कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

Tag: Caption

जन गण मन अधिनायक का असल सच…

मीडिया दरबार पहले भी अपने राष्ट्र-गान के बारे में लिख चुका है लेकिन समय की मांग को देखते हुए फिर से भारत के राष्ट्र-गान की सच्चाई अपने पाठकों के समक्ष रख रहा है ताकि हमारे राष्ट्र-गान के पीछे छुपे कडुवे सच हमारे नए पाठकों के सामने भी आ सकें.

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था. सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो

रबिन्द्र नाथ टैगौर का पत्र

अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया. पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा जॉर्ज पंचम को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये. इंग्लैंड का राजा जॉर्ज पंचम 1911 में भारत में आया. रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा. उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे. उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था. और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए.
रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”. इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जॉर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था. इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है. हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो. तुम्हारी जय हो! जय हो!! जय हो!!! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महाराष्ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदियाँ जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है, तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है. तुम्हारी ही हम गाथा गाते है. हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो.” में ये गीत गाया गया.

गुणगान से ही होगा कल्याण

जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया. जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की. वह बहुत खुश हुआ. उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जॉर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये. रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए. जॉर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था. उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया. तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया. क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था. टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है. जॉर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया.
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली. इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया.
सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे. रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे. अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) . इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है. इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है.लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे.
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये. 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी. लेकिन वह दो खेमो में बट गई. जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे. मतभेद था सरकार बनाने को लेकर. मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने. जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है. इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया. कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए. एक नरम दल और एक गरम दल. गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी. वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे. और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे). लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे.
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है. और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है. उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे. उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया. जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली. संविधान सभा की बहस चली. संविधान सभा के 319 में से 318 सदस्य ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई. बस एक सदस्य ने इस प्रस्ताव को नहीं माना. और उस एक सदस्य का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु. उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी). अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास. गाँधी जी ने कहा कि जन गण मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये. तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”. लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए. नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गण मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है.
उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गाया नहीं गया. नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे? जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था. बीबीसी ने एक सर्वे किया था. उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम. बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है. कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते हैं लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है. तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का. अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?

मीडिया दरबार पर पिछले साल भी इस बारे में लिखा गया था. इस लिंक पर जाकर आप उसे भी पढ़ सकते हैं..

होली में एक्सपोज़र का रंग चढ़ा बॉलीवुड पर, पूनम पांडेय ने तोड़ीं सारी हदें

 

 

बॉलीवुड में होली मस्ती से ज्यादा एक्सपोजर और पब्लिसिटी का त्यौहार बनता जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

राखी सावंत और सोफिया ने कैमरे के सामने ऐसी बिंदास होली मनाई कि फोटॉग्राफरों तक के होश उड़ गए।

 

 

 

 

 

 

 

‘हीरोइन’ करीना कपूर हो या ‘अवार्ड विनिंग’ विद्या बालान, कोई भी होली के बहाने रंग-बिरंगी तस्वीरें खिंचाने से पीछे नहीं रहा।

 

 

 

 

 

 

 

ऐक्ट्रेस और मॉडल पूजा बासु ने तो होली के बहाने बाकायदा एक हॉट फोटोशूट कराया। इस फोटोशूट में पूजा ने जमकर एक्सपोज भी किया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जब सब का ज़िक्र छिड़ा हो तो, मौके-बेमौके मीडिया को मसाला देने वाली किंगफिशर मॉडल पूनम पाण्डेय भला कैसे पीछे रहती? उन्होंने इस मौके पर एक बहुत ही उत्तेजक वीडियो ‘डर्टी-प्ले’ अपलोड किया है।

 

 

 

 

 

इस वीडियो में पूनम बिकनी में होली खेलती हुई नजर आ रही हैं और काफी अश्लील हरकतें भी करती हुई दिखाई दे रही हैं।

 

 

 

 

 

कहना गलत न होगा कि ऐसा करने पर सभी को पब्लिसिटी बटोरने का पूरा मौका मिला है। ताज़ा खबर ये है कि पूनम का वीडियो यूट्यूब ने ब्लॉक कर दिया है।

 

 

 

ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है।

-अमलेन्दु उपाध्याय||

अगर अखिलेश का करिश्मा है तो माया की हार कैसे है?


ऐन होली से पहले उत्तर प्रदेश में छप्परफाड़ मिली सफलता से समाजवादी पार्टी में खुशी का माहौल है। हो भी क्यो न? आखिर लगातार पांच साल सत्ता से बाहर रहकर पहली बार पार्टी प्रदेश की सरकार में आ रही है। लेकिन जितना खुशी का माहौल सपा में है उससे कई लाख गुना खुशी का माहौल हमारे मीडिया में व्याप्त है। बड़े-बड़े दिग्गज सपा की इस जीत पर युवराज अखिलेश की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं और अखबारों के मुखपृष्ठ पर विशेष संपादकीय लिखकर ये बताने का कार्य किया जा रहा है गोया प्रदेश में कोई बहुत बड़ी क्रांति हो गई है और बस उत्तर प्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है।
दरअसल हमारा मीडिया कुछ ज्यादा अतिउत्साही है। अखिलेशमय मीडिया की मौजूदा तस्वीर देखकर मुझे वर्ष 2007 का मई का महीना याद आ रहा है। हमारे यही मीडिया के सुधीजन प्रदेश में मायावती की ताजपोशी पर भी इसी तरह मायामय नज़र आ रहे थे और कई बड़े पत्रकार तो इस हद तक पहुंच गए थे कि  मायावती की जीत को दूसरी आजादी बता रहे थे ठीक उसी तरह जैसे कुछ दिन पहले अन्ना आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। लेकिन ज्यादा समय नहीं गुजरा कि यही मीडिया मायावती के पीछे हाथ धोकर पड़ गया जैसे 2003 और 2004 में मुलायम सिंह के पीछे पड़ गया था। सवाल यह है कि क्या हमारे बड़े पत्रकार वास्तव में कभी बड़े बन भी पाएंगे या ऐसी ही बचकानी हरकतें करते रहेंगे?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा को जो जीत मिली है उसमें उसके संघर्ष का भी योगदान है। लेकिन क्या केवल उसके संघर्ष से ही उसे ये जीत मिल गई है? क्या इस जीत में प्रदेश के मुस्लिम मतदाता और मायावती के कुशासन का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत में जातीय जुगलबंदी का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत का श्रेय

अकेले अखिलेश को दिया जाना उचित है, इसमें आज़म खां और शिवपाल और स्वयं मुलायम सिंह का कोई रोल नहीं है? अगर मीडिया में आ रहे विश्लेषणों पर नज़र डालें तो ऐसा ही लगता है गोया बस प्रदेश में अखिलेश ही अखिलेश हैं बाकी सब कूड़ा करकट हैं।
अहम प्रश्न यह है कि अगर ये केवल अखिलेश का कमाल है तो यह कमाल 2009 के लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? 2007 के विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? उस समय भी अखिलेश मैदान में थे फिर कमाल क्यो नहीं हुआ? आखिर अखिलेश ने पिछले दिनों वे कौन से महत्वपूर्ण कार्य किए जिनके कारण उनका जादू चल गया? बसपा नेत्री मायावती जब बोलती हैं तो बहुत कर्कश और कटु बोलती हैं लेकिन बात सीधे कहती हैं फिर चाहे किसी को बुरी लगे या भली। चुनाव हारने के बाद उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में जो कहा वह उनकी हताशा और बदजुबानी कहा जा सकता है लेकिन सत्य यही है कि बसपा को मुसलमानों और भाजपा व कांग्रेस ने मिलकर हराया है न कि सपा ने!

कांग्रेस ने जिस तरह ऐन चुनाव के वक्त ओबीसी आरक्षण में मुस्लिम कोटा का दांव चला उससे साफ संकेत गया कि यह मुसलमानों की बेहतरी के लिए नहीं बल्कि चुनावी फायदे के लिए किया गया है। इस मुद्दे को लेकर जिस तरह भाजपा आक्रामक हुई और बसपा से टूटे हुए नेता बाबू सिंह कुशवाहा पिछड़ों के नेता के रूप में उसके साथ जुटे उससे लगने लगा कि प्रदेश में भाजपा मजबूत हो रही है और इस डर ने मुस्लिम मतदाताओं के सामने यह स्थिति पैदा कर दी कि वे मायावती के कुशासन के खिलाफ और भाजपा को रोकने के लिए सपा के साथ हो जाएं। और यही स्थिति बन गई। अब इसमें अखिलेश का कितना योगदान है? और अगर इसे अखिलेश का करिश्मा बताया जा रहा है तो मायावती को कोसना बंद कीजिए। क्योंकि ये अखिलेश का करिश्मा है तो मायावती सरकार की नाकामी कहां से है?
इसी तरह बसपा ने ऐन चुनाव से पहले अपने लगभग आधे विधायकों के टिकट काटे। इनमें से अधिकांश चुनाव लड़े और उन सभी ने बसपा को ही नुकसान पहुंचाया।
प्रचारित किया जा रहा है कि धर्म और जाति से ऊपर उठकर यह जनादेश आया है। तो अखिलेश और मुलायम ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर तो वोट मांगा नहीं था और न सपा ने। फिर यह जाति और धर्म से ऊपर जनादेश कैसे हो गया? और अगर ये जाति धर्म से ऊपर उठकर जनादेश है तो क्या सपा भी इससे ऊपर उठकर पांच साल तक बिना राग द्वेष के सरकार चलाएगी?

अमलेन्दु उपाध्याय

सपा के पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के खतरों के संकेत मिलना शुरू हो गए हैं। आशंकाएं निरी निर्मूल नहीं हैं और न पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। सरकार बनने की सूचना मिलते ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर जिस तरह से उत्पात मचाया है और पत्रकारों के साथ भी मारपीट की है उससे भविष्य के पांच साल का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस यज्ञ में पहली आहुति जिन लोगों ने दी है वे कोई मामूली लोग नहीं हैं। संभल में जिन विधायक जी के विजय जुलूस में गोली चली है वे सपा के एक बड़े थिंक टैंक महासचिव के बहुत खास हैं और इतने प्रभावशाली हैं कि उनके कारण ही बड़े मुस्लिम नेता शफीकुर्रहमान वर्क को पार्टी छोड़नी पड़ी थी। इसी तरह झांसी में मिनी मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले एक नेता जी शिवपाल सिंह के पार्टी की कमान संभालने से पहले प्रदेश में पार्टी की कमान संभालते थे, वहां भी जो घटनाएं हुई हैं वे भविष्य की कहानी कह रही हैं। इन घटनाओं से पार्टी अगर सबक लेती है तो ठीक है, वरना जो मीडिया आज अखिलेशमय नज़र आ रहा है वही चार महीने में उनके खिलाफ उसी तरह खड़ा नज़र आएगा जैसे पिछले पांच सालों में मायावती के खिलाफ खड़ा था और पिछली सरकार में मुलायम सिंह के खिलाफ खड़ा था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

हॉट तस्लीमा का ट्विटर पर हॉट कमेंट: “पूनम पब्लिक प्लेस पर करवा सकती है…”

किंगफिशर मॉडल पूनम पांडे किस तरह की हरकतें कर चर्चा में रहती हैं इससे तो आप लोग वाकिफ होंगे ही लेकिन जहां उनकी हरकतें उन्हें लोगों के बीच चर्चित बनाती हैं वहीं कुछ लोगों को चर्चा में आने का मौका भी दे देती हैं।

पूनम पांडेय की इसी न्यूड तस्वीर पर तस्लीमा को है ऐतराज़

हाल ही में शर्लिन चोपड़ा और साक्षी प्रधान ने अपने-अपने फोटो शूट की मीडिया पब्लिसिटी पूनम पांडेय से की तो उन्हें खासी चर्चा मिली। शायद यही देख कर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी पूनम को जमकर कोसा है और टि्वटर पर खूब गालियां दी हैं।

शर्लिन की उजाले में ली गई न्यूड तस्वीर तस्लीमा को अश्लील नहीं लगी

 

 

 

तस्लीमा ने लिखा है कि पूनम पांड़े का सिर्फ कपड़े उतारने से मन नहीं भरा है अगर उनका बस चले तो सरेआम लोगों के बीच आकर ‘संबंध’ बना लें। बकौल तस्लीमा, पूनम पांडे की हरकतें काफी गंदी है। उन्होंने पूनम पांडे को गंदी-गंदी गालियां भी दी है। तस्लीमा ने लिखा है कि पूनम अपनी इन गंदी हरकत के चलते पैसे कमाना चाहती है।

 

 

मौका मिलने पर तस्लीमा भी हॉट फोटो शूट से नहीं चूकतीं

 

 

 

दिलचस्प बात ये है कि विवादास्पद मॉडल पूनम पांडे पर टिप्पणी करने वाली लेखिका तस्लीमा नसरीन खुद भी हमेशा विवादों में रहती है। अपनी पहली किताब लज्जा के चलते उन्हें अपने वतन बांग्लादेश से बाहर रहना पड़ रहा है। पिछले दिनों उन्होंने टि्वटर पर लिखा था कि मुस्लिम महिलाएं एक साथ 72 कुंवारे पुरुषों के साथ सो सकती हैं। बस उन्हें मौका मिलने की देर है।

देखना है कि तस्लीमा की इस ताज़ा टिप्पणी पर पूनम का क्या जवाब होता है और एक मॉडल अपनी कंट्रोवर्सी में एक लेखिका को शामिल करती है या नहीं?

गुलज़ार ने अपने अंदाज़ में पढ़ा ‘तेरा बयान गालिब’, डर्टी गर्ल ने लांच किया

पिछले दिनों मुंबई में एक समारोह में संगीत कम्पनी सारेगामा द्वारा रिलीज़ किये गए ऐलबम ‘तेरा बयान ग़ालिब’ को अभिनेत्री विद्या बालन ने लॉन्च किया. ‘तेरा बयान ग़ालिब’ में लोकप्रिय गीतकार व फिल्म निर्देशक गुलज़ार ने मिर्ज़ा ग़ालिब के खतों को अपनी गंभीर आवाज में पढ़ा है और लोकप्रिय ग़ज़ल गायक स्व जगजीत सिंह ने ग़ालिब की गज़लों को गाया भी है और इसमें संगीत भी दिया है. इस एलबम का संयोंजन एवं निर्देशन जाने-माने थियेटर निर्देशक सलीम आरिफ ने किया है.

गुलजार के साथ गजल संग्रह 'तेरा बयान गालिब' लांच करतीं विद्या बालन

ऐलबम लॉन्च के बाद गुलज़ार साहब ने “एक बौछार था” नाम की कविता पढ़ी, जिसे उन्होंने स्व. जगजीत सिंह को समर्पित किया और कहा, ”बहुत दिनों से इस ऐलबम की तैयारी चल रही थी. सोचा क्यूँ न कुछ मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में करें लेकिन धारावाहिक से अलग. सलीम आरिफ जो कि पीछे दस सालों से ‘ग़ालिबनामा’ को स्टेज पर प्रस्तुत करते रहे हैं, यह एलबम भी इनके ही प्रयास से आप सब तक पहुँच सका है.’’

जाने माने थियेटर निर्देशक सलीम आरिफ ने कहा “कभी नही सोचा था इस अवसर पर जगजीत भाई हमारे साथ नही होंगे. पहले हमने सोचा था कि 27 दिसंबर को दिल्ली में बल्लीमारान में जहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली है वहीँ इस एलबम को रिलीज़ करें लेकिन नहीं कर सके. आप सब जानते हैं क्यों? फिर सोचा कि 8 फरवरी को जगजीत भाई के जन्मदिन पर रिलीज़ करें. लेकिन नही संभव हो सका.”

उनसे यह पूछने पर कि कितना समय लगा इस ऐलबम को तैयार करने में उन्होंने बताया, “रिकॉर्डिंग में 3 महीने लगे लेकिन मैं तो पिछले दस सालों से इससे जुड़ा हूँ.” अब जबकि जगजीत जी हमारे बीच नहीं हैं तो कैसे उनका संगीत आपने इस एलबम में लिया तो उन्होंने कहा कि हमने जगजीत भाई द्वारा तैयार की हुई धुनों को कहीं-कहीं से लिया कुछ-कुछ उन्होंने कभी जो गुनगुना लिया था, वो सब खोज कर हमने यह एलबम का संगीत तैयार किया है.

इस अवसर पर सा-रेृ-गा-मा के एमडी अपूर्व नागपाल व आदर्श गुप्ता (बिजनेस हेड) गायिका रेखा भारद्वाज, रागेश्वरी, लेखक अतुल तिवारी, भूपेंद्र व मिताली, अभिनेत्री लुबना सलीम आदि उपस्थित थे. (प्रेस विज्ञप्ति)

कितना काम आएगा युवाओ को रिझाने के लिए राजनीतिक दलों का लॉलीपाप?

-धीरेंद्र अस्थाना||
देश की संसद में बड़ी-बड़ी बातें करने वाली राजनीतिक पार्टियां प्रायोगिक तौर पर अपनी ही बातों से मुकर जाती है। जिस की बानगी दिख रही है यूपी चुनावों में। हम बात कर रहै हैं सपा मुखिया मुलायम सिंह की। उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए समाजवादी पार्टी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती है। कभी अंग्रेजी और कम्प्यूटर शिक्षा का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी का नया चेहरा शुक्रवार को जारी घोषणा पत्र में देखने को मिला है। पार्टी ने 12वीं पास सभी छात्रों को लैपटाप उपलब्ध कराने का वादा किया है और दसवीं पास छात्रों को टेबलैट दिया जाएगा। घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों को मदरसों में तकनीकी शिक्षा के लिए सरकार विशेष बजट उपलब्ध करवाएगी। नेता जी के लिए तो बस हम यही कहना चाहेंगे ये जनता है जा सब जानती है। इसकी नजरों से बचना संभव नहीं है।
चुनाव का मौसम है और राजनीतिक दलों के नेता वायदे में जुटे हुए हैं। इसी की श्रृखंला में सपा मुखिया भी पिछले शुक्रवार को अपने चुनावी घोषणा पत्र में बोल पड़े कि इस बार प्रदेश में यदि उनकी सरकार बनती है तो प्रदेशवासियों को को क्या क्या तोहफे देेंगे। अब उन्होंने पिछली बार मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए प्रदेश के सभी वर्गों की छात्राओं को साइकिल बांटने की योजनाएं चलाई थी, जिस पर अमल तो किया गया, लेकिन उन्हें भी शायद ये नहीं पता होगा कि क्या पूरे प्रदेश की कन्याओं को साईकिल वितरण हो पाई थी। इसका जवाब तो शायद मुलायम के पास नहीं होगा, लेकिन अब बात है टेबलैट और लैपटाप की तो क्या मुलायम अपने वादे पर खरे साबित हो सकेंगे। बात तो ये भी है कि अब यदि मुलायम सिंह ने जनता से वादा तो कर दिया और अब इसे पूरा करने में क्या क्या जदोजहद करनी पड़ सकती हैं। वहीं प्रदेश के किसानों को सरकार की ओर से भूमि अधिग्रहण में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगें। 65 आयु वर्ष से ऊपर के किसानों को पेंशन मिलेगी, एक हजार रूपये बेरोजगारी भत्ता आदि कई ऐसे वादें किये है जिन पर अमल कर पाने के लिए क्या प्रदेश के पास इतना बजट होगा? क्या ये सारे वादे सिर्फ वादे ही रह जाएंगे? क्या बेरोजगारों को बिना किसी घोटालें के भत्ता मिल सकेंगा। तो सपा के मुखिया मुलायम ने आम जनमानस को ये लालीपाप तो दे दिया है अब देखना ये है कि यदि समाजवादी पार्टी की सत्ता बनती है तो इस पर कितना अमल हो सकेंगा।
वहीं उधर विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही सभी दलों ने वादों की झड़ी लगा दी है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने बीते दिनों अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए यह घोषणा की थी कि उत्तर प्रदेश में यदि उसकी सरकार बनी तो वह छात्रों के बीच लैपटाप व टैबलेट बांटेगी। इससे पहले समाजवादी पार्टी ने भी जनता से कुछ इसी तरह का वादा किया था। पार्टी ने अपने इस घोषण पत्र में छात्रों से लेकर महिलाओं और किसानों सहित समाज के हर वर्ग को लुभाने की कोशिश की है। पार्टी ने सरकार बनने की स्थिति में मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में लाडली लक्ष्मी योजना चलाने और बिहार की तर्ज पर स्कूली बालिकाओं को साइकिल बांटने की बात कही है। तो क्या ये वादे जनता से वोट लेने के लिए काफी होगे। या फिर किसानों को लुभाने के प्रयास के तहत पार्टी ने 1000 करोड़ रुपये का राहत कोष और उनके लिए कृषक कल्याण आयोग गठित करने का वादा किया है। साथ ही उन्हें 24 घंटे बिजली देने की बात भी कह दी है। पार्टी ने शिक्षकों के लिए भी आयोग गठित करने की बात कही है। पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में महिलाओं को रिझाने के प्रयास के तहत सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण देने की बात भी कही है। साथ ही स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित करने का वादा तक किया है। लेकिन क्या ये वादे उस जनता के लिए मुकमल होगें जो ये सोचकर नेता चुनती है, और ऐसे में यदि आम जनमानस से जुड़े लोगों के वादांे पर पानी फिर जाता है तो शायद इसका कष्ट जनता को सबसे ज्यादा होता है। अपने जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण देने की केंद्र सरकार की घोषणा का विरोध किया है और कहा है कि इस सम्बंध में वह सरकार को संसद से सड़क तक विरोध करेगी। इस बयान पर भाजपा ने शायद ये नही सोचा कि अल्पसंख्यकों के लिए हम सड़को पर उतरकर विरोध तो करेंगे। लेकिन जारी घोषणा पत्र से जब जनता नाखुश होगी तो क्या अन्य विपक्षी दल शांत रहेंगे।
इन दोनो पार्टियो की स्थिति को देखते हुए ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने जनता से वोट लेने के लिए नये नये तरीके अपना रखे है उसी का नतीजा है कि दोनों ही पार्टियो ने अपने अपने वोटो को बचाने के लिए युवा मतदाताओं को अपनी ओर खिचा हैं। जिससे एक बात तो साफ है कि युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए दोनो पार्टियों ने 12वीं पास सभी छात्रों को लैपटाप उपलब्ध कराने का वादा किया है और दसवीं पास छात्रों को टेबलैट दिया जाएगा। मतदाताओं को रिझाने के बाद अब इस बात की क्या गारंटी है कि ये दोनों बड़ी पार्टियां जनता के साथ किये गये वादो को पूरा कर सकेंगी।

धीरेंद्र अस्थाना

धीरेंद्र अस्थाना संवाददाता लोकमत लखनऊ 9415001924

इन दोनों भाजपा के प्रमुख नेता सुषमा स्वराज, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज हुसैन, सूर्य प्रताप शाही, नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेई आदि है और सपा में भी मुखिया मुलायम सिंह यादव, राम गोपाल यादव, अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह, आजम खान, मोहन सिह, बृज भूषण तिवारी आदि कई लोग है जो इन दिनों पांचो प्रदेशों की विधानसभा सीटों में जाकर चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हैं और जनता को सपने दिखा रहे हैं। इन चुनावी घोषणा पत्रों में सपा ने तो दसवीं पास छात्रांे को लैपटाप का लालीपाप दिया तो वहीं भाजपा ने बेहद रियायती दर पर छात्रों को लैपटाप देने के साथ-साथ युवाओं के सर्वांगीण विकास के युवा आयोग गठित करने की बात कहीं और हद तो तब हो गई जब क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर बेरोजगार युवाओं को बात कह डाली। अभी आम जनमानस का इन दोनों बड़ी पार्टी के लालीपाप से मन भरा भी नही था और ऐसे में कांग्रेस ने युवाओं को कोई उपहार देने के बजाय पांच सालों में बीस लाख युवाओं को रोजगार देने का वादा कर डाला। युवा छात्र मतदाताओं को रिझाने के लिए कांग्रेस ने छात्र संघों के चुनाव करवाने का वायदा भी किया है। तो कुल मिलाकर यदि इस बार के चुनाव पर नजर डाली जाए तो ये साफ है कि इस बार का बड़ा वोट बैंक युवा है और इन्हें रिझाने के लिए दल किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं।


तिरुपति बालाजी के दरबार में रिश्वतखोरों का मेला, भगवान का भी डर नहीं

नागमणि पाण्डेय।।

आंध्र प्रदेश मे स्थित तिरुपति बालाजी के दर्शन करने के लिए प्रति दिन पचास हजार से भी अधिक श्रद्धालू दर्शन के लिए उनकी नगरी मे आते हैं। तिरुपति मंदिर देश के सभी मंदिरो मे सबसे धनवान मना जाता है। इस मंदिर मे दर्शन करने आने वाले भक्तों के कारण ही यहां के लगभग 2 हजार से भी अधिक लोगों का  परिवार चलता है। इस के साथ ही  यहा प्रतिदिन आने वाले श्र्धलुओ के सुरक्षा के लिए पुलिस बल भी तैनात किया गया है।

मात्र यहा व्यवसाय करने वाले छोटे छोटे दुकानदारो से यहा तैनात कुछा सुरक्षाकर्मियों द्वारा  व्यवसाय करने के लिये प्रतिदिन रिश्वत ली जा रही  है, वह भी मंदिर परिसर में खुलेआम। इन्हे किसी भी तरह का डर नहीं है।  अधिकारियों से तो दूर की बात है, भगवान से भी कोई भय नहीं। मंदिर परिसर मे ही रिश्वत लेकर घोर पाप किया जा रहा है।

हम मुंबई से ट्रेन से सफर कर सोमवार को आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर पहुंचे। वहा एक दिन आराम कर दूसरे  दिन अर्थात 18 जनवरी को तिरुपति का दर्शन करने गए। 19 जनवरी को हमने वहां के पाप नाशम , गंगा सागर सहित और कुछा दर्शनीय स्थलों पर जाने के लिये एक जीप रिजर्व किया। जीप मे बैठने के  बाद जब हम कुछा  दूर पहुंचने के बाद जब हम  जंगल मे प्रवेश करने वाले थे उस से पहले सबसे पहले जीप के चालक ने पुलिस कि चौकी के गार्ड  को 20 रुपये रिश्वत देनी पडी।

जब वाहन चालक से इस का कारण पूछा तो बताया कि अगर नही दिया जाएगा तो ये लोग हमे बोलेंगे कि तुम गाडी मे अवैध रूप से चंदन ले जा रहे हो जो कि कानूनन अपराध है। उस के बाद  जब हम वहां के जंगलों में स्थित पहले चरण के दर्शन के लिए तिरुमाला पहुंचे तो वहां दर्शन करने के बाद हम आगे के पडाव गंगा सागर का दर्शन करने के लिये निकले। उससे पहले वहां मौजूद कर्मचारियों ने वाहन चालक से प्रवेश के लिये 20 रुपये की रिश्वत ली, तब जाकर आगे जाने की अनुमती मिली।

हम वहा गंगा सागर , पाप नासम और कुच्ह दर्शनीय स्थल का दर्शन कर वापस अपने ठहराव पर आने के बाद दूसरे दिन 20 जनवरी को बालाजी के पास ही कुबेर भगवान का दर्शन करने गए। कुबेर मंदिर बालाजी मंदिर के सामने ही है। जब हम दर्शन करने से पहले जब नारियल लेने गए तो वहा देखा कि मंदिर परिसर मे सुरक्षा मे तैनात एक महिला सुरक्षा कर्मचारी वहा के दुकानदारों से रिश्वत वसूल रही थी। रिश्वत नही देने वाले को बाहर जाने को रही थी। बेचारे दुकानदार चुपचाप उसकी जेब गरम कर रहे थे। ये सब नज़ारा देख कर लगा कि इन सुरक्षा कर्मियों की भगवान ही रक्षा करे।

भगवान कृष्ण की नगरी वृंदावन में पत्रकारों के आगे घुटने टेकने पड़े ओपरा को

वाह ताज..! मथुरा के बाद आगरा पहुंची ओपरा विनफ्रे

भारत के अपने पहले दौरे में अमेरिकी टॉक शो क्वीन ओपरा विनफ्रे का बेशक जोरदार स्वागत हुआ हो, भगवान कृष्ण की नगरी वृंदावन में उन्हें पत्रकारों के आगे घुटने टेकने ही पड़े। ओपरा भारतीय विधवा महिलाओं की कथित दुर्दशा पर नए टीवी कार्यक्रम की शूटिंग कर रही थीं। इसी दौरान उनके बाडीगार्डों की स्थानीय पत्रकारों के साथ झड़प हो गई।

पुलिस ने बताया कि विनफ्रे के दौरे को कवर कर रहे मीडियाकर्मियों की कुछ वीडियो कैमरा कथित रूप से टूटने की शिकायत के बाद विनफ्रे के तीन भारतीय सुरक्षाकर्मियों को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों से लिखित माफी मांगी, तब जा कर उन्हें रिहा कर दिया गया।

ओपरा विनफ्रे दो अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों और एक दर्जन से अधिक भारतीय सुरक्षाकर्मी के साथ वृंदावन पहुंची थी। उन्होंने तड़के पत्थरपुरा स्थित ‘भगवान भजनाश्रम’ पहुंचकर विधवा महिलाओं पर वृत्तचित्र फिल्माया। वह अपने नये शो ‘नेक्स्ट चैप्टर’ की शूटिंग के सिलसिले में भारत में हैं।

उन्होंने बताया कि बाद में ‘मां धाम’ (विधवा एवं परित्यक्त महिलाओं के लिये संचालित आश्रय) गई। वहां सुबह आठ बजे से ही कड़ाके की ठंढ में सभी महिलाओं को लॉन में बैठा कर शूटिंग की जा रही थी। पुलिस के अनुसार, दो अमेरिकी सुरक्षागार्डों सहित दर्जन भर से अधिक सुरक्षाकर्मियों ने मीडियाकर्मियों को ‘मां धाम’ से
निकाल दिया।

अपर पुलिस अधीक्षक राम किशोर के मुताबिक दोनों ही स्थल शूटिंग के लिये प्रतिबंधित नहीं है, जबकि बांके बिहारी मंदिर आदि कुछ स्थानों पर शूटिंग में आपत्ति है तो वहां बिना इजाजत ऐसी शूटिंग नहीं की जा सकती है। उन्होंने बताया कि इसके बाद ओपरा विनफ्रे की टीम शूटिंग के लिये आगरा रवाना हो गई।

प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया को चोर बनने से बचाएंगे पंकज पचौरी?

- विनीत कुमार ।।

मीडिया को आज डिसाइड करना है कि आपको राजनीति करनी है, कॉर्पोरेट बनना है या मीडिया बनकर ही रहना है। मीडिया में भ्रष्टाचार है, गड़बड़ी है और वो इसलिए है कि हम अपने धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं। आज जो बर्ताव बाबा रामदेव के साथ हुआ, यही बर्ताव बहुत जल्द ही हमारे साथ होनेवाला है। हमारे खिलाफ माहौल बन चुका है। लोग टोपी और टीशर्ट पहनकर कहेंगे- मेरा मीडिया चोर है।“-  पंकज पचौरी

हरीश खरे (बाएं) के बदले आए पंकज पचौरी

….दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में ”संवाद 2011” नामक आयोजन में “मीडिया और भ्रष्टाचार की भूमिका” पर बात करते हुए एनडीटीवी के होनहार मीडियाकर्मी पंकज पचौरी जब अंदरखाने की एक के बाद एक खबरें उघाड़ रहे थे और ऑडिएंस जमकर तालियां पीट रही थी, उन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अंबिका सोनी (सूचना और प्रसारण मंत्री, भारत सरकार) की ताली भी शामिल थी। चेहरे पर संतोष का भाव था और वो भीतर से पंकज पचौरी की बात से इस तरह से गदगद थी कि जब उन्हें बोलने का मौका आया तो अलग से कहा-पंकज पचौरीजी ने जो बातें कहीं है वो मीडिया का सच है, इस सच के आइने को बाकी पत्रकारों को भी देखना चाहिए। पंकज पचौरी के नाम पर एक बार फिर से तालियां बजी और उस दिन वो उस सर्कस/सेमिनार के सबसे बड़े कलाबाज साबित हुए।

ये अलग बात है कि पंकज पचौरी की ये कलाबाजी किसी घिनौनी हरकत से कम साबित नहीं हुई। पंकज पचौरी ने कहा था CWG 2010 पर कैग की आयी रिपोर्ट को मीडिया ने जोर-शोर से दिखाया लेकिन इसी मीडिया को हिम्मत नहीं थी कि वो रिपोर्ट में अपने उपर जो बात कही गयी है,उसके बारे में बात करे। वो नहीं कर सकता क्योंकि वो पेड मीडिया है। लेकिन पंकज पचौरी ने ये नहीं बताया कि उनके ही चैनल एनडीटीवी ने कैसे गलत-सलत तरीके से टेंडर लिए थे। आप चाहे तो कैग की रिपोर्ट चैप्टर-14 देख सकते हैं।

पत्रकार से मीडियाकर्मी, मीडियाकर्मी से मालिक और तब सरकार का दलाल होने के सफर में नामचीन पत्रकारों के बीच पिछले कुछ सालों से मीडिया के किसी भी सेमिनार को सर्कस में तब्दील कर देने का नया शगल पैदा हुआ है। उस सर्कस में रोमांच पैदा करने के लिए वो लगातार अपनी ही पीठ पर कोड़े मारते चले जाते हैं और ऑडिएंस तालियां पीटने लग जाती है। ये ठीक उसी तरह से है जैसे गांव-कस्बे में सड़क किनारे कोई कांच पर नगे पैर चलता है, पीठ पर सुईयां चुभोकर छलांगे लगाता है..दर्शक उसकी इस हरकत पर जमकर तालियां बजाते हैं।

मीडिया सेमिनारों में राजदीप सरदेसाई (हम मालिकों के हाथों मजबूर हैं), आशुतोष (मीडिया लाला कल्चर का शिकार है) के बाद पंकज पचौरी विशेष तौर पर जाने जाते हैं। उस दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया और अपनी ईमानदारी जताने के लिए खुद को चोर तक करार दे दिया। मीडिया का यही चोर अब देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी के कम्युनिकेशन अडवाइजर नियुक्त किए गए हैं। हमें सौभाग्य से देश का ऐसा प्रधानमंत्री नसीब हुआ है जो अच्छा-खराब बोलने के बजाय चुप्प रहने के लिए मशहूर हैं। ऐसे में पंकज पचौरी दोहरी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए उनकी टीम के सूरमा होने जा रहे हैं। पंकज पचौरी की सोहबत में हमारे प्रधानमंत्री बोलेंगे, टीवी ऑडिएंस की हैसियत से उन्हें अग्रिम शुभकामनाएं।

बहलहाल, एनडीटीवी से मोहब्बत करनेवाली ऑडिएंस और प्रणय राय के स्कूल की पत्रिकारिता पर लंबे समय तक यकीन रखनेवाली ऑडिएंस चाहे तो ये सवाल कर सकती है कि जो मीडियाकर्मी (भूतपूर्व) प्रणय राय का नहीं हुआ वो कांग्रेस का क्या होगा? चाहे तो ये सवाल भी कर सकती है कि जो पत्रकार कांग्रेस का हो सकता है वो किसी का भी हो सकता है। लेकिन मीडियाकर्मी और सरकार की इस लीला-संधि में एक सवाल फिर भी किया जाना चाहिए कि तो फिर तीन-साढ़े तीन सौ रुपये महीने लगाकर टीवी देखनेवाली ऑडिएंस क्या है? मुझे कोई और नाम दे, मैं खुद ही अपने को कहता- फच्चा। बात सरकार की हो या फिर मीडिया की,हम फच्चा बनने के लिए अभिशप्त हैं। अब इसके बाद आप चाहे तो जिस तरह से मीडिया विमर्श और बौद्धिकता की कमीज ऐसी घटनाओं पर चढ़ाना चाहें, चढ़ा दें।

एनडीटीवी मौजूदा सरकार की दुमछल्ला है, ये बात आज से नहीं बल्कि उस जमाने से मशहूर है जब एनडीटीवी के हवा हो जाने और बाद में सॉफ्ट लोन के जरिए बचाए जाने की खबरें आ रही थी। कॉमनवेल्थ की टेंडर और बीच-बीच में सरकार की ओर से हुई खुदरा कमाई का असर एनडीटीवी पर साफतौर पर दिखता आया है। विनोद दुआ को लेकर हमने फेसबुक पर लगातार लिखा। एनडीटीवी की तरह ही दूसरे मीडियाहाउस के सरकार और कार्पोरेट के हाथों जिगोलो बनने की कहानी कोई नई नहीं है। सच्चाई ये है कि नया कुछ भी नहीं है। संसद के गलियारे में पहुंचने के लिए या फिर मैरिन ड्राइव पर मार्निंग वॉक की हसरत पाले दर्जनों मीडियाकर्मी सरकार और कार्पोरेट घरानों के आगे जूतियां चटखाते फिरते हैं।

नया है तो सिर्फ इतना कि जो दलाली करता है वही पत्रकारिता कर सकता है और वही ईमानदार करार दिया जा रहा है। पिछले दो-तीन सालों में अच्छी बात हुई है कि सबकुछ खुलेआम हो रहा है। जो बातें आशंका और अनुमान के आधार पर कही जाती थी, उसे अब मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी अपने आप ही साबित कर दे रहे हैं। ये हमारे होने के बावजूद बेहतर स्थिति है कि हम उन्हें सीधे-सीधे पहचान पा रहे हैं। ये अलग बात है कि ऐसे में देश के दल्लाओं का हक मारा जा रहा है और शायद मजबूरी में वो आकर पत्रकारिता करने लग जाएं।

मीडिया औऱ मीडियाकर्मियों के कहे का भरोसा तो कब का खत्म हो चुका है। पंकज पचौरी के शब्दों में कहें तो ये खुद समाज का खलनायक बन चुका है। ऐसे में चिंता इस पर होनी चाहिए कि हम चिरकुट जो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते-बकते आए हैं, इन मीडिया खलनायकों के लिए क्या उपाय करें? क्या ये सिनेमा में परेश रावल और गुलशन ग्रोवर को रिप्लेस करने तक रह जाएंगे या फिर सामाजिक तौर पर भी इनका कुछ हो सकेगा?

मीडिया की श्रद्धा में आकंठ डूबे भक्त जो इसे चौथा स्तंभ मानते हैं, उनसे इतनी अपील तो फिर भी की जा सकती है कि अब तक आप जो पत्रकारिता के नायक या मीडिया हीरो पर किताबें लिखते आएं हैं, प्लीज ऐसी किताबें लिखनी बंद करें। अब मीडिया खलनायक और खलनायकों का मीडिया जैसी किताबें लिखें जिससे की मीडिया की आनेवाली पीढ़ी इस बात की ट्रेनिंग पा सकें कि उन्हें इस धंधे में पैर जमाने के लिए अनिवार्यतः दलाल बनना है और या तो कार्पोरेट या फिर सरकार की गोद में कैसे बैठा जाए,ये कला सीखनी है? ऐसी किताबें  आलोक मेहता,राजदीप सरदेसाई,आशुतोष,विनोद दुआ और बेशक पंकज पचौरी लिखें तो ज्यादा प्रामाणिक होंगी।

डिस्क्लेमर- हमें इस पूरे प्रकरण में अफसोस नहीं है बल्कि एक हद तक खुशी है कि जो पंकज पचौरी स्क्रीन पर जिस दलाली भाषा का इस्तेमाल करते आए हैं, हम उसे सुनने से बच जाएंगे। ..और किसी तरह का आश्चर्य भी नहीं क्योंकि एनडीटीवी पर पिछले कुछ सालों से इससे अलग कुछ हो भी नहीं रहा है। एक तरह से कहें तो उन्होंने प्रणय राय के साथ भी किसी किस्म का धोखा नहीं किया है, जो काम वो अब तक अर्चना कॉम्प्लेक्स में बैठकर किया करते थे, अब उसके लिए मुनासिब जगह मुकर्रर हो गयी है।. रही बात भरोसे और लोगों के साथ विश्वासघात करने की तो इस दौर में सिर्फ मौके के साथ ही प्रतिबद्धता जाहिर की जा सकती है और किसी भी चीज के साथ नहीं।

लेखक विनीत कुमार रिसर्च स्कालर, ब्लागर और विश्लेषक हैं। उनका यह लिखा उनके ब्लाग हुंकार से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है।

आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में हराने वाले मिश्र दंपत्ति की भूमि हो रही है शैक्षिक तौर पर बंजर

कोशी नदी के प्रकोप से जन-मानस को मुक्ति दिलाएं,

शैक्षणिक धरोहर बचाने हेतु बिहार और बिहार से प्रवासित लोग आगे आयें” – नीना, भारती-मंडन विद्या केंद्र के विकास अभियान की प्रमुख

ऐसे हो रही है वेद की शिक्षा: खेत में बैठ कर पढ़ते बच्चे

आप मानें या ना मानें, लेकिन यह सत्य है कि जब आदि शंकराचार्य आज से लगभग 2466 वर्ष पहले धर्म, कर्म, वेद, ज्ञान के प्रचार-प्रसार हेतु विश्व भ्रमण पर निकले अपने उत्तराधिकारी की खोज में, तो  उन्हें सफलता मिली पाटलिपुत्र (अब पटना) से करीब 180 किलोमीटर दूर उत्तर बिहार के सहरसा स्थित महिषी गाँव में, मंडन मिश्र के रूप में।

यह भी कहा जाता है कि लगभग 10 किलीमीटर क्षेत्र में फैले बनगांव-महिषी इलाके में जगत जननी के अतिरिक्त माँ सरस्वती का भी आशीष रहा है। इस क्षेत्र में जहाँ प्रत्येक दस में से कम से कम पांच घरों में स्वतंत्र भारत के महान शिक्षाविद, भारतीय प्रशाशनिक सेवा के धनुर्धर, आयुर्विज्ञान क्षेत्र के महारथी उत्पन्न हुए वहीं आज भी यह परंपरा बरक़रार है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इन सपूतों का अपनी भूमि के प्रति उदासीन रवैया, स्थानीय लोगों की उपेक्षा, सरकारों की राजनितिक चालें और अन्य कारणों से लगभग एक लाख घरों वाले इस इलाके में दो माह तक चूल्हा भी “ठीक से” नहीं जल पाता है। शायद यह उग्रतारा शक्ति पीठ और मंडन मिश्र के रूप में ईश्वर और प्रकृति का प्रकोप है।

तंत्र-मंत्र में सिद्धता हासिल किये लोगों का मानना है कि जब तक बिहार के, खासकर उत्तर बिहार के कोशी क्षेत्र के लोगों की मानसिकता सहरसा के महिषी गाँव स्थित उग्रतारा शक्ति पीठ और महान दार्शनिक तथा आदि शंकराचार्य को लगभग परास्त कर कांची पीठ के द्वितीय शंकराचार्य का कार्य-भार सँभालने वाले मंडन मिश्र की जन्म भूमि को उन्नत करने की नहीं बनेगी, तब तक प्रकृति कोशी नदी के उत्पलावन के रूप में अपना प्रकोप दिखाती रहेगी और प्रत्येक वर्ष वहां के निवासियों को इस अभिशाप को झेलते रहना होगा।

वह स्थान जहाँ मंडन मिश्र और आदि शकाराचार्य के बीच शास्त्रार्थ हुआ था

बिहार के सहरसा स्थित महिषी गाँव (प्राचीन काल में इसे महिष्मा के नाम से जाना जाता था) में विश्व विख्यात दार्शनिक मंडन मिश्र का आविर्भाव हुआ था, साथ ही महामान्य आदि शंकराचार्य के पवित्र चरण भी पड़े थे। इस तथ्य की पुष्टि पुरातत्व वेत्ताओं और इतिहासकारों द्वारा की जा चुकी है। इसी स्थल पर जगत जननी उग्र तारा का प्राचीन मंदिर भी अवस्थित है और इसे “सिद्धता” भी प्राप्त है। यह भी उल्लेख मिलता है कि शिव तांडव में सती कि बायीं आँख इसी स्थान पर गिरी थी, जहाँ अक्षोभ्य ऋषि सहित नील सरस्वती तथा एक जाता भगवती के साथ महिमामयी उग्रतारा की मूर्ति भी विराजमान है।

पौराणिक आख्यानों की मानें तो जब भगवान शिव महामाया सती का शव लेकर विक्षिप्त अवस्था में ब्रह्मांड का विचरण कर रहे थे सती की नाभि महिषी गाँव में गिरी थी। मुनि वशिष्ठ ने उस जगह माँ उग्रतारा पीठ की स्थापना की। इसीलिए यह मंदिर सिद्ध पीठ और तंत्र साधना का केंद्र है। इस मंदिर से सौ कदम दूर लगभग दो एकड़ की एक वीरान भूमि है जहाँ पैर रखते ही एक अदृश्य आकर्षण आज भी होता है, इसी स्थान पर उस महापुरुष मंडन मिश्र का जन्म हुआ था जिनकी पत्नी भारती ने अपने पति के स्वाविमान, उनकी विद्वता और मानव कल्याण की भावना को किसी भी तरह के अधात से बताल , आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।

इस पराजय के पश्च्यात आदि शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को अपना उत्तराधिकारी बनाया जो साठ  वर्षों तक द्वितीय शंकराचार्य के रूप में विख्यात हुए। यह घटना आज से लगभग 2400 वर्ष पूर्व की है और तब से लेकर अब तक सत्तर शकाराचार्य हो चुके हैं। अतीत में और पीछे जाएँ तो पाते हैं कि मुनि वशिष्ठ ने हिमालय की तराई तिब्बत में उग्रतारा विद्या की महासिद्धी के बाद धेमुड़ा (धर्ममूला) नदी के किनारे स्थित महिष्मति (वर्तमान महिषी) में माँ उग्रतारा की मूर्ति स्थापित की थी। किंवदंतियां यह भी है कि निरंतर शास्त्रार्थ के कारण यहाँ के तोते और अन्य पक्षी भी शास्त्र की बातें करते थे।

यह मंदिर एक सिद्ध तांत्रिक स्थल है जहाँ साधना करने हेतु दूर दूर से साधू समाज का आगमन होता रहा है। बौद्ध ग्रन्थ में दिए गए विवरण के अनुसार महात्मा बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्ति के बाद अपनी ज्ञान यात्रा प्रारंभ की तो उनके चरण यहाँ भी पड़े थे। उस काल में इस स्थल का नाम “आपण निगम” था। बाद में यहाँ एक अध्यन केंद्र की स्थापना की गई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत पुरातत्व विभाग द्वारा जो खुदाई की गई तो बोधिसत्वों की सैकड़ों मूर्तिया भूगर्भ से निकलीं जो आज राज्य और राष्ट्र  के विभिन्न संग्रहालयों में रखी हैं। यहाँ की मूर्तियां इतनी महत्वपूर्ण मानी गईं कि इन्हें फ़्रांस और ब्रिटेन में संपन्न भारत महोत्सवों में भी ले जाया गया था।

उग्र तारा माता मंदिर न्यास के उपाध्यक्ष प्रमिल कुमार मिश्र का कहना है कि चूंकि मंदिर बौद्ध मतावलंबियो से भी जुड़ा है इसलिए इस मंदिर को बौद्ध देशों, खासकर चीन, श्रीलंका, जापान व थाइलैंड से संपर्क कर मंदिर के जीर्णोद्धार की योजना तैयार की जा रही है।  बताया जाता है कि 16वीं शताब्दी में दरभंगा महाराज की पुत्रवधू रानी पद्मावती ने वास्तु स्थापत्य कला की उत्कृष्ट शैली से महिषी में तारा स्थान मंदिर का निर्माण कराया था।

प्राचीन काल से ही उग्रतारा स्थान धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हेतु भारत, नेपाल के श्रद्धालुओं और साधकों का आकर्षण केन्द्र और तपोभूमि रही है। असाधारण काले पत्थरों से बनी सजीव, अलौकिक प्रतीत होती भगवती उग्रतारा की प्रतिमा में ऐश्वर्य, वैभव की पूर्णता, पराकाष्ठा और करुणा बरसाती ममतामयी वात्सल्य रूप की झलक मिलती है। उपासकों को भगवती उग्रतारा की प्रतिमा की भाव-भंगिमा में सुबह बालिका, दोपहर युवती और संध्या समय वृद्ध रूप का आभास होता है। पौराणिक शास्त्रानुसार वशिष्ठ मुनि ने महाचीन देश, तिब्बत में भगवती उग्रतारा की घनघोर तपस्या की थी। वशिष्ठ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती उग्रतारा जिस रूप में प्रकट हुई थी उसी रूप में वह वशिष्ठ के साथ महिषी आई और यहां उसी रूप में पत्थर में रूपान्तरित हो गयी। उग्रतारा स्थान देश के तीन प्रमुख तारा मंदिरों में से एक है।

प्रोफ़ेसर रमेश ठाकुर का कहना है कुछ वेद और कर्मकांड में महारथ हासिल किये लोगों के सहयोग से सन 1993 से भारती-मंडन वेद विद्या केंद्र नामक संस्था की स्थापना की गई जिसे बाद में कांची कामकोटि पीठं सेवा ट्रस्ट संचालित करने लगी। इस विद्यालय के पास एक एकड़ जमीन भी है जिसे कांची कामकोटि पीठं सेवा ट्रस्ट को 99 वर्षों के लिए लीज पर दिया गया है। सन् 1998 से 2006 तक कांची कामकोटि पीठं सेवा ट्रस्ट ने प्रति माह 5000 रुपये इस विद्यालय के संचालन के लिए भेजती थी जो बाद में 10,000 रुपये हो गई। आज भी इसी वजह से इसे आर्थिक सहायता मिलती है ताकि बच्चों को वेद और कर्मकांड की शिक्षा से जोड़े रखा जा सके।

इसी विद्यालय पर है वेद शिक्षा का दायित्व?: टीन शेड में भारती-मंडन वेद विद्या केंद्र

इस विद्यालय में लगभग 300 छात्र हैं जिन्हें विद्यालय के शिक्षक भोजन और वस्त्र की सुविधा उसी 10,000 की राशि में से प्रदान करते हैं। अनुसंशा के आधार पर उत्तीर्णता प्राप्त छात्रों को प्रतिमाह छात्रवृति भी दी जाती है ताकि बच्चे इस विद्यालय की ओर उन्मुख हों और वेद, कर्म-कांड, धर्म-शास्त्र आदि की धूमिल पड़ती छवि को बचाया जा सके। वर्तमान में मंडल मिश्र की कृतियों पर कई अमेरिकी और ब्रिटिश विद्वानों ने रिसर्च कर रहे हैं।

भारती-मंडन वेद विद्या केंद्र के अध्यक्ष शोभाकांत ठाकुर का कहना है यहाँ संस्कृत विद्या की प्रसिद्द पाठशाला यहाँ चला करती थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत यहाँ बिहार सरकार ने राजकीय संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। बाद में यहाँ संस्कृत महाविद्यालय की भी स्थापना हुई। इन दोनों संस्थानों में वैसे तो वेद विद्या के अध्यापन का प्रावधान भी था, लेकिन सरकारी उपेक्षा के कारण इसकी कमी पूरी नहीं हो सकी। ये दोनों शिक्षण संस्थान पिछले दस वर्षों से बंद पड़े हैं।

बहरहाल, भारती-मंडन वेद विद्या केंद्र के प्रचूर विकास व प्रचार-प्रसार हेतु दिल्ली की संस्था “आन्दोलन:एक पुस्तक से” विश्व के कोने कोने में बसे बिहार के लोगों से अपील कर रही है कि वे अपनी शैक्षणिक धरोहर को बचाने हेतु आगे आयें। इस आन्दोलन की प्रमुख श्रीमती नीना, जो लगभग एक सप्ताह तक इस परिसर के विकास हेतु महिषी गाँव में विराजमान थीं, ने मीडिया दरबार को बताया कि वे भारत सरकार से, और विशेषकर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिबल से आग्रह कर रहीं हैं कि इस भूमि को “राष्ट्रीय धरोहर” के रूप में घोषित किया जाए। इसके साथ ही, वेद, कर्मकांड और धर्म शास्त्र के विकास हेतु और बिहार की पुरानी शैक्षणिक गरिमा को बहाल करने के लिए केंद्रीय कोष से राशि का सीधा आवंटन करे। वैसे, यह संस्था, अपने स्तर से इसके विकास के लिए प्रतिबद्ध है जिसके मंडन मिश्र के जन्म दिन (8 जुलाई) तक पूरे हो जाने की सम्भावना है।

श्रीमती नीना के मुताबिक, “वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में बिहार में वेद ज्ञाताओं और कर्म काण्ड करने वाले लोगों का भयंकर अभाव हो जाएगा और इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि परिणाम स्वरुप हम सभी अपने परिजनों की लाशों को दरवाजे पर रखे रहेंगे और उसका अंतिम संस्कार कराने वाला कोई भी ज्ञानी पुरुष तक नहीं मिलेगा। आइए, हमारा साथ दें, इस ज्ञान के धरोहर को बचाने में।”

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On Linkedin