Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

नई दिल्‍लीः सौ बरस के सफर की कुछ झलकियां

By   /  August 14, 2011  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

– नलिन चौहान ।।

तीसरे दिल्ली दरबार का एक ऐतिहासिक चित्र

किसी भी भारतीय को यह जानकर हैरानी होगी कि आज की नई दिल्ली किसी परंपरा के अनुसार अथवा स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेताओं की वजह से नहीं, बल्कि एक सौ साल (1911) पहले आयोजित तीसरे दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा के कारण देश की राजधानी बनी…

लॉर्ड हॉर्डिंग ने लिखा है कि अपने समृद्ध प्राचीन इतिहास के बावजूद जिस समय दिल्ली को राजधानी बनने का मौक़ा दिया गया, उस समय वह किसी भी लिहाज़ से एक प्रांतीय शहर से ज़्यादा नहीं थी। लॉर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन की घोषणा (1903) के बाद से ही इसका विरोध कर रहे और एकीकरण की मांग को लेकर आंदोलनरत बंगालियों की तरह दिल्ली वालों ने कोई मांग नहीं रखी और न कोई आंदोलन छेड़ा। किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा से हर कोई हैरान था, क्योंकि यह पूरी तरह गोपनीय रखी गई थी।

उनकी भारत यात्रा के छह महीने पहले ही ब्रिटिश भारत की राजधानी के स्थानांतरण का निर्णय हो चुका था। इंग्लैंड और भारत में दर्जन भर व्यक्ति ही इससे वाक़ि़फ थे. राजा की घोषणा के समानांतर बांटे गए गजट और समाचार पत्रकों को भी पूरी गोपनीयता के साथ छापा गया…  

सात दिसंबर, 1911 को ब्रिटेन के राजा और रानी (जार्ज पंचम और क्वीन मेरी) दिल्ली पहुंचे। शाही दंपत्ति को एक जुलूस की शक्ल में शहर की गलियों से होते हुए विशेष रूप से लगाए गए शिविरों के शहर (किंग्सवे कैंप) में गाजे-बाजे के साथ पहुंचाया गया…

किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी ने किंग्सवे कैंप में आयोजित दिल्ली दरबार में 15 दिसंबर, 1911 को नई दिल्ली शहर की नींव के पत्थर रखे। बाद में इन पत्थरों को नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के पास स्थानांतरित कर दिया गया और 31 जुलाई, 1915 को अलग-अलग कक्षों में रख दिया गया। स्थापना दिवस समारोह में लॉर्ड हार्डिंग ने कहा कि दिल्ली के इर्द-गिर्द अनेक राजधानियों का उद्घाटन हुआ है, पर किसी से भी भविष्य में अधिक स्थायित्व अथवा अधिक ख़ुशहाली की संभावना नहीं दिखती…

अंग्रेज सत्रह सौ सत्तावन से कलकत्ते में राज करते रहे, लेकिन दिल्ली राजधानी बनाने के महज छत्तीस साल बाद ही उनके विश्वव्यापी साम्राज्य का सूरज डूब गया।

नलिन चौहान

 

(नलिन चौहान दिल्ली सरकार के सूचना-प्रसार विभाग में डिप्टी डायरेक्टर पद पर तैनात हैं। आईआईएमसी से पत्रकारिता का डिप्लोमा प्राप्त नलिन ने दिल्ली के राजधानी बनने के सौ साल पर प्रकाश डाला है चौथी दुनिया में प्रकाशित अपने लेख में। यहां हमने उनके मूल लेख से कुछ झलकियां उनसे साभार प्रकाशित की हैं।)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Raj Kumar Yadav says:

    कमाल की जानकारी दी है नलिन जी आपने.. कोई किताब लिखिए इस पर।

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

क्या मोदी को चुनाव के पहले ही जाना पड़ सकता है ?

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: