”आगे से कभी ऐसे आन्दोलन की कवरेज नहीं करूंगी, चाहे नौकरी क्यों न छोड़नी पड़े…”

कभी तिहाड़ जेल तो कभी रामलीला मैदान.. अन्ना के आंदोलन पर रिपोर्टिंग और पल-पल की ख़बरें जुटाने के लिए तैनात रहे पत्रकारों के लिए यह अनुभव थोडा अलग रहा। हालांकि मीडिया, खासकर खबरिया चैनलों ने इन तेरह दिनों में अपनी दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी टीआरपी में जमकर व्यवसाय किया, लेकिन  किसी मीडिया इवेंट की तरह तैयारी कर की गई कवरेज में मीडियाकर्मियों के लिए मिले-जुले अनुभव रहे।

पत्रकार स्मृति के मुताबिक कई समर्थक सिर्फ हुड़दंग मचाते हैं और अश्लील टिप्पणियां करते हैं।

आम लोगों को चाहे ऐसा लगे कि पत्रकार होने की वजह से अन्ना हज़ारे के आंदोलन को नज़दीक से देख पाना एक बेहतरीन अवसर है, लेकिन इनके मुताबिक ये अनुभव खट्टा ज़्यादा और मीठा कम है। रामलीला मैदान में बीबीसी के पत्रकार ने कवरेज में जुटी महिला पत्रकारों के दुख-दर्द पर एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें कईयों ने साफ कहा कि अगर ऐसा आंदोलन दोबारा हुआ तो वे इसे कवर करने कभी नहीं जाएंगी। जरा सुनिए बीबीसी के पत्रकार की आपबीतीः

स्कूली बच्चे: अन्ना के नाम पर हुड़दंग?

मधुलिका एक समाचार एजेंसी में काम करती हैं. वो मुझसे बात करना शुरू करती हैं तो अचानक कई लड़के हमें घेर लेते हैं. हम उस भीड़ से बाहर निकलकर एक कोने में जाते हैं तो वो आराम से बात कर पाती हैं। मधुलिका के मुताबिक एक महिला के पत्रकारिता का हिस्सा बनते ही ये मान लिया जाता है कि वो बद्तमीज़ी से निपटने को तैयार है। ऐसे में अक़्सर ये समझाना मुश्किल हो जाता है कि भीड़ एक महिला पत्रकार को कैसे परेशान करती है। रामलीला मैदान में चल रहे आंदोलन पर वो कहती हैं, “यहां जैसे स्कूली बच्चे और युवाओं की तादाद बढ़ती जा रही है, वो नारेबाज़ी करने, महिलाओं को देखने, बेरोकटोक उनकी तस्वीरें खींचने के लिए आ रहे हैं, जैसा करने की छूट वो सड़कों पर महसूस करते हैं.”

स्मृति एक टेलिविज़न समाचार चैनल में काम करती हैं, यानि दिन या रात किसी भी समय काम हो सकता है। लेकिन उनका मानना है कि रात के समय रामलीला मैदान में शराब पीकर लोग जमा हो जाते हैं और ऐसे में महिला पत्रकार किसी हाल में यहां काम नहीं कर सकतीं। हालांकि दिन में काम करने के भी उनके बहुत सुखद अनुभव नहीं हैं। स्मृति बताती हैं, “पहले तो यहां जुटे लोगों को देखकर लगता था कि सभी समर्थक हैं, पर अब जो लड़के यहां इकट्ठा होते हैं उनसे बात करो तो ना उन्हें आंदोलन के बारे में, ना अन्ना के बारे में ही कोई जानकारी होती है।”

एक और टेलिविज़न समाचार चैनल में काम करने वाली सरोज कहती हैं कि उन्हें अनशन के नवें दिन जब रात के समय रामलील मैदान आना पड़ा तो वो अचानक जनता के बीच घिर गईं। उन्होंने फोन कर अपने दफ़्तर में कहा कि अब वो वहां नहीं ठहर पाएंगी। सरोज ने कहा, “उस वक्त को मैं सचमुच डर गई थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था, शराब की बदबू और ढेर सारे लोग, आख़िरकार एक पुरुष सहयोगी को बुलाया तो उनकी मदद से ही मैं मैदान से सुरक्षित निकल पाई।”

अनु कहती हैं, “यहां अब मेला सा लगा है, जैसा इन लोगों का आचरण हैं, ये लोग नहीं समझते कि ये बर्ताव इस आंदोलन को ही नुकसान पहुंचाएगा।”
अनु के मुताबिक माहौल बदल गया है, पहले जगह छोटी थी, और सब आराम से भजन और संगीत के ज़रिए अपनी बात रखते थे, लेकिन अब इस बड़े मैदान में विशेष तौर पर कुछ लोगों के ख़िलाफ या अन्ना के समर्थन में ही सही, पर ग़लत तरीके से नारे लगाए जा रहे हैं।

जन्तर-मन्तर की छवि ने अनु के मन में एक अलग ही उम्मीद जगाई थी, पर प्रदर्शन के इस बदलते स्वरूप ने उन्हें निराश किया है। रामलीला मैदान में भद्दे नारों और बद्तमीज़ लड़कों से कई बार रूबरू मैं भी हुई और अनु के आकलन को समझ सकती हूं। एक रात कुछ मोटर साइकिल सवार लड़कों ने पुलिस के साथ मार-पीट भी की. इससे पहले एक पुरुष पत्रकार के साथ भी कुछ समर्थकों ने मार-पीट की थी। अन्ना के अहिंसक घोषित किए गए इस आंदोलन से निबटने के लिए पुलिस को निहत्थे रहने की ताकीद की गई थी इसीलिए हमलावर मोटरसाइकिल सवार उनसे आराम से बदतमीजी कर चले गए।

आंदोलन से आकर्षित होने वाले लोगों की संख्या के साथ-साथ उसका स्वरूप बदला है ये समझ बढ़ रही है। ज़ाहिर है इससे अन्ना के समर्थकों के बीच पत्रकारिता, महिलाओं और पुरुषों के लिए भी और चुनौतीपूर्ण प्रतीत हो रही है।

दिव्या आर्य

(पोस्ट बीबीसीहिन्दी.कॉम में प्रकाशित खबर पर आधारित। यह रिपोर्ट बीबीसी की दिल्ली संवाददाता दिव्या आर्य ने  26 अगस्त को पब्लिश किया  था)

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