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ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है। ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है।(4)

-अमलेन्दु उपाध्याय||

अगर अखिलेश का करिश्मा है तो माया की हार कैसे है?


ऐन होली से पहले उत्तर प्रदेश में छप्परफाड़ मिली सफलता से समाजवादी पार्टी में खुशी का माहौल है। हो भी क्यो न? आखिर लगातार पांच साल सत्ता से बाहर रहकर पहली बार पार्टी प्रदेश की सरकार में आ रही है। लेकिन जितना खुशी का माहौल सपा में है उससे कई लाख गुना खुशी का माहौल हमारे मीडिया में व्याप्त है। बड़े-बड़े दिग्गज सपा की इस जीत पर युवराज अखिलेश की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं और अखबारों के मुखपृष्ठ पर विशेष संपादकीय लिखकर ये बताने का कार्य किया जा रहा है गोया प्रदेश में कोई बहुत बड़ी क्रांति हो गई है और बस उत्तर प्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है।
दरअसल हमारा मीडिया कुछ ज्यादा अतिउत्साही है। अखिलेशमय मीडिया की मौजूदा तस्वीर देखकर मुझे वर्ष 2007 का मई का महीना याद आ रहा है। हमारे यही मीडिया के सुधीजन प्रदेश में मायावती की ताजपोशी पर भी इसी तरह मायामय नज़र आ रहे थे और कई बड़े पत्रकार तो इस हद तक पहुंच गए थे कि  मायावती की जीत को दूसरी आजादी बता रहे थे ठीक उसी तरह जैसे कुछ दिन पहले अन्ना आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। लेकिन ज्यादा समय नहीं गुजरा कि यही मीडिया मायावती के पीछे हाथ धोकर पड़ गया जैसे 2003 और 2004 में मुलायम सिंह के पीछे पड़ गया था। सवाल यह है कि क्या हमारे बड़े पत्रकार वास्तव में कभी बड़े बन भी पाएंगे या ऐसी ही बचकानी हरकतें करते रहेंगे?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा को जो जीत मिली है उसमें उसके संघर्ष का भी योगदान है। लेकिन क्या केवल उसके संघर्ष से ही उसे ये जीत मिल गई है? क्या इस जीत में प्रदेश के मुस्लिम मतदाता और मायावती के कुशासन का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत में जातीय जुगलबंदी का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत का श्रेय

अकेले अखिलेश को दिया जाना उचित है, इसमें आज़म खां और शिवपाल और स्वयं मुलायम सिंह का कोई रोल नहीं है? अगर मीडिया में आ रहे विश्लेषणों पर नज़र डालें तो ऐसा ही लगता है गोया बस प्रदेश में अखिलेश ही अखिलेश हैं बाकी सब कूड़ा करकट हैं।
अहम प्रश्न यह है कि अगर ये केवल अखिलेश का कमाल है तो यह कमाल 2009 के लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? 2007 के विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? उस समय भी अखिलेश मैदान में थे फिर कमाल क्यो नहीं हुआ? आखिर अखिलेश ने पिछले दिनों वे कौन से महत्वपूर्ण कार्य किए जिनके कारण उनका जादू चल गया? बसपा नेत्री मायावती जब बोलती हैं तो बहुत कर्कश और कटु बोलती हैं लेकिन बात सीधे कहती हैं फिर चाहे किसी को बुरी लगे या भली। चुनाव हारने के बाद उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में जो कहा वह उनकी हताशा और बदजुबानी कहा जा सकता है लेकिन सत्य यही है कि बसपा को मुसलमानों और भाजपा व कांग्रेस ने मिलकर हराया है न कि सपा ने!

कांग्रेस ने जिस तरह ऐन चुनाव के वक्त ओबीसी आरक्षण में मुस्लिम कोटा का दांव चला उससे साफ संकेत गया कि यह मुसलमानों की बेहतरी के लिए नहीं बल्कि चुनावी फायदे के लिए किया गया है। इस मुद्दे को लेकर जिस तरह भाजपा आक्रामक हुई और बसपा से टूटे हुए नेता बाबू सिंह कुशवाहा पिछड़ों के नेता के रूप में उसके साथ जुटे उससे लगने लगा कि प्रदेश में भाजपा मजबूत हो रही है और इस डर ने मुस्लिम मतदाताओं के सामने यह स्थिति पैदा कर दी कि वे मायावती के कुशासन के खिलाफ और भाजपा को रोकने के लिए सपा के साथ हो जाएं। और यही स्थिति बन गई। अब इसमें अखिलेश का कितना योगदान है? और अगर इसे अखिलेश का करिश्मा बताया जा रहा है तो मायावती को कोसना बंद कीजिए। क्योंकि ये अखिलेश का करिश्मा है तो मायावती सरकार की नाकामी कहां से है?
इसी तरह बसपा ने ऐन चुनाव से पहले अपने लगभग आधे विधायकों के टिकट काटे। इनमें से अधिकांश चुनाव लड़े और उन सभी ने बसपा को ही नुकसान पहुंचाया।
प्रचारित किया जा रहा है कि धर्म और जाति से ऊपर उठकर यह जनादेश आया है। तो अखिलेश और मुलायम ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर तो वोट मांगा नहीं था और न सपा ने। फिर यह जाति और धर्म से ऊपर जनादेश कैसे हो गया? और अगर ये जाति धर्म से ऊपर उठकर जनादेश है तो क्या सपा भी इससे ऊपर उठकर पांच साल तक बिना राग द्वेष के सरकार चलाएगी?

सपा के पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के खतरों के संकेत मिलना शुरू हो गए हैं। आशंकाएं निरी निर्मूल नहीं हैं और न पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। सरकार बनने की सूचना मिलते ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर जिस तरह से उत्पात मचाया है और पत्रकारों के साथ भी मारपीट की है उससे भविष्य के पांच साल का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस यज्ञ में पहली आहुति जिन लोगों ने दी है वे कोई मामूली लोग नहीं हैं। संभल में जिन विधायक जी के विजय जुलूस में गोली चली है वे सपा के एक बड़े थिंक टैंक महासचिव के बहुत खास हैं और इतने प्रभावशाली हैं कि उनके कारण ही बड़े मुस्लिम नेता शफीकुर्रहमान वर्क को पार्टी छोड़नी पड़ी थी। इसी तरह झांसी में मिनी मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले एक नेता जी शिवपाल सिंह के पार्टी की कमान संभालने से पहले प्रदेश में पार्टी की कमान संभालते थे, वहां भी जो घटनाएं हुई हैं वे भविष्य की कहानी कह रही हैं। इन घटनाओं से पार्टी अगर सबक लेती है तो ठीक है, वरना जो मीडिया आज अखिलेशमय नज़र आ रहा है वही चार महीने में उनके खिलाफ उसी तरह खड़ा नज़र आएगा जैसे पिछले पांच सालों में मायावती के खिलाफ खड़ा था और पिछली सरकार में मुलायम सिंह के खिलाफ खड़ा था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

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इस्‍तीफे के बाद मायावती ने कहा – मुसलमान और मीडिया ने हरा दिया बसपा को इस्‍तीफे के बाद मायावती ने कहा – मुसलमान और मीडिया ने हरा दिया बसपा को(2)

लखनऊ : बसपा प्रमुख एवं सीएम मायावती ने बुधवार को राज्‍यपाल बीएल जोशी को अपना इस्‍तीफा सौंप दिया। मीडिया से बचती-बचाती वे इस्‍तीफा देने के लिए राजभवन पहुंचीं। इस्‍तीफे के बाद उन्‍होंने मीडिया को संबोधित किया। इस दौरान उन्‍होंने हमेशा की तरह लिखित बयान पढ़ा। मायावती ने बसपा के हार के कारणों को तो गिनाया ही साथ ही उन्‍होंने इसके लिए मीडिया को भी जिम्‍मेदार बताया। उन्‍होंने कहा कि भाजपा-कांग्रेस के चलते यूपी अब गलत हाथों में पहुंच गया है। इसके बाद उन्‍होंने शब्‍दश: जो कहा वो नीचे है।

”उत्तर प्रदेश के नतीजे घोषित हो चुके हैं और ये हमारी पार्टी के अनुकूल न आने के कारण आज मैंने विधान सभा भंग करने की सिफारिश करने के साथ-साथ अपने मुख्यमंत्री के पद से भी इस्तीफा महामहिम राज्यपाल को सौंप दिया है। हालांकि मेरी इस सरकार के बारे में वैसे आप लोगों को ये भी मालूम है कि मैंने सन 2007 में हर स्तर पर कितनी ज्यादा खराब हालातों में प्रदेश की सत्ता अपने हाथों में ली थी, जिन्हें सुधारने में मेरी सरकार को काफी ज्यादा मेहनत करनी पड़ी है जबकि इस मामले में मेरी सरकार को सहयोग देने में विरोधी पार्टियों की तरह केंद्र सरकार का भी रवैया ज्यादातर नकारात्मक रहा है। इस सबके बावजूद भी मेरी सरकार ने अपनी पार्टी की सर्वजन-हिताय व सर्वजन-सुखाय की नीति के आधार पर चलकर यहां विकास व कानून व्यवस्था के साथ-साथ सर्व समाज में गरीबों, मजदूरों, छात्राओं, कर्मचारियों आदि के हितों के लिए हर मामले में व हर स्तर पर महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक कार्य किए हैं। प्रदेश में बिजली की खराब स्थिति को सुधारने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं जिनका फायदा 2014 तक प्रदेश की जनता को मिल जाएगा।

दुख की बात यह है कि प्रदेश में अब सत्ता ऐसी पार्टी के हाथों में आ रही है जो सभी विकास कार्यों को ठंडे बस्ते में डालकर एक बार फिर प्रदेश को कई वर्ष पीछे ले जाएगी। इसके लिए हमारी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस के गलत स्टैंड को ही जिम्मेदार मानकर चलती है। इस बारे में आप लोगों को यह भी मालूम है कि कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में विधानसभा आम चुनाव घोषित होने के तुंरत बाद ही अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जब मुस्लिम समाज के पिछड़े हुए लोगों को ओबीसी के कोटे में से आरक्षण देने के बात कही, तब बीजेपी ने उसका काफी डंटकर विरोध किया था। इतना ही नहीं बल्कि इस मुद्दे की आड़ में बीजेपी ने भी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रदेश में अग्रणी समाज के साथ-साथ ओबीसी वोटों को भी अपने ओर खींचने की कोशिश की थी, जिसके बाद प्रदेश के मुस्लिम समाज को यह डर सताने लगा था कि कहीं प्रदेश में फिर बीजेपी की सत्ता न आ जाए। इसी स्थिति में कांग्रेस को कमजोर देखते हुए, आरक्षण के मुद्दे पर बीएसपी से अपर कास्ट समाज व पिछडे़ वोटों को बीजेपी में जाने के डर से मुस्लिम समाज ने सपा को वोट किया। इसी कारण से प्रदेश के मुस्लिम समाज ने कांग्रेस और बसपा को अपना वोट न देकर अपना 70 फीसदी वोट इकतरफा तौर पर सपा को दे दिया। यही कारण है कि सिर्फ मुस्लिम वोटों के कारण ही सपा के ओबीसी, अग्रणी समाज और अन्य समुदायों के लोगों का वोट भी जुड़ जाने के कारण सपा के प्रत्याशी चुनाव जीते। मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर सपा के मुसलमान उम्मीदवार इस बार आसानी से चुनाव जीत गए।

प्रदेश में दलितों के वर्ग को छोड़कर ज्यादातर हिंदू समाज में से खास तौर पर अपर कास्ट समाज का वोट कई पार्टियों में बंट जाने के कारण सपा के उम्मीदवारों को ही मिला। कुछ अपर कास्ट हिंदू वोट बसपा को मिले, कुछ कांग्रेस को और बाकी बीजेपी को मिला। अपर कास्ट समाज का वोट बंटने के बाद सपा के समर्थन में परिणाम आने के बाद से प्रदेश का अग्रणी हिंदू समाज दुखी महसूस कर रहा है। लेकिन फिर भी हमारी पार्टी के लिए इस चुनाव में पहले से भी ज्यादा संतोष की बात यह रही है कि विरोधी पार्टियों के हिंदू-मुस्लिम वोटों के चक्कर में बीएसपी का अपना दलित बेस वोट बिलकुल भी नहीं बंटा है। दलित वर्ग के लोगों ने पूरे प्रदेश में अपना इकतरफा वोट बीएसपी के उम्मीदवारों को दिया है। इसी कारण हमारी पार्टी इस चुनाव में दूसरे नंबर पर बनी रही। वरना हमारी पार्टी बहुत पीछे चली जाती। मैं अपने दलित समाज के लोगों का दिल से धन्यवाद और आभार प्रकट करती हूं। इसके साथ-साथ मैं अपनी पार्टी से जुड़े मुस्लिम समाज व अन्य पिछड़ा वर्ग और अग्रणी जाति समाज के उन लोगों का भी दिल से शुक्रिया अदा करती हूं, जो इस चुनाव में किसी भी लहर में गुमराह नहीं हुए और बहकावे में नहीं आए और हमारी पार्टी से जुड़े रहे। हमारी पार्टी में सर्वसमाज के 80 उम्मीदवार चुनाव जीतकर आए हैं।

इसके साथ ही यहां मैं यह भी कहना चाहती हूं कि अब हमारी पार्टी दलितों की तरह यहां प्रदेश में अन्य सभी समाज के लोगों को भी कैडर के जरिए हिंदू-मुस्लिम मानसिकता से बाहर निकालने की भी पूरी-पूरी कोशिश करेगी ताकि इस बार के चुनाव की तरह आगे अन्य किसी भी चुनाव में हमारी पार्टी को इस तरह का कोई भी नुकसान न पहुंच सके। अंत में मेरा यही कहना है कि अब प्रदेश की जनता बहुत जल्द ही सपा की कार्यशैली से तंग आकर, जिसकी शुरुआत कल से हो चुकी है, बीएसपी के सुशासन को जरूर याद करेगी और मुझे यह पूरा भरोसा है कि अगली बार प्रदेश की जनता फिर से बसपा को पूर्ण बहुमत से सत्ता में लाएगी।

मैं प्रदेश की पुलिस और प्रशासन से जुड़े सभी छोटे-बड़े अधिकारियों का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं, पूरी अवधि में उन्होंने मुझे सरकार चलाने में सहयोग किया और 2009 के लोकसभा चुनाव और प्रदेश में 2012 के आम चुनाव करवाने में सहयोग का भी आभार प्रकट करती हूं। भ्रष्टाचार का मेरे शासन के जाने से कोई लेना देना नहीं है। बसपा को मुस्लिम वोटों के ध्रुविकरण के कारण नुकसान पहुंचा। कांग्रेस और बीजेपी और मीडिया जिम्मेदार हैं। प्रदेश की जनता के साथ अब जो भी होगा उसके लिए जनता कांग्रेस और बीजेपी के साथ-साथ मीडिया को भी कोसेगी।”

उनके लिखित भाषण के बाद पत्रकारों ने उनसे कई सवाल पूछे परन्‍तु उन्‍होंने ज्‍यादातर सवालों के जवाब नहीं दिए। पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में कहा कि जनता में उनकी सरकार के प्रति गुस्‍सा नहीं था, बल्कि भाजपा-कांग्रेस की गलत नीतियों के चलते मुसलमानों के वोट एकमुश्‍त सपा को चले गए, जिसके चलते बसपा कम सीटें मिलीं। उन्‍होंने कहा कि अगर जनता नाराज होती तो बसपा का हाल बिहार में लालू की पार्टी जैसा हो जाता। उन्‍होंने उत्‍तराखंड में बसपा के कदम के बारे में पूछे गए जवाब को भी टाल दिया तथा कहा कि आप सबको इसकी जानकारी प्रेस नोट से मिल जाएगी।

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पोर्न देखने वाले विधायकों पर कार्रवाई की बजाय मीडिया पर ही रोक लगाने की तैयारी पोर्न देखने वाले विधायकों पर कार्रवाई की बजाय मीडिया पर ही रोक लगाने की तैयारी(0)

विधानसभा में तीन मंत्रियों द्वारा अपने मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो क्लिपिंग देखने का मुद्दा सामने आने से परेशान कर्नाटक सरकार परेशान है। चौतरफा मुश्किलों से घिरी सरकार सदन के भीतर निजी टीवी चैनलों के कैमरों पर प्रतिबंध लगा सकती है। सरकार ने कहा है कि वह संसद की मीडिया नीति जैसी व्यवस्था पर विचार कर रही है। पर इस संबंध में पीठासीन अधिकारियों को फैसला करना है। इधर, पोर्न वीडियो प्रकरण में विधायकों से पहले पत्रकारों से पूछताछ किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया है।

