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कोई भी एक-दूसरे के सवालों का जवाब नहीं दे पाया, न आजतक और न निर्मल बाबा कोई भी एक-दूसरे के सवालों का जवाब नहीं दे पाया, न आजतक और न निर्मल बाबा(18)

निर्मल बाबा के विज्ञापन की टीआरपी से नंबर वन बने न्यूज़ चैनल आजतक ने निर्मल बाबा पर लग रहे आरोपों का जवाब उनसे ही मांगा. अभिसार शर्मा ने निर्मल बाबा से खूब करारे सवाल किए और बाबा ने सबका जवाब देने की कोशिश की ‘किरपा’ के सहारे।

अभिसार ने बाबा से जब उनके पैसे का हिसाब मांगा तो उन्होंने साफ कहा कि वे कोई ट्रस्ट या एनजीओ बनाने के पक्ष में नहीं है। पैसा जनता ने दिया है, लेकिन वे टैक्स देते हैं। जब अभिसार ने प्रभात खबर में छपी खबर का हवाला देते हुए पूछा कि वे 109 करोड़ रुपए का क्या कर रहे हैं तो उन्होंने बड़े ही बोल्ड लहजे में कहा, ‘मैं आपके आंकड़ों को दुरुस्त कर दूं.. मेरा सालाना टर्नओवर 238 करोड़ के आसपास का है.. 109 करोड़ का नहीं..”

बाबा ने साफ किया कि वे पैसा इसलिए इकट्ठा कर रहे हैं कि इसी पैसे से सभी चैनल उनका प्रवचन दिखाते हैं, उनका पेड प्रोग्राम दिखाते हैं। अब बारी अभिसार के जवाब देने की थी, जब बाबा ने साफ शब्दों में पूछा कि क्या कोई चैनल उनका प्रवचन मुफ्त में प्रसारित करने को तैयार है? सवाल का उत्तर नहीं मिल पाया।

दरअसल बाबा अब खुल कर मैदान में उतर आए हैं। उन्होंने अब तक विज्ञापन के दम पर सभी चैनलों का मुंह बंद रखा, लेकिन लगता है उनके मैनेजरों के बस में सभी चैनल नहीं रह पाए। फिर सबको साधने के झमेले से बेहतर उन्होंने समझा कि कम से कम उस चैनल पर तो बोला ही जाए जिसने अब तक हमला नहीं शुरु किया है।

बाबा ने अपने बयान से कम से कम एक बात तो साफ कर दिया। जिसने उन्हें पैदा किया वो कोई और नहीं इन्हीं चैनलों का लालच है जो अब उनके भाष्मासुर बन जाने पर अपना सर छुपाते भाग रहे हैं। कहना गलत न होगा कि पैसे के लालच में न्यूज चैनलों ने अपने नियम, सिद्धांत, कायदे और नैतिकता सबको बेच डाला है।

हालांकि अभिसार ने कई सवाल ऐसे ढंग से पूछे जिनसे लग रहा था कि वे वास्तव में बाबा को कठघरे में रखना चाहते हों, लेकिन जिसने भी इंटरव्यू देखा उसने यही कहा कि ये तो रजत शर्मा के आपकी अदालत से भी ज्यादा हो गया जहां न सिर्फ बाबा को बेदाग साबित कर दिया गया बल्कि उनका महिमामंडन भी हो गया। आसानी से समझा जा सकता है कि अब बाबा के प्रवचन का कॉन्ट्रैक्ट आजतक पर रिन्यू हो या नहीं, उनकी ‘किरपा’ तो बरस ही चुकी है।

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सौरभ नाम के एक पाठक ने मेल के जरिए दावा किया है कि स्टार न्यूज़ और निर्मल बाबा के संस्थान के बीच जो करार चल रहा था उसके टूट जाने पर ही चैनल ने बाबा का पोल-खोल अभियान शुरु किया है. करार  11 अप्रैल को रिन्यू करना था जो निर्मल बाबा ने नहीं किया. मेल के मुताबिक स्टार की मार्केटिंग टीम ने कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करने की काफी कोशिश की, लेकिन ऐसा कराने में सफल नहीं हुए.

दरअसल बाबा की मार्केटिंग टीम ने स्टार की टाइमिंग को लाखों रूपये मूल्य के लायक नहीं समझा क्योंकि स्टार न्यूज ने बाबा के लिए तड़के 5:40 का समय दिया था, वह भी भारी भरकम फीस पर. उधर बाबा के प्रबंधकों को लगा कि सुबह इतने सवेरे प्रवचन  देखने वाले कम लोग होते हैं. आखिरकार जब करार टूट गया तो थक-हार कर स्टार ने इसके खिलाफ बोलना अब शुरू किया है.

ख़ैर पूरा सच क्या है, यह तो राम ही जाने, लेकिन बात पूरी तरह गलत भी नहीं मालूम पड़ती. स्टार न्यूज़ की खबर में कुछ ऐसी बातें हैं जिससे शक और गहराता है. चैनल कल से लेकर आज सुबह तक निर्मल बाबा पर लगातार खबरें चला रहा था. खबर के दौरान यह भी कहा जाता है कि पिछले एक महीने से स्टार न्यूज़ पड़ताल कर रहा है. लेकिन इस एक महीने की पड़ताल में स्टार न्यूज़ ने ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया जो कुछ अलग हो. स्टार न्यूज़ जो दिखा रहा है वो सब वेब मीडिया के जाबांज पहले ही प्रचारित – प्रसारित कर चुके हैं. स्टार न्यूज़ बाबा के खिलाफ खबरें दिखा रहा है, यह काबिलेतारीफ है, लेकिन एक महीने की जांच-पड़ताल वाली बात हजम नहीं हो रही. यदि वाकई में एक महीने स्टार न्यूज़ ने छान-बीन की है तो सवाल उठता है कि स्टार न्यूज़ के रिपोर्टर छान – बीन कर रहे थे या फिर झक मार रहे थे. यह काम तो वेब मीडिया ने एक हफ्ते में कर दिया और निर्मल बाबा के पूरे इतिहास – भूगोल को खंगाल डाला.

बात साफ है कि निर्मल बाबा के खिलाफ स्टोरी चलाना और विज्ञापन को बंद करना स्टार न्यूज़ की विवशता है, इसमें सरोकार वाली कोई बात है, इसपर आसानी से विश्वास नहीं किया जा सकता. बिहार में एक कहावत है – ‘जात भी गंवाया और भात भी नहीं खाया’. स्टार न्यूज़ की स्थिति कुछ वैसी ही हो गयी है.

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मीडिया दरबार शुरुआत से निर्मल बाबा के राज खोलने में जुटा है और इसीलिए उनके वकीलों ने हमें लीगल नोटिस भी भेजा। हमारे अभियान ने न सिर्फ़ देश भर के मीडिया चैनलों में एक नई बहस छेड़ दी बल्कि बाबा को पूरी तरह बेनकाब करके रख दिया है।

जब निर्मल बाबा की मीडिया दरबार पर चलाये गए पोल खोल अभियान ने निर्मल बाबा की जिंदगी में तूफ़ान ला दिया और इस ढोंगी बाबा ने कई तरीकों से मीडिया दरबार के इस अभियान को रोकने का हर संभव प्रयास किया मगर निर्मलजीत सिंह नरूला का दुर्भाग्य कि जिस किरपा को वह खुद दूसरों कि समस्याओं को सुलझाने के लिए टीवी के रिमोट के जरिए सारी दुनिया में बैठे उनके भ्रामक विज्ञापन के दर्शकों को बाँटने का दावा करता है, मीडिया दरबार के मामले में खुद उसपर ही किरपा बंद हो गयी।

आखिरकार वही हुआ जिसका अंदेशा था। इस फर्जी और ढोंगी बाबा ने तंग आकर मीडिया दरबार पर सायबर हमला करवा दिया जिसके चलते शुक्रवार शाम सात बजे से रात दस बज़ कर तीस मिनट तक मीडिया दरबार पर आने वाले विजिटर्स को वेब साईट खोलने में दिक्कत होती रही और विजिटर्स निराश हो कर हमें मेल करते रहे. ज्ञात हो कि मीडिया दरबार को होस्ट करने के लिए चार बड़े सर्वर्स को आपस में जोड़ा गया है, इसी कारण साईट तो डाउन नहीं हुई मगर कई जगह खुल भी नहीं पाई.

एक वक्त तो ऐसा आया कि मीडिया दरबार पर करीब पांच लाख आईपी से अटैक शुरू हो गया मगर हमारे सर्वर प्रबंधकों ने लगातार सर्वर अप रखने के लिए इन आई पी’ज को ब्लॉक करने में अपनी जी जान लगा दी और तीन घंटे के अथक प्रयासों से इस सायबर हमले को नाकाम कर दिया.

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निर्मल बाबा की एक दिन की कमाई कितनी है? कुछ लाख, करोड़, दो करोड़ या चार करोड़?

मीडिया दरबार ने ये बहस शुरु की तो तरह तरह के जवाब मिले। भक्तों ने कहा कि तालकटोरा इंडोर स्टेडियम की क्षमता ही साढ़े तीन हज़ार की ही है तो उस हिसाब से महज़ 70 लाख ही हुए। किसी ने कहा, लखनऊ में 22-23 हज़ार लोग आए थे, वहां तो साढ़े चार करोड़ के आस-पास कमाई हो गई होगी। किसी ने लिखा, पटना में बाबा को साढ़े तीन करोड़ की कमाई हुई थी। तो किसी ने कहा, आपने तो चार करोड़ बहुत कम रकम बताई है। इतनी रकम तो गुप-चुप तौर पर दसवंद में ही आ जाती होगी। कुछ भक्त हमें गालियों भरा मेल भेज रहे हैं तो कुछ अधर्म के खिलाफ़ इस जंग में हमारे साथ खड़े होने का भरोसा दिला रहे हैं।

बाबा जी की एक भक्त (या सलाहकार) ने तो फोन करके इस पेज को हटाने के लिए भी कहा, लेकिन जब हमने उनसे पूछा कि असल कमाई वे ही बता दें, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बाबा के वकील ने तो बाकायदा कानूनी नोटिस भेजा और हमारे उठाए मुद्दे को गलत, आधारहीन और उनके मुवक्किल का अपमान करने वाला बताया, लेकिन सच्चाई क्या है ये किसी ने नहीं बताया।

दरअसल तमाम टीवी चैनलों पर ‘थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा’ के नाम से बाबा का विज्ञापन दिन-रात प्रसारित हो रहा है। इस विज्ञापन में बाबा जी कहते हैं कि टीवी पर उन्हें देखने से भी किरपा आ जाती है। जैसे जैसे ये विज्ञापन लोकप्रिय हो रहा है वैसे-वैसे उनके समागम की लोकप्रियता भी बढ़ रही है. निर्मल बाबा के किसी भी समागम में शामिल होने के लिए भक्तों को 2000 रुपये की फीस चुकानी पड़ती है (दो साल से उपर के बच्चे का रजिस्ट्रेशन जरूरी है). फीस महीनों पहले जमा हो जाती है।

बुकिंग का तरीका निर्मल बाबा की वेबसाइट nirmalbaba.com पर लिखा है। साथ ही दर्ज़ है समागम की जगह और तारीख. इसी सूची के आगे लिखा रहता है ओपेन या क्लोज्ड और स्टेटस यानी बुकिंग चालू है या बंद हो चुकी है. आने वाले महीनों के सभी समागम कार्यक्रमों की एडवांस बुकिंग फिलहाल बंद दिखाई दे रही है. वेबसाइट के पहले ही पन्ने पर इसकी फीस और इसे जमा कराने का तरीका भी दर्ज है. फीस जमा कराने के लिए वेबसाइट पर निर्मल दरबार के दो एकाउंट नंबर भी दिए गए हैं. ये एकाउंट नंबर टीवी के थर्ड आई ऑफ निर्मल दरबार कार्यक्रम के दौरान भी प्रचारित किए जाते हैं.

निर्मल दरबार सिर्फ समागम से कमाई नहीं करता. दसवंद नाम से एक और जरिया है पैसे वसूलने का। बाबा का कहना है कि उनकी कृपा से किसी समस्या के समाधान हो जाने पर भक्त को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दसवंद के तौर पर देना होता है लेकिन इसके लिए कोई दबाव नहीं डाला जाता. अलबत्ता कई विज्ञापनों में निर्मल बाबा ये कहते हुए जरूर सुनाई पड़ते हैं कि अगर अपनी कमाई या लाभ का दसवां हिस्सा हर महीने पूर्णिमा से पहले नहीं जमा करवाओगे तो नुकसान होना भी शुरु हो जाता है। ग़ौरतलब है कि सिख धर्म में दसवंद गुरुद्वारों में जमा करने की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन वहां भक्तों को अपने
दान के खर्च पर नज़र रखने का भी अधिकार होता है।

पंजाब नैशनल बैंक इन बाबा जी का प्रिय बैंक है। इसका अकाउंट नंबर वेबसाइट पर और चैनलों पर भी प्रसारित होता है। इस अकाउंट में नगद, डिमांड ड्राफ्ट या फिर निर्मल दरबार के विशेष चालान से फीस जमा की जाती है। बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि देश भर की उनकी शाखाओं में बाबा जी दिन भर चर्चा का मुद्दा बने रहते हैं। बैंक की सभी शाखाएं इंटरनेट से जुड़ी हैं और वरिष्ठ अधिकारी इसका स्टेटस देख सकते हैं। हर रोज बाबा जी का लाखों-करोड़ों में बढ़ता बैलेंस पूरी शाखा में गॉसिप का केंद्र बना रहता है। खास बात ये है कि बाबा जी के अकाउंट से नियमित अंतराल पर ये पैसे ‘कहीं और’ ट्रांसफर भी होते रहते हैं।

आज ही झारखंड के एक प्रमुख अखबार ने बाबा जी के दो अकाउंटों का हवाला देते हुए राजफाश किया है कि उसमें कल यानि 12 अप्रैल 2012 को सोलह करोड़ रुपए जमा हुए थे। ग़ौरतलर्ब है कि निर्मल दरबार अपने विज्ञापन में कम से कम तीन अकाउंटों का प्रचार करता है।  बाबाजी से उनकी कमाई और खर्चे को लेकर उनसे कई सवाल पूछे गए, लेकिन कभी कोई जवाब नहीं मिला। उन्हें मेल भेजने पर ऑटो रिप्लाई के जरिए उनका अकाउंट नंबर ही आ जाता है तथा फोन पर कोई जवाब भी नहीं मिलता।

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लोगों की हर परेशानी दूर करने का दावा करने वाले निर्मल बाबा के बारे में ‘प्रभात खबर’ ने सनसनीखेज खुलासा किया है। ‘प्रभात खबर’ ने निर्मल बाबा के दो खातों की जानकारी दी है। अखबार का है कि जनवरी 2012 से अप्रैल 2012 के पहले हफ्ते तक खाते में 109 करोड़ रूपए जमा हुए हैं। यानी हर रोज एक करोड़ 11 लाख रूपए जमा हुए। खाते में पैसे पूरे देश से जमा किए गए।

सिर्फ 12 अप्रैल यानी कल 14 करोड़ 93 लाख 50 हजार 913 रुपए 89 पैसे जमा किए गए हैं। वो भी सुबह साढ़े 9 बजे से दोपहर एक बजे तक। शाम तक कुल 16 करोड़ जमा किए गए। यह रकम निर्मल दरबार नामक खाते में जमा किए गए। एक और बैंक में बाबा के नाम पर 25 करोड़ की एफडी है।

अखबार के मुताबिक निर्मल बाबा खुद दो तरह के खातों का संचालन करते हैं। एक बैंक खाता अपने नाम निर्मलजीत सिंह नरूला और दूसरा खाता निर्मल दरबार के नाम से हैं। निर्मल दरबार के खातों में भक्तों के रुपया जमा कराये जाने के बाद बाबा उसे अपने खाते में ट्रांसफर कर देते हैं।

खातों में सुषमा नरूला नॉमिनी हैं। सुषमा निर्मल बाबा की पत्नी हैं। बाबा ने अपने इसी बैंक में जमा रुपयों में से मार्च के पहले हफ्ते में 53 करोड़ रुपये एक निजी बैंक में ट्रांसफर कर दिये। मार्च में ही नीलम कपूर के नाम से 1 करोड़ 60 लाख रुपये ट्रांसफर किये गये।

निर्मल बाबा के एक प्रमुख बैंक के एकाउंट नंबर पर जमशेदपुर से एक साल में गये हैं 3 करोड़ 89 लाख। हर दिन 30 से 40 लोग उनके एकाउंट में रुपये डालने के लिए आते हैं। कोई एक हजार रुपये डालता है, तो कोई 10 हजार। तो कोई पचास हजार रुपये तक डाल चुका है। बैंक ड्राफ्ट के जरिये भी लोग अपना दसवंद सीधे निर्मल बाबा को भेज रहे हैं।

(स्टार न्यूज़)

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भक्तों पर कृपा करते-करते निर्मल बाबा बने करोड़पति

निर्मल बाबा आजकल काफी चर्चा में हैं. निर्मल बाबा देश के अलग-अलग शहरों में समागम करते हैं. इन समागमों में वे अपने भक्तों के दुख दूर करने का दावा करते हैं. इस समागम में बाबा लोगों को चौंकाने वाले उपाय बताते हैं लेकिन निर्मल बाबा की इन बातों पर उठ रहे हैं सवाल. हर कोई जानना चाहता है निर्मल बाबा उर्फ निर्मल सिंह नरूला का पूरा सच. स्टार न्यूज़ ने पड़ताल की और पता की निर्मल बाबा की हकीकत.

निर्मल बाबा की कमाई

तमाम टीवी चैनल पर दिखने वाला ‘थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा’ कार्यक्रम जैसे जैसे लोकप्रिय हो रहा है वैसे-वैसे उनके समागम कार्यक्रम की शोहरत भी बढ़ रही है. निर्मल बाबा के किसी भी समागम कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भक्तों को दो हजार रुपये की फीस चुकानी पड़ती है और वो भी महीनों पहले. जिसे जरूरत हो और यकीन भी, वो कीमत चुकाए और निर्मल बाबा के दरबार में पहुंच जाए.

निर्मल बाबा की आधिकारिक वेबसाइट nirmalbaba.com खोलते ही आपको बाईं ओर नजर आ जाएगी समागम कार्यक्रमों की ये सूची, जिसमें दर्ज है समागम की जगह और तारीख. इसी सूची के आगे लिखा रहता है ओपेन या क्लोज्ड और स्टेटस यानी बुकिंग चालू है या बंद हो चुकी है. आने वाले महीनों के सभी समागम कार्यक्रमों की एडवांस बुकिंग फिलहाल बंद दिखाई दे रही है. वेबसाइट के पहले ही पन्ने पर इसकी फीस और इसे जमा कराने का तरीका भी दर्ज है.

समागम कार्यक्रम के लिए 2000 रुपये प्रतिव्यक्ति जमा कराने होते हैं. समागम में आने वाले दो साल की उम्र से बड़े बच्चों से भी इतनी ही रकम ली जाती है. ये फीस निर्मल दरबार के नाम पर ली जाती है. फीस जमा कराने के लिए वेबसाइट पर निर्मल दरबार के दो एकाउंट नंबर भी दिए गए हैं. ये एकाउंट नंबर टीवी के थर्ड आई ऑफ निर्मल दरबार कार्यक्रम के दौरान भी प्रचारित किए जाते हैं.

इन एकाउंट्स में नगद, डिमांड ड्राफ्ट या फिर निर्मल दरबार के विशेष चालान से फीस जमा की जा सकती है, लेकिन समागम की फीस के लिए चेक नहीं लिए जाते हैं. अब ऐसे समागम कार्यक्रम से निर्मल बाबा की संस्था निर्मल दरबार को होने वाली कमाई का अनुमान भी लगा लीजिए. निर्मल बाबा के एक समागम में करीब पांच हजार भक्त शामिल होते हैं. 2000 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से एक समागम से कमाई हुई करीब एक करोड़ रुपए. हर महीने औसतन सात से दस समागम कार्यक्रम होते हैं. वेबसाइट की सूची पर नजर डालें तो अप्रैल महीने में ही सात समागम कार्यक्रम हो रहे हैं.

