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इस गांधी की नाक कटेगी.?

By   /  January 26, 2020  /  No Comments

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-कश्यप किशोर मिश्र।।

इकतारा या सारंगी लिए नाथ सम्प्रदाय के जोगी भिक्षाटन को निकलते तो भीख मांगते भीख में फटे पुराने कपड़े भी मांगते थे।

गुरु गोरखनाथ के ये जोगी उन गूदड़ो को सलीके से कई तह में रखकर सिलते जाते और उनसे कथरी जिसे गुदड़ी भी कहते बना लेते। गुरू गोरखनाथ के ये जोगी इन कथरियों को सिर्फ खुद के लिए नहीं सिलते थे। कड़कड़ाती रातों में ठिठुरते किसी परिवार को तो कभी किसी दीन हीन को तो कभी किसी संगी को किसी महात्मा को ये कथरियां उढ़ाकर वो खामोशी से आगे बढ़ जाते थे। ऐसा करते उनके चेहरे संतोष से भर जाते। होठों पर मुस्कुराहट हुआ करती थी। जाड़ों की कंपाती रातों में गरमाहट भरी गहरी नींद का सुख उन जोगियों से बेहतर कौन समझता होगा? इस सुख को बांट उनके चेहरे खिलखिलाहट से भर उठते थे।

आजादी की लड़ाई के दौरान, एक आंदोलन के बेहद व्यस्त दौर में एक सुबह बापू नित्य की भांति टहलने निकले। टहलते बापू के साथ अड़ोस पड़ोस के बच्चे भी टहलने निकल जाते जिनसे बापू ठिठोली करते इधर-उधर की बातें करते। साथ टहल रहे एक बच्चे की आंखों में नींद देख बापू ने उससे पूछा “क्या हुआ? रात सोया नहीं क्या?” लड़के नें जवाब दिया “बापू! इतनी ठंड है, पूरी रात कांपते गुजरी, रजाई है, नहीं। नींद पूरी कैसे हो!”

बापू टहलकर वापस आये और पुराने रद्दी कागज और अखबारों को इकट्ठा किया। उनकी खूब अच्छी तरह धुनाई कर दी जिससे वो रेशेदार हो जाए उनमें कुछ गूदड़ मिला कर खादी कपड़े का लिहाफ बना उसमें उसे भरा और धागे से ताग डाला।

यह सब करते चार बज गये। बापू नें अपनी बनाई वह रजाई ली और उस बच्चे को दे आये।

अगली सुबह बापू टहलने निकले। वो बच्चा भागता भागता बापू के पास आया। “बापू! खूब गहरी नींद आई! वो रजाई खूब गर्म करती है!” बापू खिलखिला कर हंस पड़े।

गोरखनाथ के जोगी इस मुल्क की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं जबकि बापू इस मुल्क की सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत के मिले जुले प्रतीक हैं। इस मुल्क की राजनीतिक तहज़ीब को दर्शाता एक किस्सा चंचल दा सुनाते हैं : चंचल दा गुजरे वक्त की एक प्रखर समाजवादी राजनीतिक आवाज और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे हैं।

चंचल दा बताते हैं बात आपातकाल के बाद की है। जनता सरकार में राजनारायण मंत्री बन गए थे और विधानसभा चुनाव के दौरान हरियाणा के प्रभारी थे। टिकट के लिए लोग आते मिलते रहते थे। एक दिन हरियाणा का एक जाट आया और सीधे नेता जी से मुखातिब हुआ

” – नेता ! हमे एक टिकट दे दो , हम चुनाव लड़ेंगे ।

  • टिकट ? कैसा टिकट जी ? कौन हो तुम ?
  • हम हरियाणा का है, सोशलिस्ट हैं हमको विधानसभा का टिकट दे दो ।
  • हम टिकट नही देंगे
  • हम यहीं अनसन करेंगे
  • करो!” वो भीड़ चीरते हुए उठा और डॉक्टर लोहिया जिंदाबाद! राजनारायण मुर्दाबाद! करते लान में बैठ गया ।

हर दस मिनट के अंतराल पर डाक्टर लोहिया जिंदाबाद! राजनारायण मुर्दाबाद! करता रहता। राजनारायण को देखता तो और जोर से नारा लगाता। सारे दिन उसके गिर्द मजमा जुटा रहा।

रात हुई! मौसम गर्मियों का था, चादर पर सो रहा , सुबह फिर अनशन शुरू फिर वही नारेबाजी डॉक्टर लोहिया जिंदाबाद – राजनारायण मुर्दाबाद!

सुबह राजनारायण सोकर उठे और उसके पास आकर खड़े हो गये । अपने सचिव माहेश्वरी जी को बुलाया और लगे हड़काने – “बहुत नामाकूल इंसान हो तुम लोग । देख रहे हो यह अनसन पर है । एक तंबू , दरी , घड़ा , ग्लास , नीबू , अभी सब इंतजाम करो । कह कर वह वापस चल दिए। जाट नें फिर वही नारा लगाया डॉक्टर लोहिया जिंदाबाद – राजनारायण मुर्दाबाद ।

दोपहर बाद मनीराम बागड़ी आये । उनकी सिफारिश पर उसको टिकट मिला । अब उसने नारा लगाया “डॉक्टर लोहिया जिंदाबाद – मनीराम बागड़ी जिंदाबाद!”

मछन्दरनाथ गोरखनाथ के गुरु थे। एक वक्त ऐसा आया वो अपने भाव को भूल रास-रंग के फंदे में जा पड़े। अब मछन्दरनाथ ऐसे सिद्ध को कौन राह दिखाये? कौन समझाये?

हमेशा गुरु शिष्य को राह दिखाया करता है पर मछन्दरनाथ को उनकी भूली राह दिखाने शिष्य गोरखनाथ निकल पड़ा। मछन्दरनाथ के महल के चारो ओर वह भिक्षाटन करते अपने इकतारे पर गाता जाता “जाग मछन्दर गोरख आया!”

मछन्दरनाथ जाग पड़े! अपनी भूल समझ आई। बिना कुछ कहे महल से निकले और अपने शिष्य गोरखनाथ के पीछे-पीछे चल पड़े।

बात सन 1920-21 के दरम्यान की है। बापू बारदोली में थे। एकाएक इस बात की चर्चा फैल गई कि एक काबुली पठान बापू के बारे में जानकारी जुटाने में लगा है। उसके इरादे ठीक नहीं जान पड़ते थे। एक रात वह बापू के शिविर की बाड़ लांघकर भीतर आने की कोशिश कर रहा था तो पहरेदार नें उसे रोका।

वह अक्सर बापू का पीछा करता रहता। एक दोपहर वह बाड़ के बाहर खड़ा बापू को घूरे जा रहा था। बापू ने उसे देखा हाथ के इशारे करीब बुला लिया। बापू नें उसके यूं मंडराते रहने की वजह पूछी।

-हम तुम्हारा नाक काटेगा!
-क्यों भाई, ऐसा मैंने कौन-सा काम कर दिया?
-तुम अहिंसा अहिंसा करता रहता है, हम देखेगा तुम्हारा नाक काटने पर तुम अहिंसा करता है कि हिंसा!

बापू खिलखिलाकर हंसने लगे “भाई! सिर्फ नाक काट कर क्या होगा? तुम मेरा सिर काट ले जाओ! यकीन रखो मैं या यहां मौजूद कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा।”
उसे आश्वासन देकर बापू अपना काम करने लगे। वह वहां देर तक खड़ा रहा, खामोश! और चला गया।

लखनऊ में घंटाघर पर महिलाएं डटी थीं। सरकार की नीतियों से असहमत। अपने लिए खाना पानी रजाई गद्दों के साथ।

गांधी नें इस मुल्क की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के तार लोकशाही की शांतिपूर्ण आवाज के ताने-बाने में बुने हैं। लखनऊ में सरकार का मुखिया गुरु गोरखनाथ का एक जोगी है। एक जोगी जिसकी सांस्कृतिक तहज़ीब जाड़ों में भीख मांगकर जुटाए कपड़ों से कथरी गुदरी बना कर ओढ़ा देने की रही है और राजनीतिक विरासत नें सिखाया है कि अपने विरोधियों को भी अपने विरोध में अनशन करने पर पानी दरी तंबू तिरपाल का इंतजाम कर दो।

यह विचारों का संक्रमण काल है कि गुरू गोरखनाथ के एक जोगी की सरकार में पुलिस घंटाघर में अनशन पर बैठी महिलाओं के लिए रखा पानी फेंक देती है और कड़कड़ाती ठंड में उनकी रजाईया गद्दे छीन लेती है।

अब आम अवाम के लिए जरूरी है कि वह गोरखनाथ का इकतारा लेकर जाग मछन्दर गोरख आया की अलख याद करे उसे दुहराये।

लोक निकल पड़ा है! हर सड़क हर गली हर चौबारे पर गांधी नाम के इकतारे को लेकर जम गया है!

सरकार बहादुर ठठाकर अट्टहास करती है।
“गांधी! इस गांधी की नाक कटेगी!!”

जनता जनार्दन का विराट रूप धर लेती है उसके हाथों में गांधी के नाम का इकतारा है जिसमें बस एक धुन निकल रही है
“तुम सर काटो, सरकार !!!”

जाग मछन्दर जाग!


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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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