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देश के लोकतंत्र की आत्मा को बेच देने वाला विधेयक..

By   /  March 20, 2018  /  मीडिया  /  No Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..-गिरीश मालवीय|| माफ कीजिएगा आज बड़ा मजबूर होकर के लिखना पड़ रहा है कि हमारे देश के बड़े नामचीन पत्रकारों, संपादको ने अपनी आत्मा अपने संस्थान के मालिकों के पास गिरवी रख दी है नही तो यह ख़बर आपको इस पोस्ट के माध्यम से नही मिल रही होती […]


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सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर जज पर यौन शोषण का आरोप…

By   /  November 12, 2013  /  अपराध  /  1 Comment

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..एक युवा महिला वकील ने आरोप लगाया है कि हाल ही में रिटायर में हुए सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने पिछले साल दिसंबर में उनका यौन शोषण किया था. नैशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जूर्डिशल साइंसेज, कोलकाता से ग्रैजुएशन करने वाली महिला वकील उस जज के साथ बतौर इंटर्न […]


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औपनिवेशक कानूनों का अब तक जारी रहना आखिर क्या दर्शाता है…

By   /  August 30, 2013  /  बहस  /  No Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..-शैलेन्द्र चौहान|| आजादी के बाद से ही भारतीय लोकतंत्र में लोक की यह अपेक्षा रही है कि यहां के लोगों/नागरिकों को सही सुरक्षा और न्याय मिले. आम भारतीय पर्याप्त लंबे समय से न्यायपालिका और पुलिस जिन्हें औपनिवेशिक व्यवस्था में शासन का अंग माना गया था, दोनों ही संस्थानों […]


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न्यायपालिका: साख पर सवाल…

By   /  August 12, 2013  /  बहस  /  No Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें.. -अनंत विजय|| लोकतंत्र के इस संक्रमण काल में देश की संवैधानिक संस्थाएं एक एक करके राजनेताओं की कारगुजारियों की शिकार हो रही है. इस माहौल में भी देश की न्यायपालिका और न्यायमूर्तियों में देश का भरोसा बरकरार है. निचली अदालतों में भ्रष्टाचार की बातें गाहे बगाहे समाने […]


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भारत में लगभग सभी सरकारी संगठन पुलिस थाने के समान ही तो हैं

By   /  July 24, 2013  /  बहस  /  3 Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..-मनीराम शर्मा|| प्राय: अखबारों की सुर्ख़ियों में ख़बरें रहती हैं कि अमुक अपराध में पुलिस ने एफ़ आई आर नहीं लिखी  और अपराधियों को बचाया है. पुलिस का कहना होता है कि कुछ लोग व्यक्तिगत रंजिशवश झूठी एफ़ आई आर लिखवाते हैं और इससे उनके इलाके में अपराध […]


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उपेक्षित है ग्रामीण पत्रकारिता

By   /  January 11, 2013  /  मीडिया  /  4 Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..–डॉ. आशीष वशिष्ठ|| ग्रामीण परिवेश तथा ग्रामीण जन के प्रति भारतीय जनमानस में गहरी संवेदनाएं हैं. प्रेमचंद, रेणु, शरतचंद्र, नागाजरुन जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने ग्रामीण परिवेश पर काफी कुछ लिखा है, परंतु ग्रामीण पत्रकारिता की दयनीय स्थिति काफी कचोटती है. कुछ क्षेत्रीय समाचार पत्रों को छोड़ दें, तो […]


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सत्ता की बढ़ती हठधर्मिता…

By   /  December 10, 2012  /  राजनीति  /  2 Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..-डॉ. आशीष वशिष्ठ|| अन्ना और रामदेव के आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने जो हथकंडे अपनाएं वो सत्ता की हठधर्मिता का परिचायक है. प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्तासीन दल और सरकार आंदोलनकारियों, विपक्षी दलों और आम आदमी की आवाज दबाने का जो कुकृत्य कर रही हैं वो किसी […]


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माननीय जस्टिस कापड़िया का कथन बिल्कुल सही, भले ही देरी से!

By   /  September 6, 2012  /  देश  /  3 Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एच.एम. कापड़िया का यह कथन कि ‘‘जजों को देश नहीं चलाना चाहिए न ही उन्हे नीति बनानी चाहिए’’ बल्कि वे मात्र फैसला दे, भारत की न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर अवश्य सिद्ध होगा। पिछले कुछ समय से माननीय उच्चतम […]


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