इस हिसाब से सात समागमों की कमाई हुई सात करोड़ रुपये. अनुमान है कि साल भर में 84 करोड़ रुपये की कमाई हो रही है.हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

दसवंद कार्यक्रम से कमाई

आप अगर ये अनुमान देखकर चौंक गए हों तो आपको बता दें कि निर्मल दरबार सिर्फ समागम ही आयोजित नहीं करता. निर्मल दरबार दसवंद नाम से एक और कार्यक्रम भी आयोजित करता है. निर्मल बाबा की कृपा से किसी समस्या के समाधान हो जाने पर भक्त को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दसवंद के तौर पर देना होता है लेकिन इसके लिए कोई दबाव नहीं डाला जाता. निर्मल बाबा के लिए आस्था रखनेवाले लोग अपनी कमाई या लाभ का दसवां हिस्सा हर महीने पूर्णिमा से पहले जमा करवा देते हैं.

इसके अलावा अगर आप निर्मल दरबार की वेबसाइट पर मौजूद निर्मल दरबार का बैंक चालान देखेंगे तो पाएंगे कि भक्तों को निर्मल बाबा की कृपा पाने के लिए हर मौके पर जेब ढीली करनी पड़ती है.

निर्मल दरबार का खर्च

समागम कार्यक्रम किसी बड़े हॉल या इंडोर स्टेडियम में आयोजित किए जाते हैं. इनका किराया और कार्यक्रम के पूरे आयोजन पर पैसे खर्च होते हैं. इसके अलावा निर्मल दरबार परिवार ‘थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा’ के नाम से विज्ञापन बनवाता है जिसमें समागम कार्यक्रमों की झलकियां होती हैं.

विज्ञापनों के प्रसारण के लिए उसे पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इसके अलावा निर्मल बाबा की संस्था निर्मल दरबार के दफ्तर और वेबसाइट जैसी गतिविधियों को चलाने का खर्च भी है. लेकिन किस मद में कितना खर्च हो रहा है और भक्तों से हुई बाकी कमाई का लेखा-जोखा क्या है इसका कोई खुलासा निर्मल बाबा की वेबसाइट पर नहीं है, हांलाकि निर्मल बाबा के करीबी रिश्तेदार और चातरा से निर्दलीय सांसद इंदर सिंह नामधारी के मुताबिक निर्मल बाबा अपनी कमाई पर टैक्स चुका रहे हैं.

स्टार न्यूज ने निर्मल बाबा की संस्था से साल भर में होने वाले समागम कार्यक्रमों, उनमें आने वाले भक्तों के साथ-साथ सालाना कमाई के बारे में जानकारी भी मांगी लेकिन फिलहाल निर्मल बाबा या निर्मल दरबार के किसी प्रतिनिधि ने स्टार न्यूज से बात नहीं की है.

(स्टार न्यूज़ की वेबसाइट से साभार)

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आखिरकार मीडिया दरबार की मुहिम रंग ले ही आई। न्यूज एक्सप्रेस के बाद टॉप फाइव चैनलों ने भी बाबा का भंडाफोड़ शुरु कर दिया है। शाज़ी जमां की अगुवाई में स्टार न्यूज ने एक जोरदार मुहिम छेड़ दी है। खास बात ये है कि स्टार न्यूज़ पर बाबा का विज्ञापन रूपी कार्यक्रम भी चल रहा है। ऐसे में अपने क्लाइंट के खिलाफ़ मुहिम छेड़ना निस्संदेह एक साहसिक फैसला है।

दरअसल शाजी जमां टीवी मीडिया माध्यम के बेहतरीन संपादकों में से हैं जिन्होंने कभी दबाव में काम करना उचित नहीं समझा। स्टार न्यूज ने निर्मल बाबा के विज्ञापन रूपी कार्यक्रम को 12 मई से बंद करने का भी ऐलान किया है। शायद विज्ञापन एजेंसी का करार होगा।

ज़ी न्यूज़ ने भी अपने नेटवर्क पर चल रहे विज्ञापनों की परवाह न करते हुए बाबा के खिलाफ़ लखनऊ में दायर हुए पुलिसिया मामले की ख़बर काफी देर तक चलाई। ज़ी न्यूज़ ने निर्मल बाबा के बहनोई इंदर सिंह नामधारी का इंटरव्यू भी लिया है जिसे प्रसारित करने का फैसला किया है।

आज के बाजार प्रधान युग में विज्ञापन और फ़ायदे के लिए जूझ रहे खबरिया चैनलों का यह बदला हुआ रवैया स्वागत योग्य है। कोई बड़ा न्यूज चैनल अगर पाखंड व अंधविश्वास के फलते फूलते कारोबार को रोकने के लिए कोई पहल करता है, भले ही देर से सही, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। उम्मीद है दूसरे चैनल इससे सबक लेते हुए अपने चैनलों पर भी बाबावाद खत्म करने की दिशा में कोई कदम जरूर उठाएंगे।

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निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा के इंटरनेट पर तीस लाख से भी अधिक लिंक्स हैं, पर उनका कहीं कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. निर्मलजीत से निर्मल बाबा कैसे बन गए, यह आज भी एक अनसुलझा रहस्य है.

निर्मलजीत सिंह नरुला उर्फ निर्मल बाबा दो भाई हैं. बड़े भाई मंजीत सिंह नरुला अभी लुधियाना में रहते हैं. निर्मलजीत छोटे हैं. पटियाला के सामना गांव के रहनेवाले. 1947 में देश के बंटवारे के समय बाबा जी का परिवार भारत आ गया था. बाबा शादी-शुदा हैं. एक पुत्र और एक पुत्री भी हैं उन्हें.

मेदिनीनगर (झारखंड) के दिलीप सिंह बग्गा की तीसरी बेटी से उनकी शादी हुई. चतरा के सांसद और झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के छोटे साले हैं ये. बकौल श्री नामधारी, 1964 में जब ूउनकी शादी हुई, तो निर्मल 13-14 वर्ष के थे. 1970-71 जब निर्मलजीत सिंह के पिता की मृत्यु हो गई तो नामधारी उन्हें अपने यहां ले आए.  मेदिनीनगर (तब डॉल्टनगंज) आये और 81-82 तक वह यहां रहे. रांची में भी उनका मकान था. पर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे के बाद उन्होंने रांची का मकान बेच दिया और चले गये. रांची के पिस्का मोड़ स्थित पेट्रोल पंप के पास उनका मकान था.

  • मेदिनीनगर के चैनपुर स्थित कंकारी में ईंट भट्ठा शुरू किया. पर व्यवसाय नहीं चला
  • गढ़वा में कपड़ा का बिजनेस किया. पर इसमें भी नाकाम रहे
  • बहरागोड़ा इलाके में माइनिंग का ठेका भी लिया

निर्मल बाबा का झारखंड से पुराना रिश्ता रहा है. खास कर पलामू प्रमंडल से. 1981-82 में वह मेदिनीनगर (तब डालटनगंज) में रह कर व्यवसाय करते थे. चैनपुर थाना क्षेत्र के कंकारी में उनका ईंट-भट्ठा भी हुआ करता था, जो निर्मल ईंट के नाम से चलता था.

उन्हें जानने वाले कहते हैं कि निर्मल का व्यवसाय ठीक नहीं चलता था. तब उनके ससुरालवाले मेदिनीनगर में ही रहते थे. हालांकि अभी उनकी ससुराल का कोई भी सदस्य मेदिनीनगर में नहीं रहता. उनके (निर्मल बाबा के) साले गुरमीत सिंह अरोड़ा उर्फ बबलू का लाईम स्टोन और ट्रांसपोर्ट का कारोबार हुआ करता था.

बबलू के मित्र सुमन जी कहते हैं कि चूंकि बबलू से मित्रता थी, इसलिए निर्मल जी को जानने का मौका मिला था. वह व्यवसाय कर रहे थे. कुछ दिनों तक गढ़वा में रह कर भी उन्होंने व्यवसाय किया था. वहां कपड़ा का बिजनेस किया. पर उसमें भी नाकाम रहे. बहरागोड़ा इलाके में कुछ दिनों तक माइनिंग का ठेका भी लिया. कहते हैं..बहरागोड़ा में ही बाबा को आत्मज्ञान मिला.

इसके बाद से ही वह अध्यात्म की ओर मुड़ गये. वैसे मेदिनीनगर से जाने के बाद कम लोगों से ही उनकी मुलाकात हुई है. जब उनके बारे में लोगों ने जाना, तब यह चर्चा हो रही है. उन्हें जाननेवाले लोग कहते हैं कि यह चमत्कार कैसे हुआ, उन लोगों को कुछ भी पता नहीं. (प्रभात खबर)

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लगता है निर्मल बाबा की थर्ड आई के दायरे के साथ-साथ उनकी मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस फिलहाल वहां के एक नागरिक की शिक़ायत पर बाबा के ढकोसले की जांच करने में जुटी है। इस पुराने भक्त ने दावा किया है कि उसने टीवी पर बाबा द्वारा बताए गए नुस्खों पर अमल किया था तो उसे फ़ायदा होने की बजाय नुकसान ही हो गया। इतना ही नहीं, इस नाराज़ भक्त ने बाबा पर उसकी संवेदनाओं को ठेस पहुंचाने का भी आरोप लगाया है।

दरअसल छत्तीसगढ़ के सुन्दर नगर में रहने वाले योगेन्द्र शंकर शुक्ला खुद को निर्मल बाबा का कट्टर भक्त मानते थे। उन्होंने बाबा का शो टीवी पर पूरी श्रद्धा पूर्वक देखा और उसमें बताए गए नुस्खों को अमल में भी लाए। शुक्ला का कहना है कि उन्होंने बाबा जी के कहे अनुसार दस रुपए के नए नोटों की गड्डी भी अलमारी में रखी, लेकिन बजाय फ़ायदा होन के उन्हें नुकसान ही होने लगा।

शुक्ला ने रायपुर के डीडी नगर थाने में दी गई तहरीर में लिखा है कि थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा नाम के कार्यक्रम ने उन्हें खासा उद्वेलित किया है क्योंकि इसमें बाबा जी को भगवान के बराबर बताया गया है। उन्होंने बाबा जी के टीवी कार्यक्रमों को समागम में बुलाने के लिए ‘उकसाने वाला’ बताया है और सवाल पूछा है कि अगर वे खुद को भगवान बताते हैं तो दर्शनार्थियों से प्रवेश शुल्क क्यों वसूलते हैं? उन्होंने लिखा है, ‘ईश्वरीय शक्तियां कभी बेची नहीं जातीं। शक्तियां जनकल्याण के लिए होती हैं, न कि धनोपार्जन के लिए।”

शुक्ला ने निर्मल बाबा के उस आह्वान पर भी ऐतराज़ जताया है जिसमें घरों में शिवलिंग न रखने की बात कही गई है। उन्होंने खुद को शिवजी का उपासक बताया है और लिखा है कि बाबा जी के कथनों से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है। शुक्ला के मुताबिक निर्मल बाबा द्वारा बताए गए उपाय किसी शास्त्र, धर्म या संप्रदाय में उल्लेख नहीं है और वे दुखी जनों के साथ और धोखा कर रहे हैं।

योगेन्द्र शंकर शुक्ला ने पुलिस से अपील की है कि वे थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा को रोकें और बाबा के खिलाफ उचित कार्रवाई करें। जब मीडिया दरबार ने पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा से संपर्क साधने की कोशिश की तो उन्होंने फोन नहीं उठाया, लेकिन थाना प्रभारी परमानंद शुक्ला ने बताया कि पुलिस ने तहरीर पर तफ्तीश शुरु कर दी है तथा साक्ष्य एकत्रित किए जा रहे हैं।

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-शगुन त्यागी ।।

इस बात का कोई सुबूत तो नहीं है लेकिन शत-प्रतिशत ऐसा ही है कि टैम भी निर्मल बाबा के हाथों बिक चुका है, क्योंकि तीसरी आंख वाले बाबा का ढोंग बकौल न्यूज़ चैनल्स एक विज्ञापन के तौर पर प्रसारित किया जा रहा है, लेकिन सवाल ये है कि आखिर एक विज्ञापन को टीआरपी में क्यों गिना जा रहा है। हर हफ्ते टैम की ओर से जारी होने वाली रिपोर्ट में वो आधे घंटे टीआरपी में क्यों गिने जा रहे हैं। न्यूज़ चैनलों के संपादक शायद अपने साथियों की मेहनत को मिट्टी में मिलाने में तुले हैं लेकिन क्या टैम वालों पर भी तीसरी आंख की कृपा हो गई है? क्या टैम वालों ने भी घर में कढ़ी चावल बनाने शुरू कर दिये हैं? सवाल लाख टके का ये भी है।

देशभर के जिन शहरों में टीआरपी सैंटर हैं उन शहरों में ऐसा तो है नहीं कि 100 फीसदी अनपढ़ लोग ही बसे हैं। वहां एक पढ़ा लिखा और जागरूक तबका भी मौजूद है और ऐसा भी नहीं है कि टामियों की टीआरपी के मापदंड तय करने वाली मशीनें समाज के ऐसे तबके के घरों में लगे हैं जिन्हें आस्था और अंधविश्वास के बीच का फर्क नहीं मालूम। इसलिए आखिर तीसरी आंख वाले बाबा के इस कार्यक्रम की टीआरपी ऐसे उछाल पर क्यों है, इससे ज्यादा बेहतर और कहीं ना कहीं मनोरंजन करने वाले विज्ञापन भी करीब करीब हर न्यूज़ चैनल पर प्रसारित किये जा रहे हैं लेकिन उनकी टीआरपी क्यों नहीं आ रही?

खास बात ये है कि अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले इस तरह के कई विज्ञापन पहले भी कई न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किये जाते रहे हैं लेकिन आज से पहले कभी उन विज्ञापनों को टीआरपी में नहीं गिना गया, इससे तो यही ज़ाहिर होता है कि तीसरी आंख वाले बाबा जी के दरबार में पड़ने वाली लाखों रुपयों की बारिश की कुछ छींटे टैम के ऊपर भी पड़ी हैं जिसकी बदौलत बाबा जी रातों रात शोहरत बटोरने में कामयाब हो गये हैं, और अगर ये बात कहीं ना कहीं सच साबित होती है तो वाकई उन तमाम मीडियाकर्मियों के लिए सोचने का विषय है जो 20-20 हज़ार रुपये या फिर उससे भी कम मानदेय पर न्यूज़ चैनलों के तमाम स्पेशल प्रोग्राम बनाते हैं और उनके बदले की टीआरपी ले जाती है तीसरी आंख।

हैरानी की बात तो ये है कि आखिर इस तरह की बकवास पर कोई इस कदर आंख मूंद कर भरोसा कैसे कर सकता है। सवाल तो न्यूज़ चैनल चला रहे संपादकों और मालिकों से भी है कि अगर तीसरी आंख की कृपा से ही टीआरपी आ रही है तो फिर तमाम कार्यक्रम बनाने की क्या ज़रूरत है? इस बारे में वक्त रहते अगर न्यूज़ चैनलों में काम कर रहे पत्रकारों की आंखें नहीं खुली और एकजुट होकर उन्होंने थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा नामक भ्रांति का विरोध नहीं किया तो वो दिन दूर नहीं जब न्यूज़ चैनलों के मालिकों के लिए सोने की मुर्गी साबित हो रहे निर्मल बाबा जैसे लोग ही न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किये जाएंगे और वहां काम करने वाले लोगों की न्यूज़ चैनलों के मालिकों को रत्तीभर भी ज़रूरत नहीं रहेगी।

एक और बात ये कि दुनिया टैलेंट के मामले में हिंदुस्तान का लोहा मानती है यानी हमारे देश में जिस तरीके से नकल होती है उसी तरीके से लोगों के पास अपने भी आईडिया मौजूद है इसलिए आने वाले दिनों में कुछ लोग तीसरी आंख वाले बाबा जी की नकल तो कर ही सकते हैं साथ ही अपनी प्रतिभा दिखाकर कुछ इसी तरीके के अंधविश्वास और फर्जी चमत्कारों से लबरेज़ नये कार्यक्रम भी न्यूज़ चैनलों की झोली में डाल सकते हैं। इसलिए सावधान हो जाओ मेरे साथी मीडियाकर्मियों। अगर ऐसे ही चलता रहा तो पत्रकार जैसे शब्दों का कोई मतलब इस देश में नहीं रह जाएगा।

पत्रकार भी आज़ाद हिंद सेना के सिपाहियों की तरह बनकर रह जाएंगे, जिनके बारे में कुछ खास जानकारी इस दुनिया में मौजूद नहीं है। ये बात सिर्फ गरीब पत्रकारों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है बल्कि उन संपादकों के लिए भी सोचने की बात है जो फिलहाल तो निर्मल बाबा जैसी सोने की मुर्गी अपने मालिकों को भेंट कर उन्हें खुश करने में लगे हैं लेकिन ये मुर्गी जब सोने के अंडे देने लगेगी तो उनकी भी कोई खास ज़रूरत मालिकों की नज़रों में नहीं रह जाएगी…..ज़रा सोचिये.

( शगुन त्‍यागी सहारा समय चैनल के साथ लम्‍बे समय तक जुड़े रहे हैं. वे इन दिनों नॉर्थ ईस्‍ट बिजनेस रिपोर्टर मैग्‍जीन के दिल्‍ली-एनसीआर ब्‍यूरोचीफ के तौर पर जुड़े हुए हैं. शगुन से संपर्क मोबाइल नम्‍बर 07838246333 के जरिए किया जा सकता है।)

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निर्मल बाबा ने हबपेजेस के खिलाफ़ जो कानूनी लड़ाई जीती है वो कानून विशेषज्ञों की नजर में न्यायालय को गुमराह करके लिया गया एक फैसला है। यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें मैदान खाली था और तीर तो क्या पत्थर भी चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। अमेरिकी वेबसाइट ने अपना कोई वकील मैदान में नहीं उतारा न ही वो सफाई देने आई। बाबा के वकीलों ने जो कुछ अदालत को बताया उसका प्रतिवाद करने वाला कोई था ही नहीं। दिलचस्प बात ये है कि हाईकोर्ट में दाखिल की गई रोक लगाने की अर्ज़ी में कई विरोधाभासी और भ्रामक तथ्य हैं जिनपर किसी विपक्षी के न होने से प्रकाश डालना संभव नहीं हो पाया।

कानून विशेषज्ञों की मानें तो बाबा के वकीलों ने ये धोखाधड़ी पहले पैराग्राफ से ही शुरु कर दी थी। इसमें कहा गया है कि उनके मुवक्किल निर्मलजीत सिंह  नरुला (मीडिया दरबार को भेजे गए नोटिस में यह नाम निर्मल सिंह नरुला है) उर्फ निर्मल बाबा के दावे के अनुसार वे एक प्रतिष्ठित धर्मगुरु हैं और उनके समागम का प्रसारण 30 से भी अधिक चैनलों पर होता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये चैनल बाबा जी के प्रवचनों और समस्या निवारण व गुणगान सेशन का प्रसारण नहीं करते बल्कि उसे टेली-शॉपी की तरह विज्ञापन के तौर पर चलाते हैं।

ये कुछ वैसा ही है जैसे मोटापा कम करने वाली मशीन और दर्द कम करने वाले तेल का विज्ञापन। अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे विज्ञापनों में जहां घर बैठे मशीन, तेल या गहने आदि पाने के तरीके बताए जाते हैं, वहीं बाबा के ऐड में होम-डिलीवरी के तौर पर खुशियों और समृद्धि की गारंटी दी जाती है और समागम में आकर सारे दुखों से छुटकारा पाने का प्रलोभन। बाबा के ऐड में अकाउंट नंबर भी प्रसरित किए जाते हैं जिसमें समागम की फीस के अलावा साधारण चंदा और कमाई का दसवां हिस्सा भी जमा करने की अपील की जाती है।

मशहूर वकील अमित खेमका का मानना है कि विज्ञापन को प्रसारण बता कर अदालत को गुमराह करना एक अपराध है। बाबा के वकीलों ने अदालत को इसलिए आसानी से गुमराह कर लिया कि दूसरे पक्ष ने कोई सफाई पेश नहीं की और बाबा के वकीलों की चतुराई पर ध्यान नहीं दिलाया गया। हबपेजेस के मुकद्दमे में और भी कई भ्रामक बातें लिखी गई हैं। जैसे वशीकरण मंत्र के बारे में लिखना अपमानजनक है, बाबा की वेशभूषा के बारे में लिखना गलत है, उनपर निजी हमला है आदि।

मीडिया दरबार भी निर्मल बाबा के प्रवचनों और विज्ञापनों को न सिर्फ नैतिकता के विरूद्ध मानता है बल्कि उनमें लोगों को लगातार दी जा रही गुमराह करने वाली जानकारियों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। दिलचस्प बात यह है कि बिना किसी के  घर पहुंचे उसके अलमारी में रखी रकम देख लेने वाले बाबा जी उनके खिलाफ़ चल रहे थर्ड मीडिया के अभियान के बारे में कुछ नहीं जान पाए। हबपेजेस के खिलाफ बिना लड़े मुकद्दमा जीतने वाले  बाबा के वकीलों ने मीडिया दरबार को भी धमकाने की कोशिश की है, लेकिन हमने इसे चुनौती देने का फैसला किया है और डटे हुए हैं। मीडिया दरबार के वकील कुशेश्वर भगत का कहना है कि निर्मल बाबा के वकीलों का कानूनी नोटिस पूरी तरह आधरहीन है और उसका माकूल जवाब दे दिया गया है।

हबपेजेस के विरुद्ध मुकद्दमे में बाबा के वकील यह भी लिखा है कि हबपेजेस विज्ञापन के जरिए धन कमाने का साधन है। खेमका पूछते हैं कि अगर हबपेजेस के विज्ञापन धन कमाने के लिए है तो क्या बाबा अपने विज्ञापन में दिए खाता नंबरों के जरिए धन नहीं बटोर रहे हैं?

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-अनिल सिंह ।।

टीवी-अखबारों में हर रोज चमकने-छपने वाले, नेताओं-मंत्रियों की नैतिकता पर उंगली उठाने वाले, भ्रष्‍टाचार को लेकर चीखते-चिल्‍लाते-अपनी आवाज बुलंद करने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार, जिनके चेहरों को देखकर-प्रवचन रूपी लेखनी को पढ़कर तमाम युवा इनको रोल मॉडल मानकर जर्नलिस्‍ट बनने का सपना पालते हैं, पर बाहर से चमकने वाले ये चेहरे अंदर से कहीं भयावह व डरावने हैं.

आम आदमी के हितों की बात करने तथा सरकार को आईना दिखाने का दंभ भरने वाले ये कथित वरिष्‍ठ पत्रकारों में हिम्‍मत से कस्‍बाई पत्रकारों से भी कम हैं. बाजार को पत्रकारिता के लिए अभिशाप मानने वाले वास्‍तव में बाजार के बहुत बड़े दलाल हैं. बाजार से इनको बहुत डर लगता हैं. इनमें पत्रकारिता के सिद्धांतों के एक किनारे पर भी खड़े रहने का आत्‍मबल नहीं है. मैं व्‍यक्तिगत तौर पर इनके नाम खुलासा नहीं करना चाहता ताकि लाखों युवाओं के मन में बनी इनकी छवि पर कालिख न पुत जाए.

गोष्ठियों और आयोजनों में लम्‍बे प्रवचन देने वाले, मीडिया को बराबर आईना दिखाने वाले काटजू पर भौंकने वाले पत्रकार ढोंगी निर्मल बाबा के बारे में एक शब्‍द भी कहने से घबरा जाते हैं. अगर इस मामले में इनका पक्ष जानने के लिए फोन किया जाता है तो कोई बाहर होता है, किसी को बात सुनाई ही नहीं देता है, तो कोई एक बार सवाल सुनने के बाद थोड़ी देर में बात करने की बात कहकर दुबारा फोन नहीं उठाता है, किसी को एंकरिंग की जल्‍दी होती है. यानी टीवी पर प्रवचन देने वाले चेहरों के पास तमाम तरह के काम निकल आते हैं, पर उनके चैनल पर ढोंगी निर्मल बाबा का विज्ञापन चलने के मामले में जवाब देने का समय नहीं है.

इन महान पत्रकारों के पास जवाब देने का समय इसलिए नहीं है कि इन्‍हें अपने मालिकों से डर लगता है. हर महीनों इन न्‍यूज चैनलों को करोड़ों का विज्ञापन और टीआरपी देने वाले निर्मल बाबा मालिकों के लिए दुधारू गाय हैं. इस दुधारू गाय के खिलाफ बयान दिए जाने से इनके आका लोग नाराज हो सकते हैं. इनकी नौकरियों पर बन सकती है, लिहाजा निर्मल बाबा के बारे में बोलने के लिए इनके पास टाइम नहीं है. शाम को न्‍यूज चैनलों पर होने वाले प्रवचनों में ये चेहरे जनप्रतिनिधियों पर, मंत्रियों पर नैतिकता और आम आदमी के हित को लेकर सवाल उठाते हैं. पर जब खुद जवाब देने की बारी आती है तो इनके पास समय नहीं होता है. फिर तो ये माना ही जा सकता है कि नैतिकता की दुहाई देने वाले इन पत्रकारों से नेता ही ज्‍यादा अच्‍छे हैं जो कम से कम किसी मुद्दे पर जवाब तो देते हैं. ये पत्रकार तो कथित तौर पर पतित कहे जाने वाले नेताओं से भी ज्‍यादा पतित हैं.

जस्टिस काटजू बार-बार दोहराते हैं कि देश इस समय बहुत बड़े बदलाव यानी ट्रांजीशन के फेज से गुजर रहा है, जहां एक तरफ पुरानी परम्‍पराएं-रूढि़यां हैं तो दूसरी तरफ मार्डन समाज की तरफ बढ़ते कदम यानी देश अपनी पुरानी केंचुल उतारने के दौर से गुजर रहा है और इसमें तकलीफें बढ़ जाती हैं. ऐसे हालात जब यूरोप में आए तो वहां बहुत उपद्रव हुए, भारत भी इसी दौर में है. इसमें मीडिया की भूमिका बढ़ जाती है, उसकी जिम्‍मेदारियां बढ़ जाती हैं. पर अपने देश का मीडिया है कि बाजार की गुलाम बन चुकी है और संपादक बाजार के बहुत बड़े दलाल. बाजार इन संपादकों को जिस तरीके से नचा रहा है वो उस तरीके कत्‍थक और भाड़ डांस कर रहे हैं. भूत-प्रेत से निकलकर बुलेट और एक्‍सप्रेस खबरें बनने के दौर में आम आदमी खबरों और मीडिया से दूर होता जा रहा है. निर्मल बाबा जैसे ढोंगी लोग, जिनका पोल खोलने का दायित्‍व इन संस्‍थानों और संपादकों पर है, चैनलों के हॉट केक बनते जा रहे हैं.

इतना ही नहीं बाबा के पोल खोलती खबरें भी बड़े-बड़े समाचार संस्‍थानों के पोर्टल से गायब चुकी हैं. कुछ ब्‍लॉग भी सस्‍पेंड कर दिए गए हैं. जागरण के ब्‍लॉग जागरणजंक्‍शन पर निर्मल बाबा का पोल खोलने वाले ब्‍लॉग को ही सस्‍पेंड कर दिया गया है. poghal.jagranjunction.com नामक ब्‍लॉग पर कई खबरें ‘निर्मल बाबा उर्फ ढोंगी बाबा का सच जानिए’, ‘निर्मल बाबा : मीडिया रूपी वैश्‍या की नाजायज..’, ‘निर्मल बाबा के गोरखधंधे पर लगाम लगाना ज़रूरी हो ..’ तथा ‘निर्मल बाबा का अस्तित्व यानि भारत का दुर्भाग्य …’ शीर्षक की खबरों को ना सिर्फ ब्‍लाक कर दिया गया है बल्कि इस ब्‍लॉग को ही सस्‍पेंड कर दिया गया है. खैर, जागरण जैसे संस्‍थान से इससे ज्‍यादा की उम्‍मीद भी नहीं की जा सकती है. पर एनडीटीवी के बारे में क्‍या कहें, जिसने अपने सोशल साइट पर र‍वीश कुमार की निर्मल बाबा पर लिखे कमेंट को भी ब्‍लॉक कर दिया है.

 

रवीश के ब्‍लॉग http://social.ndtv.com/ravishkumar/permalink/79144 पर जितना दिख रहा है उसमें उन्‍होंने लिखा है कि ‘निर्मल बाबा न्यूज़ चैनलों के टाप फ़ाइव में पहुँच गया है। निर्मल बाबा को ही संपादक बना देना चाहिए। निर्मल इज़ न्यूज़, निर्मल इज़ नार्मल।’ पर इस लिंक को खोलने पर लिख कर आ रहा है कि ‘उप्‍स देयर वाज ए प्रॉब्‍लम’. आज के मार्केटियर हो चुके पत्रकारिता के दौर में जब तमाम संपादक खाने के और दिखाने के और दांत रखते हैं, रवीश से थोड़ी उम्‍मीद जगाते दिखते हैं. लेकिन इसके उलट जिन जिन संपादकों में मुझे थोड़ी उम्‍मीद दिखती थी, उनको देखने समझने से लगता था कि आज के बाजारू पत्रकारिता के दौर में ये औरों से अलग हैं, पर इस घटना के बाद ये सारे प्रतिमान रेत के महल की तरह धराशायी हो चुके हैं.

अब ये लाख टीवी पर प्रवचन दें या फिर अखबारों में कलम घसीटे कम से कम उसमें सच्‍चाई तो बिल्‍कुल नहीं दिखेगी. हालांकि लाखों की सेलरी लेने वाले इन संपादकों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पर मुझे सकुन मिलेगा कि कम से कम छोटे शहरों और कस्‍बों के पत्रकार इनसे कहीं ज्‍यादा इमानदार और कर्तव्‍यनिष्‍ठ हैं.

(लेखक अनिल सिंह भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर हैं. वे दैनिक जागरण समेत कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं.)

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मैंने कई बार समझाया अपने साले को, धर्म और विज्ञान दोनों के खिलाफ है निर्मल  : नामधारी मैंने कई बार समझाया अपने साले को, धर्म और विज्ञान दोनों के खिलाफ है निर्मल : नामधारी(162)

झारखंड के वरिष्ठ राजनेता इंदर सिंह नामधारी वैसे तो निर्मल बाबा के करीबी रिश्तेदार हैं लेकिन उनके कारनामों से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखते। मीडिया दरबार से हुई बातचीत में नामधारी ने साफ कहा कि वे निजी तौर पर कई बार उन्हें जनता की भावनाओं से न खेलने की सलाह दे चुके हैं।

नामधारी ने स्वीकार किया कि निर्मल बाबा उनके सगे साले हैं। उन्होंने यह भी माना कि वे शुरुआती दिनों में निर्मल को अपना करीयर संवारने में खासी मदद कर चुके हैं। मीडिया दरबार को उन्होंने बताया कि उनके ससुर यानि निर्मल के पिता एस एस नरूला का काफी पहले देहांत हो चुका है और वे बेसहारा हुए निर्मल की मदद करने के लिए उसे अपने पास ले आए थे। निर्मल को कई छोटे-बड़े धंधों में सफलता नहीं मिली तो वह बाबा बन गया।

जब हमने नामधारी से निर्मल बाबा के विचारों और चमत्कारों के बारे में पूछा तो उन्होंने साफ कहा कि वे इससे जरा भी इत्तेफाक़ नहीं रखते। उन्होंने कहा कि वे विज्ञान के छात्र रहे हैं तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी कर चुके हैं इसलिए ऐसे किसी भी चमत्कार पर भरोसा नहीं करते। इसके अलावा उनका धर्म भी इस तरह की बातें मानने का पक्षधर नहीं है।

”सिख धर्म के धर्मग्रथों में तो साफ कहा गया है कि करामात कहर का नाम है। इसका मतलब हुआ कि जो भी करामात कर अपनी शक्तियां दिखाने की कोशिश करता है वो धर्म के खिलाफ़ काम कर रहा है। निर्मल को मैंने कई दफ़ा ये बात समझाने की कोशिश भी की, लेकिन उसका लक्ष्य कुछ और ही है। मैं क्या कर सकता हूं?” नामधारी ने सवाल किया।

उन्होंने माना कि निर्मल अपने तथाकथित चमत्कारों के जरिए जनता से पैसे वसूलने के ‘गलत खेल’ में लगे हुए हैं जो विज्ञान और धर्म किसी भी कसौटी पर जायज़ नही ठहराया जा सकता।

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