Share this on WhatsApp
Subscribe to RSS
कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

अपराध back to homepage

सीवान, शहाबुद्दीन और एक हताश पिता का संघर्ष.. सीवान, शहाबुद्दीन और एक हताश पिता का संघर्ष..(0)

90 के दशक की शुरुआत में सीवान की एक नई पहचान बनी.वजह बाहुबली नेता शहाबुद्दीन थे.. वे अपराध की दुनिया से राजनीति में आए थे. 1987 में पहली बार विधायक बने और लगभग उसी समय जमशेदपुर में हुए एक तिहरे हत्याकांड से उनका नाम अपराध की दुनिया में मजबूती से उछला.. जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या, एसपी सिंघल पर गोली चलाने से लेकर तेजाब कांड जैसे चर्चित कांडों के सूत्रधार वही माने गए.. उसी चर्चित तेजाब कांड पर फैसला आया तो सीवान और बिहार के दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों के जेहन में 12 साल पुराने इस खौफनाक घटना की याद जिंदा हो उठी..

फरवरी के पहले सप्ताह में एक खबर आई कि शहाबुद्दीन को बहुचर्चित तेजाब कांड में जमानत मिल गई है. शहाबुद्दीन, सीवान और तेजाब कांड, तीनों का नाम एक साथ सामने आते ही बिहारवासियों के जेहन में कई खौफनाक यादें ताजा हो उठती हैं. बिहार के सीमाई इलाके में बसे सीवान जिले को कई वजहों से जाना जा सकता था; भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली होने की वजह से, रेमिटेंस मनी (विदेश में बसे भारतीय कामगारों की ओर से भेजी गई रकम) में बिहार का सबसे अव्वल जिला रहने की वजह से भी. कई और विभूतियों की वजह से भी सीवान की पहचान रही. हालांकि 90 के दशक की शुरुआत में सीवान की एक नई पहचान बनी. वजह बाहुबली नेता शहाबुद्दीन थे. जिस जीरादेई में राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था, उस इलाके से पहली बार विधायक बनकर शहाबुद्दीन ने राजनीति में कदम रखा था और कई बार सांसद-विधायक रहे. लेकिन शहाबुद्दीन इस वजह से नहीं जाने गए. वे अपराध की दुनिया से राजनीति में आए थे. 1987 में पहली बार विधायक बने और लगभग उसी समय जमशेदपुर में हुए एक तिहरे हत्याकांड से उनका नाम अपराध की दुनिया में मजबूती से उछला. उसके बाद तो एक-एक कर करीब तीन दर्जन मामलों में उनका नाम आता रहा. जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या, एसपी सिंघल पर गोली चलाने से लेकर तेजाब कांड जैसे चर्चित कांडों के सूत्रधार वही माने गए. उसी चर्चित तेजाब कांड पर फैसला आया तो सीवान और बिहार के दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों के जेहन में 12 साल पुराने इस खौफनाक घटना की याद जिंदा हो उठी.

2004 में 16 अगस्त को अंजाम दिए गए इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के एक व्यवसायी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों सतीश राज (23) और गिरीश राज (18) को अपहरण के बाद तेजाब से नहला दिया गया था, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी. इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह चंदा बाबू के सबसे बड़े बेटे राजीव रोशन (36) थे. मामले की सुनवाई के दौरान 16 जून, 2014 को राजीव की भी हत्या कर दी गई. इसके ठीक तीन दिन बाद राजीव को इस मामले में गवाही के लिए कोर्ट में हाजिर होना था. चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अब अपने एकमात्र जीवित और विकलांग बेटे नीतीश (27) के सहारे अपनी बची हुई जिंदगी काट रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में ही सीवान की एक स्थानीय अदालत ने इस हत्याकांड में राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के अलावा तीन अन्य लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.

शहाबुद्दीन को इस मामले में जमानत मिलने के चार-पांच दिन बाद चंदा बाबू से इस सिलसिले में फोन पर बातचीत हुई. शाम के कोई सात बजे होंगे. उधर से एक उदास-सी आवाज थी. पूछा- चंदा बाबू बोल रहे हैं? जवाब मिला- हां..! ‘हां’ सुनकर मन में संकोच और हिचक का भाव भर गया. सोचता रहा कि पूरी तरह से बिखर चुके और लगभग खत्म हो चुके एक परिवार के टूटे हुए मुखिया से बात कहां से शुरू करूं. बात सूचना देने के अंदाज में शुरू हुई. मैंने बताया, ‘चंदा बाबू! सूचना मिली है कि आपके केस को सुप्रीम कोर्ट में देखने को प्रशांत भूषण तैयार हुए हैं.’ चंदा बाबू कहते हैं कि हम तो नहीं जानते! फिर पूछते हैं- प्रशांत भूषण जी कौन हैं? मैंने उन्हें बताया कि देश के बड़े वकील हैं.

यह बात जानकर चंदा बाबू की आवाज फिर उदासी से भर उठती है. वे कहते हैं, ‘देखीं! केहू केस लड़ सकत बा तऽ लड़े बाकि हमरा पास ना तो अब केस लड़े खातिर सामर्थ्य बा, न धैर्य, न धन, न हिम्मत.’ यह कहने के बाद एक खामोशी-सी छा जाती है. थोड़ी देर बाद बातचीत का सिलसिला शुरू होता है. बात अभी शुरू होती है कि चंदा बाबू अतीत के पन्ने पलटने लगते हैं. कहानी इतनी लंबी और इतनी दर्दनाक है कि बताते-बताते कई बार चंदा बाबू रुआंसे होते हैं. उनकी आवाज में उतार-चढ़ाव आसानी से महसूस किए जा सकते हैं. वे गुस्से में भी आते हैं और उनकी दर्दनाक दास्तान सुनते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जब चंदा बाबू अपनी व्यथा कहते हैं तो कई बार या कहें कि बार-बार ऐसा लगता है कि वे अपनी कहानी सबको बताना चाहते हैं. पूरे देश को कि कैसे वे व्यवस्था से, शासन से, खुद से हार चुके हैं. आगे चंदा बाबू के कानूनी संघर्ष और साहस की कहानी उन्हीं की जुबानी:

‘देखीं! केहू केस लड़ सकत बा तऽ लड़े, बाकि हमरा पास न तो अब केस लड़े खातिर सामर्थ्य बा, न धैर्य, न धन, न हिम्मत’
निराश चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अब अपने विकलांग बेटे के सहारे बची हुई जिंदगी काट रहे हैं. 2004 में उनके दो बेटों को तेजाब से नहलाकर मार दिया गया. इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह रहे सबसे बड़े बेटे की हत्या भी 2014 में कर दी गई.
हमारी कहानी सुनना चाहते हैं तो हम सुना सकते हैं, आपमें संवेदना होगी तो आप शायद एक बार में पूरी कहानी नहीं सुन सकेंगे. आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. आप मुकदमे में शहाबुद्दीन को मिली जमानत के बारे में सवाल पूछ रहे हैं. इस बारे में जितना आपको मालूम है, उतना ही मुझे मालूम है कि शहाबुद्दीन को हाई कोर्ट से जमानत मिल गई. मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. अब ऐसी बातों से दुख भी नहीं होता. जिंदगी में इतने बड़े-बड़े दुख देख लिए कि अब ऐसे दुख विचलित नहीं करते. अब मैं इसे जीत-हार के रूप में भी नहीं देखता, क्योंकि जिंदगी में सब जगह, सब कुछ तो हार चुका हूं. शहाबुद्दीन को जमानत मिलना तय था. यह 16 जून, 2014 को ही तय हो गया था कि अब आगे का रास्ता साफ हो गया. उस दिन मेरे बेटे राजीव की सरेआम हत्या हुई थी. राजीव को 19 जून को अदालत में गवाही देनी थी. वह इकलौता चश्मदीद गवाह था, गवाही के तीन दिन पहले घेरकर उसे मारा गया तभी यह बात साफ हो गई थी. और उसी दिन से मैंने इन बातों पर ध्यान देना बंद कर दिया कि अब मामले में क्या होगा. मैं अब क्यों जिज्ञासा रखता कि मेरे बेटों की हत्या के मामले में क्या हो रहा है? जब सब कुछ चला ही गया जिंदगी से और कुछ लौटकर नहीं आने वाला तो क्यों लड़ूं, किसके लिए लडू़ं. अब एक विकलांग बेटा है, बीमार पत्नी है और खुद 67 साल की उम्र में पहुंचकर जिंदगी की गाड़ी ढोता हुआ इंसान हूं तो कैसे लड़ूंगा, किसके सहारे लड़ूंगा. लड़ तो रहा ही था अपने दो बेटों की हत्या का बदला लेने के लिए. मेरा बेटा राजीव लड़ रहा था अपने भाइयों की हत्या का बदला लेने के लिए. राजीव मेरा सबसे बड़ा बेटा था, लेकिन 16 जून, 2014 को उसे भी मारकर मेरे लड़ने की सारी ताकत खत्म कर दी गई. राजीव को शादी के ठीक 18 दिन बाद मार डाला गया. शाम 7:30 बजे उसे गोली मारी गई थी. इसके पहले 2004 में मेरे दो बेटों को तेजाब से नहलाकर मारा जा चुका था. राजीव से पहले जब मेरे दो बेटों गिरीश और सतीश को मारा गया था, तब एक की उम्र 23 और दूसरे की 18 साल थी. जब राजीव भी मारा गया तो मैंने कुछ नहीं किया. राजीव के क्रिया-कर्म के समय ही गिरीश व सतीश का औपचारिक तौर पर क्रिया-कर्म किया. तय कर लिया कि अब जब तक प्रभु चाहें, जिंदगी चलेगी, जैसे चाहे चलेगी.

मैं क्या बताऊं. कहां से बताऊं. सीवान शहर में मेरी दो दुकानें थीं. एक किराने की और दूसरी परचून की. समृद्ध और संपन्न न भी कहें तो कम से कम खाने-पीने की कमाई तो होती ही थी. मैं छह संतानों का पिता था. चार बेटे, दो बेटियां. 16 अगस्त, 2004 से सारी बातें इतिहास में बदल गईं. उसके बाद मेरे नसीब में सिर्फ और सिर्फ भयावह भविष्य बाकी बचा. 16 अगस्त, 2004 की बात पूछ रहे हैं तो बताता हूं. साहस नहीं जुटा पा रहा लेकिन बताऊंगा. मैं उस दिन किसी काम से पटना गया हुआ था. अपने भाई के पास रुका हुआ था. मेरे भाई पटना में रिजर्व बैंक में अधिकारी थे. सीवान शहर में मेरी दोनों दुकानें खुली हुई थीं. एक पर सतीश बैठता था, दूसरे पर गिरीश. मेरे पटना जाने के पहले मुझसे दो लाख रुपये की रंगदारी मांगी जा चुकी थी. उस रोज किराने की दुकान पर डालडे से लदी हुई गाड़ी आई हुई थी. दुकान पर 2.5 लाख रुपये जुटाकर रखे थे. रंगदारी मांगने वाले फिर पहुंचे. दुकान पर सतीश था. सतीश ने कहा कि खर्चा-पानी के लिए 30-40 हजार देना हो तो दे देंगे, दो लाख रुपये कहां से देंगे. रंगदारी वसूलने आए लोग ज्यादा थे. उनके हाथों में हथियार थे. उन लोगों ने सतीश के साथ मारपीट शुरू की, गद्दी में रखे हुए 2.5 लाख रुपये ले लिए. राजीव यह सब देख रहा था. सतीश के पास कोई चारा नहीं था. वह घर में गया. बाथरूम साफ करने वाला तेजाब रखा हुआ था. मग में उड़ेलकर लाया, गुस्से में उसने तेजाब फेंक दिया जो रंगदारी वसूलने आए कुछ लोगों पर पड़ गया. तेजाब के छीटें मेरे बेटे राजीव पर भी आए. भगदड़ मच गई, अफरातफरी का माहौल बन गया.

‘लुंगी-गंजी में एसपी साहब आए. मैंने कहा कि सुरक्षा चाहिए. एसपी साहब ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए, सीवान अब आपके लिए नहीं है. चाहे तो यूपी चले जाइए या कहीं और. हम एस्कॉर्ट कर सीवान के घर में जो सामान है, वह वहां भिजवा देंगे’
इसके बाद उन लोगों ने सतीश को पकड़ लिया. राजीव भागकर छुप गया. फिर मेरी दुकान को लूटा गया. जो बाकी बचा उसमें पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी गई. वे लोग सतीश को गाड़ी में ठूंसकर ले गए. गिरीश दूसरी दुकान पर था. उसे इन बातों की कोई जानकारी नहीं थी. कुछ देर बाद उसके पास भी कुछ लोग पहुंचे. गिरीश से ही लोगों ने पूछा कि चंदा बाबू की कौन-सी दुकान है. गिरीश को लगा कि कोई सामान लेना होगा. उसने उत्साह से आगे बढ़कर बताया कि यही दुकान है. क्या चाहिए, क्या बात है? उसे कहा गया कि चलो, जहां कह रहे हैं चलने को. गिरीश ने कहा कि बस शर्ट पहनकर चलते हैं लेकिन उसे शर्ट पहनने का मौका नहीं दिया गया. पिस्तौल के हत्थे से उसे मारा गया और मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले जाया गया. तब तक राजीव को भी उन लोगों ने पकड़कर रखा था. मेरे तीनों बेटे उन लोगों के कब्जे में थे, जिन लोगों ने दो लाख रुपये रंगदारी न देने के कारण मेरी दुकान को आग लगाकर लूटा था. एक जगह ले जाकर राजीव को बांधकर छोड़ दिया गया और सतीश व गिरीश को सामने लाया गया. वहां कई लोग मौजूद थे. उन लोगों ने सतीश और गिरीश को तेजाब से नहलवाया. जब वे लोग मेरे बेटों को तेजाब से नहला रहे थे तो कह रहे थे कि तेजाब फेंका था हम लोगों पर, आज बताते हैं तेजाब कैसे जलाता है. बड़े बेटे राजीव की आंखों के सामने उसके छोटे भाइयों सतीश और गिरीश को तेजाब से जलाकर मार डाला गया. तेजाब से नहलाते वक्त वे लोग कहते रहे कि राजीव को अभी नहीं मारेंगे, इसे दूसरे तरीके से मारेंगे. सतीश और गिरीश को जलाने के बाद उन्हें काटा गया, फिर उनके शव पर नमक डालकर बोरे में भरकर फेंक दिया गया. मैं पटना में था तो मेरे पास खबर पहुंची कि आपको सीवान नहीं आना है, आपके दो बेटे मारे जा चुके हैं, एक बेटा कैद में है, आपको भी मार डाला जाएगा. मैं पटना में ही रह गया. राजीव वहीं कैद में फंसा रहा. दो दिनों बाद राजीव वहां से भागने में सफल रहा. गन्ने से लदे एक ट्रैक्टर से राजीव चैनपुर के पास उतर गया, फिर वहां से उत्तर प्रदेश के पड़रौना पहुंचा. पड़रौना में सांसद के घर पहुंचा. वहां के सांसद ने शरण दी और कहा कि किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं, चुपचाप यहीं रहो. राजीव वहीं रहने लगा. मेरे घर से मेरी पत्नी, मेरी दोनों बेटियां भी घर छोड़कर जा चुकी थीं और मैं पटना में था. सब इधर से उधर थे. किसी को नहीं पता कि कौन कहां है. हम लोगों ने तो सोच लिया था कि राजीव भी मार दिया गया होगा. मैंने सीवान में अपने घर के आसपास फोन किया तो वहां से भी मालूम चला कि तीनों बेटे मार दिए गए हैं. मेरे पास भी एक फोन आया कि आपका बेटा छत से गिर गया है. दरअसल उस समय मुझे भी पीएमसीएच बुलाकर मार दिए जाने की योजना बनाई गई थी.

