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फुटबालर सामी ने लेना गेर्क्‍के के बदन को अपने हाथ से ढंका, बवाल

एक ट्यूनीशियाई अख़बार के प्रकाशक को रियल मैड्रिड के फुटबॉल खिलाडी सामी खेदिरा की एक मैगजीन के कवर पेज पर एक कामोत्तेजक तस्वीर जिसमें वह अपनी मॉडल गर्ल फ्रेंड लेना गेर्क्के के स्तनों को अपने हाथों से ढंके है, को अपने अख़बार में छापने के बाद 15 फरवरी को गिरफ्तार किए जाने के बाद शुक्रवार को जमानत पर रिहा कर दिया गया। दैनिक समाचार पत्र अतौनिसिया के प्रकाशक नासृदीन बेन सैदा को 15 फरवरी को अखबार के एडिटर और एक पत्रकार के साथ जीक्यू मगजिन का कवर पेज छापने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया था।

टुनिस की प्राथमिक न्यायालय ने प्रकाशक को शुक्रवार को रिहा कर दिया। उनपर लगे सार्वजनिक शालीनता का उल्लंघन करने के आरोप की सुनवाई 8 मार्च तक स्थगित कर दी गई है। इस विवादस्पद तस्वीर में जर्मन- ट्यूनीशियाई फुटबाल खिलाड़ी सामी खेदिरा को तुक्सेडो कपड़े में अपने हाथों से उनकी नग्न जर्मन मॉडल गर्लफ्रेंड लेना गेर्क्के के स्तनों को कवर किए हुए दिखाया गया है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान प्रकाशक ने कहा कि उसका नैतिक शिष्टाचार के उल्लंघन करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि यह एक जाने-माने फुटबॉल खिलाड़ी के बारे में है और इसके अलावा तस्वीर का एक कलात्मक आयाम है।

प्रकाशक के एक वकील अब्देर्रावुफ अयादी ने अदालत से कहा कि ‘उनके मुवक्किल की गिरफ्तारी का औचित्य साबित करने के लिए कुछ भी नहीं है,खासकर तब जब न्यूज़ पेपर की प्रतियों को जल्द ही दुकानों से हटा लिया गया था।’ एक दूसरे वकील चोकरी बेलैद ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी एक राजनीतिक निर्णय था। उन्होंने कहा “हम जानते है कि ट्यूनीशिया में इस वक़्त स्वतंत्रता की रक्षा करने वालों और जो इसे दबाना चाहते हैं के बीच लड़ाई चल रही है।” उन्होंने कहा “ट्यूनीशियाई न्याय के लिए यह ट्रायल एक बड़ी परीक्षा है,हम चाहते हैं कि इसकी अपनी स्वतंत्रता दिखे और साबित करे कि यह किसी निर्देश को लागू नहीं कर रहा है।”

फुटबाल खिलाड़ी सामी खेदिरा इस्लामी ट्यूनीशिया देश में उनके पिता के टुनिशिया के होने के कारण लोकप्रिय है,लेकिन प्रकाशक के गिरफ्तारी के बाद देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा और सरकार को किसी मसले पर क्या अनैतिक है यह कैसे तय किया जाना चाहिए मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई है। जर्मन न्यूज़ पेपर बिल्ड को दिए अपने बयान में 24 वर्षीय खेदिरा ने कहा “मैंने मामले के बारे में गुरुवार को सुना और मैं इसे बहुत दुखी करने वाला और दुर्भाग्यपूर्ण मनाता हूं।”

उन्होंने कहा “मैं सभी धर्मों का आदर करता हूं और लोगों के विश्वास का भी सम्मान करता हूं,लेकिन मैं ये नहीं समझ पर रहा हूं कि लोग क्या अपने-आप को खुलकर अभिव्यक्त भी नहीं कर सकते हैं।” शुक्रवार हो मुक़दमे की सुनवाई के दौरान नासृदीन बेन के कई सहकर्मी खचाखच भरी अदालत में उनके समर्थन में उपस्थित नजर आए। वहीं टुनिशिया के राष्ट्रीय स्तर के हस्तियों में संविधान सभा कि सदस्य सलमा बककर और हम्मा हम्मामी,टुनिसियन कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख के साथ साथ मानवाधिकार कार्यकर्ता रधिया नस्रावुई भी मौजूद थे।

