आंदोलन के विरोध में खड़े दलित नेता आए बैकफुट पर: बसपा सुप्रीमो ने अन्ना को दिया समर्थन

फेसबुक के जरिए छेड़ रखा था विरोध का स्वर!
दलित नेता का ताज पहनने से पहले ही पहनना होगा कांटों का ताज!!

– अनूप गुप्ता ।।

मौसम का मिजाज हो या फिर सियासत का बदलना दोनों एक ही सिक्के के पहलू है। अन्ना के आंदोलन को लेकर सियासत का पारा गर्म हो चुका है। ऐसे में राजनेता बहती गंगा में हाथ धोने से पीछे नहीं हटेंगे। मौके की नजाकत को देखते हुए वे अन्ना के सुर में सुर मिलाते नजर आयेंगे। कल तक जो दलित समाज अन्ना के आंदोलन के विरोध में राजधानी की सड़कों पर हो-हंगामा मचा रहा था, आज दलित समाज की मुखिया ने ही अन्ना हजारे के भ्रष्टतंत्र के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई को समर्थन दे दिया है।
ऐसे में उन दलित नेताओं के भविष्य का क्या होगा, जो कि आज औधे मुंहे गिर पड़े है।

जहां आज पूरा देश भ्रष्टतंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर संघर्ष की लड़ाई लड़ने का बिगुल फूंक डाला है। ऐसे आंदोलन को गलत ठहराकर अपनी सियासी रोटी सेंक रहे दलित नेता बैकफुट पर आ गये है। बसपा सुप्रीमो ने सत्ता की गलियारे में मची हलचल को भांपते हुए अपने तरकश से तीर आखिरकार छोड़ ही डाला। इससे पहले दलित नेताओं द्वारा चलाए जा रहे विरोध अभियान पर मायावती की चुप्पी साफ यही दर्शाती है कि उनको इस बात का अंदाजा नहीं था कि 65 वीं स्वतंत्रता दिवस के अगले दिन के बाद से ही देश की तस्वीर बदली-बदली नज़र आएगी। हजारे के साथ हजार ही नहीं बल्कि करोड़ों हाथ उठ खड़े होंगे।
आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे अन्ना को आज यूपी मुख्यमंत्री मायावती ने समर्थन दे दिया। मायावती के इस फैसले से दलित समाज भी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन में दलित समुदाय के लोग अब तक शामिल नहीं थे। लेकिन आज भी दलित समाज में ऐसे लोग की मौजूदगी दर्ज है, जो केवल इशारों पर चलना ही बेहतर समझते है। सबसे बड़ा संकट तो अब पैदा हो गया है जो कल तक दलित समुदाय से  जुड़े कुछ लोगों ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक पर अन्ना हजारे के आंदोलन के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था। वे अब करें तो क्या करें। दलित नेता बनने का सपना उनका धरा का धरा ही रह गया। उनका साफ कहना था कि हमें रोटी, कपड़ा व मकान चाहिए न कि कोई लोकपाल। लोकपाल बिल से हमें कोई लेना-देना नहीं है, इससे हमारा पेट नहीं भरेगा। आज देश में भ्रष्टतंत्र की जड़े इतनी मजबूत हो चुकी है कि विकास की चाल कच्छप से भी धीमी है। उनको यह याद दिलाना होगा कि जब देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा तभी विकास की रफ्तार आगे बढ़ेगी। अन्ना आज जिस जन लोकपाल बिल की मांग कर रहे है, वो भ्रष्टाचार को कम करने के लिए ही हो रहा है। ऐसे में सियासत चमकाने  को लेकर आमजन को बेवकूफ बनाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर ही है।

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