‘नेता जी के यहां पटना फिर चला गया. वहां सोनपुर के लोग अपनी बात रख रहे थे. बीच में मैं बोल पड़ा कि हुजूर मैं सब कुछ गंवा चुका हूं, मुझे सुरक्षा चाहिए. नेता जी गुस्से में आ गए और कहा कि सीवान का लोग सोनपुर की मीटिंग में कैसे घुस गया’
बाद में मैं हिम्मत जुटाकर सीवान गया. वहां जाकर एसपी से मिलना चाहा. एसपी से नहीं मिलने दिया गया. थाने पर दारोगा से मिला. दारोगा ने कहा कि अंदर जाइए पहले. फिर कहा गया कि आप इधर का गाड़ी पकड़ लीजिए, चाहे उधर का पकड़ लीजिए, किधर भी जाइए लेकिन सीवान में मत रहिए. सीवान में रहिएगा तो आपसे ज्यादा खतरा हम लोगों पर है. मुझे सुझाव दिया गया कि पटना में एक बड़े नेता से मिलिए. छपरा के सांसद को लेकर पटना में नेता जी के पास गया. नेता जी से कहा कि जो खत्म हुए सो खत्म हो गए लेकिन जो बच गए हैं, उन्हें बचा लिया जाए. नेता जी ने कहा कि सीवान का मामला है, हम कुछ नहीं बोल सकते. नेता जी के पास मेरे साथ मेरे रिजर्व बैंक वाले भाई भी गए थे. अभी हम नेता जी के पास से निकल ही रहे थे कि मेरे भाई के पास सीवान से उन लोगों का फोन आ गया, जिन लोगों ने मेरे बेटों को मारा था. कहा गया कि नेता जी के पास गए थे शिकायत लेकर, मुक्ति के लिए. आप रिजर्व बैंक में नौकरी करते हैं न, आपका यही नंबर है न! मेरे भाई घबरा गए. उन्होंने कहा कि तुम कहीं और चले जाओ लेकिन यहां मत रहो, मैं भी नहीं रहूंगा. मेरे भाई ने तुरंत मुंबई ट्रांसफर करा लिया. वहां जाने के बाद भी उनको धमकी भरे फोन आते थे. उन्हें डर और दहशत से दिल का दौरा पड़ा, वे गुजर गए.

IMG-20160309-WA0013
दीवार पर चंदा बाबू के दिवंगत बेटों की तस्वीर
मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया था. अब तक मेरे बेटे राजीव के बारे में कुछ भी नहीं पता चला था कि वह जिंदा भी है या नहीं. है भी तो कहां है. मेरी पत्नी-बेटी और मेरा एक विकलांग बेटा कहां रह रहा है, वह भी नहीं पता था. मैं डर से पटना ही रहने लगा. साधु की तरह दाढ़ी-बाल बढ़ गए. 15 दिनों तक इधर से उधर पैदल पागलों की तरह घूमता रहा. बाद में एक विधायक जी के यहां शरण मिली. उन्होंने समझाया कि दिन में चाहे जहां रहिए, रात को यहीं आ जाया करिए. ज्यादा पैदल मत घूमा कीजिए, आपको मार देगा लोग. मैं लगातार जुगत में था कि किसी तरह फिर नेता जी के पास पहुंचूं. इसी बीच मुझे मालूम चल गया था कि मेरा बेटा राजीव जिंदा है. एक दिन मैं पटना में सोनपुर की एक राजनीतिक टीम के साथ शामिल होकर रात में नेता जी के यहां फिर चला गया. सोनपुर के लोग अपनी बात रख रहे थे. उस बीच मैं भी उठा और बोला कि हुजूर मेरी समस्या पर भी ध्यान दीजिए, मैं सब कुछ गंवा चुका हूं, मुझे सुरक्षा चाहिए. नेता जी गुस्से में आ गए और कहा कि सीवान का लोग सोनपुर की मीटिंग में कैसे घुस गया. इसके बाद थोड़ा आश्वासन मिला. तब राज्य के डीजीपी नारायण मिश्र थे. उन्हें निर्देश मिला कि मेरे मामले को देखें. डीजीपी से मिला, उन्होंने आईजी के नाम पत्र दिया. आईजी से किसी तरह मिला तो डीआईजी के नाम पत्र मिला, डीआईजी ने एसपी के नाम पत्र दिया. मैं पत्रों के फेर में इधर से उधर फेरे लगाता रहा. हताशा-निराशा लगातार घर करते रही, थक-हारकर फिर दिल्ली चला गया. सोनिया जी के दरबार में पहुंचा. तब सोनिया जी नहीं थीं, राहुल जी से मिला. राहुल जी मिले, उन्होंने कहा कि आप जाइए, बिहार में राष्ट्रपति शासन लगने वाला है, आपकी मुश्किलों का हल निकलेगा. फिर हिम्मत जुटाकर सीवान आया. एसपी साहब के पास चिट्ठी देने की बात थी. अपने कई परिचितों को कहा कि आप लोग चलिए, सुबह-सुबह चलेंगे तो कोई देखेगा नहीं लेकिन सीवान में साथ देने को कोई तैयार नहीं हुआ. हमारे लोगों ने सलाह दी कि आप सुबह जाइए या आधी रात को, हम लोगों को अपनी जान प्यारी है, साथ नहीं दे सकते. लोगों ने सलाह दी कि एसपी साहब को रजिस्ट्री से चिट्ठी भेज दीजिए. मैंने अपने विवेक से काम लिया. सुबह पांच बजे एसपी आवास पहुंचा तो सुरक्षाकर्मी ने रोका. मैंने उससे आग्रह किया कि मेरे पास पांच मिनट का ही समय है, बस एक बार एसपी साहब से मिलवा दो, पांच मिनट से ज्यादा नहीं रुक सकता यहां. सुरक्षाकर्मी ने कहा, आप चिट्ठी दे दें, मैं दे दूंगा. मैं इसके लिए तैयार नहीं हुआ. फिर वह एसपी साहब को जगाने चला गया.

‘शहाबुद्दीन को जमानत मिलना तय था. यह 16 जून, 2014 को ही तय हो गया था कि अब आगे का रास्ता साफ हो गया. उस दिन मेरे बेटे राजीव की सरेआम हत्या हुई थी. राजीव को 19 जून को अदालत में गवाही देनी थी. वह इकलौता चश्मदीद गवाह था’
लुंगी-गंजी (बनियान) में एसपी साहब आए. मैंने कहा कि सुरक्षा चाहिए, यह चिट्ठी है. एसपी साहब ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए, सीवान अब आपके लिए नहीं है. चाहे तो यूपी चले जाइए या कहीं और. हम एस्कॉर्ट कर सीवान के घर में जो सामान है, वह वहां भिजवा देंगे. मैंने एसपी साहब को कहा कि पटना के कंकड़बाग में आपका जो घर है, उसमें कई दुकानंे हैं, एक दे दीजिए हुजूर, वहीं दुकान कर लेंगे, पूरा परिवार वहीं रह लेगा. एसपी साहब नकार गए, बोले ऐसा कैसे होगा. मैंने भी एसपी साहब को कह दिया- साहब आप सुरक्षा दीजिए या मत दीजिए, रहूंगा तो सीवान में ही, सीवान नहीं छोड़ूंगा. एसपी साहब डेट पर डेट बदलते रहे कि कल आइए, परसों आइए. फिर से डीआईजी साहब के पास गया कि आपकी चिट्ठी बस अब तक चिट्ठी भर ही है. डीआईजी साहब ने कहा कि मैं रास्ता निकलता हूं. तब एके बेग साहब डीआईजी थे. डीआईजी साहब ने मदद की. उन्होंने एसपी साहब से कहा कि इन्हें सुरक्षा दीजिए, अगर आपके पास जिले में बीएमपी के जवान नहीं हैं तो मैं दूंगा लेकिन इन्हें सुरक्षा दीजिए. तब जाकर सुरक्षा मिली. मैं साहस कर रहने लगा कि अब मरना ही होगा तो मर जाएंगे. बाद में बेटा राजीव आया, अपनी मां, बहन और विकलांग भाई को भी लेते आया. घर-परिवार आया तो बेटे-बेटी की शादी के बारे में सोचा. बेटे राजीव की शादी की. शादी के 18वें दिन और मामले में गवाही के ठीक तीन दिन पहले उसे मार दिया गया. मेरा बेटा राजीव चश्मदीद गवाह था. मेरा बेटा राजीव इसके पहले भी कोर्ट में अपना बयान देने गया था. जिस दिन बयान देने गया था उस दिन भी उसे कहा गया था, ‘हमनी के बियाह भी कराईल सन आउरी श्राद्ध भी.’

बाहुबली: जिस जीरादेई में देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था. उस इलाके से पहली बार विधयक बनकर शहाबुद्दीन राजनीति में आए थे.
सच में ऐसा ही हुआ. जब गवाह ही मार डाला गया तो जमानत मिलनी ही थी, सो हाई कोर्ट में केस कमजोर पड़ गया. मैं तो अपने जले हुए घर में वापस नहीं आना चाहता था, वे तो एक डीएसपी सुधीर बाबू आए, उन्होंने बहुत भरोसा दिलाया कि चलिए, आपको डर लगता है तो हम रहेंगे आपके साथ. उनकी ही प्रेरणा से अपने घर को लौट सका. अब घर में मैं, मेरी बीमार पत्नी और एक विकलांग बेटा रहता है. बेटियों की शादी कर दी. लोन में दबा हुआ हूं. छह हजार रुपये की मासिक आमदनी है. तीन-तीन हजार रुपये दोनों दुकानों से किराया आता है. इस छह हजार की कमाई से ही पत्नी की बीमारी का इलाज होता है, दवाई आती है, आटा-चावल आता है और बेटियों की शादी का लोन चुकाता हूं. मेरे तीन बेटों की हत्या हुई, बेटों की हत्या का मुआवजा भी नहीं मिला. यह शिकायत है मेरी नीतीश कुमार से. खैर, अब क्या किसी से शिकायत. खुद से ही शिकायत है कि मैं कैसी किस्मत का आदमी हूं, जो शासन, व्यवस्था, कानून, खुद से… सबसे हार गया. अब ऐसे में आप पूछ रहे हैं कि क्या आप आगे सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे. मेरी स्थिति में, मेरे हालात में पहुंचा कोई आदमी आगे लड़ने लायक बचा होगा, क्या आप इसकी उम्मीद करते हैं?

(तहलका हिंदी)

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
शहाबुद्दीन जेल से रिहा, 1300 गाड़ियों के काफिले के साथ सीवान रवाना.. शहाबुद्दीन जेल से रिहा, 1300 गाड़ियों के काफिले के साथ सीवान रवाना..(0)

बिहार के बाहुबली आरजेडी नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन शनिवार को जेल से रिहा हो गया. सीवान के चर्चित तेजाब कांड में हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद शनिवार सुबह वह जेल से रिहा हुए. शहाबुद्दीन को कुछ दिनों पहले पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के आरोपों में घिरने के बाद सीवान से भागलपुर जेल शिफ्ट किया गया था. बताया जा रहा है कि जेल से रिहा होने के बाद शहाबुद्दीन 1300 गाड़ियों के काफिले के साथ सीवान जाएंगे. उसकी रिहाई को लेकर बीजेपी ने आपत्ति जताई है. बीजेपी का कहना है कि जंगल राज के प्रतीक रहे शहाबुद्दीन के बाहर आने की खबर से लोग सहमे हुए हैं.

शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने की खबर मिलते ही सिवान प्रशासन ने चौकसी बढ़ा दी है. जगह-जगह सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है. राज्य में पहले ही कानून-व्यवस्था बदहाल है और वहां गुंडाराज फैला है. अब शहाबुद्दीन के रिहा होने से राज्य में अपराध बढ़ेंगे.

तेजाब से नहलाकर की चश्मदीद की हत्या
शहाबुद्दीन दो भाइयों की तेजाब से नहलाकर हत्या करने और बाद में हत्याकांड के इकलौते गवाह उनके तीसरे भाई राजीव रौशन की हत्या के मामले में भागलपुर जेल में बंद था. दोहरे हत्याकांड में उसे हाई कोर्ट से फरवरी में ही जमानत मिल चुकी थी. बुधवार को चश्मदीद की गवाह की हत्या के मामले में भी अदालत ने उसकी जमानत मंजूर कर ली. इसके बाद उसकी रिहाई होगी.

ऐसे बना बाहुबली
शहाबुद्दीन के अपराध की कहानी 15 मार्च 2001 को लालू की पार्टी के एक नेता को गिरफ्तार करने आए पुलिस ऑफिसर संजीव कुमार को थप्पड़ मारने से शुरू हुई थी. इस घटना के बाद शहाबुद्दीन के समर्थकों और पुलिस के बीच काफी लंबी झड़प हुई. थप्पड़ मारने वाले शहाबुद्दीन के घर पुलिस ने छापेमारी की. इस दौरान शहाबुद्दीन के समर्थकों और पुलिस के बीच गई घंटों तक गोलीबारी हुई. इस घटना में 10 लोग मारे गए और पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा. तभी से वह एक बाहुबली के रूप में पहचाना जाने लगा.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
एक थी डेल्टा.. एक थी डेल्टा..(0)

-भंवर मेघवंशी||
भारत पाकिस्तान की सीमा पर बसे गाँव त्रिमोही की बेटी डेल्टा ,जो इस रेगिस्तानी गाँव की पहली बेटी थी जिसने बारहवीं पास करके रीति रिवाजों में जकड़े समाज की सीमा का उल्लघंन किया था ,उच्च शिक्षा के लिए बाहर गयी .उसके मन में कईं सपने थे ,जिन्हें वो साकार करना चाहती थी ,उन्मुक्त गगन में उड़ना चाहती थी वो ,अपने मेहनकश माता ,पिता और दलित समुदाय का आदर्श सितारा बनना चाहती थी वो ,मगर अफ़सोस यह है की महज 17 वर्ष की डेल्टा इस व्यवस्था की क्रूरता की निर्मम शिकार हो गई .जिन लोगों के संरक्षण में डेल्टा को सुरक्षित मानकर छोड़ा गया था .वे रक्षक ही हत्यारे और बलात्कारी बन बैठे और 29 मार्च 2016 को उसकी बलात्कार के बाद जघन्य हत्या कर दी गई .
एक होनहार बेटी की मौत से दलित ,बहुजन, मूलनिवासी समाज थोड़ी देर के लिए जागा ,धरने भी प्रदर्शन किये . नतीजतन जनाक्रोश से डर कर राजस्थान की घोर सामंतवादी सरकार ने सीबीआई जाँच का नाटक किया ,मगर डेल्टा की मौत के तीन माह गुजर जाने के बावजूद आज तक सीबीआई जाँच होना तो दूर की बात है ,ऐसी किसी जाँच के लिए केंद्र सरकार की ओर से नोटिफिकेशन तक जारी नहीं किया गया है. दलितों की भावनाओं की कितनी कद्र करती है ये समरसता की पैरोकार सरकार ,इसका पता इस बात से चलता है कि इसी राज्य में घोषित गुंडों की मौत की जाँच तुरंत सीबीआई को सौंपी जाती है ,मगर बहुजन समाज की होनहार बेटी की क्रूर हत्या की जाँच राजस्थान की नाकारा पुलिस करती है .
अब तो ऐसा लगता है कि डेल्टा की हत्या को एक तमाशा बना दिया गया है ,समाज की एक प्रतिभाशाली बेटी के शव को कई सरकारी ,गैर सरकारी ,राजनीतिक ,जातीय और प्रशासनिक गिद्द नौंचने में लगे हुए है .रसूखदार आरोपियों को बचाने के लिए स्पष्ट हत्या को आत्महत्या करार दिया गया है .डेल्टा के लिए लड़ रहे वकीलों तक के सुर रातों रात बदल गए है .इस मसले में भी लोग दलाली करने से नहीं चूके ,कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि कुछ लोग सड़कों से सीधे स्कार्पियों में आ गये है ,छुटभैयों को पार्टी में पद मिल गये है और जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी ख़ामोशी ओढ़े रखी ,उन्हें लाल बत्तियां नसीब हुई है .अमानवीयता की पराकाष्ठा तक पंहुच कर लालचियों ने इस पूरे मसले का अपने अपने तरीके से लाभ लेने की निष्ठुर कोशिशें की है .रही बात वृहत्तर समाज की ,तो उसने शुरुआत में हल्की सी जुम्बिश ली और फिर लम्बी चादर तान कर खुद को मुर्दों का समाज साबित कर दिया है .
डेल्टा के न्याय के लिए संघर्ष कर रहे उसके यौद्धा पिता महेंद्रा राम मेघवाल,उनके हिम्मती परिजन और अन्य संघर्षशील साथीगण अब स्वयं को अकेला पा रहे है ,उनका लड़ने का ज़ज्बा आज भी उतना ही है, ना ही उन्होंने उम्मीद छोड़ी है ,पर जिन लोगों से उन्हें सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा है वो आज आरोप ,प्रत्यारोप और राजनीतिक नफा नुकसान को मद्देनजर रख कर अपना कदम निर्धारित कर रहे है .इसका फलित यह है कि डेल्टा के पक्ष में देश के कोने कोने तथा विदेशों तक में जस्टिस फॉर डेल्टा के नारों के साथ खड़ी हुई बिरादरी को पता ही नहीं चल पा रहा है कि आखिर डेल्टा के मामले में आगे क्या हुआ है .
ज्यादातर लोग इसी गलतफहमी में है कि सीबीआई जाँच चल रही है .मगर सच्चाई तो कुछ और ही है .इसलिए हमने सोचा है कि डेल्टा की पैदाइश से लेकर उसकी परवरिश तथा पढाई और उसके साथ हुए अन्याय एवं उसको न्याय नहीं मिले इसके लिए किये जा रहे दुश्चक्र की जानकारी परत दर परत सब तक पंहुचाई जाये.
यह सीरिज बहुत सारे साथियों से बातचीत करके लिखी जा रही है फिर भी इसमें कोई तथ्यात्मक त्रुटि परिलक्षित हो तो हमें अवगत करावें . यहाँ डेल्टा के नाम का ज़िक्र उनके परिजनों की सहमति से किया जा रहा है ,वो चाहते है कि उनकी जांबाज़ बेटी के संघर्ष और उसके साथ हुई संस्थानिक क्रूरता के बारे में सब लोग जानें और न्याय की इस जंग में उनके संग खड़े हों .

राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर जिले का क़स्बा गडरारोड कभी पाकिस्तान का हिस्सा हुआ करता था ,नाम था गडरा .विभाजन के बाद निरंतर युद्धों की विभीषिका झेलने के कारण पाकिस्तानी सीमा में स्थित गडरा उजड़ गया तथा वहां के ज्यादातर नागरिक गडरारोड आ कर बस गये .स्थानीय निवासी रमेश बालाच बताते है कि तारबंदी होने से पहले तक सीमापार से लोग आ कर कभी भी यहाँ पर लूटपाट कर लेते थे ,जिंदगी बहुत दूभर थी .लोग घर बनाते थे और सेना उजाड़ देती थी .अक्सर गाँव खाली करना पड़ता था .जिसके चलते सब कुछ अनिश्चित सा था .लोग पक्के घर बनाने से भी हिचकते थे ,पढाई ,व्यापार आदि पर भी इसका असर पड़ता था .
इसी गडरा रोड से दो किलोमीटर पाकिस्तान सीमा की तरफस्थित है त्रिमोही गाँव .भारत का आखिरी गाँव ,जहाँ से आप सरहद को अपनी आँखों से देख सकते है .तारबंदी साफ दिखलाई पड़ती है. सीमापार की एक मस्जिद भी दिखती है ,जहाँ से दिन में कई बार अजान की आवाज भी सुनाई देती है .हालाँकि तारबंदी के चलते सीमापार से होने वाली लूटपाट से तो राहत है ,मगर हर वक़्त फौजी बूटों की आवाज़ अब भी यहाँ के लोगों को असहज रखती है .सामरिक महत्व के इस इलाके में सेना ,पुलिस तथा कई प्रकार की गुप्तचर एजेंसियां अपनी मुस्तैद निगाहें जमाये रहती है .सरहदी गाँव होना ही चुनौती से भरा होता है ,ऊपर से थार के रेगिस्तान का हिस्सा होना जीवन को और विकट बनाता है. ऐसे दुर्गम गाँव त्रिमोही में साठ फीसदी आबादी मेघवाल अनुसूचित जाति की है ,दो परिवार भील जनजाति के है और लगभग चालीस प्रतिशत लोग अल्पसंख्यक समुदाय के है .दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग यहाँ पर बेहद भाईचारे से रहते है तथा एक दुसरे के सुख दुःख में सहभागी बनते है .
त्रिमोही के अधिकतर मकान कच्चे या अधपके हैतो कुछेक पक्के भी ,पर भव्य और विशाल मकान इस गाँव में नहीं मिलते .सरकारी सुविधाओं के नाम पर आंगनबाड़ी है और एक राजकीय प्राथमिक पाठशाला भी .इसी विद्यालय में कार्यरत शिक्षक है महेंद्रा राम मेघवाल .42 वर्षीय महेंद्रा राम मेघवाल त्रिमोही के इसी विद्यालय ,जिसे पहले राजीव गाँधी स्वर्णजयंती पाठशाला कहा जाता था ,में बतौर शिक्षा सहयोगी नियुक्त हुए थे ,उन्हें सिर्फ 1200 रुपये मानदेय दिया जाता था .इतने अल्प मानदेय पर उन्होंने वर्ष 1999 से काम शुरू किया तथा 2007 तक प्रबोधक के नाते काम किया ,वेतन फिर भी मात्र 4,200 रूपये ही था .बाद में उन्हें तृतीय श्रेणी शिक्षक के रूप में इस स्कूल में ही नियुक्ति मिल गई .अभी भी वेतनमान कोई बहुत अधिक नहीं है .सब कटने के बाद उनके हाथ में महज़ 13 हजार रूपये आते है .इतने कम वेतनमान के बावजूद शिक्षक महेंद्रा राम का सोच बहुत विस्तृत रहा ,उन्होंने सदैव अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाने की सोच रखी .
वेतन के अलावा आय का कोई जरिया तो घर में है नहीं ,पिताजी के पास थोड़ी बहुत जमीन है ,जिसपर सिर्फ बरसाती फसल होती है ,जिससे घर का कुछ महीने खाने पीने का काम चल जाता ,बाकि घर खर्च और पढाई का सारा भार महेंद्रा राम मेघवाल के ही कन्धों पर रहा है .महेंद्रा राम के पास दो छोटे छोटे कमरे ही है ,उन्होंने अपना सर्वस्व अपनी संतानों को पढ़ाने में लगाने की ठान रखी थी .
उनकी पत्नी लहरी देवी एक सुघड़ गृहिणी और खेती व् पशुपालन में मनोयोग से जुटी रहने वाली कर्मयोगिनी है ,जिसका ख़्वाब भी अपने बच्चों को आगे बढ़ाने का ही रहा है .महेंद्रा राम के परिवार में उनके बुजुर्ग पिता राणा राम सहित कुल 6 लोग अब बचे है .महेंद्रा राम ,उनकी पत्नी लहरी देवी ,दो बेटे प्रभुलाल व अशोक कुमार और छोटी बेटी नाखू कुमारी .दोनों बेटे पी एम टी की तैयारी के लिए कोटा और बीकानेर में रह कर पढ़ रहे थे ,छोटी बेटी नाखू ग्यारहवीं कक्षा उत्तीर्ण कर चुकी है .इसी हंसते खेलते परिवार की प्रिय बेटी थी डेल्टा .सरहदी गाँव त्रिमोही की प्रथम बालिका जिसने आज़ादी के बाद बारहवीं कक्षा तक पढाई करने का गौरव हासिल किया था .
शिक्षक महेंद्रा राम मेघवाल का एक ही जूनून था कि वह अपने बच्चों को ऊँची से ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते थे ,उनकी इच्छा थी कि डेल्टा पढ़ लिख कर एक दिन आई पी एस बने ,बेटे डॉक्टर बने और छोटी बेटी भी अपनी रूचि के मुताबिक उच्च शिक्षा हासिल करें. इसके लिए उनकी अल्प आय काफी नहीं थी ,इसलिए महेंद्रा राम ने कई प्रकार के लोन ले रखे है ,उन्होंने ढाई लाख रुपये का सरकारी तथा तक़रीबन 18 लाख रुपये साहूकारी ब्याज पर ले कर अपने बच्चों का भविष्य बनाने के सपने बुने और रात दिन इसी उधेड़बुन में लगे रहे .जिंदगी अच्छे से चल रही थी .बच्चे भी पढाई लिखाई में होशियार साबित हो रहे थे ,पर उनको सबसे ज्यादा नाज़ अपनी लाडली बेटी डेल्टा पर था ,जो बचपन से ही होनहार थी और अपनी प्रतिभा के चलते पुरे गाँव ,परिवार तथा समाज की लाड़ली बेटी बनी हुई थी .महेंद्रा राम उम्मीदों से भरे हुए थे ,पर भारत जैसे जातिवादी देश में किसी दलित पिता को इतना खुश होने की कोई जरुरत नहीं है ,क्योँकि यहाँ पग पग पर ऐसी क्रूर सामाजिक व्यवस्था बनी हुई है ,जो कभी भी इस देश के मूलनिवासियों के चेहरे की मुस्कान छीन सकती है
..और अंततः महेंद्रा राम के साथ भी वही हुआ जो एकलव्य के साथ हुआ ,जो निषाद के साथ हुआ ,जो रोहित वेमुला के साथ हुआ .महेंद्रा राम के जीवन भर की तपस्या एक ही दिन में भंग कर दी गई .जिस लाडली बेटी डेल्टा को वो आईपीएस देखना चाहते थे ,उसका मृत शव देखना पड़ा और जिन बेटों को डॉक्टर बनाना चाहते थे ,वो पढाई अधूरी छोड़ कर घर लौट आये .जिस छोटी बिटिया नाखू को वो खूब पढाना चाहते थे ,वह अपनी पढाई छोड़ कर घर बैठी हुई है .अपनी लाड़ली बेटी खो चुके महेंद्रा राम कहते है कि- “ हम नहीं चाहते है कि नाखू भी डेल्टा की तरह छोटी जिंदगी जिए ,हम अपने बच्चों को नहीं खोना चाहते है “.

7 मई 1999 को शिक्षक महेन्द्रा राम के घर जन्मी पुत्री का नाम डेल्टा रखा गया .त्रिमोही जैसे छोटे से गाँव के लिए यह नाम ही किसी अजूबे से कम नहीं था .यहाँ के अधिकांश लोगों में किसी ने भी अपनी पूरी ज़िन्दगी में ऐसा नाम सुना तक नहीं था .जो पढ़े लिखे है उन्होंने भी भूगोल की किताबों में डेल्टा के बारे में पढ़ा था ,लेकिन किसी का नाम डेल्टा ,यह तो अद्भुत ही बात थी .ऐसा नाम रखने के पीछे के अपने मंतव्य को प्रकट करते हुए महेन्द्रा राम मेघवाल बताते है कि – ‘ जिस तरह नदी अपने बहाव के इलाके में तमाम विशेषताएं छोड़ कर समंदर तक पंहुच कर मिट्टी को अनूठा सौन्दर्य प्रदान करती है ,जिसे डेल्टा कहा जाता है ,ठीक वैसे ही हमारे परिवार में पहली बेटी का आगमन हमारी जिंदगी को अद्भुत ख़ुशी और सुन्दरता देनेवाला था ,इसलिए मैंने उसका नाम डेल्टा रखा .मैं चाहता था कि मेरी बेटी लाखों में से एक हो ,उसका ऐसा नाम हो जो यहाँ पर किसी का नहीं है .” वाकई अद्वितीय नामकरण किया महेन्द्राराम ने अपनी लाड़ली बेटी का !
कहते है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात ,सो डेल्टा ने अपने होनहार होने को अपनी शैशवावस्था में ही साबित करना शुरू कर दिया .वह जब अपने पैरो पर खड़ी होने लगी तो उसके पांव संगीत की धुन पर थिरकने लगते थे .बचपन में जब अन्य बच्चे तुतला तुतला कर अपनी बात कहते है ,तब ही डेल्टा स्पष्ट और प्रभावी उच्चारण करने लगी .महेन्द्राराम को विश्वास हो गया कि उसकी बेटी अद्भुत प्रतिभा की धनी है .उन्होंने उसे अपने विद्यालय राजीव गाँधी पाठशाला जहाँ पर वे बतौर शिक्षक कार्यरत थे ,वहां साथ ले जाना शुरू कर दिया .प्राथमिक शाला में पढ़ते हुए डेल्टा ने मात्र पांच साल की उम्र में दूसरी कक्षा की छात्रा होते हुए राष्ट्रिय पर्व पर आत्मविश्वास से लबरेज़ अपना पहला भाषण दे कर सबको आश्चर्यचकित कर डाला .जब वह चौथी कक्षा में पढ़ रही थी तो उसने रेगिस्तान का जहाज़ नामक एक चित्र बनाया ,जो राज्य स्तर पर चर्चित हो कर आज भी जयपुर स्थित शासन सचिवालय की दीवार की शोभा बढ़ा रहा है .मात्र आठ वर्ष की उम्र में डेल्टा ने फर्राटेदार अंग्रेजी में एक स्पीच दे कर लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया .
डेल्टा ने अपनी पांचवी तक की पढाई अपने ही गाँव त्रिमोही की राजीव गाँधी स्वर्णजयंती पाठशाला में की ,यहाँ पर वो हर प्रतियोगिता में अव्वल रही .आठवी पढने के लिए वह त्रिमोही से दो किलोमीटर दूर गडरा रोड में स्थित आदर्श विद्या मंदिर गयी .यहाँ भी हर गतिविधि और पढाई में वह आगेवान बनी . मेट्रिक की पढाई राजकीय बालिका माध्यमिक विध्यालय गडरा रोड से पूरी करके उसने सीनियर की शिक्षा स्वर्गीय तेजुराम स्वतंत्रता सेनानी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्राप्त की .यह सब उसने मात्र पंद्रह साल की आयु में ही कर दिखाया .
बहुमुखी प्रतिभासंपन्न डेल्टा सदैव अव्वल रहने वाली विद्यार्थी तो थी ही ,वह बहुत अच्छी गायिका भी थी ,उसके गाये भजनों की स्वर लहरियां श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किये देती थी .बचपन में ही उसके हाथों ने कुंची थाम ली थी ,वह किसी सधे हुए चित्रकार की भांति चित्रकारी करती थी .साथ ही साथ वह बहुत बढ़िया नृत्य भी करती थी .वह स्काऊट की लीडर भी थी और स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की परेड्स का भी नेतृत्व करती थी .
मात्र पांच साल की उम्र में मंच पर भाषण ,छह साल की उम्र में राज्य स्तरीय चित्रकारी ,आठ साल में इंग्लिश स्पीच ,दस साल की उम्र में परेड का नेतृत्व और पंद्रह साल की होते होते बारहवी कक्षा उत्तीर्ण करनेवाली डेल्टा हर दिल अज़ीज़ बन चुकी थी .वह इस इलाके की अध्ययनरत अन्य छात्राओं के लिए भी एक आदर्श बन गयी थी .त्रिमोही के हर अभिभावक की ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी भी डेल्टा जैसी होनहार बन कर गाँव और परिवार का नाम रोशन करें .
आत्मविश्वास से भरी डेल्टा अपने प्रिय पिता और परिजनों के स्वप्नों को साकार करना चाहती थी ,वह आईपीएस बनने के अपने पिता के सपने को पूरा करना चाहती थी ,लेकिन वो जानती थी कि उसके पिता महेन्द्राराम कितनी मुश्किलों से उसे और अन्य भाई बहनों को पढ़ा रहे थे ,इसलिए वह जल्दी से जल्दी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थी ,ताकि पिता पर भार कम हो .उसने शिक्षिका बनने का संकल्प लिया और जयनारायण व्यास विश्वविध्यालय द्वारा आयोजित बेसिक स्कूल टीचर कोर्स की प्रवेश परीक्षा में शामिल हो गयी ,यहाँ भी उसने अपनी कामयाबी के झंडे गाड़े ,उसने छह सौ अंको वाली यह परीक्षा चार सौ उनसत्तर अंको से पास कर ली .शुरुआत में उसे जैसलमेर सेंटर मिला ,जहाँ वह चार दिन रही भी ,लेकिन वहां का माहौल ठीक नहीं होने से वह घर लौट आई . बाद में नोखा स्थित श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय को सही जानकर उसे मात्र पंद्रह साल की आयु में सन 2014 में बीकानेर जिले के नोखा पढ़ने के लिये भेज दिया गया . जी हाँ उसी नोखा में .

नोखा ,जिसे सन 1926 में बीकानेर स्टेट के तत्कालीन महाराजा गंगासिंह ने स्थापित करवाया था .इतिहासकार ताराराम गौतम के अनुसार -” आजादी से पहले रियासतों के संघ के अध्यक्ष महाराजा गंगा सिंह थे. जिनका और बाबा साहब का गोल मेज कांफ्रेंस में मिलन हुआ. डॉ अम्बेडकर ने उनकी ओर से प्रीविपर्स और मुवावजे की पैरवी की थी. बाद में बीकानेर में उन के पुत्र ने डॉ अम्बेडकर की राजस्थान में पहली मूर्ति लगायी ” . इन्ही बीकानेर नरेश गंगासिंह द्वारा स्थापित नोखा बीकानेर जिले का एक बड़ा व्यावसायिक केंद्र माना जाता है ,यहाँ का मोठ पूरे एशिया में प्रसिद्ध है तथा हल्की रजाईयां देश विदेश तक लोकप्रिय है .व्यापारिक केंद्र होने की वजह से नोखा को नोखा मंडी कहा जाता है .
व्यापार वाणिज्य के साथ साथ यहाँ पर शिक्षण संस्थाओं का कारोबार भी खूब फला फूला .व्यापारिक जमात के सियासती रसूख वाले लोगों ने शिक्षा के बड़े बड़े संस्थान खोल लिए .यही पर स्थित है श्री आदर्श सेवा संस्थान जिसके कई विद्यालय महाविद्यालय चलते है .दक्षिणपंथी राजनीतिक सामाजिक संस्था समूहों में उच्च स्तरीय दखल रखने वाले ईश्वर चंद वैद इसके अध्यक्ष है .कहा जाता है कि उनसे आरएसएस से लेकर भाजपा तक के लोग उनसे उपकृत होते रहते है .आदर्श सेवा संस्थान द्वारा वर्ष 2007 से श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय संचालित है .इसी आदर्श ( ? ) कहे जाने वाले कोलेज में महेन्द्राराम ने अपनी प्रतिभावान बेटी डेल्टा को शिक्षिका बनने भेजा .
एक आदर्श शिक्षिका बनने का सपना लिये डेल्टा वर्ष 2014 में इस संस्थान में आई .उसे यहाँ पढ़ते हुए दूसरा बरस चल रहा था .बेसिक स्कूल टीचर कोर्स की द्वितीय वर्ष की छात्रा डेल्टा श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में भी हर गतिविधि में आगे रहती थी .वह पढने में तो तेजतर्रार थी ही ,नृत्य ,खेलकूद ,गायन तथा पेंटिंग जैसी शिक्षणत्तर कार्यों में सदैव अग्रणी भूमिका निभाती थी .हरफनमौला स्वभाव की डेल्टा में अंहकार नहीं था .वह सहज ,सरल ओर साफ दिल की भावुक बालिका थी .सबसे मीठा बोलती थी ,लडाई झगडा किसी से भी नहीं अपने काम से काम रखनेवाली लड़की के रूप में उसकी छवि थी .
डेल्टा इसी महाविद्यालय द्वारा संचालित बालिका छात्रावास की आवासिनी थी .उसके सहज स्वाभाव का फायदा उठाते हुए हॉस्टल वार्डन द्वारा हॉस्टल की सफाई का काम भी अक्सर उससे कराया जाता था .डेल्टा ने कभी भी इस बात की शिकायत नहीं की .उसका लक्ष्य जल्दी जल्दी अपनी ट्रेनिंग पूरी कर शिक्षिका बनना था .
सब कुछ ठीक ही चल रहा था .मार्च में इस साल जब होली की छुट्टियाँ हुयी तो और छात्राओं की भांति डेल्टा भी अपने गाँव त्रिमोही गई .खूब आनन्द उल्लास के साथ अपने परिजनों ओर गाँव के लोगों के साथ होली मनाई ओर 28 मार्च को अपने पिता महेन्द्राराम के साथ वापस हॉस्टल लौट आई .
डेल्टा को नोखा छोड़ कर महेन्द्राराम अपने घर के लिए रवाना हुए .घर पंहुचने पर उनके मोबाईल पर डेल्टा का रोते हुए फोन आया .उसने बताया कि आज हॉस्टल वार्डन प्रिया शुक्ला ने मुझे पीटीआई विजेन्द्रसिंह के कमरे में सफाई करने के लिए भेजा ,जहाँ पर विजेंद्र सिंह ने मेरे साथ ज्यादती की ओर धमकी दी कि अगर किसी को बताया तो जान से मार डालूँगा .वह बहुत डरी हुई थी .यह सुनकर महेन्द्राराम सन्न रह गए .अभी अभी तो वो अपनी लाड़ली को हंसती मुस्कराती छोड़कर आये ओर यह क्या हो गया ? जिस वार्डन के संरक्षण में उन्होंने अपनी बेटी रखी ,उसने ही उसकी आबरू तार तार करवा दी .महेन्द्राराम की हालत अजीब हो गयी ,उनके सोचने समझने की स्थिति ख़त्म हो रही थी ,उन्हें चक्कर आने लगे .किसी तरह खुद को संभाला ओर बिटिया को सांत्वना दी –बेटी मैं सुबह छुट्टी ले कर सीधा नोखा आ रहा हूँ,तुम डरना मत ,चिंता मत करना ,मैं सुबह स्कूल खुलते ही अवकाश लेकर रवाना हो जाऊंगा .
बेटी को तो उन्होंने दिलासा दे दिया पर खुद के मन को समझाना भारी हो रहा था .वो नहीं चाहते थे कि उनके परिजनों को इसकी भनक लगे ,इसलिए उनके सामने सामान्य होने की कोशिस करते रहे .रात भर नींद नहीं आई ,आँखों ही आँखों में पूरी रात गुजर गई .सुबह नोखा वापसी के लिए पैसों का इंतजाम किया ,स्कूल गए और सोचा कि आधे दिन का अवकाश लेकर निकल जाऊंगा ,ताकि घरवालों को भी शक ना हो और शाम होने से पहले ही बेटी तक पंहुचा भी जा सके .एक गरीब ग्रामीण कर्ज में दबे पिता के लिए किराये भाड़े की व्यवस्था भी कई बार पहाड़ लांघने जैसा दूभर काम हो जाता है .
खैर ,जाने के सारे इंतजाम हो चुके थे कि उनका फोन बजा ,नोखा थाने से फोन था .उन्हें जो सूचना दी गयी ,शायद ही कोई पिता हृदय को विदीर्ण करने वाले ऐसे शब्द सह सकें .उन्हें बताया गया कि -” आपकी पुत्री डेल्टा मृत अवस्था में कुंड में मिली है……”.

पुलिस के मुताबिक-
“ श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में बी एस टी सी ,बी एड की 16 छात्राएं संस्था परिसर में बने हॉस्टल में रहती है ,जो 20 मार्च को होली की छुट्टियाँ होने पर हॉस्टल में रहने वालीं छात्राएं अपने अपने गाँव चली गयी . 28 मार्च को छात्रा कुमारी डेल्टा मेघवाल सबसे पहले हॉस्टल में आई . उसके बाद छात्राएं शकीला बानो ,परमेश्वरी व मंजू आई .रात में लगभग 12 .30 बजे इसी हॉस्टल में रहने वाली एक नर्स श्रीमती लीना गुप्ता बाथरूम जाने के लिए जगी तो देखा कि मुख्य दरवाजा थोडा सा खुला हुआ था . गुप्ता ने लड़कियों के कमरे में जा कर देखा तो सभी लड़कियां एक ही कमरे में सो रही थी .कमरा खुला था ओर लाइट भी चालू थी .लेकिन जहाँ डेल्टा का बेड था ,वहां रजाई सीढ़ी रखी हुयी थी ,डेल्टा बेड पर नहीं थी .”
पुलिस के अनुसार –
“ लीना गुप्ता ने सोयी हुयी लड़कियों को जगाया ,उनसे डेल्टा के बारे में पूंछा ,डेल्टा को आवाज लगायी ,आस पास खोजा ,पर वह कहीं नहीं मिली .इसकी सूचना वार्डन प्रिय शुक्ला को दी गयी ,वह हॉस्टल पंहुची .डेल्टा की तलाश की मगर वह कहीं नहीं मिली .फिर वह लड़कियों को लेकर चौकीदार हनुमानसिंह के पास गई .पूरे परिसर में खोजबीन की गयी ,तब भी डेल्टा नहीं मिली .अंततः वार्डन अपने पति प्रतीक शुक्ला जो स्कूल के प्रिंसिपल भी है ,उसे बुला कर लायी .चौकीदार हनुमानसिंह को हॉस्टल परिसर में ही स्थित आवास में रहने वाले पी टी आई विजेन्द्रसिंह को बुलाने भेजा .पहले तो उसने दरवाजा ही नहीं खोला ,बाद में फोन करके दरवाजा खुलवाया गया .पीटीआई ने दरवाजा खोला और लाइट बंद करके बाहर आ गया तथा दरवाजे को बाहर से बंद कर दिया .वह भी डेल्टा की खोजबीन में शामिल हो गया .पीछे से वार्डन उसके क्वाटर में गयी ,लाइट ऑन की तो देखा कि वहां पर चारपाई पर डेल्टा बैठी हुई थी .प्रिया शुक्ला ने डेल्टा से पूंछा कि रात के समय पी टी आई के यहाँ क्यों गई तो डेल्टा का जवाब था कि पीटीआई सर के पास आंवले लेने आई थी .पीटीआई से पूंछा तो उसने बताया कि मैंने उसे नहीं बुलाया ,वह खुद आई थी ,इसके बाद वार्डन प्रिया शुक्ला ओर उसके पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला ने डेल्टा ओर पीटीआई विजेन्द्रसिंह से अलग अलग कागजों पर माफीनामा लिखवाया .”
पुलिस का दावा है कि –
“ रात्रि 3 बजे डेल्टा को नर्स लीना गुप्ता के साथ वापस हॉस्टल भेज दिया गया .डेल्टा अपने कमरे में जाकर सो गयी .सुबह जब डेल्टा को वहां नहीं पाया तो पता चला कि अभी अभी डेल्टा बाहर की तरफ गयी है .चारों तरफ खोजबीन की गयी ,डेल्टा नहीं मिली .चौकीदार हनुमानसिंह ने डेल्टा को कोलेज परिसर ,रेल्वे स्टेशन व बस स्टेंड पर ढूंढा पर वह कहीं नहीं मिली .वार्डन के ससुर श्याम शुक्ला ने बताया कि सुबह जब मैं घूम रहा था ,तब एक लड़की भोजनालय की तरफ जाते हुए दिखी थी ,जिस पर चौकीदार हनुमानसिंह हॉस्टल की दीवारों के पास तलाश करता हुआ पानी के कुंड को देखा तो उसमें डेल्टा की लाश नजर आई .इस घटना की सूचना प्रिंसिपल प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला ,संस्था के महामंत्री जगदीश मल लोढ़ा को दी गयी .उन्होंने इसकी सूचना संस्था के अध्यक्ष ईश्वर चंद बैद को दी .बैद नोखा के पूर्व विधायक कन्हैयालाल झंवर को साथ लेकर कोलेज पंहुचे .घटना की इत्तला थानाधिकारी नोखा को दी गई .इंचार्ज थाना रामकेश घटना स्थल पर पंहुचा .मृतका डेल्टा की लाश को पानी के कुंड से बाहर निकाल कर मोर्चरी रूम सी एच सी नोखा में रखवाई गई .”
ये है श्री आदर्श जैन कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय स्टाफ ,प्रबंधकों ओर उनसे मिली हुई नोखा पुलिस की कहानी ,जो यह साबित करने का प्रयास करती है कि हॉस्टल की एक नाबालिग दलित छात्रा रात के अँधेरे में अकेली हॉस्टल से बाहर निकली ,अपनी मर्जी से पीटीआई के क्वाटर पर पंहुची ,उसका दरवाजा खुलवाया स्वेच्छा से उसके बेड पर जा कर बैठ गई ,बाद में इसका पता चल जाने पर उसने माफीनामा लिख कर दिया .रात में अपने कमरे में जाकर आराम से सोयी ओर सुबह उठ कर पानी के कुंड में जा कर गिर कर मर गई .ऐसा लगता है जैसे डेल्टा कोई इंसानी जिस्म नहीं बल्कि एक रोबोट थी ,सब कुछ स्वतः ही बेहद सामान्य तरीके से घटित हो गया .
.एक नाबालिग दलित लड़की का रात में गायब होना ,पीटीआई के कमरे में उसका बरामद होना यहाँ के कोलेज के लिए बहुत आम बात की तरह थी ,इतनी बड़ी घटना की सुचना ना रात में पुलिस को दी गई और ना ही डेल्टा के परिजनों को दिया जाना ,क्या साबित करता है .सुबह फिर से डेल्टा का गायब होना ,चारों तरफ ढूंढने का नाटक किया जाना ,फिर भी पुलिस या परिजनों को सूचित नहीं करना ओर अंततः छात्रा की लाश पानी के कुंड में मिलना ,संस्था से जुड़े समस्त लोगों को बुलाया जाना तथा उनके मौके पर पंहुचने के बाद पुलिस का घटना स्थल पर पंहुचना ,किस बात की ओर ईशारा करते है .इससे भी ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि संस्था की ओर से सूचना देने के बजाय पुलिस द्वारा लाश मिलने के ढाई घंटे बाद डेल्टा के पिता महेन्द्राराम को फोन के ज़रिये सूचित करना क्या किन्ही संदेहों को जन्म नहीं देता है ?
पुलिस से लेकर कोलेज के प्रशासन की तरफ से जो कहानी रची गई है ,उसको सुनने और अब पुलिस द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र को देखने के बाद इस बनावटी कहानी का झुठापन अपने आप सामने आ रहा है .सब कुछ मैनेज कर लेने की होशियारी के बावजूद भी सैंकड़ों सवाल anu छुट गए अनुत्तरित है , जिनका जवाब न तो बीकानेर पुलिस के पास है और ना ही ईश्वर चंद बैद के आदर्श जैन कोलेज के पास .

डेल्टा की रहस्यमय परिस्तिथियों में हुई मौत जो कि वस्तुतः आत्महत्या नहीं है ,बल्कि बलात्कार के बाद की गई हत्या जैसा जघन्य अपराध है .उसे आत्महत्या में तब्दील करने की हरसंभव कोशिस 28 मार्च की रात ही शुरू कर दी गई थी .

पुलिस और कॉलेज प्रशासन का यह कहना कि 28 मार्च की रात में अपने कमरे से डेल्टा गायब थी और वह स्वत: ही पी टी आई विजेन्द्रसिंह के कमरे में पंहुची .यहीं से कहानी संदेहास्पद बनने लगती है .डेल्टा के परिजनों का कहना है कि –“ डेल्टा को रात के अँधेरे से बहुत डर लगता था ,वह अकेले कहीं बाहर नहीं निकलती थी “ ऐसे में यह सवाल लाज़िमी है कि वह हॉस्टल से निकल कर पीटीआई के कमरे तक अँधेरे में गई या उसे कोई ले कर गया ?

वार्डन प्रिया शुक्ला के मुताबिक जब हॉस्टल में डेल्टा नहीं मिली तो उसे बहुत ढूंढा गया और अंततः वह पीटीआई के कमरे में सामान्य स्थिति में पाई गई .बाद में दोनों से माफीनामा लिख कर छोड़ दिया गया .गर्ल्स हॉस्टल की एक प्रतिभावान नाबालिग दलित लड़की का गायब होना और बाद में एक पुरुष पिटीआई के यहाँ मिलना क्या वार्डन और कॉलेज प्रशासन के लिए इतनी सामान्य बात थी कि मामले को वहीँ रफा दफा कर दिया गया ? डेल्टा के स्थानीय अभिभावक ,पुलिस तथा उसके परिजनों को इसकी सुचना देना आवश्यक क्यों नहीं समझा गया ?

जो माफीनामे डेल्टा और विजेन्द्रसिंह से लिखवाये जाने की बात वार्डन प्रिया शुक्ला और उसके पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला बताते है ,उन दोनों माफीनामों की भाषा और लिखावट एक जैसी क्यों है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये माफीनामे डेल्टा की हत्या को आत्महत्या में बदलने के लिए निर्मित किये गये सबूत हो ? पुलिस का आरोप पत्र भी इस बारे में मौन है .चार्जशीट के मुताबित माफीनामों की एफ एस एल रिपोर्ट अभी प्राप्त होना शेष है .

वार्डन का यह कहना कि डेल्टा पीटीआई के क्वाटर में सामान्य स्थिति में थी ,जबकि पुलिस का आरोप पत्र यह कहता है कि मृतका डेल्टा और आरोपी विजेन्द्रसिंह के जब्तशुदा अंडरगारमेंट व बेडशीट पर मानव वीर्य मौजूद पाया गया .जाँच में बलात्कार किये जाने की पुष्टि हो चुकी है .इसका मतलब साफ है कि वार्डन और कॉलेज प्रशासन पीटीआई विजेंद्र को बचाने की भरपूर कोशिस में लगा हुआ था .कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें विजेन्द्रसिंह के अलावा भी कोई दोषी व्यक्ति हो ,जिसको भी बचाया जा रहा हो ? कहीं श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्रबंधन और प्रशासन से जुड़े लोग लड़कियों के यौन शोषण में संलिप्तता रखते हो ,जिनकी हवस की शिकार होने के बाद डेल्टा को सदा सदा के लिए मौत की नींद में सुला दिया गया हो ?

डेल्टा का शव जिस कुण्ड में बरामद हुआ ,उस समेत कोलेज में सात पानी के कुण्ड है ,जिनमे से छह पर ताले लगे हुये थे ,सिर्फ एक वो ही कुण्ड बिना ताले के क्यों रखा गया ,जिसमे गिरने की कहानी निर्मित की गई है ? मानव अधिकार संगठनों की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट डेल्टा के पानी में डूबने की पूरी थ्यौरी पर ही कई गंभीर सवाल उठाती है ,रिपोर्ट कहती है कि – “हमारा मानना है कि 5 फुट 6 इंच से भी ज्यादा लम्बी डेल्टा मेघवाल अगर डूबी होती तो 7 बजे सुबह जब लीना व अन्य छात्राओं तथा श्याम शुक्ला ने जब कुण्ड का ढक्कन उठा कर अंदर झांक कर देखा तो जरुर उसमे कुछ ना कुछ दिखता .हमारे दल का मानना है कि कुण्ड का मुंह उपर की तरफ 2 x 2 फिट खुलता है ,लेकिन अन्दर चौडाई संकरी हो जाती है ,लगभग 4 इंच का पत्थर दो तरफ से निकल रहा है जिससे कुण्ड के मुंह  से अंदर जाते जाते और छोटा हो जाता है .बिना किसी सहारे कुण्ड में किसी का कूदना आसान नहीं है ,क्यूंकि चौडाई संकरी है और ढक्कन लौहे की मोटी चद्दर का बना होने के कारण बिल्कुल भी नहीं रुकता है .साथ ही डेल्टा हॉस्टल के बाहर करीब 7 बजे निकली है तो हॉस्टल वार्डन प्रिया शुक्ला के ससुर बाहर टहल रहे थे और लीना गुप्ता भी तभी बाहर निकली थी .अन्य लड़कियां भी पीछे ही थी तो वह ढक्कन जो कि बिना जोर से आवाज किये बंद नहीं होता ,जिसकी आवाज हॉस्टल के अंदर तक सुनाई देती है ,उसकी आवाज किसी ने क्यों नहीं सुनी जबकि आधे से जयादा लोग तो उस वक्त बाहर ही घूम रहे थे .अगर डेल्टा ने कुण्ड का ढक्कन उठा कर कूदने की कोशिस की तो ढक्कन उसके सिर पर गिरा होता {क्यूंकि वह ढक्कन एक पल भी बिना पकडे खड़ा नहीं हो सकता है } अगर वह गिरा होता तो सिर पर जरुर चोट आई होती और खोपड़ी की हड्डी भी टूटी होती मगर मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार सिर पर कोई चोट नहीं है .”

पोस्टमार्टम की प्रारम्भिक रिपोर्ट में सिर पर कोई चोट नहीं है तथा डॉक्टर्स की ओपिनियन स्पष्ट थी कि मौत डूबने से नहीं हुई ,क्यूंकि मृतका के फेफड़ों में पानी नहीं पाया गया .लेकिन बाद में डॉक्टर्स की रीओपिनियन ली गई जिसमें –‘ पानी में डूबने से मृत्यु होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है ‘ अंकित किया गया .सवाल यह है कि मेडिकल बोर्ड ने किसके दबाव में यह दोबारा राय दी और अपनी ही पहली ओपिनियन और तथ्यों को बदलने की शर्मनाक कोशिस क्यों की  ?यह भी अत्यंत गंभीर तथ्य है कि मेडिकल बोर्ड ने डेल्टा के शव का अंतिम संस्कार हो जाने के बाद अपनी दूसरी राय व्यक्त की ताकि फिर से पोस्टमार्टम करने की सम्भावना ही क्षीण हो जाये .

कुल मिलाकर पुलिस ने कॉलेज प्रशासन द्वारा गढ़ी गई झूठी कहानी पर ही मोहर लगाई .डेल्टा के तथाकथित माफीनामे से लेकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ओपिनियन बदलने तक की सारी कार्यवाही आदर्श सेवा संस्थान के अध्यक्ष ईश्वर चंद ,वार्डन प्रिया शुक्ला ,उसके पति प्रतीक शुक्ला तथा विजेंद्र सिंह सहित हत्या और बलात्कार के आरोपियो को बचाने की कवायद भर दिखाई पड़ती है .वैसे भी जहाँ का पूरा सिस्टम सड़ चुका हो और अपराधियों को संरक्षित करता प्रतीत हो वहां की पुलिस के आरोप पत्र पर कौन यकीन कर सकता है .

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
जिम्बाब्वे दौरे पर गए टीम इंडिया दल के एक सदस्य पर रेप का आरोप.. जिम्बाब्वे दौरे पर गए टीम इंडिया दल के एक सदस्य पर रेप का आरोप..(1)

भारतीय क्रिकेट टीम के जिम्बाब्वे दौरे के दौरान रविवार (19 जून) को एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब सीरीज के प्रायोजकों में से एक से जुड़े अधिकारी को कथित बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हालांकि इस अधिकारी ने इस आरोप से इनकार किया और खुद को निर्दोष बताया है। यह विवाद तब खड़ा हुआ जब जिम्बाब्वे मीडिया में खबर आई कि एक भारतीय क्रिकेटर को बलात्कार के आरोपों में गिरफ्तार किया गया है, हालांकि उसका नाम नहीं दिया हुआ था।

रिपोर्ट में कहा गया कि अफ्रीकी देश के भारतीय दूत आर मासाकुई ने शनिवार (18 जून) रात हरारे के होटल में खिलाड़ी की गिरफ्तारी को रोकने की कोशिश की। हालांकि भारत में अधिकारिक सूत्रों ने इस रिपोर्ट से इनकार किया है। इसमें कहा गया कि जो व्यक्ति गिरफ्तार हुआ, वह मौजूदा एक दिवसीय श्रृंखला के प्रायोजकों से एक से जुड़ा हुआ है।

सूत्रों ने कहा, ‘हरारे में बलात्कार के कथित आरोप में भारतीय क्रिकेटर के संबंध में आयी मीडिया रिपोर्टों के बारे में हमने जिम्बाब्वे में हमारे दूत से बात की है। रिपोर्ट पूरी तरह झूठ है। कोई भी भारतीय क्रिकेटर इसमें शामिल नहीं है।’ सूत्र ने कहा, ‘प्रायोजकों में से एक से जुड़े भारतीय को गिरफ्तार किया गया है। उसने भी आरोप से इनकार किया है और कहा कि वह खुद को निर्दोष साबित करने के लिये डीएनए परीक्षण भी कराने को तैयार है। हमारे दूत इस मामले पर नजर रखे हैं।’

बीसीसीआई ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा कि उसे इस मामले के सही तथ्यों का पता करना होगा। बोर्ड के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ‘हम इस प्रकरण पर करीब से निगाह लगाये हैं। यह गंभीर मुद्दा है। इस मुद्दे की नजाकत को देखते हुए बीसीसीआई तथ्यों को जाने बिना कोई टिप्पणी नहीं करेगा।’

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
सरकार तब कहां थी जब सिटी मैजिस्ट्रेट को पीटा था रामवृक्ष ने.. सरकार तब कहां थी जब सिटी मैजिस्ट्रेट को पीटा था रामवृक्ष ने..(2)

अब तो केवल बकलोल कमिश्नरी ही होगी कमिश्नरी जांच के नाम पर.. एक दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं रामवृक्ष यादव पर, कार्रवाई एक नहीं.. एसएसपी आफिस के सामने से सैल्यूट लेता था रामवृक्ष यादव..

-कुमार सौवीर॥

लखनऊ : मथुरा में आतंक बन चुके रामवृक्ष यादव ने डेढ़ साल पहले भी जवाहर बाग में पुलिस और प्रशासन की टीम पर हमला बोल दिया था। उद्यान विभाग के कर्मचारियों के मकान पर कब्जा करने के मामले में सिटी मजिस्ट्रेट जांच करने गये तो उनकी जान के लाले पड़ गए। खरबों रूपयों कीमती वाली इस करीब तीन सौ एकड सरकारी जमीन पर जबरिया काबिज बैठे  रामवृक्ष के चेलों ने सिटी मैजिस्ट्रेट को सरेआम सडक पर लाठियों से पीटा और वहां मौजूद पुलिस वालों से वायरलैस सेट और लाठियां लूट लीं।

लेकिन इस हादसे, और इसके पहले और उसके बाद के ऐसे किसी भी हिंसक और गुण्डांगर्दी पर पुलिस और प्रशासन ने कोई भी कड़ी कार्रवाई नहीं की। सभी अफसरों में यह खुली चर्चा चलती है कि यह अवैध कब्जा सरकार की शह पर है और इस कब्जे को बरकरार रखने के लिए ही सरकार वहां अपना और अवैध कब्जेदारों का पसंदीदा डीएम और एसएसपी तैनात करती है। इतना ही नहीं, रामवृक्ष यादव के नाम पर पूरा प्रशासन ही दहल जाता था। कलेक्ट्रेट और एसएसपी आफिस के सामने से वह उस अंदाज में निकलता था जैसे कोई पुलिस या प्रशासन का अफसर सैल्यूट लेता है। उसके सामने डीएम और एसएसपी की घिग्घी बंध जाती थी।

डेढ़ साल पहले हुए ऐसे एक हादसे में भी ताबड़तोड़ फायरिंग भी की गयी थी। घायल एसओ की हालत गंभीर होने पर आगरा रेफर कर दिया गया। देर रात हुए बवाल में पुलिस ने शुक्रवार को 20 सत्याग्रहियों सहित 600 अज्ञात के खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। एक समाचार पत्र के अनुसार गत 15 मार्च से डेरा जमाए बैठे सत्याग्रही सुभाष चंद्र बोस जयंती मनाने के लिए हाईवे पर गेट बना रहे थे। इसकी भनक लगते ही सिटी मजिस्ट्रेट हेमसिंह, एसओ सदर प्रदीप पांडेय मौके पर पहुंचे। सत्याग्रहियों ने लाठियों से इन पर हमला बोल दिया। अधिकारियो और पुलिस में भगदड़ मच गई। पुलिसकर्मियों से डंडा-वायरलेस सेट छीन लिए गए।

इसी दरम्यान फायरिंग होने लगी। सिटी मजिस्ट्रेट हेमसिंह एक खोखे के पीछे दुबक गए। एसओ प्रदीप पांडेय, एसओ हाईवे सुरेंद्र यादव, शहर कोतवाल कुंवर सिंह यादव सहित आधा दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। मौके पर मौजूद सूत्रों के अनुसार, सिटी मजिस्ट्रेट डर के मारे थर-थर कांप रहे थे। घायलों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां से एसओ प्रदीप पांडेय को शुक्रवार को आगरा रेफर कर दिया गया।

शुक्रवार को पुलिस ने बलवा, पुलिस की पिटाई और उस पर जानलेवा हमला करने, सरकारी सेट छीनने, फायरिंग करने के आरोप में थाना सदर बाजार में सत्याग्रहियों के नेता रामवृक्ष यादव, चंदन बॉस, शिवमंगल, वीर सिंह यादव, अशरफीलाल चौहान, महीपाल सिंह, प्रेमचंद, वंशगोपाल पटेल आदि समेत 20 लोगों को नामजद किया गया। जबकि कुल 500-600 अज्ञात लोगों के खिलाफ उक्त आरोपों में रिपोर्ट दर्ज की गई।

लेकिन इसके और इसके बाद की कई अनेक हिंसक वारदातों पर पुलिस ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। वजह यह कि सरकार की शह थी और प्रशासन में आला अफसर उन उपद्रवियों के ही पक्ष में काम कर थे।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
सरला मिश्रा की जली लाश को आज भी इंतजार है न्याय का.. सरला मिश्रा की जली लाश को आज भी इंतजार है न्याय का..(0)

-आनन्द मिश्र||

भोपाल : नाम सरला मिश्रा। आयु ४१ वर्ष। शिक्षा डबल एम.ए.,एम.एड.,एल.एल.बी. स्नातक पत्रकारिता। परिचय म.प्र. कांग्रेस की दबंग नेता एवं स्वतन्त्रता सेनानी की पुत्री, पौत्री। पद, राजनीति, म.प्र. युवक कांग्रेस की संयुक्त सचिव। हालपता सौ फीसदी जलने के बाद तड़प-तड़प कर हुई मौत। वजह, राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के संयुक्‍त कुकर्म।

जी हां, यह कहानी है मध्य प्रदेश की बेहद जुझारू और सक्रिय नेता सरला मिश्रा की। सरला की ख्वाहिशें थीं राजनीति में महिलाओं के लिए एक मजबूत डगर बनाना, लीक बनाना, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हालांकि उसमें गजब का जोश था। कुछ कर डालने का माद्दा था। मप्र युवक कांग्रेस के विभिन्न पदों में रही सरला तब चर्चा में आयी जब मप्र के कुछ युवक कांग्रेसियों ने जबलपुर में कांग्रेसी पार्षद कैलाशशर्मा के ढाई वर्ष के पुत्र लक्की शर्मा पर तेजाब फेंक दिया। तब सरला मिश्रा ने ऐसे नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई। इसकी सक्रियता ने पूरे मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस की राजनीति में एक जबर्दस्त तूफान खड़ा कर दिया।

सरला अपना सीना तान कर उस मासूम बच्चे को न्‍याय दिलाने के लिए खड़ी थी, मगर पूरी राजनीति उसके खिलाफ हो गयी। मगर सरला ने हौसला नहीं खोया। नतीजा यह हुआ कि सरला ने लक्की को लेकर तात्कालिक प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समक्ष पहुंच गयी। तो हंगामा हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उस बच्चे का उपचार अमेरिका में कराने का निर्णय लिया। इतना ही नहीं, सरला ने इस मामले में अपनी ही पार्टी के ऐसे आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं के खिलाफ भी मोर्चा खोला। हालांकि उस पर इसके खिलाफ हमलों की साजिशें भी बुनी गयीं। लेकिन इसके बावजूद सरला अडिग ही नहीं। नतीजा यह हुआ कि तब आपराधिक प्रवृत्ति के चालीस से अधिक मध्य प्रदेश के युवक कांग्रेस के नेताओं को पार्टी से बाहर निकला था। उस समय श्री मोतीलाल बोरा म.प्र. के मुख्यमन्त्री थे।

राजीव गांधी की मप्र यात्रा में सदैव सरला मिश्रा उनकी टीम की सदस्य रही। उनका 10 जनपथ नई दिल्ली में प्रवेश बगैर रोकटोक था। श्री राजीव गांधी की हत्या के बाद भी यह क्रम बना रहा। लगातार 20 वर्षो तक कांग्रेस पार्टी के लिये सेवा में देने के बाद भी उन्हें उचित स्थान नहीं मिला।

सन् 1993 में दिग्विजय सिंह को मुख्यमन्त्री बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे उनकी राइटहैंड भी कहलाती थी किन्तु दिग्गी ने कभी भी उन्हें विधायक राज्यसभा का टिकिट नहीं दिलाया जबकि वे अपने भाई लक्ष्मण सिंह को तो विधायक,सांसद बनवाते रहे। सन् 1997 में सरला मिश्रा की सब्र का बांध टूट गया। वे इन्हीं बातों को लेकर एक दिन मुख्यमन्त्री निवास दिग्विजय सिंह से मिलने पहुंची और तैश में आकर बोली:- महाराजा मैं तेरे को अंतिम मौका दे रही हूं। अभी भी वक्त है, सम्भल जा, वरना मैं तो तुझे छोडूंगी नही।

इसी के कुछ दिनों के बाद 14 फरवरी 1997 को स्थानीय कुछ नेता सायं 5.30 बजे सरला को उनके आवास से एक कार्यक्रम के बहाने लेकर गये तथा बाद में वह १०० प्रतिशत जली अवस्था मे लौटी। संभवत उसे सी.एम. हाउस या उसके आस-पास ही जलाया गया। दूसरे दिन से लेकर २७ फरवरी तक भाजपा ने विधानसभा नहीं चलने दी। अंत में गृहमंत्री चरणदास महंत विधानसभा के अंदर सरला मिश्रा हत्याकाण्ड की सी. बी. आई. जांच की घोषणा की किन्तु नोटीफिकेशन न करने के कारण आज तक सी. बी. आई. जांच प्रारंभ नहीं हो सकी।

वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को भी इस हत्याकाण्ड की जानकारी है एवं हमने उन्हें अगस्त 2014 से लेकर लगातार पत्र लिखें, किन्तु वे भी वैसे ही निकले जैसे अन्य नेता हैं। शिवराज सिंह चौहान, बाबूलाल गौर, डॉ गौरीशंकर शैजवार, गोपाल भार्गव, विश्वास सारंग के साथ मुख्यमन्त्री आवास में बैठक (23 जुलाई 2015) के बाद शिवराज ने हम से कहा था कि मिश्रा जी मैं आपके साथ हूं मेरी प्रधानमन्त्री जी से बात हो चुकी है। यही बात म.प्र. संगठन मन्त्री अरविन्द मे भी कही थी कि मिश्रा जी मैं अन्न की कसम खाता हू्ं इसकी जांच सीबीआई से होगी। मेरी मोदी जी से बात हो चुकी है।

लेकिन शर्म की बात है कि इस मामले में एक भी सरकार ने कोई भी कान नहीं दिया। जबकि यह सारे दल इस समय आम आदमी के मन में महिलाओं को लेकर सम्मान, शील की भाव का प्रदर्शित करने में संलग्न है।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
कोई ‘पुरुष उत्पीड़न’ कहे, तो हंसियेगा मत.. कोई ‘पुरुष उत्पीड़न’ कहे, तो हंसियेगा मत..(2)

महिलाओं द्वारा उत्पीड़न कानूनों का पुरुषों के खिलाफ दुरुपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। ये महिलाओं के सचमुच हो रहे शोषण और उत्पीड़न के मामलों को भी कमज़ोर करता है..

-अरविन्द शुक्ला॥

लखनऊ। लगभग एक दशक पहले दिल्ली में दीवारों पर एक संस्था के विज्ञापन पुते रहते थे, जो महिलाओं के उत्पीड़न के शिकार पुरुषों को एकजुट करने का आवाहन करती थी।

लोग बसों और इन विज्ञापनों को देख कर हँसते थे। लेकिन अब ‘पुरुष उत्पीड़न’ के विषय पर हंसियेगा मत – महिलाओं के खिलाफ अपराध के बढ़ते मामलों की तरह ये भी तेज़ी से उभरती एक सच्चाई है।

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रुपेश शर्मा बताते हैं, “निस्संदेह फ़र्ज़ी रेप के मामले बढ़े हैं। मेरे सामने भी कई केस आए हैं। अधिकतर केस में प्रॉपटी, आपसी संबंध और पैसा का मामला होता है। खासकर 354 (छेड़खानी) का।”

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने गाँव कनेक्शऩ को फोन पर बताया, “कुछ लोग कानून का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं। खासकर दिल्ली जैसे बड़े शहरों में। हम लोगों ने खुद बहुत सारे मामले फ़र्ज़ी पाए हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि रेप जैसी घटनाएं नहीं हो रहीं।”

बांदा में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि वे बलात्कार से पीड़ित एक युवती को इंसाफ दिलाने में जुटे थे, लेकिन उन पर ही एक महिला ने बलात्कार समेत कई संगीन धाराओं में केस दर्ज करा दिए। इन आरोपों की सत्यता की जांच न्यायालय में ही हो पाएगी।

अपने बचाव में आशीष कहते हैं, “मेरे ऊपर 55 वर्ष की एक महिला से रेप का केस है। रेप का आरोप लगाने वाली महिला इससे पहले चार लोगों पर बलात्कार का केस करा चुकी है। मैं जिस केस की पैरवी कर रहा था ये आरोप उस पूरे को कमजोर करने की कोशिश है।”

लखीमपुर में रहने वाले अतुल दीक्षित (30 वर्ष) की उनके पड़ोसी से किसी बात पर मारपीट हो गई। पड़ोसी ने दूसरे दिन थाने में अतुल पर अपनी बेटी से छेड़छाड़, बलात्कर समेत कई मामलों में केस दर्ज करा दिया।

मेडिकल रिपोर्ट में बात रेप साबित नहीं हुआ। लेकिन छेड़छाड़ के आरोपों को चलते उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। वो कुछ दिनों पहले ही जमानत पर बाहर आए हैं।

आशीष और अतुल के केसों में सच का फैसला अदालत में होगा। लेकिन पीड़ित और हालात बता रहे हैं कि यौन उत्पीडन और इनसे जुड़ी कानून की धाराओं 376 (बलात्कार) व 498A (दहेज़ उत्पीड़न) को कुछ लोग हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही बड़े शहरों में ये मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। निर्भया केस के बाद दिल्ली को देश की रेप कैपिटल कहा जाने लगा। लेकिन वर्ष 2013 में दिल्ली मे महिला आयोग से जो आंकड़े आए वो हैरान करने वाले थे। रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दर्ज हुए 2753 मामलों में 1287 ही सही पाए गए जबकि 1464 केस झूठे और तथ्यहीन थे।

पुरुषों के हितों के लिए आवाज़ उठाने वाली संस्था सेव इंडिया फाउंडेशन के पास रोजाना देशभर से सैकड़ों कॉल आते हैं। संस्था का दावा है कि कई बार 75 फीसदी केस तक झूठे पाए गए हैं। संस्था की प्रवक्ता ज्योति तिवारी बताती हैं, “लड़का-लड़की सहमति से सेक्स करते हैं, किसी बात पर अनबन हुई तो रेप, बॉस प्रमोशन नहीं देता है तो रेप, वर्षों तक लिव इऩ में रहते हैं, संबंध खराब हुए तो रेप। दिल्ली में तो अधिकतर मामले सहमति के बाद वाले या फिर प्रॉपर्टी से जुड़े होते हैं।”

वो आगे बताती हैं, ”376 का दुरुपयोग वैसे ही हो रहा है जैसे कभी दहेज प्रथा का होता था। हम लोगों ने नए कानून बनाने का ही पुरजोर विरोध किया था। कानून में कुछ बदलाव होने जरुर उसके लिए हम लोग लगातार कानून मंत्रालय को लिख रहे हैं।”

अपनी बात के समर्थन में वो इंदौर के चर्चित ध्रुव अग्रवाल का उदाहरण देते हुए बताती हैं, “ध्रुव अग्रवाल पर उनकी किराएदर ने बलात्कार का आरोप लगाया, कोर्ट में वो साबित नहीं हुआ। जेल से निकलने के बाद उन्होंने सुसाइड कर लिया। ध्रुव ने सबसे पूछा था अब मेरी इज्जत कौन वापस करेगा?”

वो सवाल करती है, “क्या पुरुषों की इज्तत नहीं होती है। सोशल मीडिया का जमाना है लोग मिनटों में लोगों की फोटो वायरल होती है। आदमी की नौकरी चली जाती है, जिंदगी बर्बाद हो जाती है लोगों की। लेकिन अगर आरोप गलत साबित होते हैं तो उन्हें कोई नहीं पूछता।”

उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष जरीना उस्मानी बताती हैं, “फर्जी केस की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए हम पीड़ित और आरोपी से दोनों से बात करने, और स्थानीय पुलिस का रिपोर्ट के बाद ही कोई कार्रवाई करते हैं।”

दिल्ली में एकाएक बढ़े रेप के मामलों के बाद वर्ष 2013 में देश के बड़े अग्रेजी अख़बार द हिंदू ने छह महीने की गहन पड़ताल के बाद रिपोर्ट लिखी थी कि दिल्ली के जिन 40 फीसदी मामलों में फैसला आया, जजों ने कहा कि सेक्स सहमति से हुआ था और ज्यादातर मामलों में महिला के माता पिता ने शिकायत दर्ज कराई। यह शिकायत उस व्यक्ति के खिलाफ होती है जिसके साथ उनकी बेटी भाग गई हो। रिपोर्ट कहती है 25 फीसदी ऐसे मामले हैं जिनमें मर्द सगाई के बाद या फिर शादी का वादा करने के बाद मुकर गए। पुलिसकर्मी भी मानते है कई केस दबाव बनाने के लिए होते हैं। हालांकि किसी पुलिसकर्मी ने अपना नाम नहीं दिया।

अपर पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश, अभय बताते हैं, जब भी कोई रेप की शिकायत आती है, पुलिस प्राथमिकी लिखकर जांच शुरू कर देती है, अगर झूठा पाया जाता है तो दफा 182 के तहत कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन अधिकतर मामलो में सुलह समझौता हो जाता है।

चर्चित झूठे मामले

1. फरवरी 2013 में दिल्ली की फास्ट ट्रैक कोर्ट की जज निवेदिता अनिल शर्मा ने नौकरानी से रेप के आरोपी एक शख्स को बरी करते हुए टिप्पणी की रेप या यौन शोषण के झूठे मामलों का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है, ये खतरनाक है इसे रोकना होगा।

2. फरवरी 2014- जोधपुर में बहला-फुसलाकर दुष्कर्म करने की झूठी एफआईआर कराने पर महानगर मजिस्ट्रेट ने आरोप लगाने वाली महिला को दिन भर कोर्ट में खड़ा रहने और 100 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

3. जून 2014 में शामली की रहने वाली युवती ने चलती कार में रेप का आरोप लगाया। पुलिस की पड़ताल में पता चला जिस लड़के पर आरोप लगाया गया था उसके पार्टनर ही साजिश रची थी। लड़की भी गिरफ्तार की गई।

5. नवंबर 2014- दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने बलात्कार के दो मामलों की सुनवाई करते हुए कहा कि झूठे आरोप लगाने वाली महिलाओं को सजा दी जाए। ऑडिशनल सेशन जज वीरेंद्र भट्ट ने अपने फैसलों में कहा कि अगर किसी शख्स पर रेप का आरोप लगता है तो उसके लिए बेहद दुख और शर्मिंदगी की बात होती है। शर्मिंदगी और अपमान बेगुनाह साबित होने के बाद भी जिंदगी भर पीछा नहीं छोड़ते।

4. सितंबर 2015- हरियाणा के अंबाला मंडल कमिश्नर पर रेप का आरोप लगाने वाली महिला को पंचकुला पुलिस ने फिल्मी स्टाइल में गिरफ्तार किया। बाद पता चला महिला कई और लोगों पर भी ऐसे केस दर्ज करवा चुकी थी। महिला पर पहले एक केस दर्ज था।

5. दिसंबर 2014 में हरियाणा के रोहतक में चलती बस में दो लड़कों की पिटाई कर सुर्खियों में आई बहनों की सच्चाई पर बस में सवार कुछ महिलाओं ने ही सवाल उठाए। उनके कई और वीडियो भी समाने आए थे। जो उन्हें सवालों के घेरे में खड़े कर रहे थे।

6. 2003 में दरवाजे से बारात लौटाकर दुनिया भर में सुर्खिंया ‘आइरन लेडी’ निशा सिंह 2012 में दहेज का केस हार गईं। इस केस में टर्न तब आया जब नवनीत सिंह नाम के शख्स ने निशा से पहले शादी होने का दावा किया हालांकि निशा ने उस पर भी केस किया। लेकिन दहेज वाले केस में नवनीत से निशा की नजदीकी को कोर्ट ने भी माना था।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
लखनऊ में रेपिस्‍टों का हमला, सीएम आवास के पास फेंकी बालिका की नंगी लाश.. लखनऊ में रेपिस्‍टों का हमला, सीएम आवास के पास फेंकी बालिका की नंगी लाश..(0)

लखनऊ में रेपिस्‍टों का हमला, सीएम आवास के पास फेंकी बच्ची की नंगी लाश..
बेटियों की नंगी लाशों का सैलाब अब मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचा..
आज फिर मिली नृशंस हत्या के बाद एक स्कूली बच्ची की हत्या..
सीएम आवास, 1090 और डीजीपी के घर से ,चंद कदम दूर मिली लाश..
मोहनलालगंज के जघन्‍य हत्‍याकाण्ड के बाद दर्जन से अधिक मिली लाशें..

-कुमार सौवीर॥
लखनऊ : यह है यूपी में बेटियों के प्रति जघन्य अपराधियों का नंगा नाच। सरकार के चेहरे पर करारा तमाचा मारते हुए गिरोहबन्द अपराधियों ने आज फिर एक लखनऊ की एक नाबालिग बेटी को न सिर्फ चार दिनों तक अगवा किये रखा, बल्कि लगातार उनका दैहिक-शोषण करने के बाद उनकी नृशंस हत्‍या भी कर डाली। आज इस बच्‍ची की नंगी लाश मुख्‍यमंत्री और पुलिस महानिदेशक के आवास और महिला सहायता केंद्र 1090 के मुख्‍यालय के चंद कदम दूर गाजी कैनाल के किनारे मिली। यह जगह चिडि़याघर के ठीक पीछे लोहिया पथ पर है।
ताजा खबर के अनुसार जू यानी अजायबघर के ठीक पीछे और मुख्‍यमंत्री आवास के घर से चंद दूर एक स्‍कूली बच्‍ची की नंगी लाश बरामद हुई है। इसका पता तब पता चला, जब करीब सुबह साढे दस के करीब लोहिया पथ से गुजर रहे राहगीरों ने इस इलाके में चील-कौवों को मंडराते देखा। जहां पर लाश मिली है, वहां से समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो का आवास और कार्यालय ही नहीं, बल्कि प्रदेश के पुलिस महानिदेशक का आवास बस चंद कदम दूर है। इतना ही नहीं, प्रदेश की महिलाओं को सुरक्षा‍ दिलाने के लिए बनाये गयी वीमन हेल्‍प लाइन 1090 के मुख्‍यालय से बमुश्किलन दो सौ मीटर है, जो आजकल महिलाओं के प्रति किसी कुख्‍यात कलंक के तौर पर मशहूर होता जा रहा है।
लोहिया से गुजर रही एक सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद वर्षा चतुर्वेदी ने बताया कि करीब पौने ग्‍यारह के आसपास इस इलाके में सायरन बजाती हुई कुद पुलिस गाडि़यां इस जगह पहुंचीं थीं। तब तक नागरिकों की भी खासी भीड़ जमा हो चुकी थी। पुलिस ने आनन-फानन इस लाश को अपने कब्‍जे में लिया, और उस लाश को पंचनामा कर पोस्‍टमार्टम के लिए ले गये।
खबर पाते ही मौके पर पहुंचे शिवम तिवारी ने बताया कि मारी गयी बच्‍ची का नाम उन्‍नति विश्‍वकर्मा है और वह सम्‍भवत: एक बड़े स्‍थानीय स्‍कूल में हाई स्‍कूल की छात्रा थी। यह बच्‍ची पिछली 10 फरवरी से लापता थी! लेकिन इस बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस ने कब दर्ज की, इस बारे में कोई भी पता अब तक नहीं चल पाया है। जबकि वर्षा जी के मुताबिक कल एक अखबार में इस बच्‍ची के बारे में एक खबर प्रकाशित हो चुकी थी।
आपको याद होगा कि करीब डेढ़ साल पहले यानी पिछले 16-17 जुलाई-2014 की रात लखनऊ के मोहनलाल गंज इलाके में एक युवती की नंगी लाश बरामद हुई थी। यह लाश एक स्‍कूल के हैंडपम्‍प के किनारे मिली थी। आसपास का इलाका पूरी तरह रक्‍त-रंजित था, इस युवती की लाश को देख कर साफ पता चल रहा था कि मानों इसने हत्‍यारों से काफी देर तक संघर्ष किया। आशंका व्‍यक्‍त की जा रही थी कि इस बच्‍ची के गुप्‍तांग में किसी बड़े रॉड और सम्‍भवत पास ही लगे इंडिया मार्क हैंडपम्‍प के हत्‍थे से प्रहार किया गया था। पुलिस में मौजूद अनेक सूत्रो की आशंका थी कि इस हत्‍याकांड में कम से कम आधा दर्जन हत्‍यारे शामिल थे। लेकिन लखनऊ पुलिस ने इस हत्‍या में सिर्फ एक आदमी को गिरफ्तार किया, जो इस इलाके में बन रही कालोनी का गार्ड था।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
यूपी पुलिस में लैमारी और झपटमारी का ताजा चोखा धंधा बना 1090 वीमेन हेल्‍प लाइन.. यूपी पुलिस में लैमारी और झपटमारी का ताजा चोखा धंधा बना 1090 वीमेन हेल्‍प लाइन..(0)

जोशीली अलंकृता सिंह के नायाब प्रोजेक्‍ट को झपट लिया पुलिस के मुंहलगे अफसरों ने..
महिला सहायता सेल, यानी रंगमंच पर हवा में तलवार भांजते विदूषक की दिलचस्‍प अदायें..

-कुमार सौवीर॥
लखनऊ: दोस्‍तों, यह हादसा उस एक खुशनुमा प्रयास की दुर्गति-परिणति है, जो आज 1090 वीमेन हेल्‍प लाइन के तौर पर कुख्‍यात होता जा रहा है। तीन दिन पहले एक मेडिकल छात्रा की आत्‍महत्‍या के बाद इस हेल्‍प लाइन का चेहरा काला हो चुका है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। शुरूआती तौर पर उसका जिम्‍मा बेहाल महिलाओं पर होने वाले उत्‍पीड़न आदि पर त्‍वरित हस्‍तक्षेप कर उन्‍हें मजबूत कराना था। लेकिन इस सुखद कल्पनाओं को दुर्भाग्य के झंडाबरदारों ने आज तबाह कर दिया है। यह जानते-समझते भी कि यह हेल्‍प लाइन मुख्‍यमंत्री का ड्रीम-प्रोजेक्‍ट है, इसलिए उस पर समय-समय पर मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव हस्‍तक्षेप करते ही रहते हैं। कभी समीक्षा और सुझाव, तो कभी शिकायतें। वगैरह-वगैरह।
आज इस हेल्‍प लाइन के बड़े दारोगा हैं आईजी नवनीत सिकेरा। सिकेरा का मुलायम सिंह यादव के परिवार से खासी करीबी बतायी जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि इस यह हेल्‍प लाइन उनके प्रयासों से नहीं, बल्कि एक निहायत जोशीली और जहीन आईपीएस की सकारात्‍मक सोच का धरातली प्रयास है, जिसका नाम है अलंकृता सिंह। करीब 7-8 साल की नौकरी वाली आईपीएस अफसर अलंकृता सिंह ने ही इस योजना की रूपरेखा तैयार की थी, लेकिन इसके पहले कि वह उस पर कोई सटीक प्रयास कर सकती, वह योजना उसके हाथों से छीन ली गयी।
करीब तीन साल पहले अलंकृता सिंह सुल्‍तानपुर की पुलिस अधीक्षक थी। यह कप्‍तान के तौर पर उसकी यह पहली पोस्टिंग थी। नई-नई नौकरी थी, कर कुछ कर डालने का जज्‍बा था, और कुछ नया सोचने का माद्दा भी। इसी बीच अमेठी में अपने दौरे के दौरान अलंकृता सिंह को स्‍कूली लड़कियों के साथ हो रही अभद्र हरकतों की खबर मिली। उसने तत्‍काल मौके पर हस्‍तक्षेप किया।
इसी दौरान उसे लगा कि पुलिस द्वारा समाज में महिलाओं पर होने वाले अपराध, छेड़खानी और उत्‍पीड़न जैसे काण्‍डों पर प्रभावी हस्‍तक्षेप किया जाना चाहिए। इसलिए लिए उसने बाकायदा एक गम्‍भीर स्‍टडी शुरू की, कई समाजविज्ञानियों, शिक्षकों और पत्रकारों व समाजसेवियों से बातचीत की। इसके लिए पीडि़त महिलाओं से भी उनकी दिक्‍कतें समझने की कोशिश की। और आखिरकार सुल्‍तानपुर को ऐसी पीडि़त महिलाओं के समर्थन एक अभियान छेड़ दिया।

 

लेकिन लो भइया, हो गयी इसी बीच लैमारी और झपटमारी।
पुलिस के कुछ उच्‍चस्‍तरीय सूत्रों ने बताया है कि उसके दो-चार दिनों बाद ही यह प्रोजेक्‍ट अलंकृता के बजाय नवनीत सिकेरा के हाथों थमा दिया गया। और वे लखनऊ में ही अपना ठीहा बनाने में जुटे थे। इटावा से सिकेरा की करीबी थी ही। सो, गोटी फिट हो गयी।
जो एक महिला होने के चलते प्रोजेक्‍ट अलंकृता सिंह को महिलाओं की पीडा को देख-समझ कर उसे निपटाने की पहलकदमी के नसर्गिक प्रयास के चलते दिया जाना चाहिए, उसे अब नवनीत सिकेरा की वर्दी में टांक दिया गया। और जो प्रोजेक्‍ट सुल्‍तानपुर में पूरी सफलता के साथ संचालित किया था, उसकी सारी धज्जियां नवनीत सिकेरा आज भी बिखेर रहे हैं। तीन दिन पहले लखनऊ की एक मेडिकल छात्रा सरिता गुप्‍ता की आत्‍महत्‍या सिकेरा के इसी प्रोजेक्‍ट का एक अहम पहलू है।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
डेंटल छात्रा की आत्महत्या पर पुलिस ने सरकार पर फेंका गुल्ली-डंडा.. डेंटल छात्रा की आत्महत्या पर पुलिस ने सरकार पर फेंका गुल्ली-डंडा..(0)

1090 हेल्पलाइन के बड़े दारोगा ने हादसे पर अपना दामन झाड़ा..
कामधाम धेला भर नहीं, सिर्फ कुर्सी तोड़ती है सरकार की पुलिस..
झूठ बोले सिकेरा, कहा कि कोई फोन ही नहीं आया तो क्या करूँ..

-कुमार सौवीर||
लखनऊ: 1090 यानी वीमन हेल्प लाइन के बड़े दरोगा हैं नवनीत सिकेरा। अपराध और शोहदागिरी की राजधानी बनते जा रहे लखनऊ में परसों अपना जीवन फांसी के फंदे पर लटका चुकी बलरामपुर की बीडीएस छात्रा की मौत पर सिकेरा ने एक प्रेस-विज्ञप्ति अपनी वाल पर चस्पां किया है। सिकेरा ने निरमा से धुले अपने शब्द उड़ेलते हुए उस हादसे से अपना पल्लू झाड़ने की पूरी कवायद की है। लेकिन ऐसा करते हुए सिकेरा ने भले ही खुद को पाक-साफ़ करार दे दिया हो, लेकिन इस पूरे दर्दनाक हादसे की कालिख को प्रदेश सरकार और पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर पोत दिया है।
सीकरा कहते हैं:- “एक की गुडम्बा थाना क्षेत्र में एक लड़की रानू (नाम बदला हुआ) ने शोहदों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकरण में, रानू के पिता ने आरोप लगाया कि 1090 ने कोई मदद नहीं की। मैं स्पस्ट करना चाहता हूँ कि रानू की कोई कॉल 1090 को प्राप्त नहीं हुई है, ऐसी स्थिति में जब कोई शिकायत प्राप्त ही न हो मदद कर पाना असंभव है। रानू की कोई भी शिकायत 1090 में दर्ज नहीं है”
सिकेरा जी, जब आप फोन ही नहीं उठाएंगे तो हर फोन अनआन्सर्ड ही रहेगी ही। मेरे पास ऐसी पचासों शिकायत हैं, लेकिन आपके पास एक भी नहीं। और फिर जो दर्ज रिपोर्ट होती भी है तो आप करते क्या हैं उसका सिकेरा जी। कम से कम एक मामले में तो मैं जानता हूँ की उसमें 15 हजार वसूल लिया था आपके विवेचक ने। वह मेरी 84 वर्षीय माँ का मामला था जो अकेले ही रहती थीं और उसे एक अपराधी ने भद्दी गालियां देते हुए मकान खाली न करने पर जान से मार देने की धमकी दी थी। उस खबर पर पुलिस के प्रवक्ता और सूचना विभाग के कुख्यात चोंचलेबाज़ डिप्टी डायरेक्टर डा अशोक कुमार शर्मा ने इस डाल से उस डाल तक खूब कुलांचें भरी थीं, केवल प्रदर्शन के लिए।
ऐसे में आपकी ऐसी सफाई बहुत शर्मनाक लगती है। काम करना बहुत साहस का काम होता है। कुर्सी तो कोई भी तोड़ सकता है।
है कि नहीं बड़े दारोगा जी ?

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
1090 निदान नहीं, बिलकुल ढपोरशंख है, डेंटल मेडिकल छात्रा ने छेड़खानी से त्रस्त होकर फांसी लगा ली.. 1090 निदान नहीं, बिलकुल ढपोरशंख है, डेंटल मेडिकल छात्रा ने छेड़खानी से त्रस्त होकर फांसी लगा ली..(0)

-कुमार सौवीर||

बधाई हो सरकार में बैठे समाजवादियों और तुम्हारे कारकूनों ! तुम्हारे अटूट प्रयास आज फलीभूत हुए और नतीजा यह हुआ कि बीती रात एक मेडिकल छात्रा ने अपने कमरे में पंखे से लटक कर खुद को मौत हवाले कर दिया। बधाई हो।
ताज़ा खबर है कि लखनऊ के एक डेंटल मेडिकल छात्रा ने छेड़खानी से त्रस्त होकर फांसी लगा ली। पिछले कई महीने से मोहल्ले से लेकर कॉलेज आसपास शोहदों ने उसका जीना हराम कर रखा था। मानसिक तनाव इतना बढ़ने लगा कि उसे खुद की जिंदगी ही अभिशाप लगाने लगी। उसे लगा कि उसका स्त्री-देह ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। बस फिर क्या था। इस बच्ची ने उस कलंक-अभिशाप को ही हमेशा-हमेशा के लिए धो डाला।
यह बच्ची अवध क्षेत्र के बलरामपुर जिले की थी। उसके पिता वहां दवा की दूकान चलाते हैं। यह बच्ची होनहार थी, सो आगे की पढाई के लिए लखनऊ अपने चाचा के परिवार के साथ रहने लगी। जल्दी ही उसकी मेहनत रंग लायी और उसे डेंटल कालेज में प्रवेश मिल गया।
लेकिन आज…..
मेरी समझ में नहीं आता है कि महिला-शक्ति को सशक्तिकृत करने के दावे तो यूपी सरकार ने तो खूब किये। शुरुआत हुई महिला अपराधों पर कडा अंकुश लगाने के संकल्प से। योजना की संकल्पना तैयार की थी 2 साल पहले सुल्तानपुर की एक महिला युवा आईपीएस अधिकारी अलंकृता ने, जो उस वक्त वहां पुलिस कप्तान थी।
लेकिन शासन और पुलिस के बड़े हाकिमों ने उस संकल्पना को उस महिला से छीन लिया और लखनऊ के एसएसपी पद से हटाये गए नवनीत सिकेरा को उसका मुखिया बना डाला। जबकि होना तो यह था कि जिस अफसर ने उस योजना की रूप-रेखा बुनी थी, उसे ही उसका जिम्‍मा दिया जाता। इसलिए खास ताैर पर भी, कि महिला होने के चलते वह महिलाओं की इस हेल्‍पलाइन को बेहतर ढंग से समझ और क्रियान्वित कर सकती थी। लेकिन उस योजना को नयी रंगरोगन से लीपपोत कर उसे 1090 का नाम गया। सिकेरा को मुखिया इस लिए बनाया गया क्योंकि अखिलेश यादव परिवार से सिकेरा की बेहद करीबी है। कुछ भी हो, 1090 ने और कोई काम भले किया हो या नहीं, लेकिन इसको लेकर फर्जी डंके खूब बजवा दिया।
लेकिन अपने दो साल के प्रयोग के अंतराल यह 1090 का प्रयोग पूरी तरह असफल हो गया। महिलाओं में विश्वास उपजाने के बजाय अब किशोरियां-महिलाओं के सपनों में 1090 के दारुण-डरावने सपने दिखने लगे हैं। हाल ही 1090 के एक प्रभारी अधिकारी तो एक वादी युवती से ही वही करतूत करने लगे, जिसके खिलाफ ही 1090 डंका बजाने का दावा था। पीडि़त महिला जब महिला अधिकार प्रकोष्‍ठ की महानिदेशक सुतापा सान्‍याल के पास पहुंची तो उन्‍होंने तत्‍काल इस मामले की खुद जांच करने का ऐलान किया। लेकिन अचानक ही आला अफसरों ने सुतापा सान्‍याल से यह मामला खींच कर सीधे नवनीत सिकेरा को थमा दिया। बाकी आप-सब को यह बताने की जरूरत तो है नहीं कि करीब एक महीना होने के बावजूद यह मामला ठण्‍डे बस्‍ते में ही पड़ा हुआ है। इसके पहले एक 84 वर्षीय महिला को एक शख्‍स ने कई-कई बार फोन करके भद्दी गालियां दीं और जान से मार डालने की धमकियां दीं। इसकी शिकायत जब 1090 और नवनीत सिकेरा तक की गयी, लेकिन कई कोशिशों के बावजूद कुछ भी नहीं हुआ। बाद में पता चला कि इस शिकायत पर गाजीपुर के थानाध्‍यक्ष ने उक्‍त अभियुक्‍त से 15000 हजार रूपया वसूल कर मामला रफा-दफा कर दिया।
यह तब हुआ जब सूचना विभाग के एक बड़े बडबोले और महीन अफसर अशोक कुमार शर्मा पुलिस के प्रवक्‍ता बने घूम रहे थे और इस मामले पर उन्‍होंने खुद हस्‍तक्षेप करने का दावा किया था।
तो बोलो:- नवनीत सिकेरा जिन्‍दाबाद।
ऐसे में 1090 के प्रति आम महिला का विश्‍वास कैसे पनपता ?
एक ओर मुलायम सिंह यादव जब यह ऐलान करते घूम रहे थे कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, ऐसे में यह मेडिकल छात्रा किससे अपनी फरियाद करती।
उस बच्‍ची ने फैसला किया। तय किया कि अब न बांस रहेगा और न बजेगी बांसुरी।
बीती रात उसने अपने दोपट्टे से पंखे से फांसी का फंदा बनाया और
झूल गयी फांसी पर वह होनहार बच्‍ची।
आओ, अब 1090 का डंका बजाया जाए कि 1090 निदान नहीं, बिलकुल ढपोरशंख है।

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
प्यार करने पर दलित युवक को मिली दिल दहलाने वाली सजा.. प्यार करने पर दलित युवक को मिली दिल दहलाने वाली सजा..(18)

-भंवर मेघवंशी॥
पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर शहर के निवासी बसंती लाल वाल्मीकि के 20 वर्षीय बेटे अजय कुमार वाल्मीकि की 27 नवम्बर की रात धारदार हथियार से चेहरा काट कर अत्यंत निर्मम हत्या कर दी गयी .हत्या जिस निर्दयी तरीके से की गयी ,शव को देख कर किसी का भी दिल दहल सकता है .

जानकारी के मुताबिक अजय अपने घर से रात की 8 बजे अपनी बाइक लेकर निकला और रात भर वापस नहीं लौटा .चिंतित परिजनों ने उसकी रात भर खोजबीन की ,मगर उसका पता नहीं चल पाया .सुबह करीब 8 बजे अजय कुमार का क्षत विक्षत शव हायरसेकण्ड्री स्कूल के ग्राउंड में पाया गया .अजय के पिता और भाई विशाल ने शव की पहचान अजय के रूप में की .लाश के पास ही अजय कि बाइक भी बरामद हुई .

अजय के चेहरे को बुरी तरह से काट दिया गया ,उसे चेहराविहीन कर दिया गया ताकि उसकी पहचान तक नहीं हो पाये .इस अमानवीय हत्याकांड की खबर जैसे ही इलाके के दलित समुदाय को लगी .आक्रोशित लोग सड़कों पर उतर आये तथा बाड़मेर शहर में उपद्रव फैल गया ,जिस पर काबू पाने के लिए पुलिस को दिन भर खासी मशक्कत करनी पड़ी . हालत इतने तनावपूर्ण रहे कि जिले के पुलिस कप्तान परीश देशमुख को दिन भर कोतवाली में डेरा डालना पड़ा और स्थितियों को खुद संभालना पड़ा .

जिले भर के दलित समुदाय के सक्रिय लोग जाति और राजनितिक पहचान से ऊपर उठ कर एकजुट हो गये और हत्यारों को पकडे जाने तक शव नहीं उठाने पर अड़ गए ,हालाँकि देर शाम तक अजय के शव का पोस्टमार्टम तो करवा दिया गया मगर शव लेने से परिजनों के इंकार के बाद अजय वाल्मीकि की लाश को बाड़मेर के मुख्य चिकित्सालय की मोर्चरी में रखवा दिया गया .

दलित अत्याचार निवारण समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधान उदा राम मेघवाल के मुताबिक मृतक अजय के परिजनों द्वारा दर्ज करवाई गयी प्राथमिकी में एक स्वर्ण युवक नरेश कुमार पर एक माह पहले अजय को जान से मार देने की धमकी देने का आरोप लगाया गया है .मेघवाल का मानना है कि जिस तरह से शव का चेहरा विकृत किया गया है ,वह किसी गहरी घृणा का संकेत देता है. चेहरा पूरा काट करके कंकाल बना दिया गया ,ताकि वह पहचाना भी नहीं जा सके .

पुलिस अधीक्षक देशमुख का कहना है कि पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है और कुछ लोगों को संदेह के आधार पर पूछताछ के लिए पकड़ा गया है .पुलिस का भरसक प्रयास है कि जल्द से जल्द इस नृशंस हत्या कांड का पर्दाफाश हो जाये ,तब तक लोगों को संयम बरतना चाहिए ताकि पुलिस अपना काम कर सके .

मकतूल दलित युवा अजय कुमार वाल्मीकि के परिजनों का कहना है कि यह हत्या एक ऑनर किलिंग है ,यह एक स्वर्ण जाति की लड़की से जुड़ा हुआ मामला है .सूत्रों के मुताबिक अजय का एक स्वर्ण लड़की से प्रेम प्रसंग चल रहा था ,जिसके लिए उसे परिणाम भुगतने की चेतावनी भी मिल चुकी थी .लोगों का यह भी मानना है कि यह एक सुपारी मर्डर भी हो सकता है ,जिसमें किसी भी मार्शल कौम के अपराधी लोग निकल सकते है .पुलिस जाँच जारी है ,सम्भावना है कि दोषी कोई भी हो ,शीघ्र ही पकड़ में आ जायेंगे .

इस जघन्य हत्याकांड के विरुद्ध पश्चिमी राजस्थान के युवाओं में जबरदस्त रोष व्याप्त है और आक्रोश की यह आग राज्य भर में फैलने की आशंका जताई जा रही है ,मृतक अजय के पिता बसंती लाल वाल्मीकि सफाई कर्मचारी है ,इसलिये दलित संगठनों के साथ साथ वाल्मीकि समाज और सफाई कर्मचारी यूनियन्स के लोग राज्य भर में जगह जगह पर धरना –प्रदर्शन की तैयारी कर रहे है .

जाँच का नतीजा जो भी आये मगर यह बेहद दुखद तथ्य है कि आज भी दलित युवाओं को स्वर्ण लड़की से प्रेम करने की ऐसी निर्मम सजा दी जाती है ,जिसे देखकर तालिबान भी शर्मिंदा हो जाये .यह हत्या यह भी साबित करती है कि दलितों के प्रति स्वर्ण हिन्दुओं की घृणा आज भी इतनी प्रगाढ़ है कि अगर कोई दलित युवक किसी गैर दलित लड़की से प्यार करने की जुर्रत करेगा तो वह चेहराविहीन कर दिया जायेगा .जब आंखे ही नहीं रहेगी तो वो किससे चार होगी ,जब मुंह ही नहीं होगा तो आई लव यू किससे बोला जायेगा और प्रत्युत्तर सुननेवाले कान ही नहीं होंगे तो किससे सुना जायेगा .दलित युवाओं के प्रति नफरत की यह पराकाष्ठा तो है ही ,यह सन्देश भी है कि किसी भी स्वर्ण लड़की से प्रेम करोगे तो तुम्हें भी अजय वाल्मीकि की ही तरह एक चेहराविहीन लाश में बदल दिया जायेगा .

एक 20 साल के मासूम दलित युवा को प्यार करने की ऐसी तालिबानी सजा देने वाले लोग अगर यह दावा करें कि वो विश्व के सबसे सहिष्णु देश और समाज है तो मैं ऐसे लोगों पर लानत भेजता हूँ ,धिक्कारता हूँ और शर्मशार होता हूँ .अगर हम इसके बाद भी कुछ नहीं कर पाये और प्रतिरोध में सड़कों पर नहीं आये तो कल हर दलित युवा और युवती का हश्र अजय वाल्मीकि जैसा हो सकता है .फैसला हमारे हाथ में है कि हम अजय कि चेहराविहीन कर दी गयी लाश को उसकी पहचान पुन दिला पायेंगे या मुर्दा कौम की तरह इसे भी अपनी नियति समझ कर ख़ामोश बैठ जायेंगे .यह फैसले का वक़्त है ,मुट्ठियाँ बांधिए ,जय भीम का नारा लगाइये और सड़कों को इस जुल्म के खिलाफ़ पाट दीजिये ,राजस्थान ही नहीं देश के हर कोने से अब आवाज़ आनी चाहिये कि अब और किसी अजय को मौत के सामने हम इस तरह पराजय नहीं देखने देंगे .हम इंसाफ से कम कुछ भी नहीं स्वीकार करेंगे .हम लड़ेंगे अजय तुम्हारे चेहरे के लिये ..क्योंकि वह सिर्फ तुम्हारा ही नहीं हम सबका चेहरा है …!

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार है )

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
छोटा राजन को देश और दलितों का आदर्श मत बनाइये छोटा राजन को देश और दलितों का आदर्श मत बनाइये(2)

अपराध का रंग हरा है तो वह आतंकवाद और अगर गैरुआ है तो वह राष्ट्रवाद ,एक मुल्क के रूप में आखिर कहां जा रहे है हम..?

-भंवर मेघवंशी||
अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की इंडोनेशिया के बाली शहर में नाटकीय गिरफ्तारी तथा उसका आनन फानन में भारत लाया जाना किसी पूर्व निर्धारित पटकथा जैसा लगता है .संभव है कि यह कवायद काफी दिनों से की जा रही हो ,जिसे एक खुबसुरत मोड़ दे कर इस अंजाम तक पंहुचाया गया है . केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस बात से इत्तेफाक रखते है ,वे मानते है कि इस दिशा में काफी समय से काम चल रहा था .इसका मतलब यह हुआ कि छोटा राजन की गिरफ्तारी पूर्वनियोजित घटनाक्रम ही था .
वैसे तो यह माना जाता रहा है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियां उसकी लम्बे वक़्त से मददगार रही है तथा उसे मोस्टवांटेड अंडरवर्ल्ड माफिया दाउद इब्राहीम के विरुद्ध एक तुरुप के पत्ते के रूप में संभाल कर रखे हुए थी मगर यह भी एक सम्भावना हो सकती है कि वर्तमान केंद्र सरकार में भी छोटा राजन के प्रति हमदर्दी रखनेवाले कुछ लोग हो ,जिन्होंने उसकी ससम्मान गिरफ्तारी का प्रबंध करने में अहम् भूमिका अदा की हो ? फ़िलहाल किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है .जैसा कि हम जानते है कि अपराध जगत के सत्य उजागर होने में थोडा समय लेते है ,इसलिए वक़्त का इंतजार करना उचित होगा .
छोटा राजन की गिरफ्तारी होते ही सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के एक प्रमुख सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता रामदास अठावले की प्रतिक्रिया आई ,उन्होंने कहा कि छोटा राजन को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह दलित है ,जबकि दाउद को नहीं .अठावले के बयान से देश को छोटा राजन की जाति का पता चला.तथ्यात्मक रूप से यह बात सही है कि उसका जन्म 1956 में मुंबई के चेम्बूर इलाके में एक मध्यमवर्गीय दलित परिवार में हुआ था .वह मात्र 11 कक्षा तक पढ़ा कि उसके पिता जो की जो कि एक मिल में नौकरी करते थे ,उनकी नौकरी छूट गयी .आर्थिक तंगी के चलते उसने पढाई छोड़ दी और सिनेमा के टिकट ब्लेक करने लगा .यह काम उसके लिए अपराध जगत का प्रवेशद्वार बना .यहीं से वह राजन नायर नामक माफिया की नजर में चढ़ा जो उस वक्त बड़ा राजन कहलाता था .उसके साथ मिलकर छोटा राजन ने अवैध वसूली ,धमकी ,मारपीट और हत्याएं तक की .1983 में जब बड़ा राजन को गोली का शिकार हो गया तब उसका अपराध का साम्राज्य राजेन्द्र सदाशिव निखिलांजे उर्फ़ छोटा राजन को संभालना पड़ा .फिर उसकी माफिया किंग दाउद से दोस्ती हो गयी .दोनों ने मिलकर काले कारोबार और क्राइम में जमकर भागीदारी निभाई .उनकी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हो गयी थी कि जब पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए दाउद दुबई भागा तो वह अपने साथ छोटा राजन को भी ले गया .
दाउद और छोटा राजन का रिश्ता 1992 तक गाढ़ी दोस्ती का रहा ,लेकिन छोटा राजन की मुंबई पर बढती पकड़ से सतर्क हुए दाउद ने उसके साथ विश्वासघात करना शुरू कर दिया .एक तरफ तो साथ में सारे काले कारोबार ,दूसरी तरफ छोटा राजन के खास सहयोगियों पर अपने शूटरों द्वारा प्रहार ,दो तरफ़ा खेल खेल रहा था दाउद .शुरू शुरू में तो छोटा राजन को यह महज़ संयोग लगा लेकिन जब उसके खास साथी बहादुर थापा और तैय्यब भाई की हत्या में दाउद का हाथ होने की पुष्टि हुयी तो दोनों के मध्य दरार आ गयी जो 1993 के मुंबई बम्ब विस्फोट से एक ऐसी खाई में बदल गयी ,जिसे फिर कभी नहीं पाटा जा सका .एक ज़माने के खास दोस्त अब जानी दुश्मन बन चुके थे .फिर जो गेंगवार मुंबई में चली उसने पुलिस का काम सरल कर दिया .माफिया एक दुसरे को ही मार रहे थे .पुलिस का काम वो खुद ही करते रहे और एक दुसरे को निपटाते रहे .इस तरह मुंबई से माफिया का सफाया होने लगा .दाउद मुंबई बम धमाकों के बाद कराची में रहने लग गया तथा वह आई एस आई के हाथो की कठपुतली बन गया और छोटा राजन अपनी सुरक्षा के लिहाज़ से बैंकाक भाग गया .भारत से दूर दुनिया के दो अलग अलग देशों से दोनों के बीच दुश्मनी और जंग जारी रही . भारत सरकार दोनों को भारत लाने की वचनबद्धता दोहराते रही पर कामयाब नहीं हो पाई ..और अब अचानक अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन सहजता से बाली पुलिस के हत्थे चढ़ गया .वहां की सरकार ने भी बिना कोई हील हुज्जत किये आराम से इतने बड़े अपराधी को भारत को परोसने को एकदम से राज़ी हो गयी !
अंततः 27 साल के लम्बे अरसे बाद 6 नवम्बर 2015 की सुबह 5 बजकर 45 मिनट पर 55 वर्षीय अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की भारत में वापसी हो गयी .मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉन ने दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उतरते ही भारत भूमि को चूमा ,धरती माता (भारत माता ) को प्रणाम किया .छोटा राजन के इस एक कारनामे से राष्ट्र निहाल हो गया और देश में उसके लिए सकारात्मक माहौल बनने लग गया . संभव है कि आने वाले समय में उसे आतंकवाद के खिलाफ ज़िन्दगी भर लड़नेवाला योद्धा भी मान लिया जाये .जिस तरह से उसकी गिरफ्तारी की पूरी घटना कारित की गयी है ,वह इसी तरफ कहानी के आगे बढ़ने का संकेत देती है .
क्या यह महज़ संयोग ही है कि छोटा राजन का एक भाई दीपक निखिलांजे उस रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का बड़ा नेता है ,जिसके नेता ने छोटा राजन के प्रति सबसे पहले हमदर्दी जताई है .दीपक हाल ही में प्रधानमंत्री की मुंबई यात्रा के दौरान उनके साथ मंच पर भी दिखाई दिया था ,उसी पार्टी के नेता और भाजपा के सहयोगी दलित नेता रामदास अठावले छोटा राजन को दलित बता कर एक वर्ग की सहानुभूति बनाने का प्रयास करते है . क्या इसे भी सिर्फ इत्तेफाक ही माना जाये कि छोटा राजन का साला राहुल वालनुज सिर्फ एक महीने पहले शिवसेना छोड़कर भाजपा में शामिल होता है और भाजपाई श्रमिक संगठन राष्ट्रीय एकजुट कामगार संगठन का उपाध्यक्ष बनाया जाता है .छोटा राजन के परिजनों की भाजपा से लेकर प्रधानमंत्री तक की परिक्रमा और रामदास अठावले का दलित सम्बन्धी बयान सिर्फ संयोग मात्र नहीं हो सकते है ,इतना ही नहीं बल्कि छोटा राजन के एक भाई आकाश निखिलांजे का यह कहना कि –वह कोई आतंकी नहीं है और अब खुद छोटा राजन द्वारा मीडिया के समक्ष अपने आपको मुंबई पुलिस का प्रताड़ित पीड़ित बताना और यह कहना कि मुंबई पुलिस ने दाउद के इशारों पर उस पर बहुत अत्याचार किये है .बकौल छोटा राजन मुंबई पुलिस में दाउद के बहुत सारे मददगार है ,जिनके नामों के खुलासे होने के दावे किये जा रहे है .
ऐसा लग रहा है कि छोटा राजन के साथ एक अपराधी सा बर्ताव नहीं करके उसे भारत के खास देशभक्त हिन्दू डॉन के रूप में प्रस्तुत करके उसका राजनितिक लाभ लेने का प्रयास किया जा रहा है ,उसके पक्ष में हवा बनायीं जा रही है .छोटा राजन के बयान और भारत सरकार के बयान सब एक खास तरह का माहौल और कथ्य निर्मित कर रहे है .छोटा राजन ने कह दिया है कि वह ज़िन्दगी भर आतंकवाद के खिलाफ लड़ा है और आगे भी लड़ता रहेगा .तो इसका मतलब यह निकाला जाये कि अब 70 आपराधिक मामलों में वांछित अपराधी आतंक से लड़ने वाला हीरो बना दिया जायेगा ( ऐसे अपराध जिनमे 20 हत्या के और 4 आतंक निरोधक कानून के अंतर्गत भी मामले है ) यह आतंकवाद को धर्म ,सम्प्रदाय और रंग के चश्मों से देखनेवाली एक खास किस्म की विचारधारा की सफलता नहीं है ?
वैसे तो सत्तासीन गठबंधन के लिए छोटा राजन हर दृष्टि से मुफीद है ,वह दलित है ,उसका परिवार अम्बेडकरवादी नव बुद्धिस्ट परिवार रहा है ,उसकी माँ लक्ष्मी ताई निखिलांजे ने मुंबई के तिलकनगर में एक बुद्ध विहार बनवाने में अहम् भूमिका निभाई थी ,वह मुंबई पुलिस से प्रताड़ित एक स्वधर्मी डॉन है ,जिसने बाबरी मस्जिद ढहा दिये जाने के बाद मुंबई धमाकों का बदला लेने वाले धर्मांध और देशद्रोही दाउद के खिलाफ लम्बी जंग लड़ी ,सन्देश साफ है कि जो काम भारत की सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों को करना चाहिए था वह अकेले छोटा राजन ने किया है ,वह कथित इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला वतनपरस्त भारतीय है ,उसका सम्मान होना चाहिए ,उसकी सुरक्षा होनी चाहिए और उसकी मदद से हमें दाउद जैसे दरिन्दे को धर दबोचना चाहिए .उसकी नाटकीय गिरफ्तारी के तुरंत बाद से ही भक्तगण ऐसा माहौल बनाने में लगे हुए है .इस बीच महाराष्ट्र पुलिस ने सी बी आई की अन्तराष्ट्रीय अपराधों के अनुसन्धान में विशेष दक्षता को देखते हुए छोटा राजन के खिलाफ सारे मामल उसे सोंप दिये है .अब छोटा राजन केंद्र सरकार का विशिष्ट अतिथि है तथा उसके जान माल की सुरक्षा करना इस कृतज्ञ राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है !
छोटा राजन की तयशुदा गिरफ्तारी ,उसके लगभग पूर्वनिर्धारित प्रत्यर्पण और वायुसेना के विशेष विमान गल्फस्ट्रीम -3 से भारत पदार्पण और दीवाली से ठीक पहले स्वदेश आगमन को एक उत्सव का रूप देना और उसे आतंकवाद के खिलाफ आजीवन लड़नेवाला एक दलित यौद्धा निरुपित कर दिया जाना जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तरफ ईशारा कर रहा है वह वर्तमान के जेरेबहस असहिष्णु राष्ट्र से भी कई ज्यादा भयानक है .राष्ट्रभक्ति के नाम पर ,आतंकवाद से लडाई के नाम पर एक अपराधी को राष्ट्रनायक बनाने के हो रहे प्रयास निसंदेह डरावने है .हत्यारे को नायक बनाया जा रहा है. एक माफिया डॉन को दलितों का मसीहा बना कर पेश किया जा रहा है .क्या यह देश इतना कमजोर हो गया है कि हमें आतंकवाद के विरुद्ध लडाई भी आतंकियों को देशभक्ति का चोला पहना कर लड़नी पड़ रही है ?
हमें याद रखना होगा कि आतंक को धर्म के चश्मे से देखने की यह अदूरदर्शी नीति एक दिन देश विभाजन का कारक बन सकती है .लोग जवाब चाहेंगे कि एक दिन इसी तरह ख़ुफ़िया एजेसियों के द्वारा याकूब मेमन भी लाया गया था ,सरकारी साक्षी बनने के लिए ,फिर वो समय भी आया जब उसे लम्बे समय तक कैद में सड़ाने के बाद फांसी के फंदे पर लटका दिया गया और जिसने इसका विरोध किया वो सभी राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिये गये ,क्या इस इतिहास की पुनरावृति छोटा राजन मामले में नहीं होगी ,इसकी कोई गारंटी है ? आज यह सवाल खड़ा हो रहा है कि यह किस तरह का देश हम बना रहे है, जहाँ पर अक्षम्य अपराधों और दुर्दांत जालिमों को राष्ट्रवाद के उन्माद चादर तले ढंक कर सुरक्षित करने की सुविधा निर्मित कर ली गयी है .हम कितने आत्मघाती सोच को अपना चुके है जहाँ अगर आतंक का रंग हरा है तो वह खतरनाक और आतंक का रंग गैरुआ है तो वह राष्ट्रवाद मान लिया जायेगा .निर्मम सत्ता का यह स्वभक्षी समय है ,हम खुद नहीं जानते कि हम कहां जा रहे है ,पर इतनी सी गुजारिश तो की ही जा सकती है कि छोटा राजन जैसे अपराधी को देश और दलितों का आदर्श बनाने की भूल मत कीजिये .

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार है और दलित ,आदिवासी एवं अल्पसंख्यक समुदायों के प्रश्नों पर राजस्थान में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता है )

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार एंड्राइड एप्प

मीडिया दरबार की एंड्राइड एप्प अपने एंड्राइड फ़ोन पर इंस्टाल करें.. Click Here To Install On Your Phone

Contacts and information

मीडिया दरबार - जहाँ लगता है दरबार. आप ही राजा हैं इस दरबार के और कटघरे में है मीडिया. हम तो मात्र एक मंच हैं और मीडिया पर अपनी निगाह जमायें हैं, जहाँ भी मीडिया में कुछ गलत होता दिखाई देता है उसे हम आपके सामने रख देते हैं और चलाते हैं मुकद्दमा. जिसपर सुनवाई करते हैं आप, जहाँ न्याय करते हैं आप. जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार...

Social networks

Most popular categories

© 2014 All rights reserved.
%d bloggers like this: