज के विभव नगर स्थित एक अपार्टमेंट में फ्लैट है.

दो साल पहले अग्रवाल ने दोनों दरोगाओं से आलू में मोटी कमाई होने का हवाला देते हुए कर्ज के रूप में पांच-पांच लाख रुपये ले लिए, मगर वापस करने में आनाकानी करने लगा. पुलिस ने बताया कि अग्रवाल ने 16 अप्रैल को दरोगा विजय सिंह के मोबाइल पर डीजीपी के सीयूजी तथा पीएनटी नंबर से इंटरनेट फेक कॉल किया और धोखाधड़ी के मामले में डीजीपी बन पूछताछ करने लगा. बातचीत के दौरान शक होने पर दरोगा ने डीजीपी मुख्यालय फोन कर जानकारी ली, जहां से पता चला कि कोई कॉल नहीं किया गया है.

दरोगा विजय सिंह द्वारा शुक्रवार को डीआईजी के यहां दिए प्रार्थनापत्र पर ताजगंज थाने में मुकदमा दर्ज किया गया. देर रात पुलिस ने छापा मार शैलेंद्र अग्रवाल को गिरफ्तार कर फ्लैट की तलाशी ली. वहां से सचिवालय के पास और अन्य कागजात बरामद हुए. सदर इलाके के सीओ असीम चौधरी ने बताया सपा नेता शैलेंद्र के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है.

हत्यारोपी है यह सपा नेता
शैलेंद्र को दस वर्ष पूर्व न्यू आगरा से एक आयकर अधिकारी की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है, जिसकी ह्त्या कर उसका शव फीरोजाबाद में फेंका गया था.

क्या है कॉल स्पूफिंग
स्पूफिंग वह तकनीक है जिसके द्वारा किसी के भी मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके किसी भी अन्य मोबाइल पर कॉल की जा सकती है या मेंसेज भेजा जा सकता है। इस तकनीक में दोनों पक्ष यानि कि जिसका नंबर प्रयोग किया जा रहा हो वह और जिसे कॉल या मैसेज किया गया हो, वह इससे अनजान रहते हैं कि कॉल या मेसेज भेजने वाला आखिर है कौन।

(तहलका न्यूज़)

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
आतंकी बता कर फ़र्ज़ी एनकाउंटर.. आतंकी बता कर फ़र्ज़ी एनकाउंटर..(0)

-ज़ाहिद।।
भारत को आजाद हुए 68 वर्ष हो गये और इतने वर्षों में लगभग पूरा परिदृश्य बदल गया है नहीं बदला तो सड़ा गला अंग्रेजों की बनायी पुलिस संस्कृति ।वो चाहे हाशिमपुरा में हो , गुजरात में हो दिल्ली में हो या और कहीं पुलिस अंग्रेजों के जमाने की पुलिस आज भी बनी हुई है जिसमें क्रुरता है असंवेदनशीलता है और भ्रष्ट संस्कृति है जो रही सही कमी थी वह धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव ने पूरी कर दी ।

अंग्रेज़ी पुलिस की तरह ही इनके पास इतने अधिकार हैं कि यह किसी की भी हत्या करके मुठभेड़ दिखा देगें और मौके वारदात पर मौजूद सबूत मिटा देगें और गढ़ी गई झूठी कहानी के आधार पर सबूत गढ़ देगें ।उसके बाद पुलिस इन्क्वायरी होगी जिसमे इन्ही के साहबान इन सबको दोष मुक्त कर देगें या जो बचा खुचा सबूत होगा उसे मिटा कर सत्य का अंतिम संस्कार कर देंगे।अधिक दबाव हुआ तो और कोई इन्क्वायरी ।30-35 वर्ष मुकदमे चलते हैं साथ में नौकरी भी और अंत में अधिकांश पुलिसकर्मी हाशिमपुरा की तरह बाईज्जत बरी हो जाएंगे।तुलसी प्रजापति हो सोहराबुद्दीन हो इशरत जहां हो बाटला हाउस हो या ऐसे ही अन्य तमाम फर्जी मुठभेड़ों की यही कहानी है , यह हकीक़त है कि पुलिस आपको या हमें रात के अधेरे में सोते हुए घरों से उठा सकती है और आत्मसुरक्षा के नाम पर फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर सकती है कुछ अवैध हथियार मृत हाथों में पकड़ा सकती है और मुकदमा दर्ज कर सकती है कि आतंकवादी मारा गया और हमारा आपका परिवार कुछ नहीं कर सकता , उन्हीं पुलिस वालों के सामने गिड़गिड़ाएगा रोएगा और दबाव बनाकर पुलिस वाले आपका बयान लेकर अपने को बचा लेंगे , हो गया मानवाधिकार और न्याय और आप या हम कुछ नहीं उखाड़ सकते क्योंकि पुलिस यहां न्यायाधीश से अधिक शक्तिशाली है ।यही हुआ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी ।पर बात पहले तेलंगाना की ।

