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टीम अन्ना ने ही अंधे कुएं में धकेल दिया आंदोलन टीम अन्ना ने ही अंधे कुएं में धकेल दिया आंदोलन(7)

जिस अन्ना टीम ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन खड़ा किया, उसी ने अपनी नादानियों, दंभ और मर्यादाहीन वाचालता के चलते उसे एक अंधे कुएं में धकेल दिया है। यह एक कड़वी सच्चाई है, मगर कुछ अंध अन्ना भक्तों को यह सुन कर बहुत बुरा लगता है और वे यह तर्क देकर आंदोलन की विफलता को ढ़ंकना चाहते हैं कि टीम अन्ना ने देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण तो पैदा किया ही है। बेशक देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ी भारी पीड़ा थी और उसे टीम अन्ना ने न केवल मुखर किया और उसे एक राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ल दी, मगर जिस अंधे मोड़ पर ले जाकर हाथ खड़े किए हैं, वह आम जनता की आशाओं पर गहरा तुषारापात है। एक अर्थ में यह जनता के साथ विश्वासघात है। जिस जनता ने उन पर विश्वास किया, उसे टीम अन्ना ने एक मुकाम पर ला कर ठेंगा दिखा दिया। अब हम भले ही आशावादी रुख अपनाते हुए आंदोलन की गर्म राख में आग की तलाश करें, मगर सच्चाई ये है एक बहुत बड़ी क्रांति का टीम अन्ना ने सत्यानाश कर दिया।
टीम अन्ना में चूंकि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लोग थे, इस कारण उनमें कभी  भी मतैक्य नहीं रहा। उनके मतभेद समय-समय पर उजागर होते रहे, जिसकी वजह से कई बार सामूहिक नेतृत्व के मुद्दे पर उनसे जवाब देते नहीं बना।
जहां तक स्वयं अन्ना हजारे का सवाल है, वे खुद तो पाक साफ हैं और बने रहे, मगर उनकी टीम कई बार विवादों में आई। कभी अरविंद केजरीवाल पर आयकर विभाग ने उंगली उठाई, तो कभी किरण बेदी पर विमान की टिकट का पैसा बचाने का आरोप लगा। भूषण बाप-बेटे की जोड़ी पर भी तरह-तरह के आरोप लगे। सबसे ज्यादा विवादित हुए अपने घटिया बयानों की वजह से।
टीम अन्ना कितने मतिभ्रम में रही, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी जिन बाबा रामदेव से वह कोई संबंध नहीं रखना चाहती थी, बाद में उसी से मजबूरी में हाथ मिला लिया। उसके बाद भी बाबा रामदेव को लेकर भी टीम दो धड़ों में बंटी नजर आई। यही वजह रही कि जब टीम से बाबा से गठबंधन किया तो न केवल उनके विचारों में भिन्नता बनी रही, अपितु मनभेद भी साफ नजर आता रहा। एक ओर बाबा रामदेव गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से गलबहियां करते रहे तो दूसरी और टीम अन्ना के सदस्य इस मुद्दे पर अलग-अलग सुर उठाते नजर आए। हालत ये हो गई कि जो बाबा रामदेव अपने वायदे के मुताबिक टीम अन्ना के ताजा अनशन के पहले दिन कुछ घंटे नजर आए, बाद में गायब हो गए और आखिरी दिन अनशन तुड़वाने के लिए आने पर कहने पर साफ मुकर गए। टीम अन्ना कभी सभी राजनीतिक दलों से परहेज करती रही तो कभी पलटी और कांग्रेस को छोड़ कर अन्य सभी दलों के नेताओं के साथ एक मंच पर आई। टीम अन्ना की नीयत और नीति सदैव अस्पष्ट ही रही। यही कारण रहा कि शुरू में जो संघ व भाजपा कांग्रेस विरोधी आंदोलन होने की वजह से साथ दे रहे थे, वे  खुद को भी गाली पडऩे पर अलग हो गए।
टीम अन्ना दंभ से इतनी भरी है कि वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं गांठती। उसने कई बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व अन्य मंत्रियों और नेताओं  पर अपमाजनक टिप्पणियां कीं। पिछले साल स्वाधीनता दिवस पर खुद अन्ना ने मनमोहन सिंह पर टिप्पणी की कि वे किस मुंह से राष्ट्रीय झंडा फहरा रहे हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान तो प्रणव मुखर्जी पर आरोप लगाए ही, उनके चुने जाने पर इसे देश का दुर्भाग्य करार दिया। यह बेशर्म सदाशयता ही कही जाएगी कि पहले जानबूझकर प्रणब मुखर्जी का चित्र अपने मंच पर लगाया और बाद में खीसें निपोरते हुए उसे कपड़े से ढंक दिया।
जहां तक टीम की एकता का सवाल है, अन्ना हजारे कहने मात्र को टीम लीडर थे, मगर भीतर अरविंद केजरीवाल तानशाही करते रहे। अकेले उनके व्यवहार की वजह से एक के बाद एक सदस्य टीम से अलग होते गए। एक ओर तो टीम अन्ना लोकतंत्र और पारदर्शिता की मसीहा बनती रही, दूसरी ओर खुद कुलड़ी में गुड़ फोडऩे की नीति पर चलती रही। मौलाना शमून काजमी की टीम से छुट्टी उसी का ज्वलंत उदाहरण है। यह वही टीम है, जिसने सरकार के साथ शुरुआती बहस की वीडियो रिकार्डिंग करवाने की जिद की और दूसरी ओर अन्ना हजारे केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद से गुप्त वार्ता करने से नहीं चूके। पोल खुलने पर उनका चेहरा देखने लायक था, जो हर एक ने टीवी पर देखा।
जो आखिरी अनशन आंदोलन के पटाक्षेप और राजनीति की ओर पहल का सबब बना, वह भी बिना किसी रणनीति के शुरू हुआ। इसका दोष भले ही सरकार को दिया जाए कि उसने उनको इस बार गांठा ही नहीं, मगर यह टीम अन्ना की रणनीतिक कमजोरी ही मानी जाएगी कि नौवें दिन तक आते-आते किंकतव्र्यविमूढ़ हो गई। वजह साफ थी। टीम अन्ना की बेवकूफियों  व अपरिपक्वता की वजह से आंदोलन जनाधार खो चुका था। जब भीड़ नहीं जुटी तो उस टीम के होश फाख्ता हो गए, जो कि सबसे पहले व दूसरे अनशन के दौरान अपार जनसमर्थन की वजह से बौरा गई थी। जब मीडिया ने भीड़ की कमी को दिखाया तो अन्ना के समर्थक बौखला गए। उन्हीं मीडिया कर्मियों से बदतमीजी पर उतर आए, जिनकी बदौलत चंद दिनों में ही नेशनल फीगर बन गए थे। यहां तक कि सोशल मीडिया पर केजरवाल को भावी प्रधानमंत्री तक करार दिया जाने लगा।
असल में मीडिया किसी का सगा नहीं होता। वो तो उसने इसी कारण टीम अन्ना को जरूरत से ज्यादा उभारा क्योंकि उसे लग रहा था कि टीम एक अच्छे उद्देश्य के लिए काम कर रही है, मगर टीम अन्ना ने समझ लिया कि मीडिया उनका अनुयायी हो गया है। जैसे ही मीडिया तटस्थ हुआ और आंदोलन की कमियां भी उजागर करने लगा तो आंदोलन की रही सही हवा भी निकल गई। इसी के साथ यह भी साफ हो गया था कि पूरा आंदोलन टीवी व इंटरनेट पर की जा रही शोशेबाजी पर टिका हुआ था।
इस बार बलिदान होने की घोषणा करके अनशन पर बैठे अरविंद केजरीवाल की बुलंद आवाज तब ढ़ीली पड़ गई, जब आठ दिन बाद भी उन्हें सरकार ने तवज्जो नहीं दी। हालत ये हो गई कि अपना अनशन खुद ही तोड़ लेने का फैसला करना पड़ा। और बहाना बनाया इक्कीस लोगों की उस चि_ी को, जिस में पार्टी बनाने की कोई सलाह या उस में शामिल होने की कोई इच्छा नहीं लिखी गई थी। आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर आ कर खड़ा हो गया, जहां मुंह बाये खड़ी जनता को जवाब देना जरूरी था। जवाब कुछ था नहीं, सो आखिर विकल्प के लिए वही रास्ता चुना, जिसके लिए वे लगातार आनाकानी करते रहे। अर्थात सत्ता परिवर्तन की मुहिम। व्यवस्था परिवर्तन तो कर नहीं पाए। हालांकि अधिसंख्य अन्ना समर्थक सहित खुद टीम अन्ना भी यह जानती है कि ये रास्ता कम से कम उनके हवाई संगठन के लिए धन के अभाव में कत्तई नामुमकिन है, मगर नकटे बन कर यही कह रहे हैं कि हम सत्ता परिवर्तन कर दिखाएंगे। अनेक ऐसे भी हैं, जो आंदोलन से जुड़ कर अब पछता रहे हैं कि यदि इसी प्रकार राजनीति में आना था तो काहे को समय बर्बाद किया। जिन्हें लोग असली राष्ट्रभक्त के रूप में सम्मान दे रहे थे, उन्हें अब उसी तरह हिकारत की नजर से देखा जाएगा, जैसा कि वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं व नेताओं को देखा करते थे।
कुल मिला कर आंदोलन की निष्पत्ति ये है कि गलत रणनीतिकारों की मदद लेने से लाखों लोगों की आशा का केन्द्र अन्ना हजारे की चमक फीकी हो गई है, अलबत्ता उनकी छवि आज भी उजली ही है। बाकी पूरी टीम तो एक्सपोज हो गई है। शेष रह गया है आंदोलन, जो आज भी आमजन के दिलों में तो है, मगर उसे फिर नए मसीहा की जरूरत है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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-मॉडरेटर||

आखिर अर्थी उठ ही गयी उन भारतीयों की आशाओं की, जो अन्ना हजारे द्वारा चलाये गए आन्दोलन को देख यकायक उम्मीदों का एक दीपक जला बैठे थे. जंतर मन्तर पर जब लोगों ने देखा कि एक पिचहत्तर साल का वृद्ध देश की सबसे बड़ी भ्रष्टाचार रुपी समस्या से लड़ने के लिए अनशन पर बैठ रहा है तो उसे लगा कि अब इस देश में भ्रष्टाचार नहीं रहेगा. इससे पहले कुछ राजनेताओं, एनजीओ और मीडिया के अलावा देश में महाराष्ट्र के अलावा अन्य किसी भी राज्य में किसी को भी पता नहीं था कि अन्ना हजारे किस मर्ज की दवा है मगर जब मीडिया ने बताया कि महाराष्ट्र में अन्ना हजारे ने कई भ्रष्ट मंत्रियों से अपने आंदोलनों के जरिये मंत्रिपद छिनवा दिया था और शरद पंवार जैसे छंटे हुए और लोमड़ी से भी ज्यादा चालाक राजनेता को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहते चैन से राज नहीं करने दिया तो हर कदम पर भ्रष्टाचार से सताया आम आदमी सपने देखने लगा कि जल्द ही भारत भ्रष्टाचार रुपी दानव से मुक्त हो जायेगा.

उसकी इस उम्मीद को पक्का करने पर ठप्पा लगाया लोकपाल बिल पर बनी संसदीय समिति के मुखिया पद से इस्तीफ़ा देकर खुद शरद पंवार ने. शरद पंवार के इस्तीफे ने आम आदमी को पूरा विश्वास दिला दिया कि आईएसी नामक यह आन्दोलन सफल होने में सिर्फ उसके सहयोग की जरूरत है, सो हर आम आदमी इस आन्दोलन से दिल से जुड गया.

यदि कोई उसे सत्य बताने का प्रयत्न करता तो आम आदमी गुस्से से उबल पड़ता और सच को कांग्रेस का दलाल समझ हड़काने लगता. आम आदमी को क्या पता था कि यह एक सोची समझी चाल थी, जिसका हर दांव अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसौदिया चल रहे थे. आखिर उन्हें उनके एनजीओ को विदेशों से मिलने वाले लाखों डॉलर्स के चंदे का परिणाम भी दिखाना था अपने विदेशी आकाओं को. सिर्फ विदेशी ही नहीं हिसार के एक अरबपति उद्योगपति सांसद ने भी अपनी तिजोरी खोल रखी थी इस आन्दोलन के लिए.

कांग्रेस और उसके भ्रष्ट शासन को पटखनी देने की इस झूठी महाभारत को परवान चढाने का काम भी अंदरखाने कांग्रेस ही कर रही थी. इसी का नतीजा था अन्ना हजारे को बिना किसी अपराध के तिहाड़ की सैर करवाना. ताकि अन्ना के साथ ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें. यही नहीं तिहाड़ जेल में किरण बेदी अन्ना हजारे का अवैध रूप से एक बार नहीं दो बार विडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड कर लेती हैं और यह सभी टीवी चैनल्स पर प्रसारित भी हो जाता है और इस मामले में कोई एफआईआर भी दर्ज नहीं होती. आखिर क्यों? क्या कोई आम आदमी या अधिकारी अथवा पत्रकार बिना अनुमति तिहाड़ जेल में जाकर किसी बंदी का इंटरव्यू रिकॉर्ड कर सकता है? कत्तई नहीं. यह एक गंभीर अपराध है. मगर इस अपराध को आज तक किसी ने नोटिस में ही नहीं लिया. क्यों, क्यों और क्यों? क्योंकि आम आदमी को फंसाना जो था. तरह तरह के ड्रामें रचे गए और सताया हुआ आम आदमी इस चक्रव्यूह में फंसता गया.

अब नयी नौटंकी के ज़रिये एक और राजनैतिक पार्टी का जन्म हो रहा है, जो दो हज़ार चौदह के लोकसभा चुनावों में पांच सौ तियालिस या कुछ कम सीटों पर खम्म ठोकेगी.

यहाँ देखने वाली बात यह है कि आम मतदाता का एक अच्छा खासा प्रतिशत इस भ्रष्ट और निक्कमी सरकार से बुरी तरह उकताया हुआ है और आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को छठी का दूध याद दिलाने को तैयार बैठा है. ध्यान रहे कि हर पार्टी का अपना एक वोट बैंक होता है जो हर हांल में अपनी पार्टी को ही वोट देता है पर वह निर्णायक नहीं होता. निर्णायक वोट हमेशा हवा की झोंक में जाता है. अब यह वोट आगामी चुनावों में कितनी पार्टियों में बटें जिससे कांग्रेस का परम्परागत वोट कांग्रेस को सत्ता में या सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जीता कर ला सके सारा खेल यही है. इस ड्रामें की पटकथा बहुत ही सोच समझ कर लिखी गयी है और पर्दा उठने से गिरने की टाइमिंग का पूरा ध्यान रखा गया है.

यहाँ यह भी देखना होगा कि कांग्रेस ने महानरेगा जैसी कामधेनु के जरिये हर गांव में अपने कार्यकर्ताओं को दूध दिया है. सो उसके परम्परागत वोटों में यदि कोई इजाफा नहीं होता तो कमी भी नहीं आएगी. बाकि काम केजरीवाल और सिसौदिया युगल के हवाले है ही. राहुल गाँधी के प्रधान मंत्री बनने के सफर की ही एक कथा है यह.

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सतीश चन्द्र मिश्र  ||
संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत के साथ ही सरगर्म हुए राजनीतिक वातावरण में अन्ना टीम  ने एक बार फिर कमर कस ली है. इसके लिए अन्ना टीम ने एक बार फिर अपना “जनलोकपाली” कीर्तन प्रारम्भ किया है. पिछले तीन-चार दिनों से  न्यूज चैनलों पर ये अन्ना गैंग फिर चमका है और आदेशात्मक शैली में देश की संसद और संविधान को अपना स्वरचित जनलोकपाली पहाड़ा पढ़वाने की कोशिश करता दिखा है. 

यह अन्ना टीम न्यूज चैनलों के वातानुकूलित स्टूडियोज़ में बैठकर121 करोड़ देशवासियों के पूर्ण समर्थन के अपने दावे के साथ देश के लिए, देश की तरफ से सोचने, विचारने, आदेश देने, और फैसला लेने के इकलौते ठेकेदार के रूप मेंस्वयम को प्रस्तुत करता दिखा.

इस से पहले रामलीला मैदान में लगाये गए अपने “जनलोकपाली” मजमें के दौरान भी इस अन्ना टीम ने ऐसे ही हवाई दावों का भ्रमजाल कुछ न्यूज चैनलों के सहयोग और समर्थन से बढ़ चढ़ कर फ़ैलाने की कुटिल कोशिशें की थी, जबकि उसका यह दावा वास्तविकता से हजारों कोस दूर है. गणितीय प्रतीकों में कहूँ तो 5 प्रतिशत भी सही नहीं है. तथ्यपरक यथार्थ की तार्किक कसौटी इस अन्ना टीम द्वारा खुद को प्राप्त 121 करोड़ देशवासियों के समर्थन के दावे की धज्जियाँ उड़ाती स्पष्ट दिखायी देती है.

ज्ञात रहे की इस अन्ना टीम के जनलोकपाली आन्दोलन का सबसे बड़ा एवं मुख्य समर्थक वर्ग इस देश के पढ़े लिखे मध्य वर्ग, उच्च मध्यवर्ग एवं नौजवानों को ही माना गया था, इंटरनेट की ट्विटर एवं फेसबुक सरीखी दुनिया को इस टीम के समर्थन की सर्वाधिक उर्वर भूमि कहा गया.  इसके अंध समर्थक न्यूज चैनलों एवं खुद इस अन्ना गैंग का भी यही मानना था. इसीलिए इसने अपने तथाकथित जनलोकपाल बिल का मसौदा इस देश तक इंटरनेट के माध्यम से ही पहुंचाया था. उस मसौदे से सम्बन्धित सुझावों शिकायतों को प्राप्त करने के लिए भी इस टीम ने अपनी वेब साईट और Email को ही अपने और जनता के बीच का माध्यम बनाया था.

फेसबुक और ट्विटर पर अपने जनलोकपाली मजमे को मिले तथाकथित 121 करोड़ देशवासियों के ऐतिहासिक समर्थन के सामूहिक गीत अन्ना टीम ने कुछ न्यूजचैनलों के साथ संयुक्त रूप से गए थे.

उल्लेखनीय है की अप्रैल 2011 में खुद फेसबुक द्वारा जारी किये गए आंकड़ों के अनुसार भारत में फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या 35.7% की छमाही वृद्धि दर के साथ लगभग 2 करोड़ 30 लाख थी, अर्थात आज यह संख्या लगभग 3 करोड़ के आसपास होगी. अब जरा ध्यान से जानिये उस सच्चाई को कि इन 3 करोड़ देशवासियों के मध्य इस अन्ना टीम

टीम के समर्थन कि स्थिति क्या है.

फेसबुक में इस अन्ना टीम की संस्था INDIA AGAINST CORRUPTION के समर्थन में बने ग्रुपों/पेजों की कुल संख्या 492 है. खुद अन्ना टीम द्वारा बनाये गए इसके मुख्य पेज के समर्थकों की संख्या 5 लाख 42 हज़ार के करीब है. इसके मुख्य पेज और शेष 491 पेजों के समर्थकों की संख्या का कुल योग लगभग 8 लाख 20 हज़ार के करीब है. ज़रा ध्यान दीजिये की 3 करोड़ के करीब फेसबुक की भारतीय आबादी में से कुल 8 लाख 20 हज़ार लोगों ने इस टीम के मंच को अपना समर्थन दिया है. फेसबुक संसार की भारतीय आबादी के केवल 2.73% सदस्यों ने ही इस अन्ना टीम  और उसके मंच को अपना समर्थन दिया है. यद्यपि फेसबुक की दुनिया का हर सदस्य यह जानता है की एक सदस्य कई-कई ग्रुपों और पेजों को अपना समर्थन दे सकता है और देता भी है. यदि ऐसे साझा समर्थकों की संख्या विश्लेषित की जाए तो 2.73% समर्थन का उपरोक्त आंकड़ा 1.5% के आसपास ही पहुंचेगा. इस अन्ना टीम की चौकड़ी के सबसे मेन मेम्बर अरविन्द केजरीवाल के नाम से जो मुख्य पेज है उसमे इसके समर्थकों की संख्या है 48,790.

केजरीवाल के कुछ अंध भक्तों ने भी केजरीवाल के समर्थन के पेज बना रखे हैं. ऐसे कुल पेजों की संख्या है 53. केजरीवाल के मुख्य पेज समेत इन 54 पेजों में केजरीवाल समर्थकों की कुल संख्या है 1 लाख 34 हज़ार 971. अर्थात केवल 0.44% समर्थन

इसके बाद अन्ना टीम की मेम्बर नम्बर 2 है किरण बेदी.

किरण बेदी के नाम से जो मुख्य पेज है उसमें बेदी समर्थकों की संख्या है 1 लाख 8 हज़ार 684.

किरण बेदी के भी कुछ समर्थकों ने बेदी के समर्थन के पेज बना रखे हैं.

ऐसे कुल 76 पेज हैं और किरण बेदी के मुख्य पेज समेत इन 77 पेजों में बेदी समर्थकों की कुल संख्या है 2 लाख 13 हज़ार 387.

अर्थात केवल 0.71% समर्थन

इसके बाद नाम आता है अन्ना टीम  के फौजी नम्बर तीन प्रशांत भूषण का.

इसके समर्थन के नाम से कुल 6 पेज हैं और इन छहों पेजों में इसके समर्थकों की कुल संख्या है केवल 2369.

अर्थात केवल 0.01% समर्थन, और इस चौकड़ी के मेम्बर नम्बर चार मनीष सिसोदिया के व्यक्तिगत पेज में समर्थकों की संख्या है 4988 तथा इसके समर्थन के पेज में इसके समर्थकों की संख्या है केवल 124.

अर्थात 3 करोड़ भारतीय सदस्यों वाले फेसबुक के संसार में अन्ना गैंग की इस चौकड़ी को कुल 350851 लोगों का समर्थन प्राप्त है.

एक बार पुनः यह उल्लेख कर दूं की इसमें अधिकांश संख्या ऐसे साझा समर्थकों की होती है जो कई-कई पेजों पर जाकर अपना समर्थन व्यक्त करते हैं, और स्वाभाविक रूप से केजरीवाल को समर्थन देने वाला व्यक्ति किरण बेदी का भी समर्थक होगा. यदि यह भी जांच लिया जाए तो इस अन्ना टीम  के समर्थन की सबसे उर्वर भूमि मानी जाने वाली फेसबुक की 3 करोड़ भारतीयों की दुनिया में इस चौकड़ी के समर्थकों का आंकडा 2 से 1.5 लाख के आंकड़े के बीच झूलता नज़र आएगा.

इस टीम के मुखिया खुद अन्ना हजारे के मुख्य पेज पर समर्थकों की संख्या 3 लाख 21 हज़ार 448 है तथा अन्ना हजारे के समर्थन में बने 79 अन्य पेजों के समर्थकों की संख्या इसमें जोड़ देने पर यह आंकडा पहुँच जाता है 5 लाख 96 हज़ार 779 पर.

अर्थात केवल 01.98% समर्थन. जाहिर सी बात है की जो IAC समर्थक वही अन्ना समर्थक है.

इसी समर्थन में से अन्ना टीम की चर्चित चौकड़ी भी अपने समर्थन की बन्दर बाँट किये हुए है.

कुल मिलाकर यह स्पष्ट होता है कि 3 करोड़ भारतीयों वाले फेसबुक संसार में इस पूरी टीम और उसके जनलोकपाली मजमें के समर्थकों कि वास्तविक संख्या लगभग 6 लाख है, यानी केवल 2 प्रतिशत के आसपास ही है.

अब एक नज़र इस टीम अन्ना को ट्विटर पर प्राप्त समर्थन की.

मई 2011 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ट्विटर संसार के भारतवासी सदस्यों की संख्या लगभग 1 करोड़ 30 लाख के करीब थी.

ट्विटर कि इस दुनिया में किरण बेदी के नाम से बने 2 एकाउंट्स में से एक में किरण के समर्थकों कि संख्या है 303257 और दुसरे में 8326 यानि कुल समर्थकों कि संख्या है 311583. अर्थात लगभग 2.39%  समर्थन.

इसी ट्विट्टर की दुनिया में केजरीवाल के नाम से बने नौ एकाउंट्स में उसके कुल समर्थकों कि संख्या है 43998. अर्थात लगभग 00.33% समर्थन.

ट्विटर पर ही इस अन्ना टीम  ने जनलोकपाल के नाम से ही एकाउंट बना रखा है. ट्विटर पर इस जनलोकपाल के समर्थकों की संख्या है लगभग 181453. अर्थात 1.39%  समर्थन.

इसके अलावा जनलोकपाल  के नाम से 10-5 एकाउंट और हैं जिनमें समर्थकों की संख्या 25-50 और 100 तक है. अर्थात नगण्य.

ट्विटर पर प्रशांत भूषण नाम से बने 5-6 एकाउंटस में से किसी के समर्थकों की संख्या 2 है तो किसी की 5 और किसी की सिर्फ शून्य…!!! ये वही प्रशांत भूषन है जो देश के दो टुकड़े कर देने की सलाह पूरे देश को देता घूमता है.

कमोवेश यही स्थिति मनीष सिसोदिया नाम से बने 3 एकाउंट्स की है.

ट्विटर पर ही कुछ अन्ना समर्थकों द्वारा अन्ना हजारे के नाम से बनाये गए लगभग 100 एकाउंट्स में दर्ज समर्थकों की संख्या लगभग 42000 के करीब है. अर्थात लगभग 0.32% समर्थन.

अन्ना गैंग के समर्थन की सबसे उर्वर भूमि समझी जाने वाली इंटरनेट की दुनिया के फेसबुक एवं ट्विटर संसार में  ये है असलियत अन्ना टीम के स्वघोषित जननायकों तथा उनके जनलोकपाली मजमे को प्राप्त 121 करोड़ देशवासियों के तथाकथित समर्थन की.

अतः गाँव गरीब खेत किसान मजदूरों के लगभग 85% वास्तविक भारत में इस टीम को प्राप्त समर्थन का वास्तविक आंकडा क्या कितना और कैसा होगा, इसका आंकलन कठिन नहीं है.

इस टीम के अंध भक्तों को आइना दिख जाए  इसके लिए जिक्र ज़रूरी है की इसी ट्विटर की भारतीय दुनिया में अमिताभ बच्चन के सिर्फ एक एकाउंट के समर्थकों की संख्या ही 15 लाख 87 हज़ार 307 है, तो प्रियंका चोपड़ा के केवल एक एकाउंट के समर्थकों की संख्या 16 लाख 69 हज़ार 704 है. साझा समर्थकों की इसमें कोई सम्भावना ही नहीं.

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सोमवार को सोशल नेटवर्किग वेबसाइट फेसबुक और अन्ना समर्थकों में जम कर ठनी। फेसबुक ने इस आंदोलन की सारी सामग्री अपनी साइट से हटा कर इसका अकाउंट जाम कर दिया था। इस पर अन्ना समर्थक पूरे दिन दूसरी सोशल नेटवर्किग वेबसाइट ट्विटर के जरिए फेसबुक पर इसे बहाल करने का दबाव बनाते रहे।

दिलचस्प बात ये रही कि अन्ना समर्थक इसके लिए ट्विटर और दूसरी नेटवर्किंग साइटों पर सरकार को कोसते नजर आए। आखिरकार फेसबुक ने टीम अन्ना को ई-मेल कर भरोसा दिलाया कि यह सिर्फ तकनीकी कारण से हुआ। जल्दी ही वह इसे पहले की तरह चालू कर देगा। हालांकि देर रात पेज पूर्व स्थिति में आ गया था।

सोमवार की सुबह से फेसबुक पर ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का कम्यूनिटी पेज ठप कर दिए जाने पर टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी ने हैरानी जताई है। इन्होंने ट्विटर पर लिखा, ”आंदोलन का फेसबुक पेज गायब है। क्यों हुआ पता नहीं? किसने किया पता नहीं? ये तो कमाल है..।” कम्युनिटी पेज को चलाने वाले शिवेंद्र सिंह चौहान कहते हैं उन्होंने सुबह साढ़े सात बजे ध्यान दिया कि लगातार कोशिश करने के बाद भी वे इस पर कुछ पोस्ट नहीं कर पा रहे। कुछ घंटे के बाद पूरा पेज ही गायब हो गया।

यह फेसबुक के दुनिया भर के सबसे लोकप्रिय पेज में से है। इसके पांच लाख चालीस हजार से भी अधिक चहेते हैं। फेसबुक अश्लील सामग्री परोसने वालों के अलावा किसी समुदाय या नस्ल के खिलाफ आक्रामक सामग्री डालने वालों के खाते भी अक्सर बंद कर दिया करती है। ऐसी आशंका के बारे में पूछे जाने पर शिवेंद्र ने कहा कि कोई भी कम्युनिटी पेज किसी की भी टिप्पणी के लिए खुला होता है। किसी भी दूसरे पेज की तरह हमारे पेज पर भी कोई ऐसी टिप्पणी कर सकता था। मगर हम यहां तक कि मजाकिया लहजे में डाली गई टिप्पणियों और तस्वीरों को भी तुरंत हटा दिया करते थे।

उधर, ट्विटर पर बड़ी संख्या में लोग ‘रीस्टोर आइएसी एफबी पेज’ संदेश ट्वीट कर एफबी के इस कदम का विरोध करते रहे। स्टॉकनिन्जा डॉट काम के सह संस्थापक सौरभ बघेल ने अपने ट्वीट में इसे सरकार की नई ‘वेब सेंसरशिप’ बताया है। वहीं एक समर्थक सूरज चोखानी ने लिखा है कि ‘ऐसी डर्टी ट्रिक से कुछ नहीं होगा। लोग दिल्ली को तहरीर चौक बना देंगे, तब क्या सरकार करोड़ों लोगों के मुंह सी देगी?’

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों विख्यात अंग्रेजी लेखक सलमान रुश्दी ने अपना फेसबुक खाता बंद कर दिए जाने के बाद वेबसाइट के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग पर सीधे हमलावर टिप्पणियां की थीं। रुश्दी के दबाव के बाद फेसबुक ने यह खाता बहाल कर दिया था।

 

 

(पोस्ट जागरण पर आधारित)

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भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में दो ‘मराठा योद्धाओं’ को अब एक नया हथियार मिल गया है- उम्र का हथियार। एक योद्धा दूसरे को सठिया गया साबित करने में जुटा है तो दूसरा पहले को बचपना न करने की चेतावनी दे रहा है। दिलचस्प बात ये है कि दोनों की उम्र सत्तर से उपर है। 85 साल के ‘सठियाए’ राजनेता खुद को ‘बाल’ यानि बच्चा कहलाना पसंद करते हैं तो उनसे ग्यारह साल छोटे और ‘बचपना’ करने वाले 74 की उम्र में ही सबके ‘बड़े भाई’ यानि ‘अन्ना’ होने का दावा करते है। दोनों के समर्थकों को यह समझ में नहीं आ रहा कि किसे क्या मानें।

शिवसेना प्रमुख ने आंदोलन की प्रकृति को खोखला करार देते हुए कहा, ”इस तरह भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता। ऐसे बिछाया हुआ तुम्हारा जाल फट जाएगा और बड़ी मछलियां निकल जाएंगी।”

इसके जवाब में तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अन्ना ने शुक्रवार को कहा कि उम्र के कारण शिवसेना प्रमुख की बुद्धि में फर्क आ गया है। बढ़ती उम्र के कारण वे बेकार की बड़बड़ कर रहे हैं।

अब ताजा बयान में शिवसेना ने कहा है, ”अन्ना ने जो कहा हम उसका उपयुक्त जवाब दे सकते हैं, क्योंकि हम गांधीवादी नहीं हैं।” बाल ठाकरे की तरफ से शिवसेना सांसद संजय राउत ने बयान जारी किया जिसमें कहा गया है, ”चूंकि आपने मेरी बढ़ती उम्र का जिक्र किया, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप मुझसे छोटे हैं और यह बचपना आपको शोभा नहीं देता।” ठाकरे ने हजारे को चेतावनी देते हुए कहा, ”हमसे अनावश्यक झगड़ा मत लीजिए।”

अन्ना हजारे पर निशाना साधते हुए ठाकरे ने कहा था कि गांधीवादी समाजिक कार्यकर्ता का अनशन फाइव स्टार कार्यक्रम के समान था। उन्होंने कहा था कि यह एक फाइव स्टार उपवास था भ्रष्टाचार के मुददे को हंसी-मजाक का विषय मत बनाइए।
बाल ठाकरे ने नई दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन स्थल पर 35000 लोगों के लिए भोजन सहित भारी इंतजामों का भी हवाला दिया था।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हजारे ने रालेगण सिद्धी में संवाददाताओं से कहा कि उन्हें जो सही लगता है वह कहें। हमें जो सही लगता है वह हम करेंगे। हजारे ने कहा कि अपमान सहन करने की शक्ति होनी चाहिए। इससे पहले शिवसेना ने हजारे के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था और ठाकरे के पोते आदित्य ने अनशन के दौरान हजारे से मुलाकात भी की थी।

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“आना-आना” के लिए दौड़ रहे हैं अन्ना आंदोलन में सेवा करने आए कट्टर “समर्थक” “आना-आना” के लिए दौड़ रहे हैं अन्ना आंदोलन में सेवा करने आए कट्टर “समर्थक”(3)

-शिवनाथ झा।।

दिल्ली के रामलीला मैदान में समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ ‘कन्धे-से-कन्धा’ मिलाकर दिन-रात लड़ने वाले, भोजन-पानी, बिछावन, बिजली, लाउड-स्पीकर, पंखा, एयर-कंडीशंड गाड़ी-सवारी, पान-बीड़ी-सिगरेट और कभी-कभी “मदिरा” की आपूर्ति में लगे भारत के विभिन्न राज्यों के इवेंट मैनेजमेंट संस्थाओं का धैर्य टूट रहा है। अब वे सभी उसी स्वर से दुहरा रहे हैं, “भैया, बहुत हुई गांधीगिरी, अब लाल-लाल कागज पर छपे गाँधी जी के दर्शन करा दो, बहुत नुकसान हो गया है, भरपाई करना है।”

प्राप्त जानकारी के अनुसार दिल्ली के रामलीला मैदान में समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके टीम द्वारा भ्रष्टाचार विरोध और जिस जन लोकपाल विधेयक को लाने के लिए लगभग 15 दिनों का आन्दोलन चला था, इस कार्य में “सेवा अर्पित” करने वाले इवेंट मेनेजमेंट संस्थाएं अपनी-अपनी बकाया राशि के तुरंत भुगतान के लिए जोरदार कोशिश कर रहे है। इस कार्य के लिए पूरे देश से बहुत सारी इवेंट मैनेजमेंट कम्पनियां लगी थी।

सूत्रों का कहना है कि कुछ समाजसेवी संस्थाएं, जो अन्ना टीम मेम्बरानों या उनके द्वारा समर्थित या संचालित स्वयंसेवी संस्थाओं की करीबी थीं, उन्हें अधिकांश राशि का भुगतान कर दिया गया है, लेकिन दुर्भाग्यवश, जो संस्थाएं, दिल्ली के बाहर से आकर, अन्ना के आन्दोलन में सहयोग दिया और इवेंट मैनेजमेंट अधिकारियों के कहने पर काफी राशि सुविधा मुहैय्या कराने में लगा दिए, उन्हें लगातार दौड़ाया और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। इवेंट कर्मी आरोप लगा रहे हैं कि टीम अन्ना के लोग करोड़ों का चंदा खुद पचा गए हैं और अब उन्हें धमका रहे हैं।

इन संस्थानों की सबसे बड़ी दुविधा ये है कि इन्हें अनुबंधित करते वक्त कागजी कार्रवाई न के बराबर हुई थी। उस वक्त तो इन्हें समाजसेवी का चोगा ओढा दिया गया था और अब वे खुल कर अदालत या मीडिया के पास अपनी शिकायत भी नहीं ले जा सकते। सूत्रों का कहना है कि टीम अन्ना इस बात को अच्छी तरह समझती है कि वे खुद-ब-खुद तंग होकर अपने-अपने शहरों में वापस चले जायेगें। बताया जाता है कि टीम अन्ना एवं मैनेजमेंट संस्थाओं द्वारा महाराष्ट्र , गुजरात, आन्ध्र प्रदेश के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, दिल्ली के स्वयंसेवी संस्थाओं को सेवा-सुविधा मुहैया कराने का भार सौपा गया था, जबकि देश के मीडिया में इस बात को लगातार दुहराया गया था कि “यह सभी स्वयंसेवी संस्थाएं खुद इस आन्दोलन में अन्ना की मदद कर रही हैं।”

लखनऊ की एक ऐसी ही संस्था के “हताश” सदस्य ने नाम न खोलने की शर्त पर बताया कि “आन्दोलन के समय तो सभी हाथ-पैर पकड़ रहे थे, अब तो पकड़ में ही नहीं आ रहे हैं। सबों ने “आश्वासन” दिया था कि अच्छा व्यवसाय होगा, अच्छा कमाएंगे, अपनी जमा पूंजी, बैंकों से उधार लेकर अन्ना के आन्दोलन में कोई तकलीफ ना हों, कोशिश किया। अब तो “आना-आना” केलिए “मोहताज हो रहा हूँ”। यह मैं नहीं, वे सभी कह रहे हैं जिन्हें “सेवा उपलब्ध कराने के लिए कहा तो गया था, अब पैसे के लिए दर-दर भटक रहे हैं।”

“अन्ना के लोग” अब दिखते ही नहीं। पहले मैडम जी, केजरीवाल साहेब के अलावा कई लोग फोन करते थे – जल्दी जल्दी सामान उपलब्ध कराओ। अब तो हमेशा “शहर से बाहर हैं” यही सुनता हूँ। फोन की घंटी भी थक कर बंद हों जाती है, हमारी तरह। पहले एक ही घंटी में “हेल्लो” की आवाज आ जाती थी।

सूत्रों का कहना है कि इस आन्दोलन के दौरान लगभग बीस से अधिक बड़ी “इवेंट-मैनेजमेंट संस्थाओं” को इसका कार्य-भार सौंपा गया था। इनमे से कुछ संस्थाएं अन्ना के टीम-मेम्बरान की भी बताई जाती हैं। सूत्र ने तो यहाँ तक दावा करते हैं कि “परिवर्तन” नाम से संचालित संस्था में अन्ना के टीम के एक सदस्य का अहम् भूमिका है और शायद इसका “स्वामित्व” भी उन्ही के पास है। सूत्रों का मानना है कि “वैसे पूरे आन्दोलन के दौरान सेवा-सुविधा उपलब्ध कराने पर आये कुल खर्च राशि का अंदाजा लगाना कठिन है, फिर भी यह राशि कई एक करोड़ में होगी। आज “भुगतान” नहीं होने के कारण दर्जनों संस्थाएं “सड़क नाप रही हैं”।

इस आंदोलन को आगे बढ़ाने और खर्चों के लिए पैसा जुटाने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान के अतिरिक्त पूरे देश में जहाँ-जहाँ अन्ना समर्थक आन्दोलन कर रहे थे वही शिविर में “दान पात्र” भी बनाये गए थे जहाँ लोगों ने जी खोल-कर धन दान किया था। दिल्ली के रामलीला मैदान में बनाए गए दान शिविर पर असंख्य लोगों की लंबी कतार लगी थी। बच्चे हों या बुजुर्ग, अमीर हो या गरीब सभी अपनी क्षमता के अनुरूप इस आंदोलन के लिए दान दिया था। मीडिया में इस बात का भी जिक्र किया गया था कि “अन्ना के समर्थक अपने घरों से खाना बनाकर दिल्ली और देश के अन्य प्रान्तों में अन्ना के समर्थकों को बांट रहे थे। यह भी कहा गया था कि धनी व्यापारी ट्रक में भरकर खाने-पीने की चीजें बांट रहे थे। मजदूर अपनी इच्छा से मैदान की साफ-सफाई में जुटे रहे। लेकिन सच तो यह है कि सभी व्यवस्थाएं “इवेंट मेनेजमेंट” द्वारा कराई गई थीं जो आज अन्ना और उनके लोगों से सेवा उपलब्ध कराने की कीमत मांग रहे है।”

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अन्ना हजारे कहाँ से और कैसे गाँधी? देश पूछ रहा है सवाल अन्ना हजारे कहाँ से और कैसे गाँधी? देश पूछ रहा है सवाल(6)

-आर के चौधरी।।
अन्ना हजारे जब मेदान्ता सिटी जैसे पाँच सितारा अस्पताल से अपने गाँव रालेगण सिद्धि पहुंचे और उन्होंने वहां जब पहली बार ग्राम सभा को संबोधित किया तो जैसे उनके मुखारबिंद से गर्वोक्ति पूर्ण आवाज़ में  निकला, ” अब भारत की जनता मेरी एक आवाज़ पर उठ खड़ी होगी” तो जैसे उनके भीतर का गुरुर उनकी जुबान पर आ गया। इसी के साथ उनकी गाँधी जी से तुलना करना इस देश के लाखों को बुद्धिजीवियों को अखर गया और यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि यदि गाँधी इस तरह के आन्दोलन के बाद साबरमती जाते तो क्या उन्हें भी ऐसा ही कोई घमंड होता?

गाँधी जी ने नमक सत्याग्रह से जो विजय हासिल की उसे गाँधी जी ने गरीब जनता की विजय बताया था, जबकि अन्ना हजारे अपने आन्दोलन से अब तक ऐसी कोई उल्लेखनीय जीत हासिल नहीं कर पाए और खुद अपनी इस जीत को आधी-अधूरी बताया था। फिर किस बात का घमंड?
अन्ना समर्थकों ने दिल्ली में यह नारा दिया कि “अन्ना नहीं, गाँधी है” लेकिन अन्ना हजारे और गाँधी की तुलना मेरे ख्याल से गाँधी के साथ ज्यादती होगी। सिर्फ सफ़ेद कुरता, पायजामा और गाँधी टोपी पहन लेने से गाँधी नहीं बना जा सकता। गाँधी बनने के लिए उनकी विचारधारा और उनकी सोच को अपनाना भी जरूरी है।

गाँधी जी ने अन्ना हजारे की तरह कभी भी कलफ लगा कुरता-पायजामा नहीं पहना बल्कि वे लंगोटी पहन कर ही काम चलाते रहे। गाँधी जी ने हमेशा मन जीत कर मानस परिवर्तन में विश्वास रखा। गाँधी जी ने दुनिया को सत्याग्रह जैसा हथियार दिया तो अन्ना ने अनशन के जरिये दबाव बनाने का रास्ता अख्तियार किया।

अन्ना हजारे ना तो गरीब, ना दलित और ना ही श्रमिक की बात करते हैं, जबकि गाँधी जी इन सभी वर्गों की बात करते थे। शायद यही सबसे बड़ा कारण रहा कि गाँधी जी के साथ सभी वर्ग जुड़ गए जबकि अन्ना हजारे के साथ दलित वर्ग नहीं आया।
गाँधी जी हमेशा सर्वजन हिताय की बात करते थे और गाँधी जी का कोई सलाहकार नहीं था जबकि अन्ना हजारे के सलाहकार मंडल में देश के प्रभावशाली और चतुर लोग है  और वे भोले-भाले तथा अल्पशिक्षित अन्ना हजारे को अपने हिसाब से सलाह दे रहे हैं। गाँधी जी विधि स्नातक थे जबकि अन्ना हजारे सातवी पास, सेना के सेवानिवृत ड्राईवर हैं। वर्तमान में गाँधी जी की तुलना किसी भी व्यक्ति विशेष से नहीं की जा सकती. अन्ना हजारे की तुलना गाँधी जी से करना गाँधी जी का और उनके कार्यों का अपमान होगा।

गाँधी जी जब भी बीमार पड़े तो उन्होंने आम जनता की तरह ही अपना इलाज करवाया, जबकि उन्हें विदेशों तक इलाज करवाने के प्रस्ताव आसानी से मिल सकते थे. वहीँ अन्ना हजारे का दिल मेदान्ता सिटी जैसे पाँच सितारा अस्पताल पर आ गया और देश के जाने माने चिकित्सक नरेश त्राहेन उनकी सेवा में दिन रात जुटे रहे। मेरी समझ के अनुसार गाँधी जी और अन्ना हजारे के तौर तरीकों में दिन रात का अंतर है. गाँधी जी अतुलनीय थे, अतुलनीय हैं और अतुलनीय रहेंगे, मेरा सबसे निवेदन है की गाँधी जी की तुलना किसी से ना करें और उनका सम्मान बना रहने दें।

(आर के चौधरी पिछले 30 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा उनकी गिनती जयपुर के जाने-माने पत्रकारों में होती है)

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खुदकुशी करने से अन्ना नहीं बन जाता कोई, फिर भी दिनेश की मौत है एक दुखद सच्चाई खुदकुशी करने से अन्ना नहीं बन जाता कोई, फिर भी दिनेश की मौत है एक दुखद सच्चाई(0)

- शिव नारायण शर्मा।।

दुनिया में कुछ अलग-अलग व्यक्तित्व के लोग रहते हैं एक व्यक्तित्व वह होता है जो भ्रष्ट तंत्र का उपयोग करके धन और रुतबे में अपने आप को ऊँचा उठाने की कोशिश करते हैं, ऐसे लोग समाज में अपने रुतबे की ज़्यादा परवाह करते हैं न कि अपनों कि, दूसरा व्यक्तित्व वह होता है जो किसी भी तरह से धन प्राप्ति में लगा रहता है, ऐसे लोग अपने पर ज़्यादा ध्यान देते हैं ना कि अपने परिवार पर, तीसरा व्यक्तित्व वह होता है जो अपने व अपने परिवार के पालन के लिये चोरी या आसामाजिक कार्य करता है और चौथा व्यक्तित्व वह होता है, जो अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं करता, भले ही उसकी वजह से उसकी आर्थिक स्थिती कितनी ही खराब क्यूँ न हो जाये, यह व्यक्तित्व अपने परिवार के लिये खुद की जान भी न्योछावर करने को तैयार रहता है।

ऐसे लोगों को समाज कदम-कदम पर लज्जित करता नज़र आता है, इस वजह से ऐसे लोग अपने आप को कर्ज के महा दलदल में फँसा लेते हैं और कर्जदार इनका भरपूर शोषण करते हैं व इनसे आठ से दस प्रतिशत तक ब्याज वसूलते हैं यहाँ तक कि सरकारी व्यवस्था के अनुसार बिना फायनेन्स का रजिस्ट्रेशन हुये बिना कोई व्यक्ति कर्ज नहीं दे सकता, फिर भी कर्जदारों ने रास्ता निकाला हुआ है, वह इन लोगों से फ्रंडली लोन के नाम पर मूल रकम का तीन से चार गुना लिखवा लेते हैं, वा बिना तारीख व राशि के ब्लैंक चेक पर हस्ताक्षर करवा कर रख लेते हैं| (इन साहूकारों का बाहुबलियों द्वारा इतना मजबूत दबाव होता है कि अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग भी इनके चंगुल में फँसे रहते हैं) ऐसे लोग मौका पड़ने पर क्योंकि उनके आदर्श तो अच्छे हैं।

इसलिये वह यह सोचकर कि हम एक अच्छे मकसद के लिये अपने आप को न्यौछावर कर दें तो हो सकता है हमारे परिवार को कुछ फायदा पहुँच सके, मगर इन लोगों को अगर शहीद का दर्जा देते हुये कुछ मदद पहुँची, तो ऐसे अनगिनत लोग जो इस हालत में हैं, वे अपने परिवार की मदद हेतु इस तरह के कई कांड करते चले जायेंगे। इनमें से काफी लोग इस हालत में हैं, अगर उन्हें आसानी से कोई ऐसा हथियार उपलब्ध हो जाए जिससे वह आसानी से अपने व अपने परिवार को बिना दर्द दिये मौत के हवाले कर लेंगे और इस समाज की रोज-रोज की जिल्लत से निजात पा लेंगे, वो भला हो इस कानून का कि ऐसे हथियार सिर्फ भ्रष्टाचारी व अपराधी लोगों को ही उपलब्ध हो पाते हैं अन्यथा ऐसे लोगों की आत्महत्या की कतार लग गई होती।

हमारा यह नारा कि “मैं अन्ना हूँ” तभी कारगर हो सकता है या आप अन्ना तभी बन सकते हैं जब आप अन्ना के इन पदचिन्हों पर चलें जिस पर वे चलते हैं। जैसे अहिंसात्मक तरीके से किसी भी अन्याय का विरोध करना, समाज की भलाई के लिये काम करना, जिसमें गाँवों की उस दुर्दशा का भी सुधार हो जो गाँव वाले खुद उचित मार्गदर्शन (अन्ना के समर्थक) पर अपने क्षेत्र को उन्नत स्थिति में पहुँचाएं (पाठशाला, जमीन को उपजाऊ करना, पानी का शुद्धिकरण, क्षेत्र को बीमारी से मुक्त कराना आदि)।

हम अगर अन्ना जैसा बनना चाहते हैं, तो उनके मार्गदर्शन का उपयोग करते हुए जैसे कि अन्ना जी कहते हैं कि अपना पेट भरा तो क्या कर लिया, काम ऐसा करो कि वे जिन्हें एक वक्त का भोजन भी प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है, उनको इस काबिल बनाओ कि वे इमानदारी से मेहनत करते हुये अपना पेट भर सकें (जैसे अगर वे शिक्षित नहीं हैं तो उन्हें शिक्षित करने के साधन उपलब्ध करवायें) इस बात पर भी ध्यान रखें कि कोई उनका शोषण न कर रहा हो, उनको इस तरह शिक्षित करो कि वे गलत आचरण से अपने आप को दूर रखें, यही अन्ना जी की सबसे बड़ी सफलता होगी और सबसे पहले अपने क्षेत्र के कर्जदारों को चिन्हित करो जो शोषण करने वाले साहूकारों के पंजे में फँसे हुए हों और उचित मार्गदर्शन देते हुए आवश्यक तरीके से कार्रवाई करवाओ जिससे इस तरह के शोषण करने वाले साहूकार को कानून का भय प्राप्त हो व कर्जदार अपने आप को अकेला न समझे और इन लोगों का भरपूर विरोध कर सकें।

कई जगह ऐसा भी नजर आयेगा कि यह कर्जदार कर्ज के बोझ तले तनाव में रहते हुये दारु वगैरह पी कर खुद के घर में हंगामा तो करते हैं, मगर दिल से जरुर मानते हैं कि वे गलत कर रहे हैं| ऐसी जगह अन्ना समर्थक अपनी काबलियत का परिचय दें और (जैसा कि हम जानते है कि जिस महिला के हाथ में घर की बागदोड रहती है, वह अपने परिवार को बहुत अच्छे से संभालती है) ऐसी स्थिति में उस परिवार की बागडोड महिला के हाथ में रखवाते हुये उचित मदद करो| जिससे आप के द्वारा किये गये कार्य की सफलता का % बढ जायेगा| हम इन परिस्थितियों से गुजरते हुये कुछ भी व्यक्तियों की अगर जान बचा सकें व देश की मुख्यधारा में जोडने में सफल रहें, तो हमारे अन्ना जी को लगेगा कि उनकी तपस्या सफल हुई|
जय हिन्द
(यह लेख कमेंट के जरिए प्राप्त हुआ है)

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क्या अन्ना हजारे ने देश के युवाओं का चरित्र बदल डाला है? क्या अन्ना हजारे ने देश के युवाओं का चरित्र बदल डाला है?(10)

-सुभाष नाहर।।


अन्ना हजारे के आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये बताई जा रही है कि  देश का युवा जागरूक हो कर भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर शांतिपूर्ण आन्दोलन की दिशा में अग्रसर हुआ है. ऐसा नहीं है कि देश में यह पहली बार हुआ हो. 1971 के बांग्ला मुक्ति युद्ध के समय इंदिरा गाँधी के पीछे यही शक्ति काम कर रही थी. इसी तरह जयप्रकाश नारायण के व्यवस्था परिवर्तन के आव्हान पर देश के युवा एक जुट हो गए थे. समय की बहती हवा के साथ हमारे देश का युवा हर किसी के आन्दोलन में सक्रिय हो जाता है. यही युवा है जो एक तरफ आरक्षण के विरोध में आत्मदाह तक करने को तैयार होता है और सड़कों पर देश की सम्पति को नुकसान पहुँचाने में भी पीछे नहीं रहता।
ये वही युवा है जो कल्याण सिंह कालवी जैसे राजपूत नेता के पीछे दिबराला सती के मुद्दे को लेकर सड़कों पर तलवारें लहराता है या राजपूत आरक्षण को लेकर तोड़ फोड़ करता है। कभी किरोड़ी लाल मीना या बैंसला के पीछे मीणा बनाम गुर्जर मुद्दे को लेकर रेल की पटरियों पर बैठ जाता है और पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा कर देता है। ये वही युवा है जो दिन में इंजीनियरिंग कॉलेज में पढता है और रात में सूने घरों में नकबजनी भी करता है। ये वही युवा है जो सड़क चलती युवतियों को छेड़ता है और मौका पाने पर बलात्कार तक कर लेता है। ये वही युवावर्ग है जो याहू और फेसबुक पर नकली लड़की बन कर दूसरों को बेवकूफ बनाने का प्रयत्न करता है और खुश होता है। ये वही युवा है जो राजनैतिक रैलियों कि भीड़ बढाता है और लौटते में ठेले – खोमचे लूट लेता है.

दरअसल बीबीसी की महिला पत्रकार के बयान के आधार पर इस अभियान में शामिल युवाओं की छवि काफी हद तक असामाजिक तत्वों जैसी बनी है। रही सही कसर अभियान के अंतिम दिनों असामाजिक तत्वों के साथ हुई पुलिस की मारपीट ने पूरी कर दी। ऐसे में ये सवाल जोरदार तरीके से उठ रहा है कि अन्ना हजारे के अभियान में किस प्रजाति के युवा थे। किरण बेदी का पर्स चोरी होना, महिलाओं के साथ बदतमीजी होना, बाइकर्स का निडर होकर स्टंट करना और पुलिस द्वारा मना करने पर अन्ना हजारे के समर्थन में आक्रामक तरीके से नारेबाजी करना, इंडिया गेट पर फिल्म अभिनेता जावेद जाफरी को दौड़ा -दौड़ा कर भगाना , राहुल गांधी के घर पर विरोध करने गए युवाओं द्वारा समोसा और पेय पदार्थ पर टूट पड़ना आदि ने इस अभियान में युवाओं की भूमिका पर संदेह पैदा कर दिया है।

सूत्रों की मानें तो रामलीला मैदान के आसपास का इलाका असामाजिक तत्वों का गढ़ है ध्यान रहे कि जीबी रोड रामलीला मैदान से कुछ दूरी पर ही है जहां ऐसे लोगों का जमावड़ा लगा होता है जो औरतों को सौदेबाजी का सामान मानते हैं। अन्ना के अनशन के दौरान ज्यादातर युवाओं ने अन्ना अभियान को तमाशे की तरह लिया। गुटों में बंट कर उन्होंने नारेवाजी की और खा पीकर खूब तमाशा भी किया। खाने का इंतजाम तो अन्ना हजारे के अभियान में निशुल्क था जो ऐसे युवाओं को वहां खींचता था। अन्ना टीम के प्रबंधन ने इन युवाओं का दोहरा उपयोग किया। जब तक ये अपने वास्तविक चरित्र में नहीं रहते मंच से कहा जाता रहा कि इस अभियान की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी युवा हैं वहीं जब ये युवा अपने वास्तविक चरित्र पे आए तो खुद अरविंद केजरीवाल ने मंच से कहा कि ये साजिश अभियान को बदनाम करने की है।

क्या हम यह समझें कि अन्ना के आन्दोलन ने देश के युवावर्ग का चरित्र बदल दिया है या अलग-अलग वर्गों, अलग-अलग जातियों में बंटा ये युवावर्ग अपनी सहूलियतों के हिसाब से अपनी दिशाएं तय करता है या ये युवा दिशाहीन है?

(सुभाष नाहर पिछले ४० वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के जाने माने हस्ताक्षर हैं।)

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एक बार फिर चर्चित हुई बिहार के युवक की शहादत, लेकिन जिसके लिए जान दी उसे ही नहीं है अहसास एक बार फिर चर्चित हुई बिहार के युवक की शहादत, लेकिन जिसके लिए जान दी उसे ही नहीं है अहसास(6)

बिहार एक बार फिर शहादत को लेकर चर्चा में है। याद कीजिये राहुल राज को, जिसने बिना किसी खास विचारधारा के मुंबई में घुसकर राज ठाकरे को दिनदहाड़े चुनौती थी, शहीद होने के बाद उसकी बहन चीखती रही और उसके पापा राष्ट्रपति से मिलने के लिए आकाश जमीन एक करते रहे लेकिन मिला कुछ नही। दिनेश यादव को अगर राहुल राज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन दुख की बात यह है कि उसके गरीब परिवार को इस शहादत की कीमत मिली है करीब साढे छह हजार रुपए जिसमें से आधे से ज्यादा तो दाह-संस्कार पर ही खर्च हो गए।

बिहार के सर्फुद्दीनपुर गांव, पंचायत सिंघारा कोपरा, दुल्हिन बाजार, पटना के दिनेश यादव का पार्थिव शरीर सड़क मार्ग द्वारा जब पटना स्थित बांसघाट पहुंचा तो कोहराम मच गया। अन्ना समर्थक भी अपने आंसू रोक नहीं पाए। जीएम फ्री बिहार मूवमेंट के संयोजक पंकज भूषण ने कहा कि शहीद दिनेश की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जायेगी और जल्द ही सर्फुद्दीनपुर गांव अगला रालेगन सिद्धी बनेगा। हालाँकि अन्ना समर्थकों ने दिनेश की दर्दनाक मौत पर कुछ भी बोलने का नैतिक अधिकार खो दिया है लेकिन न अब नैतिकता बची है और न ही सच्चाई। बचा है तो बस मीडिया और उसका राज। निगमानंद को याद कीजिये। दिमाग पर जोर डालियेगा तो गया के दशरथ मांझी भी याद आ जायेंगे और कुछ और भी गुमनाम शहीद।

दिनेश यादव, दिनांक 21 अगस्त को अपने गांव से निकले और अन्ना के समर्थन में पटना से दिल्ली को रवाना हो गए थे। उनके गांव के मित्र सुनील कुमार सिन्हा ने पंकज भूषण को बताया कि उसने 23 अगस्त को दिन में 02-30 बजे दिल्ली से फोन से बताया कि वो अन्ना के समर्थन में वहां पहुंचा हुआ है। उसके मित्र ने बताया, वही मेरी अंतिम बात थी फिर शाम में जैसे ही टीवी देखा तब पता चला कि दिनेश ने राजघाट के पास आत्मदाह कर लिया है।

उसी दिन उसे लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल में भरती कराया गया। जहाँ 29 अगस्त को सुबह उसने दम तोड़ दिया और अन्ना के समर्थन में बिहार का एक नौजवान शहीद हो गया। साथ हीं जानकारी हुई कि शहीद की पत्नी मल्मतिया देवी और माता श्रीमती माया देवी का बिलख बिलख कर बुरा हाल है। दिनेश के छोटे भाई अमरजीत जो दिल्ली में एक इम्ब्रॉइडरी कारखाने में काम करते हैं, ने बताया कि अस्पताल में कोई देखने नहीं आया। ‘‘सिर्फ हमारे इलाके के दो सांसद आये थे, पुलिस वालों ने 3500 रुपयों की मदद की फिर एक एम्बुलेंस में शहीद के शव को रखकर गांव होते हुए पटना स्थित बांस घाट पर लाया गया, जहाँ उनके ज्येष्ठ पुत्र गुड्डू, उम्र 10 वर्ष,  ने मुखाग्नि दी।’’

स्व0 दिनेश ने अपने बाद पांच बच्चों, जिनमें तीन पुत्र (गुड्डू, सोहेल व अमन) एवं दो पुत्रियों (पूजा एवं भारती) को छोड़ा है। सबसे ज्येष्ठ पुत्र की उम्र 10 वर्ष और कनिष्ठ की उम्र 3 वर्ष है। शहीद के पिता विंदा यादव ने बताया, हमारी आर्थिक स्थति बिलकुल खराब है और दिनेश ही पूरे परिवार को खेती मजदूरी करके पल रहा था। अब क्या होगा ! फिर उन्होंने बताया की हमारे चार लड़कों यथा स्व। दिनेश यादव (30 वर्ष), मिथिलेश कुमार (28 वर्ष) दिल्ली में बल्ब फैक्ट्री में कार्यरत है, ब्रजमोहन (26 वर्ष) गांव में ही रहता है) तथा छोटा अमरजीत (19 वर्ष) दिल्ली में काम करता है। उक्त पंचायत के मुखिया के पति बादशाह ने कहा, ‘‘हमलोग भी देख रहे हैं पर पारिवारिक स्थिति बहुत ही इनकी खराब है, जिस कारण सबों से मदद की अपील है।’’

मौके पर उपस्थित अन्ना समर्थक प्रो। रामपाल अग्रवाल नूतन नें तत्काल अंत्येष्ठी के समय 1100 रुपये एवं मनहर कृष्ण अतुल जी ने 500/= की सहायता परिवार को दी। साथ में वहां उपस्थित जीएम फ्री बिहार मूभमेंट के संयोजक पंकज भूषण ने परिवार को सान्तावना देते हुए कहा, ‘‘शहीद की शहादत बर्बाद नहीं होगी, हम सभी आपके साथ हैं और हर परिस्थिति में मदद को तैयार हैं। साथ में उपस्थित इंडिया अगेंस्ट करप्शन के साथी तारकेश्वर ओझा, डा0 रत्नेश चौधरी, अतुल्य गुंजन, शैलेन्द्र जी, रवि कुमार आदि ने भी शोकाकुल परिवार को सांत्वना दी साथ ही अन्य बिहार वासियों से भी अपील की इस मौके पर अमर शहीद दिनेश के परिवार के देखरेख के लिए अधिक से अधिक मदद करें।

इसी बीच पटना स्थित एक चैनल  द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उपस्थित प्रो0 रामपाल अग्रवाल नूतन नें शहीद के पिता विंदा यादव को 1100 रुपये का चेक दिया और शहीद के माता पिता के जीवन भर के निर्वाह का बीड़ा उठाया। उनकी ही पहल पर रोटरी पटना मिड टाउन के अध्यक्ष इंजिनियर केके अग्रवाल ने उनकी बड़ी लड़की पूजा जिसकी उम्र 9 वर्ष है, जो उत्क्रमित मध्य विद्यालय सर्फुद्दीनपुर के वर्ग 6 की छात्रा है, के पढाई के साथ साथ जीवन भर के निर्वाह का बीड़ा उठा लिया। साथ ही रोटरी पटना से विजय श्रीवास्तव ने दूसरी लड़की भारती कुमारी के जीवन भर का बीड़ा उठा कर एक साहसिक कदम उठाया है और हमारे समाज को एक सन्देश भी दिया है।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े तारकेश्वर ओझा ने जन मानस से अपील की है कि जहाँ तक हो सके हर कोई इस परिवार की मदद करे, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या हजार-दो हजार और पांच सौ रुपए की मदद से दिनेश का परिवार पल जाएगा। करोड़ों का चंदा उठाने वाले टीम अन्ना के लोग एक बार लोगों से दिनेश के परिजनों की मदद करने के लिए अपील भी कर देते तो शायद कुछ सम्मानजनक राशि जमा हो जाती।

इधर दिनेश यादव के मौत की निष्पक्ष जाँच कि मांग भी तूल पकड़ने लगी है। फेसबुक ऐक्टिविस्ट दिलीप मंडल ने मांग की है कि दिनेश यादव के मौत कि जाँच कराई जाए। गौरतलब है कि मंडल आदोलन के समय एक कथित छात्र ने आत्महत्या की थी जिसे मीडिया ने आरक्षण विरोधी आन्दोलन के पक्ष में छवि बनाने के लिए दिखाया था बाद में पता चला कि मीडिया के अन्दर एक रणनीति के तहत ऐसी रिपोर्टिंग की गई थी और दरअसल वो पान बेचने वाला दुकानदार था।

(पोस्ट पटना से एक पत्रकार तथा इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रकाश बबलू द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित)

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कहने को तो अन्ना का मंच उन तमाम देशवासियों के लिए था जो इस देश की भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करना चाहते हैं। लेकिन लगता है कि हाथी के दांत खाने के दूसरे और दिखाने के दूसरे होते हैं। रामलीला मैदान में जब अन्ना के मंच से फिल्म अभिनेता ओमपुरी ने भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ कुछ खास लोगों की पोल खोलनी शुरू की तो अन्ना मंडली ने उनके हाथों से यह कहते हुए माइक छीन लिया कि ये अन्ना का मंच है यहां ये सब नहीं चलेगा।

हुआ यूं कि बॉलीवुड की जानी मानी हस्ती ओमपुरी अन्ना के समर्थन में रामलीला मैदान में आए और अन्ना के समर्थन में जमकर हुंकार भरी। ओमपुरी अपने जमाने में जनवादी नाट्य संघ यानि इप्टा से भी जुड़़े रह चुके हैं और उनके भी दिल में भ्रष्ट व्यवस्था और उसका समर्थन करने वालों के खिलाफ भारी आक्रोश है। वे जब तक नेताओं को भला-बुरा कहते रहे तब तक तो कोई बात नहीं थी लेकिन जैसे ही उन्होंने अब तक के सबसे बड़े घोटाले यानि 2जी स्कैम से जुड़े नीरा राडिया के टेप प्रकरण से चर्चा में आई बरखा दत्त के बारे में बोलना शुरू किया तो उनसे माइक छीनकर बोलती बंद कर दी गई। टीम अन्ना के सदस्य अरविंद गौड़ मंच पर पहुंचे और उन्होंने ओमपुरी से लगभग माइक छीनते हुए उन्हें चेताया कि वे बरखा दत्त के खिलाफ न बोलें।

रामलीला मैदान में ओमपुरी का भाषण सुन रहे लोगों को यह समझ नहीं आया कि ओमपुरी ने ऐसा क्या गलत बोल दिया जिससे उन्हें इस कदर हड़काया गया। लोगों का मानना है यह आंदोलन जब भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ किया जा रहा है तो ऐसे लोगों का मुंह आखिर क्यों बन्द करने की कोशिश की जा रही है जो इस मुहिम के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रहे हैं।

इस पूरे प्रकरण के बाद लोग इस मुहिम पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं। इससे तो इस आंदोलन के दो चेहरे साफ दिख रहे हैं। यह जग जाहिर है कि नीरा राडिया प्रकरण में बरखा दत्त का नाम आने के बाद से उन्हें भारी शर्मिंदगी उठानी पड रही है। देश के सबसे बडे घोटाले 2जी स्कैम से जुडे राडिया प्रकरण पर ओमपुरी ने कहा, ‘सुना है कि सुना है कि बरखा दत्त आजकल देश छोडकर कनाडा के वैंक्यूर चली गई हैं और वहां एक जैपनीज से शादी भी कर ली है। और तो और अब उन्होंने वहां एक रेस्टोरेंट भी खोल लिया है…” इससे पहले कि वो बरखा के खिलाफ कुछ और बोलते उन्हें रोक दिया गया।

उधर जब मंच पर बरखा पुराण चल रहा था और लोग अपने टीवी सेट में यह सब लाइव देख रहे थे उस वक्त बरखा दत्त एनडीटीवी चैनल के स्टूडियो में बैठी बड़े चाव से यह भाषण सुन रही थी और अचानक जैसे ही ओमपुरी उनकी पोल खोलनी शुरू की उनके होश फाख्ता हो गए। आनन फानन में स्टूडियो से तुरंत ओमपुरी का भाषण कट कर दिया गया और फिर बरखा दत्त विशंषज्ञ के साथ वार्तालाप में जुट गईं। वैसे तो मीडिया हर खबर को बढाचढा कर पेश कर रहा है लेकिन ये क्या बात हुई कि सिर्फ इक्का दुक्का चैनल के अलावा किसी बडे चैनल ने इस बारे में कुछ भी नहीं दिखाया।

न्यूज 24 ने बार.बार दिखाई टिप्पणी रू बरखा दत्त के बारे में ओमपुरी की टिप्पणी बाकी किसी टीवी न्यूज चैनल ने तो कुछ खास नहीं दिखाई लेकिन न्यूज 24 चैनल ने इसे बार.बार दिखायाए हालांकि बरखा दत्त का नाम आने पर वहां कट लगा दिया जाता। ताकि कोई दर्शक यह न समझ पाएं कि ओमपुरी किसके बारे में टिप्पणी कर रहे हैं।

मीडिया में जहां ओमपुरी का ज़िक्र आया भी वहां इस बात पर जोर दिया गया कि उन्हें इसलिए रोका गया कि वे शराब के नशे में थे। लेकिन सवाल यह है कि इस फिल्म अभिनेता के पी कर आने की खबर तो मंच को मैनेज़ कर रही टीम अन्ना को पहले से थी, लेकिन उन्हें तब तक क्यों नहीं कुछ कहा गया जब तक वे जोशीला भाषण दे रहे थे?

न्यूज़ 24 पर प्रसारित खबर की क्लिपिंग देखें-

इंडिया टीवी पर लाइव प्रसारित ओमपुरी का भाषण

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