Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

बुर्क़ा पर्दा शाहीन बाग़..

By   /  January 27, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-अशोक कुमार पाण्डे।।

हाँ यह सच है कि बुर्क़ा या घूँघट या पर्दा देखकर पहला ख़याल आता है मुझे भी पिछड़ेपन का। लेकिन सच इतना ही नहीं है।

महिलाएँ जिस परिवेश में रहती हैं, जितना दबाव होता है उन पर ख़ुद को पाक-साफ़ रखने का, बहुत सी चीज़ें उन्हें करनी होती हैं दबाव में और सामाजिक-सांस्कृतिक ट्रेनिंग से कई बार उनकी choice भी उसी हिसाब से निर्मित होती है। मम्मी कहती थीं – महीने भर गांव में घूँघट कर लेना अम्माजी की डाँट सुनने और दुनिया भर की भन-भन झेलने से अच्छा है।

हम अक्सर सशक्तीकरण को प्रतीकों में देखते हैं। मसलन सर पर पल्ला रखने वाली ग़ुलाम जींस पहनने वाली आज़ाद। सिगरेट पीने वाली युवती आज़ाद लेकिन हुक्का पीने वाली सर ढँकी दादी ग़ुलाम। इसी तर्क से शाहीनबाग़ में बुर्क़ा पहने आई औरतें ग़ुलाम! मज़ेदार यह कि यही तर्क तो कपड़े से पहचान करने वालों के हैं जो ‘मर्द रज़ाई में सो रहे हैं और औरतों को सड़क पर भेज दिया है’ जैसे जुमले उछालते हैं।

बहुत सम्भव है कि यह एक टैक्टिस लगी हो कई लोगों को कि भयावह दमन से बचने के लिए महिलाओं को आगे किया जाए। लेकिन डायलेटिक्स न समझने की दिक़्क़त यह कि आप समझ ही नहीं पा रहे कि एक बार उन्होंने संघर्ष का रस छक लिया तो वे वही नहीं रहीं जो थीं अब तक। पिछले सवा महीनों में एक ऐसी दुनिया खुली है उनके सामने जिसे अब तक उन्होंने या तो नहीं देखा था या जिसे उन्हें ख़राब की तरह पेश किया था – नारे लगाती कॉलेज की लड़कियाँ, औरतों के समूह गीत गाते हुए, नाटक करते हुए, कंधे से कंधा लगाकर लड़ते पुरुष और महिलाएँ, आज़ादी के नारे, बराबरी की बातें। यह सब उनके मानस में रोज़ उतर रहा है। कल जो भी हो लेकिन उनके भीतर यह उतर चुका है जिसका असर चार दिन में नहीं ख़त्म होगा। सवाल उनके ज़ेहन में आ चुके होंगे और ख़ुद की ताक़त का अहसास भी। वे आई भले किसी के कहने पर हों लेकिन यहाँ उन्होंने अपने अस्तित्व का एक और पहलू देखा है जिसका असर दीर्घ काल में होगा।

बुर्क़ा यहाँ इनकी क़ैद नहीं पहचान बन गया है। पहचान को असर्ट करने की ज़िद पैदा हुई है और दूसरी पहचानों के साथ बराबरी के स्तर पर चलने का तरीक़ा सीखा है। उन्होंने जाना है कि देश में ऐसे लाखों-करोड़ों लोग हैं जिन्होंने धार्मिक जकड़बंदी की जगह सभी धर्मों के सम्मान और इस बराबरी के लिए लड़ने की राह चुनी है, हर हिंदू संघी नहीं है। वे सोचेंगी कि लीग के सहारे नहीं बल्कि अपनी क़ौम के इंसाफ़पसंद लोगों के सहारे वे सुरक्षित होंगी। यह सवाल उनके सामने आएगा कि भारत का मुस्तकबिल धर्मनिरपेक्षता में ही है। बचपन में पढ़ी कहानियों को अपने सामने ज़िंदा देखा है उन्होंने।

और उन्होंने ही क्यों? हममें से कितने लोग थे जिन्होंने अपने शहर के शाहीनबाग़ देखे थे? हमारे लिए भी तो वे बाहरी इलाक़े रहे थे जहाँ कभी ईद-बक़रीद गए तो गए। हमने भी तो देखा है कि उन बंद इलाक़ों में कितनी खुली खिड़कियाँ हैं कितने बढ़े हुए हाथ हैं कितना साझा दर्द है कितने साझे सपने हैं और कितनी उम्मीद है उनके साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने में।

माफ़ कीजिए लेकिन मै मेरा घर मेरा परिवार ही नहीं मैं मेरा वाला फ़ेमिनिज़म मेरी किताब मेरी फ़ोटो वाली भी तमाम लोगों से अधिक उम्मीद उन बुर्क़ा और पल्लू वाली हिंदू-मुस्लिम औरतों से है मुल्क को। तय उन्हें करना है कि माथे के आँचल को परचम बनाएँगी या कंधे पर लटका झंडा थामेंगी या बालों को ज़ोर से उनमें कस नारे लगाएँगी। आज वे कह रही हैं – उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे – देखना है हम कितने क़दम चल पाते हैं।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

हर हाल में तत्काल रोकी जाए यह हिंसा!

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: