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मंत्री को बंधक बनाया और जम कर की धुलाई…

असलेहा गर्ल्स कॉलेज की विवादित जमीन को लेकर पश्चिम बंगाल के मंत्री और पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश नूर आलम चौधरी को भीड़ ने जमकर पीटा और कमरे में आठ घंटे तक बंधक बनाकर रखा.noor-alam-chaudhry

मारपीट की ये घटना पश्चिम बंगाल के बीरभूम‌‌ जिले के एक कॉलेज में हुई. जिले के पुलिस अधीक्षक सी सुधाकर ने बताया कि जिले के रामपुरहाट स्थित असलेहा गर्ल्स कॉलेज की जमीन को लेकर दो साल से विवाद चल रहा था.

र‌विवार को कॉलेज में एक बैठक में आए मंत्री नूर आलम को आक्रोशित भीड़ ने घेर लिया. वहीं मुरारई से तृणमूल विधायक और पशु पालन मंत्री नूर आलम के साथ भीड़ ने मारपीट की और कॉलेज के एक कमरे में बंधक बना लिया.

आक्रोशित भीड़ ने मंत्री जी को सुबह 11.30 बजे से रात 8 बजे तक बंधक बनाए रखा. वहीं इस मामले में अधीक्षक का कहना है कि भारी पुलिस बल मौजूद था. मंत्री को ज्यादा चोटें नहीं आईं हैं. इस मामले में न तो कॉलेज प्रशासन और न ही मंत्री की ओर से कोई मामला दर्ज कराया गया है.

इसी बैठक में शामिल अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट विधान रॉय ने बताया कि इस विवादित जमीन के मसले पर आठ सितम्बर को सूरी में फैसला किया जाएगा.

ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है।

-अमलेन्दु उपाध्याय||

अगर अखिलेश का करिश्मा है तो माया की हार कैसे है?


ऐन होली से पहले उत्तर प्रदेश में छप्परफाड़ मिली सफलता से समाजवादी पार्टी में खुशी का माहौल है। हो भी क्यो न? आखिर लगातार पांच साल सत्ता से बाहर रहकर पहली बार पार्टी प्रदेश की सरकार में आ रही है। लेकिन जितना खुशी का माहौल सपा में है उससे कई लाख गुना खुशी का माहौल हमारे मीडिया में व्याप्त है। बड़े-बड़े दिग्गज सपा की इस जीत पर युवराज अखिलेश की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं और अखबारों के मुखपृष्ठ पर विशेष संपादकीय लिखकर ये बताने का कार्य किया जा रहा है गोया प्रदेश में कोई बहुत बड़ी क्रांति हो गई है और बस उत्तर प्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है।
दरअसल हमारा मीडिया कुछ ज्यादा अतिउत्साही है। अखिलेशमय मीडिया की मौजूदा तस्वीर देखकर मुझे वर्ष 2007 का मई का महीना याद आ रहा है। हमारे यही मीडिया के सुधीजन प्रदेश में मायावती की ताजपोशी पर भी इसी तरह मायामय नज़र आ रहे थे और कई बड़े पत्रकार तो इस हद तक पहुंच गए थे कि  मायावती की जीत को दूसरी आजादी बता रहे थे ठीक उसी तरह जैसे कुछ दिन पहले अन्ना आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। लेकिन ज्यादा समय नहीं गुजरा कि यही मीडिया मायावती के पीछे हाथ धोकर पड़ गया जैसे 2003 और 2004 में मुलायम सिंह के पीछे पड़ गया था। सवाल यह है कि क्या हमारे बड़े पत्रकार वास्तव में कभी बड़े बन भी पाएंगे या ऐसी ही बचकानी हरकतें करते रहेंगे?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा को जो जीत मिली है उसमें उसके संघर्ष का भी योगदान है। लेकिन क्या केवल उसके संघर्ष से ही उसे ये जीत मिल गई है? क्या इस जीत में प्रदेश के मुस्लिम मतदाता और मायावती के कुशासन का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत में जातीय जुगलबंदी का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत का श्रेय

अकेले अखिलेश को दिया जाना उचित है, इसमें आज़म खां और शिवपाल और स्वयं मुलायम सिंह का कोई रोल नहीं है? अगर मीडिया में आ रहे विश्लेषणों पर नज़र डालें तो ऐसा ही लगता है गोया बस प्रदेश में अखिलेश ही अखिलेश हैं बाकी सब कूड़ा करकट हैं।
अहम प्रश्न यह है कि अगर ये केवल अखिलेश का कमाल है तो यह कमाल 2009 के लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? 2007 के विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? उस समय भी अखिलेश मैदान में थे फिर कमाल क्यो नहीं हुआ? आखिर अखिलेश ने पिछले दिनों वे कौन से महत्वपूर्ण कार्य किए जिनके कारण उनका जादू चल गया? बसपा नेत्री मायावती जब बोलती हैं तो बहुत कर्कश और कटु बोलती हैं लेकिन बात सीधे कहती हैं फिर चाहे किसी को बुरी लगे या भली। चुनाव हारने के बाद उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में जो कहा वह उनकी हताशा और बदजुबानी कहा जा सकता है लेकिन सत्य यही है कि बसपा को मुसलमानों और भाजपा व कांग्रेस ने मिलकर हराया है न कि सपा ने!

कांग्रेस ने जिस तरह ऐन चुनाव के वक्त ओबीसी आरक्षण में मुस्लिम कोटा का दांव चला उससे साफ संकेत गया कि यह मुसलमानों की बेहतरी के लिए नहीं बल्कि चुनावी फायदे के लिए किया गया है। इस मुद्दे को लेकर जिस तरह भाजपा आक्रामक हुई और बसपा से टूटे हुए नेता बाबू सिंह कुशवाहा पिछड़ों के नेता के रूप में उसके साथ जुटे उससे लगने लगा कि प्रदेश में भाजपा मजबूत हो रही है और इस डर ने मुस्लिम मतदाताओं के सामने यह स्थिति पैदा कर दी कि वे मायावती के कुशासन के खिलाफ और भाजपा को रोकने के लिए सपा के साथ हो जाएं। और यही स्थिति बन गई। अब इसमें अखिलेश का कितना योगदान है? और अगर इसे अखिलेश का करिश्मा बताया जा रहा है तो मायावती को कोसना बंद कीजिए। क्योंकि ये अखिलेश का करिश्मा है तो मायावती सरकार की नाकामी कहां से है?
इसी तरह बसपा ने ऐन चुनाव से पहले अपने लगभग आधे विधायकों के टिकट काटे। इनमें से अधिकांश चुनाव लड़े और उन सभी ने बसपा को ही नुकसान पहुंचाया।
प्रचारित किया जा रहा है कि धर्म और जाति से ऊपर उठकर यह जनादेश आया है। तो अखिलेश और मुलायम ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर तो वोट मांगा नहीं था और न सपा ने। फिर यह जाति और धर्म से ऊपर जनादेश कैसे हो गया? और अगर ये जाति धर्म से ऊपर उठकर जनादेश है तो क्या सपा भी इससे ऊपर उठकर पांच साल तक बिना राग द्वेष के सरकार चलाएगी?

