Subscribe to RSS
कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

Posts tagged as: पुलिस back to homepage

औपनिवेशक कानूनों का अब तक जारी रहना आखिर क्या दर्शाता है… औपनिवेशक कानूनों का अब तक जारी रहना आखिर क्या दर्शाता है…(0)

-शैलेन्द्र चौहान||

आजादी के बाद से ही भारतीय लोकतंत्र में लोक की यह अपेक्षा रही है कि यहां के लोगों/नागरिकों को सही सुरक्षा और न्याय मिले. आम भारतीय पर्याप्त लंबे समय से न्यायपालिका और पुलिस जिन्हें औपनिवेशिक व्यवस्था में शासन का अंग माना गया था, दोनों ही संस्थानों से आतंकित और हताश है. आज समाज की संवेदनहीनता के कारण आज दुर्घटना और हिंसक अपराधों के पीड़ित दम तोडते रहते हैं. उनकी सहायता करने से तथाकथित सभ्य लोग कतराते हैं. वह इस कारण नहीं कि हम अमानवीय हैं परन्तु इस उत्पीडन कारी आपराधिक न्याय संस्थान व पुलिस के भय के कारण. भारत के आम नागरिक न्यायपालिका और पुलिस की उस कार्य संस्कृति से पूरी तरह से भयभीत हैं जो उसे औपनिवेशिक युग से विरासत में प्राप्त हुई है. इसलिए वे औरों के दुःख-तकलीफ में असंवेदनशील हैं. आज भी देश के करोड़ों भारतीय नागरिकों को शासन का उपेक्षापूर्ण रवैया और अकूत शक्ति अति भयभीत कर रही हैं.

न्यायपालिका लोकतान्त्रिक मूल्यों को नए ढंग से परिभाषित करने के स्थान पर औपनिवेशिक संस्था की तरह तत्कालीन प्रोटोकोल और परम्पराओं को ही आगे बढ़ा रही है और आम आदमी का संस्थागत न्यायिक विलम्ब के निर्बाध कुचक्र के माध्यम से उसका आर्थिक शोषण कर कर रही है. काले कोट वाले अधिवक्ता और पैरवीकार मात्र हानिकारक भ्रष्टाचार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं, जनता का शोषण कर रहे हैं. यह सब पुलिस, प्रशासन और न्याय तंत्र के औपनिवेशिक नजरिये के कारण ही हो रहा है. औपनिवेशिक काले कानूनों और उनकी भाषा का अब तक जारी रहना करोड़ों भारतीयों के लिए आज भी एक सवाल है अतः भारतीय समाज और समुदाय का लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ टकराव जारी है. इन औपनिवेशिक काले कानूनों के माध्यम से किया जाने वाला तथाकथित न्याय हमारे सामाजिक तानेबाने से नहीं निकला है अपितु वह सत्रहवीं और अठारवीं सदी के यूरोप की उपज है जो कि कानून और न्याय के नाम पर बड़ी संख्या में मानवजाति को गुलाम बनाने की पश्चिमी सामाजिक रणनीति रही है. ये समस्त कानून भारतीयों पर थोपे गए एकतरफा अनुबंध मात्र हैं जो प्रभावशाली लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के सिद्धांत पर राज्य की स्थापना करते हैं. पुलिस की ओर से आनेवाली गोलियों को आज भी विशेष संरक्षण प्राप्त है. भारतीय शासकवर्ग इसे बरकरार रखे हुए है, क्यों ? यह लज्जाजनक है.

दुर्भाग्य यह भी है कि आम लोगों को ऐसी भाषा में न्याय दिया जा रहा है जिसे वे जानते ही नहीं हैं. इंग्लॅण्ड में इतालवी या हिंदी भाषा में न्याय देने का दुस्साहस नहीं किया जा सकता किन्तु भारत में 66 वर्षों से यह सब कुछ जारी है. क्योंकि 2 फरवरी 1835 को थोमस बैबंगटन मैकाले ने यह ईजाद किया था कि हमें एक ऐसा वर्ग तैयार करने का भरसक प्रयास करना है जो हमारे और करोड़ों भारतीयों के बीच अनुवादक का कार्य कर सके जिन पर हम शासन करते रहें – एक ऐसा वर्ग जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो परन्तु विचारों, नैतिकता और रूचि से अंग्रेज हो. आज की भारतीय न्याय व्यवस्था मैकाले के सपनों को साकार करने में ही अपना योग कर रही है. आज भी भारतीय न्याय प्रणाली काले उपनिवेशवादी कानूनों, प्रोटोकोल और परम्पराओं को जारी रखे हुए है जिनमें एक गरीब न्यायार्थी की स्थिति मात्र किसी लाचार गुलाम जैसी होकर रह जाती है. अत्याचारी सत्ता, प्रशासन, पुलिस, जो चाहे अत्याचार कर सकते हैं व निर्भीक होकर हत्याएं करा सकते है. ऐसी सभी मनमानी हत्याओं को एक सुरक्षा के आवरण में ढंक दिया जाता है, जैसा कि ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों में लगातार देखा जा रहा है. अफसोस कि इस अन्याय और अत्याचार को न्याय और कानून के समक्ष समानता और लोकतंत्र कहा जाता है. क्या अब छियासठ वर्ष बाद भी इस बात की आवश्यकता नहीं है इस दूषित आपराधिक पुलिस तंत्र और न्याय व्यवस्था को भारतीयों के सम्मान और अस्मिता का ध्यान में रखते हुए तदनुसार बदल दिया जाये? वे भी स्वतंत्रता का अहसास कर सकें. समानता और लोक तंत्र पर विश्वास कर सकें. लेकिन जब यह सब सायास हो रहा हो तो हम ऐसी उम्मीद भी कैसे कर सकते हैं.

आज इस बात की जरूरत है कि आम भारतीय को सत्य की पहचान करनी चाहिए. इस उपनिवेशवादी-मुकदमेबाजी उद्योग की चक्की में पिसते जाने का उसे भरपूर विरोध करना चाहिए ताकि सम्मानपूर्ण जीवन जिया जा सके. स्वतंत्र भारत के सम्पूर्ण काल का जिक्र करना यहां बेमानी हो जाता है जब मात्र 1990 से लेकर 2007 तक के बीच करीब 17000 हजार आरोपी व्यक्ति, यदि पुलिस की अन्य ज्यादतियों और यातनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो प्रतिदिन औसतन 3 व्यक्ति पुलिस हिरासत में मर जाते हैं और एकाध अपवाद छोड़कर शायद ही किसी पुलिसवाले का बाल भी बांका होता हो. यहाँ तक कि यदि प्रमाण स्वरूप घटना का वीडियो भी उपलब्ध करा दिया जाये तो भी पुलिस का कुछ नहीं बिगडता क्योंकि हमारी आपराधिक राजनीति की तासीर और संस्कृति भी वही है जो अंग्रेज आततायियों की थी. आखिर पुलिस अंग्रेजी शासनकाल से आम भारतीयों के दमन और शोषण का एक अचूक हथियार है. हम यह भलीभांति जानते हैं कि पुलिस कोई स्वायत्त संस्था या इकाई नहीं है उसकी मानसिकता शासक वर्ग की मानसिकता का ही प्रतिरूप है. लेकिन अब बहुत हो चुका, अब हमारी इस विकृत, लोकतंत्र  विरोधी और अनुपयुक्त प्रणाली में तुरंत परिवर्तन करने की महती आवश्यकता है. उन समस्त उपनिवेशवादी काले कानूनों और परम्पराओं की पहचान कर निरस्त किया जाना चाहिए जो वर्ग भेद करते हैं व कानून में विश्वास करने वालों में भय उत्पन्न करने वाली पैशाचिक शक्ति और छवि का प्रदर्शन करते हैं और अपराधियों को प्रेरित-पोषित करते हैं.

आज राष्ट्रद्रोह-कानून को चंद सत्ताधारियों की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता जो अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठने वाले स्वरों को दबाने कुचलने लिए जनविरोधी उपनिवेशवादी कानून का उपयोग करते हों. उन सभी उपनिवेशवादी कानूनों के अंतर्गत संज्ञान लिया जाना बंद होना चाहिए जिनका निर्माण शासक वर्ग द्वारा शोषण और अत्याचारों के विरुद्ध उठने वाले विरोधी स्वरों को दबाने के लिए किया जाता है. विशेषतया दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 46, 129, 144, 197 आदि, और वे सब उधर लिए विशेष कानून जो मुट्ठी भर जनविरोधी सत्ताधारियों ने लोगों की स्वतन्त्रता और समानता छीनने के लिए बनाये हों. एक लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्य के ऐसे पक्षपाती आपराधिक कानून कभी भी लोक की सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकते बल्कि वे विशेष लोगों के हित में ही उपयोग में किये जाते हैं. अब तक औपनिवेशक कानूनों का जारी रहना हमारी शोषक और जनविरोधी मानसिकता का प्रतीक हो सकता है.

संबंधित खबरें:

अम्बेडकरनगर में बुर्कापोश महिला पाकेटमार सक्रिय… अम्बेडकरनगर में बुर्कापोश महिला पाकेटमार सक्रिय…(0)

रिक्शा एवं टैक्सी-टैम्पो सवारियों को बनाती हैं निशाना

-रीता विश्वकर्मा||

अम्बेडकरनगर। होशियार! खबरदार! बुर्कापोश पाकेट मारों से वर्ना आप की पाकेट से बटुआ और बड़े बैग में से पैसों से भरा पर्स पलक झपकते ही गायब हो जाएगा फिर आप इस करिश्मे से आश्चर्य चकित होकर हाथ मलते रह जाएँगे। जी हाँ यह एक दम सोलह आने सच बात है। लगभग एक दशक से बुर्कापोश पाकेटमार अकबरपुर, शहजादपुर उपनगरों से लेकर जिला मुख्यालय स्थित कचेहरी, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति, धरना-प्रदर्शन स्थल, जिला अस्पताल, विकास भवन, जिला पंचायत कार्यालय, तहसील एवं जनपद न्यायालय परिसर, कलेक्ट्रेट के बाहर अपने मालदार, शिकार की टोह में प्रत्येक दिन टैम्पो, रिक्शा स्टैण्ड के आस-पास मंडराते रहते हैं।
इनके पाकेट मारने की स्टाइल अजीब सी है। एक दम विशुद्ध अहिंसात्मक तरीका अपना कर ये बुर्कापोश महिलाएँ अपने शिकार को हलाल कर देती हैं, जिसका दर्द लुटे-पिटे लोग अपने घर एवं बसेरों पर पहुँचकर महसूस करते हैं। यदि आप मालदार आसामी है और रिक्शे से अकेले जा रहे हैं तब ये बुर्कापोश रिक्शा रूकवाकर गन्तव्य तक चलने को कहेंगी। आप भी रिक्शे का आधा किराया बचत करने के चक्कर में इन्हें अपने बगल बिठा लेंगे। आप के गन्तव्य आने से पहले ही इन बुर्काधारी पाकेटमार महिलाएँ द्वारा रिक्शा रूकवाकर उतर जाती हैं और रिक्शा चालक को आधा किराया देकर देखते ही देखते अदृश्य हो जाती हैं और आप बेखौफ इस बात से अंजान बने अपने गन्तव्य को चल पड़ते हैं।
जब आप का डेस्टिनेशन आता है तो पता चलता है कि रिक्शेवाले का किराया कैसे दें? क्योंकि पाकेट, बैग में रखा पैसों वाला पर्स/बटुआ तो बगल बैठा बुर्कापोश सहयात्री ले उड़ा होता है। येने केन प्रकारेण आप अन्य जान पहचान वालों से पैसे लेकर रिक्शे का किराया अदा करते हैं। यदि आप पैसे वाले हैं चाहे स्त्री हों या पुरूष टैम्पो पर बैठे हुए गन्तव्य को जा रहे हैं तो झट से ये बुर्कापोश नमूदार होकर आप की बगल में बैठ जाएँगे फिर ये बुर्कापोश हाथ के करिश्मे से आपका पर्स पार करके बीच में ही उतर जाएँगी। आप को तब पता चलेगा जब टेम्पों का किराया देने के लिए आप अपने बैग में रखे पैसे वाला पर्स ढूंढेगे तब आपको जान पहचान वालों पैसे लेकर टैम्पों का किराया अदा करना पड़ेगा क्योंकि आपकी पॉकेट तो मर ली गयी होगी।
इस तरह के ‘बुर्कापोश‘ पाकेटमारों की सक्रियता थाना कोतवाली अकबरपुर क्षेत्र में एक दशक से है, लेकिन अभी तक पुलिस क्यों नहीं ध्यान दे रही है इसका उत्तर कुछ यूँ हो सकता है- पहला यह कि जब तक इस तरह के पाकेटमारों के शिकार वादी बनकर थाना पुलिस को तहरीर नहीं देंगे तब तक पुलिस कार्रवाई कैसे करे। दूसरा यह कि रिक्शा, टैम्पो चालक, क्लीनर पुलिस और इन पाकेटमारों का ‘याराना‘ होगा इसीलिए बुर्काधारी पाकेटमार अपने कार्य को अंजाम देकर पैसों की आपसी बाँट करते हैं।
यह तो रही बुर्कापोश पाकेटमारों के विषय में संक्षिप्त बात। प्रेस/मीडिया से भला ये क्यों अछूते हैं या प्रेस/मीडिया वाले इससे क्यों अंजान है? सीधी सी बात है पी फॉर पाकेटमार, पी फॉर पुलिस और पी फॉर प्रेस तब भला ऐसे में किस प्रेस/मीडिया वाले को पड़ी है कि वह बुर्कापोश पाकेटमारों की सक्रियता पर विशेष ध्यान दे। धार्मिक स्थलों, मनोरंजन केन्द्रों, पार्कों, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन, स्टापेज, टैम्पो स्टैण्ड, बैंकों के इर्द-गिर्द भी ऐसे राहजन पाकेटअ मार अपनी कारगुजारी से लोगों की जेबें ढीली कर दे रहे हैं। दो चार लाइनें अखबारों में छप गईं बस। प्रेस मीडिया इसे बड़ा क्राइम नहीं मानता ऐसे संवादों के प्रकाशन से उनका सर्कुलेशन और टी.आर.पी. नहीं बढ़ने वाला।
बहरहाल कुछ भी हो यदि पुलिस महकमा इस तरह की कथित छोटी वारदातों की तरफ गम्भीरता से ध्यान दे तो बड़ी वारदातों पर भी नियंत्रण लग सकता है। चोरी, पाकेटमारी, राहजनी, जहरखुरानी आदि जैसे अपराधों को जब तक हल्का लिया जाएगा तब तक बड़े और जघन्य अपराध पर काबू नहीं पाया जा सकेगा। क्योंकि अपराधियों को पुलिस का भय जब तक नहीं सतायेगा, अपराधों पर नियंत्रण लगना मुश्किल ही होगा। यह कोई भाषण नहीं, कोई प्रवचन नहीं अपितु नेकनीयती से यह आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि जिले के पुलिस महकमें के जिम्मेदार, कर्मठ अधिकारी, कर्मचारी सक्रिय होकर यदि किसी एक बुर्कापोश पाकेटमार को धर दबोचें तो बहुत बड़े आपराधिक गिरोह का पर्दाफाश हो सकता है।
इस सक्रिय बुर्कापोश पाकेटमार गिरोह की धरपकड़ के लिए नागरिक पुलिस को रिक्शा चालक, टैक्सी, टैम्पो चालक, क्लीनर, ड्यूटी पर तैनात यातायात पुलिस कर्मियों पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी पड़ेगी। बुर्कापोश पाकेटमारों के इस एपीसोड को अन्तिम टच देने के पूर्व थोड़ा सा और जो लिखना लाजमी हो जाता है वह यह कि ये एपीसोड काल्पनिक नहीं है, इस संवाद को विषय वस्तु बनाने के लिए ऐसे कई भुक्तभोगियों की व्यथा कथा को हर ‘ऐंगिल‘ से जाँचा परखा गया है। ये लोग बुर्काधारी पाकेटमारो, उचक्कों, राहजनों के शिकार तो हुए हैं, लेकिन पुलिस उनकी बात पर विश्वास नहीं करेगी ऐसा मानकर चुप्पी साधे हमारे दफ्तर में मिलकर अपनी पीड़ा को व्यक्त किया फलतः यह बुर्काधारी पाकेटमार एपीसोड वजूद में आया।

