अनशन से नहीं, जाति व्यवस्था मिटाने से होगा भ्रष्टाचार का खात्मा -उदित राज

जिस तरह मीडिया ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अनशन को दिखाया, उससे बहुत लोगों को अपनी पहले की सोच पर या तो शक हुआ होगा, या ऐसा भी लगा होगा कि मीडिया ने सच बताया। आमतौर पर साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, लेकिन इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि वह जो सोचता है, वही समाज सोचे। चूंकि भ्रष्टाचार एवं महंगाई का मुद्दा इतना ज्वलंत हो उठा था कि लोग इस आंदोलन से जुड़ते गए। वरना नवंबर 2010 में जब अन्ना हजारे ने इसी मुद्दे पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया, तो मुश्किल से 100 लोग इकट्ठा हुए थे।

इस आंदोलन को मिले अपार समर्थन के पीछे सबसे बड़ी भूमिका मीडिया की थी। मीडिया ने पहली बार इस तरह संघर्ष किया। टीवी चैनल ने स्कूलों, गली-मुहल्लों, चौराहों और कार्यालय तक पहुंचकर लोगों से इसके बारे में बात की। जब हजारों लोगों के बयान एवं चेहरे चैनलों पर दिखे, तो वे स्वयं को इससे जुड़ा महसूस करने लगे। क्योंकि शोहरत इनसान की कमजोरी होती है।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अभियान चला रखा है कि संविधान में सैंकड़ों पेच हैं, अत: इसे बदलना चाहिए। दबी जुबान से मध्यवर्ग के कुछ सवर्ण सोचते एवं कहते भी हैं कि देश को ठीक करने के लिए संविधान को बदलना चाहिए, जबकि बदलना उन्हीं को चाहिए। अमेरिका का संविधान 200 वर्षों से ज्यादा पुराना है और उसमें संशोधन भी बहुत कम हुए हैं, फिर भी वहां की राजनीतिक व्यवस्था कितनी मजबूत है। दरअसल लोगों की नीयत अगर ठीक नहीं हो, तो संविधान बदलने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इस आंदोलन में नौजवानों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। यदि यही नौजवान, जब 2008 में महंगाई एवं भ्रष्टाचार बढ़ने लगे थे, उठ खड़े होते, तो आज यह दिन देखने को न मिलता।

अन्ना पर मीडिया की बेहिसाब मेहरबानी एक बड़ा वर्ग हैरान था

भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में असत्य बोलना या सत्य को न दिखाना या एक पक्ष को बढ़ा-चढ़ाकर बताना या दिखाना और दूसरे पक्ष को पूरी तरह से नजरंदाज करना, क्या भ्रष्टाचार नहीं है? कुछ चैनल जोर-जोर से कह रहे थे कि पूरा देश अन्ना हजारे के साथ है। अगर ऐसी बात है, तो भला अनशन करने की जरूरत ही क्या थी? चुनाव लड़कर अपनी संसद बनाते और उसमें जन लोकपाल बिल आसानी से पास हो जाता। अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों ने अखिल भारतीय परिसंघ एवं अन्य संगठनों के माध्यम से 24 अगस्त को इंडिया गेट पर एक रैली का आयोजन कर पूछा कि क्या इस देश में दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक नहीं रहते? अगर रहते हैं, तो अन्ना हजारे की टीम में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व कहां है? अन्ना हजारे के आंदोलन की रीढ़ मध्यवर्ग है, जो स्वयं कुछ करता नहीं और मतदान करने भी बहुत कम जाता है। 24 अगस्त की रैली को टीवी मीडिया ने पूरी तरह से नजरंदाज किया, क्या यह सच को छुपाना नहीं है? अगर इस प्रवृत्ति से नहीं बचा गया, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए आंदोलन को ही नुकसान पहुंचेगा। जयप्रकाश का आंदोलन इसलिए सफल था, क्योंकि उसकी रीढ़ में नौजवान और पिछड़ा वर्ग ही था।

पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की सिविल सोसाइटी ने प्रधानमंत्री और संसद की स्थायी समिति को बहुजन लोकपाल बिल का मसौदा सौंपा है, जिसमें उन तथ्यों और मांगों को भी रखा गया है, जो अन्ना टीम के बिल में शामिल नहीं हैं। यह भी सवाल खड़ा किया गया कि क्या लोकपाल भ्रष्ट नहीं हो सकता? लोकपाल और कमेटी में किन-किन वर्गों के लोग होंगे-यह न तो सरकारी बिल में और न ही जन लोकपाल बिल में है। इसलिए नौकरियों में दलितों- पिछड़ों के आरक्षण की तरह लोकपाल समिति में भी उनके प्रतिनिधित्व की मांग बहुजन लोकपाल बिल में की गई है।

सामाजिक क्रांति के बिना राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार मिटाने की बात बेमानी होगी। जाति व्यवस्था भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है। इस पर चोट किए बिना भ्रष्टाचार से निजात संभव नहीं है। समाज को दिशा देनेवाली मीडिया अगर वह कुछ लोगों को समाज मानकर उससे प्रभावित होने लगे, तो इसे सही नहीं कहा जा सकता।

लेखक इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष हैं।

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