एक तरह जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताया वहीं पिछले सप्ताह ट्यूनीशियाई पत्रकार संघ ने प्रारंभिक अदालत के बेन सैदा के छोड़े जाने के खिलाफ निराशा प्रकट की। बेन की गिरफ्तार के बाद ‘रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स’ नामक समूह का कहना है कि यह एक पाखंडी प्रतिक्रिया है क्योंकि इस तरह की तस्वीरें ट्यूनीशिया में बेचे जा रहे विदेशी मैगजीनों के कवर पेज पर अक्सर छपती रहती है। एजेंसी

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उपनिषद गंगा में मैंने 13 चरित्र निभाए हैं -अमित बहल

सन 1994 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘शान्ति’ से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले अभिनेता अमित बहल दर्शकों में एक लोकप्रिय नाम है। अब तक 125 से भी अधिक धारावाहिकों में काम कर चुके अमित के इन दिनों एक साथ 3 धारावाहिको का प्रसारण हो रहा है जिनमे से  एक चैनल वी पर ‘हमसे हैं लाइफ’, दूसरा कलर्स पर ‘वीर शिवाजी’ और तीसरा सोनी पर ‘देखा एक खवाब’ और जल्दी ही उनके चौथे धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ का प्रसारण होने वाला है दूरदर्शन पर, जिसमें उन्होंने 13 चरित्र निभाए हैं । चिन्मय मिशन द्वारा निर्मित व डॉ चन्द्र प्रकाश द्वारा निर्देशित इसी धारावाहिक  के सिलसिले में उनसे बातचीत हुई। पेश हैं कुछ मुख्य अंश —-

  • ‘उपनिषद गंगा’ में आपने कौन सा किरदार अभिनीत किया है?

मैं एक नही, दो नही बल्कि तेरह किरदारों को ‘उपनिषद गंगा’ में निभाया है मैंने भास्कराचार्य, विद्यारण्य, आचार्य सूर्य भद्र, आर्य भट्ट आदि अनेकों किरदारों को सजीव बनाया है। एक ही बार की शूटिंग में मैंने 13 किरदारों को निभाया है जो कि मेरे लिए बहुत ही शानदार अनुभव रहा।

  • कैसे अवसर मिला आपको ‘उपनिषद गंगा’ से जुड़ने का?

वैसे तो मैं और डॉ साहब तो बहुत पहले से एक दूसरे को जानते थे पर साथ में काम नही कर सके थे। ऐसे ही एक बार हम दिनेश ठाकुर के जन्मदिन की पार्टी में मिले। मेरे मुंडे हुए सिर को देख कर कि यह क्या हुआ उन्होंने मुझसे पूछा ? उस समय मैं एक ब्रिटिश सीरीज ‘शार्प’  में काम कर रहा था। डॉ साहब ने कहा मेरे साथ काम करोगे मैंने कहा हाँ  क्यों नही? जब उनसे मिलने गया तो उन्होंने मुझे 13 एपिसोड की स्क्रिप्ट पकड़ा दी।

  • तो आपका सिर मुंडाना आपके लिए फायदेमंद रहा?

मेरे लिए तो फायदेमंद रहा ही और साथ में डॉ साहब के लिए भी रहा।

  • आपका पसंदीदा चरित्र कौन सा है?

मेरा प्रिय चरित्र है  विद्यारण्य, यह एक गणितज्ञ था, बहुत मज़ा आया है इसको अभिनीत करने में। इसके आलावा भास्कराचार्य के चरित्र को भी अभिनीत करना मेरे लिए अच्छा रहा। रोल ही अलग नही बल्कि गेटअप और सेटअप भी अलग था इसलिए बहुत ही मज़ा आया मुझे।

  • क्या युवाओं को पसंद आएगा यह धारावाहिक?

आना तो चाहिए अगर अच्छे से दर्शकों को  हम ‘उपनिषद गंगा’ के बारे में  बतायेगें। पूरे देश में दूरदर्शन की पहुंच है। आज के युवाओं को भी हमारे ऐतिहासिक धारावाहिक  बहुत पसंद आते हैं। आज की तारीख में हम देखे तो वीर शिवाजी व चंद्रगुप्त की टी आर पी काफी अच्छी जा रही है और फिर ‘उपनिषद गंगा’ के साथ तो कितने ही बड़े नाम जुड़े हैं उन सबमें सबसे बड़ा नाम तो खुद डॉ साहब का है इसके बाद अभिमन्यु सिंह, के के रैना, मुकेश तिवारी, जया भट्टाचार्या। इला अरुण आदि अनेकों ही कलाकार इससे जुड़े हैं। पिछले 10–12 सालों में किसी भी चैनल में इतने अच्छा काम नही हुआ है। जितना ‘उपनिषद गंगा’ के लिए डॉ साहब ने किया है जब दर्शक इसे देखेगें तो सच में यह महसूस करेगें।

  • अरुणा जी के साथ कैसा रहा काम करना?

बहुत ही अच्छा मैंने उनके साथ बहुत पहले भी काम कर चुका हूँ वो कैसी मंजी हुई अभिनेत्री हैं आप सभी जानते हैं। मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे अरुणा जी, आशा पारेख जी और शम्मी जी जैसे अच्छे लोगों के साथ काम करने के अवसर मिला।

  • अब तक आपने अनेकों चरित्र अभिनीत किये हैं सबसे ज्यादा आपको किस चरित्र को अभिनीत करने में मज़ा आया? और वो चरित्र आपके दिल के करीब भी रहा हो?

एक सीरियल आया था ‘खिलाड़ी’ इसमें मैं फुटबॉल का खिलाड़ी बना था इसे करने में मुझे बहुत ही मज़ा आया। इसके लिए मैंने  एक महीने तक ट्रेनिग ली। इसके आलावा मैंने  ‘गीता रहस्य’  में बलराम का  चरित्र अभिनीत किया था।  सोनी पर आता था डायरेक्टर स्पेशल आता था ‘शोहरत नफरत और शो बिज’ इसे करने में मुझे बहुत मज़ा आया। कोरा कागज और शांति तो हैं ही।

  • आपने टी वी, फिल्म और थियेटर सभी में भी काम किया है तो आपको सबसे ज्यादा कहाँ मज़ा आया?

टीवी से मुझे नाम और काम सब मिला लेकिन सबसे ज्यादा आत्म संतुष्टि मुझे जो मिली वो थियेटर में।

  • ‘उपनिषद गंगा’ में शूट करते समय कोई यादगार पल?

दिसंबर का महीना था वाई में शूट कर रहे थे 4-5 डिग्री सेल्सियस तापमान था। बहुत ठंड थी। पानी के अंदर शूटिंग थी सुबह सवेरे। शूटिंग के समय मुझे संवाद बोलने थे और मैं महसूस कर रह था कि मेरे पैरों में कई सांप थे कोई मेरी धोती पर चल रहा, कोई मेरी पीठ पर। यह मेरा यादगार पल था।

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हास्यास्पद हसीन सपना पूरा करने के “केजरीवाली” हथकंडे

-सतीश चन्द्र मिश्र ||

अन्ना टीम, खासकर उसका सबसे शातिर खिलाडी अरविन्द केजरीवाल पिछले कुछ महीनों से टी.वी.कैमरों के समक्ष जब-तब अपने तथाकथित जनलोकपाली रिफ्रेंडम की धौंस देता रहता है. हर बात पर सर्वे करा लेने की चुनौतियाँ धमकियों की तरह देता रहता है. लेकिन फेसबुक के मित्रों ने उसको लेकर एक ऐसा सर्वे कर डाला जो अन्ना टीम के इस सबसे शातिर और मंझे खिलाडी के प्रति देश की सोच का खुलासा करता है..

दरअसल इस अरविन्द केजरीवाल ने अपने कुछ चम्मच-कटोरियों के माध्यम से स्वयम को इस देश के प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करवाया था क्योंकि अगस्त महीने में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना टीम द्वारा लगाये-सजाये गए जनलोकपाली मजमे की तिकड़मी सफलता के बाद बुरी तरह बौराए अरविन्द केजरीवाल ने संभवतः इस देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर कब्ज़ा करने का दिवास्वप्न देखना पालना प्रारम्भ कर दिया था. अपने इस दिवास्वप्न के सम्बन्ध में देश की राय/थाह लेने के लिए अपने कुछ चमचों के द्वारा इसने फेसबुक पर “kejriwal for PM “https://www.facebook.com/ArvindK.PM नाम से एक पेज बनवा दिया था.

इस टीम की करतूतों से अत्यंत कुपित किसी व्यक्ति ने इसके जवाब में फेसबुक पर ही एक पेज Kejriwal For Peon Posthttps://www.facebook.com/groups/281688305200131/  बना डाला था, और गज़ब देखिये कि P.M. के पद के लिए टीम अन्ना के इस शातिर खिलाड़ी अरविन्द केजरीवाल को 1308 लोगों ने उपयुक्त माना तो इससे लगभग 110% अधिक लोगों ने अर्थात 2708 लोगों ने अन्ना टीम के इस शातिर खिलाडी को PEON के पद के ही उपयुक्त माना. अतः अन्ना टीम के इस शातिर खिलाडी की छवि के विषय में देश क्या सोचता है इसका लघु उदाहरण है उपरोक्त दोनों सर्वे…!!!!!!!!!!!!

देश को जनलोकपाल बिल की लोकलुभावनी किन्तु काल्पनिक लोरी सुनाने वाले गायक के रूप में अपनी लोकप्रियता को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनने की सीढ़ी बनाने की इसकी कोशिश को देश ने करारा जवाब दिया है.

दरअसल सिर्फ यह पेज ही नहीं, बल्कि खुद को पूरी तरह अराजनीतिक बताने-कहने वाले “अन्ना टीम के ” के इस सबसे शातिर सियासी खिलाड़ी ने शेखचिल्लियों सरीखी अपनी इस मानसिक उड़ान की सफलता के लिए हर वो धूर्त हथकंडा जमकर आजमाया जो इस देश की दूषित हो चुकी राजनीति के कीचड़ में डूबा हर शातिर नेता आजमाता है.

टीम अन्ना का यह शातिर खिलाड़ी भ्रष्टाचार की खिलाफत का झंडा उठाये उठाये धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता का सर्वाधिक निकृष्ट एवं निम्न स्तरीय सियासी पहाड़ा जोर-जोर से उसी तरह पढता दिखाई दिया, जिस तरह इस देश के कुछ महाभ्रष्ट राजनेता सत्ता की लूट में हिस्सेदारी के लिए खुद द्वारा किये जाने वाले अजब गज़ब समझौतों  को सैद्धांतिक सिद्ध करने के लिए धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता का पहाड़ा देश को पढ़ाने-सुनाने लगते हैं. इसीलिए टीम अन्ना के इस सबसे शातिर सियासी खिलाड़ी ने मौलानाओं को खुश करने के लिए सबसे पहले अपने मजमे के मंच से भारतमाता के चित्र को हटाया फिर सिर्फ अन्ना हजारे को छोड़ कर बाक़ी खुद समेत बाकी सभी खिलाडियों  ने “वन्देमातरम्” तथा “भारतमाता की जय” सरीखे “मन्त्रघोषों” को अलविदा कहा. इसके बाद बाबा रामदेव और साध्वी ऋतंभरा से लेकर संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी एवं हर उस संस्था और व्यक्ति तक को जमकर गरियाया कोसा जो तन मन और कर्म से हिंदुत्व की प्रतिनिधि हो. फिर ज़ामा मस्ज़िद के घोर कट्टरपंथी मौलाना के चरण चुम्बन के लिए किरन बेदी के साथ उसके घर जाकर रोया गया. इसके अतिरिक्त  “अन्ना टीम” के इस शातिर खिलाड़ी ने कट्टर धर्मान्धता के एक से एक धुरंधर खिलाड़ियों सरीखे लखनऊ के नामी-गिरामी मौलानाओं से मिलने के लिए विशेष रूप से लखनऊ आकर उनकी मान-मनौवल जमकर की.  इसका जी जब इस से भी नहीं भरा तो मुंबई में अपना जनलोकपाली मजमा लगाने से पहले ये बाकायदा दुपल्ली टोपी लगाकर मुंबई के कट्टरपंथी मौलानाओं के घर खुद चलकर गया था और उनकी प्रार्थना-अर्चना के बाद उनसे पक्का वायदा भी कर आया था की अपने जनलोकपाली सर्कस का शो खत्म होते ही ये खुद और इसका गैंग देश में साम्प्रदायिकता के खिलाफ धुआंधार मोर्चा खोलेगा.

अर्थात संघ भाजपा और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ. यह टीम अपनी पिछली करतूतों से यह स्पष्ट कर ही चकी है.
लेकिन हाय री किस्मत केजरीवाल की……….. मौलाना फिर भी नहीं रीझे…
और बाकी देश ….?
इसका जवाब मुंबई MMRDA और दिल्ली के रामलीला मैदान में 27 और 28 दिसम्बर को लोटते दिखे कुत्तों ने दे ही दिया है.

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जब मौका आया खुद को सम्मानित करने का तो पत्रकार कैसे चूकते भला?

नागपुर का तिलक पत्रकार भवन शुक्रवार को बूढ़े पत्रकारों के अजीबोगरीब सम्मान का गवाह बना। लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों को जब पुरस्कृत करने के लिए कोई बड़ा राजनीतिज्ञ नहीं मिला तो खुद ही आयोजन किया और खुद ही अपने आपको थोक में पुरस्कृत भी कर लिया।

विधानसभा का शीतसत्र उपराजधानी में खत्म हुआ। सरकार के अलविदा कहते-कहते पत्रकारों को अपना ही सम्मान करवाने की सूझी। मुख्यमंत्री से समय मांगा। सीएम समझ गए कि बूढ़े पत्रकारों की पत्रकारिता अब कुछ गिने-चुने दिनों की बची है, लिहाजा, आकर टाइम खराब करना उचित नहीं। यही सीएम पिछले वर्ष नागपुर के ही डा.वसंतराव देशपांडे सभागृह में श्री अरविंदबाबु देशमुख पत्रकारिता पुरस्कार वितरण समारोह में युवा पत्रकारों को पुरस्कृत करने मंत्रीमंडल के साथ दौड़े आए थे। डिप्टी सीएम भी कम चलाक नहीं निकले, उन्होंने भी सोचा कि शीतसत्र की के समापन पर जाते-जाते पत्रकारों के कार्यक्रम में हो आते हैं। बूढ़े पत्रकारों का ही सम्मान है तो क्या हुआ, सम्मान के मौके पर ऐसे पत्रकार कूद-कूद कर उनके साथ फोटो खिंचवाएंगे। इससे उनके खिलाफ खबरों के तेवर नरम रहेंगे। इतना ही नहीं, इनकी पीढ़ियां तो इस तस्वीर को अपने ड्राइंग रूम में सजा कर रखेंगी।

राजनीति के खिलाड़ी डिप्टी सीएम अजीत पवार भी मनोविज्ञान जानते हैं, उन्होंने सम्मान के साथ-साथ बूढ़े पत्रकारों को नसीहत भी दे दी। पेड न्यूज ने समाचार पत्रों की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है। पत्रकारिता की साख तभी रहेगी, जब हिम्मत से बात लिखी जाएगी। पवार ने पत्रकारिता को पेड न्यूज से दूर रखने का आह्वान करते पहले की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता की तुलना किया। नसीहत दी कि कैसे कलम से जनमत बदले हैं। युवा पत्रकारों को ऐसी नसीहत तो समझ में आती है, लेकिन बुजुर्ग पत्रकारों को ऐसी नसीहत दी जाए तो समझने के लिए थोड़ी मथ्था-पच्ची करनी पड़ती है।

दरअसल कार्यक्रम में पुरस्कृत पत्रकारों में ऐसे कई नाम हैं जिनके बारे में संतरानगरी के लोगों में अच्छी प्रतिक्रिया नहीं रहती है। इन्हीं बुजुर्ग पत्रकारों के नेतृत्व में नागपुर की पत्रकारिता का बेड़ागर्क हुआ है। यदि ऐसा नहीं होता तो नागपुर आकर सरकार विदर्भ कि किसानों पर महज मरहम लगा कर नहीं चली जाती। उनकी विरासत को नागपुर की नई पत्रकार पीढ़ी लाद कर चल रही है। यदि इनकी कलम धार तिखी रहती तो पत्रकारों के बीच डिप्टी सीएम उनकी विश्वसनीयता की बात नहीं कहते। पूरे शीतसत्र के दौरान विधानमंडल की कार्यवाही की खबरे ही सुर्खियों में रही। लेकिन कभी ऐसे मुद्दे नहीं उछाले जिससे किसी विधायक का दिल रोता और वह विधानसभा में उस पत्र को लहराते हुए मुद्दा उठाता। तब इससे बड़ा सम्मान उस खबर लिखने वाले और अखबार टीम के लिए और क्या होता। ऐसा सम्मान तो मिला नहीं, इसलिए सम्मान के भूखे बूढ़े पत्रकारों ने खुद ही कार्यक्रम रखा और सम्मान करवा लिया। अन्य अतिथि मंत्री अनिल देशमुख ने स्थानीय नेता है। उन्हें तो नागपुर में ही निवास करना होता है। उन्होंने भी मौके को देखते हुए पत्रकारों को लालच का टुकड़ा घोषणा के रूप में फेंका। कह दिया कि मुंबई में पत्रकारों के लिए सरकार जैसे कार्यरत रहती है, वैसे ही नागपुर के पत्रकारों के लिए भी सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। पाठकों को बता दे की नागपुर ही नहीं पूरे महाराष्ट्र के पत्रकार कब से पत्रकारों पर होने वाले हमले के अपराधा को गैरजमानती बनाने की मांग कर रहे हैं, हर बार सरकार से मांग करते हैं, पर स्वर कभी गरजता नहीं है, सरकार के मंत्री जानते हैं कि ऐसे मिमीयाते स्वारों को ऐसे सम्मान समारोह में एक गुलदस्ता देकर साथ में फोटो खिंचवाल लो, साल भी कलम में जंक लगी रहेगी।

ये पत्रकार हुए सम्मानित-
अपने जीवन को पत्रकारिता में समर्पित (कथित रूप से) करने वाले अनेक पत्रकारों को सम्मानित किया गया। इनमें दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दुबे व समन्वयक संपादक आनंद निर्बाण को उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के हस्ते स्मृतिचिन्ह, शाल देकर सम्मानित किया गया। इनके साथ वरिष्ठद्द पत्रकार मेघनाथ बोधनकर, मनोहर अंधारे, राधेश्याम अग्रवाल, राजाभाऊ पोफली, अमरेश प्रामाणिक, डीटी नंदपवार, राजू मिश्रा, पुरुषोत्तम दातीर, रमेश मालुलकर, गणेश शिरोले, शशिकुमार भगत, विश्वास इंदुलकर, उमेश चौबे, शिरीष बोरकर, विनोद देशमुख, मनीष सोनी, प्रभाकर दुपारे, बालासाहेब कुलकर्णी आदि वरिष्ठद्द पत्रकारों को उपमुख्यमंत्री के हस्ते सम्मानित किया गया। (विष्फोट की विष्फोटक रिपोर्ट)

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jessica

बड़ी ही कुत्ती चीज है ये साली मीडिया भी… इससे तो बस सावधान रहने की जरूरत है

 

छोटे बेटे की शादी है। हंगामे में नाचने-गाने और अपने छोटे भाई की पत्नी को आशीर्वाद देकर घर में उसका स्वागत करने के लिए उसके बड़े भाई के मौजूद रहने के भी पूरे आसार बन गए हैं। क्या हुआ जो बड़ा भाई सज़ायाफ्ता मुजरिम है? सज़ा भी किसी छोटे-मोटे अपराध की नहीं.. खून करने की। सब मैनेज़ हो जाएगा। ये साली मीडिया है बहुत कुत्ती चीज… सारा खेल बिगाड़ा भी इसी ने है, बस इससे सावधान रहना।

पहले भी कितना कुछ मैनेज किया था? बड़े-बड़े अफसर, वकील और गवाह… लैब टेकनीशियन से लेकर फोरेंसिक एक्सपर्ट तक.. ऐसा लगता था मानो सब के सब मुंह खोलने में सुरसा से ट्रेनिंग लेकर आए हुए थे। कोर्ट का फैसला तक फेवर में आ गया था, लेकिन इस मीडिया ने सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया।

फिर तो मीडिया के खिलाड़ी भी बन गया। एक साथ टीवी चैनल, अखबार, मैगज़ीन… कितना कुछ लांच किया? करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा डाला। ये मीडिया वालों के नखरे भी कितने? किसी को पैसा चाहिए तो किसी को गाड़ी। काम-धाम कुछ नहीं, कोरी लफ्फाज़ी के लिए भी लाख टके चाहिए। खैर, जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप कहना पड़ता है। इन करमहीनों को भी कहना पड़ा।

‘तथाकथित’ इसलिए जोड़ा कि जो भी आया, ये जानते हुए कि वह एक अपराधी की सिफारिश करने और नेताओं-अधिकारियों से अपनी पहचान के दम पर झूठ को सच बनाने की कीमत वसूलने आया। किसी को पत्रकारिता के मूल्यों की परवाह थोड़े ही थी? बहरहाल कितने ऐसे ही पत्रकार और मीडियकर्मी जमा भी हुए। चाहे मामला हाई कोर्ट में गया, या फिर सुप्रीम कोर्ट में हर बार इन्हीं चिरकुटों से प्रेशर डलवाया। यहां तक कि राष्ट्रपति भवन में भी इनकी एक न चली। सब के सब नालायक निकले।

पूरी तरह नाकारा कहना भी सही नहीं होगा। जब कोर्ट में बात नहीं बनी तो इन्हीं बकवास करने वालों ने किसी तरह चोरी-चुपके पैरोल करवाया था। फिर तो घूमना-फिरना, नाच-गाना… सब कुछ बदस्तूर जारी भी हो गया था। पुराना शौकीन जो ठहरा… बिना पब डिस्को में गए चैन ही नहीं पड़ता था। वो तो किस्मत का फेर था कि बेटे राजा की डिस्कोथेक़ में लड़ाई भी हुई तो पुलिस वाले के बेटे के साथ। तब भी ये विरोधी मीडिया वाले नहा-धो कर पीछे पड़ गए। बेचारे को अबतक दोबारा पैरोल नहीं मिला।

अब इस बार किसी तरह सब को मैनेज़ किया है। देखें क्या होता है? एक बार फिर सब से कहना चाहूंगा… ये साली मीडिया भी बड़ी कुत्ती चीज है। सावधान रहना।

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