संबंधित खबरें:

मोटरसाईकिल पर स्टंट कर रहे युवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, एक युवक की मौत.. मोटरसाईकिल पर स्टंट कर रहे युवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, एक युवक की मौत..(3)

राजधानी के वीवीआइपी इलाके में शनिवार स्टंट कर रहे युवकों पर पुलिस ने गोली चला दी जिसमें एक युवक की मौत हो गई और एक अन्य घायल हो गया जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

जानकारी के अनुसार, अशोका रोड चौराहे के समीप पांच सितारा होटल ली मेरीडियन इलाके में देर रात स्टंट कर रहे बाइकर्स पर पुलिस फायरिंग में बाइक पर पीछे बैठे करन पांडेय की मौत हो गई और ड्राइव कर रहे पुनीत शर्मा घायल हो गया. उसे राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है. दोनों मालवीय नगर के रहने वाले बताए जा रहे हैं.

पुलिस सूत्रों ने बताया कि घटना रात डेढ़ से दो बजे के बीच उस समय हुई जब सड़कों पर बाइकरों का एक समूह पुलिस अधिकारियों से भिड़ गया और पथराव कर दिया. पुलिस अधिकारियों ने बताया कि बाइक का टायर पंचर करने के लिए चलाई गई गोली से युवक की मौत हुई. गोली उसकी पीठ में लगी थी. सूत्रों ने बताया कि अस्पताल में जांच में पाया गया कि दोनों युवकों ने शराब पी रखी थी.

पुलिस को खबर मिली थी कि ली मेरीडियन इलाके में कई बाइकर्स खतरनाक स्टंट कर रहे हैं. जब पुलिस उन्हें रोकने के लिए पहुंची और स्टंट करने से रोका तो भागते हुए बाइकर्स पथराव करने लगे जिसमें पुलिस वाहन क्षतिग्रस्त हो गया. पुलिस के अनुसार बाइकर्स को तितर-बितर करने के लिए हवा में कुछ गोलियां चलाई गई. लेकिन जब वे लगातार स्टंट करते रहे तो एक पुलिस अधिकारी ने एक बाइक का टायर पंचर करने के लिए गोली चलाई जो दुर्घटनावश पांडेय की पीठ में जा लगी. घटना में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं.

संबंधित खबरें:

भारत में लगभग सभी सरकारी संगठन पुलिस थाने के समान ही तो हैं भारत में लगभग सभी सरकारी संगठन पुलिस थाने के समान ही तो हैं(3)

-मनीराम शर्मा||

प्राय: अखबारों की सुर्ख़ियों में ख़बरें रहती हैं कि अमुक अपराध में पुलिस ने एफ़ आई आर नहीं लिखी  और अपराधियों को बचाया है. पुलिस का कहना होता है कि कुछ लोग व्यक्तिगत रंजिशवश झूठी एफ़ आई आर लिखवाते हैं और इससे उनके इलाके में अपराध के आंकड़े अनावश्यक ही बढ़ जाते हैं जिससे उनकी रिपोर्ट खराब होती है और कई बार तो विधान-सभाओं तक में सवाल-जवाब होते हैं. इस कारण चुनिन्दा मामलों में (सभी में नहीं) पुलिस बहाना बनाती है कि वे मामले की पहले जांच करके ही रिपोर्ट लिखेगी. आम नागरिक के मन में यह धारणा गहरी बैठ जाती है कि पुलिस निक्कमी और भ्रष्ट है. अत: कानून की पालना नहीं करती व जनता की रक्षा नहीं करती. किन्तु वास्तविक स्थिति क्या है यह तो गहराई में जाकर शासन के विभिन्न अंगों का चरित्र-पुराण खंगालने से ही पता लगेगा कि इस महान भारत भूमि पर कौन भ्रष्ट व निक्कमा नहीं.  

सर्वप्रथम उच्चतम न्यायालय को ही परखते हैं जिसने एफ आई आर के विषय में विभिन्न विरोधाभासी निर्णय देकर पुलिस को एफ़ आई आर लिखने से मना करने के लिए बल प्रदान किया है. कहानी मात्र यहीं पूर्ण नहीं होती अपितु उच्चतम न्यायालय ने अपने कार्यकरण के विषय में “ए हैण्ड बुक ऑफ़ इनफोर्मेशन” नामक एक पुस्तिका जारी की है, जिसके पृष्ट 52 पर यह उल्लेख है कि एफ़ आई आर से मनाही के शिकायती पत्र को लेटर पिटीशन मानकर रिट दर्ज की जावेगी किन्तु वास्तव में उच्चतम न्यायालय में इस परिधि में आने वाले पत्रों को भी रिट की तरह दर्ज नहीं किया जाता है अपितु डाकघर की भांति ऐसी शिकायत को उसी आरोपित पुलिस अधिकारी को अग्रेषित मात्र कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी जाती है. जबकि ऐसा कोई प्रावधान इस पुस्तिका में नहीं है. यह मात्र साधारण मामलों में ही नहीं अपितु भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में भी होता है. जिसे देखकर कई बार यह  लगता है कि देश में न्याय और कानून तो एक सपना मात्र है और देश की न्याय व्यवस्था बेरोजगारी दूर करने के लिए संचालित एक विशुद्ध वाणिज्यिक उपक्रम है. अब निचले स्तर पर कोई मजिस्ट्रेट यदि उच्चतम न्यायालय का अनुसरण  करते हुए कानून का उल्लंघन कर यही सुगम मार्ग अपनाए तो उसे दोष किस प्रकार दिया जा सकता है.

हमारी न्याय प्रणाली मूलत: इंग्लॅण्ड की व्यवस्था पर आधारित है किन्तु हमने  इसे समसामयिक नहीं बनाया है और देश की जनता को गलत पाठ पढ़ाया जा रहा है कि न्यायपालिका सर्वोच्च है. इसके विपरीत इंग्लॅण्ड में “न्यायिक पुनरीक्षा आयोग” कार्यरत है जो किसी भी न्यायालय में विचाराधीन अथवा निर्णित मामले में हस्तक्षेप कर सकता है और अन्याय होने का उसे विश्वास होने पर उचित राहत भी दे सकता है.  ऐसी व्यवस्था भारत में भी लागू की जा सकती है, विशेषकर तब जब न्यायपालिका को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा हो. अभी हाल ही में यह कहा गया है कि तेजाब के लिए लाइसेंस लागू कर दिया जाये किन्तु लाइसेंस तो हथियारों और विस्फोटकों के लिए भी आवश्यक  है, क्या इससे रक्तपात रुक गया है अथवा स्वयं पुलिस और सेना ये वस्तुएं अपराधियों को उपलब्ध नहीं करवा रही हैं. वास्तव में भारत में कड़े कानून बनाने का अर्थ भ्रष्ट लोकसेवकों की अपराधियों के साथ मोलभाव की शक्ति को बढ़ाना मात्र है, किसी अपराध पर नियंत्रण करना नहीं है.

संविधान के अनुच्छेद 350 में जनता को अपने चुने गए प्रतिनिधियों और विधायिकाओं को अपनी व्यथा निवेदन करने का अधिकार है और यह अपेक्षित है कि जनप्रतिनिधि इन व्यथाओं पर गुणदोष के आधार पर निर्णय लें. जब जन प्रतिनिधि प्रश्न पूछने के लिए ही धन लेते हों तो फिर बिना धनवाली (अर्थहीन) जनव्यथा को सदन में उठाने की उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती. विधायिकाओं की स्थिति में इन व्यथाओं पर निर्णय का अधिकार अध्यक्ष को दिया गया है किन्तु इन व्यथाओं को विधायिकाओं में याचिकाओं के रूप में विधिवत दर्ज किये बिना निचले स्तर पर सचिव ही निरस्त कर देते हैं और इसी प्रकार मंत्रालयों में भी सम्बन्धित मंत्री के ध्यान में लाये बिना नीतिगत मामलों की जन परिवेदनाओं को भी रोजमर्रा के मामले की तरह सचिवों द्वारा ही निरस्त कर दिया जाता है.  इससे यह झूठी रंगीन छवि प्रस्तुत की जाती है कि मंत्रालय में कोई परिवेदना बकाया नहीं है अथवा शीघ्र निस्तारण कर दिया जाता है.

इस प्रकार हमारा लोकतंत्र एक खाली डिब्बा-दिखावे से अधिक कुछ नहीं है. जब किसी मामले पर जनता उद्वेलित होती है तो तुष्टिकरण की कूटनीति अपनाते हुए किसी कमेटी या आयोग का गठन कर दिया जाता है और उसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट कालान्तर में कूड़ेदान की शोभा बढ़ाती है. देश का अकेला विधि आयोग ही वर्ष में औसतन 4 रिपोर्टें दे रहा है और सरकार को एक रिपोर्ट पर कार्यवाही करने में औसतन 10 वर्ष लगे रहें हैं. इसी दर से अब तक प्रस्तुत 250 रिपोर्टों पर अगले 2500 वर्षों में कार्यवाही हो पाएगी और तब तक परिस्थितियाँ और परिदृश्य ही बदल चुका होगा तथा वे सभी रिपोर्टें अप्रासंगिक रह जाएँगी. यह हमारे लोकतंत्र की गति और प्रगति (अथवा दुर्गति) है. जिसमें जब तक प्रत्येक लोक सेवक की स्पष्ट जिम्मेदारी तय करने वाला कानून लागू नहीं होगा, संविधान सहित सभी अन्य कानून मात्र कागजी ही रहेंगे और जनता इस भूल-भूलैया में चक्कर खाती रहेगी .

अभी सूचना का अधिकार अधिनियम के विषय में भी सरकार बड़ी वाह-वाही लूटने का प्रयास कर रही है और कुछ अपरिपक्व बुद्धिवाले नागरिक भी इस कानून को एक मील के पत्थर के रूप में महिमा मंडित कर रहे हैं. यह सही है कि इस अधिनियम के बाद सरकारी मशीनरी ने कागजों को संभालना शुरू कर दिया है किन्तु इससे अधिक कुछ नहीं हुआ है. लगभग एक हजार आवेदन के बाद मेरा विचार है कि आम नागरिक को मात्र पंद्रह प्रतिशत मामलों में ही वांछित सूचनाएं मिलती हैं और शेष मामलों में कोई सूचना नहीं मिलती चाहे किसी स्तर पर अपील दाखिल कर दें. प्रभावशाली लोग तो वैध या अवैध ढंग से पहले भी सूचनाएं लेते रहे हैं व आज भी ले रहे हैं. अधिनियम के प्रभाव से नागरिकों को कागज तो खूब मिलते हैं पर उनमें उपयोगी सूचनाएं अधिक नहीं होती हैं. अधिनियम में तीस दिन में सूचना देने की कल्पना की गयी थी किन्तु सूचना नहीं देने पर कई महीनों तक आयोगों में मामले दर्ज ही नहीं किये जाते हैं और निर्णय आने में वर्षों लग जाते हैं. पुलिस थानों की ही भांति सूचना आयोगों का भी विचार है कि मामले तुरंत दर्ज करने पर उनके पास बकाया मामलों का अम्बार दिखाई देगा. अत: मामलों को दर्ज नहीं करके आयोग की झूठी सुन्दर और लोकलुभावन छवि पेश की जाये कि आयोग में बहुत कम मामले बकाया हैं और आयोग दक्षता पूर्वक कार्य कर रहा है. अब विद्वान् पाठकगण स्वयं निर्णय करें कि देश में विधायिका, न्यायपालिका अथवा कार्यपालिका में से कौनसा ऐसा तंत्र है जो मनमर्जी नहीं कर रहा अर्थात पुलिस थाने की तरह व्यवहार नहीं कर रहा है. मेरे विचार से तो सभी शक्तिसंपन्न लोग लोकतंत्र रुपी द्रोपदी का चीर हरने के लिए आतुर हैं.

 

संबंधित खबरें:

नक्सलवाद का नया अध्याय, कौन है लाल आतंक का ज़िम्मेवार…? नक्सलवाद का नया अध्याय, कौन है लाल आतंक का ज़िम्मेवार…?(0)

-फाल्गुनी सरकार||

कहते हैं हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. जब देश के बड़े-बड़े विद्वान छत्तीसगढ़ के दरभा में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए नक्सली हमले की कड़े शब्दों में निन्दा कर रहे थे, उस समय मैं प्रदेश की एक आम नागरिक इसके दूसरे पहलू पर सोच रही थी. आगे कुछ भी लिखने से पहले मैं ये स्पष्ट कर देना चाहूंगी कि सभी मृतकों और उनके परिजनों के प्रति मेरी भी उतनी ही संवेदना है जो किसी भी अन्य आमजन की है. संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार का बड़े ही सावधानी और थोड़े डर के साथ उपयोग करते हुए कुछ लिखने का प्रयास कर रही हूं. प्रार्थना कीजिए कि मैं किसी भी कांग्रेसी या अन्य के कोप का शिकार न बनूं.

अब तक के नक्सल इतिहास में मरने वालों की सूची में नक्सली, सेना के जवान, पुलिस, आदिवासी महिला, पुरूष, वृद्ध तथा बच्चों का ही नाम रहा. हां, कुछ नाकाम हमलों का इतिहास भी रहा है. पर 25 मई 2013 का दिन इस इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब बाकि सबको छोडक़र सिर्फ राजनेताओं और सक्रिय राजनीति के नक्सल विरोधियों पर निशाना साधा गया. इससे एक बात तो साफ हो गई कि दुनिया गोल है जिस कारण विष का प्रवाह घूमकर वापस अपने प्रणेता के पास लौट आया है. हर कहर अपना रंग दिखाता ही है और राजनीति से ऊपजे कहर ने भी अपने लाल आतंक का रंग दिखा दिया है. ऐसा भी हो सकता है कि शायद नक्सलियों को परिवर्तन यात्रा का अर्थ नहीं पता था क्योंकि उनके जीवन में तो परिवर्तन होता ही नहीं. हम शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वैश्वीकरण और ना जाने कितनी थ्योरियों की बात करते हैं पर आदिवासी आज भी जीवन के मूल संसाधनों से वंचित हैं. ना इंफ्रास्ट्रक्चर, ना बिजली, ना शिक्षा, ना स्वस्थ्य सुविधा. तन ढक़ना भी मुश्किल होता है इन लोगों के लिए, वहां अगर कुछ है तो सिर्फ शोषण, तस्करी, बंदूक का डर और करोड़ों के वादों का अम्बार. जहां सीआरपीएफ के जवान मलेरिया से ग्रस्त हैं और गांवों में शोषण कर रहे हैं, बेगुनाहों पर बंदूक का कहर बरपा रहे हैं, ऐसे राज्य और उनकी व्यवस्था का और कितना बखान करूं. नक्सलवाद की लड़ाई उनके जन, जंगल, जमीन, रीति-रिवाज़ और उनके अस्तित्व की लड़ाई है. जिसे नष्ट करने की चेष्टा इसी राजनीति ने की है. घटना के चश्मदीद डॉ. सत्यनारायण दुबे के अनुसार सलवा जुडूम के जनक महेंद्र कर्मा ने भी स्वयं यही किया है. वे भी बातचीत नहीं बल्कि मार-काट के समर्थक थे.

इस हमले में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मारा गया जो नक्सली हिट लिस्ट में नहीं था. करीब 120 लोगों की इस परिवर्तन यात्रा पर उससे कई गुणा ज्यादा नक्सलियों ने हमला किया और सैंकड़ों राऊन्ड गोली चलायी लेकिन मरने वालों की संख्या 30 थी. हां, घायलों की एक अलग संख्या थी क्योंकि गोली का कोई मज़हब नहीं होता. डॉ. सत्यनारायण दुबे के अनुसार महिला नक्सलियों ने घायलों की पट्टी की, दर्द कम करने के लिए उन्हें इंजेक्शन लगाया, पीने के लिए उन्हें मिनरल वाटर दिया और कईयों की जान बचाई. अब यह समझना इतना मुश्किल नहीं है कि इस नक्सली हमले से क्या संदेश दिया गया है?

आज राजनीति में आमजन की कोई अहमियत नहीं रह गई है. ज्यादा पीछे ना जाते हुए बताना चाहूंगी कि इस नक्सली वारदात के कुछ समय पहले ही छत्तीसगढ़ के ही एडसमेटा गांव में ऐसा ही कुछ हुआ था जिसमें जवानों ने ऐसी ही नक्सली वारदात को अंजाम दिया था और गांव के सभी पुरूषों को नक्सली बताकर उनकी हत्या कर दी थी. उस समय ना ही प्रधानमंत्री आहत हुए थे, न सोनिया गांधी की आंखें नम हुईं थी. और दरभा में हुयी 30 मौतों को लोकतंत्र पर हमला करार दे दिया गया. बंद का आह्वान कर दिया गया. क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं? शायद हमें लोकतंत्र को दोबारा परिभाषित करने की आवश्यकता है.

जब आदिवासियों पर ज़ुल्म होते हैं तो उनकी दास्तान अंधेरी गलियों में चीख-चीखकर दम तोड़ देते हैं पर मीडिया की सुर्खी नहीं बन पाते. और जब वहीं आधुनिक हथियार, लैपटॉप, टेबलेट, फस्र्ट ऐड और जंगल में मिनरल वाटर की बॉटल लेकर इस तबाही का कर्ज़ा चुकाते हैं तो उन्हें आतंकवादी कहकर चेतावनी दी जाती है. इस घटना में एक और चर्चा का विषय रहा और वो था बड़ी तादाद में महिला नक्सलियों का इस वारदात में शामिल होना. तो क्या महिला केवल शोषण के लिए ही उचित समझी जानी चाहिए. आज उसने बंदूक उठा ली तो हल्ला हो गया. कल तक वो मर-मरकर जीती रही तो सब चुप थे. वैसे जैसी उठा-पटक दरभा की वारदात के बाद देखने को मिली उसका अगर पच्चीस फीसद भी जवानों के द्वारा गांव वालों की नृशंस हत्या के बाद एडसमेटा में हुआ होता तो शायद ये खूनी खेल टल सकता था. उम्मीद है कि कांग्रेसियों की यह शहादत बेकार नहीं जाएगी और उनकी ये परिवर्तन यात्रा एक नई शुरूआत होगी जो राजनीति से ऊपर उठकर मानवतावाद पर केंद्रित होगी. नक्सली कोई दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं. वे आदिवासी ही हैं जिन्होंने शिक्षा की बज़ाय  तीर-धनुष ग्रहण कर युद्ध कला का प्रशिक्षण लिया है और अपनी जंग लड़ रहे हैं. दु:ख की बात ये है कि इस लड़ाई में दोनों ही छोर पर भारतीय हैं जो एक दूसरे से लड़ रहे हैं. ऐसे में देश की सीमा के सिकुडऩे की खबर भी सुर्ख़ियों में है. पर हम बेबस हैं. अपने घर को संभाल नहीं पा रहे हैं तो पड़ोस के विवाद को कैसे निपटाए? इसमें कोई दो राय नहीं कि नक्सलवाद के चादर के नीचे कुछ लोग आतंक का विस्तार भी कर रहे हैं. आखिर आतंक ही तो वो बाज़ार है जहां हथियारों का व्यापार फलेगा-फूलेगा. और ये तो होना ही था.

संबंधित खबरें:

चलो वह पत्रकार है ना, तो उसे मार डालो – अफसर और दबंग नेताओं के शिकंजे में फंसा पत्रकार चलो वह पत्रकार है ना, तो उसे मार डालो – अफसर और दबंग नेताओं के शिकंजे में फंसा पत्रकार(0)

निकाय चुनाव में मतदान के दौरान भदोही के जिलाधिकारी ने एक मतदाता को सरेआम थप्पड़ मार दिया. मौके पर मौजूद एक पत्रकार ने इस घटना को अपने कैमरे में कैच किया, तो डीएम साहब भड़क गये. मौजूद थानाध्यक्ष को ललकार कर उन्हों ने पत्रकार को दबोचा और जमकर पीटने के बाद थाने के हवालात में बंद कर दिया. इसके बाद इस पत्रकार को पहले तो शहर-बदर किया गया और फिर उसे जान से मारने की साजिशें की जा रही हैं.

यह मामला है भदोही के सुरेश गांधी का. सुरेश पिछले करीब 15 बरसों से दैनिक हिन्दुस्तान, जन संदेश टाइम्स, आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत रहे हैं. सुरेश का आरोप है कि भदोही कोतवाल संजयनाथ तिवारी सहित पुलिस कर्मी मेरे व मेरे परिवार की हत्या करवा देना चाहते है. इन्हें सपा के बाहुबली विधायक विजय मिश्रा व मेरे विरोधी गुलाम रसुल सहित कई अन्य का संरक्षण प्राप्त है. इनकी शिकायत मुख्य मंत्री से लेकर कई सम्बन्धित सचिवो, अफसरो, व मंत्रियों से की लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है.

सुरेश गांधी का कहना है कि वे भदोही के समाजिक सरोकारो जुडी खबरों के साथ-साथ गरीब-दलितो व पीडितो को आवाज को प्रमुखता से उठाने व समय-समय पर न सिर्फ सडी-गली प्रशासनिक व्यवस्था व उनकी जादतियों व खामियों को उजागर करनें के साथ ही सत्ता के जनप्रतिनिधियों के काले कारनामों को भी जनता के बीच खबरों के जरिये अवगत कराते हैं. बकौल सुरेश गांधी:- इन्हीं मेरी गलतियों से कुपित होकर भदोही के प्रशासनिक अफसर व बाहुबली विधायक मेरे विरोधियों के साजिंश में आकर कोतवाल थाना-भदोही संजयनाथ तिवारी ने पहले गुण्डा एक्ट की कार्यवाही की बाद में तत्कालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी ने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अशोक शुक्ला की रिपोर्ट पर जिला बदर कर दिया. जबकि जिन 15 साल पुराने मुकदमों को आधार बनाकर कार्यवाही की गयी है उसमें मुझे न्यायालय से दोषमुक्त किया गया है या पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगा दी हैं.

मामला यह है कि जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी गत 2012 जून में नगर निकाय चुनाव के दौरान भदोही के एम.ए.समद इण्टर कालेज बूथ पर धाधॅली व फर्जी मतदान को रोकने पहुंचे थे. उसी दौरान जिलाधिकारी ने लाइन में खडे एक युवक को थप्पड मार दिया जिसकी मैंने फोटो खीच ली. फोटो खिचते ही उनकी नजर पड गयी और बुलाकर पहले परिचय पूछा परिचय बताने के बाद भी बगल में खडे पुलिस अधीक्षक अशोक शुक्ला को निर्देश दिया कि इसे गिरफतार कर लों. उनके द्वारा कई बार निर्देश दिये जाने के वावजूद पुलिस ने गिरफतार नहीं किया और कहा कि गांधीजी जनपद के अच्छे पत्रकारों में से है फोटो अभी डिलिट करवा देता हॅूं. एस. पी. के कहने पर मेरा मोबाइल कैमरा लेकर पुलिस ने फोटो डिलिट कर दी. इसके बावजूद भी जिलाधिकारी मेरी गिरफतारी के लिये अडे रहे लेकिन मौका देखकर में वहां से हट लिया और दूसरे दिन अपने समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स में खबर छपी कि ‘‘लोकतंत्र के पर्व पर दिनभर हाफता रहा तंत्र, एम.ए. समद बूथ पर अपनी नाकामीयों पर बौखलाये डी.एम.‘‘ खबर पढ कर डी.एम खिसिया उठे और मेरे मोबाइल पर फोन पर सूचना अधिकारी से कहलवाया की डीएम से पंगा महॅगा पडेगा और तभी से डी. एम. नाराज रहने लगें.

गत नवम्बर 2012 में मोहर्रम पर्व के दौरान 20 नवम्बर को दरोपुर व घमहापुर में ताजिया रास्ते विवाद को लेकर उपजे विवाद के मामले में लोगों से पूछॅताछ कर खबर छापी थी ताजिया मार्ग को लेकर घमहापुर में तनाव. इस खबर पढने के बाद पुलिस अधीक्षक अशोक शुक्ला ने मेरे मोबाइल पर फोन किया कि जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी आप से काफी नाराज हैं. तनाव की खबर क्यों छपी है मैंने बताया कि स्थानिय लोगो के आक्रोश व बातचीत पर खबर छपी फिर भी आप का भी पक्ष छपेगा घन्टे भर बाद फिर से फोन कर एस. पी शुक्ला ने बताया कि कोतवाली ने दोनो पक्षो को बुलाकर सुलह समझौता करा लिया गया है अब विवाद नहीं है. एस.पी. के हवाले से दूसरे दिन खबर छपी की मोहल्ले में तनाव नही है विवाद सुलझा. 25 नवम्बर को मोहर्रम के दिन ग्यारह बजे दरोपुर में रास्ता विवाद को लेकर ही डी.एम., एस.पी. की मौजूदगी में जमकर ईट-पत्थर व फायरिंग जिसमें विधायक जाहिद बेग सहित कई घायल हो गये. लोगो ने बताया कि अगर डी.एम. यह न कहते कि सडक तुम्हारे बाप की है क्या सडक मेरी है और मै जिधर से चाहूंगा ताजिया उसी रास्ते ले जाने दूंगा, तो उपद्रव न होता. दूसरे दिन फिर खबर छपी की आखिर चौकन्ना क्यों नहीं रहा प्रशासन, सुलझा था तो उलझा कैसे, साजिश के तहत भडकाई गयी हिंसा, हिंसा के लिए डीएम, एसपी जिम्मेदार-महमूद आदि खबरों से डी.एम. कुपित हो गये.

तीन महिने बाद कोतवाल संजयनाथ तिवारी को संजिश में लेकर पहले गुंडा एक्ट की रिपोर्ट एस.पी. को प्रेषित की और एस. पी. की रिपोर्ट पर डी.एम. ने 25 मार्च को डी. एम. ने नोटिस जारी करायी और चार अप्रैल को अपना पक्ष रखने का मौका दिया. मेरे विद्वान अधिवक्ता द्वारा पे्रषित की गयी आवेदन व दलीलो को सुने वगैर 9 अपे्रैल को जिलाबदर की कार्यवाही करने के बाद पूरे शहर में डुगडुगी बजवाकर मुझे चोर उच्चका, डकैत, माफिया आदि शब्दो से अपमानित कराया गया उसके बाद मेरे मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता आदि निवासी काजीपुर रोड, भदोही पर दबाव बनाकर कोतवाल संजयनाथ तिवारी 23 मार्च 2013 को रात 8.30 बजे मु0 अ0 सं0-337/2013, धारा-452, 386, 323, 504, 506 आई.पी.सी. के तहत फर्जी तरीके से पुलिसिया भाषा में रपट दर्ज करा दी. मेरे खिलाफ यह रपट तब दर्ज की गयी जब मैंने 23 मोर्च 2013 को दोपहर में उप-जिलामजिस्ट्रेट न्यायालय में कोतवाल संजयनाथ तिवारी द्वारा प्रेषित धारा-110 जाब्ता फौजदारी की मनगंढत आरोपों जिसमें मैं न्यायालय से दोषमुक्त हॅू या पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगायी है पर अपनी आपत्ति दाखिल कर दी. दोषमुक्त मामले में मेरे द्वारा जनसूचना अधिकार के तहत मांगी गयी रिपोर्ट में खुद एएसपी. ने तीनो आरोपो में दोषमुक्त की बात कही है. कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने अपनी झूठी आरोपों को साबित करने के लिये मकान मालिक की रिपोर्ट दर्ज की.

फिलहाल डी.एम., एस. पी. व कोतवाल सहित मकान मालिक की झूठी रपट में उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खण्ड पीठ ने न सिर्फ 20 मई 2013 के आदेश में डी.एम. द्वारा की गयी जिला बदर की कार्यवाही पर रोक लगा दी बल्कि मकान मालिक की एफ.आई.आर. में भी उच्च न्यायालय के आदेश पर 13 जून 2013 को जिला न्यायालय ने 25 जून तक के लिए अन्तरिम जमानत दे दी लेकिन मुझे बरबाद कर देने पर तुले कोतवाल संजयनाथ तिवारी पहले जिला बदर की कार्यवाही के दौरान बाहर था तो मकान मालिक को उकसाकर ओैर षडयंत्र में शामिल कर 07 मई 2013 को आलमारी में रखें नगदी समेत जेवरात आदि लूटवा दी. 20 मई 2013 को डी. एम. के जिलाबदर के आदेश पर उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाने की खबर सुनने के बाद 01 जून 2013 को दुबारा मकान मालिक को उकसा कर कमरे का ताला तोडवाकर घर में पन्द्रह सालों से तिनका तिनका जुटा कर रखें लाखों के गृहस्थी के सामान व कम्प्यूटर, कैमरा, मूबी कैमरा, जेवर आदि लूटवा दी. इन सारे धटना क्रमों की मेरे व मेरी पत्नी रश्मि गांधी द्वारा कोतवाली सहित डीएम व एसपी सहित मुख्यमंत्री, प्रमुख गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, आईजी, डीआईजी आदि को रजिस्टर्ड पत्र भेजवायी लेकिन सुनवाई नहीं हुई. इसके पहले मेरी पत्नी 10 मई को खुद पुलिस अधीक्षक से मिलकर घटनी की तहरीर दी लेकिन जांच कराने का आश्वासन देकर लौटा दिया गया लेकिन अभी तक सुनवाई नही हुयी.

इसके अलावा तथ्यों पर आधारित खबरें न प्रकाशन हो, बाहुबली विधायक विजय मिश्रा की शह पर जिले में चल रहे अवैध खनन सडक निर्माध में धांधली व जगह जगह रंगदारी वसूलने जैसी घटनाओं का पर्दाफाश न हो और ब्लाक प्रमुख सहित कई चुनाव ने बरती गयी धांधली व पूर्वान्चल के इनामी माफियाओ की खबरें न छपे इसके लिए बाहुबली विधायक व ब्लाक प्रमुख के इशारों पर पुलिसिया उत्पीडन करायी जा रही है. इसी के तहत कोतवाल संजयनाथ तिवारी हर सीमा लांघ कर 14 जून 2013 को कोतवाल व उसके दर्जनभर दरोगा व सिपाहियों ने न सिर्फ मारापिटा बल्कि घसीटते हुऐ कोतवाली ले जाते समय जमकर मारापीटा भद्दी-भद्दी गालियां दीं और कहा पुलिस पर फायर किया है गोली मिस हो गयी, साले को पुलिस पर हमला करने के आरोप में जेल भेज दो, गांजा, अफीम व चरस में रपट दर्ज करो जिससे जेल में ही सड जाय.

इतना ही नही कोतवाली के अन्दर न सिर्फ मेरा बाल उखाडा गया बल्कि पैर में कील ठोककर जख्मों पर नमक छिडका गया. मै कराहता रहा लेकिन बेरहम कोतवाल व सिपाहियों ने लगातार लाठियां बरसायी. उसके अलावा कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने धमकी दी की अगर मेरा टान्सफर भी हो जायेगा तो किसी भी जनपद में रहकर वहा के घटना क्रमो में मुल्जिम बनाकर जेल भेज दूंगा या तो वहां के अपराधियों को भेजकर तुम्हारे व तुम्हारे परिवार की हत्या करवा दूंगा. शुक्र है कि मेरे गिरफतारी की सूचना मेरी पत्नि को समय पर मिल गयी और उनके द्वारा समाचार पत्र कार्यालय सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों व मंत्रियों से गुहार लगाने के बाद डीजीपी. के हस्तक्षेप पर रात नौ बजे यह कह कर छोड दिया कि सुरेश गांधी को पूछॅताछ के लिए लाया गया था कोई रिपोर्ट दर्ज नही है इन्हें छोडा जा रहा है. इस दौरान पुलिस ने मेरा मेडिकल भी सही तरीके से नही होने दिया सिर्फ मामूली जख्म दिखकर रिपोर्ट लगवा दी. कोतवाल ने कहा कि अगर ज्यादा जख्म दिखा दूंगा तो फिर मैं नहीं छोड पाउॅगा.

लेकिन 16 जून को न्यायालय द्वारा पता चला कि मेरे खिलाफ मुकदमा अपराध संख्या-144/13, धारा-332, 353, 504, आई.पी.सी. के तहत रपट दर्ज की गई. भदोही में आंतक के पर्याय बने कोतवाल संजयनाथ तिवारी को बाहुबली विधायक विजय मिश्रा का संरक्षण प्राप्त है उन्ही के इसारे पर जब जिसे चाहा कोतवाल मारपिट कर बेईज्जत कर रपट लिख देते है . मै अकेला ही नही उनके आंतक से भदोही के कई पत्रकार व सम्भ्रांत नागरिक उत्पीडन के शिकार है वर्तमान में भदोही में इमर्जेन्सी जैसा माहौल है खास बात यह है कि कोतवाल के सात माह के कार्यकाल में कई अपराधिक घटनाये हुई लेकिन एक भी घटना का पर्दाफाश नही हुआ और न ही कोई एक अपराधी पकडा गया लेकिन सम्भ्रान्त नागरिकों पर गुण्डा एक्ट व उत्पीडन की कार्यवाही होती रही. मेरे व मेरे परिवार की हत्या करा देने पर आमदा कोतवाल न सिर्फ मुझे बेघर कर दर दर की ठोकरे खाने को मजवूर कर दिया है बल्कि सेंट मैरिज स्कूल नई बाजार में पढ रहे दो बच्चे साहिल गांधी कक्षा-6 व सेजल गांधी कक्षा-10 की भी पढाई लिखाई चौपट हो रही है बच्चे स्कूल नही जा पा रहे है मेरे साथ साथ मेरे बच्चों का भविष्य चैपट हो रहा है. इसकी गुहार मैने सभी आयोग काउंसिल व प्रशासनिक अफसरों से की है लेकिन सुनवाई नही हो सकी.

निवेदन है कि कोतवाल संजयनाथ तिवारी व उनके हमराही दरोगा के खिलाफ कार्यवाही कर बर्खास्त करने के साथ ही बाहुबली विधायक विजय मिश्रा व विरोधी गुलाम रसूल आदि के आंतक से निजात ले सकें. और मेरे व मेरी पत्नी सहित बच्चों के जानमाल की रक्षा व परिवार का गुजर बसर हो सकें. और मै स्वतंत्र रूप से रहकर अपनी पत्रकारिता करने के साथ ही मासूम बच्चों की पढाई लिखाई कराकर उनका भविष्य बना सकूं.

(वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की फेसबुक वाल से)

संबंधित खबरें:

पुलिस हिंसा और भ्रष्टाचार की बुनियाद अंग्रेजी साक्ष्य कानून पुलिस हिंसा और भ्रष्टाचार की बुनियाद अंग्रेजी साक्ष्य कानून(0)

-मणिराम शर्मा||

ब्रिटिश साम्राज्य के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए गवर्नर जनरल ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 बनाया था| यह स्वस्प्ष्ट है कि राज सिंहासन पर बैठे लोग ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि थे और उनका उद्देश्य कानून बनाकर जनता को न्याय सुनिश्चित करना नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना और उसकी पकड को मजबूत बनाए रखना था| आज भी हमारे देश में यही न्याय प्रणाली-परिपाटी प्रचलित है| आज भी देश के न्यायिक अधिकारी, अर्द्ध-पुलिस अधिकारी की तरह व्यवहार करते हैं और गिरफ्तारी का औचित्य ठहराने के लिए वे कहते हैं कि जहां अभियुक्त का न्यायिक प्रक्रिया से भागने का भय हो उसे गिरफ्तार करना उचित है किन्तु जो पुलिस उसे पहले गिरफ्तार कर सकती वह उसे बाद में भी तो ढूंढकर गिरफ्तार कर सकती है|

इसी प्रकार न्यायाधीशों का यह भी कहना होता है कि जहां अभियुक्त द्वारा गवाहों या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना हो तो उसकी गिरफ्तारी उचित है| दूसरी ओर राज्यों के पुलिस नियम यह कहते हैं कि अपराध का पता लगने पर पुलिस को तुरंत घटना स्थल पर जाना चाहिए और सम्बंधित दस्तावेजों को बरामद कर लेना चाहिए| ऐसी स्थिति में यदि पुलिस अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करे उसका दंड अभियुक्त को नहीं मिलना चाहिए| ठीक उसी प्रकार जहां साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना हो वहां कलमबंद बयान करवाए जा सकते हैं| किन्तु देश का तंत्र हार्दिक रूप से यह कभी नहीं चाहता कि दोषी को दंड मिले, अपराधों पर नियंत्रण हो अपितु वे तो स्वयं शोषण करना चाहते हैं| दूसरा, जहां तक साक्षियों या प्रलेखों के साथ छेड़छाड़ का प्रश्न है, अभियुक्त में हितबद्ध परिवारजन, मित्र आदि भी यह कार्य कर सकते हैं और यहाँ तक देखा गया है कि शक्तिशाली अभियुक्त होने परिवादी पर स्वयम पुलिस दबाव डालती है| तो फिर क्या प्रलेखों और साक्षियों के साथ छेड़छाड़ की संभावना के मद्देनजर इन लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया जाए?

तत्कालीन गवर्नर जनरल का स्थान आज के राष्ट्रपति के समकक्ष था और ये कानून जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए गए नहीं बल्कि जनता पर थोपे गए एक तरफ़ा अनुबंध की प्रकृति के हैं| जिस प्रकार राष्ट्रपति द्वारा जारी कोई भी अध्यादेश संसद की पुष्टि के बिना मात्र 6 माह तक ही वैध है उसी सिद्धांत पर ये कानून मात्र 6 माह की सीमित अवधि के लिए लागू रहने चाहिए थे और देश की संसद को चाहिए था कि इन सबकी बारीबारी से समीक्षा करे कि क्या ये कानून जनतांत्रिक मूल्यों को प्रोत्साहित करते हैं| खेद का विषय है कि आज स्वतंत्र भारत में भी उन्हीं कानूनों को ढोया जा रहा है और उनकी समसामयिक प्रासंगिकता पर देश के संकीर्ण सोचवाले जन प्रतिनिधि और न्यायविद कभी भी प्रश्न तक नहीं उठा रहे हैं| अभी हाल ही यशवंत सिन्हा ने राजस्थान पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि दंड संहिता के आधार पर तो अंग्रेज देश में सौ साल तक शासन कर गए किन्तु विद्वान् श्री सिन्हा यह भूल रहे हैं कि शासन करने और सफल प्रजातंत्र के कार्य में जमीन-आसमान का अंतर होता है| शासन चलाने में जनता का हित-अहित नहीं देखा जाता बल्कि कुर्सी पर अपनी पकड़ मात्र मजबूत करनी होती है| इससे हमारे जन प्रतिनिधियों की दिवालिया और गुलाम मानसिकता का संकेत मिलता है|

सिद्धांतत: संविधान लागू होने के बाद देश के नागरिक ही इस प्रजातंत्र के स्वामी हैं और सभी सरकारी सेवक जनता के नौकर हैं किन्तु इन नौकरों को नागरिक आज भी रेत में रेंगनेवाले कीड़े-मकौड़े जैसे नजर आते हैं| इसी कूटनीति के सहारे ब्रिटेन ने लगभग पूरे विश्व पर शासन किया है और एक समय ऐसा था जब ब्रिटिश साम्राज्य में कभी भी सूर्यास्त नहीं होता था अर्थात उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक उनका साम्राज्य विस्तृत था| उनके साम्राज्य में यदि पूर्व में सूर्यास्त हो रहा होता तो पश्चिम में सूर्योदय होता था| यह बात अलग है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व स्तर पर ही स्वतंत्राता की आवाज उठने लगी तो उन्हें धीरे- धीरे सभी राष्ट्रों को मुक्त करना पड़ा जिसमें 1947 में संयोग से भारत की भी बारी आ गयी| किन्तु भारत की शासन प्रणाली में आज तक कोई परिवर्तन नहीं आया है क्योंकि आज भी 80 प्रतिशत से ज्यादा वही कानून लागू हैं जो ब्रिटिश सरकार ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए बनाए थे| ये कानून जनतंत्र के दर्शन पर आधारित नहीं हैं और न ही हमारे सामाजिक ताने बाने और मर्यादाओं से निकले हैं| कानून समाज के लिए बनाए जाते हैं न कि समाज कानून के लिए होता है|
दूसरा, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यदि यही कानून जनतंत्र के लिए उपयुक्त होते तो ब्रिटेन में यही मौलिक कानून – दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, दीवानी प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य कानून आज भी लागू होते| किन्तु ब्रिटेन में समस्याओं को अविलम्ब निराकरण किया जाता है और वहां इस बात की प्रतीक्षा नहीं की जाती कि चलती बस में दुष्कर्म होने के बाद कानून बनाया जाएगा| कानून निर्माण का उद्देश्य समग्र और व्यापक होता है तथा उसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए व उनमें विद्यमान धरातल स्तर की सभी परिस्थितियों का समावेश होना चाहिए| कानून मात्र आज की तात्कालिक समस्याओं का ही नहीं बल्कि संभावित भावी और आने वाली पीढ़ियों की चुनौतियों से निपटने को ध्यान में रखते हुए बनाए जाने चाहिए| इनमें सभी पक्षकारों के हितों का ध्यान रखते हुए संतुलन के साथ दुरूपयोग की समस्या से निपटने की भी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए| किसी भी कानून का दुरूपयोग पाए जाने पर बिना मांग किये दुरूपयोग से पीड़ित व्यक्ति को उचित और वास्तविक क्षतिपूर्ति और दुरुपयोगकर्ता को समुचित दंड ही न्याय व्यवस्था में वास्तविक सुधार और संतुलन ला सकता है|

भारत के विधि आयोग ने हिरासती हिंसा विषय पर दी गयी अपनी 152 वीं रिपोर्ट दिनांक 26.08.1994 में यह चिंता व्यक्त की है कि इसकी जड़ साक्ष्य कानून की विसंगतिपूर्ण धारा 27 में निहित है| साक्ष्य कानून में यद्यपि यह प्रावधान है कि हिरासत में किसी व्यक्ति द्वारा की गयी कबुलियत स्वीकार्य नहीं है| यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 के अनुरूप है किन्तु उक्त धारा में इससे विपरीत प्रावधान है कि यदि हिरासत में कोई व्यक्ति किसी बरामदगी से सम्बंधित कोई बयान देता है तो यह स्वीकार्य होगा | कूटनीतिक शब्दजाल से बनायी गयी इस धारा को चाहे देश के न्यायालय शब्दश: असंवैधानिक न ठहराते हों किन्तु यह मौलिक भावना और संविधान की आत्मा के विपरीत है|
पुलिस अधिकारी अपने अनुभव, ज्ञान, कौशल से इस बात को भलीभांति जानते हैं कि इस प्रावधान के उपयोग से वे अनुचित तरीकों का प्रयोग करके ऐसा बयान प्राप्त कर सकते हैं जो स्वयं अभियुक्त के विरुद्ध प्रभाव रखता हो| यह एक बड़ी अप्रिय स्थिति है कि इस धारा के प्रभाव से शरारत की जा सकती है और इसके बल पर कबुलियत करवाई जा सकती है| यदि हमें ईमानदार कानून की अवधारणा को आगे बढ़ाना हो तो इस कानून में आमूलचूल परिवर्तन करना पडेगा| भारतीय न्याय प्रणाली का यह सिद्धांत रहा है कि चाहे हजार दोषी छूट जाएँ लेकिन एक भी निर्दोष को को दंड नहीं मिलना चाहिए जबकि यह धारा इस सुस्थापित सिद्धांत के ठीक विपरीत प्रभाव रखती है| भारत यू एन ओ का सदस्य है और उसने उत्पीडन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर कर दिये हैं और यह संधि भारत सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रभाव रखती है तथा साक्ष्य कानून की धारा 27 इस संधि के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण भी अविलम्ब निरस्त की जानी चाहिए|

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने डी के बासु के प्रसिद्ध मामले में कहा है कि मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन अनुसंधान में उस समय होता है जब पुलिस कबूलियत के लिए या साक्ष्य प्राप्त करने के लिए थर्ड डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करती है| हिरासत में उत्पीडन और मृत्यु इस सीमा तक बढ़ गए हैं कि कानून के राज और आपराधिक न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता दांव पर लग गयी है| विधि आयोग ने आगे भी अपनी रिपोर्ट संख्या 185 में इस प्रावधान पर प्रतिकूल दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है| यद्यपि पुलिस के इन अत्याचारों को किसी भी कानून में कोई स्थान प्राप्त नहीं है और स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने रामफल कुंडू बनाम कमल शर्मा के मामले में कहा है कि कानून में यह सुनिश्चित है जब किसी कार्य के लिए कोई शक्ति दी जाती है तो वह ठीक उसी प्रकार प्रयोग की जानी चाहिए अन्यथा बिलकुल नहीं और अन्य तरीके आवश्यक रूप से निषिद्ध हैं|
यद्यपि पुलिस को हिरासत में अमानवीय कृत्य का सहारा लेने का कोई अधिकार नहीं है किन्तु उक्त धारा की आड़ में पुलिस वह सब कुछ कर रही है जिसकी करने की उन्हें कानून में कोई अनुमति नहीं है और पुलिस इसे अपना अधिकार मानती है| दूसरी ओर भारत में पशुओं पर निर्दयता के निवारण के लिए 1960 से ही कानून बना हुआ है किन्तु मनुष्य जाति पर निर्दयता के निवारण के लिए हमारी विधायिकाओं को कोई कानून बनाने के लिये आज तक फुरसत नहीं मिली है| यह भी सुस्थापित है कि कोई भी व्यक्ति किसी प्रेरणा या भय के बिना अपने विरुद्ध किसी भी तथ्य का रहस्योद्घाटन नहीं करेगा अत: पुलिस द्वारा अभियुक्त से प्राप्त की गयी सूचना मुश्किल से ही किसी बाहरी प्रभाव के बिना हो सकती है| सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम बलबीर सिंह (1994 एआईआर 1872) में कहा है कि यदि अभिरक्षा में एक व्यक्ति से पूछताछ की जाती है तो उसे सर्वप्रथम स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में बताया जाना चाहिए उसे चुप रहने का अधिकार है। जो इस विशेषाधिकार से अनभिज्ञ हो उन्हें यह चेतावनी प्रारम्भिक स्तर पर ही दी जानी चाहिए। ऐसी चेतावनी की अन्तर्निहित आवश्यकता पूछताछ के दबावयुक्त वातावरण पर काबू पाने के लिए है। किन्तु इन निर्देशों की अनुपालना किस प्रकार सुनिश्चित की जा रही है कहने की आवश्यकता नहीं है|
साक्ष्य कानून के उक्त प्रावधान से पुलिस को बनावटी कहानी गढ़ने और फर्जी साक्ष्य बनाने के लिए खुला अवसर उपलब्ध होता है| कुछ वर्ष पहले ऐसा ही एक दुखदायी मामला नछत्र सिंह का सामने आया जिसमें पंजाब पुलिस ने फर्जीतौर पर खून से रंगे हथियार, कपडे और गवाह खड़े करके 5 अभियुक्तों को एक ऐसे व्यक्ति की ह्त्या के जुर्म में सजा करवा दी जो जीवित था और कालान्तर में पंजाब उच्च न्यायालय में उपस्थित था| पुलिस की बाजीगरी की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती अपितु अन्य भी ऐसे बहुत से मामले हैं जहां बिलकुल निर्दोष व्यक्ति को फंसाकर दोषी ठहरा दिया जाता है और तथाकथित रक्त से रंगे कपड़ों आदि की जांच में पाया जाता है कि वह मानव खून ही नहीं था अपितु किसी जानवर का खून था अथवा लोहे के जंग के निशान थे| इसी प्रकार पुलिस (जो सामान उनके पास उचंती तौर पर जब्ती से पडा रहता है) अन्य मामलों में भी अवैध हथियार, चोरी आदि के सामान की फर्जी बरामदगी दिखाकर अपनी करामत दिखाती है, वाही वाही लूटती है और पदोन्नति और प्रतिवर्ष पदक भी पाती है| नछत्र सिंह के उक्त मामले में पाँचों अभियुक्तों को रिहा करते हुए उन्हें एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया किन्तु इस धारा के दुरुपयोग को रोकने के लिए न ही तो यह कोई स्वीकार्य उपाय है और स्वतंत्रता के अमूल्य अधिकार को देखते हुए किसी भी मौद्रिक क्षतिपूर्ति से वास्तव में हुई हानि की पूर्ति नहीं हो सकती| इस प्रकरण में एक अभियुक्त ने तो सामाजिक बदनामी के कारण आत्म ह्त्या भी कर ली थी| पुलिस के अनुचित कृत्यों से एक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण भाग इस प्रकार बर्बाद हो जाता है, व्यक्ति आर्थिक रूप से जेरबार हो जाता है, परिवार छिन्नभिन्न हो जता है, उसका भविष्य अन्धकार में लीन हो जाता है और दोष मुक्त होने के बावजूद भी यह झूठा कलंक उसका जीवन भर पीछा नहीं छोड़ता है| समाज में उसे अपमान की दृष्टि से देखा जाता है महज इस कारण की कि साक्ष्य कानून के उक्त प्रावधान ने पुलिस के क्रूर हाथों में इसका दुरूपयोग करने का हथियार उपलब्ध करवाया|
वर्तमान कानून में परीक्षण पूर्ण होने पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत न्यायाधीश अभियुक्त से स्पष्टीकरण माँगता है और अभियुक्त अपना पक्ष रख सकता है किन्तु उसकी यह परीक्षा न तो शपथ पर होती है और न ही उसकी प्रतिपरीक्षा की जा सकती | अत: यह बयान सामान्य बयान की तरह नहीं पढ़ा जाता और न ही बयान की तरह मान्य होता है | एक अभियुक्त भी सक्षम साक्षी होता है और जहां वह बिलकुल निर्दोष हो वहां स्वयं को साक्षी के तौर पर प्रस्तुत कर अपनी निर्दोषिता सिद्ध कर सकता है| चूँकि साक्षी के तौर पर दिए गए उसके बयान पर प्रतिपरीक्षण हो सकता है अत; यह बयान मान्य है| किन्तु भारत में इस प्रावधान का उपयोग करने के उदाहरण ढूढने से भी मिलने मुश्किल हैं |

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अंतर्गत पुलिस को दिए गए बयानों को धारा 162 में न्यायालयों में मान्यता नहीं दी गयी है| देश की विधायिका को भी इस बात का ज्ञान है कि पुलिस थानों में नागरिकों के साथ किस प्रकार अभद्र व्यवहार किया जाता है इस कारण धारा 161 के बयानों के प्रयोजनार्थ महिलाओं और बच्चों के बयान लेने के लिए उन्हें थानों में बुलाने पर 1973 की संहिता में प्रतिबन्ध लगाया गया है जोकि 1898 की अंग्रेजी संहिता में नहीं था| प्रश्न यह है कि जिस पुलिस से महिलाओं और बच्चों के साथ सद्व्यवहार की आशा नहीं है वह अन्य नागरिकों के साथ कैसे सद्व्यवहार कर सकती है या उन्हें पुलिस के दुर्व्यवहार को झेलने के लिए क्यों विवश किया जाए| इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आनंद नारायण मुल्ला ने पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी समूह बताया था और हाल ही तरनतारन (पंजाब) में एक महिला के साथ सरेआम मारपीट के मामले में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने टिपण्णी की थी कि पुलिस में सभी नियुक्तियां पैसे के दम पर होती हैं| सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली ज्युडीसियल सर्विस के मामले में भी कहा है कि पुलिस अधिकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं करने से यह संकेत मिलता है कि गुजरात राज्य में पुलिस हावी है अत; दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही करने से प्रशासन हिचकिचाता है| कमोबेश यही स्थिति सम्पूर्ण भारत की है और इससे पुलिस की कार्यवाहियों की विश्वसनीयता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है|

महानगरों में फुटपाथों, रेलवे आदि पर मजदूरी करनेवाले, कचरा बीनने वाले गरीब बच्चे इस धारा के दुरूपयोग के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं| अत: इस धारा को अविलम्ब निरस्त करने की आवश्यकता है जबकि पुलिस और अभियोजन यह कुतर्क दे सकते हैं कि एक अभियुक्त को दण्डित करने के लिए यह एक कारगर उपाय है| किन्तु वास्तविक स्थिति भिन्न है| आस्ट्रेलिया के साक्ष्य कानून में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है फिर भी वहां दोष सिद्धि की दर- मजिस्ट्रेट मामलों में 6.1 प्रतिशत और जिला न्यायालयों के मामलों में 8.2 प्रतिशत है वहीँ भारतीय विधि आयोग अपनी 197 वीं रिपोर्ट में भारत में मात्र 2 प्रतिशत दोषसिद्धि की दर पर चिंता व्यक्त कर चुका है| इस प्रकार पुलिस और अभियोजन की यह अवधारणा भी पूर्णत: निराधार और बेबुनियाद है| पुलिस को अब साक्ष्य और अनुसन्धान के आधुनिक एवं उन्नत तरीकों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए| न्यायशास्त्र का यह भी सिद्धांत है कि साक्ष्यों को गिना नहीं अपितु उनकी गुणवता देखी जानी चाहिए| ऐसी स्थिति में पुलिस द्वारा इस प्रकार गढ़ी गयी साक्ष्यों का मूल्याङ्कन किया जाना चाहिए| वर्तमान में 1872 का विद्यमान भारतीय साक्ष्य कानून समयातीत हो गया है और यह समसामयिक चुनौतियों का सामना करने में विफल है|

संबंधित खबरें:

अखबार के दफ्तर में तिहरा हत्याकांड, अंधेरे में तीर चला रही है त्रिपुरा पुलिस! अखबार के दफ्तर में तिहरा हत्याकांड, अंधेरे में तीर चला रही है त्रिपुरा पुलिस!(0)

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||​

अगरतला में 19 मई को `दैनिक गणदूत’ के दफ्तर में तीन लोगों की हत्या के मामले में पुलिस अभी अंधेरे में तीर चला रही है। इस मामले में प्रगति यह है कि इस अभूतपूर्व हत्याकांड में अखबार के मालिक के मारे गये ड्राइवर की पत्नी नियति घोष को गिरफ्तार करके पुलिस उससे सघन पूछताछ कर रही है। इस महिला के पास पांच पांच कीमती मोबाइल फोन मिले हैं, जिनके जरिये पुलिस हत्यारों को पकड़ने की जुगत में है।पुलिस को शक है कि दैनिक अखबार के दफ्तर में एक साथ तीन तीन लोगों की हत्या के मामले में हत्यारों से इस महिला के संबंध हो सकते हैं। पूछताछ से ऐसे ही संकेत मिले हैं।पुलिस के तमाम अफसरान तिनके का सहारा पकड़ने की तरह इस महिला से पूछताछ में लगे हैं।

लेकिन इस मामले में पेंच यह है कि बरामद मोबाइलों में से एक टच स्क्रीन मोबाइल का सिम गायब है। अब पुलिस आईईएम नंबर के जरिये काललिस्ट की खोज में है।अदालत से नियति घोष को पांच दिनों की पुलिस रिमांड पर भेजा गया है।

त्रिपुरा पुलिस ने बताया कि उन्होंने दैनिक गणदूत के संपादक के ड्राइवर दिवंगत बलराम घोष की पत्नी नियति घोष को गिरफ्तार किया है। ड्राइवर अखबार के कार्यालय के भीतर ही एक कमरे में रहता था। मोटरसाइकिल पर सवार होकर आए दो लोगों ने पैलेस परिसर में दैनिक गणदूत के कार्यालय में घुसकर प्रूफ रीडर सुजीत भट्टाचार्य, ड्राइवर बलराम घोष और ऑफिस मैनेजर रंजीत चौधरी पर चाकू से वार किया।

पुलिस ने बताया कि विधवा को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह लगातार गुमराह करने वाला बयान दे रही थी।

इसके साथ ही इस मामले में यह पहली गिरफ्तारी है।

पुलिस ने बताया कि उसी परिसर में रहने वाले सुशील चौधरी घटना के वक्त कार्यालय में मौजूद था लेकिन उसने दावा किया है कि उसने कुछ नहीं देखा है

संबंधित खबरें:

तो क्या पी.सी.ज्वैलर्स से ऑपरेट होता था सैक्स रैकेट का कारोबार…? तो क्या पी.सी.ज्वैलर्स से ऑपरेट होता था सैक्स रैकेट का कारोबार…?(5)

-नारायण परगाई||

देहरादून. देहरादून में पकड़ा गया अब तक का सबसे बड़ा सैक्स रैकेट जाने माने पी.सी.ज्वैलर्स के यहाँ से संचालित हो रहा था लेकिन पुलिस की थ्योरी मे इस नाम को बेपर्दा होने से इसलिए बचा लिया क्योकि इसमें बड़े कई बड़े सफेद पोश नेताओ के दामन दागदार थे. देहरादून पुलिस इस रैकेट को भांडा फोड़ करने का जो फार्मूला तैयार कर पाई उसमें कई तरह के छेद नजर आए जबकि इस गिरोह का मुख्य सरगना परदे के पीछे से पुलिस के साथ मिलकर लाखो का खेल खेल गया. राजपुर रोड स्थित पी.सी.ज्वैलर्स में हाई फाई कॉल गर्ल्स को दिखाने के साथ साथ वहां इनकी डीलिंग के लिए सबसे मुफीद जगह साबित होती थी.

पांच सितारा थीम पर बने पी.सी.ज्वैलर्स के यहां किट्टी पार्टियां भी आयोजित की जाती हैं और कई बड़े घरानो की महिलाएं इनमें शिरकत करती हैं लेकिन पुलिस ने जिस कमल अग्रवाल को इस सेक्स रैकेट का सरगना करार दिया है उसने पुलिस के दावों की हवा निकाल दी ळै. कमल अग्रवाल का कहना है कि वह तो सिर्फ मोहरे के तौर पर इस्तेमाल होता था जबकि इस धन्धे में कई सफेद पोश नेताओ को मनोज गुप्ता लड़कियां सप्लाई किया करता था. इतना ही नहीं उसने इस बात का भी राज फाश किया कि मनोज गुप्ता की पत्नी रेनू गुप्ता पी.सी.ज्वैलर्स देहरादून में बतौर काम करने के साथ साथ इस गोरख धन्धे में मिली हुई है और पी.सी.ज्वैलर्स के ही कई अन्य लोग भी इसमं मिले हो सकते हैं. हाइ प्रोफाइल सैक्स रैकेट का देहरादून पुलिस ने 30 जनवारी को खुलासा कर 9 लड़कियों सहित कुल 21 लोगो को गिरफतार किया था लेकिन सूत्र बताते हैं कि इस खेल का मास्टर माइंड मनोज गुप्ता लाखो की डील कर बच निकला क्योकि उसे ऐसे सफेद पोश नेताओं का संरक्षण प्राप्त था जो राजनेता  बतौर सरकार में भी अपना रसूख रखते हैं. कमल अग्रवाल के इस खुलासे के बाद पुलिस की कहानी सिर्फ उसे बचाती हुई दिख रही है, हालाकि जनपद के पुलिस कप्तान केवल खुराना का साफ कहना है कि यदि इसमें कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल हुआ तो उसे गिरफतार किया जाएगा. लेकिन सवाल यह उठ रहा ळै कि जब इस गैंग का भांडा फोड़ करने के लिए देहरादून की एस.ओ.जी टीम व नेहरू कालोनी की पुलिस को  लगाया गया था तो आखिर किसके इशारे पर मनोज गुप्ता को नही पकड़ा गया.

पुलिस अभी तक इस मामले में पकड़ी गई एक गाड़ी के मालिक का नाम पता नही हासिल कर पाई हैं जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान उठ रहे हें. इस पूरी कहानी में एसओजी टीम की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही ळै जिसे देखते हुए पुलिस कप्तान ने इस खेल के राज को तलाशना शुरू कर दिया है क्योंकि जनपद के पुलिस कप्तान को इस मामले में कई जानकारियो से अवगत नही कराया गया. जबकि सूत्रो की खबरो पर यकीन करें तो इस मामले में  कुछ लोगो द्वारा मनोज गुप्ता को बचाने लाखो का खेल खेला गया ळै. इस बारे में जब पी.सी.ज्वैलर्स के देहरादून मैनेजर भारत मेहता से जानकारी ली गई तो उन्होने पी.सी.ज्वैलर्स में रेनू गुप्ता के काम करने की बात तो स्वीकार की लेकिन ज्यादा कुछ बताने से इनकार कर दिया जबकि मनोज गुप्ता कई बार फोन पर सही जानकारी नही दे पाए. अब देखना होगा कि इस सैक्स रैकेट में पुलिस क्या पी.सी.ज्वैलर्स के यहां की वीडियो फुटेज खंगालती है या नही क्योकि पुलिस ने इस रैकेट में पकड़े सरगना कमल अग्रवाल ने खुद को सरगना ना बताकर मनोज गुप्ता को सरगना बताया है.

संबंधित खबरें:

स्वर्ण नगरी में देह व्यापार को मिल रहा है खाकी का प्रश्रय… स्वर्ण नगरी में देह व्यापार को मिल रहा है खाकी का प्रश्रय…(2)

स्वर्ण नगरी में फल फूल रहा है देह व्यापार का कारोबार..पुलिस की नाक के नीचे होता है देह का धंधा…कच्ची बस्तियों में बाहर से आई कई महिलायें इस धंधे में शामिल…

-जैसलमेर से सिकंदर शेख़||

स्वर्ण नगरी जैसलमेर विश्व् मानचित्र पर पर्यटन नगरी के नाम से विख्यात है, देश दुनिया से लाखों की संख्या में पर्यटक हर वर्ष इसको निहारने यहाँ आते हैं जिससे इस शहर की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा सुदृढ़ है, आज भी यहाँ के बाशिंदे अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए खासे जाने जाते हैं. लेकिन कुछ एक वर्षों से यहाँ अपराधिक गतिविधियाँ ज्यादा बढ़ गयी है, चाहे वो चोरी की हो, लूट की हो, यहाँ तक की हत्या जैसी भी घटनाये यहाँ बढ़ गयी है, पुलिस की बात की जाए तो वो एक नाकर सिस्टम के साथ यहाँ बैठी है, चाहे हरीश हत्याकांड हो, डालूराम हत्याकांड या फिर हाल ही में होटल काम्प्लेक्स के पास मिला एक युवक का शव , इन सारी हत्याओं के पीछे कोई न कोई तथ्य जरूर रहा है मगर पुलिस इन हत्याकांडों की गुथियाँ सुलझाने में असमर्थ ही रही है या यूँ कहे की अपनी ड्यूटी को निभाने में वो असफल रही है ,सभी हत्याओं पर गौर किया जाय तो सबके पीछे कोई ना कोई वजह जरूर रही होगी, लेकिन पुलिस का मानना है की इन सब हत्याओं के पीछे अवैध संबंधों की बू आती है.

अब बात यहाँ आ पहुंची है तो गौर करने वाली बात ये है की पिछले कुछ समय से जैसलमेर में ऐसा कौन आ गया जिसके पीछे हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया जो कि इस जैसलमेर जैसे शांत वातावरण में ज़हर घोलने का कार्य कर रहा है

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है यहाँ बाहर से आई वो महिलाएं जो शहर के विभिन्न हिस्सों में देह व्यापार का कारोबार फैला कर बैठी है, कच्ची बस्तियों में इस तरह का व्यापर आम बात हो गयी है, ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी पुलिस या प्रशासन को नहीं है , जानकारी है मगर सूत्र बताते हैं की इन महिलाओं का नेटवर्क इतना तगड़ा है की पुलिस भी इनपर हाथ डालने से घबराती है, पहले इस तरह के कार्य रात के अँधेरे में होते थे मगर आज कल तो दिन में खुलेआम देह व्यापार का कार्य होता देखा जा सकता है

गफूर भट्टा  हो बब्बरमगरा  हो, वहाँ रात दिन वासना का खेल पैसे लेकर खेला जाता है, आस पड़ोस के लोगों का तो जीना ही मुहाल हो गया है. मगर पुलिस में शिकायत करने से भी घबराने वाले लोग दबी जुबां में कहते हैं कि यहाँ तो ऐसे लोगों को भी आते देखा है जो की काफी ऊंची पहुँच वाले है तो इन महिलाओं का हौसला इतना बुलंद है कि बेचारा पडोसी किसी मामले में फंस न जाय, इससे ये शिकायत करते भी घबरा जाता है.

यहाँ के युवाओं को भटकाती ये बाहर से आई देह व्यापार करने वाली महिलाएं उन्हें इस गर्त में धकेल रही है साथ ही साथ इनका नेटवर्क भी इतना बढ़ गया है कि जोधपुर और अहमदाबाद से लडकियां लाकर यहाँ सप्लाई की जाती है , और पर्यटन सीजन में तो ये लड़कियों को होटलों और बाहर बने रिसोर्ट में भी भेजती है जिससे बाहर से आने वाले पर्यटक को सीधे लडकियां सप्लाई की जाती है ,

गफूर भट्टे पर भी एक बाहर से आई महिला इस तरह का कारोबार करती है मज़े की बात तो ये है की वो जिस मकान में रहती है वो पूरा अतिक्रमण है. ना तो उसका कोई सर्वे हो रखा है और न ही कोई पट्टा है, मगर फिर भी वो महिला धड़ल्ले से वहाँ रह रही है और बेखोफ देहव्यापार का कारोबार चला रही है.

नगरपरिषद जहाँ एक और गरीबों के झोंपड़े तोड़ रहा है वहीँ, इस महिला के अतिक्रमण पर उसकी कोई नज़र भी नहीं जाती है और पुलिस तो यहाँ आये ही क्यों? क्योंकि यहाँ तो उसका कोई काम ही नहीं है, कहने वाले कहते हैं कि कई खाकी वर्दी वाले भी यहाँ रात को मंडराते दिखाई पड़ते हैं, मगर कोई कार्रवाई करने नहीं अपितु……! सुनने में तो ये भी आया था की एक बुजुर्ग को इस महिला ने काफी समय से ब्लैकमेल कर रखा था जो कि अभी इन दिनों यहाँ आया था और उसने बड़ी मुश्किल से इस महिला से पीछा छुड़ाया. क्योंकि इस महिला ने उससे काफी रकम भी ऐंठ रखी थी और काफी लम्बे समय से ब्लैकमेल भी कर रही थी बेचारे उस बुजुर्ग के लड़के ने यहाँ आकर उससे पीछा छुड़ाने के लिए जिन लोगों से मध्यस्थता करवाई वो भी सब लोगों को पता चल चुकी है कि कौन लोग थे. इन महिलाओं को आप जिला कलेक्ट्रेट में भी बिना हिचक घुमते देख सकते है.

गौरतलब है की जैसलमेर में बढ़ रहे अपराधों में इस तरह के देह व्यापार का भी बहुत अहम् हाथ है ये एक तरह की वो काली स्याही है जो धीरे धीरे समाज में एक बिमारी की तरह फ़ैल रही है अगर समय रहते इसे रोका ना गया तो इसका हश्र क्या होगा ये कोई नहीं जानता.

 

संबंधित खबरें:

धिक्कार है ऐसी पुलिस पर… धिक्कार है ऐसी पुलिस पर…(2)

ये है हमारे तिरंगे की इज्जत हमारे समाज के रक्षक कहलाने वाले पुलिस की नजर में. जिस तिरंगे के लिए न जाने कितने ही वीर सपूतों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी, न जाने कितनी ही माँओं के गोद उजड़ गए, न जाने कितने ही सुहागनों के मांग का सिंदूर मिट गया. जिस तिरगे की हिफाजत के लिए आज भी हजारों जवान कड़ाके की ठंढ की परवाह किये बिना वर्फ से ढकी पहाड़ों पर शरहद पर खड़े रहते हैं, उसी तिरंगे को हमारे पुलिसवाले अपने क़दमों के निचे कुचल रहे है, लाठी चार्ज में डंडे की जगह लोगो के हांथों से छीन कर तिरंगा लगे डंडे का इस्तेमाल किया जा रहा है.  इस तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह राष्ट्रीय ध्वज का अपमान खुलेआम किया जा रहा है. यह कोई एडिट किया हुआ तस्वीर नहीं है, बल्कि 23 दिसम्बर को जन्तर-मन्तर से उस समय लिया था जब कई हज़ार लोग  स्वामी रामदेव और पूर्व सेनाध्यक्ष श्री वी.के सिंह के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रहे थे और बलात्कारियो को फाँसी की सजा की मांग करते हुए इंडिया गेट की तरफ जाने के लिए आगे बढ़े थे .उसी समय कांग्रेस सरकार की अंधी पुलिस ने बुड्ढ़े बच्चों महिलाओं के साथ-साथ श्री वी . के सिंह पर लाठियाँ बरसायी .

यही अपराध अगर कोई आम आदमी करता तो उस पर देश द्रोह माना जाता, उस मुक़दमे भी चलते और सजा भी होता. जैसा की पहले भी हुआ है सचिन ने अगर तीन रंगों वाला केक काट दिया तो देशद्रोह हो गया. सानिया मिर्जा ने तिरंगे की तरफ टेबल पर पैर रख दिया तो देशद्रोह, किसी मॉडल ने तिरंगे के रंग का बिकनी पहन लिया तो देश द्रोह. मैं भी मानता हूँ ये तीनो ही घटना में राष्ट्रिय ध्वज का अपमान हुआ है लेकिन  ये कैसा कानून  देश के सिपाही तिरंगे का सम्मान करना नहीं जानते हैं. जब रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थक झंडे को नीचे भी रख देते थे तो मीडिया हंगामा खड़ा कर देती थी,  इस तस्वीर में साफ दिख रहा है कि लोगों के हाथ से तिरंगा छीन कर उसी से मार रही है पुलिस जो कि कानून का उलंघन है . लेकिन इसके लिए हमारी सरकार कोई कदम नही उठाएगी क्युकी ये पुलिस वाले लाठी चार्ज उसी सरकार के लिए कर रही है. ना इनके खिलाफ कोई रिपोर्ट लिखी जा सकती है क्युकी रिपोर्ट लिखने वाले भी तो पुलिसवाले ही होते है. जो पुलिस राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना नहीं जानती वो किसी और का सम्मान क्या करेगी . धिक्कार है ऐसी पुलिस पर जो राष्ट्रीय ध्वज का भी सम्मान करना भी नहीं जानती.

संबंधित खबरें:

नटवर लाल भी शर्मिंदा हो सकता है पवन भूत नामक इस महाठग के सामने… नटवर लाल भी शर्मिंदा हो सकता है पवन भूत नामक इस महाठग के सामने…(0)

आज हम आपको मिलवा रहे हैं एक ऐसे महाठग से जो देश के बड़े मीडिया समूहों के साथ साथ सभी सुरक्षा एजेंसियों को अपना सहयोगी बता कर पत्रकारिता में आने को आतुर लोगों को अपने जाल में फंसा कर पत्रकार बनाने के नाम पर ना केवल उनसे पैसा ठगता है बल्कि उनके बेशकीमती साल भी ख़राब कर देता है. पवन कुमार भूत नामक इस महाठग ने पिछले कुछ् सालों में पुलिस और मीडिया की आड़ में हजारों लोगों को ठग कर एक कीर्तिमान भी स्थापित किया है….

-लखन साल्वी||

‘‘ऐसा लगता है कि देश की सम्पूर्ण सशस्त्र सेना, पुलिस फोर्स, खुफिया एजेन्सियां और इलेक्ट्रोनिक  मीडिया पवन भूत के ठगी के कारोबार में उसके पार्टनर है.’’ नटवर लाल की चालाकी को पीछे छोड़ते हुए पवन भूत ने देश की तमाम महत्त्वपूर्ण सरकारी सुरक्षा एवं अन्वेषण एजेन्सियों को अपनी वेबसाइट पुलिस पब्लिक प्रेस.इन  पर अपना सहयोगी होना दर्शाया है. ताकि वेबसाइट पर विजिट करने वाले लोगों को लगे कि वाकई ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ में कुछ गलत नहीं है और इसके माध्यम से पुलिस और पब्लिक के बीच सामंज्स्य स्थापित करने के लिए काम कर रही है.

क्या है ये ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’

यह एक मासिक पत्रिका का नाम है. इसके सम्पादक पवन कुमार भूत ने एक दशक पूर्व इस मासिक पत्रिका का किरण बेदी से विमोचन करवाया था. विमोचन के समय किरण बेदी के साथ लिए गए फोटो को देशभर में जगह-जगह लोगों को दिखाकर किरण बेदी को पुलिस पब्लिक प्रेस में सहयोगी होने का दावा करता है. 

पवन कुमार भूत विभिन्न अखबारों व पेम्पलेट में किरण बेदी के फोटों सहित ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ पत्रिका का फोटों प्रकाशित करवाता है और पत्रिका के लिए रिपोर्टरों की आवश्यकता वाला विज्ञापन प्रकाशित करवाता है.

रिपोर्टर बनने की इच्छा रखने वाले लोगों से 2500 व 10,000 रुपए लेकर उन्हें उन्हें प्रेस कार्ड देता है तथा रिपोर्टरों के माध्यम से अपनी मासिक पत्रिका के सदस्य बनाता है. रिपोर्टर अपने क्षेत्र में लोगों से सदस्यता शुल्क लेकर उन्हें मासिक पत्रिका के सदस्य बनाते है. सदस्यता शुल्क की एवज में डाक द्वारा मासिक पत्रिका भेजने व दुर्घटना बीमा करवाने तथा सदस्यता कार्ड दिए जाने का वादा किया जाता है.

‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के रिपोर्टर व सदस्य बने राजस्थान व गुजरात के सैकड़ों लोगों से मिली जानकारी के अनुसार पवन कुमार भूत ने तो डाक द्वारा मासिक पत्रिका भिजवाता है और ना ही दुर्घटना बीमा करवाता है. उन्होंने बताया कि उसके द्वारा महज सदस्यता कार्ड ही भिजवाया जाता है.

देश की तमाम सुरक्षा एजेन्सिया उसकी सहयोगी..?

पवन भूत ने लोगों का विश्वास जीतने के लिए पवन भूत द्वारा अपनी वेबसाइट पर आसाम राइफल्स, बीएसफ, सीआरसीएफ, सीआईसीएफ, आईटीबी पुलिस, एनसीआरबी, राजस्थान पुलिस, एसएसबी, सीबीआई और बीपीआरडी जैसी संस्थाओं को अपनी सहयोगी संस्थाएं दर्शाया गया है. वेबसाइट पर दी गई सूचनाओं के अनुसार चंडीगढ़, कर्नाटक, कोलकत्ता, गुजरात, हिमाचलप्रदेश, पंजाब, दिल्ली, मध्यप्रदेश, केरल, चैन्नई, मुम्बई, उत्तरप्रदेश, नागपुर, हरियाणा, आसाम, अरूणाचल, आंध्रप्रदेश, उत्तरांचल पुलिस सहित कई राज्यों की पुलिस ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस‘‘ की सहयोगी है. वहीं बड़े समाचार ग्रुप भी उसके सहयोगी है. पीटीआई न्यूज, एनडीटीवी, आईबीएन लाइव, आज तक, जी न्यूज, डीडीआई न्यूज, आज तक, सहारा समय, जी टीवी जैसे टीवी समाचार चैनलों के साथ प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को भी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ ने अपना सहयोगी बताया  है.

वहीं सहारा समय के आलोक कुमार ने कहा कि ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ से सहारा समय का कोई वास्ता नहीं है तथा ‘‘पुलिसपब्लिकप्रेस. इन’’ नामक वेबसाइट पर ‘‘अवर एसोसिएट’’ में सहारा समय को अपना सहयोगी दर्शाने के खिलाफ पवन भूत को लीगल नोटिस भेजा जाएगा.

उल्लेखनीय है कि ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ द्वारा आयोजित विभिन्न सेमीनारों और कार्यक्रमों में पुलिस के उच्चाधिकारी समय-समय पर शिरकत करते रहे है. लेकिन किसी का ध्यान इस और नहीं गया कि पवन भूत ने अपनी वेबसाइट पर देश की सुरक्षा करने वाली बड़ी-बड़ी सरकारी संस्थाओं को अपनी सहयोगी बता रखा है.

क्या एक सेमीनार में किसी बड़े अधिकारी के भाग लेने मात्र पर यह समझा जा सकता है कि उस अधिकारी से संबंधित विभाग भी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ का सहयोगी है ? और अगर सहयोगी नहीं है तो वो किस प्रकार का सहयोग कर रहे है.

लेखक ने इन तमाम एजेन्सियों को पत्र लिखकर उनसे पुलिस पब्लिक प्रेस के सहयोगी होने के प्रमाण मांगे है. साथ पुलिस पब्लिक प्रेस के माध्यम से की जा रही ठगी से भी अवगत कराया है. अब देखना है कि  देश की सम्पूर्ण सशस्त्र सेना, पुलिस फोर्स, खुफिया एजेन्सियां और इलेक्ट्रोनिक मीडिया इस ठगी को रोक पाता है या नहीं.

संबंधित खबरें:

दस हज़ार में प्रेस कार्ड, अब इस ठगी को कौन रोकेगा… दस हज़ार में प्रेस कार्ड, अब इस ठगी को कौन रोकेगा…(0)

-लखन सालवी||
दिल्ली से प्रकाशित पुलिस पब्लिक प्रेस के सर्वेसर्वा (मालिक संपादक) पवन कुमार भूत द्वारा 10,000 रुपए में प्रेस कार्ड दिए जा रहे हैं। यूं तो पवन कुमार भूत अपनी पत्रिका के माध्यम से भारत में बढ़ रहे अपराध के ग्राफ को कम करने व पुलिस व पब्लिक के बीच सामंजस्य स्थापित करने लिए एक पहल बताता है। पर सच्चाई इससे अलग है।

पवन भूत अपनी मासिक पत्रिका (जो कि कभी कभार ही छपती है) के रिपोर्टर बनाने के नाम पर लोगों से 10,000 रुपए लेकर प्रेस कार्ड दे रहा है। दो नंबर का धंधा करने वाला हो या गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर हो या हो कोई किराणे का व्यापारी सभी को 10 हजार लेकर प्रेस कार्ड बांटे जा रहे है।

किरण बेदी के फोटो लगाकर करता है विज्ञापन, किरण बेदी का कहना है कि वो नहीं है पवन भूत के साथ

इस धोखाधड़ी के बिजनेस में पवन भूत ने किरण बेदी के नाम का उपयोग किया है। किरण बेदी को अपनी कंपनी का पार्टनर बताकर लोगों को विश्वास में लेता रहा है। जानने में आया है कि किरण बेदी द्वारा पुलिस पब्लिक प्रेस का विमोचन करवाया गया था तथा कई सेमीनारों में मुख्यवक्ता के रूप में बुलाया गया था। विमोचन व सेमीनारों में किरण बेदी के साथ खिंचवाई गई फोटो को पवन भूत पेम्पलेट, अखबारों आदि में प्रकाशित करवाता है ताकि लोग ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ पर विश्वास करे और उससे जुड़े।

यही नहीं पवन भूत ने नेशनल टॉल फ्री नंबर 1800-11-5100 का आरंभ भी किरण बेदी के हाथों करवाया। हालांकि यह नंबर दिखावा मात्र है। पवन भूत का कहना था कि पुलिस अगर किसी की जायज शिकायत पर कार्यवाही नहीं करती है तो वो हमारे टोल फ्री नंबर पर कॉल कर सकता है, तब पुलिस पब्लिक प्रेस द्वारा उसकी मदद की जाएगी। यह लोगों को आकर्षित करने का तरीका महज है। पवन भूत ने अपनी वेबसाइट, अपनी मैगजीन व विभिन्न अखबारों इत्यादि में दिए गए विज्ञापन में किरण बेदी का फोटों लगावाकर किरण बेदी के नाम को खूब भूनाया है। जबकि किरण बेदी का कहना है कि ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के साथ उनका कोई वास्ता नहीं है। पवन भूत के खिलाफ ठगी की कई शिकायतों के बावजूद किरण बेदी का महज यह कह देना कि मैं उसके साथ नहीं हूं . . क्या पर्याप्त है ? क्या किरण बेदी को पवन भूत के खिलाफ कार्यवाही की मांग नहीं करनी चाहिए ? ऐसे ही कई सवाल है पुलिस पब्लिक प्रेस के सदस्य बनकर ठगे गए लोगों के मन में।

18 से अधिक बैंकों में खाते

कई राज्यों के लोगों को मूर्ख बनाकर अब तक करोड़ो रुपए ऐंठ चुके पवन कुमार भूत के देशभर के 18 से भी अधिक बैंकों में खाते है। सारे नियमों व सिद्धान्तों को ताक में रख कर व कानून के सिपाहियों की नाक के नीचे पवन कुमार भूत देश की जनता को ठग रहा है। जनता को भी प्रेस कार्ड का ऐसा चस्का लगा है कि बिना सोचे समझे रुपए देकर प्रेस कार्ड बनवा रहे है। जानकारी के अनुसार पवन कुमार भूत ने 2006 में ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ नाम की मासिक पत्रिका आरंभ की थी। शुरू में वह 1000 रुपए लेकर अपनी मासिक पत्रिका के रिपोर्टर नियुक्त करता था तथा रिपोर्टर के माध्यम से लोगों से 200 रुपए लेकर पत्रिका के द्विवार्षिक सदस्य बनाता था। आजकल वो राशि कई गुना बढ़ गई है। इतने बैंकों में खाते खुलवाने के पीछे पवन भूत का मकसद है कि जिस रिपोर्टर के क्षेत्र जो भी बैंक हो उस बैंक में वो सदस्यता शुल्क तुरन्त जमा करवा सके।

ना तो बीमा करवाता है और ना ही भेजता है मैगजीन

3 साल पहले पवन भूत ने रिपोर्टर फीस बढ़ाकर 1000 रुपए से 2500 रुपए कर दी तथा पत्रिका के सदस्य बनाने के लिए भी दो प्लान बनाए। अब वह प्लान के अनुसार रिपोर्टरों से पत्रिका के सदस्य बनाने लगा। 400 रुपए में द्विवार्षिक सदस्यता व 3000 रुपए में आजीवन सदस्यता दी जाने लगी। द्विवार्षिक सदस्य को 1 वर्ष की अवधि के लिए 1 लाख रुपए का दुर्घटना मृत्यु बीमा देने, पुलिस पब्लिक प्रेस का सदस्यता कार्ड व पुलिस पब्लिक प्रेस के 24 अंक डाक द्वारा भिजवाने का एवं आजीवन सदस्य को 1 वर्ष की अवधि के लिए 2 लाख रुपए का दुर्घटना मृत्यु बीमा देने का वादा किया जाता है।

अब तक रिपोर्टर बने सैंकड़ों लोगों द्वारा बनाए गए सदस्यों को महज ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के सदस्यता कार्ड के अलावा कुछ नहीं मिला है। प्रेस कार्ड व सदस्यता कार्ड की मार्केट में जबरदस्त मांग के चलते अब पवन भूत ने पुलिस पब्लिक प्रेस की सदस्यता राशि और बढ़ा दी है, अब वार्षिक सदस्यता शुल्क 400 रुपए, द्विवार्षिक सदस्यता शुल्क 1000 रुपए व आजीवन सदस्यता शुल्क 3000 रुपए कर दिया है। एसोसिएट रिपोर्टर की फीस 10,000 रुपए कर दी है। जिसे आजीवन सदस्यता मुफ्त दी जा रही है।

एक ही शहर में सैकडों रिपोर्टर

एक शहर में किसी अखबार या पत्रिका के 1, 2, 3 या 4 संवाददाता होते है, जो अलग-अलग मुद्दों पर काम करते है। लेकिन ’’पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के एक ही शहर में सैकड़ों-सैंकड़ों रिपोर्टर है। गुजरात के सूरत, बड़ोदा, गांधीनगर, महाराष्ट्र के मुम्बई, कोलकत्ता, दिल्ली, फिरोजाबाद, रांची, धनबाद में 100-100 से अधिक कार्डधारी संवाददाता है।

ऐसे की जाती है ठगी

पवन भूत विभिन्न माध्यमों से ‘‘संवाददाताओं की आवश्यकता’’ के आशय का विज्ञापन प्रकाशित करवाता है। जरूरतमंद लोग विज्ञापन में दिए पते पर सम्पर्क करते है। जहां उनसे रिपोर्टर फीस के नाम पर रुपए वसूल कर संवाददाता का फार्म भरवाया जाता है और मैगजीन के सदस्य बनाने का काम सौंपा जाता है।

रुपए देकर रिपोर्टर बना व्यक्ति मैगजीन के सदस्य बनाना शुरू करता है। उसे सदस्यता राशि का 25 प्रतिशत दिया जाता है। 1 वर्ष, 2 वर्ष और आजीवन सदस्यता के नाम पर लोगों से रुपए लिए जाते है और वादा किया जाता है कि उनकी सदस्यता अवधि तक उन्हें डाक द्वारा मैगजीन भेजी जाएगी और दुर्घटना बीमा करवाया जाएगा। लेकिन हालात जुदा है ना तो मैगजीन भेजी जाती है और ना ही किसी प्रकार का दुर्घटना बीमा करवाया जाता है। सदस्य बने लोगों को दिया जाता है तो महज सदस्यता कार्ड।

पीडितों ने की प्रधानमंत्री से शिकायत

कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम व प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया की सेक्रेटरी विभा भार्गव को शिकायत पत्र भेजकर ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। धोखाधड़ी के शिकार हुए देश भर के कई लोगों ने विभिन्न पुलिस थानों में एफआईआर भी दर्ज करवाई है। फरीदाबाद, कोलकत्ता के थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है। लेकिन नतीजा सिफर रहा है। अभी तक पवन भूत के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इससे ऐसा लगता है कि पवन भूत पुलिस व पब्लिक के बीच में भले ही सामंजस्य स्थापित ना करवा पाया हो, लेकिन पुलिस व प्रेस में सामंजस्य जरूर स्थापित किया है।

पवन भूत जिसकी वाकपटुता का ही कमाल है कि उसने देश की जनता से करोड़ों रुपए ठग लिए हैं। वह ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ नाम की भिजवाने का वादा कर लोगों से सदस्यता राशि के नाम पर रुपए लेता है। लेकिन पत्रिका भिजवाता नहीं है। लोग पत्रिका की मांग करते हैं या ठगी का आरोप लगाते हैं तो सफाई से कहता है ‘‘यही मेरी कमजोर नस है’’ कि मैं पत्रिका नहीं भिजवा पाता हूं।

क्या हजारों लोगों से मैगजीन के नाम से लाखों रुपए लेकर महज इतना कह देना कि किन्हीं कारणों से मैं मैगजीन नहीं भिजवा पा रहा हूं पर्याप्त है ? 5000 रुपए प्रतिमाह का झांसा देकर बेरोजगार युवाओं से हजारों रुपए लेकर उन्हें रिपोर्टर कार्ड प्रदान करने वाले पवन भूत के खिलाफ पुलिस कोई कार्यवाही करेगी या देश के लोगों को यूं ही लुटने देगी ?

अकेले भीलवाड़ा जिले में हजार से अधिक लोग ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के मार्फत ठगे गए है। उन को ना तो मैगजीन भेजी गई है और ना ही किसी किस्म का बीमा करवाया गया।

पुलिस पब्लिक प्रेस से जुड़कर पत्रकारिता में अपना भविष्य संवारने निकले ठगी के शिकार हुए युवाओं का कहना है कि पुलिस पब्लिक प्रेस के मालिक पवन भूत के बहुत ही बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों से सम्पर्क है तथा कई मंत्रियों से भी मिलीभगत है जिसके चलते उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नही हो पाती है।

‘‘मैं अकेला क्या कर सकता हूं, हर तरफ भ्रष्टाचार फैला हुआ है, मैंनें भी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के कई सदस्य जोड़े लेकिन पवन भूत ने उन सदस्यों को मैगजीन नहीं भेजी। चूंकि लोगों से सदस्यता राशि लेकर मैंनें पवन भूत को भिजवाई थी इसलिए लोगों ने मैगजीन के मुझ पर दबाव बनाया। अंत में मुझे अपनी जेब से पैसे वापस लौटाने पड़े।’’ दिनेश-ज्ञानगढ़।

सदस्यों की मैगजीन न मिलने की शिकायतों से परेशान होकर रिपोर्टर के रवि व्यास को अपना क्षेत्र छोड़कर अन्यत्र जाकर रहना पड़ रहा है। अकेले भीलवाड़ा शहर में सैकड़ों लोगों को पुलिस पब्लिक प्रेस की सदस्यता दिलवा चुके युवा रवि व्यास का कहना है कि सदस्यता फार्म में लिखा होता है कि डाक द्वारा मैगजीन भेजी जाएगी और दुर्घटना बीमा करवाया जाएगा। लेकिन जब मैगजीन नहीं आती है और बीमा नहीं करवाया जाता है तो लोग सदस्यता फार्म भरने वाले को पकड़ते है ना कि मैगजीन के मालिक और सम्पादक को।

गुजरात के हिम्मतनगर जिले के विपुल भाई पटेल का कहना है कि वो बड़े जुनून के साथ पत्रकारिता क्षेत्र में उतरे। उन्होंने एक माह में सैकड़ों लोगों को ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ की सदस्यता दे दी। लेकिन उनके पांव से जमीन तब खिसक गई जब उन्हें पवन भूत की असलियत का पता चला।

जब मैंने ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ को देखा और उसमें जगह जगह पवन भूत के साथ किरण बेदी के फोटो देखे तो इस मैगजीन से जुड़ने का ख्याल आया। मैंने पूवन भूत से बात की। उन्होनें मुझे बताया कि किरण बेदी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के साथ है तथा हर समय पीडित लोगों की मदद के लिए तत्पर रहती है। तब मैं भी इस मैगजीन में पत्रकार के रूप में जुड़ा था। कई पत्रकार साथियों को भी इससे जोड़ा तथा सैकड़ो सदस्य बनाए। इससे जुड़ने के दो माह बाद ही मुझे पता चल गया कि ना तो किरण बेदी उसके साथ है और ना ही वो मैगजीन को नियमित छपवाता है। सदस्यता कार्ड पर छपे हुए केवल एक वादे को वो पूरा करता है, सदस्यता और रिपोर्टर कार्ड समय पर भिजवा देता है।

पवन भूत के बारे में मैंने किरण बेदी से भी बात की। उन्होने कई दिनों तक तो ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ और पवन भूत के बारे में कुछ बोलने पर चुप्पी साधे रखी। उन्होनें बताया कि वो पवन भूत द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में जाती रही है।  जब मैंनें उन्हें पूवन भूत द्वारा की जा रही ठगी के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि ‘‘आई एम नोट विथ हिम देट्स ऑल’’

किरण बेदी द्वारा पवन भूत के खिलाफ कोई कार्यवाही करने की बजाए क्या महज यह कह देना पर्याप्त है ?

(लेखक www.khabarkosh.com के सह सम्पादक है। उनसे  lakhandb@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।  )

संबंधित खबरें:

प्रसिद्ध खबरें..

  • Sorry. No data yet.
Ajax spinner

ताज़ा पोस्ट्स

Contacts and information

मीडिया दरबार - जहाँ लगता है दरबार. आप ही राजा हैं इस दरबार के और कटघरे में है मीडिया. हम तो मात्र एक मंच हैं और मीडिया पर अपनी निगाह जमायें हैं, जहाँ भी मीडिया में कुछ गलत होता दिखाई देता है उसे हम आपके सामने रख देते हैं और चलाते हैं मुकद्दमा. जिसपर सुनवाई करते हैं आप, जहाँ न्याय करते हैं आप. जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार...

Social networks

Most popular categories

© 2014 All rights reserved.
%d bloggers like this: