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अगर आतंकवादी हैं पत्रकार काज़मी तो क्यों नही कार्रवाई करती पुलिस?: डीयूजे

दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (डीयूजे) के महासचिव एसके पाण्डेय ने मांग की है कि पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काज़मी को जमानत पर रिहा किया जाए।

काज़मी दिल्ली में एक ईरानी समाचार एजेंसी के लिए काम करते थे और माना जाता है इसराइल-फलस्तीन मामलों पर लिखते हुए उनके विचार अक्सर इसराइल के खिलाफ़ रहे हैं। पीआईबी से कई वर्षों पहले से मान्यता प्राप्त इस पत्रकार को 7 मार्च को जोरबाग के पास बी के दत्त कॉलोनी स्थित उनके आवास से हिरासत में ले लिया गया था। गिरफ़्तारी के बाद एक निचली अदालत ने उन्हें 20 दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया।

”अगर पुलिस के पास काज़मी के खिलाफ सबूत हैं तो जल्द से जल्द चार्जशीट दायर की जाए या फिर उन्हें छोड़ा जाए। पुलिस को मीडिया में काजमी की छवि पर उंगली नहीं उठानी चाहिए। उनके संदर्भ में पुलिस को बाकायदा प्रेस नोट जारी करने चाहिए।” पाण्डेय ने मीडिया दरबार से कहा।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में डीयूजे द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जांच निष्पक्ष व हर स्तर पर पारदर्शी होनी चाहिए। काज़मी की गिरफ्तारी से पत्रकार आहत हैं, इसे मीडिया व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देख रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यह जाहिर है कि काज़मी पुलिस के साथ भरपूर सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें पुलिस कस्टडी में रखना उन्हें और उनके परिवार के लिए पीड़ायादक है। वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी ने कहा कि मोहम्मद काज़मी को जबरदस्ती फंसाया गया है। यह हम सभी पत्रकारों पर हमला है।

”हम यहां किसी हिंदू या मुस्लिम के रूप में नहीं आए हैं। हम सभी पत्रकार हैं और यह एक पत्रकार की गिरफ्तारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है,” नकवी ने कहा। नकवी के मुताबिक यह एक दुखद घटना है कि विदेशी मामलों, कई भाषाओं के जानकार और वर्षो से पीआईबी के मान्यताप्राप्त पत्रकार को इस तरह गिरफ़्तार करना कहीं से उचित नहीं है।

संवाददाता सम्मेलन में भावुक हो मोहम्मद अहमद काजमी के बेटे शोजब काजमी रो पड़े। उन्होंने कहा कि मेरे पिता नेशनल हीरो हैं। वे इराक युद्ध कवर करने गए थे और भारत का नेतृत्व किया था। स्पेशल सेल और पुलिस ने मुझसे और मेरे पिता से जबरदस्ती कागजों पर दस्तखत कराए।

स्कूटी के मामले में शोजब ने कहा, ”यह मेरे अंकल की स्कूटी है। जब अंकल मेरठ से दिल्ली इलाज कराने आए थे तो उन्होंने खरीदी थी ताकि एम्स तक आसानी से आ-जा सकें। स्कूटी काफी समय से चलाई भी नहीं गई थी। पुलिस ने उसके कागज भी हमसे जबरदस्ती ले लिए हैं। पुलिस ने मेरे साथ दुर्व्यवहार कर अपशब्द भी कहे।”

होली में एक्सपोज़र का रंग चढ़ा बॉलीवुड पर, पूनम पांडेय ने तोड़ीं सारी हदें

 

 

बॉलीवुड में होली मस्ती से ज्यादा एक्सपोजर और पब्लिसिटी का त्यौहार बनता जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

राखी सावंत और सोफिया ने कैमरे के सामने ऐसी बिंदास होली मनाई कि फोटॉग्राफरों तक के होश उड़ गए।

 

 

 

 

 

 

 

‘हीरोइन’ करीना कपूर हो या ‘अवार्ड विनिंग’ विद्या बालान, कोई भी होली के बहाने रंग-बिरंगी तस्वीरें खिंचाने से पीछे नहीं रहा।

 

 

 

 

 

 

 

ऐक्ट्रेस और मॉडल पूजा बासु ने तो होली के बहाने बाकायदा एक हॉट फोटोशूट कराया। इस फोटोशूट में पूजा ने जमकर एक्सपोज भी किया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जब सब का ज़िक्र छिड़ा हो तो, मौके-बेमौके मीडिया को मसाला देने वाली किंगफिशर मॉडल पूनम पाण्डेय भला कैसे पीछे रहती? उन्होंने इस मौके पर एक बहुत ही उत्तेजक वीडियो ‘डर्टी-प्ले’ अपलोड किया है।

 

 

 

 

 

इस वीडियो में पूनम बिकनी में होली खेलती हुई नजर आ रही हैं और काफी अश्लील हरकतें भी करती हुई दिखाई दे रही हैं।

 

 

 

 

 

कहना गलत न होगा कि ऐसा करने पर सभी को पब्लिसिटी बटोरने का पूरा मौका मिला है। ताज़ा खबर ये है कि पूनम का वीडियो यूट्यूब ने ब्लॉक कर दिया है।

 

 

 

समाजवादियों में परिवारवाद?: कौन बनेगा मुख्यमंत्री पर तेज होने लगी माथापच्ची

- अमलेन्दु उपध्याय

एक्जिट पोल्स बता रहे हैं कि समाजवादी पार्टी थोक भाव में सीटें लाकर सरकार बनाने जा रही है. उधर ख़बरें आने लगी हैं कि मुलायम सिंह यादव के ज्येष्ठ पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. ताल खुदने से पहले ही मेंढकों ने टर्र-टर्र करना शुरू कर दिया है. सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने लगभग आदेश की मुद्रा में कह दिया है कि अखिलेश मुख्यमंत्री  बने तो उन्हें अच्छा लगेगा. गोया उत्तर प्रदेश मास्टर साहब की जागीर है सो उन्हें जो अच्छा लगे वही किया जाये.दरअसल ये पार्टी के चुनकर आने वाले विधायकों को आदेश है कि युवराज की ताजपोशी के लिए तैयार रहो.  लेकिन मास्टर रामगोपाल से पुरानी अदावत रखने वाले मुलायम सिंह यादव के सगे अनुज शिवपाल यादव ने बयान दे दिया है कि मुख्यमंत्री नेता जी बनेंगे, यानी इशारों इशारों में उन्होंने साफ़ कह दिया है कि अखिलेश इतनी आसानी से मुख्यमंत्री कैसे बन जायेंगे?

उधर पार्टी के फायर ब्रांड नेता मोहम्मद आज़म खान ने अपना कोई तीर नहीं खोला है. याद हो कि जब अखिलेश क्रान्ति रथ लेकर प्रदेश के दौरे पर निकले थे तब आज़म खान ने ही उन्हें हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था. पार्टी के अंदरूनी सत्ता संग्राम में अब सबकी निगाहें उनकी तरफ लग गई हैं क्या अब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनने को वह लाल झंडी दिखाएँगे? चुनाव के दौरान जिस तरीके से अखिलेश की तरफ से आज़म खान के खिलाफ दांव चले गए उससे खान साहब तिलमिलाए हुए हैं. जो लोग आज़म खान को जानते हैं उन्हें मालूम है कि उनके शब्दकोष में “माफी” नाम की जगह नहीं है. वह किसी को माफ़ नहीं करते हैं. ऐसे में अखिलेश की राह में कांटे ही कांटें हैं.

सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि अगर सरकार सपा की बन रही है तो इसमें अखिलेश का क्या योगदान है? सही मायनों में इसमें योगदान तो सबसे ज्यादा बहन जी का है. अगर मायावती पिछले पांच साल के शासनकाल को राग द्वेष से ऊपर उठकर सही प्रशासन दे पातीं और उनकी सरकार में जबरदस्त लूटपाट न मची होती तो क्या सपा को यह अवसर मिल सकता था? मुलायम सिंह जी को चाहिए कि अगर उनकी सरकार बनने की किसी तरह नौबत आ जाये तो मिठाई का डिब्बा लेकर सबसे पहले बहन जी के पास जाएँ.

वैसे सवाल यह है कि अखिलेश का पार्टी के लिए योगदान क्या है? अगर अखिलेश ही मुख्यमंत्री बनते हैं तो तो सपा का और राजनीति का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं होगा. अगर अखिलेश का सिर्फ यही योगदान है कि वे मुलायम सिंह जी के पुत्र हैं तो उनसे ज्यादा अच्छे तो प्रतीक यादव रहेंगे, वे भी नेता जी के पुत्र हैं और अखिलेश के मुकाबले ज्यादा युवा हैं.

और सवाल यह भी है कि  मुलायम सिंह जी के बाद अखिलेश का ही नंबर क्यों? नौ प्रतिशत यादव मतदाता के बल पर  तीन बार मुख्यमंत्री और अब बेटे की बारी. सामाजिक न्याय के योद्धा और डॉ. लोहिया के वारिस नेता जी का दल  1993 से जिन 18 प्रतिशत मुसलमानों के बल पर सत्ता में आता रहा और राजनीति में मलाई काटते रहे उन मुसलामानों में से किसी को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बना सकता? या जिन्होंने पार्टी को खडा किया और तमाम दुश्वारियों के बावजूद पार्टी का दामन नहीं छोड़ा वो कार्यकर्ता मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता?

अगर “सपा” प्रोप्राइटर फर्म नहीं है तो आज़म खान को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए, अगर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है तो शिवपाल सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए क्योंकि पूरे पांच साल मायावती सरकार के थप्पड़ और सिपाहियों के घूंसे तो शिवपाल ने ही खाए हैं.. और प्रोप्राइटर फर्म है तो फिलहाल अखिलेश बेहतर रहेंगे, लेकिन समाचार चैनल्स के एक्सिट पोल्स सुनकर दिल बहुत जोर जोर से काँप कर रहा है. खुदा करे ये झूठे साबित हों. अगर ये सच हो गए तो पूरा प्रदेश एक अजब किस्म की आग में झुलसने वाला है. नेता जी के कर्णधारों ने गुंडागर्दी मचाने की तैयारियां पूरी कर ली बताई जाती हैं.

हालांकि तर्क दिया जा रहा है कि डीपी यादव के मामले पर अखिलेश ने समझदारी दिखाई है। पार्टी के लिए यह एक मौका है। लेकिन प्रति प्रश्न है कि डी पी यादव के मसले पर जैसी समझदारी दिखाई वैसी समझदारी श्री भगवान् शर्मा उर्फ़ गुड्डू पंडित के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? वीर सिंह के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? अमरमणि के पुत्र अमनमणि के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? क्या डी पी यादव, इन महानुभावों से भी गए गुजरे हैं? राजनीति में आने के बाद न तो डीपी यादव के ऊपर अपराध के कोई आरोप लगे हैं और न उससे पूर्व भी उनके अपराध उस श्रेणी के थे जिस श्रेणी के अपराध अमरमणि और गुड्डू पंडित के थे. फिर इस भोथरे तर्क का असल मकसद क्या है?

दरअसल ये चुनाव के दौरान ही मुलायम सिंह की तरफ से अखिलेश की राह आसान बनाने के लिए और आज़म खान को किनारे करने के लिए चला गया दांव था. इसलिए अखिलेश से ही डीपी का प्रवेश रोकने का बयान दिलवाया गया और प्रचारित किया गया कि पार्टी दागियों से किनारा कर रही है. अगर डीपी यादव भी पार्टी में आ जाते तो जाहिर है अंदरूनी सता संग्राम में वे आज़म खान के साथ होते. चूंकि वे आज़म खान के घर पर ही पार्टी में शामिल होने पहुंचे थे और शिवपाल भी इस समूह में शामिल हो जाते तो अखिलेश के राह और ज्यादा काँटों भरी हो जाती. इसीलिये डीपी का प्रवेश रोका गया न कि इसलिए कि पार्टी दागियों से किनारा कर रही है.

अगर पार्टी वास्तव में गुंडा तत्वों से किनारा कर रही है तो बदायूं, एटा, कांशीराम नगर, फिरोजाबाद, जैसे इलाकों समेत पूरे प्रदेश में हर जिले में पार्टी की कमान उन्हीं लोगों के हाथों में क्यों है जिनके ऊपर पिछली सरकार में गुंडागर्दी करने और जनता पर ज़ुल्म करने के आरोप हैं. क्या किसी एक भी जिले में इन क्षत्रपों में से किसी एक का भी टिकट काटा गया?
अगर वाकई में सपा सरकार में आने वाली है तो तैयार रहिये पूरा प्रदेश एक अजब किस्म की आग में झुलसने वाला है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

 

कार्रवाई से बौखला गया कृपाशंकर सिंह का परिवार, बेटे ने मीडिया को किया अभद्र इशारा

मुंबई: मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह और उनके परिजनों पर आय से अधिक सम्‍पत्ति के मामले का मुकदमा दर्ज होने तथा सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद लग रहा है यह परिवार बौखला गया है। अब कृपाशंकर सिंह और उनके परिजनों पर गिरफ्तारी की भी तलवार लटक रही है। कृपाशंकर पूरे दिन गायब रहे। मीडिया उनका पक्ष जानने के लिए उनके घर के पास मौजूद थी तो कृपाशंकर सिंह के बेटे नरेंद्र सिंह ने मीडियाकर्मियों को भद्दा इशारा करते दिखे।

कहा जा रहा है कि कृपाशंकर गिरफ्तारी से बचने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं और उनका पूरा परिवार मुश्किल में है। उनकी पत्‍नी, बेटा, बहू, बेटी, दामाद सब पर आय से अधिक सम्‍पत्ति की तलवार लटक रही है। इस बीच पुलिस ने उनका मुंबई में स्थित बंगला और फ्लैट सील कर दिया है। शुक्रवार सुबह करीब आठ बजे मुंबई क्राइम ब्रांच और एसआईटी ने कृपाशंकर के बांद्रा स्थित बंगले पर छापा मारा था।

मीडियाकर्मी जब इस मामले में खबर करने के लिए कृपाशंकर सिंह के घर के सामने खड़े थे तो उनके बेटे नरेंद्र सिंह अपने घर से मीडियाकर्मियों के लिए अंगुली का इशारा करते हुए दिखे। इस अभद्र इशारे की मीडियाकर्मियों ने निंदा की है। मीडियाकर्मियों का कहना है कि वे अपना काम कर रहे थे परन्‍तु नरेंद्र सिंह ने उनलोगों की तरफ भद्दे इशारे करने के बाद चले गए। उल्‍लेखनीय है कि कृपाशंकर इनदिनों मुश्किलों में हैं। पहले बीएमसी की हार, फिर मुंबई कांग्रेस का अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफा और अब आय से अधिक सम्‍पत्ति मामले ने उन्‍हें तथा उनके परिवार को परेशान कर रखा है।

हालांकि बाद में कृपाशंकर सिंह के बेटे ने अपनी आपत्तिजनक इशारेबाजी के लिए मीडिया से माफी मांगी है। नरेंद्र ने दुख जताते हुए कहा है कि वो एक जिम्‍मेदार नागरिक है और मीडिया का सम्‍मान करते हैं। उन्‍होंने जो अश्‍लील इशारा किया वो गलत है। इसके लिए मैं सभी मीडियाकर्मियों से क्षमा मांगता हूं।

मीडिया की एकतरफा रिपोर्टिंग ने बना दिया था निशा शर्मा को हिरोइन

शायद दिल्‍ली-एनसीआर के बहुत लोग भूल गए होंगे निशा शर्मा को। नोएडा के सेक्‍टर 56 में रहने वाली निशा शर्मा 2003 में सुर्खियों में छा गई थी। मीडिया ने उसे इस तरह के रोल मॉडल के रूप में पेश किया जिसने दहेज के खिलाफ आवाज उठाते हुए बारात को वापस लौटा दिया था। पर कोर्ट ने नौ साल बाद निशा की दर्ज कराए गए आरोप को बनावटी कहानी ठहराकर सभी आरोपियों को बरी कर दिया। साथ ही एक बड़े अखबार के रिपोर्टर के खिलाफ भी मामला शुरू करने का आदेश दिया।

कोर्ट के इस फैसले ने साबित किया कि किस तरह मीडिया एक झूठी कहानी को इस तरह का हाइप दे दिया कि गलत तरीके से कहानी बनाने वाली एक लड़की रातोंरात रोल मॉडल बन गई। पूरी देश में बस निशा शर्मा की ही चर्चा होने लगी। अपनी कवरेज और कहानी से मीडिया ने निशा को तो रोल मॉडल बना दिया परन्‍तु मीडिया ने कहानी का दूसरा पहलू देखने की कोशिश नहीं की, जिसमें बिना अपराध के एक परिवार नौ सालों तक यातना झेलता रहा।

घटना के अनुसार निशा की शादी होने वाली थी, पर निशा ने दहेज मांगने के आरोप में अपने भावी पति मुनीष दलाल से शादी से इनकार कर दिया। कहा गया कि ये लोग दहेज में बड़ी रकम मांग रहे थे इसलिए निशा ने बारात लौटा दी। ये खबर अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बन गईं। भेड़चाल में सिर झुकाए बिना दाएं-बाएं देखकर भागने वाली मीडिया ने भी कहानी के पीछे का सच जाने बगैर निशा को दहेज के लिए लड़ने वाली लड़की का रोल मॉडल बना दिया। अगर मुनीष और उसके परिवार वालों ने दहेज मांगा था तो निश्चित रूप से निशा का कदम सराहनीय कहा जाता, पर कोर्ट के फैसले ने साबित कर दिया है कि एक लड़की ने बनावटी कहानी बनाया और मीडिया ने उस आधी-अधूरी कहानी पर अपनी खबरों की मंजिल तैयार कर ली।

इस खबर को सनसनीखेज बनाने में मीडिया अपना दायित्‍व भूल गया। ये भी भूल गया कि उसकी आधी-अधूरी खबरों से दूसरे पक्ष को नुकसान हो सकता है। मीडिया ने तो इस कहानी की सच्‍चाई भी जानने की कोशिश नहीं की। बस जो पकी पकाई सूचना मिली उसी के आधार पर अपना मसाला-तड़का डालते हुए खबर बना दी। मीडिया की इस धमाचौकड़ी में कम से कम मुनीष का परिवार तो बिना अपराध के ही नौ सालों तक सजा को भोगता रहा। मुनीष का कहना भी है कि उन्‍हें इंसाफ तो मिला पर जिंदगी बरबाद हो गई। मुनीष अब इस मामले को ऐसे न्‍हीं छोड़ने की बात कह रहे हैं। मनीष का कहना है कि वे निशा और उनके पिता डीडी शर्मा के खिलाफ अपनी बरबाद जिंदगी के हर्जाने का केस करेंगे।

कोर्ट ने भी माना कि मीडिया ने एकतरफा रिपोर्टिंग करके दूसरे परिवार को बहुत ठेस पहुंचाया है। कोर्ट ने इस मामले में मुनीष और उनके परिवार के लोगों के खिलाफ एकतरफा खबर लिखने के मामले में एक बड़े अखबार के रिपोर्टर के खिलाफ मुकदमा शुरू करने का आदेश भी दिया है। कोर्ट ने ये भी कहा कि जब मुनीष और निशा की शादी हुई ही नहीं तो फिर दहेज एक्‍ट कैसे लागू हो सकता है। इस मामले में पेंच उस समय फंसा था जब नवनीत राय ने खुद को निशा शर्मा का पति बताया। निशा ने नवनीत के खिलाफ भी केस दर्ज करा दिया था, परन्‍तु कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया।

दूसरी तरफ निशा के पिता इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात कह रहे हैं। पर कोर्ट में पूरे मामले की सुनवाई के दौरान जिन गवाहों और सबूतों को निशा शर्मा के परिवार की तरफ से पेश किए गए थे उसे अदालत ने आधा-अधूरा माना। कोर्ट ने ये भी माना कि निशा और नवनीत के रिश्‍ते काफी गहरे थे। यह भी मुनीष और उनके परिवार के बरी होने का अहम वहज बना। कोर्ट के फैसले ने साबित किया है कि मीडिया का एक तबका बिना तथ्‍यों की जांच किए, बिना मामले की सत्‍यता को परखे एकतरफा खबरें प्रकाशित की, जिससे कम से कम मुनीष का परिवार तो आहत हुआ है।

मिन्‍नतों के बाद भी नहीं माने पत्रकार, बयान को हटाने को लेकर गतिरोध जारी

जम्‍मू विधानसभा स्‍पीकर मोहम्‍मद अकबर लोन की मीडिया के उनके कंट्रोल में रहने की टिप्‍पणी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब भी जारी है। स्‍पीकर के बयान से नाराज मीडियाकर्मियों ने लगातार दूसरे दिन राज्‍य के दोनों सदनों की कार्रवाई का बहिष्‍कार किया। मीडियाकर्मियों को मनाने के लिए चौतरफा प्रयास किया गया। सरकार, विपक्ष और सदन के कई प्रतिनिधियों ने इस गतिरोध को खतम करने की कोशिश की पर आखिर तक सफलता नहीं मिल पाई।

यह विवाद लोन के उस बयान के बाद शुरू हुआ है, जिसमें उन्‍होंने कहा था कि मीडिया उनके नियंत्रण में है और यदि वह चाहें तो मीडिया को अपने सोर्स का खुलासा करना पड़ेगा। इस बयान के बाद ही मीडियाकर्मियों ने विधानसभा की कार्यवाही का बहिष्‍कार कर दिया था। बुधवार को भी पत्रकार विधानसभा परिसर पहुंचकर सीढि़यों पर धरना देकर बैठ गए। सबसे पहले सीएम के एडवाइजर देवेंद्र सिंह राणा ने मीडियाकर्मियों को मनाने-समझाने का प्रयास किया पर पत्रकार टस से मस नहीं हुए।

इसके बाद माकपा विधायक एमवाई तारिगामी भी मीडियाकर्मियों को सदन में आने के लिए कहा परन्‍तु मीडियाकर्मी स्‍पीकर के आपत्तिजनक टिप्‍पणी को विधानसभा की कार्रवाई से बाहर निकालने की मांग पर डंटे हुए थे। इसके बाद संसदीय कार्य एवं कानून मंत्री अली मोहम्‍मद सागर, पैंथर्स पार्टी के विधायक हर्षदेव सिंह भी पत्रकारों को मनाने के लिए आए। इन लोगों ने बताया कि स्‍पीकर इस मामले को सुलझाने के लिए तैयार हैं, परन्‍तु पत्रकार आपत्तिजनक अंश को कार्रवाई से हटाने पर अड़े हुए थे। समझा जा रहा है कि गुरुवार को भी पत्रकारों का बहिष्‍कार जारी रहेगा।

 

भारत के ‘जन’ नहीं, ‘तंत्र’ के साथ था अज्ञेय का साहित्य : रविभूषण

पिछले वर्ष हिंदी के जिन चार प्रमुख कवियों- शमशेर, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की जन्मशती मनायी गयी और अब भी यत्र-तत्र मनायी जा रही है, उनमें आरंभ से अब तक, अशोक वाजपेयी और उनके सहयोगियों ने अज्ञेय को शीर्ष स्थान पर रखते हुए उन्हें ‘नायक’ का दर्जा देने के कम प्रयत्न नहीं किये हैं।

ताजा उदाहरण कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी के भाषा भवन में आयोजित त्रिदिवसीय अज्ञेय जन्म शताब्दी समारोह (21-23 फ़रवरी 2012) है। चालीस-बयालीस साल पहले का समय कुछ और था, जब अज्ञेय के नौवें कविता-संकलन ‘कितनी नावों में कितनी बार’ (1967) की समीक्षा में अशोक वाजपेयी ने अज्ञेय को ‘बूढ़ा गिद्ध ’ कहा था। ‘बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फ़ैलाये’ शीर्षक से लिखित पुस्तक समीक्षा में अशोक वाजपेयी ने यह लिखा था कि अज्ञेय ने अपने पुनर्संस्का।र की कोई गहरी कोशिश नहीं की है, कि वे ‘गरिमा और आत्मसंतुष्टि के द्वंद्व से घिर कर, बल्कि उनकी गिरफ्त में आकर’ लिखते हैं। उस समय उन्होंने अज्ञेय के काव्य-संसार को ‘सुरक्षित और समकालीन दबावों से मुक्त’ कहा था। उत्सवधर्मिता को कविता का स्थायी भाव न मानने वाले तब के अशोक वाजपेयी के लिए आज उत्सवधर्मी आयोजनों का कहीं अधिक महत्व है।

अस्सी के दशक के आरंभ में अज्ञेय ने ‘जय जानकी यात्रा’ एवं ‘भागवत भूमि यात्रा’ आरंभ की थी। लगभग इसी सम विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने तीन प्रमुख तीर्थयात्राओं की योजना 16 नवंबर 1983 से 16 दिसंबर 1983 तक बनायी थी। एक महीने की यह तीर्थयात्रा संपूर्ण भारत के लिए थी- ‘गंगा जल या एकात्मता यात्रा’, हरिद्वार से रामेश्वरम तक, दूसरी एकात्मता यात्रा, पशुपतिनाथ से कन्याकुमारी तक और तीसरी एकात्मता यात्रा, गंगासागर से सोमनाथ तक।

1984 में विहिप ने अपने प़्रोग्राम में ‘राम’ के नाम का उपयोग नहीं किया था। ऐसा पहला प्रयत्न उसने 1987 में ‘राम-जानकी धर्म यात्रा’ में किया। इसी वर्ष 4 अप्रैल को अज्ञेय का निधन हुआ। अभी इस पर विचार नहीं हुआ है कि अज्ञेय की ‘जय जानकी यात्रा’ एवं ‘भागवत भूमि यात्रा’ से विहिप की ‘राम-जानकी धर्मयात्रा और आडवाणी की ‘राम यात्रा ’ (25 सितंबर 1990) को कोई प्रेरणा मिली या नहीं?

अज्ञेय ने किसी भी राजनेता से ज्ञानपीठ पुरस्कार लेने से इनकार किया था। उन्हें 14वां ज्ञानपीठ पुरस्कार 28 दिसंबर 1979 को कलकत्ता में नृत्यांगना रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने दिया था। ‘स्टेट्समैन’ ने उस समय यह लिखा था कि इस वर्ष एक पत्रकार ने ज्ञानपीठ प्राप्त किया है।

अज्ञेय ने ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘एवरीमैंस’, ‘नया प्रतीक’ और ‘नवभारत टाइम्स’ का संपादन किया था। कोलकाता में में आयोजित त्रिदिवसीय सेमिनार में विचारणीय विषय ‘अज्ञेय के सरोकार’, ‘अज्ञेय के शहर’ और ‘अज्ञेय की यायावरी’ थे। अशोक वाजपेयी अज्ञेय और शमशेर पर हुए लगभग 200 आयोजनों और इन पर लिखित तीस से चालीस पुस्तकों के प्रकाशन का जब उल्लेख करते हैं, तब किसी की भी यह जिज्ञासा हो सकती है कि ‘अज्ञेय के सरोकार’ और शमशेर, केदार और नागार्जुन के सरोकार क्या एक हैं और अगर इसमें भिन्नता है, तो वह कहां-कैसी है?

अज्ञेय जन्मशती समारोह में राजनेताओं, अधिकारियों, अभिनेता-अभिनेत्रियों की मुख्य उपस्थिति होनी चाहिए या कवियों-लेखकों की? कविता-पाठ कवियों को क्यों नहीं करना चाहिए? उद्घाटन सत्र में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने ‘कोलकाता को देश की सांस्कृतिक राजधानी’ कहा, जबकि बाद के सत्र में अज्ञेय के शहर में वक्ताओं -श्रोताओं को मिला कर कुल 25 लोग उपस्थित थे। दो-तीन हिंदी लेखकों को छोड़ कर कलकत्ता का कोई हिंदी लेखक-कवि वहां उपस्थित नहीं था।

अज्ञेय हिंदी के सभी कवियों-लेखकों के ‘प्रेरणा-पुरुष ’ नहीं हो सकते। हिंदी की सरहपाद से लेकर आज तक की मुख्य काव्यधारा जन और लोक से जुड़ी हुई है। अज्ञेय का संपूर्ण साहित्य जन और लोक से विमुख है। उन्होंने अपनी एक कविता में स्वयं को ‘चुका हुआ ’ कहा है, जबकि शमशेर घोषित करते हैं -‘चुका भी नहीं हूं मैं’।

निश्चित रूप से वे ऐसे महत्वपूर्ण लेखक हैं, जो अनेक हिंदी कवियों-लेखकों के लिए न जरूरी रहे, न महत्वपूर्ण। उनका साहित्य बौद्धिक और आधुनिक है, पर उनकी आधुनिकता देशज और भारतीय नहीं है। वह नेहरू की आधुनिकता से मेल खाती है। अज्ञेय नेहरू अभिनंदन ग्रंथ के संपादक भी थे। अज्ञेय को क्रांतिकारी नहीं कहा जा सकता। वे भगत सिंह और आजाद के साथ कुछ समय तक थे, मेरठ के किसान-आंदोलन से जुड़े थे, 1942 में दिल्ली में अखिल भारतीय फ़ासिस्ट विरोधी सम्मेलन के आयोजकों में थे, कुछ समय तक कृश्नचंदर और शिवदान सिंह चौहान के साथ भी रहे, पर 1943 में उन्होंने ब्रिटिश सेना में नौकरी की।

जब 1936 में प्रेमचंद, ‘साहित्य का उद्देश्य’ बता रहे थे, अज्ञेय क्रांतिपरक साहित्य को थोथा और निस्सार कह रहे थे। वे जीवन-दर्शन के निर्माण में माक्र्सवाद की तुलना में डार्विन, आइन्सटाइन और फ्रायड की बड़ी देन मानते थे। जिन कवियों-लेखकों के प्रेरणा पुरुष भारतेन्दु, निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन होंगे, उनके प्रेरणा पुरुष अज्ञेय कभी नहीं हो सकते। अज्ञेय, अशोक वाजपेयी के रोल मॉडल हो सकते हैं।

 

अज्ञेय की चिंता में कभी भारतीय जनता नहीं रही है। उन्हें हिंदी का बड़ा और नागार्जुन से श्रेष्ठ घोषित करनेवालों की भी चिंता भारतीय जन से जुड़ी नहीं है। नामवर हों या विद्यानिवास, शाह हों या आचार्य, अशोक वाजपेयी हों या उनके सहचर। अज्ञेय का साहित्य तंत्र को चुनौती नहीं देता। वह बहुत हद तक तंत्र के साथ हैं। भारतीय लोकतंत्र में आज लोक नहीं तंत्र प्रमुख है। जो तंत्र से जुड़े हैं, उनके साथ हैं। उनके लिए जरूर अज्ञेय आधुनिक हिंदी कविता के शिखर पुरुष होंगे।

 

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। उनका ये आलेख प्रभात खबर में प्रकाशित हुआ है। वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है।)

काटजू के बयान पर बिहार विधानसभा में हंगामा, तीन सदस्‍यीय जांच कमेटी गठित

पटना। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू के ‘बिहार में प्रेस की आजादी नहीं’ सम्बंधी बयान को लेकर सोमवार को बिहार विधानसभा के बाहर और भीतर विपक्षी दलों ने जमकर हंगामा किया और सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया। विधानसभा की कार्यवाही प्रारंभ होने से पहले गेट के बाहर सभी विपक्षी सदस्यों ने प्रेस की आजादी को लेकर विभिन्न तरह के नारे लिखे तख्तियों को लेकर सरकार के विरोध में जमकर नारे लगाए। इसके बाद जब सदन प्रारंभ हुआ तब भी सदन के अंदर काटजू के बयान को लेकर हंगामा किया। इसके बाद विपक्ष ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया।

इस मसले पर विपक्ष ने कार्यस्थगन का प्रस्ताव भी दिया जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने अवैधानिक बताते हुए नामंजूर कर दिया। शून्यकाल में भी इस मसले पर जमकर शोर शराबा हुआ। नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी ने कहा कि काटजू के वक्तव्य पर जिस तरह से उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने टिप्पणी की है वह अपमानजनक है। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस पर कहा कि जिस तरह से प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष श्री काटजू वक्तव्य दे रहे हैं, वैसी स्थिति में केंद्र सरकार को इस पर विचार करना चाहिए कि ऐसे लोगों को इस तरह के पद पर रखा जाना चाहिए या नहीं। विपक्ष ने इस मसले पर ध्यानाकर्षण के समय भी सदन का बहिष्कार किया।

शून्यकाल में इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी ने जब उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नाम के साथ अपनी बात कही तो उप मुख्यमंत्री श्री मोदी ने कहा कि-यह तो मीडिया को तय करना है कि वह स्वतंत्र है कि नहीं? चार आदमी ने श्री काटजू को ब्रीफ कर दिया तो क्या उसके आधार पर वह टिप्पणी कर देंगे। दरअसल श्री काटजू अलग-अलग राज्यों में पहुंचकर इस तरह की टिप्पणी करते रहे हैं। महाराष्ट्र में गये तो वहां कह दिया कि महाराष्ट्र की सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए। गया में उन्होंने यह कहा कि बिहार सरकार को सबक सीखा देंगे। ऐसी बात तो विपक्ष भी नहीं करता है। कौन लोग हैं जो उन्हें बरगला रहे हैं।

संसदीय कार्य मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि विपक्ष को इस मुद्दे को सदन में लाने से पहले से ठीक से पढ़ना चाहिए था। सरकार ने ऐसा कोई कानून तो बनाया नहीं है जो मीडिया पर बंदिश की बात करता हो। श्री काटजू ने खुद कहा है कि वह बिहार में मीडिया की स्वतंत्रता की जांच कराएंगे। पहले जांच रिपोर्ट तो आ जाये। श्री यादव ने कहा नेता प्रतिपक्ष संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के बारे में मर्यादा के साथ टिप्पणी करने की बात कही है जबकि राज्यपाल के अभिभाषण के बाद विपक्ष के कुछ सदस्यों ने राज्यपाल को सत्ताधारी दल का एजेंट कहा। इस पर नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी खड़े हो गये। उन्होंने कहा-आज जो लोग सत्ता में हैं उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल एआर किदवई के बारे में क्या कहा था सबको मालूम है।

गौरतलब है कि पटना में शुक्रवार को एक समरोह में काटजू ने कहा था कि बिहार में प्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है। अगर यहां कोई सरकार या सरकारी अधिकारी के खिलाफ लिख दे तो उसे परेशान किया जाता है। उन्होंने कहा था कि लालू के शासन काल से बिहार में विधि-व्यवस्था की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है परंतु प्रेस की आजादी कम हो गई है। उन्होंने कहा कि बिहार में अगर कोई पत्रकार सरकार के खिलाफ लिख देता है तो उसके मालिकों पर दबाव बनाकर उस पत्रकार को नौकरी से निकालवा दिया जा रहा है या उसे तंग करने की नीयत से स्थानांतरण करवा दिया जा रहा है। दूसरी तरफ खबर है कि जस्टिस काटजू ने बिहार में मीडिया की स्‍वतंत्रता की जांच के लिए तीन सदस्‍यीय टीम गठित कर दी है।

 

चिटफंडियों के चैनल जीएनएन न्‍यूज में स्‍ट्राइक, नहीं प्रसारित हुआ बुलेटिन

चिटफंडियों के चैनल जीएनएन न्‍यूज से खबर है कि वहां पर पीसीआर एवं कैमरा सेक्‍शन के कर्मचारियों ने स्‍ट्राइक कर दिया है। इसके चलते पांच बजे का बुलेटिन प्रसारित नहीं हो पाया। बताया जा रहा है कि बहुधंधी चिटफंड ग्रुप के इस चैनल का वित्‍तीय स्थिति खस्‍ता है, जिसके चलते यह अपने कर्मचारियों को समय से सेलरी नहीं मिल पा रहा है। यह हालात पिछले दिनों चिटफंड के धंधे पर व्‍यापक छापेमारी के बाद आया है। कर्मचारियों की भयानक छंटनी के बाद भी यह चैनल सही समय से सेलरी नहीं दे पा रहा है।

बताया जा रहा है कि चिटफंडियों की इस कंपनी के चैनल में कर्मचारियों को जनवरी माह का वेतन नहीं मिला है। जनवरी का वेतन कब तक आएगा इसकी जानकारी भी कोई नहीं दे रहा है, जिसके चलते नाराज कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। उनकी मांग है कि जब तक वेतन नहीं आएगा वे काम नहीं करेंगे। खबर है कि नवनियुक्‍त जीएम जगमीत सिंह अरोड़ा मामले को सुलटाने की कोशिशों में जुटे हैं, पर चैनल हेड के रूप में जिम्‍मेदारी संभालेने वाले महरुफ रजा मौके से गायब हैं। बताया जा रहा है कि वो कार्यालय भी नहीं आए हैं। सूत्र बताते हैं कि महरुफ ही पूरा खेल करा रहे हैं, जो जीएम की नियुक्ति के बाद से प्रबंधन से खुश नहीं हैं। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई पर कहा जा रहा है कि इसी वजह से वे कार्यालय से गायब हैं।

खबर है कि चैनल लूप पर चलाया जा रहा है तथा एमसीआर से पुराने कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। हड़ताल के चलते साढ़े छह बजे होने वाला डिस्‍कशन का प्रोग्राम भी टाल दिया गया है। मेहमानों को भी मना कर दिया गया है। जगजीत सिंह मामले को समझाने में जुटे हुए हैं, पर कर्मचारी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। उल्‍लेखनीय है कि चिटफंड के रूप में जीएन गोल्‍ड समेत कई कंपनियों का संचालन करने वाला जीएन ग्रुप का चैनल लांचिंग के पहले से ही विवादों में रहा है। अल्‍प समय में ही यहां कई वरिष्‍ठ बदले जा चुके हैं। बड़ी छंटनी भी की जा चुकी है, इसके बावजूद कोई भी चीज पटरी पर नहीं आ पाई।

जानकारी के अनुसार पिछले काफी समय से जीएनएन में काम कर रहे कर्मचारियों की सेलरी कई दिन लेट आ रही थी। इस बार भी जनवरी की सेलरी अब तक नहीं आई है जबकि फरवरी बीतने जा रहा है। आश्‍वासनों के सहारे कर्मचारियों से काम लिया जा रहा था। पर अब कर्मचारी मानने को तैयार नहीं हैं। कर्मचारी अपनी सेलरी दिए जाने की मांग पर अड़े हैं। बताया जा रहा है कि जगजीत सिंह अरोड़ा ने भी कर्मचारियों को समझाने का प्रयास किया तथा आश्‍वासन दिया कि दो-तीन दिन में सेलरी आ जाएगी पर कर्मचारी मानने को तैयार नहीं हैं। एक दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि कहीं भी दिखाई न पड़ने वाला यह चैनल आजतक, स्‍टार न्‍यूज, जीटीवी, आईबीएन7, इंडिया टीवी जैसे चैनलों को पीछे छोड़ते हुए तीन दिन पहले ही बेस्‍ट डिट्रीब्‍यूशन का अवार्ड जीता है।

फुटबालर सामी ने लेना गेर्क्‍के के बदन को अपने हाथ से ढंका, बवाल

एक ट्यूनीशियाई अख़बार के प्रकाशक को रियल मैड्रिड के फुटबॉल खिलाडी सामी खेदिरा की एक मैगजीन के कवर पेज पर एक कामोत्तेजक तस्वीर जिसमें वह अपनी मॉडल गर्ल फ्रेंड लेना गेर्क्के के स्तनों को अपने हाथों से ढंके है, को अपने अख़बार में छापने के बाद 15 फरवरी को गिरफ्तार किए जाने के बाद शुक्रवार को जमानत पर रिहा कर दिया गया। दैनिक समाचार पत्र अतौनिसिया के प्रकाशक नासृदीन बेन सैदा को 15 फरवरी को अखबार के एडिटर और एक पत्रकार के साथ जीक्यू मगजिन का कवर पेज छापने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया था।

टुनिस की प्राथमिक न्यायालय ने प्रकाशक को शुक्रवार को रिहा कर दिया। उनपर लगे सार्वजनिक शालीनता का उल्लंघन करने के आरोप की सुनवाई 8 मार्च तक स्थगित कर दी गई है। इस विवादस्पद तस्वीर में जर्मन- ट्यूनीशियाई फुटबाल खिलाड़ी सामी खेदिरा को तुक्सेडो कपड़े में अपने हाथों से उनकी नग्न जर्मन मॉडल गर्लफ्रेंड लेना गेर्क्के के स्तनों को कवर किए हुए दिखाया गया है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान प्रकाशक ने कहा कि उसका नैतिक शिष्टाचार के उल्लंघन करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि यह एक जाने-माने फुटबॉल खिलाड़ी के बारे में है और इसके अलावा तस्वीर का एक कलात्मक आयाम है।

प्रकाशक के एक वकील अब्देर्रावुफ अयादी ने अदालत से कहा कि ‘उनके मुवक्किल की गिरफ्तारी का औचित्य साबित करने के लिए कुछ भी नहीं है,खासकर तब जब न्यूज़ पेपर की प्रतियों को जल्द ही दुकानों से हटा लिया गया था।’ एक दूसरे वकील चोकरी बेलैद ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी एक राजनीतिक निर्णय था। उन्होंने कहा “हम जानते है कि ट्यूनीशिया में इस वक़्त स्वतंत्रता की रक्षा करने वालों और जो इसे दबाना चाहते हैं के बीच लड़ाई चल रही है।” उन्होंने कहा “ट्यूनीशियाई न्याय के लिए यह ट्रायल एक बड़ी परीक्षा है,हम चाहते हैं कि इसकी अपनी स्वतंत्रता दिखे और साबित करे कि यह किसी निर्देश को लागू नहीं कर रहा है।”

फुटबाल खिलाड़ी सामी खेदिरा इस्लामी ट्यूनीशिया देश में उनके पिता के टुनिशिया के होने के कारण लोकप्रिय है,लेकिन प्रकाशक के गिरफ्तारी के बाद देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा और सरकार को किसी मसले पर क्या अनैतिक है यह कैसे तय किया जाना चाहिए मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई है। जर्मन न्यूज़ पेपर बिल्ड को दिए अपने बयान में 24 वर्षीय खेदिरा ने कहा “मैंने मामले के बारे में गुरुवार को सुना और मैं इसे बहुत दुखी करने वाला और दुर्भाग्यपूर्ण मनाता हूं।”

उन्होंने कहा “मैं सभी धर्मों का आदर करता हूं और लोगों के विश्वास का भी सम्मान करता हूं,लेकिन मैं ये नहीं समझ पर रहा हूं कि लोग क्या अपने-आप को खुलकर अभिव्यक्त भी नहीं कर सकते हैं।” शुक्रवार हो मुक़दमे की सुनवाई के दौरान नासृदीन बेन के कई सहकर्मी खचाखच भरी अदालत में उनके समर्थन में उपस्थित नजर आए। वहीं टुनिशिया के राष्ट्रीय स्तर के हस्तियों में संविधान सभा कि सदस्य सलमा बककर और हम्मा हम्मामी,टुनिसियन कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख के साथ साथ मानवाधिकार कार्यकर्ता रधिया नस्रावुई भी मौजूद थे।

एक तरह जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताया वहीं पिछले सप्ताह ट्यूनीशियाई पत्रकार संघ ने प्रारंभिक अदालत के बेन सैदा के छोड़े जाने के खिलाफ निराशा प्रकट की। बेन की गिरफ्तार के बाद ‘रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स’ नामक समूह का कहना है कि यह एक पाखंडी प्रतिक्रिया है क्योंकि इस तरह की तस्वीरें ट्यूनीशिया में बेचे जा रहे विदेशी मैगजीनों के कवर पेज पर अक्सर छपती रहती है। एजेंसी

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