अमलेन्दु उपाध्याय

सपा के पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के खतरों के संकेत मिलना शुरू हो गए हैं। आशंकाएं निरी निर्मूल नहीं हैं और न पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। सरकार बनने की सूचना मिलते ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर जिस तरह से उत्पात मचाया है और पत्रकारों के साथ भी मारपीट की है उससे भविष्य के पांच साल का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस यज्ञ में पहली आहुति जिन लोगों ने दी है वे कोई मामूली लोग नहीं हैं। संभल में जिन विधायक जी के विजय जुलूस में गोली चली है वे सपा के एक बड़े थिंक टैंक महासचिव के बहुत खास हैं और इतने प्रभावशाली हैं कि उनके कारण ही बड़े मुस्लिम नेता शफीकुर्रहमान वर्क को पार्टी छोड़नी पड़ी थी। इसी तरह झांसी में मिनी मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले एक नेता जी शिवपाल सिंह के पार्टी की कमान संभालने से पहले प्रदेश में पार्टी की कमान संभालते थे, वहां भी जो घटनाएं हुई हैं वे भविष्य की कहानी कह रही हैं। इन घटनाओं से पार्टी अगर सबक लेती है तो ठीक है, वरना जो मीडिया आज अखिलेशमय नज़र आ रहा है वही चार महीने में उनके खिलाफ उसी तरह खड़ा नज़र आएगा जैसे पिछले पांच सालों में मायावती के खिलाफ खड़ा था और पिछली सरकार में मुलायम सिंह के खिलाफ खड़ा था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

वंशवाद को नहीं, जनता के फैसले को तरज़ीह: चौथी बार भी मुलायम ही बनेंगे मुख्यमंत्री

- शिवनाथ झा।।

वंशवाद से ऊपर उठें, उसके लिए सोचें जिसने आपके सर विजय का ‘सेहरा’ बांधा है”: मुलायम

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अपने परिवार और सभी सगे सम्बन्धियों को स्पष्ट तौर पर आगाह किया है कि “वंशवाद” से ऊपर उठ कर उत्तर प्रदेश के आवाम के बारे में सोचें जो समाजवादी पार्टी में अपना विश्वास जताया है और आपको ‘सरकार बनाने लायक’ बनाया है। 

होली के अवसर पर जहाँ परिवार और सम्पूर्ण प्रदेश में ख़ुशी का माहौल है, मुलायम सिंह यादव अपने परिजनों को यह कहते सुने गए: “मुख्यमंत्री कौन बनेगा यह निर्णय जनता करेगी ना कि हम सभी सगे-सम्बन्धी घर में बैठकर अपना निर्णय उनपर थोपें।” समाजवादी पार्टी के संसदीय बोर्ड ने मुलायम सिंह यादव को आगामी 10 मार्च विधान मंडल का नेता चुनने का अधिकार दिया है। मुलायम सिंह के बहुत ही नजदीकी सूत्रों ने आज मीडिया दरबार को बताया कि “नेताजी किसी भी परिस्थिति में अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री बनाने के पक्ष में नहीं है, क्योकि इससे पार्टी के साथ साथ परिवार में भी विघटन की सम्भावना है। वैसे अखिलेश भी “पिता की राजनीतिक सूझ-बूझ और कद के सामने खड़े नहीं होना चाहते हैं।”

सूत्रों के अनुसार, मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव भी नहीं चाहते हैं की अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री का कार्य-भार सौंपा जाये। सूत्रों ने बताया कि वैसे तो शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के अनन्य भक्त हैं और उनके निर्णय को चुनौती नहीं देंगे, लेकिन पारिवारिक स्तर पर अखिलेश यादव को बनाने पारिवारिक के अस्थिरता का वातावरण आ सकता है। वैसे मुलायम और अखिलेश दोनों ही प्रदेश के राज्यपाल श्री बनवारी लाल जोशी को इस बात से आश्वस्त कर चुके हैं कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा यह 10 मार्च को तय होगा।

सूत्रों के अनुसार, वैसे इस चुनाव परिणाम में अखिलेश यादव की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन “अखिलेश यादव में उतनी राजनितिक सूझ-बूझ नहीं है जो आने वाले दिनों में कांग्रेस के अतिरिक बहुजन समाज पार्टी या भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश के साथ साथ राष्ट्रीय नेताओं की ‘गहरी चाल’ को समझ सकें। इसलिए इस बात की कोशिश जारी है कि समाजवादी पार्टी के संगठनात्मक स्वरुप को और अधिक मजबूत बनाने के साथ साथ प्रदेश के विकाश सम्बन्धी कार्यों का सम्पूर्ण भार अखिलेश और उनके कोर-ग्रुप के सभी सदस्यों को सौंपा जाय वह भी मत्रिमंडल में केबिनेट मंत्री के रूप में आसीन कर।”

यह पूछने पर कि ब्रह्म शंकर त्रिपाठी और मनपाल सिंह की क्या भूमिका होगी जो अखिलेश को मुख्य मंत्री बनाने के लिए आमादा हैं, एक आंतरिक सूत्र ने बताया, “ये सभी नेताजी (मुलायम सिंह) से बात किये हैं और अखिलेश यादव द्वारा चुनाब से पूर्व किये गए वादे को दुहराया है (जिसमे मुख्य मंत्री का पड़ भी एक है), लेकिन प्रदेश में आने वाली दिनों में जो उथल-पुथल होने का संकेत दिख रहा है, उसे मद्देनज़र रखते हुए सभी शांत हैं।”

यह पूछने पर कि आज़म खान की भूमिका क्या होगी? सूत्र के अनुसार, “आजम खान के अतिरिक्त पार्टी के कुछ अन्य लोगों के ‘इगो-वार’ के कारण पार्टी एक बार झटका खा चुकी है और इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि नेताजी (मुलायम सिंह) उस हादसे से अब तक बाहर नहीं आ पाए हैं, लेकिन इस बार ऐसी कोई अप्रिय घटना ना हो, इसके लिए नेताजी सबों पर विशेष ध्यान रखे हुए हैं।”

ग़ौरतलब है कि फरवरी 2010 में समाजवादी पार्टी से महासचिव अमर सिंह और सांसद जया प्रदा को पार्टी से निष्काषित कर दिया गया था। सूत्रों का मानना है कि आधिकारिक तौर पर जो भी वजह बताये गए हों, लेकिन वह वास्तविकता से परे है। पार्टी के कुछ लोग (जो आज भी सक्रिय सदस्य हैं) समाजवादी पार्टी में अमर सिंह को नहीं देखना चाहते थे। लेकिन, आज भी समाजवादी पार्टी के अस्तित्व को इतनी दूर तक लाने में नेताजी अमर सिंह की भूमिका को नहीं भूल पाए हैं”। इस विषय में अमर सिंह से संपर्क नहीं हों सका।

मुलायम सिंह यादव सबसे पहले 1989 में मुख्य मंत्री बने। लेकिन 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह कि सरकार गिरने के बाद वे चन्द्र शेखर के जनता दल (समाजवादी) में चले गए और कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाये रखे। लेकिन अप्रील 1991 में कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस ले लेने के कारण सरकार गिर गयी।

मुलायम सिंह यादव ने 7 अक्तूबर 1992 को समाजवादी पार्टी का गठन किया और बहुजन समाज पार्टी से साथ चुनाव लड़कर भारतीय जनता पार्टी को सरकार बने से रोका। इस समय फिर कांग्रेस ने साथ दिया। मुलायम सिंह यादव तीसरी बार मुख्य मंत्री सितम्बर 2003 में बने थे।

इस्‍तीफे के बाद मायावती ने कहा – मुसलमान और मीडिया ने हरा दिया बसपा को

लखनऊ : बसपा प्रमुख एवं सीएम मायावती ने बुधवार को राज्‍यपाल बीएल जोशी को अपना इस्‍तीफा सौंप दिया। मीडिया से बचती-बचाती वे इस्‍तीफा देने के लिए राजभवन पहुंचीं। इस्‍तीफे के बाद उन्‍होंने मीडिया को संबोधित किया। इस दौरान उन्‍होंने हमेशा की तरह लिखित बयान पढ़ा। मायावती ने बसपा के हार के कारणों को तो गिनाया ही साथ ही उन्‍होंने इसके लिए मीडिया को भी जिम्‍मेदार बताया। उन्‍होंने कहा कि भाजपा-कांग्रेस के चलते यूपी अब गलत हाथों में पहुंच गया है। इसके बाद उन्‍होंने शब्‍दश: जो कहा वो नीचे है।

”उत्तर प्रदेश के नतीजे घोषित हो चुके हैं और ये हमारी पार्टी के अनुकूल न आने के कारण आज मैंने विधान सभा भंग करने की सिफारिश करने के साथ-साथ अपने मुख्यमंत्री के पद से भी इस्तीफा महामहिम राज्यपाल को सौंप दिया है। हालांकि मेरी इस सरकार के बारे में वैसे आप लोगों को ये भी मालूम है कि मैंने सन 2007 में हर स्तर पर कितनी ज्यादा खराब हालातों में प्रदेश की सत्ता अपने हाथों में ली थी, जिन्हें सुधारने में मेरी सरकार को काफी ज्यादा मेहनत करनी पड़ी है जबकि इस मामले में मेरी सरकार को सहयोग देने में विरोधी पार्टियों की तरह केंद्र सरकार का भी रवैया ज्यादातर नकारात्मक रहा है। इस सबके बावजूद भी मेरी सरकार ने अपनी पार्टी की सर्वजन-हिताय व सर्वजन-सुखाय की नीति के आधार पर चलकर यहां विकास व कानून व्यवस्था के साथ-साथ सर्व समाज में गरीबों, मजदूरों, छात्राओं, कर्मचारियों आदि के हितों के लिए हर मामले में व हर स्तर पर महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक कार्य किए हैं। प्रदेश में बिजली की खराब स्थिति को सुधारने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं जिनका फायदा 2014 तक प्रदेश की जनता को मिल जाएगा।

दुख की बात यह है कि प्रदेश में अब सत्ता ऐसी पार्टी के हाथों में आ रही है जो सभी विकास कार्यों को ठंडे बस्ते में डालकर एक बार फिर प्रदेश को कई वर्ष पीछे ले जाएगी। इसके लिए हमारी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस के गलत स्टैंड को ही जिम्मेदार मानकर चलती है। इस बारे में आप लोगों को यह भी मालूम है कि कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में विधानसभा आम चुनाव घोषित होने के तुंरत बाद ही अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जब मुस्लिम समाज के पिछड़े हुए लोगों को ओबीसी के कोटे में से आरक्षण देने के बात कही, तब बीजेपी ने उसका काफी डंटकर विरोध किया था। इतना ही नहीं बल्कि इस मुद्दे की आड़ में बीजेपी ने भी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रदेश में अग्रणी समाज के साथ-साथ ओबीसी वोटों को भी अपने ओर खींचने की कोशिश की थी, जिसके बाद प्रदेश के मुस्लिम समाज को यह डर सताने लगा था कि कहीं प्रदेश में फिर बीजेपी की सत्ता न आ जाए। इसी स्थिति में कांग्रेस को कमजोर देखते हुए, आरक्षण के मुद्दे पर बीएसपी से अपर कास्ट समाज व पिछडे़ वोटों को बीजेपी में जाने के डर से मुस्लिम समाज ने सपा को वोट किया। इसी कारण से प्रदेश के मुस्लिम समाज ने कांग्रेस और बसपा को अपना वोट न देकर अपना 70 फीसदी वोट इकतरफा तौर पर सपा को दे दिया। यही कारण है कि सिर्फ मुस्लिम वोटों के कारण ही सपा के ओबीसी, अग्रणी समाज और अन्य समुदायों के लोगों का वोट भी जुड़ जाने के कारण सपा के प्रत्याशी चुनाव जीते। मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर सपा के मुसलमान उम्मीदवार इस बार आसानी से चुनाव जीत गए।

प्रदेश में दलितों के वर्ग को छोड़कर ज्यादातर हिंदू समाज में से खास तौर पर अपर कास्ट समाज का वोट कई पार्टियों में बंट जाने के कारण सपा के उम्मीदवारों को ही मिला। कुछ अपर कास्ट हिंदू वोट बसपा को मिले, कुछ कांग्रेस को और बाकी बीजेपी को मिला। अपर कास्ट समाज का वोट बंटने के बाद सपा के समर्थन में परिणाम आने के बाद से प्रदेश का अग्रणी हिंदू समाज दुखी महसूस कर रहा है। लेकिन फिर भी हमारी पार्टी के लिए इस चुनाव में पहले से भी ज्यादा संतोष की बात यह रही है कि विरोधी पार्टियों के हिंदू-मुस्लिम वोटों के चक्कर में बीएसपी का अपना दलित बेस वोट बिलकुल भी नहीं बंटा है। दलित वर्ग के लोगों ने पूरे प्रदेश में अपना इकतरफा वोट बीएसपी के उम्मीदवारों को दिया है। इसी कारण हमारी पार्टी इस चुनाव में दूसरे नंबर पर बनी रही। वरना हमारी पार्टी बहुत पीछे चली जाती। मैं अपने दलित समाज के लोगों का दिल से धन्यवाद और आभार प्रकट करती हूं। इसके साथ-साथ मैं अपनी पार्टी से जुड़े मुस्लिम समाज व अन्य पिछड़ा वर्ग और अग्रणी जाति समाज के उन लोगों का भी दिल से शुक्रिया अदा करती हूं, जो इस चुनाव में किसी भी लहर में गुमराह नहीं हुए और बहकावे में नहीं आए और हमारी पार्टी से जुड़े रहे। हमारी पार्टी में सर्वसमाज के 80 उम्मीदवार चुनाव जीतकर आए हैं।

इसके साथ ही यहां मैं यह भी कहना चाहती हूं कि अब हमारी पार्टी दलितों की तरह यहां प्रदेश में अन्य सभी समाज के लोगों को भी कैडर के जरिए हिंदू-मुस्लिम मानसिकता से बाहर निकालने की भी पूरी-पूरी कोशिश करेगी ताकि इस बार के चुनाव की तरह आगे अन्य किसी भी चुनाव में हमारी पार्टी को इस तरह का कोई भी नुकसान न पहुंच सके। अंत में मेरा यही कहना है कि अब प्रदेश की जनता बहुत जल्द ही सपा की कार्यशैली से तंग आकर, जिसकी शुरुआत कल से हो चुकी है, बीएसपी के सुशासन को जरूर याद करेगी और मुझे यह पूरा भरोसा है कि अगली बार प्रदेश की जनता फिर से बसपा को पूर्ण बहुमत से सत्ता में लाएगी।

मैं प्रदेश की पुलिस और प्रशासन से जुड़े सभी छोटे-बड़े अधिकारियों का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं, पूरी अवधि में उन्होंने मुझे सरकार चलाने में सहयोग किया और 2009 के लोकसभा चुनाव और प्रदेश में 2012 के आम चुनाव करवाने में सहयोग का भी आभार प्रकट करती हूं। भ्रष्टाचार का मेरे शासन के जाने से कोई लेना देना नहीं है। बसपा को मुस्लिम वोटों के ध्रुविकरण के कारण नुकसान पहुंचा। कांग्रेस और बीजेपी और मीडिया जिम्मेदार हैं। प्रदेश की जनता के साथ अब जो भी होगा उसके लिए जनता कांग्रेस और बीजेपी के साथ-साथ मीडिया को भी कोसेगी।”

उनके लिखित भाषण के बाद पत्रकारों ने उनसे कई सवाल पूछे परन्‍तु उन्‍होंने ज्‍यादातर सवालों के जवाब नहीं दिए। पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में कहा कि जनता में उनकी सरकार के प्रति गुस्‍सा नहीं था, बल्कि भाजपा-कांग्रेस की गलत नीतियों के चलते मुसलमानों के वोट एकमुश्‍त सपा को चले गए, जिसके चलते बसपा कम सीटें मिलीं। उन्‍होंने कहा कि अगर जनता नाराज होती तो बसपा का हाल बिहार में लालू की पार्टी जैसा हो जाता। उन्‍होंने उत्‍तराखंड में बसपा के कदम के बारे में पूछे गए जवाब को भी टाल दिया तथा कहा कि आप सबको इसकी जानकारी प्रेस नोट से मिल जाएगी।

फिल्म, पैसा और राजनीति: तुझसे नाराज नहीं, हैरान हूँ मैं

-प्रशांत शर्मा ।।
फिल्मों का राजनीति में काफी असर होता है यह पता था लेकिन राजनीति से फिल्में भी प्रभावित होती हैं ये अब पता चला। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘जोड़ी ब्रेकरर्स’ मुझे काफी पसंद आई लेकिन उम्मीद के अनुसार ये मुनाफा नहीं कमा सकी। इसके पीछे का राज जानने के लिए मैंने काफी सोच विचार किया। लेकिन ‘बॉडीगार्ड’ फिल्म के इस डायलॉग ने ‘मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान न करना’ सारी पहेली सुलझा दी।

जब चुनाव से पहले कोई भी राजनीतिक दल किसी से भी जोड़ी नाने को तैयार नहीं थे और सभी दो टूक कह रहे थे कि ‘मुझ पर एक एहसान करना कि मुझसे कोई गठबंधन न करना’। फिर यूपी के ‘अग्निपथ’ में ‘जोड़ी ब्रेकरर्स’ का रिलीज होना कैसे गले उतरेगा।

पिछले चुनाव में दोधारी तलवार बनकर उभरी माया की धार इस बार कमजोर होती दिख रबही है। इससे गदगद मुलायम जी बीएसपी पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि ‘हम तुम्हें इतनी सीटों से हराएंगे कि कन्फ्यूज हो जाओगे कि दोष किसको दे और मुंह कहां छुपाएं’। इस बार के यूपी चुनाव में प्रियंका गांधी अपनी पार्टी के लिए स्टार प्रचारक बनके घूमती रहीं। कई लोग इसे भाई को यूपी की सत्ता दिलाने के लिए बहना का प्रेम बता रहे थे। लेकिन मुझे लग रहा है कि भाइया को यूपी के गरीबों के घर का खाना इतना पसंद आ गया है कि बहना अब ‘अपने ब्रदर की दुल्हन‘ तलाशने लग गई हैं।

सल्लू मियां की ‘दबंग’ का एक गाना काफी चर्चा में रहा ‘मुन्नी बदनाम हुई’। यह गाना राजनेताओं को बहुत पसंद आ जाएगा यह नहीं सोचा था। इस गाने के बदनाम शब्द को राजनीति में इतना तवज्जो दी गई कि नेताओं में बदनाम होने की होड़ लग गई। कई सफेदपोशों ने विद्या बालन के उस डायलॉग को अपना लिया-‘कुछ लोगों का नाम उनके काम से होता है मेरा बदनाम होकर हुआ है’।

22 वर्षों पहले जनता दल ने यूपी की सत्ता से कांग्रेसियों के हाथ ‘ये सत्ता हमको दे दो कांग्रेसियों’ कहकर काट दिए थे। इस बार न सिर्फ कांग्रेस ने बल्कि बीजेपी ने भी सत्ता पाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। मगर न ही कांग्रेस के हाथ जुड़ते दिख रहे हैं न कमल दलदल से उभरता। अभी हाल ही में डर्टी पिक्चर ने खूब धमाल मचाया। उस फिल्म में एक डायलॉग बोला गया ‘फिल्म सिर्फ तीन चीजों से चलती है इंटरटेन्मेंट, इंटरटेन्मेंट, इंटरटेन्मेंट’। मगर राजनीति सिर्फ एक चीज से चलती है ‘तिकड़म’।

अभी सुनने में आया है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने बोलना शुरू कर दिया है। मैंने जब इसकी वजह पता की तो वह सलमान खान की एक फिल्म निकली। ‘वॉन्टेड’ में सलमान ने कहा ‘एक बार जो मैंने कमिटमेंट कर दिया उसके बाद तो मैं खुद की भी नहीं सुनता’। इससे हमारे प्रधानमंत्री जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ठान लिया कि एक बार जो वो फैसला कर देंगे उसके बाद वे सोनिया जी की भी नहीं सुनेंगे!

राजनीति को समझने के लिए फिल्मों ने मुझे बहुत सहारा दिया। एक फिल्म के डायलॉग सुनकर अब मैं समझ चुका हूँ कि सत्ता न ही राजनेताओं की चाहत है न जरूरत वो सिर्फ उनकी ‘आदत’ है।

 

समाजवादियों में परिवारवाद?: कौन बनेगा मुख्यमंत्री पर तेज होने लगी माथापच्ची

- अमलेन्दु उपध्याय

एक्जिट पोल्स बता रहे हैं कि समाजवादी पार्टी थोक भाव में सीटें लाकर सरकार बनाने जा रही है. उधर ख़बरें आने लगी हैं कि मुलायम सिंह यादव के ज्येष्ठ पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. ताल खुदने से पहले ही मेंढकों ने टर्र-टर्र करना शुरू कर दिया है. सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने लगभग आदेश की मुद्रा में कह दिया है कि अखिलेश मुख्यमंत्री  बने तो उन्हें अच्छा लगेगा. गोया उत्तर प्रदेश मास्टर साहब की जागीर है सो उन्हें जो अच्छा लगे वही किया जाये.दरअसल ये पार्टी के चुनकर आने वाले विधायकों को आदेश है कि युवराज की ताजपोशी के लिए तैयार रहो.  लेकिन मास्टर रामगोपाल से पुरानी अदावत रखने वाले मुलायम सिंह यादव के सगे अनुज शिवपाल यादव ने बयान दे दिया है कि मुख्यमंत्री नेता जी बनेंगे, यानी इशारों इशारों में उन्होंने साफ़ कह दिया है कि अखिलेश इतनी आसानी से मुख्यमंत्री कैसे बन जायेंगे?

उधर पार्टी के फायर ब्रांड नेता मोहम्मद आज़म खान ने अपना कोई तीर नहीं खोला है. याद हो कि जब अखिलेश क्रान्ति रथ लेकर प्रदेश के दौरे पर निकले थे तब आज़म खान ने ही उन्हें हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था. पार्टी के अंदरूनी सत्ता संग्राम में अब सबकी निगाहें उनकी तरफ लग गई हैं क्या अब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनने को वह लाल झंडी दिखाएँगे? चुनाव के दौरान जिस तरीके से अखिलेश की तरफ से आज़म खान के खिलाफ दांव चले गए उससे खान साहब तिलमिलाए हुए हैं. जो लोग आज़म खान को जानते हैं उन्हें मालूम है कि उनके शब्दकोष में “माफी” नाम की जगह नहीं है. वह किसी को माफ़ नहीं करते हैं. ऐसे में अखिलेश की राह में कांटे ही कांटें हैं.

सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि अगर सरकार सपा की बन रही है तो इसमें अखिलेश का क्या योगदान है? सही मायनों में इसमें योगदान तो सबसे ज्यादा बहन जी का है. अगर मायावती पिछले पांच साल के शासनकाल को राग द्वेष से ऊपर उठकर सही प्रशासन दे पातीं और उनकी सरकार में जबरदस्त लूटपाट न मची होती तो क्या सपा को यह अवसर मिल सकता था? मुलायम सिंह जी को चाहिए कि अगर उनकी सरकार बनने की किसी तरह नौबत आ जाये तो मिठाई का डिब्बा लेकर सबसे पहले बहन जी के पास जाएँ.

वैसे सवाल यह है कि अखिलेश का पार्टी के लिए योगदान क्या है? अगर अखिलेश ही मुख्यमंत्री बनते हैं तो तो सपा का और राजनीति का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं होगा. अगर अखिलेश का सिर्फ यही योगदान है कि वे मुलायम सिंह जी के पुत्र हैं तो उनसे ज्यादा अच्छे तो प्रतीक यादव रहेंगे, वे भी नेता जी के पुत्र हैं और अखिलेश के मुकाबले ज्यादा युवा हैं.

और सवाल यह भी है कि  मुलायम सिंह जी के बाद अखिलेश का ही नंबर क्यों? नौ प्रतिशत यादव मतदाता के बल पर  तीन बार मुख्यमंत्री और अब बेटे की बारी. सामाजिक न्याय के योद्धा और डॉ. लोहिया के वारिस नेता जी का दल  1993 से जिन 18 प्रतिशत मुसलमानों के बल पर सत्ता में आता रहा और राजनीति में मलाई काटते रहे उन मुसलामानों में से किसी को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बना सकता? या जिन्होंने पार्टी को खडा किया और तमाम दुश्वारियों के बावजूद पार्टी का दामन नहीं छोड़ा वो कार्यकर्ता मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता?

अगर “सपा” प्रोप्राइटर फर्म नहीं है तो आज़म खान को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए, अगर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है तो शिवपाल सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए क्योंकि पूरे पांच साल मायावती सरकार के थप्पड़ और सिपाहियों के घूंसे तो शिवपाल ने ही खाए हैं.. और प्रोप्राइटर फर्म है तो फिलहाल अखिलेश बेहतर रहेंगे, लेकिन समाचार चैनल्स के एक्सिट पोल्स सुनकर दिल बहुत जोर जोर से काँप कर रहा है. खुदा करे ये झूठे साबित हों. अगर ये सच हो गए तो पूरा प्रदेश एक अजब किस्म की आग में झुलसने वाला है. नेता जी के कर्णधारों ने गुंडागर्दी मचाने की तैयारियां पूरी कर ली बताई जाती हैं.

हालांकि तर्क दिया जा रहा है कि डीपी यादव के मामले पर अखिलेश ने समझदारी दिखाई है। पार्टी के लिए यह एक मौका है। लेकिन प्रति प्रश्न है कि डी पी यादव के मसले पर जैसी समझदारी दिखाई वैसी समझदारी श्री भगवान् शर्मा उर्फ़ गुड्डू पंडित के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? वीर सिंह के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? अमरमणि के पुत्र अमनमणि के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? क्या डी पी यादव, इन महानुभावों से भी गए गुजरे हैं? राजनीति में आने के बाद न तो डीपी यादव के ऊपर अपराध के कोई आरोप लगे हैं और न उससे पूर्व भी उनके अपराध उस श्रेणी के थे जिस श्रेणी के अपराध अमरमणि और गुड्डू पंडित के थे. फिर इस भोथरे तर्क का असल मकसद क्या है?

दरअसल ये चुनाव के दौरान ही मुलायम सिंह की तरफ से अखिलेश की राह आसान बनाने के लिए और आज़म खान को किनारे करने के लिए चला गया दांव था. इसलिए अखिलेश से ही डीपी का प्रवेश रोकने का बयान दिलवाया गया और प्रचारित किया गया कि पार्टी दागियों से किनारा कर रही है. अगर डीपी यादव भी पार्टी में आ जाते तो जाहिर है अंदरूनी सता संग्राम में वे आज़म खान के साथ होते. चूंकि वे आज़म खान के घर पर ही पार्टी में शामिल होने पहुंचे थे और शिवपाल भी इस समूह में शामिल हो जाते तो अखिलेश के राह और ज्यादा काँटों भरी हो जाती. इसीलिये डीपी का प्रवेश रोका गया न कि इसलिए कि पार्टी दागियों से किनारा कर रही है.

अगर पार्टी वास्तव में गुंडा तत्वों से किनारा कर रही है तो बदायूं, एटा, कांशीराम नगर, फिरोजाबाद, जैसे इलाकों समेत पूरे प्रदेश में हर जिले में पार्टी की कमान उन्हीं लोगों के हाथों में क्यों है जिनके ऊपर पिछली सरकार में गुंडागर्दी करने और जनता पर ज़ुल्म करने के आरोप हैं. क्या किसी एक भी जिले में इन क्षत्रपों में से किसी एक का भी टिकट काटा गया?
अगर वाकई में सपा सरकार में आने वाली है तो तैयार रहिये पूरा प्रदेश एक अजब किस्म की आग में झुलसने वाला है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

 

पोर्न देखने वाले विधायकों पर कार्रवाई की बजाय मीडिया पर ही रोक लगाने की तैयारी

विधानसभा में तीन मंत्रियों द्वारा अपने मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो क्लिपिंग देखने का मुद्दा सामने आने से परेशान कर्नाटक सरकार परेशान है। चौतरफा मुश्किलों से घिरी सरकार सदन के भीतर निजी टीवी चैनलों के कैमरों पर प्रतिबंध लगा सकती है। सरकार ने कहा है कि वह संसद की मीडिया नीति जैसी व्यवस्था पर विचार कर रही है। पर इस संबंध में पीठासीन अधिकारियों को फैसला करना है। इधर, पोर्न वीडियो प्रकरण में विधायकों से पहले पत्रकारों से पूछताछ किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया है।

हालांकि दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा ने सफाई दी है कि सरकार मीडिया को विधानसभा और विधानपरिषद में प्रवेश अथवा उसकी कवरेज से रोकेगी नहीं। उसकी स्‍वतंत्रता से कोई छेड़छाड़ नहीं किया जाएगा। जबकि जांच समिति ने इस प्रकरण को प्रसारित करने वाले टीवी चैनलों से शुरू में सवाल पूछने के समिति के फैसले से विवाद खड़ा हो गया है। समिति ने विधायकों से पूछताछ करने की बजाय क्लिपिंग दिखाने वाले चैनल तथा उसके पत्रकारों से पूछताछ की है।

दरअसल, अलग-अलग समाचार चैनलों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो वरिष्ठ पत्रकार बुधवार और गुरुवार को समिति के समक्ष उपस्थित हुए। उनसे समिति ने कई सवाल-जवाब किए। समिति के इस कदम पर मीडिया ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। वह इसे आरोपी पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय अपने ऊपर निशाना साधे जाने की चाल के रूप में देख रही है। अभी तक पोर्न वीडियो देखते पाए गए तीनों विधायक लक्ष्मण एस सावदी, सीसी पाटिल और जे कृष्ण पालेमर को तलब करने के बारे में कोई फैसला नहीं किया गया है। हालांकि समिति ने मीडिया के सवाल के जवाब में बताया है कि उन्‍हें बुलाने का फैसला कर लिया गया है।

इस संदर्भ में समिति के प्रमुख श्रीशैलप्पा बीदादुर ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि इस बारे में फैसला कर लिया गया है। आपको बाद में जानकारी मिल जाएगी। उन्होंने बताया कि समिति की अगली बैठक आठ मार्च को होगी। उन्होंने यह बताने से इंकार कर दिया कि तीनों विधायक समिति के समक्ष कब अपना बयान देंगे। गौड़ा ने नई दिल्ली में कहा कि मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। हमने मीडिया की निजता में दखल नहीं दिया। हम संसदीय प्रणाली की तर्ज पर सोच रहे हैं। इस प्रणाली के अंतर्गत निजी टीवी चैनलों के सदन में प्रवेश की इजाजत नहीं है।

बीबीसी के अतीत का हिस्‍सा बन जाएगा बुश हाउस

खर्चे अब बीबीसी पर भारी पड़ रहे हैं। खर्चों में कटौती के चलते बीबीसी को बुश हाउस से हटाया जा रहा है। सात दशकों तक देश-दुनिया के तमाम बदलावों और घटनाक्रम के प्रसारण का गवाह रहा बुश हाउस अब बीबीसी के अतीत का हिस्‍सा बनकर यहां काम कर चुके पत्रकारों औ कर्मचारियों की यादों में सिमट जाएगा। बीबीसी का कार्यालय अन्यत्र ले जाने की योजना के अन्‍तर्गत अब बीबीसी व‌र्ल्ड सर्विस बुश हाउस से मार्च के शुरू में मध्य लंदन स्थित ब्रॉडकास्टिंग हाउस चला जाएगा।

वित्‍तीय दुश्‍वारियों ने बीबीसी को झकझोर कर रख दिया है। कई भाषाओं में प्रसारण बंद किया जा चुका है। अब मात्र 27 भाषाओं में बीबीसी का प्रसारण किया जा रहा है। लंदन के इन स्ट्रैंड स्थित भारतीय उच्चायोग कार्यालय के बगल में स्थित इस इमारत में दुनिया भर के शीर्ष नेताओं, जानीमानी हस्तियों और प्रमुख लोगों का आना जाना होता था। इन हस्तियों का इंटरव्‍यू लंदन में मौजूद, भारत और अन्य देशों के श्रोताओं के जाने-पहचाने पत्रकार करते थे।

बुश हाउस से दशकों तक बीबीसी की हिन्दी सेवा का प्रसारण हुआ। इंदिरा तथा राजीव गांधी की हत्या जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम का प्रसारण भी यहीं से हुआ। ये वो दौर था जब भारत में नया मीडिया अक्सर सरकार के मुताबिक चलता था। जॉर्ज ओरवेल और वी एस नायपॉल जैसे दिग्गजों ने बुश हाउस में बरसों काम किया। उनके अलावा भारत में हिंदी और अन्य भाषाओं के श्रोताओं के बीच जाने पहचाने पत्रकारों जैसे कैलाश बुधम्वार, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, रत्नाकर भरतिया, हरीश खन्ना, पुरूषोत्तम लाल पाहवा और अचला शर्मा ने भी बुश हाउस में काम किया।

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की शुरुआत 1932 में बीबीसी अंपायर सर्विस के तौर पर हुई थी। भारत की आजादी के पहले इसने 11 मई 1940 को हिन्दुस्तानी सर्विस शुरू कर अपनी पहली दक्षिण एशिया शाखा खोली थी। बर्मीज सेवा की शुरूआत सितंबर 1940 में हुई। इसके बाद बुश हाउस से अन्य भाषाओं की सेवाएं शुरू हुईं। मई 1941 में तमिल सेवा, नवंबर 1941 में बांग्ला सेवा, मार्च 1942 में सिंहली, अप्रैल 1949 में उर्दू सेवा तथा सितंबर 1969 में नेपाली सेवा शुरू की गई। इन सेवाओं के लिए काम कर चुके कई पत्रकारों के लिए बुश हाउस से बीबीसी का हटना एक भावनात्मक मुददा है।

वर्ष 1997 से 2008 तक हिंदी सेवा की प्रमुख रहीं अचला शर्मा ने कहा बुश हाउस में मैंने 24 साल काम किया और वर्ल्ड सर्विस के लिए इससे बेहतर जगह की मैं कल्पना नहीं कर सकती। इमारत में दुनिया भर की अलग अलग भाषाओं के शब्द अक्सर सुनाई देते थे। दुनिया भर में हर दिन होने वाले घटनाक्रमों की गवाह रही है यह इमारत। पर अब यह इमारत इतिहास का हिस्‍सा बनने जा रही है।

पत्रकार याद करते हैं कि बुश हाउस में साक्षात्कार के लिए आई जानी मानी हस्तियों से अनौपचारिक बातचीत भी होती थी। इन हस्तियों में रविशंकर लता मंगेशकर, मेहदी हसन, गुलामी अली, शशि कपूर, इंद्रकुमार गुजराल, टी एन कौल, लालकृष्ण आडवाणी और कुर्तुल.ऐन हैदर प्रमुख रहे। हिंदी सेवा से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार परवेज आलम ने कहा ”बुश हाउस को पेशेवराना अंदाज और मनोरंजन का परिचायक कहा जा सकता है। भारत में बुश हाउस इतना जाना पहचाना है कि कुछ श्रोता तो पते पर केवल ‘बीबीसी, बुश हाउस, लंदन’ लिख कर पत्र भेज देते और वह पत्र हम तक पहुंच जाता।’

उन्होंने कहा, ”बुश हाउस में बिताई गई हर शाम यादगार है। कवि, कलाकार, राजनीतिज्ञ कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के बाद रूकते और यहा के प्रख्यात क्लब में हमारे साथ बैठकर कुछ खाते पीते थे।” बुश हाउस में बरसों तक काम कर चुके भारतीय पत्रकारों में एक पंकज पचौरी भी हैं जो वर्तमान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संचार सलाहकार हैं। बीबीसी व‌र्ल्ड सर्विस को बरसों तक अपने आचल में सहेजने वाली इस इमारत का डिजाइन हार्वे कॉरबेट ने तैयार किया था। यह इमारत 1923 में निर्मित की गई और 1928 से 1935 के बीच इसमें अतिरिक्त निर्माण किया गया।

यह इमारत वास्तव में इरविंग टी बुश की अध्यक्षता वाले आग्ल अमेरिकी व्यापार संगठन के लिए तैयार की गई थी। इरविंग टी बुश के नाम पर ही इस इमारत को बुश हाउस कहा गया। जुलाई 1925 में यह इमारत खोली गई और करीब 20 लाख पाउंड की लागत से निर्मित बुश हाउस को दुनिया की सबसे महंगी इमारत माना गया। इतने लंबे समय में बीबीसी की सभी विदेशी भाषा की सेवाएं धीरे धीरे बुश हाउस में आती गईं। बीबीसी के पास बुश हाउस का मालिकाना हक कभी नहीं रहा। इसका मालिकाना हक चर्च ऑफ वेल्स, पोस्ट ऑफिस के पास रहा और अब यह हक एक जापानी संगठन के पास है। (इनपुट : एजेंसी)

 

बैंक का 52 करोड़ मारने वाले मतंग सिंह के चैनलों की प्रॉपर्टी होगी नीलाम

पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिंह एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। इंडियन ओवरसीज बैंक का करोड़ों रुपया दबाकर बैठ जाने पर बैंक ने रिकवरी नोटिस जारी किया है। हमार टीवी तथा पॉजिटिव मीडिया एवं एम3एम मीडिया के निदेशकों मतंग सिंह, रुपेंद्र नाथ सिंह एवं कुमार संजॉय सिंह के नाम से यह रिकवरी नोटिस नवभारत टाइम्‍स में प्रकाशित कराया गया है। इसमें उल्‍लेखनीय यह है कि निदेशक मंडल में शामिल रहे कुमार संजॉय सिंह काफी पहले ही कंपनी तथा निदेशक मंडल से इस्‍तीफा दे चुके हैं।

बैंक ने अपने नोटिस में बताया है‍ कि हमार टीवी की पूरी सम्‍पत्ति अब बैंक की प्रॉपर्टी हो गया है। कोई इस पर वित्‍तीय लेन-देन ना करे अन्‍यथा किसी भी गड़बड़ी का जिम्‍मेदार वो खुद होगा। कंपनी ने अपने रिकवरी नोटिस में कहा है कि अगर हमार टीवी और पॉजिटिव मीडिया ग्रुप ने अस्‍सी दिनों के भीतर बैंक का बकाया रकम 52,39,78,370 रुपये नहीं लौटाए तो हमार टीवी की पूरी प्रॉपर्टी उसकी होगी। बैंक ने नोएडा के सेक्‍टर चार में स्थित प्‍लाट नम्‍बर ए30 को अपनी प्रॉपर्टी घोषित किया है।

मतंग सिंह फिर मुश्किलों में आ गए हैं। अपनी पत्‍नी से तलाक एवं अपने चैनलों में कर्मचारियों का पीएफ न देने को लेकर वह काफी विवादों में रहे हैं। बीच में कांग्रेस में वापसी को लेकर भी उनकी स्थिति काफी हास्‍यास्‍पद हो गई थी। दिग्विजय सिंह की उपस्थिति में उन्‍होंने कांग्रेस ज्‍वाइन किया था पर अगले ही दिन पार्टी प्रवक्‍ता मनीष मिश्रा ने उनकी कांग्रेस में वापसी को पूरी तरह नकार दिया था। इस पर भी मतंग सिंह की काफी छीछालेदर हुई थी। अब बैंक द्वारा डिफाल्‍टर घोषित होने के बाद उनकी बची खुची इज्‍जत भी जाने के कगार पर है।

बैंक ने अपने नोटिस में लिखा है कि नोएडा के सेक्‍टर चार स्थित हमार टीवी नेटवर्क की 610322 स्‍कावयर फीट की पूरी सम्‍पत्ति उनकी है। हालांकि मतंग सिंह सेक्‍टर चार के ए ब्‍लाक में प्‍लाट नम्‍बर 29 और 30 दोनों के मालिक हैं। 29 नम्‍बर प्‍लाट पर महिलाओं के चैनल फोकस टीवी का ऑफिस है। बताया जा रहा है नकि अस्‍सी दिन तक अगर मतंग सिंह की कंपनी बैंक को पैसा वापस नहीं लौटा पाई तो पूरी बैंक उस सम्‍पति को अपने कस्‍टडी में लेकर उसकी नीलामी करेगा।

मिन्‍नतों के बाद भी नहीं माने पत्रकार, बयान को हटाने को लेकर गतिरोध जारी

जम्‍मू विधानसभा स्‍पीकर मोहम्‍मद अकबर लोन की मीडिया के उनके कंट्रोल में रहने की टिप्‍पणी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब भी जारी है। स्‍पीकर के बयान से नाराज मीडियाकर्मियों ने लगातार दूसरे दिन राज्‍य के दोनों सदनों की कार्रवाई का बहिष्‍कार किया। मीडियाकर्मियों को मनाने के लिए चौतरफा प्रयास किया गया। सरकार, विपक्ष और सदन के कई प्रतिनिधियों ने इस गतिरोध को खतम करने की कोशिश की पर आखिर तक सफलता नहीं मिल पाई।

यह विवाद लोन के उस बयान के बाद शुरू हुआ है, जिसमें उन्‍होंने कहा था कि मीडिया उनके नियंत्रण में है और यदि वह चाहें तो मीडिया को अपने सोर्स का खुलासा करना पड़ेगा। इस बयान के बाद ही मीडियाकर्मियों ने विधानसभा की कार्यवाही का बहिष्‍कार कर दिया था। बुधवार को भी पत्रकार विधानसभा परिसर पहुंचकर सीढि़यों पर धरना देकर बैठ गए। सबसे पहले सीएम के एडवाइजर देवेंद्र सिंह राणा ने मीडियाकर्मियों को मनाने-समझाने का प्रयास किया पर पत्रकार टस से मस नहीं हुए।

इसके बाद माकपा विधायक एमवाई तारिगामी भी मीडियाकर्मियों को सदन में आने के लिए कहा परन्‍तु मीडियाकर्मी स्‍पीकर के आपत्तिजनक टिप्‍पणी को विधानसभा की कार्रवाई से बाहर निकालने की मांग पर डंटे हुए थे। इसके बाद संसदीय कार्य एवं कानून मंत्री अली मोहम्‍मद सागर, पैंथर्स पार्टी के विधायक हर्षदेव सिंह भी पत्रकारों को मनाने के लिए आए। इन लोगों ने बताया कि स्‍पीकर इस मामले को सुलझाने के लिए तैयार हैं, परन्‍तु पत्रकार आपत्तिजनक अंश को कार्रवाई से हटाने पर अड़े हुए थे। समझा जा रहा है कि गुरुवार को भी पत्रकारों का बहिष्‍कार जारी रहेगा।

 

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