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आत्म-हत्या, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था: किसको सुनाएँ हाले दिल Suicide: Part-4

By   /  May 9, 2012  /  बहस  /  5 Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..आज भी खाकी वर्दी, काला कोट और कचहरी की दीवारों को देखते ही लोगों की सांसें फूलने लगती हैं, रक्त-चाप बढ़ जाता है, पैंसठ सालों में भी लोगों का विश्वास क्यों नहीं जीत पाई ये संस्थाएं? भारत के गाँवों में एक कहावत बहुत ही प्रसिद्द है और शहरी बाबू भी […]


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छात्र-छात्राओं द्वारा पंखे से लटककर जीवन समाप्त करने की बढती दर – Suicide: Part- 2

By   /  May 7, 2012  /  बहस  /  Comments Off on छात्र-छात्राओं द्वारा पंखे से लटककर जीवन समाप्त करने की बढती दर – Suicide: Part- 2

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें.. अभिभावकों से अनुरोध  बच्चों के परीक्षा-दवाव को ‘मित्र-वत’ बाटें  : चार साल में नौ हज़ार से अधिक जाने गयीं, पंखे से लटककर जीवन-अंत करने की प्रथा छात्र-छात्राओं में अधिक प्रचलित मेरा मानना है: जिस तरह एक्स्केलेटर अधिक भार को उठाने में अपनी असमर्थता दिखाता है और एक अलार्म के साथ उपभोक्ताओं को […]


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अभिभावक, बच्चे और आत्म-हत्याएं : आपकी ‘व्यस्तता’ कहीं उनकी हताशा का कारण न बन जाए Suicide: Part-1

By   /  May 5, 2012  /  शिक्षा  /  2 Comments

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इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..-शिवनाथ झा- दाना सिल्वा संगमा नहीं रही, रिचर्ड लोइतम ने भी संदेहास्पद स्थिति में दम तोड़ दिया, समितन सेठिया ने  भी मृत्यु को गले लगाना पसंद किया. क्यों कर रहे हैं भारतीय बच्चे आत्म-हत्याएं? कौन है दोषी? माता-पिता या परिवार का वातावरण या शैक्षणिक संस्थाएं या शिक्षक या […]


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