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मीडिया हकीकत दिखाए तो टीम अन्ना को बर्दाश्त नहीं… मीडिया हकीकत दिखाए तो टीम अन्ना को बर्दाश्त नहीं…(5)

-तेजवानी गिरधर||

अब तक तो माना जाता था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा की घोर प्रतिक्रियावादी संगठन हैं और उन्हें अपने प्रतिकूल कोई प्रतिक्रिया बर्दाश्त नहीं होती, मगर टीम अन्ना उनसे एक कदम आगे निकल गई प्रतीत होती है। मीडिया और खासकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर उसकी तारीफ की जाए अथवा उसकी गतिविधियों को पूरा कवरेज दिया जाए तो वह खुश रहती है और जैसे ही कवरेज में संयोगवश अथवा घटना के अनुरूप कवरेज में कमी हो अथवा कवरेज में उनके प्रतिकूल दृश्य उभर कर आए तो उसे कत्तई बर्दाश्त नहीं होता।
विभिन्न विवादों की वजह से दिन-ब-दिन घट रही लोकप्रियता के चलते जब इन दिनों दिल्ली में चल रहे टीम अन्ना के धरने व अनशन में भीड़ कम आई और उसे इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने दिखाया तो अन्ना समर्थक बौखला गए। उन्हें तब मिर्ची और ज्यादा लगी, जब यह दिखाया गया कि बाबा रामदेव के आने पर भीड़ जुटी और उनके जाते ही भीड़ भी गायब हो गई। शनिवार को हालात ये थी कि जब खुद अन्ना संबोधित कर रहे थे तो मात्र तीन सौ लोग ही मौजूद थे। इतनी कम भीड़ को जब टीवी पर दिखाए जाने लगा तो अन्ना समर्थकों ने मीडिया वालों को कवरेज करने से रोकने की कोशिश तक की।
टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी तो इतनी बौखलाई कि उन्होंने यह आरोप लगाने में जरा भी देरी नहीं की कि यूपीए सरकार ने मीडिया को आंदोलन को अंडरप्ले करने को कहा है। उन्होंने कहा कि इसके लिए केंद्र सरकार ने बाकायदा चिट्ठी लिखी है। उसे आंदोलन से खतरा महसूस हो रहा है। ऐसा कह कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि टीम अन्ना आंदोलन धरातल पर कम, जबकि टीवी और सोशल मीडिया पर ही ज्यादा चल रहा है। यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि टीवी और सोशल मीडिया के सहारे ही आंदोलन को बड़ा करके दिखाया जा रहा है। इससे भी गंभीर बात ये कि जैसे ही खुद के विवादों व कमजोरियों के चलते आंदोलन का बुखार कम होने लगा तो उसके लिए आत्मविश्लेषण करने की बजाय पूरा दोष ही मीडिया पर जड़ दिया। ऐसा कह कर उन्होंने सरकार को घेरा या नहीं, पर मीडिया को गाली जरूर दे दी। उसी मीडिया को, जिसकी बदौलत आंदोलन शिखर पर पहुंचा। यह दीगर बात है कि खुद अपनी घटिया हरकतों के चलते आंदोलन की हवा निकलती जा रही है। ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि क्या वाकई मीडिया सरकार के कहने पर चलता है? यदि यह सही है तो क्या वजह थी कि अन्ना आंदोलन के पहले चरण में तमाम मीडिया अन्ना हजारे को दूसरा गांधी बताने को तुला था और सरकार की जम की बखिया उधेड़ रहा था? हकीकत तो ये है कि मीडिया पर तब ये आरोप तक लगने लगा था कि वह सुनियोजित तरीके से अन्ना आंदोलन को सौ गुणा बढ़ा-चढ़ा कर दिखा रहा है।
मीडिया ने जब अन्ना समर्थकों को उनका आइना दिखाया तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बौखलाते हुए मीडिया को जम कर गालियां दी गईं। एक कार्टून में कुत्तों की शक्ल में तमाम न्यूज चैनलों के लोगो लगा कर दर्शाया गया कि उनको कटोरों में सोनिया गांधी टुकड़े डाल रही है। मीडिया को इससे बड़ी कोई गाली नहीं हो सकती।
एक बानगी और देखिए। एक अन्ना समर्थक ने एक न्यूज पोर्टल पर इस तरह की प्रतिक्रिया दी है:-
क्या इसलिए हो प्रेस की आजादी? अरे ऐसी आजादी से तो प्रेस की आजादी पर प्रतिबन्ध ही सही होगा । ऐसी मीडिया से सडऩे की बू आने लगी है। सड़ चुकी है ये मीडिया। ये वही मीडिया थी, जब पिछली बार अन्ना के आन्दोलन को दिन-रात एक कर कवर किया था। आज ये वही मीडिया जिसे सांप सूंघ गया है। ये इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की कुछ लोग इस देश की भलाई के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर लगे है, वही हमारी मीडिया पता नहीं क्यों सच्चाई को नजरंदाज कर रही है। इससे लोगों का भ्रम विश्वास में बदलने लगा है। कहीं हमारी मीडिया मैनेज तो नहीं हो गई है? अगर मीडिया आम लोगों से जुडी सच्चाई, इस देश की भलाई से जुड़ी खबरों को छापने के बजाय छुपाने लगे तो ऐसी मीडिया का कोई औचित्य नहीं। आज की मीडिया सिर्फ पैसे के ही बारे में ज्यादा सोचने लगी है। देश और देश के लोगों से इनका कोई लेना-देना नहीं। आज की मीडिया प्रायोजित समाचार को ज्यादा प्राथमिकता देने लगी है।
रविवार को जब छुट्टी के कारण भीड़ बढ़ी और उसे भी दिखाया तो एक महिला ने खुशी जाहिर करते हुए तमाम टीवी चैनलों से शिकायत की वह आंदोलन का लगातार लाइट प्रसारण क्यों नहीं करता? गनीमत है कि मीडिया ने संयम बरतते हुए दूसरे दिन भीड़ बढऩे पर उसे भी उल्लेखित किया। यदि वह भी प्रतिक्रिया में कवरेज दिखाना बंद कर देता तो आंदोलन का क्या हश्र होता, इसकी कल्पना की जा सकती है।
कुल मिला कर ऐसा प्रतीत होता है कि टीम अन्ना व उनके समर्थक घोर प्रतिक्रियावादी हैं। उन्हें अपनी बुराई सुनना कत्तई बर्दाश्त नहीं है। यदि यकीन न हो तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जरा टीम अन्ना की थोड़ी सी वास्तविक बुराई करके देखिए, पूरे दिन इसी काम के लिए लगे उनके समर्थक आपको फाड़ कर खा जाने को उतारु हो जाएंगे।
वस्तुत: टीम अन्ना व उनके समर्थक हताश हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जिस आंदोलन ने पूरे देश को एक साथ खड़ा कर दिया था, आज उसी आंदोलन में लोगों की भागीदारी कम क्यों हो रही है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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ऐसी क्या गोपनीय साजिश रची जा रही थी टीम अन्ना की बैठक में? ऐसी क्या गोपनीय साजिश रची जा रही थी टीम अन्ना की बैठक में?(25)

-तेजवानी गिरधर-

अन्ना से उसके कथित फाउंडर मेंबर मुफ्ती शमून काजमी की छुट्टी के साथ एक यक्ष प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि आखिर टीम की बैठक में ऐसा क्या अति गोपनीय हो रहा था, जिसे रिकार्ड करने की वजह से काजमी को बाहर होना पड़ा? मेरे एक सोशल नेटवर्किंग मित्र ऐतेजाद अहमद खान ने यह सवाल हाल ही फेसबुक पर डाला है, हालांकि उसका जवाब किसी ने नहीं दिया है।

हालांकि अभी यह खुलासा नहीं हुआ है कि काजमी ने जो रिकार्डिंग की अथवा गलती से हो गई, उसका मकसद मात्र याददाश्त के लिए रिकार्ड करना था अथवा सोची-समझी साजिश थी। टीम अन्ना बार-बार ये तो कहती रही कि काजमी जासूसी के लिए रिकार्डिंग कर रहे थे, मगर यह स्पष्ट नहीं किया कि पूरा माजरा क्या है? वे यह रिकार्डिंग करने के बाद उसे किसे सौंपने वाले थे? या फिर टीम अन्ना को यह संदेह मात्र था कि उन्होंने जो रिकार्डिंग की, उसका उपयोग वे उसे लीक करने के लिए करेंगे? या फिर टीम अन्ना का यह पक्का नियम है कि उसकी बैठकों की रिकार्डिंग किसी भी सूरत में नहीं होगी? और क्या टीम अन्ना इतनी फासिस्ट है कि छोटी सी गलती की सजा भी तुरंत दी जाती है?

अव्वल तो सूचना के अधिकार की सबसे बड़ी पैरोकार और सरकार को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने को आमादा टीम अन्ना उस बैठक में ऐसा क्या कर रही थी, जो कि अति गोपनीय था, कि एक फाउंडर मेंबर की छुट्टी जैसी गंभीर नौबत आ गई। क्या पारदर्शिता का आदर्श उस पर लागू नहीं होता। क्या यह वही टीम नहीं है, जो सरकार से पहले दौर की बातचीत की वीडियो रिकार्डिंग करने के लिए हल्ला मचाए हुई थी और खुद की बैठकों को इतना गोपनीय रखती है? उसकी यह गोपनीयता कितनी गंभीर है कि इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि टीवी चैनल वाले मनीष सिसोदिया और शाजिया इल्मी से रिकार्डिंग दिखाने को कहते रहे, मगर उन्होंने रिकार्डिंग नहीं दिखाई।

इसके दो ही मतलब हो सकते हैं। एक तो यह कि रिकार्डिंग में कुछ खास नहीं था, मगर चूंकि काजमी को निकालना था, इस कारण यह बहाना लिया गया। इसकी संभावना अधिक इस कारण हो सकती है क्योंकि इधर रिकार्डिंग की और उधर टीम अन्ना के अन्य सदस्यों ने तुरत-फुरत में उन्हें बाहर निकालने जैसा कड़ा निर्णय भी कर लिया। कहीं ऐसा तो नहीं काजमी की पहले से रेकी की जाती रही या फिर मतभेद पहले से चलते रहे और मौका मिलते ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। काजमी ने बाहर आ कर जिस प्रकार आरोप लगाए हैं, उनसे तो यही लगता है कि विवाद पहले से चल रहा था व रिकार्डिंग वाली तात्कालिक घटना उनको निकाले जाने की बड़ी वजह नहीं। इसी से जुड़ा सवाल ये है कि काजमी ने क्या चंद लम्हों में ही गंभीर आरोप गढ़ लिए?

यदि यह मान भी लिया जाए कि उन्होंने सफाई देने के चक्कर में तुरंत आरोप बना लिए, मगर इससे यह तो पुष्ट होता ही है कि उनके आरोपों से मिलता जुलता भीतर कुछ न कुछ होता रहता है। एक सवाल ये भी कि जो भी टीम के खिलाफ बोलता है, वह सबसे ज्यादा हमला अरविंद केजरीवाल पर ही क्यों करता है? क्या वाकई टीम अन्ना की बैठकों में खुद अन्ना तो मूकदर्शक की भांति बैठे रहते हैं और तानाशाही केजरीवाल की चलती है?

जहां तक रिकार्डिंग को जाहिर न करने का सवाल है, दूसरा मतलब ये है कि जरूर अंदर ऐसा कुछ हुआ, जिसे कि सार्वजनिक करना टीम अन्ना के लिए कोई बड़ी मुसीबत पैदा करने वाला था। यदि काजमी सरकार की ओर से जासूसी कर रहे थे तो वे मुख जुबानी भी सूचनाएं लीक कर सकते थे। फाउंडर मेंबर होने के नाते उनके पास कुछ रिकार्ड भी होगा, जिसे कि लीक कर सकते थे। रिकार्डिंग में ऐसा क्या था, जो कि बेहद महत्वपूर्ण था?

इस पूरे प्रकरण में सर्वाधिक रहस्यपूर्ण रही अन्ना की चुप्पी। उन्होंने कुछ भी साफ साफ नहीं कहा। उनके सदस्य ही आगे आ कर बढ़-चढ़ कर बोलते रहे। शाजिया इल्मी तो अपनी फितरत के मुताबिक अपने से वरिष्ठ काजमी से बदतमीजी पर उतारु हो गईं। यदि अन्ना आम तौर पर मौनी बाबा रहते हों तो यह समझ में आता भी, मगर वे तो खुल कर बोलते ही रहते है। कई बार तो क्रीज से बाहर निकल पर चौके-छक्के जड़ देते हैं। कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारे जाने का ही मामला ले लीजिए। इतना बेहूदा बोले कि गले आ गया। ऊपर से नया गांधीवाद रचते हुए लंबी चौड़ी तकरीर और दे दी।

ताजा प्रकरण में उनकी चुप्पी इस बात के भी संकेत देती है कि वे अपनी टीम में चल रही हलचलों से बेहद दुखी हैं। इस कारण काजमी के निकाले जाने पर कुछ बोल नहीं पाए। इस बात की ताकीद काजमी के बयान से भी होती है। कुल मिला कर टीम अन्ना की जिस बाहरी पाकीजगी के कारण आम जनता ने सिर आंखों पर बैठा लिया, अपनी अंदरुनी नापाक हरकतों की वजह से विवादित होती जा रही है।

आखिर में मेरे मित्र ऐतेजाद का वह शेर, जो उन्होंने अपनी छोटी मगर सारगर्भित टिप्पणी के साथ लिखा है-
जो चुप रहेगी जुबान-ऐ-खंजर
लहू पुकारेगा का आस्तीन का

 

तेजवानी गिरधर राजस्थान के जाने-माने पत्रकार हैं। उनसे फोन नं. 7742067000 या ई-मेल ऐड्रेस tejwanig@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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कब तक कायम रहेगी अन्ना और बाबा की मजबूरी में ओढ़ी एकजुटता? कब तक कायम रहेगी अन्ना और बाबा की मजबूरी में ओढ़ी एकजुटता?(8)

-तेजवानी गिरधर-

कैसा अजब संयोग है कि आज जब कि देश में गठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है, आंदोलन भी गठबंधन से चलाने की नौबत आ गई है। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और बाबा रामदेव सरकार से अलग-अलग लड़ कर देख चुके, मगर जब कामयाबी हाथ लगती नजर आई तो दोनों ने गठबंधन कर लिया है। जाहिर तौर पर यह गठबंधन वैसा ही है, जैसा कि सरकार चलाने के लिए कभी एनडीए को तो कभी यूपीए का काम करता है। मजबूरी का गठबंधन। गठबंधन की मजबूरी पूरा देश देख चुका है, जिसके चलते मनमोहन सिंह पर मजबूरतम प्रधानमंत्री होने का ठप्पा लग चुका है। अब दो अलग-अलग आंदोलनों के प्रणेता एक-दूसरे के पूरक बन कर लडऩे को तैयार हुए हैं तो यह स्वाभाविक है कि दोनों को संयुक्त एजेंडे के खातिर अपने-अपने एजेंडे के साथ-साथ कुछ मौलिक बातों के साथ समझौते करने होंगे। यह गठबंधन कितनी दूर चलेगा, पूत के पांव पालने में ही नजर आने लगे हैं। टीम अन्ना के कुछ सदस्यों को बाबा रामदेव के तौर-तरीके पर ऐतराज है, जो कि उन्होंने जाहिर भी कर दिए हैं।

ऐसा नहीं है कि अन्ना और बाबा के एकजुट होने की बातें पहले नहीं हुई हों, मगर तब पूरी तरह से गैर राजनीतिक कहाने वाली टीम अन्ना को संघ व भाजपा की छाप लगे बाबा रामदेव के आंदोलन से परहेज करना पड़ रहा था। सच तो ये है कि दोनों ही भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए गए आंदोलन में नंबर वन रहने की होड़ में लगे हुए थे। बाबा को योग बेच कर कमाए हुए धन और अपने भक्तों व राष्ट्रव्यापी संगठन का गुमान था तो अन्ना को महात्मा गांधी के समकक्ष प्रोजेक्ट कर दिए जाने व कुछ प्रखर बुद्धिजीवियों के साथ होने का दंभ था। राष्ट्रीय क्षितिज पर यकायक उभरे दोनों ही दिग्गजों को दुर्भाग्य से राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन करने का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। बावजूद इसके वे अकेले दम पर ही जीत हासिल करने के दंभ से भरे हुए थे। जहां तक बाबा का सवाल है, उन्हें लगता था कि उनके शिविरों में आने वाले उनके लाखों भक्त सरकार का तख्ता पलटने की ताकत रखते हैं, जबकि सच्चाई ये थी कि भीतर ही भीतर हिंदूवादी ताकतें अपने मकसद से उनका साथ दे रही थीं। खुद बाबा राजनीतिक आंदोलन के मामले में कोरे थे। यही वजह रही कि सरकार की चालों के आगे टिक नहीं पाए और स्त्री वेष में भागने की नौबत आ गई। उधर अन्ना को हालांकि महाराष्ट्र में कई दिग्गज मंत्रियों को घर बैठाने का अनुभव तो था, मगर राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार हाथ आजमाया। यह अन्ना का सौभाग्य ही रहा कि भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने उनको सिर माथे पर बैठाया। एक बारगी तो ऐसा लगा कि इस दूसरे गांधी की आंधी से वाकई दूसरी आजादी के दर्शन होंगे। मीडिया ने भी इतना चढ़ाया कि टीम अन्ना बौराने लगी। जहां तक कांग्रेसनीत सरकार का सवाल है तो, कोई भी सरकार हो, आंदोलन से निपटने में साम, दाम, दंड, भेद अपनाती है, उसने वही किया। सरकार ने अपना लोकपाल लोकसभा में पास करवा कर उसे राज्यसभा में फंसा दिया, उससे अन्ना आंदोलन की गाडी भी गेर में आ गई। इसे भले ही अन्ना को धोखा देना करार दिया जाए, मगर यह तो तय हो गया न कि अन्ना धोखा खा गए। मुंबई में फ्लाप शो के बाद तो टीम अन्ना को समझ में नहीं आ रहा था कि अब किया क्या जाए। हालांकि उसके लिए कुछ हद तक टीम अन्ना का बड़बोलापन भी जिम्मेदार है।
कुल मिला कर बाबा व अन्ना, दोनों को समझ में आ गया कि सरकार बहुत बड़ी चीज होती है और उसे परास्त करना इतना भी आसान नहीं है, जितना कि वे समझ रहे थे। चंद दिन के जन उभार के कारण दोनों भले ही दावा ये कर रहे थे कि वे देश की एक सौ बीस करोड़ जनता के प्रतिनिधि हैं, मगर उन्हें यह भी समझ में आ गया कि धरातल का सच कुछ और है। लब्बोलुआब दोनों यह साफ समझ में आ गया कि कुटिल बुद्धि से सरकार चलाने वालों से मुकाबला करना है तो एक मंच पर आना होगा। एक मंच पर आने की मजबूरी की और वजहें भी हैं। बाबा के पास भक्तों की ताकत व संगठनात्मक ढांचा तो है, मगर अब उनका चेहरा उतना पाक-साफ नहीं रहा, जिसके अकेले बूते पर जंग जीती जाए। उधर टीम अन्ना के पास अन्ना जैसा ब्रह्मास्त्र तो है, मगर संगठन नाम की कोई चीज नहीं। आपने बचपन में एक कहानी सुनी होगी, एक नेत्रहीन व एक विकलांग की। एक देख नहीं सकता था, दूसरा चल नहीं सकता था। दोनों ही अपने-अपने बूते गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुुंच सकते थे, सो दोनों ने दोस्ती कर ली। विकलांग नेत्रहीन के कंधों पर सवार हो गया। फिर जैसा-जैसा विकलांग बताता गया, अंधा चलता गया। वे गन्तव्य तक पहुंच गए।

लगभग वैसी ही दोस्ती है अन्ना व बाबा की, मगर वे पहुंचेंगे या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। वजह ये है कि दोनों का मिजाज अलग-अलग है। अन्ना ठहरे भोले-भाले और बाबा चतुर-चालाक। आज भले ही वे साथ-साथ चलने का दावा कर रहे हैं, मगर उनके साथ जो लोग हैं, उनमें भी तालमेल होगा, यह कहना कठिन है। दरअसल पूत के पग पालने में ही दिखाई दे रहे हैं। शुरुआत ही विवाद के साथ हो रही है। टीम अन्ना बाबा के रुख से इस कारण नाराज है क्योंकि वह मानती है कि अन्ना को भरोसे में लिए बिना रामदेव आगे बढ़ रहे हैं। असल में रामदेव और अन्ना हजारे की गुडगांव में हुई मुलाकात के बाद प्रेस कान्फ्रेंस हुई। टीम अन्ना का ऐतराज है कि उसे इसके बारे में पहले से नहीं बताया गया था। अन्ना ने मुद्दों पर बात करने के लिए मुलाकात की, लेकिन बैठक के बाद उन्हें जबरदस्ती मीडिया के सामने लाया गया। हमें इस पर गहरी आपत्ति है। टीम अन्ना के एक सदस्य ने कहा कि रामदेव खुद को ही सबसे महत्वपूर्ण दिखाना चाहते हैं। टीम अन्ना में कुछ लोगों को रामदेव को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल करने पर भी आपत्ति है। इनका कहना है कि रामदेव पर पतंजलि योग पीठ समेत कई संस्थानों को लेकर कई आरोप लगे हैं। इसलिए ऐसा करना सही नहीं होगा।
केवल बाबा को लेकर ही नहीं, टीम में अन्य कई कारणों से अंदर भी अंतर्विरोध है। इसी के चलते ताजा घटनाक्रम में मुफ्ती शमीम काजमी को जासूसी करने के आरोप में टीम से निकाल दिया गया। काजमी ने टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल पर मुंबई का अनशन नाकाम करने सहित मनमानी करने के आरोप लगाए। बकौल काजमी टीम अन्ना के कुछ सदस्य हिमाचल प्रदेश से चुनाव लडऩा चाहते हैं, जिस कारण टीम में मतभेद है। काजमी ने यह भी कहा कि टीम अन्ना मुसलमानों के साथ भेदभाव करती है। शमीम काजमी ने कहा कि अन्ना हजारे का भी इस टीम के साथ अब दम घुट रहा है और वो भी बहुत जल्द ही इससे अलग हो जाएंगे।

कुल मिला कर एक ओर टीम अन्ना को घाट-घाट के पानी पिये हुओं में तालमेल बैठाना है तो दूसरी ओर बाबा रामदेव के साथ तालमेल बनाए रखना है, जो कि आसान काम नहीं है। एक बड़ी कठिनाई ये है कि बाबा के साथ हिंदूवादी ताकतें हैं, जब कि अन्ना के साथ वामपंथी विचारधारा के लोग ज्यादा हैं। इनके बीच का गठजोड़ कितना चलेगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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टीम अन्ना की चौकड़ी ने अन्ना को फिर किया हाइजैक, राजू ने ब्लॉग पर डाले अन्ना के नोट टीम अन्ना की चौकड़ी ने अन्ना को फिर किया हाइजैक, राजू ने ब्लॉग पर डाले अन्ना के नोट(0)

ये एक ऐसा ब्लॉग है जो सिर्फ मराठी जानने वाले छठी पास सोशल वर्कर किशन बाबूराव हज़ारे अर्फ अन्ना चलाते हैं। लेकिन ब्लॉग अंग्रेजी में है। दरअसल http://annahazaresays.wordpress.com/ नाम से चल रहा ब्लॉग, जो अन्ना की बोली के तौर पर जाना जाता है, राजू पारुलकर नाम के एक पत्रकार चलाते हैं। उन्होंने अन्ना और उनकी टीम का कई विवादास्पद मुद्दों पर बचाव भी किया है। मौन व्रत में भी अन्ना राजू को लिख कर पत्र देते थे और वे उसका अनुवाद तथा ट्रांस्क्रिप्शन ब्लॉग पर लगाते थे। लेकिन अब यह ताना-बाना बिखर गया है।

ऐसा अचानक नहीं हुआ है। दरअसल राजू ने टीम के चार ख़ास सदस्यों की विश्वसनीयता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। राजू के मुताबिक अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण और मनीष सिसोदिया फासीवादी हैं। इतना ही नहीं इस ब्लॉगर ने इन सभी का पर्दाफाश करने की भी धमकी दी है।

राजू ने आरोप लगाया है कि टीम अन्ना के इन चारों सदस्यों ने उनके साथ अभद्रता की है। राजू का कहना है कि इन चारों सदस्यों ने अन्ना पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर रखा है और उन्हें हर तरह से अपनी तरफ करने में लगे रहते हैं।

राजू ने कहा है कि अन्ना नई कोर टीम चाहते थे। राजू के मुताबिक अन्ना ने यह बात मौन व्रत के दौरान लिखकर कही थी। राजू पारुलकर का कहना है कि टीम अन्ना के लोगों ने किस तरह अन्ना को बरगलाया इसके सबूत उनके पास हैं। राजू ने कहा कि वह सभी आरोपों के पक्ष में सबूतों के लेकर जल्दी ही जनता के सामने आएंगे।

 गौरतलब है कि अन्ना ने हाल ही में राजू को पहचानने से भी मना कर दिया था। राजू ने जवाब में अन्ना के वे नोट अपने ब्लॉग पर डाल दिए हैं जो अन्ना ने लिखे थे।

 

 

 

 

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न पैसे का हिसाब, न कांग्रेस का विरोध, न साथियों की बकबक पर झकझक: बस मौनव्रत न पैसे का हिसाब, न कांग्रेस का विरोध, न साथियों की बकबक पर झकझक: बस मौनव्रत(1)

करीब हफ्ते भर से अपने सहयोगियों पर हो रहे हमलों के बीच गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने शनिवार को मौनव्रत पर जाने का ऐलान कर दिया। अन्ना की इस अचानक  की गई घोषणा ने सबको सकते में डाल दिया। अन्ना ने कहा था कि सरकार मौन की भाषा ही समझती है, इसलिए वह खामोशी धारण करने जा रहे हैं। लेकिन, समझा जा रहा है कि इस मौनव्रत का उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

अन्ना के अनुसार वे अनिश्चितकालीन मौनव्रत पर जा रहे हैं। इस दौरान वह रालेगण सिद्धि के पद्मावती देवी मंदिर परिसर स्थित एक विशाल वटवृक्ष की लटकती जटाओं की बीच बनी विशेष कुटिया में बैठेंगे। मौनव्रत के दौरान वह अपने गांव से बाहर नहीं जाएंगे। अर्थात, पूर्व घोषित उनके सारे दौरे रद्द हो जाएंगे। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब अन्‍ना हजारे ने मौन व्रत रखा हो लेकिन कई चुनावी राज्यों के दौरों की घोषणा के बाद अब मौन व्रत का फैसले का मतलब बता पाना मुश्किल है। अधिकतर आलोचकों का मानना है कि कांग्रेस ने अन्ना को किसी तरह विरोधी प्रचार न करने के लिए ‘मना’ लिया है।

अपने तेरह दिनों के विशाल अनशन से सरकार को झुका देने का दावा करने वाले अन्ना के मौन से सरकार के साथ- साथ उनकी टीम के लोगों में भी खलबली मच गई है। चारों तरफ चर्चाओं का बाजार गर्म है कि आखिर ये मौन किसलिए साधा गया है। अन्ना को करीब से जानने वालों का कहना है कि सहयोगियों के बड़बोलेपन से तंग आकर उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है। गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से अन्ना के कई सहयोगी गलत वजहों से चर्चा में रहे।

हालांकि अन्ना ने मौन रखने को स्वास्थ्य लाभ से जोड़ा है, लेकिन तथ्यों पर ध्यान दें तो इसके पीछे और भी कई कारण नजर आते हैं। आपको बताते चलें कि कुछ दिन पहले रालेगण सिद्धि में ही अन्ना के निकट सहयोगी सुरेश पठारे के दु‌र्व्यवहार के चलते बाहर से आए लोगों के साथ उनकी मारपीट हुई। कश्मीर पर विवादास्पद बयान देने के कारण प्रशांत भूषण की दिल्ली में पिटाई कर दी गई। इसके बाद संतोष हेगड़ ने टीम के ही साथी अरविंद केजरीवाल पर ज्यादा बोलने को लेकर टिप्पणी की। इस सबसे अन्ना खिन्न नजर आ रहे हैं।

पिछले कई दिनों से सिविल सोसाइटी के लोगों पर हिसाब किताब देने का दबाव भी बढ़ रहा है। बताया जा रहा है कि चंदे के रूप में आधिकारिक तौर पर मिले चंदे का भी पूरा हसाब नहीं मिल पाया है और कर्ता-धर्ता इसे सार्वजनिक करने के लिए समय मांग रहे हैं। माना जा रहा है कि इस मौनव्रत से अन्ना अपने सहयोगियों को संदेश देंगे। साथ ही मीडिया द्वारा सहयोगियों के बारे में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने से भी बच सकेंगे।

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कौन सठियाया? 85 साल के ‘बाल’ और 74 साल के ‘बड़े भाई’ में छिड़ी नूराकुश्ती कौन सठियाया? 85 साल के ‘बाल’ और 74 साल के ‘बड़े भाई’ में छिड़ी नूराकुश्ती(3)

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में दो ‘मराठा योद्धाओं’ को अब एक नया हथियार मिल गया है- उम्र का हथियार। एक योद्धा दूसरे को सठिया गया साबित करने में जुटा है तो दूसरा पहले को बचपना न करने की चेतावनी दे रहा है। दिलचस्प बात ये है कि दोनों की उम्र सत्तर से उपर है। 85 साल के ‘सठियाए’ राजनेता खुद को ‘बाल’ यानि बच्चा कहलाना पसंद करते हैं तो उनसे ग्यारह साल छोटे और ‘बचपना’ करने वाले 74 की उम्र में ही सबके ‘बड़े भाई’ यानि ‘अन्ना’ होने का दावा करते है। दोनों के समर्थकों को यह समझ में नहीं आ रहा कि किसे क्या मानें।

शिवसेना प्रमुख ने आंदोलन की प्रकृति को खोखला करार देते हुए कहा, ”इस तरह भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता। ऐसे बिछाया हुआ तुम्हारा जाल फट जाएगा और बड़ी मछलियां निकल जाएंगी।”

इसके जवाब में तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अन्ना ने शुक्रवार को कहा कि उम्र के कारण शिवसेना प्रमुख की बुद्धि में फर्क आ गया है। बढ़ती उम्र के कारण वे बेकार की बड़बड़ कर रहे हैं।

अब ताजा बयान में शिवसेना ने कहा है, ”अन्ना ने जो कहा हम उसका उपयुक्त जवाब दे सकते हैं, क्योंकि हम गांधीवादी नहीं हैं।” बाल ठाकरे की तरफ से शिवसेना सांसद संजय राउत ने बयान जारी किया जिसमें कहा गया है, ”चूंकि आपने मेरी बढ़ती उम्र का जिक्र किया, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप मुझसे छोटे हैं और यह बचपना आपको शोभा नहीं देता।” ठाकरे ने हजारे को चेतावनी देते हुए कहा, ”हमसे अनावश्यक झगड़ा मत लीजिए।”

अन्ना हजारे पर निशाना साधते हुए ठाकरे ने कहा था कि गांधीवादी समाजिक कार्यकर्ता का अनशन फाइव स्टार कार्यक्रम के समान था। उन्होंने कहा था कि यह एक फाइव स्टार उपवास था भ्रष्टाचार के मुददे को हंसी-मजाक का विषय मत बनाइए।
बाल ठाकरे ने नई दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन स्थल पर 35000 लोगों के लिए भोजन सहित भारी इंतजामों का भी हवाला दिया था।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हजारे ने रालेगण सिद्धी में संवाददाताओं से कहा कि उन्हें जो सही लगता है वह कहें। हमें जो सही लगता है वह हम करेंगे। हजारे ने कहा कि अपमान सहन करने की शक्ति होनी चाहिए। इससे पहले शिवसेना ने हजारे के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था और ठाकरे के पोते आदित्य ने अनशन के दौरान हजारे से मुलाकात भी की थी।

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काले धन पर बाबा रामदेव की सिफारिशें नहीं मानेगी सरकार, अन्ना ने कहा कोई बात नहीं से आगे..

-सतीश चंद्र मिश्रा।।

मीडिया में जिस अग्निवेश की बदनीयती और बेईमानी के बेनकाब होने के बाद उसको अन्ना हजारे ने अपने से अलग किया है उस भगवाधारी के पाखंड की करतूतों का काला चिटठा दशकों पुराना है. लेकिन इसके बावजूद वह अन्ना हजारे की टीम का अत्यंत महत्वपूर्ण सदस्य बना हुआ रहा. प्रशांत भूषण-शांति भूषण के ” सदाचार ” के किस्से दिल्ली पुलिस को CFSL से मिली CD की जांच रिपोर्ट तथा इलाहाबाद के राजस्व विभाग एवं नोएडा भूमि आबंटन के सरकारी दस्तावेजों में केवल दर्ज ही नहीं हैं बल्कि सारे देश के सामने उजागर भी हो चुके हैं. अपनी नौकरी से इस्तीफे तथा खुद पर बकाया सरकारी देनदारी के विषय में लगातर 4 दिनों तक झूठे दावे करने के पश्चात स्वयम द्वारा 4 वर्ष पूर्व विभाग को लिखी गयी एक चिट्ठी में अपने दोषी होने की बात स्वीकारने की सच्चाई एक समाचार पत्र के माध्यम से उजागर होने के पश्चात अरविन्द केजरीवाल को वह सच भी स्वीकरना पडा जो खुद केजरीवाल द्वारा लगातार बोले गए झूठ को तार-तार कर बेनकाब कर रहा था.

सबसे गंभीर प्रश्न तो यह है कि जो अन्ना हजारे महीनों तक साथ घूमने के पश्चात् अपने इर्द-गिर्द पूरी तरह पाक-साफ़ पांच ईमानदार लोगों को एकत्र नहीं कर सके वो अन्ना हजारे किस जादू की कौन सी छड़ी से पूरे देश में हजारों ईमानदार “नेताओं” की फौज खडी कर देंगे…? चुनावी मैदान में उतरे व्यक्तियों में से किसी को भी बेईमान और किसी को भी ईमानदार घोषित करने का अधिकार केवल अन्ना हजारे के पास क्यों और किस अधिकार के तहत होगा…?  चुनावी मैदान में उतरे व्यक्तियों में से किसी को भी बेईमान और किसी को भी ईमानदार घोषित करने का उनका आधार,उनका मापदंड क्या होगा…?  उनके ऐसे निर्णयों का स्त्रोत क्या और कितना विश्वसनीय होगा…? ऐसा करते समय क्या अन्ना हजारे और टीम अन्ना के सदस्य  स्वयं पर उठी उँगलियों और लगने वाले आरोपों का भी तार्किक तथ्यात्मक स्पष्टीकरण सत्यनिष्ठा के साथ देने की ईमानदारी दिखायेंगे या फिर इन दिनों की भांति केवल यह कहकर पल्ला झाडेंगे कि हमको परेशान करने के लिए ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं इसलिए हम इन सवालों का जवाब नहीं देंगे.

अन्ना हजारे ने 13 सितम्बर को ही टाइम्स नाऊ न्यूज़ चैनल के साथ हुई अपनी बातचीत के दौरान बाबा रामदेव से कोई सम्पर्क सम्बन्ध नहीं रखने, उनका कोई सहयोग-समर्थन नहीं करने का ऐलान भी किया, इसी के साथ लाल कृष्ण अडवाणी द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा निकाले जाने की घोषणा को मात्र एक शिगूफा कहकर अन्ना हजारे ने उसका जबर्दस्त विरोध भी किया. आखिर कौन है ये अन्ना हजारे जो कभी ग्राम प्रधान का चुनाव लड़कर जनता की अदालत का सीधा सामना करने का साहस तो नहीं जुटा सका लेकिन देश में कोई भी व्यक्ति या कोई भी दल या कोई भी संगठन किसी मुद्दे पर क्या करे.? क्या ना करे.? इसका फैसला एक तानाशाह की भांति सुनाने की जल्लादी जिद्द निरंकुश होकर कर रहा है.

लाल कृष्ण अडवाणी या किसी भी अन्य राजनेता या राजनीतिक दल द्वारा केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध में किये जाने वाले धरना, प्रदर्शनों, आन्दोलनों एवं आयोजनों का विरोध कर उनके खिलाफ ज़हर उगल कर अन्ना हजारे और टीम अन्ना ने केंद्र सरकार के रक्षा कवच की भूमिका में उतरने का सशक्त सन्देश-संकेत दिया है. अन्ना गुट की यह करतूत केवल और केवल इस देश की राजनीतिक प्रक्रिया-परम्परा को बंधक बनाकर उसकी मूल आत्मा को रौंदने-कुचलने का कुटिल षड्यंत्र मात्र तो है ही साथ ही साथ वर्तमान सत्ताधारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज़ का गला घोंटने का अत्यंत घृणित षड्यंत्र भी है.

स्वयम अन्ना के नेतृत्व वाली टीम अन्ना द्वारा लोकपाल बिल की स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य सांसदों के घर के बाहर धरना देकर उनपर निर्णायक दबाव बनाने की घोषणा भी इसी षड्यंत्र के अंतर्गत रची गयी कुटिल रणनीति का ही एक अंग है. क्योंकि इसी देश में 1.76 लाख करोड़ की 2G घोटाला लूट में प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्तमंत्री चिदम्बरम की संलिप्तता साक्ष्यों के साथ प्रमाणित करने वाली पीएसी की रिपोर्ट को नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर कूड़े की टोकरी में फिंकवा चुके उसी पीएसी के सदस्य रहे कांग्रेस तथा उसके सहयोगी सत्तारूढ़ दलों के 11 संप्रग सांसदों के खिलाफ अन्ना हजारे और टीम अन्ना ने इसी तरह दबाव बनाना तो दूर उनके खिलाफ आजतक एक शब्द भी क्यों नहीं बोला…?

क्या 2G घोटाले के द्वारा की गयी 1.76 लाख करोड़ की सनसनीखेज सरकारी लूट अन्ना हजारे की “भ्रष्टाचार की परिभाषा” में नहीं आती है…? यदि ऐसा है तो अन्ना हजारे इस देश को बताएं कि 1.76 लाख करोड़ की सरकारी राशि की सनसनीखेज लूट को वो भ्रष्टाचार क्यों नहीं मानते हैं.?  और यदि मानते हैं तो उस भ्रष्टाचार का भांडा फोड़ने वाली पीएसी की रिपोर्ट की धजियाँ उड़ाने वाले सांसदों पर दबाव बनाने, उनको धिक्कारने से मुंह क्यों चुरा रहे हैं.? क्या अन्ना हजारे और टीम अन्ना के स्वघोषित दिग्गज ऐसे किसी धरने/मुहिम और उसके जिक्र से भी इसलिए मुंह चुरा रहे हैं , क्योंकि ऐसे किसी धरने/मुहिम का निशाना केवल सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके सहयोगी दल ही बनेंगे तथा मनमोहन सिंह और चिदम्बरम को “तिहाड़” में ए राजा, कनिमोझी, के पड़ोस में भी रहना पड़ सकता है.? जबकि मनमोहन को तो स्वयं अन्ना हजारे आज भी सीधा-सच्चा-ईमानदार मानते हैं…!

ज्ञात रहे कि 1.76 लाख करोड़ के 2G घोटाले, 70 हज़ार करोड़ के CWG घोटाले या KG बेसिन घोटाले में रिलायंस के साथ मिलकर की जाने वाली लगभग 30 हज़ार करोड़ की सनसनीखेज लूट तथा बाबा रामदेव द्वारा उठाये जा रहे 400 लाख करोड़ के कालेधन की वापसी सरीखे सर्वाधिक सवेंदनशील मुद्दों पर अन्ना हजारे और टीम अन्ना के अन्य सेनापति गांधी के तीन बंदरों की भांति अपने आँख कान मुंह बंद किये हैं, तथा अपनी चुप्पी और उपेक्षा कर इन मुद्दों पर देश का ध्यान भी केन्द्रित ना होने देने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं. अपनी इस कुटिल रणनीति के पक्ष में अन्ना हजारे और उनकी टीम यह कह रही है कि अभी हमारा ध्यान केवल जनलोकपाल पर केन्द्रित है. अन्ना हजारे और उनकी टीम के दिग्गजों का यह कुतर्क क्या पुलिस के उस भ्रष्ट और बेशर्म सिपाही की याद नहीं दिलाता जो अपनी आँखों के सामने हो रही लूट या क़त्ल की घटना को अनदेखा कर उपेक्षा के साथ यह कहते हुए आगे बढ़ जाता है कि ये घटना मेरे थाना क्षेत्र में नहीं घटित हुई है.

अतः पाठक स्वयं निर्णय करें कि स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य सांसदों के घर के बाहर धरना देकर सस्ती लोकप्रियता वाहवाही लूटने को आतुर खुद अन्ना हजारे तथा उनकी फौज के सेनापति भ्रष्टाचार के हमाम में देश के सामने पूरी तरह नंगे हो चुके पीएसी के उन 11 सदस्य सांसदों की करतूत के जिक्र से भी क्यों मुंह चुरा रहे है…?
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-सतीश चंद्र मिश्रा।।

केंद्र सरकार ने रामदेव को मनाने के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष की अगुआई में जो उच्चस्तरीय समिति गठित की थी उसने  23 सितम्बर को हुई अपनी बैठक में स्पष्ट कर दिया कि समिति योग गुरु के एक भी प्रमुख सुझाव पर अमल करने नहीं जा रही है। बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित नहीं किया जा सकता तथा समिति काले धन की समस्या से निपटने के लिए कोई नया कानून बनाने के भी खिलाफ है. आश्चर्यजनक रूप से अन्ना हजारे और टीम अन्ना ने इस समाचार पर गांधी जी के तीन बंदरों की तरह का रुख अपनाया। इस से पूर्व बीते 21 सितम्बर को प्रधान मंत्री को लिखे गए अपने पत्र में अन्ना हजारे ने लोकपाल पर सरकार के आश्वासन की तारीफ करते हुए लिखा था, ”भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में यह एक अच्छी पहल है।”

पहले इंदिरा फिर राजीव और अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की प्रशंसा, विशेषकर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के संदर्भ में, अन्ना द्वारा दिए जा रहे राजनीतिक संकेतों-संदेशों का चमकता हुआ दर्पण है. अन्ना हजारे इस से पूर्व अडवाणी की रथयात्रा, मोदी के अनशन तथा भाजपा की मंशा पर तल्ख़ तेवरों के साथ अपने तीखे प्रश्नों के जोरदार हमले कर चुके हैं.

12 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से नरेन्द्र मोदी विरोधियों के मुंह पर पड़े जोरदार थप्पड़ के तत्काल पश्चात् 13 सितम्बर को अन्ना हजारे की सक्रियता अचानक ही गतिमान  हो गयी थी. IBN7 के राजदीप सरदेसाई के साथ बातचीत में अन्ना हजारे ने स्पष्ट किया था कि कांग्रेस यदि भ्रष्टाचार में ग्रेजुएट है तो भाजपा ने पी.एच.डी. कर रखी है. अन्ना का यह निशाना 2014 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर साधा गया था. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय के पश्चात् 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के भाजपा के प्रत्याशी के रूप में नरेन्द्र मोदी के उभरने की प्रबल संभावनाओं को बल मिला था. अतः अन्ना हजारे को ऎसी किसी भी सम्भावना पर प्रहार तो करना ही था.

अन्ना का यह कुटिल राजनीतिक प्रयास इतने पर ही नहीं थमा था. उसी बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि वह किसी गैर कांग्रेसी-गैर भाजपा दल का समर्थन करेंगे. बातचीत में अन्ना ने मनमोहन सिंह को सीधा-साधा ईमानदार व्यक्ति बताया तथा ये भी कहा कि देश को आज इंदिरा गाँधी सरीखी “गरीब-नवाज़” नेता की आवश्यकता है. ज़रा इसके निहितार्थ समझिए एवं गंभीरता से विचार करिए कि अन्ना हजारे को यह कहते समय क्यों और कैसे यह याद नहीं रहा कि इंदिरा गाँधी ने ही दशकों पहले भ्रष्टाचार को वैश्विक चलन बताते हुए इसको कोई मुद्दा मानने से ही इनकार कर दिया था तथा भ्रष्टाचार का वह निकृष्ट इतिहास रचा था जिसकी पतित पराकाष्ठा “आपातकाल” के रूप में फलीभूत हुई थी.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी घोषित किया था. लेकिन अन्ना हजारे का शायद ऎसी कटु सच्चाइयों वाले कलंकित इतिहास से कोई लेनादेना नहीं है. हजारे की ऐसी घोषणाओं का सीधा अर्थ यह है कि उनके नेतृत्व में टीम अन्ना केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस गठबंधन सरकार के विरोधी मतों को देश भर में तितर-बितर कर उनकी बन्दरबांट करवाने के लिए कमर कस रही है. उसकी यह रणनीति मुख्य विपक्षी दल भाजपा को हाशिये पर पहुँचाने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करेगी. टीम अन्ना ऐसा करके किसकी राह आसान करेगी यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है. आश्चर्यजनक एवं हास्यस्पद तथ्य यह है कि यही अन्ना और उनकी टीम कुछ दिनों पहले तक देश की जनता की चुनावी अदालत का सामना करने से मुंह चुराती नज़र आ रही थी. इसके लिए यह लोग भांति-भांति के फूहड़ तर्क दे रहे थे.

यहाँ तक कि देश के मतदाताओं पर एक शराब की बोतल और कुछ रुपयों में बिक जाने का घृणित आरोप सार्वजनिक रूप से निहायत निर्लज्जता के साथ लगा रहे थे. अतः केवल कुछ दिनों में ही देश में ऐसा कौन सा महान राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन हुआ देख लिया है इस अन्ना गुट ने? जो अन्ना खुद के चुनाव लड़ने पर देश के मतदाता को केवल  एक शराब की बोतल और कुछ रुपयों में बिक जाने वाला बता उसे लांक्षित-अपमानित करने का दुष्कृत्य कर अपनी जमानत तक गंवा देने की बात कर रहे थे वही अन्ना हजारे अब पूरे देश में केवल अपने सन्देश के द्वारा ईमानदार नेताओं की एक पूरी फौज तैयार कर देने का दम्भी दावा जोर-शोर से कर रहे हैं. खुद अन्ना के अनुसार जो मतदाता पिछले 64 सालों से केवल एक शराब की बोतल और कुछ रुपयों में बिकता चला आ रहा था, उसमें अचानक अनायास ऐसा हिमालयी परिवर्तन हजारे या उनकी टीम को किस आधार पर होता दिखा है ?

आगे पढ़ें.. जब अपने मंच पर चार-पांच ईमानदार नहीं जमा कर पाए अन्ना तो भ्रष्टाचार से क्या खाक लड़ेंगे?

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जिस तरह मीडिया ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अनशन को दिखाया, उससे बहुत लोगों को अपनी पहले की सोच पर या तो शक हुआ होगा, या ऐसा भी लगा होगा कि मीडिया ने सच बताया। आमतौर पर साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, लेकिन इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि वह जो सोचता है, वही समाज सोचे। चूंकि भ्रष्टाचार एवं महंगाई का मुद्दा इतना ज्वलंत हो उठा था कि लोग इस आंदोलन से जुड़ते गए। वरना नवंबर 2010 में जब अन्ना हजारे ने इसी मुद्दे पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया, तो मुश्किल से 100 लोग इकट्ठा हुए थे।

इस आंदोलन को मिले अपार समर्थन के पीछे सबसे बड़ी भूमिका मीडिया की थी। मीडिया ने पहली बार इस तरह संघर्ष किया। टीवी चैनल ने स्कूलों, गली-मुहल्लों, चौराहों और कार्यालय तक पहुंचकर लोगों से इसके बारे में बात की। जब हजारों लोगों के बयान एवं चेहरे चैनलों पर दिखे, तो वे स्वयं को इससे जुड़ा महसूस करने लगे। क्योंकि शोहरत इनसान की कमजोरी होती है।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अभियान चला रखा है कि संविधान में सैंकड़ों पेच हैं, अत: इसे बदलना चाहिए। दबी जुबान से मध्यवर्ग के कुछ सवर्ण सोचते एवं कहते भी हैं कि देश को ठीक करने के लिए संविधान को बदलना चाहिए, जबकि बदलना उन्हीं को चाहिए। अमेरिका का संविधान 200 वर्षों से ज्यादा पुराना है और उसमें संशोधन भी बहुत कम हुए हैं, फिर भी वहां की राजनीतिक व्यवस्था कितनी मजबूत है। दरअसल लोगों की नीयत अगर ठीक नहीं हो, तो संविधान बदलने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इस आंदोलन में नौजवानों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। यदि यही नौजवान, जब 2008 में महंगाई एवं भ्रष्टाचार बढ़ने लगे थे, उठ खड़े होते, तो आज यह दिन देखने को न मिलता।

भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में असत्य बोलना या सत्य को न दिखाना या एक पक्ष को बढ़ा-चढ़ाकर बताना या दिखाना और दूसरे पक्ष को पूरी तरह से नजरंदाज करना, क्या भ्रष्टाचार नहीं है? कुछ चैनल जोर-जोर से कह रहे थे कि पूरा देश अन्ना हजारे के साथ है। अगर ऐसी बात है, तो भला अनशन करने की जरूरत ही क्या थी? चुनाव लड़कर अपनी संसद बनाते और उसमें जन लोकपाल बिल आसानी से पास हो जाता। अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों ने अखिल भारतीय परिसंघ एवं अन्य संगठनों के माध्यम से 24 अगस्त को इंडिया गेट पर एक रैली का आयोजन कर पूछा कि क्या इस देश में दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक नहीं रहते? अगर रहते हैं, तो अन्ना हजारे की टीम में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व कहां है? अन्ना हजारे के आंदोलन की रीढ़ मध्यवर्ग है, जो स्वयं कुछ करता नहीं और मतदान करने भी बहुत कम जाता है। 24 अगस्त की रैली को टीवी मीडिया ने पूरी तरह से नजरंदाज किया, क्या यह सच को छुपाना नहीं है? अगर इस प्रवृत्ति से नहीं बचा गया, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए आंदोलन को ही नुकसान पहुंचेगा। जयप्रकाश का आंदोलन इसलिए सफल था, क्योंकि उसकी रीढ़ में नौजवान और पिछड़ा वर्ग ही था।

पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की सिविल सोसाइटी ने प्रधानमंत्री और संसद की स्थायी समिति को बहुजन लोकपाल बिल का मसौदा सौंपा है, जिसमें उन तथ्यों और मांगों को भी रखा गया है, जो अन्ना टीम के बिल में शामिल नहीं हैं। यह भी सवाल खड़ा किया गया कि क्या लोकपाल भ्रष्ट नहीं हो सकता? लोकपाल और कमेटी में किन-किन वर्गों के लोग होंगे-यह न तो सरकारी बिल में और न ही जन लोकपाल बिल में है। इसलिए नौकरियों में दलितों- पिछड़ों के आरक्षण की तरह लोकपाल समिति में भी उनके प्रतिनिधित्व की मांग बहुजन लोकपाल बिल में की गई है।

सामाजिक क्रांति के बिना राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार मिटाने की बात बेमानी होगी। जाति व्यवस्था भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है। इस पर चोट किए बिना भ्रष्टाचार से निजात संभव नहीं है। समाज को दिशा देनेवाली मीडिया अगर वह कुछ लोगों को समाज मानकर उससे प्रभावित होने लगे, तो इसे सही नहीं कहा जा सकता।

लेखक इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष हैं।

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-एस. शंकर।।

 

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी ने अन्ना के आंदोलन को इस्लाम विरोधी  बताया, क्योंकि इसमें वंदे मातरम और भारत माता की जय जैसे नारे लग रहे थे।  उन्होंने मुसलमानों को अन्ना के आंदोलन से दूर रहने को कहा। ऐसी बात वह  पहले दौर में भी कह चुके हैं, जिसके बाद अन्ना ने अपने मंच से भारत माता  वाला चित्र हटा दिया था। दूसरी बार इस बयान के बाद अन्ना के सहयोगी अरविंद  केजरीवाल और किरण बेदी बुखारी से मिल कर उन्हें स्पष्टीकरण देने गए। इन  प्रयत्नों में ठीक वही गलती है जो गांधीजी ने बार-बार करते हुए देश को  विभाजन तक पहुंचा दिया। जब मुस्लिम जनता समेत पूरा देश स्वत: अन्ना को  समर्थन दे रहा है तब एक कट्टर इस्लामी नेता को संतुष्ट करने के लिए उससे  मिलने जाना नि:संदेह एक गलत कदम था।

अन्ना का आंदोलन अभी लंबा चलने वाला  है। यदि इस्लामी आपत्तियों पर यही रुख रहा तो आगे क्या होगा, इसका अनुमान  कठिन नहीं। बुखारी कई मांगें रखेंगे, जिन्हें कमोबेश मानने का प्रयत्न किया  जाएगा। इससे बुखारी साहब का महत्व बढ़ेगा, फिर वह कुछ और चाहेंगे।  बाबासाहब अंबेडकर ने बिलकुल सटीक कहा था कि मुस्लिम नेताओं की मांगें  हनुमान जी की पूंछ की तरह बढ़ती जाती हैं। अन्ना, बेदी और केजरीवाल या तो  उस त्रासद इतिहास से अनभिज्ञ हैं या अपनी लोकप्रियता और भलमनसाहत पर उन्हें  अतिवादी विश्वास है, किंतु यह एक घातक मृग-मरीचिका है।

बुखारी का पूरा  बयान ध्यान से देखें। वह अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने के लिए और शतरें  के साथ-साथ आंदोलन में सांप्रदायिकता के सवाल को भी जोड़ने की मांग कर रहे  हैं। इसी से स्पष्ट है कि उन्हें भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे आंदोलन को  समर्थन देने की नहीं, बल्कि आंदोलन को इस्लामी बनाने, मोड़ने की फिक्र है।  यदि इतने खुले संकेत के बाद भी अन्ना और केजरीवाल गांधीजी वाली दुराशा में  चले जाएं तो खुदा खैर करे! जहां एक जिद्दी, कठोर, विजातीय किस्म की  राजनीति की बिसात बिछी है वहां ऐसे नेता ज्ञान-चर्चा करने जाते हैं। मानो  मौलाना को कोई गलतफहमी हो गई है, जो शुद्ध हृदय के समझाने से दूर हो जाएगी।

जहां गांधीजी जैसे सत्य-सेवा-निष्ठ सज्जन विफल हुए वहां फिर वही रास्ता  अपनाना दोहरी भयंकर भूल है। कहने का अर्थ यह नहीं कि मुस्लिम जनता की परवाह  नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह कि मुस्लिम जनता और उनके राजनीतिक नेताओं में  भेद करना जरूरी है। मुस्लिम जनता तो अपने आप में हिंदू जनता की तरह ही है।  अपने अनुभव और अवलोकन से आश्वस्त होकर वह भी अच्छे और सच्चाई भरे लोगों और  प्रयासों को समर्थन देती है। बशर्ते उसके नेता इसमें बाधा न डालें।

रामलीला  मैदान और देश भर में मुस्लिम भी अन्ना के पक्ष में बोलते रहे, किंतु  मुस्लिम नेता दूसरी चीज होते हैं। वे हर प्रसंग को इस्लामी तान पर खींचने  की जिद करते हैं और इसके लिए कोई दांव लगाने से नहीं चूकते। हालांकि  बहुतेरे जानकार इसे समझ कर भी कहते नहीं। उलटे दुराशा में खुशामद और  तुष्टीकरण के उसी मार्ग पर जा गिरते हैं जिस मार्ग पर सैकड़ों भले-सच्चे  नेता, समाजसेवी और रचनाकार राह भटक चुके हैं। इस्लामी नेता उन्हें समर्थन  के सपने दिखाते और राह से भटकाते हुए अंत में कहीं का नहीं छोड़ते। बुखारी  ने वही चारा डाला था और अन्ना की टीम ने कांटा पकड़ भी लिया।

आखिर अन्ना  टीम ने देश भर के मुस्लिम प्रतिनिधियों में ठीक बुखारी जैसे इस्लामवादी  राजनीतिक को महत्व देकर और क्या किया? वह भी तब जबकि मुस्लिम स्वत: उनके  आंदोलन को समर्थन दे ही रहे थे। एक बार बुखारी को महत्व देकर अब वे उनकी  क्रमिक मांगें सुनने, मानने से बच नहीं सकते, क्योंकि ऐसा करते ही  मुस्लिमों की उपेक्षा का आरोप उन पर लगाया जाएगा। बुखारी जैसे नेताओं की  मांगे दुनिया पर इस्लामी राज के पहले कभी खत्म नहीं हो सकतीं यही उनका  मूलभूत मतवाद है। दुनिया भर के इस्लामी नेताओं, बुद्धिजीवियों की सारी  बातें, शिकायतें, मांगें, दलीलें आदि इकट्ठी कर के कभी भी देख लें। मूल  मतवाद बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा।

रामलीला मैदान में वंदे मातरम के नारे लगने  के कारण बुखारी साहब भ्रष्टाचार विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन से नहीं जुड़ना  चाहते, यह कपटी दलील है। सच तो यह है कि सामान्य मुस्लिम भारत माता की जय  और वंदे मातरम सुनते हुए ही इसमें आ रहे थे। वे इसे सहजता से लेते हैं कि  हिंदुओं से भरे देश में किसी भी व्यापक आंदोलन की भाषा, प्रतीक और भाव-भूमि  हिंदू होगी ही जैसे किसी मुस्लिम देश में मुस्लिम प्रतीकों और ईसाई देश  में ईसाई प्रतीकों के सहारे व्यक्त होगी। लेकिन इसी से वह किसी अन्य  धर्मवलंबी के विरुद्ध नहीं हो जाती। यह स्वत: स्पष्ट बात रामलीला मैदान  जाने वाली मुस्लिम जनता समझ रही थी। तब क्या बुखारी नहीं समझ रहे थे? वह  बिलकुल समझ रहे थे, किंतु यदि न समझने की भंगिमा बनाने से उनकी राजनीति खरी  होती है, तो दांव लगाने में हर्ज क्या। तब उनकी इस राजनीति का उपाय क्या  है?

उपाय वही है जो स्वत: हो रहा था। राष्ट्रहित के काम में लगे रहना, बिना  किसी नेता की चिंता किए लगे रहना। यदि काम सही होगा तो हर वर्ग के लोग  स्वयं आएंगे। अलग से किसी को संतुष्ट करने के प्रयास का मतलब है, अनावश्यक  भटकाव।  1926 में श्रीअरविंद ने कहा था कि गांधीजी ने मुस्लिम नेताओं को जीतने की  अपनी चाह को एक झख बना कर बहुत बुरा किया। पिछले सौ साल के कटु अनुभव को  देख कर भी अन्ना की टीम को फिर वही भूल करने से बचना चाहिए। उन्हें सामान्य  मुस्लिम जनता के विवेक पर भरोसा करना चाहिए और उनकी ठेकेदारी करने वालों  को महत्व नहीं देना चाहिए। यदि वे देश-हित का काम अडिग होकर करते रहेंगे तो  इस्लामवादियों, मिशनरियों की आपत्तियां समय के साथ अपने आप बेपर्दा हो  जाएंगी।

 

(साभार-जागरण. लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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टीम अन्ना ने अपनी भ्रष्टाचार की मुहिम को जमीनी स्तर पर आजमाने की ठानी है। यही वजह है कि अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में जनता का रुख जानने की कोशिश की जाएगी। विस चुनाव से पहले अन्ना हजारे क्षेत्रों में जगह-जगह सभाएं कर योग्य, बेदाग और इमानदार उम्मीदवारों को जिताने की अपील करेंगे। इसकी तैयारी भी शुरू कर दी गई है। सब कुछ ठीक रहा, तो नवंबर में कार्यक्रम की पूरी रूप रेखा तैयार कर ली जाएगी।

 

महाराष्ट्र में अन्ना के गांव रालेगन सिद्धि मे टीम अन्ना के कोर कमेटि के सदस्यों के सामने सुलतानपुर जिले से आए संजय सिंह ने इस संदर्भ में एक प्रस्ताव पेश किया, जो सबकी राय से पास हो गया। अन्ना के प्रचार अभियान में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि इसमें किसी विशेष पार्टी का नाम नहीं आने पाए। मुहिम के दौरान जनलोकपाल बिल का विरोध करने वालों की पोल-पट्टी भी खोली जाएगी। खासकर ऐसे नेता निशाने पर होंगे, जो जनलोकपाल बिल का खुलकर विरोध कर रहे थे।

 

टीम अन्ना को भी पता है कि किसी भी मुहिम या फिर आंदोलन की सफलता की कसौटी मतदान होता है। आंदोलन के दौरान जुटने वाली भीड़ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी असर दिखाएगी। ये आजमाने के लिए सबसे नजदीक उत्तर प्रदेश का विस चुनाव है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले विशेषकों का हालांकि इसमें संदेह है कि अन्ना की मुहिम कोई रंग ला पाएगी। क्योंकि आंदोलन का असर शहरों में दिखा, लेकिन गांव में रहने वाली 80 प्रतिशत आबादी को टीम अन्ना के आंदोलन का कुछ अता-पता ही नहीं लग पाया।

 

यह भी एक सच्चाई है कि जब तक अन्ना का आंदोलन न्यूज चैनलों ने कवर किया, तब तक जनता भी साथ रही, लेकिन टीम अन्ना की भूख हड़ताल खत्म होते ही न तो शहरों में मोमबत्ती रैली निकल रही है और न ही नारे। कहने का मतलब जनमानस जोश में था या अखबारों और टीवी चैनलों में दिखनी की चाह, लेकिन अब वह गायब है।

जिस प्रदेश में सामानिक न्याय की लड़ाई और जातीय आधार पर मतदान की परंपरा सी रही हो, वहां अन्ना का कामयाब होना संदेह को जन्म देता है। संजय सिंह ने स्वीकार किया कि अगर जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम नहीं किया जाएगा, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बना माहौल ठंडा पड़ सकता है।

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अरविंद केजरीवाल के बयान पर बरसीं अरुणा रॉय, कहा, ”मैंने नहीं किया बातचीत से इंकार” अरविंद केजरीवाल के बयान पर बरसीं अरुणा रॉय, कहा, ”मैंने नहीं किया बातचीत से इंकार”(0)

लोकपाल विधेयक को लेकर टीम अन्ना और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य अरुणा रॉय के बीच एक नया विवाद छिड़ गया है। अरुणा रॉय ने अन्ना के प्रमुख पैरोकार अरविंद केजरीवाल के उस बयान पर आपत्ति जताई है जिसमें उन्होंने कहा था कि अरुणा की टीम बातचीत नहीं करना चाहती।

अरुणा रॉय ने रालेगण सिद्धी में केजरीवाल द्वारा दिये गये बयानों पर आपत्ति जताते हुए कहा, ”मैंने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि टीम अन्ना ने इस मुद्दे पर हमारे (एनसीपीआरआई) के साथ कोई विचार-विमर्श नहीं किया। दरअसल एनसीपीआरआई ने बातचीत में शामिल होने से कभी इनकार नहीं किया। केजरीवाल ने खुद कहा है कि तीन दौर में बातचीत हुई है इसलिए यह आरोप गलत है कि हमने बातचीत में शामिल होने से इनकार कर दिया था।”

अरुणा ने 11 सितंबर को अखबारों में आये इस बयान पर भी गहरी आपत्ति जताई है, जिसमें केजरीवाल के हवाले से कहा गया है, ”जब हम अरुणा से मिलने वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर के घर गये तो उन्होंने हमें दरवाजे से यह कहकर लौटा दिया कि वह मुझसे बातचीत नहीं करना चाहतीं।” उन्होंने एनसीपीआरआई के अपने सहयोगी निखिल डे के साथ रविवार को जारी संयुक्त बयान में कहा कि नैय्यर ने उन्हें निजी मुलाकात के लिए आमंत्रित किया था, जहां उन्होंने न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर, मेधा पाटकर और संभवत: प्रशांत भूषण को भी बुलाने की बात कही। जब हमें पता चला कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) से भी कुछ लोग आ रहे हैं तो हमने नैय्यर के सामने स्पष्ट कर दिया कि इस मुलाकात में लोकपाल पर चर्चा नहीं होगी क्योंकि यह मित्रवत बैठक है।

अरुणा ने यह भी कहा कि लोकपाल के मुद्दे पर आईएसी तथा एनसीपीआरआई के बीच बातचीत अलग से हुई और किसी भी समय उनके संगठन ने यह नहीं कहा कि वह केजरीवाल से मुलाकात नहीं करेगी। गौरतलब है कि अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धी में 10-11 सितंबर को अन्ना पक्ष की कोर समिति की बैठक के बाद केजरीवाल ने कहा था कि उन्होंने अरुणा राय और उनकी टीम के साथ कई दौर की बातचीत की है। इससे पहले खबरों में अरुणा का यह बयान आया था कि टीम अन्ना उनके साथ चर्चा करने की इच्छुक नहीं है।

केजरीवाल ने दावा किया था कि अरुणा की टीम ने कानून का कोई मसौदा तैयार नहीं किया है बल्कि सिर्फ प्रस्ताव हैं।  उन्होंने कहा कि हम बातचीत के लिए तैयार हैं। हम अरुणा राय और उनकी टीम को सार्वजनिक चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। इससे पहले देश में हजारे पक्ष के जन लोकपाल विधेयक पर शुरू हुई बहस के बीच अरुणा ने लोकपाल विधेयक का एक अलग मसौदा पेश किया था जिसे लेकर अन्ना पक्ष और उनके बीच मतभेद सामने आये थे।

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एक बार फिर चर्चित हुई बिहार के युवक की शहादत, लेकिन जिसके लिए जान दी उसे ही नहीं है अहसास एक बार फिर चर्चित हुई बिहार के युवक की शहादत, लेकिन जिसके लिए जान दी उसे ही नहीं है अहसास(6)

बिहार एक बार फिर शहादत को लेकर चर्चा में है। याद कीजिये राहुल राज को, जिसने बिना किसी खास विचारधारा के मुंबई में घुसकर राज ठाकरे को दिनदहाड़े चुनौती थी, शहीद होने के बाद उसकी बहन चीखती रही और उसके पापा राष्ट्रपति से मिलने के लिए आकाश जमीन एक करते रहे लेकिन मिला कुछ नही। दिनेश यादव को अगर राहुल राज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन दुख की बात यह है कि उसके गरीब परिवार को इस शहादत की कीमत मिली है करीब साढे छह हजार रुपए जिसमें से आधे से ज्यादा तो दाह-संस्कार पर ही खर्च हो गए।

बिहार के सर्फुद्दीनपुर गांव, पंचायत सिंघारा कोपरा, दुल्हिन बाजार, पटना के दिनेश यादव का पार्थिव शरीर सड़क मार्ग द्वारा जब पटना स्थित बांसघाट पहुंचा तो कोहराम मच गया। अन्ना समर्थक भी अपने आंसू रोक नहीं पाए। जीएम फ्री बिहार मूवमेंट के संयोजक पंकज भूषण ने कहा कि शहीद दिनेश की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जायेगी और जल्द ही सर्फुद्दीनपुर गांव अगला रालेगन सिद्धी बनेगा। हालाँकि अन्ना समर्थकों ने दिनेश की दर्दनाक मौत पर कुछ भी बोलने का नैतिक अधिकार खो दिया है लेकिन न अब नैतिकता बची है और न ही सच्चाई। बचा है तो बस मीडिया और उसका राज। निगमानंद को याद कीजिये। दिमाग पर जोर डालियेगा तो गया के दशरथ मांझी भी याद आ जायेंगे और कुछ और भी गुमनाम शहीद।

दिनेश यादव, दिनांक 21 अगस्त को अपने गांव से निकले और अन्ना के समर्थन में पटना से दिल्ली को रवाना हो गए थे। उनके गांव के मित्र सुनील कुमार सिन्हा ने पंकज भूषण को बताया कि उसने 23 अगस्त को दिन में 02-30 बजे दिल्ली से फोन से बताया कि वो अन्ना के समर्थन में वहां पहुंचा हुआ है। उसके मित्र ने बताया, वही मेरी अंतिम बात थी फिर शाम में जैसे ही टीवी देखा तब पता चला कि दिनेश ने राजघाट के पास आत्मदाह कर लिया है।

उसी दिन उसे लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल में भरती कराया गया। जहाँ 29 अगस्त को सुबह उसने दम तोड़ दिया और अन्ना के समर्थन में बिहार का एक नौजवान शहीद हो गया। साथ हीं जानकारी हुई कि शहीद की पत्नी मल्मतिया देवी और माता श्रीमती माया देवी का बिलख बिलख कर बुरा हाल है। दिनेश के छोटे भाई अमरजीत जो दिल्ली में एक इम्ब्रॉइडरी कारखाने में काम करते हैं, ने बताया कि अस्पताल में कोई देखने नहीं आया। ‘‘सिर्फ हमारे इलाके के दो सांसद आये थे, पुलिस वालों ने 3500 रुपयों की मदद की फिर एक एम्बुलेंस में शहीद के शव को रखकर गांव होते हुए पटना स्थित बांस घाट पर लाया गया, जहाँ उनके ज्येष्ठ पुत्र गुड्डू, उम्र 10 वर्ष,  ने मुखाग्नि दी।’’

स्व0 दिनेश ने अपने बाद पांच बच्चों, जिनमें तीन पुत्र (गुड्डू, सोहेल व अमन) एवं दो पुत्रियों (पूजा एवं भारती) को छोड़ा है। सबसे ज्येष्ठ पुत्र की उम्र 10 वर्ष और कनिष्ठ की उम्र 3 वर्ष है। शहीद के पिता विंदा यादव ने बताया, हमारी आर्थिक स्थति बिलकुल खराब है और दिनेश ही पूरे परिवार को खेती मजदूरी करके पल रहा था। अब क्या होगा ! फिर उन्होंने बताया की हमारे चार लड़कों यथा स्व। दिनेश यादव (30 वर्ष), मिथिलेश कुमार (28 वर्ष) दिल्ली में बल्ब फैक्ट्री में कार्यरत है, ब्रजमोहन (26 वर्ष) गांव में ही रहता है) तथा छोटा अमरजीत (19 वर्ष) दिल्ली में काम करता है। उक्त पंचायत के मुखिया के पति बादशाह ने कहा, ‘‘हमलोग भी देख रहे हैं पर पारिवारिक स्थिति बहुत ही इनकी खराब है, जिस कारण सबों से मदद की अपील है।’’

मौके पर उपस्थित अन्ना समर्थक प्रो। रामपाल अग्रवाल नूतन नें तत्काल अंत्येष्ठी के समय 1100 रुपये एवं मनहर कृष्ण अतुल जी ने 500/= की सहायता परिवार को दी। साथ में वहां उपस्थित जीएम फ्री बिहार मूभमेंट के संयोजक पंकज भूषण ने परिवार को सान्तावना देते हुए कहा, ‘‘शहीद की शहादत बर्बाद नहीं होगी, हम सभी आपके साथ हैं और हर परिस्थिति में मदद को तैयार हैं। साथ में उपस्थित इंडिया अगेंस्ट करप्शन के साथी तारकेश्वर ओझा, डा0 रत्नेश चौधरी, अतुल्य गुंजन, शैलेन्द्र जी, रवि कुमार आदि ने भी शोकाकुल परिवार को सांत्वना दी साथ ही अन्य बिहार वासियों से भी अपील की इस मौके पर अमर शहीद दिनेश के परिवार के देखरेख के लिए अधिक से अधिक मदद करें।

इसी बीच पटना स्थित एक चैनल  द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उपस्थित प्रो0 रामपाल अग्रवाल नूतन नें शहीद के पिता विंदा यादव को 1100 रुपये का चेक दिया और शहीद के माता पिता के जीवन भर के निर्वाह का बीड़ा उठाया। उनकी ही पहल पर रोटरी पटना मिड टाउन के अध्यक्ष इंजिनियर केके अग्रवाल ने उनकी बड़ी लड़की पूजा जिसकी उम्र 9 वर्ष है, जो उत्क्रमित मध्य विद्यालय सर्फुद्दीनपुर के वर्ग 6 की छात्रा है, के पढाई के साथ साथ जीवन भर के निर्वाह का बीड़ा उठा लिया। साथ ही रोटरी पटना से विजय श्रीवास्तव ने दूसरी लड़की भारती कुमारी के जीवन भर का बीड़ा उठा कर एक साहसिक कदम उठाया है और हमारे समाज को एक सन्देश भी दिया है।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े तारकेश्वर ओझा ने जन मानस से अपील की है कि जहाँ तक हो सके हर कोई इस परिवार की मदद करे, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या हजार-दो हजार और पांच सौ रुपए की मदद से दिनेश का परिवार पल जाएगा। करोड़ों का चंदा उठाने वाले टीम अन्ना के लोग एक बार लोगों से दिनेश के परिजनों की मदद करने के लिए अपील भी कर देते तो शायद कुछ सम्मानजनक राशि जमा हो जाती।

इधर दिनेश यादव के मौत की निष्पक्ष जाँच कि मांग भी तूल पकड़ने लगी है। फेसबुक ऐक्टिविस्ट दिलीप मंडल ने मांग की है कि दिनेश यादव के मौत कि जाँच कराई जाए। गौरतलब है कि मंडल आदोलन के समय एक कथित छात्र ने आत्महत्या की थी जिसे मीडिया ने आरक्षण विरोधी आन्दोलन के पक्ष में छवि बनाने के लिए दिखाया था बाद में पता चला कि मीडिया के अन्दर एक रणनीति के तहत ऐसी रिपोर्टिंग की गई थी और दरअसल वो पान बेचने वाला दुकानदार था।

(पोस्ट पटना से एक पत्रकार तथा इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रकाश बबलू द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित)

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