पांच संदिग्ध आतंकी तेलंगाना के नालगोंडा जिले में मारे गए थे। इन्हें 17 मेंबर्स वाली सिक्यॉरिटी टीम ने मारा। वे इन्हें एक पुलिस वैन में वारांगल जेल से हैदराबाद कोर्ट ले जा रहे थे। वारांगल से हैदराबाद कोर्ट 150 किमी. दूर है।

पुलिस का कहना है कि उनमें से एक संदिग्ध आतंकी विकारुद्दीन अहमद ने उनसे हथकड़ी खोलने के लिए कहा क्योंकि उसे टॉइलट जाना था। वापस लौटने पर उसने उनसे हथियार छीनने की कोशिश की। सिक्यॉरिटी टीम का कहना है बाकियों ने भी उनसे हथियार छीनकर भागने की कोशिश की। इसके बाद सिक्यॉरिटी टीम ने उन पर गोलियां चला दीं जिसमें पांच संदिग्ध आतंकी मारे गए।अब पुलिस की इस झूठी कहानी पर ध्यान दें कि वारांगल से हैदराबाद की दूरी 150 किमी है और यह घटना वारंगल से कोई 60-65 किमी दूर हुई जो एक डेढ़ घंटे के रास्ते पर है , जेल से कैदी जब पेशी पर आते हैं तो उन्हें पूर्व सूचना होती है तो वह टायलट नहाना धोना सब जेल से ही करके आते हैं तो यह एक झूठा तर्क है और यदि सच भी है तो एक संदिग्ध आतंकवादी की हथकड़ी खोलना किस कानून या पुलिस के नियम में है ? 17 हथियार बंद पुलिस के दस्ते से एक व्यक्ति हथियार छीनने का प्रयास करेगा यह हास्यास्पद लगता है और एक मजेदार तथ्य देखें कि सभी मृतकों के हाथों में हथकड़ियां हैं ।दरअसल आप हर ऐसी मुठभेड़ को देख लें पुलिस का 19-20 यही कहानी रहती है कि हथियार छीनने का प्रयास किया या पुलिस पर जानलेवा हमला किया ।

ऐसा ही कुछ हुआ आन्ध्राप्रदेश के जंगल में चंदन तस्कर के नाम पर 20 लोगों को मुठभेड़ में मारा गया ।वहाँ भी लगभग ऐसी ही कहानी बनाई गई परन्तु जो रिपोर्ट आरही हैं वह बता रही हैं कि सभी को सर के उपर गोली मारी गई है ।अब मुठभेड़ में सर के उपर कैसे गोली लग सकती है यह एक शोध का विषय है ।बाटला हाउस मुठभेड़ में भी यही हुआ और जिनको मुठभेड़ के नाम पर मारा गया था उनके सर के उपर बीचोंबीच मे गोलियां मारी गईं और मैने स्वयं उसकी लाश को आजमगढ़ में देखा था क्युँकि 12 वीं पास करके गया वह बच्चा दिल्ली में कम्पटीशन की तैयारी के लिए कुछ दिन पहले ही गया था और मेरे ससुराल का पडोसी था ।बाटला हाउस मुठभेड़ का सच जो भी हो पर वह बच्चा आतंकवादी नहीँ हो सकता इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ क्योंकि जो बच्चा किसी को एक थप्पड़ ना मारा हो वह दिल्ली जाकर 12 दिन में आतंकवादी कैसे बन सकता है ।सवाल यह है कि भारत की जिस न्याय व्यवस्था का यह मूल हो कि 10 अपराधी भले झूट जाएं परन्तु किसी एक बेगुनाह को सजा ना मिले उस व्यवस्था में पुलिस कैसे किसी की हत्या कर सकती है जिसकी जिम्मेदारी है अपराधी को अदालत के सामने प्रस्तुत करने की ।कहीं कहीं पुलिस सही भी हो सकती है तो क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था , कार्यप्रणाली और नियमों में सुधार की जरूरत नहीं है ? आखिर 68 वर्षों तक उच्चतम न्यायालय हो या सरकार ऐसी सड़ी गली अंग्रेजों की पुलिस व्यवस्था को क्युँ नहीं बदलती, जहाँ अंग्रेजों की पुलिस स्वतंत्रता सेनानियों को उठाकर ऐसे ही हत्याएँ करती थीं वैसे ही आज की पुलिस धार्मिक , जातिगत अथवा व्यक्तिगत आधार पर हत्याएँ करती हैं करती रहेंगी ।आज यह एक कड़वा सच है कि किसी के दरवाज़े पर दो पुलिस वाले आजाएं तो आपकी अपने मुहल्ले में मिट्टी पलीद तय है फिर आप देते रहिए सफाई ।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
सत्यम घोटाले में रामलिंगा राजू समेत 10 आरोपी दोषी करार, कल सजा मिलेगी.. सत्यम घोटाले में रामलिंगा राजू समेत 10 आरोपी दोषी करार, कल सजा मिलेगी..(0)

त्यम कंप्यूटर सर्विसेज लिमिटेड (SCSL) में करोड़ों रुपये के लेखा घोटाले में रामलिंगा राजू समेत सभी 10 आरोपियों को दोषी माना गया है. मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत शुक्रवार को सजा का ऐलान करेगी. केस की जांच सीबीआई ने की है.
सभी आरोपियों को आईपीसी की धारा 120बी और 420 के तहत दोषी पाया गया है. रामलिंगा राजू पर धारा 409 के आरोप भी साबित हुए हैं. देश की सबसे बड़ी लेखा में धोखाधड़ी का मामला 7 जनवरी, 2009 को तब सामने आया, जब कंपनी के फाउंडर और चेयरमैन अध्यक्ष बी रामलिंगा राजू ने कथित तौर पर अपनी कंपनी के बहीखाते में हेराफेरी और वर्षों तक करोड़ों रुपये का मुनाफा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की बात कबूल की.

अपने भाई रामराजू और अन्य के साथ फर्जीवाड़े की बात कथित तौर पर स्वीकार करने के बाद आंध्र प्रदेश पुलिस के अपराध जांच विभाग ने राजू को गिरफ्तार किया था. मामले में सभी 10 आरोपी अभी जमानत पर थे. करीब छह साल पहले शुरू हुए मामले में लगभग 3000 दस्तावेज जमा किए गए और 226 गवाहों से पूछताछ हुई.

ये हैं 10 आरोपी
1. रामलिंगा राजू, फाउंडर, पूर्व चेयरमैन
2. बी रामा राजू, रामलिंगा के भाई और सत्यम के पूर्व प्रबंध निदेशक
3. वदलामणि श्रीनिवास, पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी
4. सुब्रमणि गोपालकृष्णन, पूर्व पीडब्लूसी ऑडिटर
5. टी श्रीनिवास, पूर्व पीडब्लूसी ऑडिटर
6. बी सूर्यनारायण राजू, राजू के एक अन्य भाई
7. जी रामकृष्ण, पूर्व कर्मचारी
8. डी वेंकटपति राजू, पूर्व कर्मचारी
9. श्रीसाईलम, पूर्व कर्मचारी
10. वी एस प्रभाकर गुप्ता, सत्या के पूर्व आंतरिक मुख्य ऑडिटर

आमदनी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने, खाता में हेरफर, फर्जी सावधि जमा के साथ ही विभिन्न आयकर कानूनों का उल्लंघन करने के सिलसिले में राजू और अन्य पर आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत गलत रिटर्न भरने, फर्जीवाड़ा, आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और विश्वासघात का मामला दर्ज किया गया था.

फरवरी 2009 में सीबीआई ने जांच का जिम्मा संभाला और तीन आरोप पत्र (7 अप्रैल 2009, 24 नवंबर 2009 और 7 जनवरी 2010) दाखिल किया, जिसे बाद में एक साथ मिला दिया गया.

 

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

ताज़ा पोस्ट्स

Contacts and information

मीडिया दरबार - जहाँ लगता है दरबार. आप ही राजा हैं इस दरबार के और कटघरे में है मीडिया. हम तो मात्र एक मंच हैं और मीडिया पर अपनी निगाह जमायें हैं, जहाँ भी मीडिया में कुछ गलत होता दिखाई देता है उसे हम आपके सामने रख देते हैं और चलाते हैं मुकद्दमा. जिसपर सुनवाई करते हैं आप, जहाँ न्याय करते हैं आप. जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार...

Social networks

Most popular categories

© 2014 All rights reserved.
%d bloggers like this: