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कारपोरेट मीडिया और खबरों की विश्वसनीयता..

-के.पी. सिंह||

मीडिया कारपोरेट हुआ तो एचआर पालिसी बनी जिसके मुख्य घटकों में ट्रेनिंग, ट्रांसफर, इन्क्रीमेंट व एलाउंस शामिल हैं. जिलों में पहले वहां के इतिहास, भूगोल से सुपरिचित संवाददाता कामयाब माने जाते थे लेकिन ट्रांसफर पालिसी के तहत तय हुआ कि जिले में बाहर से पत्रकार को भेजा जायेगा और वह भी मात्र दो तीन साल रहेगा. इसके बाद दूसरी जगह उसका तबादला कर दिया जायेगा. एचआर पालिसी की मजबूरी के साथ-साथ इस व्यवस्था के पीछे दलील यह थी कि पुराने खुर्राट पत्रकार अपने जिले में मठाधीश हो जाते हैं और अपने न्यस्त स्वार्थों के चश्मे से खबर को देखते हैं. बाहर का संवाददाता नियुक्त होगा तो इस तरह की तमाम गंदगियां दूर हो जायेंगी लेकिन यह सदाशयता खोखली साबित हुई.medialies_1

आज हालत यह है कि गैर जिले के संवाददाता की नियुक्ति के प्रयोग ने पेड न्यूज और ब्लैकमेलिंग की पराकाष्ठा कर दी है. जब लोकल का संवाददाता होता था तो उसे डर रहता था कि अगर उसने अपने यहां के किसी सफेदपोश का कालर उसकी जेब से कुछ ऐंठने के लिये खींचा तो वह बुरी तरह बदनाम हो जायेगा. इसलिये आसानी से ब्लैकमेलिंग करने का साहस उसे नहीं होता था. पुराने और लोकल पत्रकार की व्यक्तिगत इमेज भी थी जिसके कारण वह बेरोजगार और विकलांगों के संगठन तक से पैसे लेने की बात सोच भी नहीं सकता था.

दरअसल बाजारवाद औपनिवेशिक इरादों का नया रूप है और इसके काम करने के तरीके भी नये हैं. दूसरे देश को चारागाह के रूप में इस्तेमाल करने के लिये वहां उसके अपने विचार विवेक को समाप्त करना उपनिवेशवादी ताकतों का मुख्य लक्ष्य होता है. इसके तहत सबसे पहले बाजार ने शिक्षा प्रणाली को अनुकूल बनाया. आईआईटी और आईआईएम का ऐसा नशा नौनिहालों पर चढ़ाया कि वे तकनीकी शिक्षा में गर्क हो गये और मानविकी व समाज विज्ञान के विषयों का एक तरीके से उन्होंने परित्याग किया. इससे विचार विवेक शून्य पीढ़ी तैयार करने में उसे मदद मिली. बाजार इसे अपने तरीके से मोल्ड करने में कितना सफल है यह बताने के लिये कोई सबूत देने की जरूरत नहीं है. अभी तक पत्रकारिता में सामाजिक सरोकार की भावना जिंदा थी जो बाजार के लिये सबसे बड़ी बाधा थी. इस कारण पत्रकारिता को प्रतिबद्धता शून्य करने के लिये इसमें एचआर पालिसी लागू की गयी. भारत की वर्नाकुलर पत्रकारिता अंग्रेजी और विदेशी पत्रकारिता के उत्कृष्ट बाजारीय सिद्घान्तों से भी परे है. वहां यह माना जाता है कि जिला प्रमुख जैसी जिम्मेदारी निभाने वाला पत्रकार कंपनी का सबसे अहम ब्रांड एम्बेसडर है. इस कारण उसका चुनाव करते समय यह ध्यान रखने की जरूरत महसूस की जाती है कि वह औसत से अधिक बुद्धिमान हो और ऐसी इंटैलिजेंसीया के लिये पत्रकारिता वरेण्य हो.

इसके लिये समुचित वेतन और ईमानदारी से सारे भत्ते देने का प्रावधान रहता है लेकिन हिन्दी मीडिया हाउस मुनाफे का एक भी पैसा काम की गुणवत्ता के लिये खर्च नहीं करना चाहते. इस कारण वेतन देने में कंजूसी बरतते हैं और उनके यहां नयी पीढ़ी में वह पत्रकार बनता है जो सफाई कर्मचारी तक के इंटरव्यू में रिजेक्ट हो जाता है. यह पत्रकार अनुभवी भी नहीं होता क्योंकि अब जो ट्रेंड चला है उसमें 22 से 28 वर्ष की उम्र के लडक़े ही जिला प्रमुख बना दिये जाते हैं और 40 वर्ष होने के पहले ही वह संपादक बन जाता है.

आज के उपभोक्तावादी युग में आकांक्षायें पूरी करने के लिये नौजवान पहले दिन से ही किसी कीमत पर पैसा बनाने की भावना दिल में बसा लेते हैं और जिला प्रमुख बनने वाले नौजवान भी इसके अपवाद नहीं होते. नतीजतन आज कारपोरेट अखबारों के यह ब्रांड एम्बेसडर जिलों में किसी भी लोकलाज की परवाह न करते हुए खाकी को भी शर्मिंदा करने वाली बेशर्मी और बेहयायी से उगाही करने में लगे हैं. इससे पत्रकारिता का जो चेहरा आम समाज में पहचाना जा रहा है वह बेहद भ्रष्ट और ब्लैकमेलर का चेहरा है. जाहिर है कि अखबार या चैनल अपने नंबर को लेकर चाहे जो दावा करे लेकिन जब रिक्शा वाला तक यह कहने लगा कि पत्रकार चोर होते हैं तो अब खबरों की विश्वसनीयता क्या होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है. आज मीडिया में इस बात की चर्चा तो बहुत हो रही है कि मुनाफावाद के कारण सारे मूल्य मर्यादाओं को नष्ट किया जा रहा है लेकिन मीडिया यह नहीं बता रही कि इसमें सबसे बड़ा योगदान खुद उनका अपना है.

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उपजा का दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन 26-27 को इलाहाबाद में..

-आशीष वशिष्ठ||

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन (उपजा) का दो दिवसीय अधिवेशन आगामी 26 एवं 27 को इलाहाबाद में आयोजित होगा. अधिवेशन के दौरान प्रदेश कार्यकारिणी का द्विवार्षिक चुनाव भी संपन्न होगा.AA040013

उपजा के महामंत्री सर्वेश कुमार सिंह ने बताया कि, उपजा का दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन आगामी 26 एवं 27 अक्टूबर को इलाहाबाद के केपी कम्युनिटी सेन्टर (केपी इन्टर कालेज के बगल में), महात्मा गांधी मार्ग में संपन्न होगा. अधिवेशन का उद्घाटन 26 अक्टूबर को पूर्वान्ह 11 बजे हेागा व समापन 27 अक्टूबर को सांय चार बजे होगा. उपजा की प्रदेश कार्यकारिणी का द्विवार्षिक चुनाव 26 अक्टूबर को अपरान्ह भोजन के बाद होगा. चुनाव परिणाम की घोशणा 27 अक्टूबर को प्रथम सत्र में की जाएगी.

उपजा महामंत्री ने बताया कि, प्रादेशिक अधिवेशन में सम्मिलित होने हेतु प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारी एवं सदस्य, जिलाध्यक्ष, महामंत्री एवं समस्त डेलीगेट, एनयूजे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में निर्वाचित प्रदेश से पदाधिकारी एवं सदस्य आमंत्रित हैं. इनके अतिरिक्त भाग लेने के इच्छुक सदस्य विषेश आमंत्रित के रूप में भाग ले सकेंगे, किंतु इसके लिए प्रदेश अध्यक्ष एवं प्रदेश महामंत्री की पूर्व अनुमति आवष्यक है.

ज्ञातव्य है कि इस बार उपजा प्रदेश कार्यकारिणी में चुनाव होने जा रहे हैं. प्रदेश कार्यकारिणी में कुल 30 सदस्यों में से अध्यक्ष पद पर निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित का मनोनयन सर्वसम्मति से हो चुका है. प्रदेश कार्यकारिणी के षेश 29 पदों उपाध्यक्ष-5, महामंत्री-1, मंत्री-5, कोषाध्यक्ष-1 एवं 17 कार्यकारिणी सदस्यों के नामों पर आम सहमति नहीं बन पायी है जिनका चुनाव अधिवेशन के दौरान होगा. पिछली दफा समस्त पदों पर आम सहमति बन गयी थी लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है लगभग सभी पदों पर कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है. सूत्रों की मानें तो इस बार प्रदेश कार्यकारिणी में बड़ा उलटफेर होने की संभावना है.

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पत्रकार ने सच बोला तो मिली सजा ए मौत…

-अब्दुल रशीद||

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के सिपाही का जनसम्पर्क अधिकारी के सामने जहर खाकर पहुँचना और जहर खाने से पहले डी जी पी को अपने ख़ुदकुशी की जानकारी एसमएस के माध्यम से भेजना इस बात की तस्दीक करता है कि वह मरना नहीं चाहता था लेकिन उसके पास मौत के सिवा कोई विकल्प नहीं था.journalist_suicide

मध्य प्रदेश के मीडियाकर्मी व पी आई एल एक्टिविस्ट राजेन्द्र कुमार ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हड़पने वाले अफसरों का सच दुनियां के सामने लाना इतना बड़ा गुनाह हो गया कि उन्हें मौत को गले लगाने को विवश होना पड़ा और प्रदेश के सबसे सुरक्षित जगह पर और प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले को सूचना होने के बावजूद बचाया न जा सका. तो क्या मध्य प्रदेश में सच लिखने और सच उजागर करने वाले को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि उनकी हिफाजत करने वाला कोई नहीं? कहते है जनसम्पर्क मीडिया का अपना विभाग होता है जो मीडियाकर्मियों के सुख दुःख का ध्यान रखता है? लेकिन यह घटना तो कुछ और ही बयां करती है.

जानकारी के अनुसार मीडियाकर्मी राजेन्द्र कुमार (४८) पिता लालचंद निवासी अवधपुर ने मंगलवार को मंत्रालय पहुँच कर जहर खा लिया. जहर खाने से पहले अपने ख़ुदकुशी की सूचना डीजीपी नंदन दुबे और कुछ अन्य मीडियाकर्मियों को देने के साथ २३ पेज का सुसाइड नोट अपने सहयोगी को दे दिया था जिसमें ३३ अधिकारीयों को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया है. राजेन्द्र ने आरोप लगाया की इन अधिकारीयों की प्रताड़ना और आए दिन जान से मारने की धमकी से आजिज़ आ कर मौत को गले लगा रहा है. सुसाईड नोट में यह भी लिखा है की प्रताड़ना की शिकायत डीजीपी, आईजी और एसपी से भी की थी, पर किसी ने उनकी नहीं सुनी. अधिकारी राजेन्द्र के पीछे पड़े हुए थे और आए दिन जान से मारने की धमकी मिलती थी.

जहर खाने के बाद राजेन्द्र बल्लभ भवन के चौथी मंजिल पर स्थित प्रेस सचिव अशोक मनवानी के केबिन में पहुंचा और वहां उलटी करने लगा हालत बिगड़ती देख वहां उपस्थित अधिकारीयों ने पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी. आनन् फानन में पुलिस वहां पहुंची और वहां से जेपी अस्पताल ले गया. डॉक्टरो ने गंभीर हालत देख हमीदिया अस्पताल रेफर कर दिया जहाँ उसकी इहलीला समाप्त हो गई.

क्या लिखा था डीजीपी को भेजे एसमएस में

डीजीपी सर मैंने एससी के फर्जी जाति प्रमाण पत्र लगाकर सरकारी नौकरी हड़पने वाले २५० से अधिक लोगों के विरुद्ध हाईकोर्ट में पीआइएल ४७४३/०९ फाइल की है. इसमें डॉ शैलेन्द्र खामारा, अंकिता खामारा, रविन्द्र खामारा (३३लोग) आदिम जाति कल्याण विभाग के अतिरिक्त संचालक एसएस भंडारी की प्रताड़ना और धमकियों से तंग आकर सुसाइड कर रहा हूँ. ये लोग आठ साल से मुझे जान से मारने की धमकी दे रहें हैं. ये सभी मेरी सुसाईड के जिम्मेदार है. (मीडियाकर्मी व पी आई एल एक्टिविस्ट राजेन्द्र कुमार)

 

अब यह देखने वाली बात होगी के पत्रकार को मरने के लिए मजबूर करनेवाला मध्य प्रदेश प्रशासन अपने ही प्रशासन के खिलाफ कार्यवाही करता है या पत्रकार की मौत की खबर कागजों में समेट कर रद्दी की तरह फ़ेंक दिया जाता है.

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माल-ए-मुफ्त और मुफ्तखोर पत्रकार…

-डॉ. महर उद्दीन खां||

नेता और अफसर कुछ पत्रकारों को मुफ्तखोरी की ऐसी आदत डाल देते हैं कि वह अपने मित्रों को भी आसामी समझने लगते हैं. कई बार तो ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि बड़ी शर्म महसूस होती थी.मुम्बई की हवाई यात्रा में नाश्ता दिया गया. नाश्ते के बाद मेरे साथ बैठे पत्रकार ने प्लास्टिक की छुरी कांटे और चम्मच रूमाल से साफ कर अपनी जेब में रख लिए. मैं देख रहा था तो खिसियाने से हो कर बोले इनसे बच्चे खेलेंगे.freeloader1
ऐसे ही बनारस की यात्रा में विमान परिचारिका ट्रे में टाफियां ले कर आई. सब एक या दो टाफी उठा रहे थे. पास बैठे पत्रकार ने मुट्ठी भर टाफियां उठा लीं.परिचारिका एक क्षण ठिठकी और मुस्करा कर आगे बढ गई. साथी पत्रकार ने बड़े गर्व से कहा- जब बच्चों को बताया जाएगा कि ये हवाई जहाज की टाफियां हैं तो कितने खुश होंगे और अपने मित्रों को बताएंगे तो उन पर कितना रौब पड़ेगा.मैं शांत भाव से सुनता रहा.ऐसे ही इंदौर के एक होटल में एक एक कमरे में दो दो पत्रकार ठहराए गए थे.कमरे में इमरजेंसी के लिए एक हीटर जग, दूध ,चीनी के पाउच और चाय की डिप का प्रबंध था.दो दिन के प्रवास में कई बार इस सुविधा का उपयोग भी किया.चलते समय साथी ने चाय , चीनी और दूध के बचे हुए पाउच अपने बैग के हवाले कर लिए.मैंने मजाक में कहा यार ये जग भी रख लो काम आएगा.वह थोड़े शर्मिंदा तो हुए मगर बोले कुछ नहीं.

कई पत्रकारों का इगो बहुत नाजुक होता है जो जरा जरा सी बात पर हर्ट हो जाता है.ऐसा एक दिलचस्प मामला देखने को मिला आप भी आनंद लें. जी. एम. बनातवाला के मुस्लिम लीग का अघ्यक्ष बनने पर केरल का उनका एक सप्ताह का दौरा था. इसे कवर करने के लिए पत्रकारों की एक टीम सांसद इ. अहमद के साथ केरल जा रही थी. मुम्बई से कोझिकोड़ की उड़ान पकड़नी थी. मुम्बई की उड़ान लेट हो गई. खाना अगली उड़ान में मिलना था जो जा चुकी थी. भूख के मारे सब का बुरा हाल था. सांसद इ. अहमद कहीं से एक प्लेट में बटर सैंडविच का प्रबंध कर के लाए और सबको देने लगे. यह देख कर एक पत्रकार बिदक गए और कहने लगे कि यह हमारी तौहीन है जो इस तरह खड़े हो कर खाएं. उन्होंने सबसे कहा कि यह हमारे इगो का सवाल है, कोई नहीं खाएगा. मगर किसी ने उनकी बात नहीं मानी तो वह भन्ना कर बोले- आप हमें अपमानित करने के लिए लाए हैं. इ. अहमद शांत भाव से यह तमाशा देखते रहे.

खैर अगली फ्लाइट के लिए उन्होंने भाग दौड़ कर प्रबंध किया और सब कोझिकोड़ पहुंच गए. यहां पत्रकारों की देखभाल के लिए चंद्रिका के अहमद कुट्टी थे. सब को होटल में ले जाया गया और बताया कि नाश्ते के बाद एक सभा में चलना है. सबने भर पेट नाश्ता किया मगर इगो महाशय भन्नाते रहे. कुट्टी उनकी खुशामद कर रहे थे. मगर वह हठ किए थे कि उन्हें वापस भेज दिया जाए. मैं कुट्टी को एक ओर ले गया और कहा कि आप अधिक खुशामद न करें, ये वापस नही जाएंगे और जब भूख लगेगी तो खाना इन्हें खुद मना लेगा. यही हुआ भी. दस बजे के बाद जब लौटे तो सबसे पहले इन इगो महाशय ने ही खाने का आर्डर दिया. इस यात्रा में सबने इनका नाम ही इगो रख दिया था. ये महाशय रोजाना सवेरे 555 सिगरेट के दो पैकेट बैरे से मंगा लेते और उनमें से एक ही पी पाते. चलते समय इन्होंने तीन पैकेट मंगाए और बैग में रख लिए.

dmkअब सुनिए मुफ्त खोरी की एक और कहानी. दादरी की थोक सब्जी मंडी गांव के सामने है सवेरे के समय कुछ रिटेलर भी वहां बैठते हैं तो आस पास के लोग सब्जी लेने आ जाते हैं. मेरे घर से सब्जी मंडी पांच मिनट से कम के वाक पर है. सवेरे घूमने के साथ कभी कभी सब्जी मंडी से ताजा सब्जी भी ले आता था. उस दिन सड़क पार ही की थी कि एक मारूति वैन पास आ कर रुकी. तीन परिचित पत्रकार थे. अलीगढ़ के किसी कार्यक्रम से लौट रहे थे. दुआ सलाम के बाद मैंने सामने ही घर चलने का आग्रह किया आरै कहा कि चलिए सब्जी बाद में ले ली जाएगी. अरे नहीं, चलिए हम भी सब्जी मंडी देख लेते हैं.

उनके साथ अंदर गया. सब्जी खरीदी तो वह भी कहने लगे यार ताजा सब्जी है दिल्ली में यह कहां मिलती है सो उनके लिए भी एक एक किलो भिंडी, करेला और टमाटर तुलवा दिए. सब्जी वाला जानकार था. बोला डाक्टर साहब पैसे की चिंता न करें, आ जाएंगे. लौटते में गांव का ही एक आढती मिल गया. बोला चाचा आपके लिए एक पेटी आम रखा है बहुत मीठा और खुशबूदार है. उसने पेटी अपने लड़के को उठवा दी. वह पेटी बाहर रख कर चला गया. इस बीच एक ने आम उठा कर पहले सूंघा और फिर चूस कर बोला यार आम तो वाकई कमाल का है. ऐसा करते हैं, आप तो यहां रहते ही हैं, हम यह पेटी रख लेते हैं.इतना कह कर उन्होंने पेटी वैन में रखी और बिना हाथ मिलाए ही एक दम से फुर्र हो गए और आगे जा कर हाथ हिला कर विदा होने का नाटक करते चले गए. मैं सोचता ही रह गया कि इन्हें घर ले जाता तो सस्ते में ही छूट जाता.

(लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है: सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207)

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प्रमोद सिंह के बहाने मीडिया की पड़ताल…

ऐसे मीडिया की वजह से क्यूं मरे कोई…?

-निरंजन परिहार||
प्रमोद सिंह नहीं रहे. उन्होंने आत्महत्या कर ली. अपन सन्न हैं. सन्न इसलिए, क्योंकि प्रमोद सिंह जैसे प्रतिभाशाली रिपोर्टर के इस दुनिया से चले जाने के तरीके ने हम सबको एक बार फिर से मीडिया में हमारे काम, उस काम को करते रहने के तरीके, और उसकी जरूरत के साथ साथ जिंदगी के मुकाबले मीडिया की औकात के प्रति हमेशा सजग रहने के प्रति चिंतित करनेवाले सवाल खड़े कर दिये हैं.Pramod-Singh

जो लोग प्रमोद सिंह को जानते है, वे यह भी जानते हैं कि प्रमोद सिंह मीडिया में कोई इतने बड़े आदमी नहीं थे, कि उन पर मृत्यु लेख लिखे जाएं. लेकिन फिर भी लिखा जाना चाहिए. क्योंकि प्रमोद सिंह का जिंदगी से जाने का माहौल और तरीका दोनों, लिखे जाने के काबिल है. मौत वैसे भी कोई इतनी आसान चीज नहीं होती, जिस पर नहीं लिखा जाना चाहिए. फिर, यह तो एक पत्रकार की मौत है. पत्रकार, जिसे किसी भी सामान्य आदमी के मुकाबले आम तौर पर समझदार माना जाता है, समाज का पहरेदार कहा जाता है.

लेकिन मुश्किल यह है कि कोर्ट और अपराध कवर करने वाले जिन बहुत सारे पत्रकारों को अपन करीब से जानते हैं, उनमें काम का तो जज्बा तो बहुत दिखता है, लेकिन उसके उलट कुछेक को छोड़ दें, तो ज्यादातर लोगों में व्यक्तिगत जीवन के प्रति गंभीरता न के बराबर दिखाई देती है. या यूं कहा जा सकता है कि वे काम की गहराइयों को छूने की कोशिश में अपराधियों तक से भी निजी रिश्ते बनाने के लिए बहुत गहरे उतर जाने की वजह से जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. इसी वजह से उनके जीवन में एक खास किस्म का अवसाद भी घर कर जाता है, जो धीरे धीरे जिंदगी पर काल बनकर छा जाता है. फिर जीवन के रहने और न रहने के बीच कोई खास फर्क ही नहीं लगता. जीवन के अर्थ के मुकाबले निरर्थकता ज्यादा भाने लगती है. यही वजह है कि खेल, फिल्म, व्यापार, राजनीति, और बाकी काम करनेवाले पत्रकारों के मुकाबले अपराध करनेवाले पत्रकारों में फ्रस्ट्रेशन बहुत ज्यादा दिखाई देता है. फिर जिंदगी का एक सीधा सादा गणित यह भी है कि जो काम आप रोज देखते रहते हैं, उसी में आपको ज्यादा आसानी लगती है. सो अपराध कवर करनेवाले पत्रकारों को मौत भी आसान रास्ते के रूप में दिखाई देती है. पिछले दस सालों में पत्रकारों की आत्महत्या और अकाल मौत के अलावा उनके अपराध में लिप्त होने की जो खबरे आई हैं, उनमें सबसे ज्यादा लोग वे हैं, जो अपराध कवर करते रहे हैं. कोर्ट और अपराध कवर करते करते हम लोग खुद भी कब उसी मानसिकता के हो जाते हैं, यह कोई नहीं जानता.

दरअसल, प्रमोद सिंह नाराज थे. उन लोगों से, जिनने प्रमोद सिंह की खबरों के जरिये अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया, और जब मदद करने की बारी आई, तो हाथ खड़े कर दिए. मुंबई के बहुत सारे पत्रकार जानते हैं कि प्रमोद सिंह ने सबकी मदद की, लेकिन उनको काम देने की बारी आई, तो उन लोगों में से किसी ने उनकी मदद नहीं की, काम भी नहीं दिया. वे लोग उनके फोन भी नहीं उठाते थे. अपनों के ही इस कदर बेगाना हो जाने के अवसाद ने प्रमोद सिंह को लील लिया. उन की आत्महत्या से अपन भी दुखी हैं. आहत भी हैं. और चिंतित भी. उन्होंने अपने पास काम किया है. वे लगनशील थे और मेहनती भी. ऐसे प्रमोद सिंह की आत्महत्या के बाद यह समझ में आता है कि पत्रकारिता की हमारी दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो देह त्यागने के बाद के जीवन को न जानने के अज्ञानी हैं. हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि जिंदगी है, तो ही सब कुछ है. जिंदगी है तो कुछ भी किया जा सकता है, लेकिन जब जिंदगी ही नहीं, तो कोई किसी के लिए कुछ भी नहीं कर सकता. सिवाय रोने के.

प्रमोद सिंह सिर्फ 33 साल के ही थे. विनम्र थे. मुंबई में अपराध के बढ़िया रिपोर्टर थे. और इंसान होने के तौर पर भी ठीक ठाक ही थे. ठीक ठाक इसलिए, क्योंकि आमतौर पर अपराध की रिपोर्टिंग करनेवाले जहां दो चार खबरों के बाद ही अपने आप को तुर्रमखां समझने लगते हैं, उनको अगर टुच्चा कहा जाए, तो उनके मुकाबले प्रमोद सिंह बहुत ऊंचे आदमी थे. न कोई घमंड और न कोई दर्प. लेकिन मीडिया, और खासकर अपराध कवर करने के काम में यह ऊंचापन कब जिंदगी को अंदर से खोखला कर देता है, यह समझने की जरूरत है. प्रमोद सिंह यह नहीं जानते थे. इसीलिए खुद ही अपनी जिंदगी को खा गए. आत्महत्या कर ली. वे कोई दस साल मे इस पेशे में थे, और जैसा कि हमारे बाजार में चैनलों के खुलने और बंद होने का हाल है, उन्होंने जितने साल काम किया उतने ही साल घर भी बैठे रहे. वैसे, प्रमोद सिंह उन लोगों में नहीं थे, जो रोजमर्रा की अपराध की खबरें कवर करके भी खुद ही वाहवाहियां लेने की कोशिश में अपनी पीठ थापथपाते रहते हैं. वे गहरे आदमी थे. और लगता है कि अपनी जिंदगी की गहराइयों में वे इतने गहरे उतर गए थे कि वापस उबर ही नहीं पाए. वे खुद्दार थे.
हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि हमारा काम हमारे जीने और जीवन को जीतने का साधन रहे, तब तक तो ठीक, लेकिन वही काम जब मौत का कारण बनकर सामने आने लगे, तो उस काम के बारे में पुनर्विचार करना बहुत जायज हो जाता है. मीडिया वैसे भी अब कोई पहले जितना बहुत इज्जतदार काम नहीं रह गया है.

ज्ञान प्राप्ति के साधन के रूप में तो मीडिया ने बहुत पहले ही अपनी साख खो दी थी. सूचनाएं देने में भी बहुत ज्यादा घालमेल होने की वजह से अब यह जानकारी के माध्यम के रूप में भी अपनी साख खोता जा रहा है. अब मीडिया सिर्फ और सिर्फ व्यापार है. सर्वशुद्ध व्यापार. जिसे जिंदगी की कीमत पर भी सिर्फ अपने मुनाफे की पड़ी रहती है. जितना बड़ा ब्रांड, उतना ही बड़ा धंधा. धंधा करनेवालों और धंधेवालियों की वैसे भी कोई औकात नहीं मानी जाती. शायद यही वजह है कि मीडिया के भी धंधा बन जाने के बाद बाजार में अब मीडिया की औकात नपने लगी है. किसी को बुरा लगे, तो अपने जूते पर, लेकिन ऐसे धंधे के लिए कोई अपनी जिंदगी को क्यों स्वाहा करें, यह सबसे बड़ा सवाल है.
(लेखक राजनीतिक विशेलेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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