हालांकि दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा ने सफाई दी है कि सरकार मीडिया को विधानसभा और विधानपरिषद में प्रवेश अथवा उसकी कवरेज से रोकेगी नहीं। उसकी स्‍वतंत्रता से कोई छेड़छाड़ नहीं किया जाएगा। जबकि जांच समिति ने इस प्रकरण को प्रसारित करने वाले टीवी चैनलों से शुरू में सवाल पूछने के समिति के फैसले से विवाद खड़ा हो गया है। समिति ने विधायकों से पूछताछ करने की बजाय क्लिपिंग दिखाने वाले चैनल तथा उसके पत्रकारों से पूछताछ की है।

दरअसल, अलग-अलग समाचार चैनलों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो वरिष्ठ पत्रकार बुधवार और गुरुवार को समिति के समक्ष उपस्थित हुए। उनसे समिति ने कई सवाल-जवाब किए। समिति के इस कदम पर मीडिया ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। वह इसे आरोपी पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय अपने ऊपर निशाना साधे जाने की चाल के रूप में देख रही है। अभी तक पोर्न वीडियो देखते पाए गए तीनों विधायक लक्ष्मण एस सावदी, सीसी पाटिल और जे कृष्ण पालेमर को तलब करने के बारे में कोई फैसला नहीं किया गया है। हालांकि समिति ने मीडिया के सवाल के जवाब में बताया है कि उन्‍हें बुलाने का फैसला कर लिया गया है।

इस संदर्भ में समिति के प्रमुख श्रीशैलप्पा बीदादुर ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि इस बारे में फैसला कर लिया गया है। आपको बाद में जानकारी मिल जाएगी। उन्होंने बताया कि समिति की अगली बैठक आठ मार्च को होगी। उन्होंने यह बताने से इंकार कर दिया कि तीनों विधायक समिति के समक्ष कब अपना बयान देंगे। गौड़ा ने नई दिल्ली में कहा कि मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। हमने मीडिया की निजता में दखल नहीं दिया। हम संसदीय प्रणाली की तर्ज पर सोच रहे हैं। इस प्रणाली के अंतर्गत निजी टीवी चैनलों के सदन में प्रवेश की इजाजत नहीं है।

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जम्‍मू में गतिरोध कायम : आज भी बहिष्‍कार जारी रख सकते हैं पत्रकार जम्‍मू में गतिरोध कायम : आज भी बहिष्‍कार जारी रख सकते हैं पत्रकार(0)

जम्‍मू कश्‍मीर में विधानसभा स्‍पीकर मुहम्‍मद अकबर लोन के विवादास्‍पद बयान पर गुरुवार को भी गतिरोध कायम रहने की संभावना है। पत्रकार आज भी दोनों सदनों की कार्यवाहियों का बहिष्‍कार कर सकते हैं, क्‍योंकि अब तक मामला सुलझ नहीं पाया है। सरकार और विपक्ष के प्रयास और मिन्‍नतों के बाद भी पत्रकार विवादास्‍द बयान को विधानसभा की रिकार्ड से हटाने की अपनी मांग पर कायम हैं। इससे कम पर वो किसी भी कीमत पर मानने को तैयार नहीं हैं।

उल्‍लेखनीय है कि दो दिन पूर्व विधानसभा स्‍पीकर लोन ने मीडिया को उनके कंट्रोल में होने का बयान दिया था तथा कहा था कि मीडिया को अपने सूत्र उन्‍हें बताने पड़ेंगे। जबकि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ है। इस बयान के बाद से ही जम्‍मू के पत्रकार विधानसभा तथा विधान परिषद की कार्यवाहियों का बहिष्‍कार कर रखा है। बुधवार को उन लोगों ने विधान सभा परिसर में धरना भी दिया। कई नेताओं और अधिकारियों के प्रयास के बाद भी वे अपनी मांग से पीछे नहीं हटे।

संभावना जताई जा रही है कि आज भी पत्रकारों का बहिष्‍कार जारी रह सकता है। हालांकि स्‍पीकर के दूतों ने पत्रकारों के पास संदेश पहुंचाया था कि स्‍पीकर मामले को सुलझाना चाहते हैं, पर पत्रकारों की मांग है कि विवादित वक्‍त्‍वय को रिकार्ड से हटाने के बाद ही आगे की बातचीत होगी। इस बीच प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष जस्टिस काटजू ने भी इस मामले में जांच की मांग की है। स्‍पीकर के बयान पर शिव सेना भी आंदोलन कर रही है। शिव सेना ने कल स्‍पीकर के खिलाफ प्रदर्शन किया तथा उनके खिलाफ नारे लगाए। शिवसेना ने कहा कि प्रेस पर अंकुश लगाने वालों को किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकता।

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मिन्‍नतों के बाद भी नहीं माने पत्रकार, बयान को हटाने को लेकर गतिरोध जारी मिन्‍नतों के बाद भी नहीं माने पत्रकार, बयान को हटाने को लेकर गतिरोध जारी(0)

जम्‍मू विधानसभा स्‍पीकर मोहम्‍मद अकबर लोन की मीडिया के उनके कंट्रोल में रहने की टिप्‍पणी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब भी जारी है। स्‍पीकर के बयान से नाराज मीडियाकर्मियों ने लगातार दूसरे दिन राज्‍य के दोनों सदनों की कार्रवाई का बहिष्‍कार किया। मीडियाकर्मियों को मनाने के लिए चौतरफा प्रयास किया गया। सरकार, विपक्ष और सदन के कई प्रतिनिधियों ने इस गतिरोध को खतम करने की कोशिश की पर आखिर तक सफलता नहीं मिल पाई।

यह विवाद लोन के उस बयान के बाद शुरू हुआ है, जिसमें उन्‍होंने कहा था कि मीडिया उनके नियंत्रण में है और यदि वह चाहें तो मीडिया को अपने सोर्स का खुलासा करना पड़ेगा। इस बयान के बाद ही मीडियाकर्मियों ने विधानसभा की कार्यवाही का बहिष्‍कार कर दिया था। बुधवार को भी पत्रकार विधानसभा परिसर पहुंचकर सीढि़यों पर धरना देकर बैठ गए। सबसे पहले सीएम के एडवाइजर देवेंद्र सिंह राणा ने मीडियाकर्मियों को मनाने-समझाने का प्रयास किया पर पत्रकार टस से मस नहीं हुए।

इसके बाद माकपा विधायक एमवाई तारिगामी भी मीडियाकर्मियों को सदन में आने के लिए कहा परन्‍तु मीडियाकर्मी स्‍पीकर के आपत्तिजनक टिप्‍पणी को विधानसभा की कार्रवाई से बाहर निकालने की मांग पर डंटे हुए थे। इसके बाद संसदीय कार्य एवं कानून मंत्री अली मोहम्‍मद सागर, पैंथर्स पार्टी के विधायक हर्षदेव सिंह भी पत्रकारों को मनाने के लिए आए। इन लोगों ने बताया कि स्‍पीकर इस मामले को सुलझाने के लिए तैयार हैं, परन्‍तु पत्रकार आपत्तिजनक अंश को कार्रवाई से हटाने पर अड़े हुए थे। समझा जा रहा है कि गुरुवार को भी पत्रकारों का बहिष्‍कार जारी रहेगा।

 

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काटजू के बयान पर बिहार विधानसभा में हंगामा, तीन सदस्‍यीय जांच कमेटी गठित काटजू के बयान पर बिहार विधानसभा में हंगामा, तीन सदस्‍यीय जांच कमेटी गठित(0)

पटना। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू के ‘बिहार में प्रेस की आजादी नहीं’ सम्बंधी बयान को लेकर सोमवार को बिहार विधानसभा के बाहर और भीतर विपक्षी दलों ने जमकर हंगामा किया और सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया। विधानसभा की कार्यवाही प्रारंभ होने से पहले गेट के बाहर सभी विपक्षी सदस्यों ने प्रेस की आजादी को लेकर विभिन्न तरह के नारे लिखे तख्तियों को लेकर सरकार के विरोध में जमकर नारे लगाए। इसके बाद जब सदन प्रारंभ हुआ तब भी सदन के अंदर काटजू के बयान को लेकर हंगामा किया। इसके बाद विपक्ष ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया।

इस मसले पर विपक्ष ने कार्यस्थगन का प्रस्ताव भी दिया जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने अवैधानिक बताते हुए नामंजूर कर दिया। शून्यकाल में भी इस मसले पर जमकर शोर शराबा हुआ। नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी ने कहा कि काटजू के वक्तव्य पर जिस तरह से उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने टिप्पणी की है वह अपमानजनक है। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस पर कहा कि जिस तरह से प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष श्री काटजू वक्तव्य दे रहे हैं, वैसी स्थिति में केंद्र सरकार को इस पर विचार करना चाहिए कि ऐसे लोगों को इस तरह के पद पर रखा जाना चाहिए या नहीं। विपक्ष ने इस मसले पर ध्यानाकर्षण के समय भी सदन का बहिष्कार किया।

शून्यकाल में इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी ने जब उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नाम के साथ अपनी बात कही तो उप मुख्यमंत्री श्री मोदी ने कहा कि-यह तो मीडिया को तय करना है कि वह स्वतंत्र है कि नहीं? चार आदमी ने श्री काटजू को ब्रीफ कर दिया तो क्या उसके आधार पर वह टिप्पणी कर देंगे। दरअसल श्री काटजू अलग-अलग राज्यों में पहुंचकर इस तरह की टिप्पणी करते रहे हैं। महाराष्ट्र में गये तो वहां कह दिया कि महाराष्ट्र की सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए। गया में उन्होंने यह कहा कि बिहार सरकार को सबक सीखा देंगे। ऐसी बात तो विपक्ष भी नहीं करता है। कौन लोग हैं जो उन्हें बरगला रहे हैं।

संसदीय कार्य मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि विपक्ष को इस मुद्दे को सदन में लाने से पहले से ठीक से पढ़ना चाहिए था। सरकार ने ऐसा कोई कानून तो बनाया नहीं है जो मीडिया पर बंदिश की बात करता हो। श्री काटजू ने खुद कहा है कि वह बिहार में मीडिया की स्वतंत्रता की जांच कराएंगे। पहले जांच रिपोर्ट तो आ जाये। श्री यादव ने कहा नेता प्रतिपक्ष संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के बारे में मर्यादा के साथ टिप्पणी करने की बात कही है जबकि राज्यपाल के अभिभाषण के बाद विपक्ष के कुछ सदस्यों ने राज्यपाल को सत्ताधारी दल का एजेंट कहा। इस पर नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी खड़े हो गये। उन्होंने कहा-आज जो लोग सत्ता में हैं उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल एआर किदवई के बारे में क्या कहा था सबको मालूम है।

गौरतलब है कि पटना में शुक्रवार को एक समरोह में काटजू ने कहा था कि बिहार में प्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है। अगर यहां कोई सरकार या सरकारी अधिकारी के खिलाफ लिख दे तो उसे परेशान किया जाता है। उन्होंने कहा था कि लालू के शासन काल से बिहार में विधि-व्यवस्था की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है परंतु प्रेस की आजादी कम हो गई है। उन्होंने कहा कि बिहार में अगर कोई पत्रकार सरकार के खिलाफ लिख देता है तो उसके मालिकों पर दबाव बनाकर उस पत्रकार को नौकरी से निकालवा दिया जा रहा है या उसे तंग करने की नीयत से स्थानांतरण करवा दिया जा रहा है। दूसरी तरफ खबर है कि जस्टिस काटजू ने बिहार में मीडिया की स्‍वतंत्रता की जांच के लिए तीन सदस्‍यीय टीम गठित कर दी है।

 

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क्‍या स्‍पीकर के कंट्रोल में है जम्‍मू कश्‍मीर की मीडिया? क्‍या स्‍पीकर के कंट्रोल में है जम्‍मू कश्‍मीर की मीडिया?(0)

जम्मू : क्‍या सचमुच जम्‍मू कश्‍मीर की मीडिया विधानसभा स्‍पीकर मोहम्‍मद अकबर लोन के कंट्रोल में है या फिर ये स्पिकर का बड़बोलापन है। इस बात को लेकर जम्‍मू कश्‍मीर की मीडिया बवाल काट रही है। विधानसभा स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन ने कल कहा कि ‘मीडिया मेरे कंट्रोल में है। समाचार पत्रों में छपी स्टोरी के सूत्रों की जानकारी सदन को देनी होगी। इसके बाद से ही बवाल जारी है। स्पीकर द्वारा यह बात कहने पर प्रेस गैलरी में मौजूद पत्रकारों ने सोमवार को सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार किया।

उनकी इस टिप्पणी पर विपक्ष ने भी आपत्ति जताई। इससे पहले सदन में तीन केबिनेट मंत्रियों ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार में घिरे होने के संबंध में एक स्थानीय अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित खबर की ओर अध्यक्ष का ध्यान दिलाया था। सेंट्रल हाल के बाहर धरने पर बैठे मीडिया कर्मियों ने मांग की कि जब तक स्पीकर अपने ये शब्द वापस नहीं लेते तब तक बहिष्कार जारी रहेगा। विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती भी मीडिया के समर्थन में खड़ी हो गई हैं। उन्‍होंने शब्‍द वापस लेने तक पीडीपी के बहिष्‍कार का ऐलान किया है। उन्‍होंने इस विषय पर स्‍थगन प्रस्‍ताव लाने की बात भी कहीं है।

स्पीकर लोन के विवादित बयानों तथा रूख के चलते मीडिया कर्मी इससे पहले भी सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर चुके हैं। तब स्पीकर ने मीडिया से माफी मांग कर अपनी इज्‍जत बचाई थी। इस बार फिर स्‍पीकर विवादास्‍पद बयान देकर मीडिया को नाराज कर दिया है। स्पीकर ने सोमवार को कार्यवाही के दौरान इन शब्दों को इस्तेमाल तब किया जब स्वास्थ्य मंत्री शाम लाल शर्मा ने उनके तथा विभाग के खिलाफ एक समाचार पत्र में छपी स्टोरी का मामला सदन में उठाया। शर्मा ने समाचार पत्र के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। उन्‍होंने इस स्टोरी पर समाचार पत्र से जबाव लेने की अपील स्पीकर से की।

शर्मा का साथ देने के लिए पीएचई मंत्री ताज मोहयुद्दीन भी खड़े हो गए। इस पर स्पीकर ने कहा कि इस मामले पर बाद में अपना निर्णय देंगे और मीडिया को भी निर्देश जारी करेंगे। इस पर पीडीपी के निजामुद्दीन बट ने कहा कि इस मामले को विधानसभा में नहीं उठाया जा सकता। इसकी शिकायत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को की जानी चाहिए। इस पर स्पीकर ने कहा कि मीडिया मेरे अधीन है और उन्हें अपने सूत्रों की जानकारी देनी ही होगी। बाद में स्‍पीकर ने सफाई देते हुए कहा कि मीडिया सदन के अधीन है। इस पर नाराज पत्रकार विरोध स्‍वरूप प्रेस गैलरी से बाहर निकल आए। आज भी मीडिया ने बहिष्‍कार जारी रखने की बात कही है।

स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन के बयान के चलते उनका इसके पहले भी मीडिया के साथ विवाद हो चुका है। गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले बजट सत्र के दौरान वर्ष 2009 में भी उनके व्यवहार के चलते मीडिया ने कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार किया। उस समय विपक्ष के नेता महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा से वाक आउट किया था। इस पर मीडियाकर्मी महबूबा से प्रतिक्रिया लेने के लिए मीडिया गैलरी से बाहर चले गए थे, तब लोन ने बाहर गए रिपोर्टरों को प्रेस गैलरी में न आने देने का निर्देश जारी कर दिया था। बाद में उमर के राजनीतिक सलाहकार के मध्‍यस्‍थता के बाद स्थिति ठीक हुई थी तथा लोन ने अपनी गलती मानते हुए मीडियाकर्मियों से माफी भी मांगी थी।

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प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष मार्केडेय काट्जू के उस बयान पर बिहार की राजनीति गरमा गयी है जिसमें यह कहा गया था कि बिहार में प्रेस पर पाबंदी है। काटजू के इस वक्तव्य पर उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि उन्हें इस तरह के विवादास्पद वक्तव्य देने की आदत है। वहीं विपक्ष के लोग श्री काटजू के वक्तव्य के साथ खड़े हो गये हैं। राजद सुप्रीमो ने कहा है कि काटजू ने जो कहा है, वही सच है।

उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू को राजनीति में उतरने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि काटजू साहब को ऐसे विवादास्पद बयान देने की आदत सी है। वैसे महत्वपूर्ण पद पर रहने वाले व्यक्ति को राजनीति से प्रेरित बातें करना उचित नहीं। बेहतर है कि वे खुलकर इस क्षेत्र में आ जायें। बिहार में प्रेस स्वतंत्र है या नहीं यह तो पत्रकार ही बेहतर बता सकते हैं। मगर लालू राज से वर्तमान शासन की तुलना करना कहीं से उचित नहीं है।

उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। शनिवार को पटना मेडिकल कालेज अस्पताल, पीएमसीएच के 87वें स्थापना दिवस समारोह में भाषण देने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने काटजू के बयान पर मीडियाकर्मियों द्वारा पूछे गये सवाल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। नीतीश ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि अर्धन्यायिक संस्था पीसीआई के अध्यक्ष काटजू ने शुक्रवार को पटना में एक कार्यक्रम में कहा था कि बिहार में मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश है और भारतीय प्रेस परिषद इस संबंध में जांच के लिए राज्य में अपनी एक टीम भेजेगी।

काटजू के बयान पर पूछे गये सवाल के जवाब में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा, ‘राज्य में प्रेस बिल्कुल स्वतंत्र है। काटजू साहब को बिहार में विकास और अच्छी चीजों के बजाय यही प्रेस की स्वतंत्रता का मामला दिखाई देता है तो उन्हें बधाई है।’ बिहार विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर सरकार की ओर से नीतीश कुमार ने जवाब देते हुए गुरुवार को कहा था कि बिहार में मीडिया स्वतंत्र है। प्रेस पर कोई बंधन नहीं है।

उधर जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘प्रेस परिषद के अध्यक्ष का बयान अखबारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए दिया गया बयान है। सरकार द्वारा बिहार में मीडिया पर अंकुश लगाने की बात गलत है। अपने बयानों से मीडिया में कैसे छपा जाए, काटजू का इस कला में किसी से मुकाबला नहीं है। जब वह जज थे तो भ्रष्टाचारियों को लैंपपोस्ट पर लटका देने की बात कही थी, जो अखबारों में खूब प्रकाशित हुई थी।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अखबारों में किस प्रकार छपा जाए, इसका हुनर नेताओं को भी उनसे काटजू से सीखना चाहिए।’’ तिवारी ने मीडियाकर्मियों से पलटकर सवाल किया, ‘‘क्या आपको लगता है कि बिहार में मीडिया पर सरकार का कोई दबाव है? काटजू का बयान अखबारों में प्रमुखता से छपा है, यदि नीतीश सरकार का दबदबा रहता तो यह खबर नहीं छपती।’’

हालांकि विधानमंडल के निचले सदन में अपने बयान के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था , ‘मीडिया अपनी बात कहने को स्वतंत्र है लेकिन कुछ एकपक्षीय बात दिखा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो न जाने क्या क्या लिखा जा रहा है। खिलाफ दिखाने से थोड़े ही फर्क पड़ता है। असत्य दिखाने से कुछ नहीं होता राज्य की जनता जमीन देखती है। हम लगातार जनता के बीच घूमते रहते हैं।’ नीतीश ने कहा था कि जनता के बीच रहना राजधर्म है और वह जनता के खजाने के ट्रस्टी हैं।

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने काटजू के बयान को और आगे बढ़ाते हुए कहा ‘‘मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दबाव में बिहार में प्रेस की आजादी खत्म हो गयी है। बिहार में प्रेस पर इतना दबाव है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ जो भी बयान प्रेस के दफ्तरों में जाता है उसे डस्टबीन में डाल दिया जाता है।’’

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने भी कहा कि श्री काटजू के वक्तव्य से सारी स्थिति सामने आ गयी हैं। मीडिया पर बिहार में जो दबाव है वह काटजू के बयान से सामने आ गयी है।(एजेंसी)

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राजनीति की भेंट चढ़ा उत्तर भारत का ‘मैनचेस्टर’ राजनीति की भेंट चढ़ा उत्तर भारत का ‘मैनचेस्टर’(0)

विद्याशंकर राय-||

सूती कपड़ों के उत्पादन और गुणवत्ता में देश-विदेश में कभी धमक रखने वाली यहां की कपड़ा मिलें आज गुजरे जमाने की चीज हो गई हैं। जिन कपड़ा मिलों के लिए कानपुर को उत्तर भारत के ‘मैनचेस्टर’ का दर्जा प्राप्त था और यहां की एल्गिन मिल से तैयार तौलिये की तारीफ अमेरिका के होटलों में हुआ करती थी। उन मिलों ने अब धुआं उगलना बंद कर दिया है। मिलों के बेरोजगार मजदूरों को चुनावी मौसम में लॉलीपॉप हालांकि, जरूर थमाई जा रही है। 

वर्ष 1862 में शुरू हुई एल्गिन मिल कानपुर में सूती कपड़े की पहली मिल थी। कानपुर में सार्वजनिक क्षेत्र की ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एनटीसी) के अलावा निजी क्षेत्र की तमाम कपड़ा मिलें जब चलती थीं, तो यहां प्रतिदिन न केवल लाखों मीटर कपड़ा तैयार होता था बल्कि इनकी धड़धड़ाती आवाज के साथ मजदूरों की धड़कनें भी चलती थीं। इन मिलों में काम करना गौरव की बात होती थी।

कानुपर की स्वदेशी कॉटन मिल में काम कर चुके राघवेंद्र प्रजापति ने बताया कि गंगा के किनारे होने की वजह से यहां कपास का अच्छा उत्पादन होता था। इससे लाखों लोगों की रोजी-रोटी चलती थी।

राघवेंद्र ने बताया, “बीते दो दशक में यहां एक के बाद एक मिलें बंद कर दी गईं। आज लाल इमली और जेके कॉटन को छोड़ कोई भी मिल चालू नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।”

केंद्र सरकार के आधा दर्जन मंत्री उत्तर प्रदेश के हैं, फिर भी बंद पड़ी मिलों को चलाने की पहल केवल कागजों तक ही सीमित रही। हाल यह है कि दक्षिण भारतीय मंत्रियों ने अपने क्षेत्रों में एनटीसी की मिलें शुरू कराईं, लेकिन कानपुर में केवल घोषणाओं से काम चलता रहा।

नेताओं की पैंतरेबाजी से अब लोग पूरी तरह से वाकिफ हो चुके हैं। एनटीसी में काम कर चुके राजेंद्र द्विवेदी ने कहा, “केंद्र और राज्य के नेता एवं मंत्री अपने-अपने क्षेत्रों का विकास कराने में लगे हैं। मिलों की परवाह किसी को नहीं है।”

 

एल्गिन मिल में काम कर चुके वीरेंद्र सिंह ने बताया कि जिनके ऊपर इन मिलों को चलाने की जिम्मेदारी है, अब वही इनकी जमीनें बिकवाकर कमाई के चक्कर में पड़े हैं।

सुनहरे दिनों को याद करते हुए वीरेंद्र ने बताया कि कपड़ा मिलों में हर दिन 11 लाख मीटर कपड़ा बनता था और करीब डेढ़ लाख मजदूर इन मिलों में काम करते थे।

कानपुर के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जिलाध्यक्ष विजय सेंगर ने बताया, “अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तब शहर की बंद पड़ी मिलों को चलवाने की पूरी कोशिश हुई थी। मामला जब हल होने के समीप पहुंचा, तब तक सरकार चली गई। यदि जनता ने साथ दिया तो मिलें दोबारा चलाई जाएंगी।”

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी वर्ष 2004 तथा वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में वादा किया था कि सरकार बनी तो मिलें शुरू की जाएंगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली को सम्बोधित करते हुए उन्होंने फिर यह वादा किया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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फूलन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी भी हैं प्रासंगिक फूलन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी भी हैं प्रासंगिक(1)

जार्ज जोसेफ-||

डकैत से सांसद बनीं फूलन देवी की हत्या हुए भले ही 11 वर्ष बीत गए हों, लेकिन अभी भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वह प्रासंगिक हैं।

कानपुर शहर के हरजिंदर नगर इलाके की जूते के शोरुम में लगी फूलन की तस्वीर इसकी गवाह है। महाराजपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार एवं शोरुम के मालिक मोहम्मद असीम कहते हैं, “वह मेरी बहन थीं। मैं उन्हें हमेशा इज्जत के साथ याद करुं गा।” यहां गुरुवार को मतदान होना है। फूलन देवी ने जब 1990 के दशक में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर राजनीति में प्रवेश किया तबसे असीम उनके सम्पर्क में थे। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा से यह महसूस करता था कि निचली जाति से सम्बंधित उस महिला पर ज्यादती हुई है। उनका हिंसात्मक जवाब एक प्रतिक्रिया थी।”

फूलन की प्रशंसा करने वालों में उनके कई पूर्व सहयोगी एवं राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं। फूलन के गिरोह ने 1981 में कानपुर से 60 किमी दूर बेहमई गांव में 22 ठाकुरों की हत्या कर दी थी। मल्लाह जाति की फूलन घटना के समय 18 वर्ष की थी।

लेकिन फूलन की कथित पीड़िता की छवि प्रस्तुत करने के प्रयासों का कई लोग विरोध भी करते हैं।

बेहमई कांड की विधवाओं का कई वर्षो तक मुकदमा लड़ने वाले विजय नारायण सिंह सेंगर ने कहा, “मीडिया एवं कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा फूलन को महिमामंडित किया गया है।” फूलन की 2001 में 38 वर्ष की उम्र में हत्या कर दी गई थी। सेंगर ने कहा कि वह फूलन एवं उसके गिरोह के सदस्यों के खिलाफ अभी भी मुकदमा लड़ रहे हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी इजाजत भी दे दी है।

फूलन पड़ोस के मिर्जापुर से सपा के टिकट पर दो बार सांसद चुनी गईं थीं। अभी भी कई राजनीतिज्ञ उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते। उन्नाव सीट से सपा उम्मीदवार एवं विधायक दीपक कुमार फूलन के निकट सहयोगी रहे हैं। उन्होंने आईएएनएस से कहा, “अपनी राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने हिंसा से भरे अपने जीवन के पिछले अध्याय को बंद करने की कोशिश की।”

कुमार के पिता और वरिष्ठ समाजवादी नेता मनोहर लाल कानपुर के पूर्व सांसद हैं और उनके प्रयासों से फूलन राजनीति में आईं। मिर्जापुर से सपा प्रत्याशी कैलाश चौरसिया एवं बहुजन समाज पार्टी के पिंटू सेंगर भी फूलन की प्रशंसा करते हैं।

फूलन की हत्या के आरोप में बंद शेर सिंह राणा गौतमबुद्ध नगर की जेवर विधानसभा क्षेत्र से राष्ट्रवादी प्रताप सेना के टिकट पर मैदान में है।

लेकिन फूलन एक दुर्दात डकैत थी या फिर सामाजिक अत्याचार की शिकार, इस बात पर बहस अभी भी जारी है।

सेंगर कहते हैं कि फिल्म एवं मीडिया के कारण फूलन को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया। जबकि असीम फूलन के प्रति सम्मान को लेकर दृढ़ है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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पेड न्यूज़ पर रोक है तो क्या..? नए-नए तरीकों का भी ‘जागरण’ हो चुका है पेड न्यूज़ पर रोक है तो क्या..? नए-नए तरीकों का भी ‘जागरण’ हो चुका है(2)

पिछले लोकसभा चुनावों में पेड न्यूज को लेकर जिस एक बड़े अखबार की सबसे अधिक आलोचना हुई थी उसका नाम दैनिक जागरण है। हालांकि इस बार अभी तक किसी प्रत्याशी ने जागरण के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की है लेकिन दैनिक जागरण अपने तरीके से पेड न्यूज का कारोबार करने से नहीं चूक रहा है। वाराणसी मंडल में ऐन चुनाव से पहले यहां छपनेवाले अखबार के संस्करण में दो ऐसे विज्ञापन नजर आ ही गये जो जागरण की दूषित मानसिकता का संकेत देते हैं।

15 फरवरी को इस क्षेत्र में मतदान से पूर्व जागरण में छपे ये दो विज्ञापन संकेत करते हैं कि चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद भी अखबारों ने पेड न्यूज के नये नये तरीके इजाद कर लिये और कारोबार को अंजाम दिया। लोकसभा चुनाव में अखबारों से जो सबसे बड़ी शिकायत थी वह यह कि जो कन्टेन्ट लिखा गया उसमें विज्ञापन शब्द नहीं लिखा गया इसलिए उससे यह समझने में मुश्किल हुई कि अखबार में छपी सामग्री समाचार है या विज्ञापन। तो इसका तोड़ जागरण ने कुछ यूं निकाला है कि सामग्री तो विज्ञापन है लेकिन विज्ञापन के अंदर जो लिखा है वह समाचार है।

ये दोनों विज्ञापन दो अलग अलग उम्मीदवारों के हैं। इसमें एक उम्मीदवार रोहनिया से बसपा के प्रत्याशी रमाकांत सिंह पिन्टू का है तो दूसरा विज्ञापन पिण्डरा से निवर्तमान विधायक और दबंग माफिया अजय राय का है। वैसे तो इन दोनों ही विज्ञापनों में बहुत छोटे अक्षरों में advt लिखकर विज्ञापन होने का संकेत किया गया लेकिन इन विज्ञापनों में ही असली खेल है। विज्ञापन के साथ ही यह भी लिखा हुआ है कि यह संबंधित प्रत्याशी द्वारा जारी किया गया है।

जाहिर है, ऐसा करने से विज्ञापन का खर्च प्रत्याशी के खाते में जुड़ जाएगा और अखबार पर कोई आरोप नहीं लगेगा, लेकिन जब आप विज्ञापन पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह तो विज्ञापन है ही नहीं। यह तो सीधे सीधे प्रशंसा समाचार है जिसे विज्ञापन बनाकर छाप दिया गया है और नीचे उसी प्रत्याशी द्वारा जारी किया गया बताया जा रहा है जिसकी प्रशंसा की जा रही है। इस तथाकथित विज्ञापन की भाषा देखने से कोई भी पत्रकार आसानी से हक़ीकत समझ सकता है।

रमाकांत सिंह पिन्टू के नाम से जो विज्ञापन छापा गया है, जरा उसकी भाषा पर गौर फरमाइये- ” रोहनिया विधानसभा के मुकाबले में रमाकांत सिंह पिन्टू को क्षेत्रीय प्रत्याशी होने का पूरा फायदा मिल रहा है। यही वजह है कि जाति और धर्म तथा पार्टी का बंधन तोड़कर सभी समाज के लोग उनका साथ दे रहे हैं। गांवों में पहुंचते ही नौजवानों का हुजूम साथ चल दे रहा है तथा गांव के बुजुर्ग सिर पर हाथ रखकर आशिर्वाद दे रहे हैं। रमाकान्त सिंह मिन्टू के मिलनसार व्यवहार और ब्लाक प्रमुख होने का भी उन्हें पूरा लाभ मिल रहा है।”

ऐसे ही लंबे चौड़े प्रचार के बाद आखिर में लिखा गया है-” मतदाताओं के रुझान को देखते हुए रमाकांत सिंह पिन्टू की जीत सुनिश्चित लग रही है।” इस पहले विज्ञापन को पढ़ने के बाद किसी के भी जेहन में तत्काल जो सवाल उभरेगा वह यह कि प्रत्याशी वोट मांगने और जनता से अपील करने की बजाय उन्हें हर हाल में अपने विजयी होने के कारण समझा रहा है। वह अपने तथाकथित विज्ञापन में न तो वोट मांग रहा है और न ही जनता से कोई अपील कर रहा है। उसका विज्ञापन बता रहा है कि वह तो विजेता है और उसके विजेता होने के जो कारण है वे कारण विज्ञापन में बता दिये गये हैं। और उस पर तुर्रा यह कि विज्ञापन के आखिर में उसी व्यक्ति की ओर से विज्ञापन को जारी बताया जा रहा है, जिसकी तारीफ की गई है।

इसी तरह दूसरा विज्ञापन अजय राय का है। कांग्रेस के अजय राय इस वक्त पिण्डरा विधानसभा से विधायक हैं और एक बार फिर मैदान में हैं। अजय राय की ओर से जो तथाकथित विज्ञापन प्रकाशित किया गया है उसकी भाषा भी विज्ञापन की आड़ में खबर छापनेवाला ही है। विज्ञापन इन शब्दों के साथ शुरू होता है कि “पिण्डरा की जनता इन दिनों चट्टी चौराहों पर स्वयं ही चौपाल लगाकर अजय राय और कांग्रेस को लेकर चर्चा कर रही है। एक माहौल बन गया है।” विज्ञापन में चुनाव आयोग की सख्ती का भी जिक्र किया गया है तो यह भी बताया गया है कि दूसरे प्रत्याशी जाति, धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है।

ये दो विज्ञापन हमें क्या बता रहे हैं? क्या सचमुच पेड न्यूज हमारी पत्रकारिता से खत्म हो गया या फिर उसने ज्यादा खतरनाक गठजोड़ कायम कर लिया है जिसमें वे खामियां दूर कर दी गई हैं जिसके कारण 2009 में बड़े अखबारी घरानों को आलोचना झेलनी पड़ी थी। हो सकता है इस दफा जागरण यह कह दे कि यह तो विज्ञापन है और विज्ञापन की भाषा क्या है यह फैसला विज्ञापनदाता करता है लेकिन क्या इस सफाई से जागरण निर्दोष साबित हो जाएगा? अगर ऐसा है तो गलत दावे और भ्रामक प्रचार के लिए अखबार और प्रत्याशी दोनों को दंडित किया जाना चाहिए। अगर विज्ञापन को खबर बनाना अपराध है तो खबर को विज्ञापन के रूप में छापना कौन सा पुनीत काम है? क्या उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए या फिर उसमें प्रकाशक की कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? फैसला शायद चुनाव आयोग को ही करना होगा। (विष्फोट)

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कितना काम आएगा युवाओ को रिझाने के लिए राजनीतिक दलों का लॉलीपाप? कितना काम आएगा युवाओ को रिझाने के लिए राजनीतिक दलों का लॉलीपाप?(0)

-धीरेंद्र अस्थाना||
देश की संसद में बड़ी-बड़ी बातें करने वाली राजनीतिक पार्टियां प्रायोगिक तौर पर अपनी ही बातों से मुकर जाती है। जिस की बानगी दिख रही है यूपी चुनावों में। हम बात कर रहै हैं सपा मुखिया मुलायम सिंह की। उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए समाजवादी पार्टी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती है। कभी अंग्रेजी और कम्प्यूटर शिक्षा का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी का नया चेहरा शुक्रवार को जारी घोषणा पत्र में देखने को मिला है। पार्टी ने 12वीं पास सभी छात्रों को लैपटाप उपलब्ध कराने का वादा किया है और दसवीं पास छात्रों को टेबलैट दिया जाएगा। घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों को मदरसों में तकनीकी शिक्षा के लिए सरकार विशेष बजट उपलब्ध करवाएगी। नेता जी के लिए तो बस हम यही कहना चाहेंगे ये जनता है जा सब जानती है। इसकी नजरों से बचना संभव नहीं है।
चुनाव का मौसम है और राजनीतिक दलों के नेता वायदे में जुटे हुए हैं। इसी की श्रृखंला में सपा मुखिया भी पिछले शुक्रवार को अपने चुनावी घोषणा पत्र में बोल पड़े कि इस बार प्रदेश में यदि उनकी सरकार बनती है तो प्रदेशवासियों को को क्या क्या तोहफे देेंगे। अब उन्होंने पिछली बार मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए प्रदेश के सभी वर्गों की छात्राओं को साइकिल बांटने की योजनाएं चलाई थी, जिस पर अमल तो किया गया, लेकिन उन्हें भी शायद ये नहीं पता होगा कि क्या पूरे प्रदेश की कन्याओं को साईकिल वितरण हो पाई थी। इसका जवाब तो शायद मुलायम के पास नहीं होगा, लेकिन अब बात है टेबलैट और लैपटाप की तो क्या मुलायम अपने वादे पर खरे साबित हो सकेंगे। बात तो ये भी है कि अब यदि मुलायम सिंह ने जनता से वादा तो कर दिया और अब इसे पूरा करने में क्या क्या जदोजहद करनी पड़ सकती हैं। वहीं प्रदेश के किसानों को सरकार की ओर से भूमि अधिग्रहण में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगें। 65 आयु वर्ष से ऊपर के किसानों को पेंशन मिलेगी, एक हजार रूपये बेरोजगारी भत्ता आदि कई ऐसे वादें किये है जिन पर अमल कर पाने के लिए क्या प्रदेश के पास इतना बजट होगा? क्या ये सारे वादे सिर्फ वादे ही रह जाएंगे? क्या बेरोजगारों को बिना किसी घोटालें के भत्ता मिल सकेंगा। तो सपा के मुखिया मुलायम ने आम जनमानस को ये लालीपाप तो दे दिया है अब देखना ये है कि यदि समाजवादी पार्टी की सत्ता बनती है तो इस पर कितना अमल हो सकेंगा।
वहीं उधर विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही सभी दलों ने वादों की झड़ी लगा दी है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने बीते दिनों अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए यह घोषणा की थी कि उत्तर प्रदेश में यदि उसकी सरकार बनी तो वह छात्रों के बीच लैपटाप व टैबलेट बांटेगी। इससे पहले समाजवादी पार्टी ने भी जनता से कुछ इसी तरह का वादा किया था। पार्टी ने अपने इस घोषण पत्र में छात्रों से लेकर महिलाओं और किसानों सहित समाज के हर वर्ग को लुभाने की कोशिश की है। पार्टी ने सरकार बनने की स्थिति में मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में लाडली लक्ष्मी योजना चलाने और बिहार की तर्ज पर स्कूली बालिकाओं को साइकिल बांटने की बात कही है। तो क्या ये वादे जनता से वोट लेने के लिए काफी होगे। या फिर किसानों को लुभाने के प्रयास के तहत पार्टी ने 1000 करोड़ रुपये का राहत कोष और उनके लिए कृषक कल्याण आयोग गठित करने का वादा किया है। साथ ही उन्हें 24 घंटे बिजली देने की बात भी कह दी है। पार्टी ने शिक्षकों के लिए भी आयोग गठित करने की बात कही है। पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में महिलाओं को रिझाने के प्रयास के तहत सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण देने की बात भी कही है। साथ ही स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित करने का वादा तक किया है। लेकिन क्या ये वादे उस जनता के लिए मुकमल होगें जो ये सोचकर नेता चुनती है, और ऐसे में यदि आम जनमानस से जुड़े लोगों के वादांे पर पानी फिर जाता है तो शायद इसका कष्ट जनता को सबसे ज्यादा होता है। अपने जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण देने की केंद्र सरकार की घोषणा का विरोध किया है और कहा है कि इस सम्बंध में वह सरकार को संसद से सड़क तक विरोध करेगी। इस बयान पर भाजपा ने शायद ये नही सोचा कि अल्पसंख्यकों के लिए हम सड़को पर उतरकर विरोध तो करेंगे। लेकिन जारी घोषणा पत्र से जब जनता नाखुश होगी तो क्या अन्य विपक्षी दल शांत रहेंगे।
इन दोनो पार्टियो की स्थिति को देखते हुए ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने जनता से वोट लेने के लिए नये नये तरीके अपना रखे है उसी का नतीजा है कि दोनों ही पार्टियो ने अपने अपने वोटो को बचाने के लिए युवा मतदाताओं को अपनी ओर खिचा हैं। जिससे एक बात तो साफ है कि युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए दोनो पार्टियों ने 12वीं पास सभी छात्रों को लैपटाप उपलब्ध कराने का वादा किया है और दसवीं पास छात्रों को टेबलैट दिया जाएगा। मतदाताओं को रिझाने के बाद अब इस बात की क्या गारंटी है कि ये दोनों बड़ी पार्टियां जनता के साथ किये गये वादो को पूरा कर सकेंगी।

इन दोनों भाजपा के प्रमुख नेता सुषमा स्वराज, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज हुसैन, सूर्य प्रताप शाही, नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेई आदि है और सपा में भी मुखिया मुलायम सिंह यादव, राम गोपाल यादव, अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह, आजम खान, मोहन सिह, बृज भूषण तिवारी आदि कई लोग है जो इन दिनों पांचो प्रदेशों की विधानसभा सीटों में जाकर चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हैं और जनता को सपने दिखा रहे हैं। इन चुनावी घोषणा पत्रों में सपा ने तो दसवीं पास छात्रांे को लैपटाप का लालीपाप दिया तो वहीं भाजपा ने बेहद रियायती दर पर छात्रों को लैपटाप देने के साथ-साथ युवाओं के सर्वांगीण विकास के युवा आयोग गठित करने की बात कहीं और हद तो तब हो गई जब क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर बेरोजगार युवाओं को बात कह डाली। अभी आम जनमानस का इन दोनों बड़ी पार्टी के लालीपाप से मन भरा भी नही था और ऐसे में कांग्रेस ने युवाओं को कोई उपहार देने के बजाय पांच सालों में बीस लाख युवाओं को रोजगार देने का वादा कर डाला। युवा छात्र मतदाताओं को रिझाने के लिए कांग्रेस ने छात्र संघों के चुनाव करवाने का वायदा भी किया है। तो कुल मिलाकर यदि इस बार के चुनाव पर नजर डाली जाए तो ये साफ है कि इस बार का बड़ा वोट बैंक युवा है और इन्हें रिझाने के लिए दल किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं।


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मिनी कश्मीर की झील में डूब रहा है कमल, लेकिन हाथी कहीं खेल ना बिगाड़ दे हाथ का मिनी कश्मीर की झील में डूब रहा है कमल, लेकिन हाथी कहीं खेल ना बिगाड़ दे हाथ का(2)

उत्‍तराखण्‍ड में भाजपा  पहली बार व्यक्ति विशेष के नाम पर चुनाव लड़ रही है। कहा जा रहा है कि प्रदेश की 72 फीसद जनता चाहती है कि खंडूड़ी मुख्यमंत्री बनें। परन्‍तु इसके लिए जरूरी है कि हर विधानसभा में भाजपा का कमल खिले। हालांकि उत्तराखंड के मिनी कश्मीर कहे जाने वाले पिथौरागढ़ में एंटी इनकंबेंसी फैक्‍टर असरकारक होता दिख रहा है जिससे भाजपा को नुकसान माना जा रहा है, और मीडिया रिपोर्टों की मानें तो ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ का नारा यहां उल्टा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन वहां हाथी की धमक से हाथ भी कांपता दिख रहा है। पिथौरागढ, डीडीहाट, धारचूला में भाजपा की सीट फंसती हुई नजर आ रही है, चन्‍द्रशेखर जोशी की एक रिपोर्ट

उत्तराखंड में  भाजपा और कांग्रेस का चुनावी समीकरण पूरी तरह से उलझ गया है। भाजपा के लिए मिनी कश्मीर कही जाने वाली पिथौरागढ़ की सीट फंसती हुई नजर आ रही है। पिछले दस सालों में पहला बार यह स्‍थिति आई है कि चुनाव प्रचार में जाति व क्षेत्रवाद विकास के मुद्दों पर भारी पड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। ज्ञात हो कि राज्य गठन के बाद पिथौरागढ़ विस में भाजपा के खाते में रही है। इस बार यहां एंटी इनकंबेंसी फैक्टर दिखाई दे रहा है।   पिथौरागढ़ में लोस चुनाव के दौरान भाजपा छह हजार से अधिक मतों से पिछड़ गई थी। तब जनता के आक्रोश को सत्तारूढ़ पार्टी ने नहीं समझा था।  वहीं आक्रोश अब फिर रई झील, नैनी सैनी हवाई पट्टी से नियमित उड़ान, नर्सिग कालेज आदि बड़े मुद्दे के रूप में विधानसभा चुनाव में भी दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस ने पिथौरागढ़ में भाजपा राज में कुमाऊं के साथ शिक्षा के क्षेत्र में की गई उपेक्षा को एक नया मुद्दा बनाया है। इस तरह अनेक मुददो से इस विस सीट पर कांटे का मुकाबला  दिखाई दे रहा है। भाजपा के विश्लेषक भी मान रहे हैं कि इस बार पिथौरागढ़ सीट पर कांटे की टक्कर है। 2002 और 2007 के चुनाव में भाजपा को जिताने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी भी दिखाई दे रही है।

धारचुला विस सीट में सरकार और विधायक के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी फैक्‍टर से भाजपा को नुकसान माना जा रहा है, ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ का नारा यहां उल्टा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। उक्रांद (पी) के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी, भाजपा प्रत्याशी खुशाल सिंह पिपलिया और कांग्रेस प्रत्याशी हरीश धामी के बीच कांटे का मुकाबला है।  शुरूआत में यहां काशी सिंह ऐरी ने काफी बढ़त बनाई थी लेकिन अब अंतिम दौर में काशी सिंह ऐरी फंसते हुए नजर आ रहे हैं जबकि विधायक एवं निर्दलीय प्रत्याशी गगन सिंह रजवार भाजपा, कांग्रेस और यूकेडी के वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। वहीं ऐरी के पक्ष में सहानुभूति की लहर भी दिखाई दे रही है, इस क्षेत्र में पूरा चुनाव धारचूला विस के 111 गांवों को मृगविहार अभ्यारण्य से बाहर करने के साथ ही बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा पर केंद्रित है। पलायन भी यहां बड़ा मुद्दा है लेकिन भाजपा, कांग्रेस के दिग्गजों ने इन मुद्दों की हवा निकाल दी है। ताबड़तोड़ प्रचार और सारे संसाधन झोंक देने से ऐरी की राह कांटों से भर दी है। भाजपा, कांग्रेस के कुछ दिग्गज भी ऐरी को किसी भी हालत में रोकने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

इसके अलावा बसपा प्रत्याशी राजेन्द्र कुटियाल ने अनुसूचित जनजाति के वोट बैंक में सेंधमारी की है। इसका नुकसान ऐरी को हो रहा है। हालांकि ऐरी को अनुसूचित जनजाति का वोट दिलाने के लिए इस जाति के तमाम आईएएस, आईएफएस, आईपीएस, पीसीएस, एलाइड पीसीएस, एलआईसी एवं तमाम बैंक अफसर जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। इसके बावजूद अनुसूचित जनजाति का काफी वोट कुटियाल के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है।

पिथौरागढ जनपद की डीडीहाट सीट में इस बार हाथी पहुंच चुका है।  भाजपा के प्रदेश अध्‍यक्ष व प्रत्याशी बिशन सिंह चुफाल को डीडीहाट विस सीट में  हाथी ने अपनी चिंघाड़ से हिला दिया  हैं।   बसपा प्रत्याशी जगजीवन सिंह कन्याल इस सीट पर अप्रत्याशित परिणाम लाकर चौंकाने वाली स्‍थिति में पहुंच गए हैं। मतदान के लिए अंतिम चरण में  उत्तराखंड के मिनी कश्मीर में हाथी रौंदता हुआ आगे बढता दिख रहा है। इस सीट से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चुफाल की  ही नहीं भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर है।

वैसे चुनाव की घोषणा से पहले भाजपा के लिए यह सबसे मुफीद सीट मानी जा रही थी लेकिन किसी दौर में भाजपा के सबसे वजनदार नेता जगजीवन सिंह कन्याल ने हाथी पर सवार होकर एकतरफा संघर्ष को काफी रोचक बना दिया है। इस सीट को अपने खाते में करने के लिए इस सीमांत सीट पर भाजपा के सर्वोच्‍च महारथी लालकृष्ण आडवाणी को लाया गया, और कांग्रेस ने अपने दिग्‍गज महारथी दिग्गज  केन्‍द्रीय मंत्री हरीश रावत को उतारा जिन्‍होंने कांग्रेस प्रत्याशी रेवती जोशी को जिताने के लिए गांव गधेरों में जनसभा कर चुनावी फिजा बनाने की । जबकि  बसपा प्रत्याशी जगजीवन सिंह कन्याल सिर्फ अपने बल पर इस महासंग्राम में डटे हैं, वह पिछले पांच साल से लोगों से मिलते जुलते रहे हैं और चुनाव प्रचार के बाद उभर रही तस्वीर में इसका असर भी देखने को मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश में 80 के दशक को छोड़कर हर बार डीडीहाट सीट में परिवर्तन होता रहा है। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा और कभी यूकेडी ने यहां से जीत का स्वाद चखा। राज्य गठन के समय इस सीट से चुफाल ही विधायक थे। इसके बाद 2002 और 2007 में भी चुफाल की विजय का डंका बजता रहा है।

नए परिसीमन के बाद बेरीनाग तहसील का पूरा हिस्सा गंगोलीहाट में चले जाने के कारण भाजपा प्रत्याशी को नुकसान हुआ है। यह क्षेत्र भाजपा का गढ़ रहा है। यह क्षेत्र हर बार जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभा चुका है। टिकटों के बंटवारे के समय यह माना जा रहा था कि इस सीट पर चुफाल की एकतरफा जीत तय है। कांग्रेस ने रेवती जोशी को मैदान में उतारकर इस अनुमान को और बल दे दिया था लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार बढ़ रहा है कि बसपा प्रत्याशी सहानुभूति लहर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें कि 80 के दशक में कन्याल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में एक थे और नगर पालिका पिथौरागढ़ के अध्यक्ष भी बने थे। 2002 के चुनाव में कन्याल ही डीडीहाट से भाजपा के प्रत्याशी थे लेकिन ऐन वक्त पर चुफाल को टिकट मिला। इसके बाद कन्याल ने कनालीछीना से भाग्य आजमाने की कोशिश की और उनके रास्ते को उक्रांद के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी ने जाम कर दिया। इसके बाद भाजपा पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी से बिगड़े रिश्तों के कारण कन्याल ने पहले कांग्रेस तो बाद में बसपा का दामन थाम लिया। डीडीहाट में चर्चा है कि कन्याल ने ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को राजनीति का ‘क, ख, ग’ सिखाया। अब यहां किस्मत ने गुरु और शिष्य को ही मुख्य मुकाबले में खड़ा कर दिया है। डीडीहाट शहर से लेकर तमाम ग्रामीण हिस्सों में ‘हाथी’ तेजी से आगे बढ़ रहा है लेकिन चुफाल की व्यक्तिगत छवि ‘हाथी’ को आगे बढ़ने से रोक रही है। इस कारण डीडीहाट सीट भी चुनाव नतीजों के हिसाब से फंसती हुई नजर आ रही है।

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