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कारपोरेट मीडिया और खबरों की विश्वसनीयता.. कारपोरेट मीडिया और खबरों की विश्वसनीयता..(1)

-के.पी. सिंह||

मीडिया कारपोरेट हुआ तो एचआर पालिसी बनी जिसके मुख्य घटकों में ट्रेनिंग, ट्रांसफर, इन्क्रीमेंट व एलाउंस शामिल हैं. जिलों में पहले वहां के इतिहास, भूगोल से सुपरिचित संवाददाता कामयाब माने जाते थे लेकिन ट्रांसफर पालिसी के तहत तय हुआ कि जिले में बाहर से पत्रकार को भेजा जायेगा और वह भी मात्र दो तीन साल रहेगा. इसके बाद दूसरी जगह उसका तबादला कर दिया जायेगा. एचआर पालिसी की मजबूरी के साथ-साथ इस व्यवस्था के पीछे दलील यह थी कि पुराने खुर्राट पत्रकार अपने जिले में मठाधीश हो जाते हैं और अपने न्यस्त स्वार्थों के चश्मे से खबर को देखते हैं. बाहर का संवाददाता नियुक्त होगा तो इस तरह की तमाम गंदगियां दूर हो जायेंगी लेकिन यह सदाशयता खोखली साबित हुई.

आज हालत यह है कि गैर जिले के संवाददाता की नियुक्ति के प्रयोग ने पेड न्यूज और ब्लैकमेलिंग की पराकाष्ठा कर दी है. जब लोकल का संवाददाता होता था तो उसे डर रहता था कि अगर उसने अपने यहां के किसी सफेदपोश का कालर उसकी जेब से कुछ ऐंठने के लिये खींचा तो वह बुरी तरह बदनाम हो जायेगा. इसलिये आसानी से ब्लैकमेलिंग करने का साहस उसे नहीं होता था. पुराने और लोकल पत्रकार की व्यक्तिगत इमेज भी थी जिसके कारण वह बेरोजगार और विकलांगों के संगठन तक से पैसे लेने की बात सोच भी नहीं सकता था.

दरअसल बाजारवाद औपनिवेशिक इरादों का नया रूप है और इसके काम करने के तरीके भी नये हैं. दूसरे देश को चारागाह के रूप में इस्तेमाल करने के लिये वहां उसके अपने विचार विवेक को समाप्त करना उपनिवेशवादी ताकतों का मुख्य लक्ष्य होता है. इसके तहत सबसे पहले बाजार ने शिक्षा प्रणाली को अनुकूल बनाया. आईआईटी और आईआईएम का ऐसा नशा नौनिहालों पर चढ़ाया कि वे तकनीकी शिक्षा में गर्क हो गये और मानविकी व समाज विज्ञान के विषयों का एक तरीके से उन्होंने परित्याग किया. इससे विचार विवेक शून्य पीढ़ी तैयार करने में उसे मदद मिली. बाजार इसे अपने तरीके से मोल्ड करने में कितना सफल है यह बताने के लिये कोई सबूत देने की जरूरत नहीं है. अभी तक पत्रकारिता में सामाजिक सरोकार की भावना जिंदा थी जो बाजार के लिये सबसे बड़ी बाधा थी. इस कारण पत्रकारिता को प्रतिबद्धता शून्य करने के लिये इसमें एचआर पालिसी लागू की गयी. भारत की वर्नाकुलर पत्रकारिता अंग्रेजी और विदेशी पत्रकारिता के उत्कृष्ट बाजारीय सिद्घान्तों से भी परे है. वहां यह माना जाता है कि जिला प्रमुख जैसी जिम्मेदारी निभाने वाला पत्रकार कंपनी का सबसे अहम ब्रांड एम्बेसडर है. इस कारण उसका चुनाव करते समय यह ध्यान रखने की जरूरत महसूस की जाती है कि वह औसत से अधिक बुद्धिमान हो और ऐसी इंटैलिजेंसीया के लिये पत्रकारिता वरेण्य हो.

इसके लिये समुचित वेतन और ईमानदारी से सारे भत्ते देने का प्रावधान रहता है लेकिन हिन्दी मीडिया हाउस मुनाफे का एक भी पैसा काम की गुणवत्ता के लिये खर्च नहीं करना चाहते. इस कारण वेतन देने में कंजूसी बरतते हैं और उनके यहां नयी पीढ़ी में वह पत्रकार बनता है जो सफाई कर्मचारी तक के इंटरव्यू में रिजेक्ट हो जाता है. यह पत्रकार अनुभवी भी नहीं होता क्योंकि अब जो ट्रेंड चला है उसमें 22 से 28 वर्ष की उम्र के लडक़े ही जिला प्रमुख बना दिये जाते हैं और 40 वर्ष होने के पहले ही वह संपादक बन जाता है.

आज के उपभोक्तावादी युग में आकांक्षायें पूरी करने के लिये नौजवान पहले दिन से ही किसी कीमत पर पैसा बनाने की भावना दिल में बसा लेते हैं और जिला प्रमुख बनने वाले नौजवान भी इसके अपवाद नहीं होते. नतीजतन आज कारपोरेट अखबारों के यह ब्रांड एम्बेसडर जिलों में किसी भी लोकलाज की परवाह न करते हुए खाकी को भी शर्मिंदा करने वाली बेशर्मी और बेहयायी से उगाही करने में लगे हैं. इससे पत्रकारिता का जो चेहरा आम समाज में पहचाना जा रहा है वह बेहद भ्रष्ट और ब्लैकमेलर का चेहरा है. जाहिर है कि अखबार या चैनल अपने नंबर को लेकर चाहे जो दावा करे लेकिन जब रिक्शा वाला तक यह कहने लगा कि पत्रकार चोर होते हैं तो अब खबरों की विश्वसनीयता क्या होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है. आज मीडिया में इस बात की चर्चा तो बहुत हो रही है कि मुनाफावाद के कारण सारे मूल्य मर्यादाओं को नष्ट किया जा रहा है लेकिन मीडिया यह नहीं बता रही कि इसमें सबसे बड़ा योगदान खुद उनका अपना है.

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उपजा का दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन 26-27 को इलाहाबाद में.. उपजा का दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन 26-27 को इलाहाबाद में..(0)

-आशीष वशिष्ठ||

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन (उपजा) का दो दिवसीय अधिवेशन आगामी 26 एवं 27 को इलाहाबाद में आयोजित होगा. अधिवेशन के दौरान प्रदेश कार्यकारिणी का द्विवार्षिक चुनाव भी संपन्न होगा.

उपजा के महामंत्री सर्वेश कुमार सिंह ने बताया कि, उपजा का दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन आगामी 26 एवं 27 अक्टूबर को इलाहाबाद के केपी कम्युनिटी सेन्टर (केपी इन्टर कालेज के बगल में), महात्मा गांधी मार्ग में संपन्न होगा. अधिवेशन का उद्घाटन 26 अक्टूबर को पूर्वान्ह 11 बजे हेागा व समापन 27 अक्टूबर को सांय चार बजे होगा. उपजा की प्रदेश कार्यकारिणी का द्विवार्षिक चुनाव 26 अक्टूबर को अपरान्ह भोजन के बाद होगा. चुनाव परिणाम की घोशणा 27 अक्टूबर को प्रथम सत्र में की जाएगी.

उपजा महामंत्री ने बताया कि, प्रादेशिक अधिवेशन में सम्मिलित होने हेतु प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारी एवं सदस्य, जिलाध्यक्ष, महामंत्री एवं समस्त डेलीगेट, एनयूजे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में निर्वाचित प्रदेश से पदाधिकारी एवं सदस्य आमंत्रित हैं. इनके अतिरिक्त भाग लेने के इच्छुक सदस्य विषेश आमंत्रित के रूप में भाग ले सकेंगे, किंतु इसके लिए प्रदेश अध्यक्ष एवं प्रदेश महामंत्री की पूर्व अनुमति आवष्यक है.

ज्ञातव्य है कि इस बार उपजा प्रदेश कार्यकारिणी में चुनाव होने जा रहे हैं. प्रदेश कार्यकारिणी में कुल 30 सदस्यों में से अध्यक्ष पद पर निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित का मनोनयन सर्वसम्मति से हो चुका है. प्रदेश कार्यकारिणी के षेश 29 पदों उपाध्यक्ष-5, महामंत्री-1, मंत्री-5, कोषाध्यक्ष-1 एवं 17 कार्यकारिणी सदस्यों के नामों पर आम सहमति नहीं बन पायी है जिनका चुनाव अधिवेशन के दौरान होगा. पिछली दफा समस्त पदों पर आम सहमति बन गयी थी लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है लगभग सभी पदों पर कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है. सूत्रों की मानें तो इस बार प्रदेश कार्यकारिणी में बड़ा उलटफेर होने की संभावना है.

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पत्रकार ने सच बोला तो मिली सजा ए मौत… पत्रकार ने सच बोला तो मिली सजा ए मौत…(2)

-अब्दुल रशीद||

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के सिपाही का जनसम्पर्क अधिकारी के सामने जहर खाकर पहुँचना और जहर खाने से पहले डी जी पी को अपने ख़ुदकुशी की जानकारी एसमएस के माध्यम से भेजना इस बात की तस्दीक करता है कि वह मरना नहीं चाहता था लेकिन उसके पास मौत के सिवा कोई विकल्प नहीं था.

मध्य प्रदेश के मीडियाकर्मी व पी आई एल एक्टिविस्ट राजेन्द्र कुमार ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हड़पने वाले अफसरों का सच दुनियां के सामने लाना इतना बड़ा गुनाह हो गया कि उन्हें मौत को गले लगाने को विवश होना पड़ा और प्रदेश के सबसे सुरक्षित जगह पर और प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले को सूचना होने के बावजूद बचाया न जा सका. तो क्या मध्य प्रदेश में सच लिखने और सच उजागर करने वाले को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि उनकी हिफाजत करने वाला कोई नहीं? कहते है जनसम्पर्क मीडिया का अपना विभाग होता है जो मीडियाकर्मियों के सुख दुःख का ध्यान रखता है? लेकिन यह घटना तो कुछ और ही बयां करती है.

जानकारी के अनुसार मीडियाकर्मी राजेन्द्र कुमार (४८) पिता लालचंद निवासी अवधपुर ने मंगलवार को मंत्रालय पहुँच कर जहर खा लिया. जहर खाने से पहले अपने ख़ुदकुशी की सूचना डीजीपी नंदन दुबे और कुछ अन्य मीडियाकर्मियों को देने के साथ २३ पेज का सुसाइड नोट अपने सहयोगी को दे दिया था जिसमें ३३ अधिकारीयों को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया है. राजेन्द्र ने आरोप लगाया की इन अधिकारीयों की प्रताड़ना और आए दिन जान से मारने की धमकी से आजिज़ आ कर मौत को गले लगा रहा है. सुसाईड नोट में यह भी लिखा है की प्रताड़ना की शिकायत डीजीपी, आईजी और एसपी से भी की थी, पर किसी ने उनकी नहीं सुनी. अधिकारी राजेन्द्र के पीछे पड़े हुए थे और आए दिन जान से मारने की धमकी मिलती थी.

जहर खाने के बाद राजेन्द्र बल्लभ भवन के चौथी मंजिल पर स्थित प्रेस सचिव अशोक मनवानी के केबिन में पहुंचा और वहां उलटी करने लगा हालत बिगड़ती देख वहां उपस्थित अधिकारीयों ने पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी. आनन् फानन में पुलिस वहां पहुंची और वहां से जेपी अस्पताल ले गया. डॉक्टरो ने गंभीर हालत देख हमीदिया अस्पताल रेफर कर दिया जहाँ उसकी इहलीला समाप्त हो गई.

क्या लिखा था डीजीपी को भेजे एसमएस में

डीजीपी सर मैंने एससी के फर्जी जाति प्रमाण पत्र लगाकर सरकारी नौकरी हड़पने वाले २५० से अधिक लोगों के विरुद्ध हाईकोर्ट में पीआइएल ४७४३/०९ फाइल की है. इसमें डॉ शैलेन्द्र खामारा, अंकिता खामारा, रविन्द्र खामारा (३३लोग) आदिम जाति कल्याण विभाग के अतिरिक्त संचालक एसएस भंडारी की प्रताड़ना और धमकियों से तंग आकर सुसाइड कर रहा हूँ. ये लोग आठ साल से मुझे जान से मारने की धमकी दे रहें हैं. ये सभी मेरी सुसाईड के जिम्मेदार है. (मीडियाकर्मी व पी आई एल एक्टिविस्ट राजेन्द्र कुमार)

 

अब यह देखने वाली बात होगी के पत्रकार को मरने के लिए मजबूर करनेवाला मध्य प्रदेश प्रशासन अपने ही प्रशासन के खिलाफ कार्यवाही करता है या पत्रकार की मौत की खबर कागजों में समेट कर रद्दी की तरह फ़ेंक दिया जाता है.

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माल-ए-मुफ्त और मुफ्तखोर पत्रकार… माल-ए-मुफ्त और मुफ्तखोर पत्रकार…(0)

-डॉ. महर उद्दीन खां||

नेता और अफसर कुछ पत्रकारों को मुफ्तखोरी की ऐसी आदत डाल देते हैं कि वह अपने मित्रों को भी आसामी समझने लगते हैं. कई बार तो ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि बड़ी शर्म महसूस होती थी.मुम्बई की हवाई यात्रा में नाश्ता दिया गया. नाश्ते के बाद मेरे साथ बैठे पत्रकार ने प्लास्टिक की छुरी कांटे और चम्मच रूमाल से साफ कर अपनी जेब में रख लिए. मैं देख रहा था तो खिसियाने से हो कर बोले इनसे बच्चे खेलेंगे.
ऐसे ही बनारस की यात्रा में विमान परिचारिका ट्रे में टाफियां ले कर आई. सब एक या दो टाफी उठा रहे थे. पास बैठे पत्रकार ने मुट्ठी भर टाफियां उठा लीं.परिचारिका एक क्षण ठिठकी और मुस्करा कर आगे बढ गई. साथी पत्रकार ने बड़े गर्व से कहा- जब बच्चों को बताया जाएगा कि ये हवाई जहाज की टाफियां हैं तो कितने खुश होंगे और अपने मित्रों को बताएंगे तो उन पर कितना रौब पड़ेगा.मैं शांत भाव से सुनता रहा.ऐसे ही इंदौर के एक होटल में एक एक कमरे में दो दो पत्रकार ठहराए गए थे.कमरे में इमरजेंसी के लिए एक हीटर जग, दूध ,चीनी के पाउच और चाय की डिप का प्रबंध था.दो दिन के प्रवास में कई बार इस सुविधा का उपयोग भी किया.चलते समय साथी ने चाय , चीनी और दूध के बचे हुए पाउच अपने बैग के हवाले कर लिए.मैंने मजाक में कहा यार ये जग भी रख लो काम आएगा.वह थोड़े शर्मिंदा तो हुए मगर बोले कुछ नहीं.

कई पत्रकारों का इगो बहुत नाजुक होता है जो जरा जरा सी बात पर हर्ट हो जाता है.ऐसा एक दिलचस्प मामला देखने को मिला आप भी आनंद लें. जी. एम. बनातवाला के मुस्लिम लीग का अघ्यक्ष बनने पर केरल का उनका एक सप्ताह का दौरा था. इसे कवर करने के लिए पत्रकारों की एक टीम सांसद इ. अहमद के साथ केरल जा रही थी. मुम्बई से कोझिकोड़ की उड़ान पकड़नी थी. मुम्बई की उड़ान लेट हो गई. खाना अगली उड़ान में मिलना था जो जा चुकी थी. भूख के मारे सब का बुरा हाल था. सांसद इ. अहमद कहीं से एक प्लेट में बटर सैंडविच का प्रबंध कर के लाए और सबको देने लगे. यह देख कर एक पत्रकार बिदक गए और कहने लगे कि यह हमारी तौहीन है जो इस तरह खड़े हो कर खाएं. उन्होंने सबसे कहा कि यह हमारे इगो का सवाल है, कोई नहीं खाएगा. मगर किसी ने उनकी बात नहीं मानी तो वह भन्ना कर बोले- आप हमें अपमानित करने के लिए लाए हैं. इ. अहमद शांत भाव से यह तमाशा देखते रहे.

खैर अगली फ्लाइट के लिए उन्होंने भाग दौड़ कर प्रबंध किया और सब कोझिकोड़ पहुंच गए. यहां पत्रकारों की देखभाल के लिए चंद्रिका के अहमद कुट्टी थे. सब को होटल में ले जाया गया और बताया कि नाश्ते के बाद एक सभा में चलना है. सबने भर पेट नाश्ता किया मगर इगो महाशय भन्नाते रहे. कुट्टी उनकी खुशामद कर रहे थे. मगर वह हठ किए थे कि उन्हें वापस भेज दिया जाए. मैं कुट्टी को एक ओर ले गया और कहा कि आप अधिक खुशामद न करें, ये वापस नही जाएंगे और जब भूख लगेगी तो खाना इन्हें खुद मना लेगा. यही हुआ भी. दस बजे के बाद जब लौटे तो सबसे पहले इन इगो महाशय ने ही खाने का आर्डर दिया. इस यात्रा में सबने इनका नाम ही इगो रख दिया था. ये महाशय रोजाना सवेरे 555 सिगरेट के दो पैकेट बैरे से मंगा लेते और उनमें से एक ही पी पाते. चलते समय इन्होंने तीन पैकेट मंगाए और बैग में रख लिए.

अब सुनिए मुफ्त खोरी की एक और कहानी. दादरी की थोक सब्जी मंडी गांव के सामने है सवेरे के समय कुछ रिटेलर भी वहां बैठते हैं तो आस पास के लोग सब्जी लेने आ जाते हैं. मेरे घर से सब्जी मंडी पांच मिनट से कम के वाक पर है. सवेरे घूमने के साथ कभी कभी सब्जी मंडी से ताजा सब्जी भी ले आता था. उस दिन सड़क पार ही की थी कि एक मारूति वैन पास आ कर रुकी. तीन परिचित पत्रकार थे. अलीगढ़ के किसी कार्यक्रम से लौट रहे थे. दुआ सलाम के बाद मैंने सामने ही घर चलने का आग्रह किया आरै कहा कि चलिए सब्जी बाद में ले ली जाएगी. अरे नहीं, चलिए हम भी सब्जी मंडी देख लेते हैं.

उनके साथ अंदर गया. सब्जी खरीदी तो वह भी कहने लगे यार ताजा सब्जी है दिल्ली में यह कहां मिलती है सो उनके लिए भी एक एक किलो भिंडी, करेला और टमाटर तुलवा दिए. सब्जी वाला जानकार था. बोला डाक्टर साहब पैसे की चिंता न करें, आ जाएंगे. लौटते में गांव का ही एक आढती मिल गया. बोला चाचा आपके लिए एक पेटी आम रखा है बहुत मीठा और खुशबूदार है. उसने पेटी अपने लड़के को उठवा दी. वह पेटी बाहर रख कर चला गया. इस बीच एक ने आम उठा कर पहले सूंघा और फिर चूस कर बोला यार आम तो वाकई कमाल का है. ऐसा करते हैं, आप तो यहां रहते ही हैं, हम यह पेटी रख लेते हैं.इतना कह कर उन्होंने पेटी वैन में रखी और बिना हाथ मिलाए ही एक दम से फुर्र हो गए और आगे जा कर हाथ हिला कर विदा होने का नाटक करते चले गए. मैं सोचता ही रह गया कि इन्हें घर ले जाता तो सस्ते में ही छूट जाता.

(लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है: सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207)

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प्रमोद सिंह के बहाने मीडिया की पड़ताल… प्रमोद सिंह के बहाने मीडिया की पड़ताल…(1)

ऐसे मीडिया की वजह से क्यूं मरे कोई…?

-निरंजन परिहार||
प्रमोद सिंह नहीं रहे. उन्होंने आत्महत्या कर ली. अपन सन्न हैं. सन्न इसलिए, क्योंकि प्रमोद सिंह जैसे प्रतिभाशाली रिपोर्टर के इस दुनिया से चले जाने के तरीके ने हम सबको एक बार फिर से मीडिया में हमारे काम, उस काम को करते रहने के तरीके, और उसकी जरूरत के साथ साथ जिंदगी के मुकाबले मीडिया की औकात के प्रति हमेशा सजग रहने के प्रति चिंतित करनेवाले सवाल खड़े कर दिये हैं.

जो लोग प्रमोद सिंह को जानते है, वे यह भी जानते हैं कि प्रमोद सिंह मीडिया में कोई इतने बड़े आदमी नहीं थे, कि उन पर मृत्यु लेख लिखे जाएं. लेकिन फिर भी लिखा जाना चाहिए. क्योंकि प्रमोद सिंह का जिंदगी से जाने का माहौल और तरीका दोनों, लिखे जाने के काबिल है. मौत वैसे भी कोई इतनी आसान चीज नहीं होती, जिस पर नहीं लिखा जाना चाहिए. फिर, यह तो एक पत्रकार की मौत है. पत्रकार, जिसे किसी भी सामान्य आदमी के मुकाबले आम तौर पर समझदार माना जाता है, समाज का पहरेदार कहा जाता है.

लेकिन मुश्किल यह है कि कोर्ट और अपराध कवर करने वाले जिन बहुत सारे पत्रकारों को अपन करीब से जानते हैं, उनमें काम का तो जज्बा तो बहुत दिखता है, लेकिन उसके उलट कुछेक को छोड़ दें, तो ज्यादातर लोगों में व्यक्तिगत जीवन के प्रति गंभीरता न के बराबर दिखाई देती है. या यूं कहा जा सकता है कि वे काम की गहराइयों को छूने की कोशिश में अपराधियों तक से भी निजी रिश्ते बनाने के लिए बहुत गहरे उतर जाने की वजह से जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. इसी वजह से उनके जीवन में एक खास किस्म का अवसाद भी घर कर जाता है, जो धीरे धीरे जिंदगी पर काल बनकर छा जाता है. फिर जीवन के रहने और न रहने के बीच कोई खास फर्क ही नहीं लगता. जीवन के अर्थ के मुकाबले निरर्थकता ज्यादा भाने लगती है. यही वजह है कि खेल, फिल्म, व्यापार, राजनीति, और बाकी काम करनेवाले पत्रकारों के मुकाबले अपराध करनेवाले पत्रकारों में फ्रस्ट्रेशन बहुत ज्यादा दिखाई देता है. फिर जिंदगी का एक सीधा सादा गणित यह भी है कि जो काम आप रोज देखते रहते हैं, उसी में आपको ज्यादा आसानी लगती है. सो अपराध कवर करनेवाले पत्रकारों को मौत भी आसान रास्ते के रूप में दिखाई देती है. पिछले दस सालों में पत्रकारों की आत्महत्या और अकाल मौत के अलावा उनके अपराध में लिप्त होने की जो खबरे आई हैं, उनमें सबसे ज्यादा लोग वे हैं, जो अपराध कवर करते रहे हैं. कोर्ट और अपराध कवर करते करते हम लोग खुद भी कब उसी मानसिकता के हो जाते हैं, यह कोई नहीं जानता.

दरअसल, प्रमोद सिंह नाराज थे. उन लोगों से, जिनने प्रमोद सिंह की खबरों के जरिये अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया, और जब मदद करने की बारी आई, तो हाथ खड़े कर दिए. मुंबई के बहुत सारे पत्रकार जानते हैं कि प्रमोद सिंह ने सबकी मदद की, लेकिन उनको काम देने की बारी आई, तो उन लोगों में से किसी ने उनकी मदद नहीं की, काम भी नहीं दिया. वे लोग उनके फोन भी नहीं उठाते थे. अपनों के ही इस कदर बेगाना हो जाने के अवसाद ने प्रमोद सिंह को लील लिया. उन की आत्महत्या से अपन भी दुखी हैं. आहत भी हैं. और चिंतित भी. उन्होंने अपने पास काम किया है. वे लगनशील थे और मेहनती भी. ऐसे प्रमोद सिंह की आत्महत्या के बाद यह समझ में आता है कि पत्रकारिता की हमारी दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो देह त्यागने के बाद के जीवन को न जानने के अज्ञानी हैं. हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि जिंदगी है, तो ही सब कुछ है. जिंदगी है तो कुछ भी किया जा सकता है, लेकिन जब जिंदगी ही नहीं, तो कोई किसी के लिए कुछ भी नहीं कर सकता. सिवाय रोने के.

प्रमोद सिंह सिर्फ 33 साल के ही थे. विनम्र थे. मुंबई में अपराध के बढ़िया रिपोर्टर थे. और इंसान होने के तौर पर भी ठीक ठाक ही थे. ठीक ठाक इसलिए, क्योंकि आमतौर पर अपराध की रिपोर्टिंग करनेवाले जहां दो चार खबरों के बाद ही अपने आप को तुर्रमखां समझने लगते हैं, उनको अगर टुच्चा कहा जाए, तो उनके मुकाबले प्रमोद सिंह बहुत ऊंचे आदमी थे. न कोई घमंड और न कोई दर्प. लेकिन मीडिया, और खासकर अपराध कवर करने के काम में यह ऊंचापन कब जिंदगी को अंदर से खोखला कर देता है, यह समझने की जरूरत है. प्रमोद सिंह यह नहीं जानते थे. इसीलिए खुद ही अपनी जिंदगी को खा गए. आत्महत्या कर ली. वे कोई दस साल मे इस पेशे में थे, और जैसा कि हमारे बाजार में चैनलों के खुलने और बंद होने का हाल है, उन्होंने जितने साल काम किया उतने ही साल घर भी बैठे रहे. वैसे, प्रमोद सिंह उन लोगों में नहीं थे, जो रोजमर्रा की अपराध की खबरें कवर करके भी खुद ही वाहवाहियां लेने की कोशिश में अपनी पीठ थापथपाते रहते हैं. वे गहरे आदमी थे. और लगता है कि अपनी जिंदगी की गहराइयों में वे इतने गहरे उतर गए थे कि वापस उबर ही नहीं पाए. वे खुद्दार थे.
हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि हमारा काम हमारे जीने और जीवन को जीतने का साधन रहे, तब तक तो ठीक, लेकिन वही काम जब मौत का कारण बनकर सामने आने लगे, तो उस काम के बारे में पुनर्विचार करना बहुत जायज हो जाता है. मीडिया वैसे भी अब कोई पहले जितना बहुत इज्जतदार काम नहीं रह गया है.

ज्ञान प्राप्ति के साधन के रूप में तो मीडिया ने बहुत पहले ही अपनी साख खो दी थी. सूचनाएं देने में भी बहुत ज्यादा घालमेल होने की वजह से अब यह जानकारी के माध्यम के रूप में भी अपनी साख खोता जा रहा है. अब मीडिया सिर्फ और सिर्फ व्यापार है. सर्वशुद्ध व्यापार. जिसे जिंदगी की कीमत पर भी सिर्फ अपने मुनाफे की पड़ी रहती है. जितना बड़ा ब्रांड, उतना ही बड़ा धंधा. धंधा करनेवालों और धंधेवालियों की वैसे भी कोई औकात नहीं मानी जाती. शायद यही वजह है कि मीडिया के भी धंधा बन जाने के बाद बाजार में अब मीडिया की औकात नपने लगी है. किसी को बुरा लगे, तो अपने जूते पर, लेकिन ऐसे धंधे के लिए कोई अपनी जिंदगी को क्यों स्वाहा करें, यह सबसे बड़ा सवाल है.
(लेखक राजनीतिक विशेलेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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अब दैनिक भास्कर में छंटनी का दौर शुरु… अब दैनिक भास्कर में छंटनी का दौर शुरु…(0)

-विनीत कुमार||

अब दैनिक भास्कर में छंटनी का दौर शुरु. 1 सितंबर से शायद बंद हो जाए दिल्ली संस्करण. दर्जनों पत्रकार फिर से दूसरे अखबारों और संस्थानों में जाकर वहां काम कर रहे लोगों के लिए संकट पैदा करेंगे. मैंने अबकी बार सड़क पर आ जाएंगे शब्द का प्रयोग नहीं किया क्योंकि नेटवर्क-18 मामले में हमने देखा कि अधिकांश सीएनएन-आइबीएन,आइबीएन-7 से छंटकर उन चैनलों में फिट हो गए जिसे नेटवर्क 18 की अटारी पर चढ़कर कमतर बताकर कोसते रहे.

दैनिक भास्कर से छांटे गए लोग संभवतः इसी तरह अपने से कमतर के संस्थान में जाएं और वहां काम कर रहे लोगों के लिए संकट बनें. मीडिया में आमतौर पर होता ये है कि संस्थान का ठप्पा कई बार इस तरह काम करता है कि नक्कारा और अयोग्य भी अगर नामी संस्थान से घुसकर निकलता है तो सी ग्रेड, डी ग्रेड के संस्थान उस नामी संस्थान को भुनाने के लिए उन नक्कारों को रखकर ढोल पीटते हैं- देखो जी, हमारे यहां लोग आइबीएन 7 छोड़कर आ रहे हैं, स्टार छोड़कर आए हैं. एनडीटीवी इंडिया से निकाले गए उदय चंद्रा को लेकर लाइव इंडिया में इसी तरह के ढोल पीटे जाते थे जबकि हम हैरान हुआ करते कि इसे एनडीटीवी इंडिया ने काम कैसे दे दिया था? वो शख्स भी अजीब नमूने की तरह पेश आता. लैप्पी को ऐसे चमकाता जैसे मिसाइल लिए घूम रहा हो, कभी कायदे से इस पर काम करते नहीं देखा.. बाद में उसके चिरकुट और प्रोमैनेजमेंट रवैये से फोकस टीवी में अपने ही सहकर्मियों के हाथों कुटाई भी हुई थी. खैर, ऐसे छंटनी के शिकार पत्रकार समझौते और कम पैसे में भी काम करने के लिए कमतर संस्थानों में तैयार हो जाते हैं.

एबीपी न्यूज के सीओओ अविनाश पांडे जैसे लोगों की कमी नहीं है जो ये मानते हैं कि ये सब छंटनी-वंटनी लगी रहती है. इसी में लोगों को नौकरी भी मिल जाती है..लेकिन सरजी, हमें तो सिर्फ छंटनी ही दिख रही है, कहीं मिल रही हो तो बताइए..हमारे मीडिया साथी का हौसला बढ़ेगा.

(विनीत कुमार की फेसबुक वाल से)

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एम.पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन विवादों के घेरे में… एम.पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन विवादों के घेरे में…(1)

-दिवाकर गुप्ता || 

भोपाल. एम. पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (आईएफडब्ल्यूजे) के प्रदेशाध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने आई. एफ. डब्ल्यू. जे. के राष्ट्रीय सचिव कृष्णमोहन झा की सहमति से प्रदेश की पूर्व की जिला एवं संभाग की इकाईयों को भंग कर दिया है. अब प्रदेश में नए सिरे से तहसील, जिला एवं संभाग इकाईयों का गठन किया जाएगा.

इस तीन लाइन को जरा गौर से पढ़कर समझ लें. प्रदेश में (आईएफडब्ल्यूजे) के नए प्रदेशाध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने जिला एवं संभाग की सभी इकाईयों को भंग कर दिया है.

तौबा तौबा अब एम. पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (आईएफडब्ल्यूजे) के चुने हुए पदाधिकारी भी धूल चाटते नज़र आयेगें. खबर है कि पिछले दिनों भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के चुनाव हुए. राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामगोपाल शर्मा और सदस्यता अभियान का संयोजक वरिष्ठ पत्रकार सतीश सक्सेना ने भोपाल में पत्रकारों की सदस्यता की और सेकड़ो पत्रकारों से फार्म भरवा लिए गए और फिर सूची बनाकर दिल्ली तक पहुचाई गई, पत्रकारों से फार्म भरवाने में भोपाल के कई पत्रकारों ने अहम् भूमिका निभाई, सूची को भोपाल पत्रकार भवन में चस्पा किया गया और फिर चुनाव प्रक्रिया अपनाई गई, चुनाव प्रभारी अवधेश भार्गव और प्रेम नारायण प्रेमी को बनाया गया और विधिवत निर्वाचन किया गया, इस चुनाव में निर्विरोध अध्यक्ष रमेश तिवारी को चुना गया, अध्यक्ष रमेश तिवारी भी लग्जरी गाड़ी में ढोल धमाके के साथ पत्रकार भवन परिसर में आये और पद ग्रहण किया, लगा भोपाल में पत्रकारों की तूती बोलेगी. अब विधिवत चुनाव हुए है. परन्तु फिर वही जिसको ढपली दी वो ही अपना राग गाने लगा. अब प्रश्न उठता है कि क्या मनोनीत प्रदेशाध्यक्ष निर्वाचित पदाधिकारियों की इकाई को भंग कर सके. जबकि भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन एक स्वतंत्र इकाई है.

प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सतीश सक्सेना को सदस्यता अभियान का संयोजक नियुक्त करते हुए नए सिरे से प्रभावी और पत्रकारिता को समर्पित पत्रकारों को जोडऩे और पुन: सदस्यता अभियान चलाकर नई इकाईयों के गठन की जिम्मेदारी सौंपी है. बस प्रदेश के पत्रकारों के पास यही काम बाकि रह गया है की वो अपनी सदस्यता कराये फिर उनकी सदस्यता निरस्त हो जाये, और सदस्यता निरस्त हो न हो किया फर्क क्या पड़ता है इन लोगो ने तो पहले भी की गई सदस्यता धारको को कोई आई कार्ड भी इशू नहीं किया. सब घर घर में होता रहा और करीब 350 पत्रकारों बेवकूफ बन गए.

एम. पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की नई नियुक्तियो को एक विरोधी मानसिकता के संगठन अवैध बता रहा है. इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की प्रदेश इकाई पुनः गठन प्रांतीय अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल एवं प्रांतीय महामंत्री रवीन्द्रं पंचोली एवं फेडरेशन के राष्ट्रीय सचिव कृष्णमोहन झा के नेतृत्व में किया जा रहा है. प्रदेश के सभी वर्किंग जर्नलिस्टों से एम. पी. वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन ने के सभी संभागों, जिलों, तहसील में इकाईयां गठित की जाने की अपील की है. राष्ट्रीय सचिव कृष्णमोहन झा ने जो मध्यप्रदेश में नियुक्तिया की है इनका मानना है की सभी अवैध है और ये नियुक्त पदाधिकारी को भोपाल और प्रदेश की किसी भी इकाई को भंग करने का अधिकार भी नहीं है जो नए प्रदेशाध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने किया है. साथ ही वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के मिलते जुलते नाम वालों के सावधान किया है, वहीँ कामरेड विक्रम राव के संगठन के दवारा की जाने वाली नियुक्तियो अवैध ठहराने में लगा हुआ है.

भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के भोपाल चुनाव के प्रभारी रहे अवधेश भार्गव से बात की तो उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भी घोषणा प्रांतीय अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल दवारा की गई है वो विधि विरुद्ध है इस पर ध्यान देने की जरुरत नहीं है. क्योकि उनको यह अधिकार नहीं है की वो किसी स्वतंत्र इकाई को भंग कर सके.

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छंटनी के विरोध में एकजुट हुए पत्रकार… छंटनी के विरोध में एकजुट हुए पत्रकार…(1)

बीते 16 अगस्त को दो समाचार चैनलों आईबीएन7 और सीएनएन आईबीएन से बिना किसी पूर्व सूचना के लगभग 320 पत्रकारों को निकाले जाने के विरोध में आज जर्नलिस्ट सोलिडेरिटी फोरम (जेएसएफ) ने दोनों चैनलों के गेट के सामने प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन में भारी संख्या में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र संगठनों और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं ने भाग लिया.

तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार जेएसएफ के बैनर तले दोपहर दो बजे से विभिन्न संगठनों दिल्ली पत्रकार यूनियन, ,पीपुल्स यूनियन फोर ड्रेमोक्रेटिक राइट्स, जेएनयू छात्र संघ , आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन, ड्रेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन,आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन, स्टूडेंट फोर रेजिस्टेंस और मारुति वर्कर्स यूनियन ने सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन-7 के सामने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया. गौरतलब है कि पिछले एक दशक में मीडिया में जारी कारगुजारियों को लेकर पत्रकारों द्वारा किया गया ये एक मात्र और अपने तरह का पहला विरोध प्रदर्शन है.

जेएसएफ की मांग है कि IBN 7 और CNN-IBN से निकाले गए पत्रकारों को तत्काल वापस नौकरी पर रखा जाए और मीडिया संस्थानों के भीतर यूनियन बनाने के अधिकार की बहाली हो. इसके अलावा सभी मीडिया हाउसों में श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए तुरंत वर्किंग जर्नलिस्ट ऐक्ट लागू करें साथ ही मजीठिया आयोग की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाए. आने वाले समय में जेएसएफ की देश भर के मीडिया संस्थानों से निकाले जा रहे पत्रकारों का डाटाबेस तैयार करने की योजना है. साथ ही जल्द से जल्द मीडिया में जारी छंटनी को लेकर एक पब्लिक मीटिंग बुलाने का भी फैसला लिया गया है.

प्रदर्शन के दौरान जेएसएफ ने विभिन्न मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों से भी मुहिम के समर्थन की अपेक्षा जताई । प्रदर्शन में बड़ी संख्या में मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए कारपोरेट के पत्रकारिता पेशे पर बढ़ते हुए दबाव का जमकर विरोध किया. प्रदर्शन में प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल, सुरेन्द्र ग्रोवर, भूपेन सिंह, भड़ास फार मीडिया के संपादक यशवंत सिंह, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता पी के शाही, दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन से एस के पांडे,  वरिष्ठ पत्रकार राजेश वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार, , वरिष्ठ पत्रकार हैदर रजा, सामाजिक कार्यकर्ता महताब आलम ने मीडिया में बढ़ते भ्रष्ट्राचार कारपोरेटों का बढ़ता दखल और कांट्रैक्ट कर्मचारियों के शोषण पर अपने विचार रखे. भूपेन सिंह ने कहा कि कारपोरेट समाचार चैनलों के संपादकों को यह साफ करना होगा कि वे चैनल में हिस्सेदार है या एक पत्रकार की भूमिका में काम कर रहे है. वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल ने आब्जर्वर समाचार पत्र के साथ हुए संघर्ष और मीडिया संस्थानों में यूनियन की जरूरत को लेकर महत्वपूर्ण बातें साझा की.

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बाज़ार पहले आपको खरीदता है, फिर नीलाम कर देता है… बाज़ार पहले आपको खरीदता है, फिर नीलाम कर देता है…(0)

-मयंक सक्सेना||

आईबीएन 7 और सीएनएन आईबीएन यानी कि नेटवर्क18 के न्यूज़ मीडिया वेंचर्स के लगभग 300 कर्मचारियों की छंटनी को जो लोग विदाई कह रहे हैं, उनको पहले अपनी भाषा पर काम करना होगा कि दरअसल ये विदाई है या नहीं, क्योंकि विदाई की एक रस्म होती है जो बाज़ार की इस रस्म से काफी अलग होती है। ख़ैर हिंदी टीवी मीडियाकर्मियों के भाषाई ज्ञान पर बात करना भी, भाषा का अपमान है इसलिए मुद्दे पर आना बेहतर है।

अब बात नेटवर्क 18 के कर्मचारियों की छंटनी की तो हुज़ूर ये तो होना ही था और इसकी चर्चा चैनल के आला कर्मियों के बीच लम्बे समय से थी। अब ये आला कर्मियों से पूछिये कि कई कर्मचारियों को इसके बारे में पहले से भनक भी क्यों नहीं लगने दी गई, जिस से कि वो अपने लिए कोई ठौर तलाश लेते…क्योंकि जिनको जानकारी मिल गई थी उन में से कई ने ठिकाने ढूंढ लिए हैं। बाज़ार ये ही करता है पहले अपने कई ठिकाने बनाता है फिर आपको उनमें से ही अलग अलग पर बार बार शरण लेने के लिए मजबूर कर देता है।

दरअसल ये बाज़ारवाद को पहले ओढ़ने, फिर पहन लेने और अब बिछा लेने का मुद्दा है, मसला जुड़ा है इस बात से किस तरह से जवानी में वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले, जनवादी लेख लिखने वाले और बाज़ार के ख़तरों से अच्छी तरह वाकिफ़ रहने वाले सीनियर पत्रकार सम्पादकीय पदों पर आते ही बाज़ार के पुजारी हो गए। ये पत्रकारिता की वो पीढ़ी है, जो अपने अखबारी लेखों में जनता के तमाम मसलों पर ऐसे लिखती है जैसे उनसे ज़्यादा जनता की फिक्र किसी को न हो लेकिन अपने चैनलों में तमाम जनता से जुड़ी ख़बरें ये ही सम्पादक लो प्रोफाइल कह कर गिरवा देते हैं।

टीवी पत्रकारिता को पतितकारिता बना देने में इनका सबसे अहम किरदार है, इनमें से कोई चीख चीख कर जनता को अपनी ईमानदारी दिखाता है, तो कोई मुहावरों के इस्तेंमाल से, कोई उच्चारण बोध न होने के बावजूद टीवी पर एंकरिंग करना चाहता है बग़ैर ये सोचे कि लोगों को सही भाषा सिखाना भी आपकी ज़िम्मेदारियों में से एक है। कई सम्पादक तो ऐसे हैं जो शायद आखिरी बार किसी अखबार में नगर निगम की बीट देखा करते थे और अब किसी टीवी चैनल के समपादक हैं।

ऐसे में बाज़ार के आगे नतमस्तक हो जाना अहम हो जाता है क्योंकि सम्पादकों को अब अलग अलग रिहायशी सोसायटी में फ्लैट्स भी चाहिएं, 5 सितारा बार में पार्टी भी, महंगी शराब भी, बड़ी सी विदेशी गाड़ी भी और विदेशों में छुट्टियां भी। आखिर बिना बाज़ार से बिस्तर साझा किए ये होगा कैसे? दरअसल बार बार बाज़ार की दुहाई देने वाले सम्पादकों की मजबूरी भी ये ही है, और आखिरकार ये वहीं हुआ जिस सम्पादक ने बार बार बाज़ार को अहम बताया था। देख लीजिए सम्पादक जी बाज़ार ने क्या किया।

दरअसल पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सीधा सा सिद्धांत है, ज़रूरत के लिए नहीं बल्कि मुनाफ़े के लिए उत्पादन और ऐसे में ज़ाहिर है कि मुनाफ़े के आगे न तो मोहब्बत होती है और न ही मुरव्वत। जब तक कर्मचारियों की ज़रूरत थी नेटवर्क 18 उनको श्रम से कम सैलरी पर काम पर लगाए रहा लेकिन जैसे ही कम्पनी मुकेश धीरूभाई अम्बानी के कब्ज़े में गई 300 कर्मचारियों का पत्ता साफ हो गया। इस घटना से ही इस बात की पोल भी खुल जाती है कि सम्पादक जी के इस दावे का कोई आधार नहीं है कि आईबीएन 7 की पॉलिसीज़ में रिलायंस वाले मुकेश का कोई हस्तक्षेप नहीं है। सम्पादक जी जो कर्मचारियों को रख और निकलवा सकता है वो सम्पादकीय नीति भी तय कर सकता है और करता ही है…आपके लिए भी ये एक इशारा है, समझ रहे हैं न..

मुनाफ़ाखोर अर्थव्यवस्था को न तो इस से मतलब होता है कि उसकी मुनाफ़ाखोरी गरीब को मार रही है…न ही इससे कि उससे मौलिक अधिकारों या संवैधानिक नीतियों का हनन हो रहा है। पूंजीवाद जिस भी देश में पनपा है, वहां के क़ानून से लेकर नागरिक अधिकारों तक का हमेशा उल्लंघन हुआ है। दरअसल रोज़गार समेत गरीबी मिटाने के लुभावने सपने दिखा कर ही पूंजीवाद हमेशा लाभ कमाता आया है। ऐसे ही मीडिया भी जब पूंजीपतियों के हाथ का खिलौना हुई तो उसके साथ भी ये ही होना था। जेट एयरवेज़ के कर्मचारियों की छंटनी के खिलाफ आग उगलने वाले सम्पादक जी अब शांत हैं, शायद वो ये समझने में लगे हैं कि बाज़ार को समझने में उन से क्या भूल हुई। सिर्फ एक भूल सम्पादक जी कि आप ये नहीं समझ पाए कि बाज़ार में हर चीज़ की एक कीमत होती है, उत्पाद की भी और उपभोक्ता की भी…ऐसे में बाज़ार जब ख़तरे में आता है तो वो आपकी भी कीमत लगाने से नहीं चूकता है।

दरअसल ये समय है खतरे समझने का और खतरे उठाने का, समझना होगा कि ये हमारा मुगालता हो सकता है कि हम बाज़ार को समझने लगे हैं लेकिन बाज़ार हमें ये मौका नहीं देता है। वो हमको अपने एक उत्पाद की तरह तैयार करता है, वो उत्पाद जो उसके बाकी उत्पादों को बेचे और ज़रूरत पड़ने पर खुद भी बिक जाए। हां, बाज़ार आपको ये भरोसा भी देता रहता है कि आपका बाल भी बांका नहीं होगा। आईबीएन 7 के परिप्रेक्ष्य में आशुतोष संभवतः ख़ुद भी सोच पा रहे हों आप को याद है आशु भाई, लगभग हर जगह, हर मंच से आप बार बार चीखते थे कि बाज़ार से इतना डर किसलिए…बाज़ार से डरो मत…उसे अपनाओ उसे साधो…तब हम हर बार कहते थे कि बाज़ार किसी का नहीं होता…आप और ज़ोर से चीखते थे…बाकी लोग चुप हो जाते थे… आज आप चुप हैं सम्पादक जी और बाकी सब चीख रहे हैं…कुछ रो भी रहे हैं…आपको पता है कि आपकी बच्चों जैसी ज़िद ने आपको आज कहां ला खड़ा किया है…

आज आपसे सवाल हो रहे हैं लेकिन आप चुप खड़े हैं, हो सकता है कि आप ने कुछ योग्य लोगों को बचा लिया हो, लेकिन जो उतने योग्य नहीं थे उनको निकाल देना भी तो जायज़ नहीं न…फिर अब क्या होगा उन परिवारों का जो आश्रित थे आप पर…उन साथियों का क्या जो आपके कह देने भर पर रात को दफ्तर में ही रुक कर स्पेशल तैयार करवाते थे…

उस टीम के लिए क्या आप कुछ नहीं कहेंगे, जिन्होंने नया ग्राफिक्स और ले आउट तैयार किया…ये सोच कर कि शायद उनकी मेहनत से संस्थान आगे बढ़े…उन साथियों के लिए कुछ कहें जो कई बार सुबह 7 बजे घर से रिपोर्टिंग पर निकलते थे और आपके शो के लिए एक बाइट लेने या गेस्ट अरेंज करने के लिए 12 घंटे से भी ज़्यादा फील्ड में डंटे रहते थे…आपको याद है वो असिस्टेंट प्रोड्यूसर जो असाइनमेंट हेड के हिस्से की गालियां भी सुनता था…और वो शर्मीला सा लड़का जिसको इंटरटेनमेंट की तेज़ तर्रार लड़कियों के बीच छोड़ दिया गया था…फिर भी वो काम उतनी ही शिद्दत से करता रहा…वो लड़की आप की आंखों के सामने घूमेगी क्या, जो एक छोटे से शहर से बड़े सपने लेकर बाहर निकली थी…और अपनी मेहनत के दम पर आपके यहां लगातार न केवल काम करती रही…बाज़ार के मुताबिक टीआरपीसी भी देती रही…

आशु भाई…मैं बहुत लिखता रहा हूं…आप सब के खिलाफ़…चाहता हूं बहुत तीखा लिखूं…इतना कि आप तिलमिला उठें…पर जानता हूं कि आप हमेशा ही अपनी नई बाज़ारू वैचारिकी के खिलाफ बोले-लिखे जाने पर तिलमिला ही उठते थे….अब शायद उसकी ज़रूरत नहीं है…

मैं तीखा नहीं लिखूंगा…मैं चाहता हूं कि आप सोचें…आप भावुक हों…आप रोएं…और पछताएं कि आप बाज़ार का आंख मूंद कर समर्थन क्यों करते रहे…शायद आपको लगा होगा कि वो कभी आपका साथ देगा…याद रखिए प्रबंध सम्पादक जी…बाज़ार भस्मासुर है…सबको जला कर राख कर देगा…याद रखिएगा कि सिसकियां हों किसी की भी, सोने आपको भी नहीं देंगी…नहीं देंगी…नहीं देंगी… हम आप से नाराज़ नहीं हैं…बशर्ते आप ख़ुद से नाराज़ रहें…हमेशा रहें…हम उम्मीद करते हैं कि आप अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे…कभी नहीं…

लेखक मयंक सक्सेना सरोकारी पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं. मयंक पिछले दो महीने से उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों में राहतकार्य का नेतृत्व करके लौटे हैं. वे कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.

(सौ: भड़ास)

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मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल एकमुश्त बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं… मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल एकमुश्त बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं…(0)

करीब करीब हर बड़े मीडिया संस्थान ने मीडिया स्कूल खोल रखे हैं जिसका दिखावटी मकसद तो होता है, नए ट्रेंड पत्रकार और मीडियाकर्मी तैयार करना मगर पर्दे के पीछे यह मीडिया संस्थान बंधुआ मज़दूर हासिल कर रहे होते हैं और साथ ही यह मीडिया स्कूल नामक दुकाने लाखों रुपये बतौर फीस लेकर अपने संस्थानों के लिए आमदनी का अतिरिक्त ज़रिया बनती हैं. हालात इतने बुरे हैं कि लाखों रुपये खर्च कर इन मीडिया संस्थानों से प्रशिक्षण पाकर निकले युवाओं को खुद इनके मीडिया संस्थानों में भी नौकरी मिलना आसान नहीं होता जिसके चलते यह युवा बेरोज़गारी की ज़मात में शामिल हो जाते हैं…

-विनीत कुमार||

मीडिया महंत जब ये कहते हैं कि हम तो अच्छे पत्रकार खोजते रहते हैं लेकिन मिलते ही नहीं तो लगता है अपने ही सिर के बाल नोच लूं..

उनका निशाना आइआइएमसी, जामिया, डीयू और ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की तरफ होता है जहां वो खुद घुसने के लिए मार किए हुए हैं. अग्गा-पिच्छा करके डिग्रियां बटोरने में लगे हैं..भायजी, गोली मारिए इन संस्थानों को एक वक्त के लिए.

ये जो आपके मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपनी-अपनी मीडिया स्कूल की जो दूकानें खोल रखी हैं, वो आपके काम के नहीं हैं क्या ? कहां गया टीवीटीएमआई, ट्रेनिंग दोगे दर्जनों को और रखोगे कुल चार..सरकारी संस्थान अगर मीडियाकर्मी तैयार करने के नाम पर कबाड़ पैदा कर रहा है तो आपके यहां लाखों रुपये फीस देने के बाद प्रतिभाएं कबाड़ क्यों हो जा रही है, उन्हें मौका दो न सरजी.

मेनस्ट्रीम मीडिया के अखबारों औऱ चैनलों ने मीडिया स्कूल की जो दूकान खोली है, आप कोशिश करके एक सूची बनाएं कि अब तक किस संस्थान ने कितने छात्रों को मीडियाकर्मी की ट्रेनिंग दी है और उनमे से कितने लोगों को नौकरी पर रखा.आपको प्रोफशनलिज्म और हन्ड्रेड परसेंट प्लेसमेंट के बड़े-बड़े दावों के बीच का सच निकलकर सामने आ जाएगा.

आपको लगता है कि ये अखबार और टीवी चैनल के धंधे में लगे संस्थान जब मीडिया स्कूल नाम से दूसरी दूकान खोलते हैं तो प्रोफेशनल पैदा करते हैं जिन्हें खबर, कैमरे, प्रोडक्शन आदि की बेहतरीन समझ होती है.. वो क्या ट्रेनिंग देते हैं, ये तो हमें स्क्रीन और अखबार के पन्ने पर दिखाई देता ही है लेकिन वो एकमुश्त बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं. मसलन पिछले बैच में टीवी टुडे नेटवर्क ने कुल 35 लोगों को टीवीटीएमआई में दाखिला लिया और सिर्फ 4 लोगों को प्लेसमेंट दी. इस बार कुल 95 लोगों को लिया है, अभी उनके कोर्स शुरु होने के एक ही दिन हुए हैं कि वहां भी भारी छंटनी की संभावना जतानी शुरु हो गई है. ऐसे में इन 95 का क्या भविष्य है, आप समझ सकते हैं.

मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल अपने छात्रों को ट्रेनिंग और फर्स्ट हैंड एक्सपीरिएंस के नाम पर उन्हें बंधुआ मजदूर बनाकर छोड़ देते हैं. उनसे लाखों में फीस लेते हैं और आए दिन जो उनके कार्यक्रम होते हैं, अपने अखबार या चैनल की टीशर्ट पकड़ाकर जमकर काम लेते हैं. माफ कीजिएगा, इसमे सबसे ज्यादा बुरी हालत गर्ल्स स्टूडेंट की होती है. उनका काम आए अतिथियों, मंत्रियों को बुके देने, चाय-नाश्ते का इंतजाम करने और मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस आगे बढ़ाने से ज्यादा का नहीं होता. उनसे ऐसे कोई भी काम नहीं कराए जाते जो कि पत्रकारिता के हिस्से में आते हों और जो आगे चलकर उन्हें इसकी बारीक समझ विकसित करे. उन्हें प्रशिक्षु पत्रकार की नहीं, निजी कंपनी में रिस्पेशसनिस्ट या एटेंडर की ट्रेनिंग दी जाती है. ये काम तो वो स्कूल के ही दिनों से करती आयीं होती है और फिर इस तरह की सेवाटहल का काम तो सदियों से उसके जिम्मे में थोप दिया गया है.

जितने पैसे देकर लोग मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थानों की मीडिया दूकान में पत्रकार बनने की ट्रेनिंग लेते हैं, उसे अगर बैंक में जमा कर दें और सालभर किसी सरकारी संस्थान से पढ़ाई करें तो कोर्स खत्म होते-होते सिर्फ ब्याज के पैसे से एक ठीक-ठाक पत्रिका निकालने की हैसियत में होंगे.

(विनीत कुमार की फेसबुक वाल से)

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रिर्पोटर पुरुषोतम पर जानलेवा हमले के आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग… रिर्पोटर पुरुषोतम पर जानलेवा हमले के आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग…(0)

पिंकसिटी प्रेस क्लब अध्यक्ष नीरज मेहरा ने टाइम टी.वी. के रिर्पोटर पुरुषोतम पर कवरेज के दौरान जानलेवा हमले के आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग की है. मेहरा ने बताया कि पीड़ित जब पुरुषोतम रावतसर में कवरेज करने गए तब स्थानीय दबंगों ने उस पर जानलेवा हमला कर दिया और रिर्पोटर पुरूषौतम को इतनी बेरहमी से मारा जिससे उसकी स्थिति काफी गंभीर है.
पीड़ित पत्रकार कॉमा में है. जिनका इलाज बीकानेर के पीबीएम हॉस्पिटल में चल रहा है. पुलिस प्रशासन ने अब तक कोई कार्यवाही नही की. इस हमले से पत्रकार जगत में गहरा रोष है. मेहरा ने चेतावनी दी है कि यदि आरोपियों के विरूद्ध कार्यवाही नही की गई तो सरकार के विरूद्ध प्रदर्शन करेंगे.
मेहरा ने मुख्यमंत्री और गृह राज्यमंत्री वीरेन्द्र सिंह को पत्र लिखकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की है. आरोपियों को गिरफ्तार करने एवं पीड़ित का इलाज करने की उचित मांग की है.

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देश में जितना “आम आदमी” का शोषण, मीडिया में उतनी ही “आम पत्रकार” की दुर्गति… देश में जितना “आम आदमी” का शोषण, मीडिया में उतनी ही “आम पत्रकार” की दुर्गति…(3)

-अभिरंजन कुमार||

हम मीडिया वाले समूची दुनिया के शोषण के ख़िलाफ़ तो आवाज़ उठाते हैं, लेकिन अपने ही लोगों पर बड़े से बड़ा पहाड़ टूट जाने पर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है.

-टीवी 18 ग्रुप में इतनी बड़ी संख्या में पत्रकारों की छंटनी के बाद भी प्रतिरोध के स्वर छिटपुट हैं और वो भी ऐसे, जिनसे कुछ बदलने वाला नहीं है. कई मित्रों से बात हुई. वे कहते हैं कि अब दूसरा कोई काम करेंगे, लेकिन मीडिया में नहीं रहेंगे.

-पहले भी एनडीटीवी समेत कई बड़े चैनलों में छंटनी के कई दौर चले. कहीं से कोई आवाज़ नहीं उठी.

-वॉयस ऑफ इंडिया जैसे कितने चैनल खुले और बंद हो गए. कई साथियों का पैसा संभवत: अब तक अटका है.

-ज़्यादातर चैनलों में “स्ट्रिंगरों” का पैसा मार लेना तो फ़ैशन ही बन गया है. दुर्भाग्य यह है कि “स्ट्रिंगरों” के लिए कोई आवाज़ भी नहीं उठाता, जबकि वे मीडिया में सबसे पिछली कतार में खड़े हमारे वे भाई-बंधु हैं, जो देश के कोने-कोने से हमें रिपोर्ट्स लाकर देते हैं और पूंजीपतियों का मीडिया उन्हें प्रति स्टोरी भुगतान करता है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कई चैनलों में हमारे स्ट्रिंगर भाइयों को एक-एक डेढ़-डेढ़ साल से पैसा नहीं मिला है.

-पिछले कुछ साल में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कई चैनल अपने पत्रकारों से दिहाड़ी मज़दूरों से भी घटिया बर्ताव करते हैं. अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो उसकी सैलरी काट लेंगे. अगर किसी का एक्सीडेंट हो जाए, तो बिस्तर पर पड़े रहने की अवधि की सैलरी काट लेंगे. यानी जिन दिनों आपको सैलरी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, उन दिनों की सैलरी आपको नहीं मिलेगी. न कोई छुट्टी, न पीएफ, न ग्रेच्युटी, न किसी किस्म की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा.

-कई पत्रकारों की सैलरी मनरेगा मज़दूरों से भी कम है. बिहार में इस वक्त मनरेगा मज़दूर को 162 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जो 30 दिन के 4860 रुपये बनते हैं, लेकिन सभी चैनलों में आपको 3,000 रुपये महीना पाकर काम करने वाले पत्रकार मिल जाएंगे. इस 3,000 रुपये में भी उतने दिन की सैलरी काट ली जाती है, जितने दिन किसी भी वजह से वे काम नहीं करते हैं.

-मज़दूरों का शोषण बहुत है, फिर भी फ्री में काम करने वाला एक भी मज़दूर मैंने आज तक नहीं देखा. यहां तक कि अगर कोई नौसिखिया मज़दूर या बाल मज़दूर (बाल मज़दूरी अनैतिक और ग़ैरक़ानूनी है) भी है, तो भी उसे कुछ न कुछ पैसा ज़रूर मिलता है, लेकिन आपको कई मीडिया संस्थानों में ऐसे पत्रकार मिल जाएंगे, जो इंटर्नशिप के नाम पर छह-छह महीने से फ्री में काम कर रहे हैं. कई चैनलों ने तो यह फैशन ही बना लिया है कि फ्री के इंटर्न रखो और अपने बाकी कानूनी-ग़ैरकानूनी धंधों के सुरक्षा-कवच के तौर पर एक चलताऊ किस्म का चैनल चलाते रहो.

-कई चैनलों की समूची फंक्शनिंग इल्लीगल है. ये कर्मचारियों का पीएफ और टीडीएस काटते तो हैं, लेकिन संबंधित विभागों में जमा नहीं कराते. पूरा गोलमाल है और इन्हें कोई कुछ करता भी नहीं, क्योंकि ये मीडिया हाउस जो चलाते हैं! इनसे कौन पंगा लेगा?

-एक तरफ़ सरकारी मीडिया है, दूसरी तरफ़ पूंजीपतियों का मीडिया. आम पत्रकार के लिए कोई रास्ता नहीं. आगे कुआं, पीछे खाई. ज़ाहिर है, जैसे इस देश में हर जगह “आम आदमी” का शोषण है, वैसे ही हमारे मीडिया में “आम पत्रकार” की दुर्गति है.

-हालात ऐसे हैं कि हर पत्रकार अपनी जगह बचाने में जुटा है. भले ही इसके लिए किसी साथी पत्रकार की बलि क्यों न देनी पड़े.

-जनजागरण में मीडिया की ज़बर्दस्त भूमिका है और कभी-कभी लगता है कि आज की तारीख़ में इससे ज़्यादा पावरफुल कोई और नहीं. मीडिया चाहे तो देश के हुक्मरानों को घुटनों के बल ला खड़ा करे. पूरे देश का मीडिया एकजुट हो जाए, तो देश के हालात आज के आज बदल सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया एक गंदे धंधे में तब्दील होता जा रहा है.

ज़रा सोचिए, हम जो अपने लिए आवाज़ नहीं उठा सकते, वे दूसरों के लिए क्या कर सकते हैं? क्या नपुंसक मीडियाकर्मी इस देश को पुरुषार्थी बनाने के लिए संघर्ष करेंगे? देश के नागरिकों को न सिर्फ़ सियासत की सफ़ाई के लिए लामबंद होना है, बल्कि मीडिया की सफ़ाई के लिए भी आवाज़ उठाना होगा. क्या आप इसके लिए तैयार हैं?

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महंतों ने मीडिया के भीतर प्रतिरोध के स्वर को पूरी तरह कुचलने का काम किया है… महंतों ने मीडिया के भीतर प्रतिरोध के स्वर को पूरी तरह कुचलने का काम किया है…(3)

मुकेश अम्बानी के मीडिया समूह नेटवर्क 18 से सैंकड़ों पत्रकारों की छंटनी ने न केवल सभी मीडियाकर्मियों को सहमा दिया है बल्कि इस हादसे ने साबित कर दिया है कि किसी भी मीडिया संस्थान में कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित नहीं और अब पत्रकारिता को बतौर करियर चुनना महज़ बेवकूफी के सिवा कुछ भी नहीं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी बीओई से साढ़े सात सौ पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को एक मुश्त बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.  ताज्जुब तो इस बात का है कि मीडिया के कथित मठाधीश ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साध लेते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो. प्रख्यात मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने इस घटना पर अपनी फेसबुक वाल पर अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह व्यक्त की है..

-विनीत कुमार||

मीडिया के जो कभी बड़े चेहरे हुआ करते थे, अब वो भूतपूर्व पदों का भारी मुकुट लेकर जहां-तहां सेमिनारों की शोभा बढ़ाने का काम कर रहे हैं. वो कहीं संज्ञा, कहीं सर्वनाम तो कहीं वाक्य विन्यास बचाने/सहेजने की नसीहतें देते नजर आते हैं. वो हमारे नए मीडियाकर्मियों के रोल मॉडल बनने की कोशिश करते नजर आते हैं लेकिन बात जैसे ही पत्रकारिता पर आती है, मीडियाकर्मियों पर आती है, पता नहीं किस मानव हिन्दी व्याकरण और रचना की किताबों में खो जाते हैं. ये सवाल हमेशा की तरह मौजूद रहेगा- श्रीमान आप भाषा के नाम पर दरअसल बचाना क्या चाहते हैं ?

मीडिया एथिक्स पर जो जिस मासूमियत से बात की जाती है, वो दरअसल मुद्दों से लोगों को भटकाना है. सच तो ये है कि ढाई सौ से ज्यादा पत्रकार हैं जो कार्पोरेट के लिए काम करते हैं- पुण्य प्रसून वाजपेयी, वरिष्ठ टीवी एंकर, आजतक

आपको बीइए, एनबीए, एडिटर्स गिल्ड के दावे याद रहते हैं न ? वो हर हाल में पत्रकारिता बचाने का काम करते हैं. एश्वर्या राय बच्चन के मां बनने की खबर कितनी देर और कैसे चलेगी, निर्देश जारी करने का काम करते हैं. आत्महत्या के लिए उकसाने वाले मीडियाकर्मी को रातोंरात बचाने का काम कर सकते हैं. गोवाहाटी में यौन उत्पीड़न की मिनटों खड़े होकर फुटेज तैयार करनेवाले रिपोर्टर को नजरअंदाज करके बचा सकते हैं, उसे दोबारा नौकरी मिल जाने पर चुप मार सकते हैं. वो उमा खुराना फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के प्रकाश सिंह को बेरोजगार न होने देने से रोक सकते हैं. वो जी न्यूज के दागदार संपादक सुधीर चौधरी की घुड़की खाकर चुप्प मार सकते हैं..आप उनकी इन हरकतों से कन्फ्यूज हो जाते होंगे कि ये क्या नहीं कर सकते ? कन्फ्यूज मत होइए, ये मालिक की इच्छा और दागदार मीडियाकर्मियों को बचाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते. नहीं तो पहले आउटलुक और अब नेटवर्क 18 में जिस बेरहमी से छंटनी की गई, उस पर प्रेस रिलीज जारी नहीं करते.

हमारे हाथ बंधे हुए हैं, हम मालिकों के हाथों मजबूर हैं. कार्पोरेट पूरे मीडिया पर हावी है और उसे अपने तरीके से चलाना चाहता है. आप रिपोर्टस पर दवाब इसलिए देखते हैं क्योंकि संपादक फैसले नहीं ले सकता.- राजदीप सरदेसाई, एडिटर इन चीफ, नेटवर्क 18 (उदयन शर्मा स्मृति व्याख्यान में दिया गया वक्तव्य)

मीडिया को रेगुलेट करने की जब भी बात आती है, इस इन्डस्ट्री के एक से एक बड़े चेहरे सेल्फ रेगुलेशन का झंड़ा लेकर खड़े हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जिसके लिए लोग मां की कोख से ही पोप बनकर पैदा होते हैं और उन्हें भला कैसे रेगुलेट किया जा सकता है..लेकिन जब इस इन्डस्ट्री के भीतर यौन उत्पीड़न की घटना होती है, भारी छंटनी का काम होता है, ट्विट करके काम से बेदखल होने की खबर दी जाती है, कई दिनों तक नौकरी चली जाने के खौफ के साये में रखा जाता है..ये सारे झंडाबदार वीकएंड मनाने निकल जाते हैं..उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि जो धकिआया गया, उस पर क्या बीत रही होगी ?

ऐसे में ये कहना क्या गलत होगा कि सेल्फ रेगुलेशन का मतलब सिर्फ और सिर्फ मालिकों की आवाज बनकर लोगों को झांसा देना और किसी भी हाल में मीडिया को नियम और कायदे के तहत नहीं आने देना है. आपको बात बुरी लगे तो लगे नहीं, सेल्फ रेगुलेशन के नाम पर इन महंतों ने मीडिया के भीतर प्रतिरोध के स्वर को पूरी तरह कुचलने का काम किया है.

यकीन कीजिए, इन दिनों मीडिया में जो कुछ भी चल रहा है, उनसे गुजरते हुए मेरी मानसिक हालत ऐसी हो गई है कि लगता है उन तमाम मीडिया संस्थानों में जाउं, वहां पढ़ रहे मीडिया छात्रों को अपनी किताब मंडी में मीडिया जिसे लेकर मीडिया के बच्चे अक्सर मंहगी होने की शिकायत करते हैं, की मुफ्त प्रति दूं और कहूं- देखो, इस मीडिया के सच से एक बार गुजर जाओ. अपने को तैयार करो कि आगे क्या और कैसे करना है ? तुम हर सवाल के साथ- मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, ये मानवीय सरोकार का वाहक है, जनसंचार संस्कृत के चर धातु से निकला है जैसी दालमखनी बनाना बंद करो. इसे साहित्य के दरवाजे से गुजरने के बजाय, बिजनेस, इकॉनमिक्स, मैनेजमेंट, पॉलिटिक्स और पीआर के जरिए समझने की कोशिश करो. साहित्य से सिर्फ भाषा सीखो, बाकी सब इन विषयों से.

देशभर के मीडिया संस्थान जिन्होंने अपने पाठ्यक्रम में पत्रकारिता,मूल्य, मानवता, नैतिकता, सामाजिक विकास में धूप-अक्षत की तरह चिपकाकर रुपचंद मानस और हरीश अरोड़ा जैसे दर्जनों टंकणकारों के दुग्गी (अशोक प्रकाशन को कैंपस में दुग्गी कहते हैं) के लिए विशाल मार्केट तैयार का परिवेश रचते हैं, उन्हें पाठ्यक्रम में एक पेपर अनिवार्य रुप से एस्ट्रेस मैनेजमेंट शामिल करने चाहिए. वो इस पेपर के जरिए समझ सकेंगे कि जब बच्चा बीमार हो, पत्नी एक्सपेक्टेड हो, शादी होनेवाली हो, मां-बाबूजी कुछ दिन रहने साथ आनेवाले हों और इस बीच नौकरी चली जाए तो क्या करें ? माफ कीजिएगा, मैं गांधी, सोल,माइंड,हर्ट,पीस से अलग एक पेपर की बात कर रहा हूं.

पगला गए हो क्या, जिनकी नौकरी गई है वो तो एक शब्द लिख-बोल रहे ही नहीं है. सबके सब इस जुगाड़ में लगें हैं कि कैसे दूसरी जगह फिट हो जाएं तो तुम क्यों अपनी शाम खराब कर रहे हो ? इतनी खूबसूरत शाम है, सीपी जाओ, वर्कोज में चिल्ल आउट करो, तितलियां ताड़ो..बोक्का मानुष. आज के दिन भी यही सब लेकर बैठे हो.

सही बात है कि मीडिया के लोग इस घटना पर कुछ नहीं बोलेंगे, वो कार्पोरेट मजदूर बनकर रह गए हैं..लेकिन कई बार मजदूर भी तो अपनी बात नहीं करते, वो ठेकेदारों से पंगा लेने के बजाय कहीं और दीहाड़ी खोजने चले जाते हैं लेकिन तब हमारा खबर हर कीमत पर, आपको रखे आगे, सबसे तेज..उनके बारे में बात करते है न..सोशल मीडिया का काम बदलाव की चिंता के बजाए उन खबरों को सार्वजनिक करना तो है ही जो शादी-ब्याह,पार्टी-कॉकटेल से अलग फेसबुक और ट्विटर के बीच होने की मांग करते हैं.

कितना सुरक्षित है मीडिया कारोबार और कैसे बचेंगे मानव मूल्य ? कुछ नहीं तो पूरी उम्मीद है कि यूजीसी के लाखों रुपये अब देशभर के कॉलेजों और संस्थानों में होनेवाले मीडिया सेमिनारों पर खर्च होंगे, हजारों के फाइल फोल्डर बांटे जाएंगे, बच्चों से दो से तीन सौ रुपये लिए जाएंगे..शिक्षक इनमे मिले सर्टिफिकेट से अपनी इन्क्रीमेंट बढ़ा सकेंगे और आप देख लीजिएगा कल को उन्हीं मठाधीशों, महंतों को रजनीगंधा की लड़ियों से सम्मानित करते हुए इस पर दाल मखनी बनाने के लिए बुलाया जाएगा जो अभी इत्मिनान से बैठकर चुरुट सेवन कर रहे होंगे, अनार गोली खाकर हेवी लंच ठिकाने लगा रहे होंगे ताकि डिनर के लिए स्पेस क्रिएट हो सके.

(विनीत कुमार की फेसबुक वाल से)

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